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विष्णु

भगवान विष्णु के नाम, शंख-चक्र, लक्ष्मी से संबंध, दशावतार, राम-कृष्ण की कथाएँ, वैष्णव दर्शन, मंदिर और पर्व सरल भाषा में समझें।

संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

किसी विशाल संसार को एक साथ बाँधे रखने वाली शक्ति क्या है? जब व्यवस्था डगमगाने लगती है, अधिकार रखने वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी भूल जाता है या किसी निर्बल को संरक्षण चाहिए होता है, तब मनुष्य न्याय और सहारे की कल्पना किस रूप में करता है? हिंदू परंपराओं में भगवान विष्णु के अनेक रूप और आख्यान इन प्रश्नों से जुड़े हैं। उन्हें प्रायः जगत के पालनकर्ता कहा जाता है। लेकिन पालन का अर्थ केवल यह नहीं कि बनी-बनाई दुनिया को स्थिर रखा जाए। ऋग्वेद के विष्णु विराट कदमों से लोकों को नापते हैं; पुराणों के विष्णु संकट में अवतार लेते हैं; और महाभारत के कृष्ण, अर्जुन को कर्म एवं धर्म का गहरा अर्थ समझाते हैं। 1 3 4

अनेक वैष्णव संप्रदायों में विष्णु अथवा नारायण ही सर्वोच्च परमसत्ता हैं। वहाँ वे केवल ब्रह्मा और शिव के साथ सृष्टि के कार्य बाँटने वाले तीन देवों में से एक नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व के मूल आश्रय माने जाते हैं। दूसरी ओर शैव, शाक्त तथा कुछ अन्य दार्शनिक परंपराएँ परमसत्ता को अलग ढंग से समझाती हैं। किसी एक समुदाय की आस्था को सभी हिंदुओं का निर्विवाद मत बताना ठीक नहीं होगा। इस परिचय में हम विष्णु के नामों, ग्रंथों, कहानियों, प्रतीकों, मंदिरों और विचारधाराओं को इसी विविधता के साथ जानेंगे। 2 13

नाम, अर्थ और पहचान

विष्णु नाम के अर्थ की व्याख्या प्रायः 'व्याप्त होने वाले' या 'सब ओर व्यापक' सत्ता के रूप में की जाती है। इसकी शाब्दिक व्युत्पत्ति के सूक्ष्म प्रश्न संस्कृत-भाषाविज्ञान के अध्ययन का विषय हैं। ऋग्वेद में विष्णु विशाल पग भरकर लोकों का विस्तार नापते हैं। इसलिए उरुक्रम और त्रिविक्रम जैसे नाम उनके व्यापक कदमों की याद दिलाते हैं। बाद की भक्तिपरंपराओं में नारायण, हरि, केशव, माधव, गोविंद, अच्युत, जनार्दन, पद्मनाभ, पुरुषोत्तम, श्रीमन्नारायण तथा वासुदेव जैसे नाम अत्यंत प्रिय हैं। 1 2

किसी नाम में कथा छिपी होती है तो किसी में उपासना का भाव। पद्मनाभ नाम नाभि से जुड़े कमल की स्मृति कराता है। गोविंद और केशव कृष्ण की भक्ति में भी बहुत प्रचलित हैं। श्रीमन्नारायण में 'श्री', यानी लक्ष्मी का सान्निध्य विशेष अर्थ रखता है। दैनिक प्रार्थना में विष्णु, नारायण और कृष्ण के नाम एक साथ बोले जा सकते हैं; फिर भी दर्शनशास्त्र के प्रत्येक मत में ये शब्द सर्वथा समान तकनीकी अर्थ नहीं रखते। इनके परस्पर संबंध को समझना वैष्णव परंपराओं की बारीकियों को समझना है। 2 3 13

