एक कमल की कल्पना कीजिए। चारों ओर आदिकालीन जलराशि है और उस कमल पर बैठे हैं ब्रह्मा, जिनके चार मुख चार दिशाओं की ओर देखते हैं। हिंदू धर्म की अनेक कथाओं में वे प्राणियों, ऋषियों और संसार की विविध व्यवस्थाओं को प्रकट करने वाले सृष्टिकर्ता हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सभी हिंदू परंपराएँ उन्हें एकमात्र, सबसे ऊपर स्थित और किसी दूसरे तत्त्व पर निर्भर न रहने वाला परमेश्वर मानती हैं। ब्रह्मा को सृष्टि की शक्ति कहाँ से मिलती है, वे विष्णु और शिव से किस प्रकार जुड़े हैं, तथा सृष्टि किस क्रम में प्रकट होती है—इन प्रश्नों के उत्तर ग्रंथों और संप्रदायों में अलग-अलग हैं। 2 3 4
ब्रह्मा की कथा केवल यह बताने के लिए नहीं है कि 'दुनिया किसने बनाई'। उसमें ज्ञान, अहंकार, समय, जिम्मेदारी, तप और विनम्रता जैसे प्रश्न भी हैं। आइए उनके धार्मिक स्वरूप, साहित्य, मूर्तिकला और जीवित पूजा-परंपराओं को समझें। यहाँ पुराण की कथा, दर्शन की व्याख्या और इतिहास से प्रमाणित बात को एक नहीं माना जाएगा।
नाम, अर्थ और पहचान: ब्रह्मा, ब्रह्म तथा ब्राह्मण
सबसे पहले एक बहुत जरूरी अंतर समझें। ब्रह्मा (Brahma)ब्रह्मा (Brahmā) अनेक हिंदू कथाओं के सृष्टिकर्ता देवता हैं। ब्रह्म (Brahman) बहुत-सी दार्शनिक परंपराओं में परम सत्य या अंतिम वास्तविकता का नाम है। ब्राह्मण (Brāhmaṇa/Brahmin) सामाजिक-पुजारी वर्ग के संदर्भ में प्रयुक्त शब्द है; वैदिक साहित्य के एक ग्रंथ-वर्ग को भी ब्राह्मण कहते हैं। इन शब्दों का भाषायी इतिहास आपस में जुड़ा हो सकता है, पर इनके अर्थ अपने-आप एक नहीं हो जाते। किसी उपनिषद में 'ब्रह्म' का उल्लेख होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उसी वाक्य में चार मुख वाले ब्रह्मा का वर्णन है। 15
ब्रह्मा के साथ प्रजापति (प्रजा के स्वामी), पितामह (पूर्वज या जगत के पितामह), स्वयंभू, चतुर्मुख, पद्मयोनि, अब्जज और हिरण्यगर्भ जैसे नाम या संबोधन जुड़े मिलते हैं। पर एक सावधानी चाहिए। 'प्रजापति' और 'हिरण्यगर्भ' शब्दों की प्राचीन वैदिक पृष्ठभूमि है। हर पुराने वैदिक उल्लेख को बाद के पुराणों में मिलने वाले ब्रह्मा का बिल्कुल वैसा ही चित्र नहीं मान सकते। ऋग्वेद 10.121 में हिरण्यगर्भ की स्तुति है, लेकिन वहाँ की चिंतन-परंपरा और बाद की चारमुखी मूर्तियों के बीच विकास और व्याख्या का लंबा इतिहास है। 1
हिंदी में ब्रह्मदेव, ब्रह्माजी, चतुरानन, चतुर्मुख ब्रह्मा, पितामह ब्रह्मा भी प्रचलित नाम हैं। इंटरनेट पर 'Brahma' और 'Brahman' एक-जैसे दिखाई दे सकते हैं, इसलिए सही उत्तर पाने के लिए प्रश्न का संदर्भ देखना आवश्यक है।
वैदिक चिंतन से पुराणों की सृष्टि-कथाओं तक
