पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

कवच

हनुमान कवचम् — नारदपुराण अध्याय ७८

दिशाओं, शरीर, दैनिक जीवन और रामभक्ति में हनुमान की रक्षा-भावना व्यक्त करने वाला पुराणिक कवच।

पठन की सेटिंग

सेटिंग इस पृष्ठ के URL में रहती है और पिछले या अगले अध्याय में भी लागू होती है। इसे सहेजने के लिए URL बुकमार्क करें। देवनागरी का विशेष पठन फ़ॉन्ट बना रहेगा।

सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

कार्तवीर्यस्य कवचं कथितं ते मुनीश्वर । मोहविध्वंसनं जैत्रं मारुतेः कवचं शृणु ॥

अर्थ

सनत्कुमार कहते हैं कि कार्तवीर्य के कवच के बाद वे मोह दूर करने वाला मारुति का विजयदायक कवच सुनाएँगे।

व्याख्या

यह आरम्भ नारदपुराण के पिछले अध्याय से जुड़ता है और वक्ता सनत्कुमार को पहचानता है। कवच स्मरण द्वारा रक्षा की धार्मिक कल्पना है, भौतिक कवच नहीं।

2

यस्य सन्धारणात्सद्यः सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः । भूतप्रेतारिजं दुःखं नाशमेति न संशयः ॥

अर्थ

इसमें कवच को विघ्न, शत्रुभय और भूत-प्रेत से जुड़े पारम्परिक संकटों को मिटाने वाला कहा गया है।

व्याख्या

ये कवच के पारम्परिक फलवचन हैं, रोग या भय से निश्चित मुक्ति का प्रमाण नहीं। भाषा में श्रद्धा का आश्वासन व्यक्त होता है।

3

एकदाहं गतो द्रष्टुं रामं रमयतां वरम् । आनन्दवनिकासंस्थं ध्यायन्तं स्वात्मनः पदम् ॥

अर्थ

सनत्कुमार स्मरण करते हैं कि वे आनन्दवन में अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करते हुए राम के दर्शन के लिए गए।

व्याख्या

यहाँ राम केवल कथा-नायक नहीं, आत्मचिन्तन में स्थित दिव्य व्यक्तित्व भी हैं; इसी से शिक्षापरम्परा की पृष्ठभूमि बनती है।

4

तत्र रामं रमानाथं पूजितं त्रिदशेश्वरैः । नमस्कृत्य तदादिष्टमासनं स्थितवान् पुरः ॥

अर्थ

उन्होंने देवताओं द्वारा पूजित राम को प्रणाम किया और उनके दिए हुए आसन पर बैठे।

व्याख्या

यह आतिथ्य और विनय का प्रसंग है, शरीर-रक्षा की सूची का अंश नहीं।

5

तत्र सर्वं मया वृत्तं रावणस्य वधान्तकम् । पृष्टं प्रोवाच राजेन्द्रः श्रीरामः स्वयमादरात् ॥

अर्थ

रावण-वध तक की घटनाओं के विषय में पूछने पर राम आदरपूर्वक उत्तर देते हैं।

व्याख्या

कवच की पृष्ठभूमि रामकथा है; इसका आरम्भ किसी अनाम स्वतंत्र मन्त्र की तरह नहीं होता।

6

ततः कथान्ते भगवान्मारुतेः कवचं ददौ । मह्यं तत्ते प्रवक्ष्यामि न प्रकाश्यं हि कुत्रचित् ॥

अर्थ

कथा के अंत में राम मारुति का कवच देते हैं और वक्ता उसे गोपनीयता के साथ आगे बताने की बात करते हैं।

व्याख्या

गोपनीयता का उल्लेख ग्रंथ की पवित्रता का परम्परागत संकेत है; इससे यहाँ दीक्षात्मक प्रयोग सिखाने की अनुमति नहीं मिलती।

7

भविष्यदेतन्निर्द्दिष्टं बालभावेन नारद । श्रीरामेणाञ्जनासूनोर्भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥

अर्थ

राम द्वारा अंजनीपुत्र से सम्बन्धित यह उपदेश लौकिक सुख और मुक्ति दोनों से जुड़ा बताया गया है।

व्याख्या

इस श्लोक के पदों में डिजिटल पाठभेद हैं; भोग-मोक्ष के फल परम्परागत विश्वास हैं, निर्विवाद ऐतिहासिक कथन नहीं।

8

हनुमान् पूर्वतः पातु दक्षिणे पवनात्मजः । पातु प्रतीच्यामक्षघ्नः सौम्ये सागरतारकः ॥

अर्थ

पूर्व में हनुमान, दक्षिण में पवनात्मज, पश्चिम में अक्षघ्न और उत्तर में समुद्र-लाँघने वाले हनुमान रक्षा करें।

व्याख्या

चार दिशाओं में भिन्न नामों से एक ही हनुमान का स्मरण होता है; ‘अक्षघ्न’ रामकथा के अक्ष-वध की याद दिलाता है।

