माँ पार्वती का परिचय केवल इतना नहीं है कि वे भगवान शिव की पत्नी हैं। कहीं वे हिमालय की लाड़ली पुत्री हैं, कहीं कठोर तप करने वाली साधिका, कहीं अपने पुत्र की रक्षा के लिए अडिग खड़ी माता और कहीं ऐसी देवी, जिनके माध्यम से शिव तथा शक्ति का गहरा संबंध समझाया जाता है। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में स्नेह, स्वाभिमान, विवेक, संकल्प और दिव्य सामर्थ्य एक साथ दिखाई देते हैं।
अनेक हिंदू परंपराओं में पार्वती को गणेश की माता तथा कार्तिकेय या स्कंद की माता माना जाता है। उमा, गौरी, गिरिजा, हैमवती, शैलजा और अपर्णा उनके प्रसिद्ध नाम हैं। शाक्त परंपराओं में देवी को केवल किसी देवता की सहचरी न मानकर स्वयं सर्वोच्च सत्ता के रूप में भी पूजा जाता है। फिर भी यह याद रखना ज़रूरी है कि सभी ग्रंथ, मत और क्षेत्रों की देवी-संबंधी मान्यताएँ बिल्कुल एक जैसी नहीं हैं। 1 8
समझने की कुंजी: पार्वती की कथाएँ हमें ऐसी देवी से परिचित कराती हैं जो अपने निर्णय स्वयं लेती हैं, ज्ञान की ओर बढ़ती हैं, परिवार का पोषण करती हैं और आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ता से अन्याय या अवरोध का सामना करती हैं।
पार्वती, उमा, गौरी और गिरिजा: अलग-अलग नामों के अर्थ
पार्वती नाम में पर्वत का संकेत है—पर्वत की पुत्री। उनके पिता हिमवत् या हिमाचल हिमालय का देवस्वरूप हैं और माता को पुराणों में मेना या मेनका कहा गया है। गिरिजा और शैलजा भी पर्वत-कन्या की पहचान बताते हैं। हैमवती नाम उनके हिमवत् से संबंध को याद दिलाता है। उमा बहुत प्राचीन और महत्त्वपूर्ण नाम है; इसका एक ही सर्वमान्य व्युत्पत्तिगत अर्थ बताना उचित नहीं होगा। 2
शिवपुराण की पार्वती-कथा में मेना अपनी पुत्री को कठिन तप से रोकती हैं। इस प्रसंग में उमा नाम की एक कथा-आधारित व्याख्या दी जाती है। उसी ग्रंथ में जब पार्वती तप के समय पत्तों का सेवन भी छोड़ देती हैं, तब अपर्णा नाम की व्याख्या मिलती है। ये ग्रंथ के भीतर दी गई व्याख्याएँ हैं; इन्हें हर युग में प्रचलित नामों का एकमात्र प्रमाणित भाषावैज्ञानिक इतिहास नहीं मानना चाहिए। 3
गौरी प्रायः देवी के उज्ज्वल, मंगलमय स्वरूप से जुड़ा नाम है। अंबिका मातृत्व का भाव जगाती हैं। माँ पार्वती, गौरी माता, उमा-महेश्वरी, शिवानी, गिरिजा, हैमवती और शैलपुत्री जैसे शब्द पाठकों को अलग-अलग धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय संदर्भों में मिलेंगे। नवदुर्गा की परंपरा में शैलपुत्री प्रथम स्वरूप का नाम है, लेकिन नवदुर्गा की सूची पार्वती के सभी नामों की अंतिम सूची नहीं है। इसी प्रकार शंकर सामान्यतः शिव का नाम है—इस आधार पर पार्वती के लिए किसी अलग पति की कल्पना नहीं करनी चाहिए।
प्राचीन ग्रंथों से पुराणों तक: पार्वती की पहचान का विकास
केनोपनिषद् के तृतीय और चतुर्थ खंडों में उमा हैमवती का विशेष उल्लेख मिलता है। इंद्र को जब एक अद्भुत यक्ष का रहस्य समझ में नहीं आता, तब उमा बताती हैं कि वह ब्रह्म था, जिसकी विजय के कारण देवताओं को गौरव प्राप्त हुआ। इस प्रसंग में वे ज्ञान का प्रकाश देने वाली हैं। किंतु यह मानना सही नहीं होगा कि इसी छोटे उपनिषद् प्रसंग में पार्वती का बाद का संपूर्ण विवाह, परिवार और मूर्तिरूप पहले से वर्णित है। 6