वैदिक विष्णु से पुराणों के नारायण तक

ऋग्वेद 1.154 पढ़ने पर पहली बात यह दिखाई देती है कि वहाँ परिचित चार भुजाओं वाली मूर्ति का विवरण मुख्य विषय नहीं है। मंत्र विष्णु के तीन विराट पगों, उनके द्वारा लोकों को सँभालने और उनके परम पद का गुणगान करते हैं। वेद का यह अपना संदर्भ है। कालांतर में वामन–त्रिविक्रम की कथा इसी व्यापक-पग वाले रूप के साथ जोड़ी जाती है। दोनों में संबंध पहचानना उचित है, पर यह कहना कि ऋग्वेद के उसी सूक्त में राजा बलि के यज्ञ की पूरी पुराण-कथा मौजूद है, सटीक नहीं होगा। 1

महाकाव्यों, पुराणों, तमिल भक्ति-साहित्य और मंदिरों की परंपराओं ने विष्णु की पहचान को अनेक आयाम दिए। वे ब्रह्मांड के आधार नारायण हैं, धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होने वाले भगवान हैं और भक्त के लिए सुलभ प्रियतम भी। विष्णु पुराण प्रथम अंश में उनकी व्यापक सत्ता और सृष्टि के कार्यों का विवेचन करता है। भागवत पुराण अवतारों की विविधता और उनकी कथाओं के स्मरण पर बल देता है। इन ग्रंथों का धार्मिक दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण है, पर दोनों को समस्त हिंदू संप्रदायों का एक-सा प्रतिनिधि नहीं मानना चाहिए। 2 3 15

इतिहास की पड़ताल एक अलग रास्ता अपनाती है। चोलकालीन विष्णु प्रतिमा, कश्मीर का वैकुण्ठ-विष्णु रूप और दक्षिण-पूर्व एशिया की प्राचीन प्रतिमाएँ बताती हैं कि विभिन्न क्षेत्रों में उनकी मूर्तियों और उपासना का समृद्ध विकास हुआ। ऐसी प्रतिमा से उसकी कला, समय और धार्मिक प्रतीकों का साक्ष्य मिलता है। वह किसी चमत्कार की ऐतिहासिक सत्यता का प्रमाण अपने-आप नहीं बन जाती। यही अंतर परंपरा का सम्मान करते हुए सावधान शोध करने में सहायक है। 9 10 11

1. वामन और बलि: केवल तीन पग भूमि

राजा बलि सामर्थ्यवान और दानशील हैं। उनके यज्ञ में एक छोटे-से ब्रह्मचारी, वामन, का आगमन होता है। वे बहुत कम माँगते हैं—मात्र तीन पग भूमि। पहली दृष्टि में यह विनती इतनी छोटी है कि राजा सहज ही स्वीकार कर लेते हैं। किंतु इस अतिथि में विष्णु स्वयं प्रकट हुए हैं। कथा आगे बढ़ते ही वे विराट त्रिविक्रम स्वरूप धारण करते हैं और भूमि के तीन पगों का अर्थ बदल जाता है। भागवत पुराण 8.18 में वामन का प्राकट्य और बलि से उनका मिलना वर्णित है; 8.19.16 में तीन पग भूमि की स्पष्ट माँग आती है। 1.3.19 में अवतार-परिचय के साथ इस प्रसंग का संकेत भी मिलता है। 6 19 3

इस कथा में अहंकार का प्रश्न अवश्य है, पर बलि को केवल दुष्ट पात्र बनाकर देखने से उसका संदेश अधूरा रह जाएगा। कई भक्तिपरंपराएँ उनकी दानशीलता, वचनपालन और शरणागति को भी आदर देती हैं। त्रिविक्रम का वैदिक बिंब और वामन-बलि का बाद का आख्यान एक दूसरे से जुड़े हैं, लेकिन उनकी साहित्यिक परिस्थितियाँ अलग हैं। इस भेद को याद रखना ग्रंथों के सही पाठ में सहायता करता है। 1 6