9

ऊर्ध्वं पातु कपिश्रेष्ठः केसरिप्रियनन्दनः । अधस्ताद्विष्णुभक्तस्तु पातु मध्ये च पावनिः ॥

अर्थ

ऊपर कपिश्रेष्ठ, नीचे केसरिनन्दन एवं विष्णुभक्त, और मध्य में पवनपुत्र की रक्षा-भावना व्यक्त है।

व्याख्या

यहाँ ऊपर-नीचे-मध्य से सम्पूर्ण स्थान की कल्पना की गई है; बल के साथ भक्ति और परिवार-सूचक नाम भी आते हैं।

10
विषय-सूची पर लौटें

लङ्काविदाहकः पातु सर्वापद्भ्यो निरन्तरम् । सुग्रीवसचिवः पातु मस्तकं वायुनन्दनः ॥

अर्थ

लंका-दाह करने वाले तथा सुग्रीव के मंत्री कहे गए वायुनन्दन सिर और संकटों से रक्षा करें।

व्याख्या

लंका-दहन वीरता की स्मृति है और सुग्रीव-सचिव पद हनुमान की बुद्धिमत्ता तथा सेवाभाव पर बल देता है।

11

भालं पातु महावीरो भ्रुवोर्मध्ये निरन्तरम् । नेत्रे छायापहारी च पातु नः प्लवगेश्वरः ॥

अर्थ

महावीर ललाट और भ्रूमध्य की तथा प्लवगेश्वर नेत्रों की रक्षा करें।

व्याख्या

इन्द्रियों को भी रक्षा-प्रार्थना में सम्मिलित किया गया है; प्रथम चरण की एक दुर्लभ उपाधि की शब्दार्थ-जाँच शेष है।

12

कपोलौ कर्णमूले च पातु श्रीरामकिङ्करः । नासाग्रमञ्जनासूनुः पातु वक्त्रं हरीश्वरः ॥

अर्थ

रामसेवक कपोल और कानों, अंजनीसूनु नासिका तथा हरीश्वर मुख की रक्षा करें।

व्याख्या

अंजनीपुत्र और रामकिंकर जैसे नाम बताते हैं कि हनुमान की पहचान शक्ति के साथ सेवा से भी बनती है।

13

पातु कण्ठे तु दैत्यारिः स्कन्धौ पातु सुरारिजित् । भुजौ पातु महातेजाः करौ च चरणायुधः ॥

अर्थ

दैत्यारि कंठ, सुरारिजित् कंधों, महातेजस्वी बाहुओं तथा चरणायुध हाथों की रक्षा करें।

व्याख्या

आयुध-संबन्धी पद वीर-काव्य के संकेत हैं; इससे वास्तविक अस्त्रप्रयोग या हिंसक निर्देश नहीं निकलते।

14

नखान्नखायुधः पातु कुक्षौ पातु कपीश्वरः । वक्षो मुद्रापहारी च पातु पार्श्वे भुजायुधः ॥

अर्थ

नखायुध नखों, कपीश्वर उदर, मुद्रा ले जाने वाले हनुमान वक्ष तथा पार्श्व की रक्षा करें।

व्याख्या

‘मुद्रा’ सीता तक राम की अँगूठी पहुँचाने का प्रसंग जगा सकती है; पद-रचना का अंतिम निर्णय पाठालोचन पर निर्भर है।

15

लङ्कानिभर्जनः पातु पृष्ठदेशे निरन्तरम् । नाभिं श्रीरामभक्तस्तु कटिं पात्वनिलात्मजः ॥

अर्थ

लंकाविजयी हनुमान पीठ, रामभक्त नाभि और अनिलात्मज कटि की रक्षा करें।

व्याख्या

लंका से जुड़े विशेषण का पाठभेद दर्ज है; शरीर के मध्य भाग भी भक्ति की रक्षात्मक कल्पना में आते हैं।

16

गुह्यं पातु महाप्राज्ञः सक्थिनी अतिथिप्रियः । ऊरू च जानुनी पातु लङ्काप्रासादभञ्जनः ॥

अर्थ

महाप्राज्ञ गोपनीय अंगों और जाँघों तथा लंका-प्रासाद-भंजक घुटनों की रक्षा करें।

व्याख्या

कवच की सामान्य शैली में शरीर का कोई अंग उपेक्षित नहीं रहता; यह शरीर के प्रति समग्रता का संकेत है।

17

जङ्घे पातु कपिश्रेष्ठो गुल्फौ पातु महाबलः । अचलोद्धारकः पातु पादौ भास्करसन्निभः ॥

अर्थ

कपिश्रेष्ठ पिंडलियों, महाबलवान गुल्फों तथा पर्वत उठाने वाले हनुमान पैरों की रक्षा करें।

व्याख्या

पर्वत उठाने की छवि लक्ष्मण-रक्षा की कथा याद दिलाती है; वीरता का लक्ष्य यहाँ सहायता है।

18

अङ्गानि पातु सत्त्वाढ्यः पातु पादाङ्गुलीः सदा । मुखाङ्गानि महाशूरः पातु रोमाणि चात्मवान् ॥