शिवपुराण के रुद्रसंहिता—पार्वतीखंड में उनका जन्म, नारद से संवाद, तप, शिव के साथ संबंध और विवाह विस्तार से आते हैं। कालिदास के कुमारसंभव में यही दिव्य संबंध उच्च कोटि की संस्कृत काव्य-कल्पना बनता है। वहाँ हिमालय, ऋतु, प्रेम, तप और देवताओं की आवश्यकता जैसी अनेक बातों को काव्यात्मक ढंग से रखा गया है। दोनों रचनाओं को एक-दूसरे का शब्दशः समान पाठ नहीं समझना चाहिए। 1 14
इतिहास की दृष्टि से मंदिर-मूर्तियाँ एक अलग तरह का प्रमाण देती हैं। नेपाल, उत्तर और मध्य भारत, ओडिशा तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में उमा-महेश्वर, अर्धनारीश्वर और पार्वती के पारिवारिक रूपों की प्राचीन मूर्तियाँ सुरक्षित हैं। उनसे कलाकारों की शैली, किसी समय के धार्मिक विचार और कुछ प्रतिमाओं की भौगोलिक पृष्ठभूमि समझ आती है। किंतु किसी मूर्ति की तिथि को पौराणिक घटना की वास्तविक तिथि नहीं कहा जा सकता। 9 12
1. सती से पार्वती: हिमालय के घर देवी का जन्म
एक प्रसिद्ध शैव कथा में पहले सती का उल्लेख आता है। वे दक्ष की पुत्री और शिव की पत्नी थीं। दक्ष के यज्ञ से जुड़े अपमान और संघर्ष के बाद वे अपना शरीर त्याग देती हैं। शिवपुराण पार्वती का जन्म इसी कथा की अगली कड़ी के रूप में प्रस्तुत करता है: देवी फिर हिमवत् और मेना के यहाँ पुत्री के रूप में प्रकट होती हैं। पार्वतीखंड के प्रारंभिक अध्यायों में इस संबंध को बताया गया है और छठे अध्याय में जन्म का विस्तृत वर्णन है। 1 2
इस कथा में विरह और पुनर्मिलन के साथ माता-पिता का वात्सल्य भी जुड़ता है। जिस दिव्य सत्ता की महिमा देवता गाते हैं, वही पर्वतराज के घर प्रिय बेटी बनकर आती है। भक्त के लिए यह कथा सती और पार्वती के बीच दिव्य निरंतरता व्यक्त करती है। ऐतिहासिक अध्ययन के लिए यह एक धार्मिक आख्यान है, न कि किसी व्यक्ति के पुनर्जन्म का स्वतंत्र रूप से सिद्ध किया गया अभिलेख। अन्य शाक्त और क्षेत्रीय कथाओं में देवी का संबंध अलग तरह से भी प्रस्तुत हो सकता है।
2. पार्वती का तप: अपने निर्णय पर अडिग देवी
पार्वती शिव को पति के रूप में प्राप्त करना चाहती हैं। पर शिव संसार से विरक्त तपस्वी की तरह ध्यानमग्न हैं। शिवपुराण के पार्वतीखंड का अध्याय 22 बताता है कि पार्वती अपने माता-पिता से तप के लिए वन जाने की अनुमति माँगती हैं। मेना चिंतित हो उठती हैं। उन्हें बेटी का स्वास्थ्य, कठिन मौसम और वन का जीवन परेशान करता है। वे आग्रह करती हैं कि तप करना हो तो घर पर ही करो। पार्वती अपने निश्चय से पीछे नहीं हटतीं; अंततः उन्हें अनुमति मिलती है। 3
यहीं कथा में उमा और अपर्णा नामों का अर्थ भी सामने आता है। वस्त्र, सुविधा और आहार छोड़ने जैसे वर्णन उनकी असाधारण तपश्चर्या के प्रतीक हैं। इसे आज के पाठकों के लिए उपवास, भूखे रहने या शरीर को कष्ट देने का निर्देश नहीं समझना चाहिए। ऐसे आचरण स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकते हैं। कहानी का महत्त्व साधना के नाम पर स्वयं को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि आत्मनिश्चय, धैर्य और एकाग्रता जैसे विचारों को समझना है।