2. समुद्र-मंथन: सहयोग, संघर्ष और लक्ष्मी

अमृत की प्राप्ति के लिए देवता और असुर समुद्र का मंथन करते हैं। मंदराचल पर्वत मथानी बनता है, लेकिन उसे थामने के लिए आधार की आवश्यकता पड़ती है। प्रसिद्ध कथा में विष्णु कूर्म, अर्थात कछुए, का रूप लेकर यह भार सँभालते हैं। मंथन से अनेक वस्तुएँ और शक्तियाँ सामने आती हैं; लाभ के साथ संकट भी उत्पन्न होता है। भागवत पुराण के अष्टम स्कंध, अध्याय 8 में देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव और विष्णु को चुनने का वर्णन मिलता है। 3 7

लक्ष्मी को केवल वैभव बाँटने वाली देवी या विष्णु की प्रतिमा के पास खड़ी रहने वाली पात्र समझना सीमित दृष्टि होगी। श्रीवैष्णव परंपरा में 'श्री' का स्थान दिव्य कृपा और नारायण की शरण के विचार से गहराई से जुड़ा है। शाक्त परंपराएँ देवी की स्वतंत्र परमसत्ता पर विशेष बल दे सकती हैं। इन विभिन्न दृष्टियों को एक-दूसरे पर थोपने की आवश्यकता नहीं। लक्ष्मी का विस्तृत परिचय संबंधित लक्ष्मी पृष्ठ में मिलेगा, जो अभी प्रकाशन-प्रतीक्षारत है। 7 13

3. राम: कठिन परिस्थितियों में मर्यादा

अयोध्या के राजकुमार राम की कथा वनवास, सीता के अपहरण, मित्रता, वानर-सेना के सहयोग और रावण से युद्ध तक पहुँचती है। हिंदू समाज की अनेक परंपराओं में उन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। भागवत पुराण 1.3.22 में राम को अवतारों में गिना गया है, यद्यपि वाल्मीकि रामायण और अन्य क्षेत्रीय रामकथाएँ अपने-अपने साहित्यिक ढंग से घटनाओं को कहती हैं। 3 13

राम की कथा में पराक्रम के साथ-साथ वचन, परिवार, राजधर्म, न्याय और पीड़ा के कठिन प्रश्न आते हैं। इसलिए इसे केवल असुर-वध की कहानी समझना पर्याप्त नहीं। हनुमान की रामभक्ति सेवा और निष्ठा का विशिष्ट उदाहरण बनी है। ShivGoraksh की हनुमान परिचय-श्रृंखला में इस संबंध का अधिक विस्तार होगा। विष्णु, राम और हनुमान का धर्मशास्त्रीय संबंध विभिन्न वैष्णव एवं स्थानीय परंपराओं में अलग बल के साथ समझाया जा सकता है। 3 13

4. कृष्ण: रणभूमि पर उठते जीवन के प्रश्न

कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सामने केवल युद्ध नहीं, एक नैतिक संकट है। वे अपने संबंधियों और गुरुओं को देखकर विचलित हो जाते हैं। उनके सारथी श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मसंयम और परमसत्ता पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। भगवद्गीता 4.7–4.8 में कृष्ण धर्म के ह्रास और अधर्म की वृद्धि पर अपने प्राकट्य का आशय बताते हैं। 18.66 में शरणागति का संदेश सामने आता है। इन श्लोकों पर अलग-अलग आचार्यों ने अलग व्याख्याएँ दी हैं; केवल एक भावार्थ सबके लिए अंतिम नहीं माना जा सकता। 4 5 8