अर्थ

सत्त्वसम्पन्न वीर हनुमान अंगों, पैर की उँगलियों, मुख-अंगों और रोमों तक रक्षा करें।

व्याख्या

अंगों से रोमों तक की प्रार्थना कवच को सम्पूर्ण शरीर की प्रतीकात्मक सुरक्षा बना देती है।

19

दिवारात्रौ त्रिलोकेषु सदागतिसुतोऽवतु । स्थितं व्रजन्तमासीनं पिबन्तं जक्षतं कपिः ॥

अर्थ

दिन-रात, खड़े होने, चलने, बैठने, पीने और खाने की सभी अवस्थाओं में पवनसुत रक्षा करें।

व्याख्या

स्मरण केवल युद्ध-संकट तक नहीं, दैनिक क्रियाओं तक फैला है; एक नाम के पाठभेद की जाँच अभी बाकी है।

20
विषय-सूची पर लौटें

लोकोत्तरगुणः श्रीमान् पातु त्र्यम्बकसम्भवः । प्रमत्तमप्रमत्तं वा शयानं गहनेऽम्बुनि ॥

अर्थ

त्र्यम्बकसम्भव कहे गए हनुमान सावधान-असावधान व्यक्ति तथा नींद या गहरे जल की स्थिति में रक्षा करें।

व्याख्या

‘त्र्यम्बकसम्भव’ शैव सम्बन्ध की एक अभिव्यक्ति है; इसे सभी परम्पराओं का एकमात्र मत नहीं ठहराना चाहिए।

21

स्थलेऽन्तरिक्षे ह्यग्नौ वा पर्वते सागरे द्रुमे । सङ्ग्रामे सङ्कटे घोरे विराड्रूपधरोऽवतु ॥

अर्थ

स्थल, आकाश, अग्नि, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, युद्ध और गहन संकट में विराट रूपधारी हनुमान रक्षा करें।

व्याख्या

विविध स्थलों की सूची व्यापक शरण-भावना दिखाती है; अग्नि या दुर्घटना से अभेद्य होने का तथ्यात्मक दावा नहीं।

22

डाकिनीशाकिनीमारीकालरात्रिमरीचिकाः । शयानं मां विभुः पातु पिशाचोरगराक्षसीः ॥

अर्थ

ग्रंथ में वर्णित डाकिनी, शाकिनी, पिशाच, सर्प और भयावह शक्तियों से विभु हनुमान रक्षा करें।

व्याख्या

ये प्राचीन धार्मिक कल्पनाएँ हैं; इन्हें सत्यापित अलौकिक ख़तरों के रूप में स्वीकार करना आवश्यक नहीं।

23

दिव्यदेहधरो धीमान्सर्वसत्त्वभयङ्करः । साधकेन्द्रावनः शश्वत्पातु सर्वत एव माम् ॥

अर्थ

दिव्यदेहधारी, बुद्धिमान तथा भक्तों के रक्षक हनुमान हर दिशा से संरक्षण दें।

व्याख्या

विशिष्ट भय के बाद फिर व्यापक रक्षा-भाव आता है; ‘साधकेन्द्रावन’ समास की व्याख्या विशेषज्ञ समीक्षा के अधीन है।

24

यद्रूपं भीषणं दृष्ट्वा पलायन्ते भयानकाः । स सर्वरूपः सर्वज्ञः सृष्टिस्थितिकरोऽवतु ॥

अर्थ

जिनके भीषण रूप से भयावह शक्तियाँ भागती हैं, वे सर्वज्ञ तथा सृष्टि-पालक रूप में रक्षा करें।

व्याख्या

यह पद हनुमान को रामकथा के पात्र से बढ़ाकर विराट रक्षक रूप देता है; यह स्तोत्र का धार्मिक दृष्टिकोण है।

25

स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः साक्षाद्देवो महेश्वरः । सूर्यमण्डलगः श्रीदः पातु कालत्रयेऽपि माम् ॥

अर्थ

ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा सूर्य-मण्डल से संबद्ध दिव्य रूप तीनों काल में रक्षा करे।

व्याख्या

यह बहुरूपी ईश्वर-भाव का काव्य है; इससे विभिन्न संप्रदायों के विशिष्ट दार्शनिक मत मिट नहीं जाते।

26

यस्य शब्दमुपाकर्ण्य दैत्यदानवराक्षसाः । देवा मनुष्यास्तिर्यञ्चः स्थावरा जङ्गमास्तथा ॥

अर्थ

दैत्य, देवता, मनुष्य, पशु, स्थावर और जंगम सभी हनुमान के प्रबल शब्द को सुनते हैं।

व्याख्या

वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है; इसलिए २६ और २७ का अर्थ संयुक्त सन्दर्भ में समझें।

27

सभया भयनिर्मुक्ता भवन्ति स्वकृतानुगाः । यस्यानेककथाः पुण्याः श्रूयन्ते प्रतिकल्पके ॥

अर्थ

पिछले श्लोक में वर्णित प्राणी भय तथा भयमुक्ति से जुड़ते हैं और हनुमान की कथाएँ कल्प-कल्प में सुनी जाती हैं।