वैदिक साहित्य में सृष्टि का एक ही अनिवार्य वर्णन नहीं मिलता। अलग-अलग मंत्र कभी मूल शक्ति, कभी प्रजापति, कभी हिरण्यगर्भ और कभी अस्तित्व के रहस्य पर विचार करते हैं। ऋग्वेद 10.121 का प्रसिद्ध विषय हिरण्यगर्भ है, जिसे प्राणी-जगत के आरंभ और धारण करने वाली सत्ता के रूप में संबोधित किया जाता है। आगे चलकर इस भाषा को ब्रह्मा की अवधारणा से जोड़ा गया; पर इसे यह दावा बनाकर न पढ़ें कि चार मुख वाले ब्रह्मदेव का बाद वाला पूर्ण स्वरूप उसी मंत्र में शब्दशः मौजूद है। 1
कई पुराणों में ब्रह्मा एक व्यक्तित्व वाले देवता बनकर सृष्टि में भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, विष्णु पुराण के प्रथम अंश का दूसरा अध्याय रचना, पालन और संहार को भगवान विष्णु की व्यापक सत्ता के अंतर्गत समझाता है। इसी ग्रंथ का पाँचवाँ अध्याय ब्रह्मा के ध्यान और अलग-अलग प्रकार की सृष्टि का वर्णन करता है। यह उस ग्रंथ की वैष्णव धार्मिक दृष्टि है; सभी शैव या शाक्त परंपराओं का समान रूप से बाध्यकारी सिद्धांत नहीं। 2 3
इन वर्णनों में सृष्टि केवल एक बार घटित होने वाली घटना नहीं है। कल्प, प्रलय और पुनः प्रकट होने वाले संसार की कल्पना महत्वपूर्ण है। यहाँ 'सृष्टि' को आधुनिक भौतिक-विज्ञान का प्रयोगात्मक मॉडल नहीं बल्कि धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण मानकर पढ़ना अधिक सटीक है।
1. विष्णु की नाभि से निकला कमल
एक प्रसिद्ध वैष्णव कथा में आदि जल के बीच विष्णु योगनिद्रा में स्थित हैं। उनकी नाभि से कमल निकलता है और उस कमल पर ब्रह्मा प्रकट होते हैं। श्रीमद्भागवत पुराण के तीसरे स्कंध के आठवें अध्याय में वर्णित ब्रह्मा शुरुआत में अपने चारों ओर के जगत को समझ नहीं पाते। वे अपने अस्तित्व और कमल के मूल की खोज करते हैं। 3.8.16 में दिशाओं की ओर देखने के साथ उनके चार मुखों का वर्णन मिलता है। 5
इस दृश्य का सबसे दिलचस्प पहलू क्या है? सृष्टिकर्ता कहे जाने वाले ब्रह्मा का प्रथम अनुभव सर्वज्ञता नहीं, जिज्ञासा और अनिश्चितता है। इस ग्रंथ में ब्रह्मा की शक्ति का मूल विष्णु से जुड़ा है। इससे पाठक समझ सकता है कि अलग-अलग हिंदू ग्रंथों में 'सृष्टिकर्ता' और 'परम सत्य' शब्द एक ही स्तर पर नहीं रखे जाते।
कमल को अनेक पाठक जीवन, प्रस्फुटन और छिपी संभावना के प्रतीक की तरह समझते हैं। फिर भी किसी प्रतीक की एक व्याख्या को अनिवार्य और सर्वमान्य प्राचीन अर्थ घोषित करना ठीक नहीं। यह कथा वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, धार्मिक चित्र और विचार-परंपरा है।
2. मानस-पुत्र और वैराग्य का मार्ग
विष्णु पुराण 1.5 और 1.7 में ब्रह्मा की सृष्टि एक क्रम से आगे बढ़ती है। वे ध्यान करते हैं, विभिन्न तरह के जीव प्रकट होते हैं, और अपेक्षित उद्देश्य पूरा न होने पर अन्य रूपों की रचना होती है। 1.7 में भृगु, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि और वसिष्ठ जैसे मानस-पुत्रों का उल्लेख मिलता है। दूसरे ग्रंथों और प्रसंगों में प्रजापतियों की संख्या और नाम अलग हो सकते हैं; अतः इस सूची को हर पुराण की एकमात्र मानक सूची न समझें। 3 4