एक सूक्ष्म मतभेद यहाँ विशेष रूप से समझने योग्य है। कई वैष्णव दृष्टियों में कृष्ण विष्णु के अवतार हैं। कुछ कृष्ण-केंद्रित संप्रदायों में वे स्वयं भगवान हैं और विष्णु के स्वरूपों की उत्पत्ति उनसे समझी जाती है। भागवत पुराण 1.3.28 से इस दूसरे मत को प्रमुख आधार मिलता है। यह अंतर भक्तों के बीच सम्मान का विषय हो सकता है, विवाद का अनिवार्य कारण नहीं। ShivGoraksh की अलग तैयार की गई भगवद्गीता को इस पृष्ठ से तभी जोड़ा जाएगा जब उसका वास्तविक प्रकाशन हो। 3 13

दशावतार: दस प्रसिद्ध रूप और उससे आगे

दशावतार की एक बहुचर्चित सूची है—मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। कुछ परंपराएँ बुद्ध के स्थान पर बलराम को सम्मिलित करती हैं। कृष्ण को परम मूल मानने वाली परंपराओं में अवतारों की गणना और उनका क्रम दूसरे प्रकार से प्रस्तुत हो सकता है। इसलिए किसी एक चित्र या पोस्टर में अंकित दस नामों को शास्त्रों की सर्वसम्मत, अपरिवर्तनीय सूची कहना गलत होगा। 3 13

स्वयं भागवत पुराण 1.3 में दस से अधिक रूपों का उल्लेख है और अवतारों की संख्या अनगिनत बताई गई है। वराह-प्रसंग में पृथ्वी का उद्धार, नरसिंह की कथाओं में प्रह्लाद की रक्षा, वामन में बलि से संवाद, राम में मर्यादा और कृष्ण में धर्म की पुनर्व्याख्या जैसे विषय उभरते हैं। इन रूपों को भक्ति और धर्मशास्त्र के कथात्मक माध्यम के रूप में पढ़ना चाहिए। इन्हें सीधे जैव-विकास का वैज्ञानिक नक्शा या ऐतिहासिक घटनाओं की सिद्ध समयरेखा घोषित करना शोध की दृष्टि से उचित नहीं है। 3

अवतार का आशय मात्र भेष बदलना नहीं। भक्त के लिए यह विचार महत्त्वपूर्ण है कि जिस दिव्य सत्ता को मन या भाषा से पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता, वही किसी सुलभ रूप में प्रेम, संवाद और संरक्षण का अनुभव करा सकती है। परंतु प्रश्न बना रहता है: अनंत और सीमित का संबंध कैसे संभव है? अलग-अलग वैष्णव दर्शनों के उत्तर इसी स्थान पर रोचक भिन्नताएँ प्रकट करते हैं। 13

शंख, चक्र, गदा, पद्म और विष्णु की प्रतिमाएँ

विष्णु की चार भुजाओं में दिखाई देने वाली वस्तुएँ उनके सबसे परिचित चिह्न हैं। शंख का स्वर आह्वान या युद्ध की घोषणा से जुड़ सकता है; चक्र रक्षा और निर्णायक शक्ति का संकेत देता है; गदा सामर्थ्य से और पद्म मंगल तथा पवित्रता से संबद्ध समझा जाता है। ये सामान्य व्याख्याएँ हैं, प्रतिमा के हर विवरण का एकमात्र प्रमाणित अर्थ नहीं। अलग काल और स्थान की मूर्तियों में इन आयुधों का स्थान, मुद्रा और साथ खड़ी आकृतियाँ भिन्न हो सकती हैं। 9 14

मुकुट, आभूषण, वनमाला, पीताम्बर और शांत मुद्रा अनेक चित्रों में दिखाई देते हैं। विष्णु का वाहन गरुड़ है, जो पक्षीरूप या पक्षी-मानव रूप में अंकित हो सकता है। दूसरी प्रसिद्ध छवि में भगवान अनंत या शेष नाग पर क्षीरसागर में शयन करते हैं। कंबोडिया की एक ऐतिहासिक शेषशायी-विष्णु प्रतिमा से इस प्रकार की प्राचीन कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रमाण मिलता है। 18 यह दृश्य अनेक भक्तों को विश्व की निरंतरता, विश्राम और नए सृजन के बीच का संबंध समझाने में सहायक लगता है। कुछ वैष्णव सृष्टि-कथाओं में कमल से ब्रह्मा का प्राकट्य इसी व्यापक ब्रह्मांड-दृष्टि से जुड़ता है। 15 14