व्याख्या

समास और वाक्यरचना कठिन हैं; सम्भव अर्थ दिव्य महिमा का विस्मय और शरण से निर्भयता का मेल है।

28

सोऽवतात्साधकश्रेष्ठं सदा रामपरायणः । वैधात्रधातृप्रभृति यत्किञ्चिद्दृश्यतेऽत्यलम् ॥

अर्थ

रामपरायण हनुमान श्रेष्ठ साधक की रक्षा करें; आगे दृश्य जगत् में दिव्य व्याप्ति का संकेत आता है।

व्याख्या

दूसरा चरण अगले श्लोक के दार्शनिक कथन से जुड़ता है; इसीलिए उसका अर्थ सावधानी से प्रस्तुत है।

29

विद्धि व्याप्तं यथा कीशरूपेणानञ्जनेन तत् । यो विभुः सोऽहमेषोऽहं स्वीयः स्वयमणुर्बृहत् ॥

अर्थ

दृश्य जगत् को हनुमान के दिव्य रूप से व्याप्त समझने तथा सूक्ष्म और विराट एक साथ देखने का आग्रह है।

व्याख्या

इस स्थान का पाठ और व्याकरण कठिन है; ‘मैं वही हूँ’ जैसी भाषा को किसी एक निश्चित दर्शन का प्रमाण न मानें।

30
विषय-सूची पर लौटें

ऋग्यजुःसामरूपश्च प्रणवस्त्रिवृदध्वरः । तस्मै स्वस्मै च सर्वस्मै नतोऽस्म्यात्मसमाधिना ॥

अर्थ

ऋक्, यजुः, साम, प्रणव तथा यज्ञ से संबद्ध रूप की उपासना कर वक्ता भीतर से प्रणाम करता है।

व्याख्या

वैदिक पदों का प्रयोग हनुमान की महिमा के लिए है; कवच को स्वयं वेद की ऋचा घोषित करना गलत होगा।

31

अनेकानन्तब्रह्माण्डधृते ब्रह्मस्वरूपिणे । समीरणात्मने तस्मै नतोऽस्म्यात्मस्वरूपिणे ॥

अर्थ

अनन्त ब्रह्माण्ड धारण करने वाले, वायुसम्बद्ध तथा ब्रह्मस्वरूप हनुमान को वक्ता प्रणाम करता है।

व्याख्या

यहाँ कवच अंगरक्षा से आगे बढ़कर व्यापक ब्रह्मतत्त्व और परम शक्ति की स्तुति बन जाता है।

32

नमो हनुमते तस्मै नमो मारुतसूनवे । नमः श्रीरामभक्ताय श्यामाय महते नमः ॥

अर्थ

मारुतसुत, महान् रामभक्त हनुमान को बार-बार नमस्कार किया गया है।

व्याख्या

यहीं से नमस्कारात्मक नामावली आरम्भ होती है जिसमें पराक्रम और प्रेमभक्ति साथ चलते हैं।

33

नमो वानरवीराय सुग्रीवसख्यकारिणे । लङ्काविदहनायाथ महासागरतारिणे ॥

अर्थ

सुग्रीव के मित्र, समुद्र लाँघने और लंका-दहन करने वाले वानरवीर को नमस्कार है।

व्याख्या

ये दोनों घटनाएँ सीता-खोज के अभियान से जुड़ी हैं; संदर्भ के बिना इन्हें स्वतंत्र हिंसा का आदर्श न बनाएँ।

34

सीताशोकविनाशाय राममुद्राधराय च । रावणान्तनिदानाय नमः सर्वोत्तरात्मने ॥

अर्थ

सीता का शोक दूर करने, राम की मुद्रा लेकर जाने और रावण-विनाश में योगदान देने वाले हनुमान को प्रणाम है।

व्याख्या

मुद्रा विश्वास और पहचान का चिह्न है; हनुमान की सेवा में आश्वासन देना युद्ध-वीरता जितना महत्त्वपूर्ण है।

35

मेघनादमखध्वंसकारणाय नमो नमः । अशोकवनविध्वंसकारिणे जयदायिने ॥

अर्थ

मेघनाद के यज्ञ में बाधा और अशोक-वाटिका विध्वंस का स्मरण कर विजयदायी हनुमान की स्तुति है।

व्याख्या

यह रामकथा के युद्ध प्रसंग का वर्णन है; किसी वास्तविक धार्मिक अनुष्ठान को बाधित करने की सलाह नहीं।

36

वायुपुत्राय वीराय आकाशोदरगामिने । वनपालशिरश्छेत्रे लङ्काप्रासादभञ्जिने ॥

अर्थ

वायुपुत्र हनुमान के आकाशगमन और लंका के रक्षकों से संघर्ष की वीरगाथा कही गई है।

व्याख्या

यह क्रियात्मक चित्रण कर्तव्य के प्रति दृढ़ता का रूपक बनता है, न कि साधक के लिए आचरण-निर्देश।