अगले प्रसंगों में शिव परीक्षा लेने वाले वेश में आते हैं और पार्वती से कठिन प्रश्न पूछते हैं। उनकी प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि वे अपने चुने हुए मार्ग के बारे में विचार करती हैं; वे किसी के कहने मात्र से अपना निर्णय नहीं बदल देतीं। शिव और पार्वती का मिलन इसलिए केवल अलौकिक प्रेम-कथा नहीं, तप और गृहस्थ जीवन के बीच एक संवाद भी है। 1
3. शिव-पार्वती विवाह: संन्यासी और राजकन्या का मिलन
शिव के विवाह-प्रसंग में विरोधाभास जान-बूझकर उभारा गया है। एक ओर हिमालय के राजा का भव्य परिवार है; दूसरी ओर भस्मधारी, अनगढ़ वेश वाले शिव और उनके विचित्र गणों की बारात। मेना की प्रतिक्रिया तथा अंततः शिव का सौम्य रूप कथा में गहन भावनात्मक रंग भरते हैं। पार्वतीखंड के अध्याय 48 में विवाह का विस्तार मिलता है। एक प्रसंग में जब शिव से कुल-गोत्र पूछा जाता है, तो कथाकार उनके पारलौकिक स्वरूप की ओर ध्यान दिलाता है। 4
भक्तों के लिए यह विवाह शिव की विरक्ति और पार्वती की गृहस्थ आत्मीयता का संगम है। उमा-महेश्वर की मूर्तियों में यही अपनापन सुंदर ढंग से दिखता है। न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन संग्रहालय की नेपाल-निर्मित ग्यारहवीं शताब्दी की एक प्रतिमा में शिव-पार्वती को अत्यंत निकट बैठे दिखाया गया है। वह प्रमाण है कि कलाकारों ने इस दंपती के स्नेह को सदियों पहले भी मूर्त रूप दिया था; उससे किसी विशेष ग्रंथ की हर बात स्वयं सिद्ध नहीं हो जाती। 9
4. द्वार पर खड़ा बालक: माता पार्वती और गणेश
शिवपुराण के कुमारखंड, अध्याय 13 में पार्वती सोचती हैं कि उनके अपने आदेश मानने वाला रक्षक होना चाहिए। वे एक बालक की रचना करती हैं, उसे पुत्र मानती हैं और अपने निजी स्थान के द्वार पर पहरा देने को कहती हैं। शिव आते हैं, लेकिन बालक उन्हें प्रवेश नहीं करने देता। विवाद बढ़ने पर संकट उत्पन्न होता है; आगे के अध्यायों में बालक के मस्तक की हानि, जीवन-प्रत्यावर्तन और गणेश के रूप में प्रतिष्ठा का वर्णन है। ग्रंथ स्वयं दूसरे कल्पों में गणेश-जन्म की भिन्न कथाएँ होने की बात मानता है। 5
इस कथा में पार्वती कोई मूक दर्शक नहीं हैं। पुत्र का जन्म उनके संकल्प से हुआ है और वे उसकी रक्षा के लिए खड़ी होती हैं। इससे मातृत्व, निजी मर्यादा, जिम्मेदारी और अधिकार जैसे अर्थ निकल सकते हैं। पर अर्थ निकालते समय पाठ के अपने संदर्भ को नहीं भूलना चाहिए। हिंदू समुदायों में गणेश के जन्म के अन्य आख्यान भी प्रचलित हैं; यह संस्करण उन सबको समाप्त नहीं करता।
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में पार्वती, कौशिकी और कालिका
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के पाँचवें अध्याय में देवता देवी की स्तुति करते हैं। उसी समय पार्वती गंगा में स्नान करने आती हैं। उनके शरीर के आवरण से एक दिव्य रूप प्रकट होता है, जिसे अंबिका या कौशिकी कहा जाता है। इसके बाद पार्वती के श्याम रूप का कालिका नाम से उल्लेख आता है। यह प्रसंग बताता है कि कुछ शाक्त ग्रंथ देवी के रूपों का गहरा संबंध कैसे स्थापित करते हैं। 7
लेकिन इससे तुरंत यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हर गाँव की काली-मूर्ति, हर दुर्गा-व्रत और हर गौरी-कथा का इतिहास बिल्कुल एक-सा है। पार्वती, गौरी, दुर्गा, काली और कौशिकी के बीच संबंध समझने के लिए जिस ग्रंथ या परंपरा की चर्चा हो रही है, उसे स्पष्ट करना आवश्यक है।
मूर्तियों में माँ पार्वती का स्वरूप