इसी प्रसंग में सनंदन आदि कुछ पहले उत्पन्न संतति संसार-विस्तार के बजाय ज्ञान और विरक्ति का मार्ग चुनती है। ब्रह्मा सृष्टि की वृद्धि चाहते हैं, पर ये संतति वैराग्य की ओर बढ़ती है। कहानी एक गहरी बात उठाती है: दुनिया में जिम्मेदारी निभाना और आसक्ति से ऊपर उठना, दोनों आध्यात्मिक विचार-धारा के हिस्से हो सकते हैं।
विष्णु पुराण के इसी विवरण में ब्रह्मा के क्रोध से रुद्र की उत्पत्ति का प्रसंग आता है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि समस्त हिंदू परंपराएँ शिव की सत्ता को केवल इसी तरह समझती हैं। अन्य शैव कथाओं में क्रम और धार्मिक अर्थ भिन्न मिलते हैं। 4
3. पाँचवाँ सिर, भैरव और अहंकार की सीख
आज ब्रह्मा की अधिकांश प्रसिद्ध प्रतिमाओं में चार मुख दिखाई देते हैं। लेकिन कुछ शैव कथाओं में पाँचवें सिर की चर्चा क्यों आती है? शिव पुराण की शतरुद्र-संहिता, अध्याय 8 में ब्रह्मा के अभिमान, भैरव के प्राकट्य और उनके पाँचवें सिर को काटने का वर्णन है। इसके साथ भैरव की कपालधारण और प्रायश्चित्त संबंधी कथा भी जुड़ती है। यह उस परंपरा में ज्ञान के दंभ और उत्तरदायित्व की तीखी कथा है। 7
यहाँ ग्रंथ के भीतर मौजूद एक महत्वपूर्ण पाठांतर जानना जरूरी है। शिव पुराण की विद्येश्वर-संहिता, अध्याय 8 के संबंधित प्रसंग में भैरव प्रहार करने को तैयार होते हैं, लेकिन शिव के हस्तक्षेप से उस क्षण ब्रह्मा बच जाते हैं। दूसरी ओर शतरुद्र-संहिता वाले प्रसंग में पाँचवाँ सिर वास्तव में काटा जाता है। इसलिए दोनों कथाओं को मिलाकर 'एक ही निश्चित पुराण-कथा' कहना गलत होगा। 6 7
इन कथाओं का धार्मिक संदेश अहंकार, सत्य का दावा और शक्ति के सदुपयोग से जुड़ा है। शैव संदर्भ में शिव की सर्वोच्चता सामने आती है। लेकिन कथा का मतलब यह नहीं कि किसी दूसरे संप्रदाय के उपासक को कमतर बताया जाए, या इसे एक ऐतिहासिक शारीरिक घटना का प्रमाण माना जाए।
4. कृष्ण के सामने ब्रह्मा का मोह
श्रीमद्भागवत पुराण 10.13 में ब्रह्मा गोकुल के बालक कृष्ण की लीला देखते हैं। उनकी शक्ति परखने के लिए वे बछड़ों और ग्वालबालों को छिपा देते हैं। कृष्ण उन्हीं के समान रूपों में प्रकट होकर अपना खेल जारी रखते हैं। अंततः ब्रह्मा को समझ आता है कि जिस दिव्यता को वे सीमित बुद्धि और अपनी सृजन-क्षमता से परखना चाहते थे, वह उनसे कहीं अधिक व्यापक है। ब्रह्मा विनम्र होकर स्तुति करते हैं। 8
इस कहानी में ब्रह्मा केवल सृष्टि बनाने वाले देवता नहीं, सीखने वाले पात्र भी हैं। भागवत की वैष्णव दृष्टि में कृष्ण की सर्वोच्चता और ब्रह्मा की विनम्रता का पाठ मिलता है। इसे सभी हिंदू संप्रदायों की एक ही देव-क्रम सूची घोषित करना सही नहीं, लेकिन वैष्णव भक्ति का यह महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रसंग है।
ब्रह्मा की मूर्ति और प्रतीकों को कैसे पहचानें?