37

ज्वलत्काञ्चनवर्णाय दीर्घलाङ्गूलधारिणे । सौमित्रिजयदात्रे च रामदूताय ते नमः ॥

अर्थ

स्वर्ण-तेज से दीप्त, दीर्घपूँछ वाले रामदूत तथा सौमित्रि की सहायता करने वाले हनुमान को नमस्कार है।

व्याख्या

‘सौमित्रि’ लक्ष्मण का नाम है; इस स्मरण में रूपवैभव से अधिक सेवा और सहायता की प्रतिष्ठा है।

38

अक्षस्य वधकर्त्रे च ब्रह्मशस्त्रनिवारिणे । लक्ष्मणाङ्गमहाशक्तिजातक्षतविनाशिने ॥

अर्थ

अक्ष-वध, ब्रह्मास्त्र का सामना करने तथा लक्ष्मण के गंभीर घाव से जुड़ी रक्षा-कथा के लिए उनका गुणगान है।

व्याख्या

रामकथा के अनेक प्रसंग एक ही श्लोक में संक्षेपित हैं; विवरण सभी संस्करणों में समान हों, यह आवश्यक नहीं।

39

रक्षोघ्नाय रिपुघ्नाय भूतघ्नाय नमो नमः । ऋक्षवानरवीरौघप्रासादाय नमो नमः ॥

अर्थ

विरोधी शक्तियों का दमन करने और वानर-ऋक्ष वीरों का सहारा बनने वाले हनुमान को बार-बार प्रणाम है।

व्याख्या

वीररस का युद्ध-सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण है; इसे आज किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का आह्वान नहीं समझना चाहिए।

40
विषय-सूची पर लौटें

परसैन्यबलघ्नाय शस्त्रास्त्रघ्नाय ते नमः । विषघ्नाय द्विषघ्नाय भयघ्नाय नमो नमः ॥

अर्थ

शत्रुसेना, अस्त्र-शस्त्र, विष, द्वेष और भय पर विजय के लिए हनुमान की स्तुति है।

व्याख्या

विषनिवारण सहित सभी दावे स्तोत्र की धार्मिक भाषा हैं; वास्तविक विषाक्तता में तत्काल चिकित्सकीय सहायता चाहिए।

41

महारिपुभयघ्नाय भक्तत्राणैककारिणे । परप्रेरितमन्त्राणां मन्त्राणां स्तम्भकारिणे ॥

अर्थ

महाशत्रुओं के भय तथा दूसरे के द्वारा भेजे गए बाधक मन्त्रों को रोकने की शक्ति के रूप में हनुमान की स्तुति है।

व्याख्या

‘मन्त्र-स्तम्भन’ पुराने धार्मिक विश्वासों का उल्लेख है; इससे किसी प्रकार का तान्त्रिक प्रयोग सिखाया नहीं जा रहा।

42

पयःपाषाणतरणकारणाय नमो नमः । बालार्कमण्डलग्रासकारिणे दुःखहारिणे ॥

अर्थ

समुद्र पर शिलाओं से सेतु बनने और बाल्यकाल में सूर्य को फल समझने की कथा से हनुमान का स्मरण है।

व्याख्या

सेतु का प्रसंग रामसेना से और सूर्य को फल समझने की कथा हनुमान के बालचरित से संबंधित है।

43

नखायुधाय भीमाय दन्तायुधधराय च । विहङ्गमाय शर्वाय वज्रदेहाय ते नमः ॥

अर्थ

नख-दन्त को आयुध मानने वाले, वज्र-सी देह वाले पराक्रमी हनुमान को प्रणाम है।

व्याख्या

उग्र रूप रक्षक-वीरता का प्रतीक है; ‘शर्व’ और ‘विहंगम’ जैसे पदों की विशेष पाठ-जाँच अपेक्षित है।

44

प्रतिग्रामस्थितायाथ भूतप्रेतवधार्थिने । करस्थशैलशस्त्राय रामशस्त्राय ते नमः ॥

अर्थ

ग्राम-ग्राम में स्मरणीय, हाथ में पर्वत धारण करने वाले तथा राम के आयुध-सदृश सेवक की स्तुति है।

व्याख्या

‘रामशस्त्र’ राम की आज्ञा में समर्पित बल का रूपक है; भूत-प्रेत विनाश का उल्लेख वास्तविक हिंसक कार्यादेश नहीं।

45

कौपीनवाससे तुभ्यं रामभक्तिरताय च । दक्षिणाशाभास्कराय सतां चन्द्रोदयात्मने ॥

अर्थ

कौपीनधारी, रामभक्ति में रत हनुमान सज्जनों के लिए चन्द्रोदय और दक्षिण दिशा में सूर्य के समान कहे गए हैं।

व्याख्या

सूर्य और चन्द्र की उपमा में शक्ति तथा शीतल करुणा दोनों भाव मिलते हैं; कौपीन सादगी का चिह्न है।

46

कृत्याक्षतव्यथाघ्नाय सर्वक्लेशहराय च । स्वाम्याज्ञापार्थसङ्ग्रामसख्यसञ्जयकारिणे ॥