कश्मीर की वैकुण्ठ-विष्णु प्रतिमा में मानव मुख के साथ सिंह और वराह से जुड़े रूप दिखाई देते हैं। यह विशेष रूप बताता है कि केवल चार भुजाओं वाली एक ही छवि को विष्णु का संपूर्ण या अनिवार्य रूप नहीं माना जा सकता। मूर्ति का अर्थ समझने के लिए कला की तिथि, निर्माण-स्थान, शिल्प-परंपरा और धार्मिक प्रयोग को साथ देखना पड़ता है। किसी नई बनाई गई वेबसाइट-चित्रकला को अपने-आप प्राचीन शास्त्र का साक्ष्य नहीं मानेंगे। 10

विष्णु, लक्ष्मी, ब्रह्मा और शिव का संबंध

जनसामान्य को हिंदू धर्म का परिचय देते समय प्रायः कहा जाता है कि ब्रह्मा सृजन, विष्णु पालन और शिव संहार या रूपांतरण से जुड़े हैं। यह त्रिमूर्ति की सरल प्रस्तुति है। किंतु हर हिंदू संप्रदाय में तीनों की स्वतंत्रता, परस्पर संबंध और सर्वोच्चता एक जैसी नहीं मानी जाती। विष्णु पुराण विष्णु को सृष्टि के मूल आधार के रूप में प्रस्तुत करता है; शैव और शाक्त ग्रंथ परमसत्ता के बारे में अन्य दृष्टियाँ सामने रख सकते हैं। एक परंपरा की व्याख्या को सबकी सहमति बताना सही नहीं। 2 15

लक्ष्मी के साथ विष्णु का संबंध केवल धन-संपत्ति से जुड़ी लोकप्रिय छवि तक सीमित नहीं है। श्री, मंगल, समृद्धि और करुणा की अवधारणाएँ भी महत्त्व रखती हैं। दक्षिण भारत के कुछ ऐतिहासिक कांस्य-विग्रहों में उनके साथ श्रीदेवी और भूदेवी दिखाई देती हैं; यह एक विशिष्ट प्रतिमा-व्यवस्था है, सभी रूपों के लिए अनिवार्य नियम नहीं। 12 इसी प्रकार ब्रह्मा के कमल-जन्म या शिव से जुड़े अलग पुराण-प्रसंगों को जोड़कर एक ऐसी पारिवारिक वंशावली नहीं बनानी चाहिए, जिसे कोई एक स्रोत स्पष्ट रूप से प्रस्तुत ही नहीं करता।

वैष्णव दर्शन में भक्ति और परमसत्ता

वैष्णव धर्म अनेक संप्रदायों और चिंतन-परंपराओं का व्यापक परिवार है। इनमें भक्ति का अर्थ प्रायः भगवान के प्रति प्रेमपूर्ण निष्ठा, स्मरण, सेवा और आराधना से है। कुछ परंपराओं में मंदिर की सेवा और भजन मुख्य साधन हैं; कहीं शास्त्रों का मनन, कहीं गुरु-परंपरा और कहीं प्रपत्ति, यानी भगवान की शरण ग्रहण करने का भाव, विशेष महत्त्व रखता है। मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं कि भक्त किस नाम से भगवान को पुकारता है, बल्कि यह भी है कि जीव, जगत और ईश्वर का संबंध कैसा माना जाता है। 13

रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत ईश्वर और उनसे संबंधित जीव-जगत के वास्तविक अर्थ पर बल देता है। मध्वाचार्य का द्वैत परमेश्वर और जीव के बीच स्थायी भेद को महत्त्व देता है। वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैत तथा गौड़ीय वैष्णवों का अचिन्त्य-भेदाभेद एकता और भिन्नता के अन्य तरीके बताते हैं। ये केवल परिचयात्मक संकेत हैं; प्रत्येक मत की दार्शनिक गहराई इससे कहीं अधिक है। विष्णु, नारायण और कृष्ण की परस्पर स्थिति भी इन संप्रदायों में भिन्न ढंग से समझी जा सकती है। 13

दक्षिण भारत के आलवार संतों ने तमिल में परमात्मा के प्रति अनुराग को अत्यंत सजीव काव्य का रूप दिया। उनकी रचनाएँ बाद में नालायिर दिव्यप्रबंधम् की परंपरा से जुड़ीं। तिरुमला के वेंकटेश्वर, पुरी के जगन्नाथ और विभिन्न क्षेत्रों के अन्य विष्णु-रूप दर्शाते हैं कि अलग भाषा, संगीत, मंदिर और कथा के माध्यम से वैष्णव भक्ति कैसे जीवित रहती है। एक मंदिर की स्थानीय मान्यता का आदर करना और उसे समस्त वैष्णव मतों पर लागू न करना—दोनों बातें साथ संभव हैं। 16 17

पूजा, मंदिर और तीर्थ-परंपराएँ

घरों में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीप जलाया जाता है, फूल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं, नाम-स्मरण या कथा-श्रवण होता है। कहीं भजन-कीर्तन प्रमुख है, तो कहीं मंदिर के निर्धारित उत्सव और दर्शन। फिर भी हर मंदिर और परिवार की विधि एक समान नहीं होती। प्रतिष्ठित मूर्तियों की विशेष सेवा, मंत्रों के प्रयोग और कुछ अनुष्ठानों के लिए स्थानीय नियम या प्रशिक्षण आवश्यक हो सकता है। यह लेख सामान्य जानकारी देता है; किसी सीमित या दीक्षा-संबंधी प्रक्रिया के निर्देश नहीं देता। 16 13

आंध्र प्रदेश के तिरुमला में भगवान वेंकटेश्वर को श्रीनिवास और बालाजी जैसे नामों से भी जाना जाता है। इस तीर्थ की अपनी प्राचीन मंदिर-परंपरा और सेवा-विधियाँ हैं। ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ की विशेष पहचान कृष्ण और विष्णु से जुड़ी है; वहाँ की रथयात्रा स्थानीय संस्कृति और लोकभागीदारी के लिए महत्त्वपूर्ण है। मंदिर और सरकारी आयोजन-विवरण वहाँ चल रही आस्थाओं और रीति-रिवाजों के उपयोगी स्रोत हैं, पर उनमें किए गए दिव्य-फल संबंधी दावे श्रद्धा के रूप में समझे जाने चाहिए। 16 17

पर्व और कैलेंडर से संबंध

विष्णु और उनके विविध रूपों से जुड़े पर्वों में वैकुण्ठ एकादशी, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, जगन्नाथ की रथयात्रा और केरल में बलि–वामन संबंधी लोकपरंपराओं से जुड़ा ओणम उल्लेखनीय हैं। किन्हीं क्षेत्रों में एकादशी व्रत महत्त्वपूर्ण है, कहीं सामूहिक झाँकियाँ, कहीं भजन या रथ-उत्सव। सबकी धार्मिक व्याख्या तथा उत्सव-विधि एक जैसी नहीं है। 6 16 17

ShivGoraksh के भावी कैलेंडर के लिए एक आवश्यक बात है: त्योहार की तारीख केवल नाम से स्थिर नहीं हो जाती। वर्ष, स्थान, पंचांग की गणना, तिथि और सूर्योदय से संबंधित नियम बदलने पर ग्रेगोरियन दिनांक बदल सकती है। इसलिए यह सदाबहार परिचय किसी पर्व को हर वर्ष एक ही अंग्रेज़ी तारीख पर नहीं बाँधता। वार्षिक तिथियाँ अलग सत्यापित कैलेंडर-डेटा से जोड़ी जानी चाहिए। उपवास से चमत्कारी या चिकित्सकीय परिणाम मिलने का कोई सार्वभौमिक वादा यहाँ नहीं किया गया है।