ब्रह्मा के प्रमुख दृश्य-चिह्न हैं चार मुख, अनेक प्रतिमाओं में चार भुजाएँ, पुस्तक या पांडुलिपि, अक्षमाला, कमंडल, कभी कुशा घास और एक हंस जैसा पक्षी। कई चित्रों में वे कमल पर बैठे दिखते हैं। हर प्रदेश या युग की प्रतिमा में वस्तुओं का एक-जैसा क्रम नहीं मिलता। 'चार मुख यानी चार वेद' जैसी व्याख्या प्रसिद्ध है, पर किसी कला-वस्तु में चार मुख देखकर यह दावा नहीं करना चाहिए कि उसके निर्माता ने केवल यही अर्थ सोचा था। 9 10
न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ आर्ट में संरक्षित लगभग 1720 के माणकोट क्षेत्र के एक चित्र में ब्रह्मा के हाथों से कमंडल, माला, वेद-संबंधी पुस्तक और कुशा जैसे चिह्न पहचाने गए हैं। उसी संग्रहालय में दसवीं शताब्दी के प्रारंभ की कंबोडियाई प्रतिमा बताती है कि ब्रह्मा का बहुमुखी रूप भारत से बाहर दक्षिण-पूर्व एशियाई धार्मिक कला में भी स्थापित था। ये ऐतिहासिक कलाकृतियाँ पूजा और चित्रांकन की परंपरा का प्रमाण हैं; पुराणों में वर्णित घटना घटने का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं। 9 10
क्लीवलैंड म्यूज़ियम ऑफ आर्ट की एक मूर्ति का संग्रहालय शीर्षक 'ब्रह्मा–शिव' है। यह याद दिलाता है कि कभी आकृति मिश्रित या विशिष्ट शिल्प-कार्यक्रम का हिस्सा हो सकती है। किसी चित्र को वेबपेज पर लगाने से पहले उसकी वास्तविक पहचान, काल और संग्रहालय की टिप्पणी देखनी चाहिए। 11
सृष्टि, कालचक्र और दर्शन का संबंध
ब्रह्मा को समझने के लिए सृष्टि, कल्प और प्रलय महत्वपूर्ण शब्द हैं। विष्णु पुराण 1.3 में ब्रह्मा के दिन-रात और विशाल समय-चक्र का वर्णन है। संसार प्रकट होता है, विश्राम या लय की अवस्था आती है और फिर नया चक्र शुरू होता है। इस समय-विस्तार को आधुनिक ब्रह्मांड-विज्ञान से प्रमाणित भौतिक आयु मान लेना उचित नहीं; यह धार्मिक काल-कल्पना है। 12
लोकप्रिय त्रिमूर्ति चित्र में ब्रह्मा सृष्टि, विष्णु पालन और शिव संहार या लय से जुड़े होते हैं। सीखने की शुरुआत के लिए यह उपयोगी है, लेकिन इससे हिंदू दर्शन की सभी धाराएँ पूरी तरह नहीं समझाई जा सकतीं। विष्णु पुराण में ये भूमिकाएँ विष्णु की परम सत्ता में समाहित बताई गई हैं। शैव परंपराएँ शिव को परम मान सकती हैं; शाक्त परंपराओं में देवी या शक्ति को केंद्रीय सृजन-शक्ति समझा जा सकता है। कश्मीर की एक ऐतिहासिक त्रिमूर्ति मूर्ति, जो मेट संग्रहालय में है, तीनों के संयुक्त कलात्मक रूप को दिखाती है—पर अकेली प्रतिमा सबके दार्शनिक मत का अंतिम प्रमाण नहीं। 2 13
यह भी याद रखें कि ब्रह्मा का कल्पों में वर्णित जीवनकाल और ब्रह्म का दार्शनिक अर्थ दो अलग विषय हैं। एक में व्यक्तित्व वाला सृष्टिकर्ता और उसकी ब्रह्मांडीय भूमिका है, दूसरे में परम वास्तविकता का प्रश्न। किसी विशिष्ट दर्शन में संबंध हो सकता है, मगर दोनों शब्दों का अंतर मिटाकर अध्ययन नहीं किया जा सकता। 12 15
सरस्वती, सावित्री, गायत्री, विष्णु और शिव से संबंध
सामान्य धार्मिक चित्रों तथा कथाओं में ब्रह्मा का संबंध विद्या, वाणी और कला की देवी सरस्वती से जोड़ा जाता है। अन्य कथाओं में सावित्री और गायत्री के नाम प्रमुख हैं। इन तीनों नामों का संबंध हर ग्रंथ या प्रदेश में बिल्कुल एक-जैसा नहीं होता। विशेषतः पुष्कर के स्थानीय आख्यान में ब्रह्मा के यज्ञ, गायत्री और सावित्री की नाराजगी का वर्णन मिलता है। राजस्थान पर्यटन के अभिलेख मंदिर में गायत्री की परंपरा तथा सावित्री के पहाड़ी मंदिर का उल्लेख करते हैं। इसे पुष्कर की प्रचलित धार्मिक परंपरा के रूप में बताएँ, हर संप्रदाय पर लागू एक अंतिम वंशावली के रूप में नहीं। 14 16