अर्थ

क्लेशों को हरने, स्वामी की आज्ञा निभाने और संग्राम में साथियों की सहायता करने वाले हनुमान की स्तुति है।

व्याख्या

कुछ समासों का पाठ अस्पष्ट है; निष्ठापूर्ण सेवा का मुख्य आशय स्पष्ट है, युद्ध-घटना का हर ब्योरा नहीं।

47

भक्तानां दिव्यवादेषु सङ्ग्रामे जयकारिणे । किल्किलारवकाराय घोरशब्दकराय च ॥

अर्थ

युद्ध में साथ देने तथा प्रबल किलकारी और सिंहनाद करने वाले हनुमान का स्मरण है।

व्याख्या

ध्वनि का अनुकरण करने वाला शब्द विभिन्न पाठों में बदलता है; यहाँ किसी रूप को अंतिम उच्चारण नहीं बताया गया।

48

सर्वाग्निव्याधिसंस्तम्भकारिणे भयहारिणे । सदा वनफलाहारसन्तृप्ताय विशेषतः ॥

अर्थ

अग्नि, व्याधि और भय शांत करने वाले तथा वनफलों से संतुष्ट हनुमान को प्रणाम है।

व्याख्या

रोगहरण का कथन श्रद्धापरक है, चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं; वनफलों से संतोष सादगी दिखाता है।

49

महार्णवशिलाबद्धसेतुबन्धाय ते नमः । इत्येतत्कथितं विप्र मारुतेः कवचं शिवम् ॥

अर्थ

सागर के शिलासेतु से जुड़ी स्तुति के बाद वक्ता कहता है कि मारुति का यह शुभ कवच कहा जा चुका है।

व्याख्या

यह श्लोक स्तुति के अंत और फलश्रुति के आरम्भ को एक साथ रखता है; कोई भाग हटाया नहीं गया है।

50
विषय-सूची पर लौटें

यस्मै कस्मै न दातव्यं रक्षणीयं प्रयत्नतः । अष्टगन्धैर्विलिख्याथ कवचं धारयेत्तु यः ॥

अर्थ

फलश्रुति में इसे सावधानी से रखने तथा सुगन्धित पदार्थों से लिखकर धारण करने का उल्लेख है।

व्याख्या

यह प्राचीन अनुष्ठान का वर्णन भर है; यहाँ सामग्री, क्रम, सिद्धि या दीक्षा-विधि का निर्देश नहीं है।

51

कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ जयस्तस्य पदे पदे । किं पुनर्बहुनोक्तेन साधितं लक्षमादरात् ॥

अर्थ

परम्परागत कथन में इसे धारण करने वाले की सफलता और दीर्घ जप-साधना का संकेत मिलता है।

व्याख्या

जप-संख्या या सफलता का आश्वासन यहाँ नहीं दिया गया; यह मूल पाठ की फलश्रुति है, व्यावहारिक सलाह नहीं।

52

प्रजप्तमेतत्कवचमसाध्यं चापि साधयेत् ॥

अर्थ

अंतिम अर्धश्लोक में कथित है कि कवच-जप से कठिन लक्ष्य भी साधे जा सकते हैं।

व्याख्या

जाँचे गए पाठ में श्लोक ५२ आधा है; छन्द पूरा दिखाने के लिए कोई कल्पित अतिरिक्त पंक्ति नहीं जोड़ी गई है।

53
विषय-सूची पर लौटें

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे हनुमत्कवचनिरूपणं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥

अर्थ

समापन-पंक्ति इसे बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग में हनुमत्कवच का अठहत्तरवाँ अध्याय बताती है।

व्याख्या

कोलॉफन ग्रंथ और अध्याय की पारम्परिक पहचान है, कवच का तिरेपनवाँ श्लोक नहीं। शीर्षक तथा अध्याय विभाजन की ऐतिहासिक पुष्टि शेष है।

सन्दर्भ और उपयोग

संपूर्ण चुना हुआ डिजिटल पाठ: ५२ श्लोक और अलग अध्याय-समापन। यह ऐतिहासिक मुद्रित प्रति से स्वीकृत मूलपाठ नहीं है।

यह कवच क्या है? यह हनुमत्कवच बृहन्नारदीय/नारदपुराण, पूर्वभाग, अध्याय ७८ से चुना गया है। सनत्कुमार नारद को बताते हैं कि कैसे राम से मारुति के कवच की शिक्षा मिली। आरम्भ के सात श्लोक कथा के हैं, श्लोक ८–१८ दिशा और अंगों की रक्षाप्रार्थना हैं, १९–३१ दिनचर्या, संकट तथा व्यापक दिव्यस्वरूप का वर्णन करते हैं, ३२–४८ हनुमान के गुणों और रामकथा के प्रसंगों की नमस्कारात्मक स्तुति हैं, और ४९–५२ में कथित फलश्रुति आती है। 1 2

यह आनन्दरामायण, सुदर्शनसंहिता या पञ्चमुख हनुमत्कवच का संयुक्त पाठ नहीं है। उन रचनाओं की कथा, मन्त्र और श्लोकसंख्या अलग हैं। 4 5 6