ग्रंथों में विष्णु का दर्शन

इस विशाल साहित्य में प्रवेश के लिए कुछ स्पष्ट आधार उपयोगी हैं। ऋग्वेद 1.154 विष्णु के विराट तीन पगों की स्तुति करता है। विष्णु पुराण के प्रथम अंश में सृष्टि और दिव्य आधार के विचार आते हैं। भागवत पुराण 1.3 अनेक अवतारों का वर्णन करता है; उसी ग्रंथ के आठवें स्कंध में समुद्र-मंथन और वामन-कथा के प्रसंग हैं। भगवद्गीता में कृष्ण, अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर में धर्म, कर्म, ज्ञान, भक्ति और शरणागति पर विचार करते हैं। स्रोतों का मूल स्थान समझे बिना उनसे अपनी पसंद का निष्कर्ष निकाल लेना उचित नहीं होगा। 1 2 3 4 5 8

ShivGoraksh के लिए भगवद्गीता पहले ही अलग संपादकीय परियोजना के रूप में तैयार की जा चुकी है, लेकिन उसे वेबसाइट पर प्रकाशित मान लेना गलत होगा। तैयार देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) और अष्टावक्र गीता परियोजनाओं का अस्तित्व भी इस बात का संकेत नहीं कि सभी ग्रंथ एक ही वैष्णव दार्शनिक सिद्धांत को स्वीकार करते हैं। प्रत्येक ग्रंथ को उसके उचित प्रसंग में पढ़ना ही अच्छी अध्ययन-पद्धति है।

क्या विष्णु और कृष्ण एक ही हैं?

अनेक वैष्णव परंपराओं में कृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है। कुछ कृष्ण-केंद्रित परंपराओं में कृष्ण स्वयं मूल भगवान और विष्णु उनके दिव्य विस्तार माने जाते हैं। उत्तर देते समय ग्रंथ और संप्रदाय बताना इसलिए आवश्यक है। 3 13

विष्णु बड़े हैं या शिव?

सभी हिंदू परंपराएँ इसका एक जैसा उत्तर नहीं देतीं। वैष्णव, शैव और शाक्त ग्रंथ परमसत्ता का वर्णन अलग भाषा और दृष्टि से करते हैं। एक सम्मानजनक ज्ञानकोश विभिन्न विचारों को प्रमाण सहित रख सकता है; उसे किसी मत की जीत घोषित करने की आवश्यकता नहीं। 2 15

क्या विष्णु के ठीक दस ही अवतार हैं?

नहीं। दशावतार अत्यंत प्रसिद्ध सूची है, लेकिन भागवत पुराण दस से अधिक अवतार गिनाता है और उनके असंख्य होने की बात करता है। विभिन्न सूचियों में बुद्ध और बलराम का स्थान भी अलग हो सकता है। 3

क्या हर विष्णु मंदिर में एक ही प्रकार की पूजा होती है?

नहीं। तिरुमला की वेंकटेश्वर-परंपरा और पुरी की जगन्नाथ-परंपरा अपने इतिहास, रूप, पर्व तथा विधियों में अलग विशेषताएँ रखती हैं। 16 17

क्या चारों आयुधों का अर्थ हर मूर्ति में बिल्कुल तय है?