पार्वती का कोई एक चित्र हर स्थान और हर युग के लिए अनिवार्य नहीं है। कभी वे शिव के बगल में बैठी उमा हैं; कभी दोनों के साथ गणेश और कार्तिकेय दिखाई देते हैं; कभी उनके हाथ में कमल, दर्पण या अन्य चिह्न हैं। मेट्रोपॉलिटन संग्रहालय की दसवीं शताब्दी की गौरी प्रतिमा में अनेक भुजाएँ दिखाई देती हैं और बचे हुए एक हाथ में कमल पर बैठे गणेश का रूप है। संग्रहालय बताता है कि शास्त्रीय निर्देशों में देवी के आयुध और चिह्न अलग-अलग हो सकते हैं। 8
ब्रिटिश म्यूज़ियम की ओडिशा-निर्मित हर-पार्वती प्रतिमा में शिव के साथ पार्वती, सिंह, नंदी तथा अन्य सहचर दिखाई देते हैं। एक और संग्रहालय-विवरण में वे दर्पण लिए उमा के रूप में हैं। इसलिए केवल किसी पशु, मुकुट या अस्त्र को देखकर, बिना ऐतिहासिक संदर्भ पढ़े, प्रतिमा को निश्चित रूप से दुर्गा, गौरी या पार्वती बताना जोखिमपूर्ण है। और वेबसाइट के लिए चुना गया नया चित्र प्रामाणिक प्राचीन मूर्ति या ऐतिहासिक प्रमाण अपने-आप नहीं बन जाता। 13 18
अर्धनारीश्वर: एक देह, दो पूरक पक्ष
अर्धनारीश्वर में शिव तथा देवी का संयुक्त अर्ध-पुरुष, अर्ध-नारी रूप दिखाया जाता है। इससे कई शैव और शाक्त व्याख्याओं में चेतना और शक्ति, स्थिरता और अभिव्यक्ति, या पूरक तत्त्वों की अभिन्नता समझाई जाती है। मेट्रोपॉलिटन संग्रहालय में केरल का एक कांस्य रूप तथा लॉस एंजिलिस काउंटी म्यूज़ियम में अन्य ऐतिहासिक उदाहरण दर्ज हैं। विभिन्न समुदाय उस प्रतीक की अलग दार्शनिक व्याख्या कर सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि शिव और पार्वती की स्वतंत्र पूजा का स्थान समाप्त हो गया। 10 11
शिव-शक्ति दर्शन: पार्वती का दार्शनिक महत्त्व
शक्ति का सामान्य अर्थ सामर्थ्य या सक्रिय ऊर्जा से जुड़ता है। कई शैव विचारों में शिव और शक्ति के माध्यम से यह बताया जाता है कि चेतना तथा उसकी अभिव्यक्ति को अलग-अलग करके पूरी वास्तविकता नहीं समझी जा सकती। अनेक शाक्त परंपराएँ देवी को ही परम सत्य मानकर विचार करती हैं। इसलिए पार्वती को केवल 'शिव की ऊर्जा' कह देना कुछ परंपराओं के लिए अधूरा होगा; दूसरी ओर किसी एक शाक्त दर्शन को सबका मत बताना भी अनुचित है। 11
पार्वती की कहानियों से तीन स्तरों पर विचार किया जा सकता है। ज्ञान के स्तर पर केनोपनिषद् की उमा हैमवती इंद्र को सत्य पहचानने में सहायता करती हैं। साधना के स्तर पर पार्वती अपनी इच्छा और निर्णय पर टिकती हैं। संबंधों के स्तर पर वे शिव, गणेश और स्कंद से जुड़ी पारिवारिक कहानियों में उपस्थित रहती हैं। इन तीनों को जोड़ने वाला सूत्र यह है कि आध्यात्मिक जीवन को केवल जंगल में तप या केवल घर की व्यस्तता तक सीमित नहीं किया गया है। 6 3
हिंदू कथाओं में स्कंद/कार्तिकेय के जन्म और पालन से जुड़ी कई भिन्न परंपराएँ हैं। उन्हें हर जगह पार्वती से एक ही तरह जन्मा बताना ठीक नहीं। गणेश के जन्म की कथाओं में भी अंतर है। फिर भी देवी को दोनों पुत्रों के साथ दर्शाने वाली मूर्तियाँ व्यापक परिवार-भावना की साक्षी हैं। चौदहवीं शताब्दी की जावा की एक प्रतिमा में पार्वती के दोनों ओर गणेश और कार्तिकेय दिखाई देते हैं—यह विचार भारत से बाहर की कलात्मक परंपराओं तक भी पहुँचा। 12
पार्वती, दुर्गा और काली: एकता और विविधता को कैसे समझें?