पाठस्थिति: संस्कृत विकिस्रोत के अध्याय को दूसरे डिजिटल पाठ से तुलना करके तैयार किया गया यह प्रावधिक, तुलना-संशोधित पाठ है। इसे किसी मुद्रित ऐतिहासिक संस्करण की शब्दशः प्रतिलिपि या स्वीकृत पाठ न मानें। विशेषतः श्लोक ७, १९, २७–२९, ४१, ४३ और ४७ का विशेषज्ञ पाठ-परीक्षण शेष है।

अध्याय-समापन

सरल अर्थ: समापन-पंक्ति इसे बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग में हनुमत्कवच का अठहत्तरवाँ अध्याय बताती है। विस्तृत व्याख्या: कोलॉफन ग्रंथ और अध्याय की पारम्परिक पहचान है, कवच का तिरेपनवाँ श्लोक नहीं। शीर्षक तथा अध्याय विभाजन की ऐतिहासिक पुष्टि शेष है।

मुख्य विषय और पठन-दृष्टि

दिशा और अंगों की सुरक्षा (८–१८): स्तोत्र पूरे शरीर और विश्व-परिसर को भक्ति से जोड़ता है। ‘पूर्वतः’, ‘कण्ठे’, ‘नाभिं’ जैसे पद क्रमशः स्थान तथा शरीर के अंगों को दर्शाते हैं। यह भावात्मक मानचित्र है; किसी व्यावहारिक चिकित्सा या सुरक्षा युक्ति का विकल्प नहीं। रामसेवा की छवियाँ (३२–४८): राम की मुद्रा, सीता का शोक, समुद्र-लङ्घन, लक्ष्मण की सहायता और लंका का प्रसंग बार-बार आता है। इसलिए पराक्रम को सेवा और निष्ठा से अलग करके न पढ़ें। दिव्य स्वरूप (२५–३१): शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य तथा वैदिक रूपों के साथ हनुमान का सम्बन्ध स्तोत्र की धार्मिक भाषा है। विभिन्न परम्पराओं में हनुमान की पहचान का विवेचन एक जैसा नहीं होता। फलश्रुति (४९–५२): लिखकर धारण करने और पुनरावृत्ति का उल्लेख केवल स्रोत-सन्दर्भ में है। इस लेख से कोई दीक्षा, न्यास, तान्त्रिक प्रयोग, जप-गणना या सिद्धि-विधान अनुमोदित नहीं होता। बीमारी, विष, अग्नि या शत्रु से अजेय होने का वैज्ञानिक आश्वासन भी नहीं दिया जाता।

पाठभेद और प्रमाण

मुख्य डिजिटल संदर्भ 1 संस्कृत विकिस्रोत का अध्याय ७८ है; 2 स्वतंत्र ऑनलाइन तुलना-पाठ है, जिसकी व्यावसायिक पुनर्प्रकाशन-शर्तें कठोर हैं। श्लोक ७ में अतिरिक्त अक्षर, १९ में नामभेद, ३३ में ‘लङ्का’ का छूटा हुआ आरम्भ, ४१ में ‘मन्त्र/यन्त्र’, ४३ में ‘शर्व/शव’, और ४७ में ध्वन्यात्मक पद के भेद विशेष रूप से दर्ज हैं। श्लोक ५२ एक ही अर्धश्लोक है—उसमें नई पंक्ति नहीं बनाई गई है। 1 2

मुद्रित ऐतिहासिक ग्रंथ या हस्तलेख से स्वतंत्र संपूर्ण मिलान नहीं हुआ है। क्या यह पञ्चमुख हनुमान कवच है? नहीं। पञ्चमुख रूप से जुड़ा कवच अलग पाठ और परम्परा है। क्या अंतिम श्लोक अधूरा है? उपलब्ध दोनों डिजिटल पाठों में ५२वाँ श्लोक केवल एक अर्धश्लोक है। शेष को कल्पना से नहीं भरा गया। क्या फलश्रुति की क्रियाएँ यहाँ सिखाई गई हैं? नहीं। उन्हें केवल ग्रंथ की परम्परागत भाषा के रूप में बताया गया है। वर्तमान फाइलें बंद संपादकीय ड्राफ्ट हैं। आंतरिक सम्बन्ध: सम्बन्धित पाठ (हनुमान), सम्बन्धित पाठ (संकटमोचन अष्टक), सम्बन्धित पाठ (ॐ हनुमते नमः)। ये स्थिर संदर्भ हैं, लाइव लिंक नहीं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on नारदपुराणम् — पूर्वार्धः, अध्यायः ७८, Sanskrit Wikisource. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    kārtavīryasya kavacaṃ kathitaṃ te munīśvara | mohavidhvaṃsanaṃ jaitraṃ māruteḥ kavacaṃ śṛṇu ||

  2. 2

    yasya sandhāraṇātsadyaḥ sarve naśyantyupadravāḥ | bhūtapretārijaṃ duḥkhaṃ nāśameti na saṃśayaḥ ||