नहीं। शंख, चक्र, गदा और पद्म के सामान्य अर्थों के साथ मूर्ति का निर्माण-क्षेत्र, काल, पाठ और पूजा-संदर्भ भी देखना चाहिए। नई बनाई गई छवि को पुरातात्त्विक प्रमाण नहीं मानेंगे। 9 10

संदर्भ और स्रोत (19)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Ṛgveda, Śākala Saṃhitā, 1.154, Viṣṇu hymn

    स्रोत खोलें 1

  2. Viṣṇu Purāṇa, Book I, Chapter 2: Prayer of Parāśara to Viṣṇu

    स्रोत खोलें 2

  3. Śrīmad-Bhāgavatam, Book 1, Chapter 3: List of divine manifestations

    स्रोत खोलें 3

  4. Bhagavad Gītā 4.7, Gita Supersite

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  5. Bhagavad Gītā 4.8, Gita Supersite

    स्रोत खोलें 5

  6. Śrīmad-Bhāgavatam, Book 8, Chapter 18: Vāmana

    स्रोत खोलें 6

  7. Śrīmad-Bhāgavatam, Book 8, Chapter 8: The Churning of the Milk Ocean

    स्रोत खोलें 7

  8. Bhagavad Gītā 18.66, Gita Supersite

    स्रोत खोलें 8

  9. Standing Vishnu, Tamil Nadu, Chola period

    स्रोत खोलें 9

  10. Vaikuntha Vishnu, Kashmir

    स्रोत खोलें 10

  11. Standing Four-Armed Vishnu, pre-Angkor Mekong region

    स्रोत खोलें 11

  12. The Hindu God Vishnu, Tamil Nadu, 13th century

    स्रोत खोलें 12

  13. Vaishnavism

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  14. Vishnu, National Museum New Delhi

    स्रोत खोलें 14

  15. Viṣṇu Purāṇa, Book I, Chapter 5

    स्रोत खोलें 15

  16. Places at Tirumala: Sri Venkateswara Temple

    स्रोत खोलें 16

  17. About Rath Jatra, Puri

    स्रोत खोलें 17

  18. Vishnu Resting on the Serpent Shesha (Vishnu Anantashayin)

    स्रोत खोलें 18

  19. Śrīmad-Bhāgavatam, Book 8, Chapter 19: Vāmanadeva Asks Bali for Three Paces of Land

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लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

स्रोत और आगे का अध्ययन

नीचे दिए गए स्रोत क्रमांक स्रोत और संस्करण विवरण की शोध-सूची से संबंधित हैं। मूल ग्रंथों के अलग मतों का सम्मान करते हुए तथ्यात्मक सार अपने शब्दों में लिखा गया है; वेबसाइट और आधुनिक अनुवादों के पुनःप्रयोग-अधिकार की जाँच अभी बाकी है।

Source 1

Ṛgveda, Śākala Saṃhitā, 1.154, Viṣṇu hymn. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

Source 2

Viṣṇu Purāṇa, Book I, Chapter 2: Prayer of Parāśara to Viṣṇu. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

Source 3

Śrīmad-Bhāgavatam, Book 1, Chapter 3: List of divine manifestations. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

Source 4

Bhagavad Gītā 4.7, Gita Supersite. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

Source 5

Bhagavad Gītā 4.8, Gita Supersite. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

Source 6

Śrīmad-Bhāgavatam, Book 8, Chapter 18: Vāmana. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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Śrīmad-Bhāgavatam, Book 8, Chapter 8: The Churning of the Milk Ocean. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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Vaikuntha Vishnu, Kashmir. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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The Hindu God Vishnu, Tamil Nadu, 13th century. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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Vaishnavism. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

Source 14

Vishnu, National Museum New Delhi. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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Viṣṇu Purāṇa, Book I, Chapter 5. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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Places at Tirumala: Sri Venkateswara Temple. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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About Rath Jatra, Puri. शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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Vishnu Resting on the Serpent Shesha (Vishnu Anantashayin). शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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श्रीमद्भागवतम्, अष्टम स्कंध, अध्याय 19: वामन का बलि से तीन पग भूमि माँगना। शोध की सीमा और पुनःप्रयोग-अधिकार के लिए स्रोत और संस्करण विवरण देखें।

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