कई श्रद्धालु माँ पार्वती, दुर्गा और काली को एक ही महाशक्ति के भिन्न स्वरूपों के रूप में पूजते हैं। कुछ ग्रंथों में उनके बीच प्रत्यक्ष संबंध बताया गया है; कहीं उनकी कथाओं, मूर्तियों और उपासना-पद्धतियों का केंद्र अलग है। पार्वती/उमा/गौरी नामों से पर्वत-पुत्री, सहचरी और माता का रूप उभरता है। दुर्गा के साथ रक्षा और असुर-विजय की भावना प्रमुख हो सकती है; काली के साथ परिवर्तन, निर्भयता और मातृ-शरण का भाव। ये आम व्याख्याएँ हैं, कठोर सार्वभौमिक श्रेणियाँ नहीं। 7
बंगाल की आगमनी परंपरा में उमा या दुर्गा को मायके लौटती बेटी के रूप में याद किया जाता है। ब्रिटिश म्यूज़ियम के एक ऐतिहासिक चित्र में हिमवत् और मेना उसका स्वागत करते दिखते हैं। उसी देवी का उत्सव असुर-विजयी दुर्गा के रूप में भी मनाया जा सकता है। यही धार्मिक अनुभव की विशेषता है: देवी कहीं पुत्री हैं, कहीं माता, कहीं शक्तिशाली रक्षिका। इस सांस्कृतिक मेल को देखकर यह दावा नहीं करना चाहिए कि सभी क्षेत्रीय प्रतिमाएँ या अनुष्ठान शत-प्रतिशत समान हैं। 17
पर्व, व्रत और लोकजीवन में गौरी-पूजन
राजस्थान के गणगौर पर्व में शिव और गौरी की संयुक्त आराधना महत्त्वपूर्ण है। लोकगीत, सजी हुई प्रतिमाएँ, पारिवारिक उत्सव तथा शोभायात्राएँ इस परंपरा को जीवंत बनाते हैं। राजस्थान पर्यटन विभाग की सामग्री इसे दांपत्य, वसंत और स्थानीय सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से जोड़ती है। किसी ऐतिहासिक पर्व की सामाजिक भूमिका समझना एक बात है; हर व्यक्ति को विवाह या विशेष व्रत करना चाहिए, ऐसा आदेश देना दूसरी बात। यह लेख ऐसी अनिवार्यता नहीं बताता। 15
हरतालिका तीज के प्रसंग में पार्वती की तपस्या और शिव से मिलन को याद किया जाता है। भारत और नेपाल में इसके रीति-रिवाजों में भिन्नता है। नेपाल पर्यटन बोर्ड नृत्य, गीत, मायके आना और स्त्रियों के उत्सव का उल्लेख करता है; पशुपति क्षेत्र से संबंधित आधिकारिक जानकारी इसे शिव-पार्वती की कथा से जोड़ती है। कई परिवार उपवास करते हैं, पर कठोर उपवास सभी के लिए सुरक्षित या आवश्यक नहीं है। आस्था के नाम पर स्वास्थ्य को खतरे में डालना इस लेख का सुझाव नहीं है। 16 19
कुछ स्थानों पर गौरी-पूजन, शिवरात्रि के साथ पार्वती का स्मरण और नवरात्र में देवी के विशिष्ट रूपों का पूजन होता है। अलग-अलग पंचांगों के कारण तिथियों का नागरिक कैलेंडर में स्थान बदल सकता है; इस स्थायी अध्ययन लेख में अप्रमाणित वार्षिक तारीखें नहीं दी गई हैं। नवदुर्गा के नौ रूप और देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के तेरह अध्याय एक ही तरह की सूची नहीं हैं।
सार्वजनिक भक्ति में भजन, कथाश्रवण, मंदिर-दर्शन, पुष्प-अर्पण और देवी के गुणों पर मनन जैसे सरल रूप मिलते हैं। परंपरा-विशिष्ट तांत्रिक दीक्षा, गोपनीय मंत्र और विशिष्ट साधना-विधियों को यहाँ सार्वजनिक निर्देश के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। किसी व्रत या पूजन से चिकित्सा-संबंधी अथवा अलौकिक परिणाम की गारंटी भी नहीं दी जाती।
क्या पार्वती और शक्ति एक ही हैं?