विष्णु से संबंध कमल-जन्म या विष्णु की सृजनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में मिलता है। शिव से संबंध में संवाद, विवाद, भैरव और पुनः सामंजस्य जैसे प्रसंग आते हैं। ऐसी अलग-अलग कथाएँ केवल 'किस देवता की विजय हुई' की प्रतियोगिता नहीं हैं; वे विभिन्न परंपराओं के भीतर परम सत्ता, रचना और नैतिकता पर विचार भी प्रकट करती हैं। 2 5 7
धर्मग्रंथों में ब्रह्मा: पढ़ने का क्रम
- ऋग्वेद 10.121: हिरण्यगर्भ और सृष्टि के उद्गम का वैदिक चिंतन; इसे सीधे चार मुख वाली प्रतिमा का वर्णन न मानें। 1
- विष्णु पुराण 1.2, 1.3, 1.5 तथा 1.7: विष्णु-केंद्रित ब्रह्मांड-व्यवस्था, विशाल कालचक्र, ब्रह्मा की रचना और मानस-पुत्र। 2 3 4 12
- श्रीमद्भागवत पुराण 3.8 और 10.13: कमल-जन्म तथा बालकृष्ण से जुड़े ब्रह्मा के मोह का प्रसंग। 5 8
- शिव पुराण, विद्येश्वर-संहिता 8 और शतरुद्र-संहिता 8: पाँचवें सिर और भैरव से जुड़े भिन्न विवरण। 6 7
ये संदर्भ पहचाने जा सकने वाले ग्रंथों और ऑनलाइन प्रस्तुतियों के हैं। मूल संस्कृत पाठों की स्वतंत्र संस्करण-समीक्षा तथा सामग्री के पुनःउपयोग की विधिवत अनुमति अभी शेष है। ShivGoraksh की पहले तैयार भगवद्गीता, देवीमाहात्म्य और अष्टावक्रगीता परियोजनाओं को इस लेख में अनावश्यक रूप से दोहराया नहीं गया है और न ही उन्हें प्रकाशित माना गया है।
मंदिर, पुष्कर और जीवित भक्ति
राजस्थान में अजमेर के पास पुष्कर ब्रह्मा-उपासना के प्रसिद्ध तीर्थों में है। राजस्थान पर्यटन विभाग जगतपिता ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर सरोवर, चतुर्मुख प्रतिमा, हंस के प्रतीक तथा कार्तिक पूर्णिमा के समय होने वाले तीर्थ-आयोजनों का उल्लेख करता है। स्थानीय परंपरा में कमल गिरने से सरोवर बनने और ब्रह्मा के यज्ञ की कहानी भी सुनाई जाती है। मंदिर और वहाँ की वर्तमान पूजा ऐतिहासिक-सांस्कृतिक रूप से देखी जा सकने वाली चीजें हैं; यज्ञ या कमल की कथा एक पवित्र आख्यान है। 14 16
क्या पुष्कर में दुनिया का अकेला ब्रह्मा मंदिर है? नहीं। कुछ पर्यटन सामग्री में ऐसा वाक्य लिखा मिलता है, लेकिन उसे शाब्दिक वैश्विक तथ्य बनाना गलत होगा। राजस्थान सरकार के एक आधिकारिक प्रेस विवरण में बालोतरा जिले के आसोतरा ब्रह्म मंदिर में पूजा-अर्चना दर्ज है। स्वतंत्र ब्रह्मा मंदिर अपेक्षाकृत कम हैं, मगर अन्य स्थानों पर भी उनके मंदिर, प्रतिमाएँ और बड़े मंदिरों के अंदर उप-देवालय मिलते हैं। 17 13
फिर ब्रह्मा की पूजा कम क्यों दिखती है? एक जवाब सावित्री के शाप जैसी लोकप्रिय धार्मिक कथाएँ देती हैं। दूसरा उत्तर इतिहास में भक्ति-संप्रदायों और मंदिरों के संरक्षण तथा अलग-अलग उपासना परंपराओं के विकास से जुड़ा है। इन सारे कारणों को छोड़कर केवल 'शाप के कारण कहीं पूजा नहीं होती' कहना न तो ऐतिहासिक रूप से पूरा है, न तथ्यात्मक रूप से सही। 15 16
मंदिर-दर्शन, सार्वजनिक उत्सव और स्थानीय परंपराओं के बारे में शिक्षाप्रद जानकारी दी जा सकती है। पर किसी विशेष मंत्र, व्रत, अनुष्ठान, निश्चित मुहूर्त या सफलता की गारंटी का निर्देश यहाँ नहीं दिया जा रहा। पर्व की तिथि संबंधित स्थान के पंचांग और मंदिर-सूचना से मिलाकर ही प्रकाशित करनी चाहिए।
क्या ब्रह्मा और ब्रह्म एक ही हैं?