शक्ति दिव्य सामर्थ्य की व्यापक अवधारणा हो सकती है, जबकि पार्वती विशिष्ट नाम, कथाओं और पूजित रूप वाली देवी हैं। अनेक परंपराओं में वे शक्ति की अभिव्यक्ति हैं; कुछ शाक्त दृष्टियों में देवी स्वयं सर्वोच्च सत्य हैं। इसलिए दोनों का संबंध गहरा है, पर शब्दों का प्रयोग संदर्भ देखकर करना चाहिए।
क्या उमा और गौरी शिव की दो अलग पत्नियाँ हैं?
प्रचलित शैव परंपराओं में उमा और गौरी पार्वती से जुड़े नाम और रूप हैं; उन्हें बिना प्रमाण दो असंबद्ध स्त्रियाँ नहीं मानना चाहिए। फिर भी किसी खास ग्रंथ में प्रयुक्त नाम का संदर्भ अलग से पढ़ना उपयोगी है। 8
क्या केनोपनिषद् की उमा का अर्थ वही पूरा पौराणिक पार्वती-चरित्र है?
केनोपनिषद् में उमा हैमवती ज्ञान प्रदान करती हैं। आगे की हिंदू परंपराएँ उन्हें पार्वती से जोड़ती हैं, किंतु केवल उस एक प्रसंग से पूरा विवाह-वृत्तांत और गणेश-कार्तिकेय संबंध सिद्ध नहीं हो जाते। 6
क्या पार्वती कोमल और दुर्गा-काली उनसे बिल्कुल अलग उग्र देवियाँ हैं?
ऐसी कठोर रेखा हर ग्रंथ में नहीं मिलती। देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में पार्वती से कौशिकी का उद्भव और कालिका नाम का प्रसंग है; बंगाल की परंपराओं में उमा और दुर्गा की पहचानें मिलती हैं। कौन-सा रूप किस अर्थ में जुड़ा है, यह स्रोत पर निर्भर है। 7
क्या पार्वती की तपस्या देखकर बहुत कठोर उपवास करना चाहिए?
नहीं। वह अलौकिक तप का पौराणिक आख्यान है, स्वास्थ्य संबंधी सलाह नहीं। नियमित जीवन में धैर्य, अध्ययन और संयम का अभ्यास शरीर को नुकसान पहुँचाए बिना किया जा सकता है।
क्या शिव और शंकर पार्वती के दो अलग-अलग पति हैं?
बहुत-सी हिंदू परंपराओं में शंकर भगवान शिव का ही नाम है। शिवगोरक्ष ने इन नामों पर अलग अध्ययन-पृष्ठ इसलिए रखे हैं कि पाठकों की जिज्ञासाएँ अलग हैं—इससे दो स्वतंत्र देवता या दो पति सिद्ध नहीं होते।
छोटे शब्दार्थ
- पार्वती: पर्वतराज की पुत्री के रूप में पूजित देवी।
- उमा: देवी का महत्त्वपूर्ण नाम; केनोपनिषद् में उमा हैमवती।
- गौरी: देवी का मंगलमय, उज्ज्वल नाम या रूप।
- हिमवत्/हिमाचल: हिमालय का देवस्वरूप, कथाओं में पार्वती के पिता।
- मेना/मेनका: प्रमुख पौराणिक कथाओं में पार्वती की माता।
- तपस्: अनुशासन और तपश्चर्या; इसका अर्थ अनिवार्य रूप से कठोर उपवास नहीं।
- शक्ति: दिव्य सामर्थ्य; विभिन्न दर्शनों में इसके अर्थ भिन्न हो सकते हैं।
- उमा-महेश्वर: शिव और पार्वती का संयुक्त नाम या मूर्तिरूप।
- अर्धनारीश्वर: शिव और शक्ति का संयुक्त अर्ध-पुरुष, अर्ध-नारी स्वरूप।
- कौशिकी: देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के एक प्रसंग में पार्वती से प्रकट देवी।
- आगमनी: बंगाल में उमा के मायके आने से जुड़ी गीत और उत्सव-परंपरा।