सीधे-सीधे नहीं। ब्रह्मा सृष्टिकर्ता देवता का नाम है; ब्रह्म कई दार्शनिक व्यवस्थाओं में परम वास्तविकता का। उनका दार्शनिक संबंध किसी विशिष्ट ग्रंथ में समझना पड़ता है, शब्दों को बिना भेद मिलाना नहीं। 15
क्या ब्रह्मा ने बिल्कुल अकेले संपूर्ण ब्रह्मांड बनाया?
हर हिंदू परंपरा ऐसा नहीं कहती। यहाँ पढ़े गए भागवत और विष्णु पुराण के वैष्णव संदर्भों में ब्रह्मा की रचना व्यापक विष्णु-तत्त्व के अंतर्गत है; दूसरी परंपराएँ अपना अलग आधार प्रस्तुत कर सकती हैं। 2 5
ब्रह्मा के चार सिर हैं या पाँच?
अधिकांश प्रसिद्ध मूर्तियों में चार दिखते हैं। कुछ शैव कथाएँ पाँचवें की चर्चा करती हैं, किंतु उनमें भैरव वाला घटनाक्रम भी अलग-अलग मिलता है। 6 7 9
क्या सरस्वती ही हर कथा में ब्रह्मा की एकमात्र सहचरी हैं?
नहीं। सरस्वती का संबंध बहुत प्रचलित है, लेकिन पुष्कर जैसे क्षेत्रीय आख्यानों में सावित्री और गायत्री भी आती हैं। उनके संबंधों को एक ही नियम से नहीं समझना चाहिए। 15 16
क्या ब्रह्मा की पूजा वर्जित है?
कहीं-कहीं मंदिर कम होने से ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। पुष्कर और आसोतरा जैसे जीवित उपासना-केंद्र मौजूद हैं। 14 17
क्या पुराणों के कल्प और प्रलय वैज्ञानिक समय-मापन हैं?
वे धार्मिक ब्रह्मांड-दृष्टि और दार्शनिक समय-कल्पना के अंग हैं। उन्हें आधुनिक खगोल-विज्ञान से प्रमाणित माप की तरह प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। 12
शब्दावली
- ब्रह्मा: अनेक पुराणों के व्यक्तित्व वाले सृष्टिकर्ता देवता।
- ब्रह्म: कई हिंदू दर्शनों में परम सत्य का विचार; हमेशा ब्रह्मा का पर्याय नहीं।
- प्रजापति: प्रजाओं के अधिपति; वैदिक और बाद के साहित्य में विस्तृत इतिहास वाला संबोधन।
- हिरण्यगर्भ: 'स्वर्णिम गर्भ/बीज'; सृष्टि-विचार का वैदिक पद।
- त्रिमूर्ति: कुछ प्रस्तुतियों में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की संयुक्त रूपरेखा।
- सृष्टि: जगत का प्राकट्य या रचना।
- कल्प: पारंपरिक विशाल ब्रह्मांडीय कालखंड।
- प्रलय: जगत की लय या पुनःअव्यक्त अवस्था।
- मानस-पुत्र: मन से उत्पन्न माने गए ऋषि या संतति।
- हंस: ब्रह्मा से जुड़ा पक्षी-वाहन।
- यज्ञ: वैदिक तथा बाद की परंपराओं में विभिन्न रूपों वाला धार्मिक अर्पण-कर्म।