  3. 3

    ekadāhaṃ gato draṣṭuṃ rāmaṃ ramayatāṃ varam | ānandavanikāsaṃsthaṃ dhyāyantaṃ svātmanaḥ padam ||

  4. 4

    tatra rāmaṃ ramānāthaṃ pūjitaṃ tridaśeśvaraiḥ | namaskṛtya tadādiṣṭamāsanaṃ sthitavān puraḥ ||

  5. 5

    tatra sarvaṃ mayā vṛttaṃ rāvaṇasya vadhāntakam | pṛṣṭaṃ provāca rājendraḥ śrīrāmaḥ svayamādarāt ||

  6. 6

    tataḥ kathānte bhagavānmāruteḥ kavacaṃ dadau | mahyaṃ tatte pravakṣyāmi na prakāśyaṃ hi kutracit ||

  7. 7

    bhaviṣyadetannirddiṣṭaṃ bālabhāvena nārada | śrīrāmeṇāñjanāsūnorbhuktimuktipradāyakam ||

  8. 8

    hanumān pūrvataḥ pātu dakṣiṇe pavanātmajaḥ | pātu pratīcyāmakṣaghnaḥ saumye sāgaratārakaḥ ||

  9. 9

    ūrdhvaṃ pātu kapiśreṣṭhaḥ kesaripriyanandanaḥ | adhastādviṣṇubhaktastu pātu madhye ca pāvaniḥ ||

  10. 10

    laṅkāvidāhakaḥ pātu sarvāpadbhyo nirantaram | sugrīvasacivaḥ pātu mastakaṃ vāyunandanaḥ ||

  11. 11

    bhālaṃ pātu mahāvīro bhruvormadhye nirantaram | netre chāyāpahārī ca pātu naḥ plavageśvaraḥ ||

  12. 12

    kapolau karṇamūle ca pātu śrīrāmakiṅkaraḥ | nāsāgramañjanāsūnuḥ pātu vaktraṃ harīśvaraḥ ||

  13. 13

    pātu kaṇṭhe tu daityāriḥ skandhau pātu surārijit | bhujau pātu mahātejāḥ karau ca caraṇāyudhaḥ ||

  14. 14

    nakhānnakhāyudhaḥ pātu kukṣau pātu kapīśvaraḥ | vakṣo mudrāpahārī ca pātu pārśve bhujāyudhaḥ ||

  15. 15

    laṅkānibharjanaḥ pātu pṛṣṭhadeśe nirantaram | nābhiṃ śrīrāmabhaktastu kaṭiṃ pātvanilātmajaḥ ||

  16. 16

    guhyaṃ pātu mahāprājñaḥ sakthinī atithipriyaḥ | ūrū ca jānunī pātu laṅkāprāsādabhañjanaḥ ||

  17. 17

    jaṅghe pātu kapiśreṣṭho gulphau pātu mahābalaḥ | acaloddhārakaḥ pātu pādau bhāskarasannibhaḥ ||

  18. 18

    aṅgāni pātu sattvāḍhyaḥ pātu pādāṅgulīḥ sadā | mukhāṅgāni mahāśūraḥ pātu romāṇi cātmavān ||

  19. 19

    divārātrau trilokeṣu sadāgatisuto’vatu | sthitaṃ vrajantamāsīnaṃ pibantaṃ jakṣataṃ kapiḥ ||

  20. 20

    lokottaraguṇaḥ śrīmān pātu tryambakasambhavaḥ | pramattamapramattaṃ vā śayānaṃ gahane’mbuni ||

  21. 21

    sthale’ntarikṣe hyagnau vā parvate sāgare drume | saṅgrāme saṅkaṭe ghore virāḍrūpadharo’vatu ||

  22. 22

    ḍākinīśākinīmārīkālarātrimarīcikāḥ | śayānaṃ māṃ vibhuḥ pātu piśācoragarākṣasīḥ ||

  23. 23

    divyadehadharo dhīmānsarvasattvabhayaṅkaraḥ | sādhakendrāvanaḥ śaśvatpātu sarvata eva mām ||

  24. 24

    yadrūpaṃ bhīṣaṇaṃ dṛṣṭvā palāyante bhayānakāḥ | sa sarvarūpaḥ sarvajñaḥ sṛṣṭisthitikaro’vatu ||

  25. 25

    svayaṃ brahmā svayaṃ viṣṇuḥ sākṣāddevo maheśvaraḥ | sūryamaṇḍalagaḥ śrīdaḥ pātu kālatraye’pi mām ||

  26. 26

    yasya śabdamupākarṇya daityadānavarākṣasāḥ | devā manuṣyāstiryañcaḥ sthāvarā jaṅgamāstathā ||

  27. 27

    sabhayā bhayanirmuktā bhavanti svakṛtānugāḥ | yasyānekakathāḥ puṇyāḥ śrūyante pratikalpake ||

  28. 28

    so’vatātsādhakaśreṣṭhaṃ sadā rāmaparāyaṇaḥ | vaidhātradhātṛprabhṛti yatkiñciddṛśyate’tyalam ||

  29. 29

    viddhi vyāptaṃ yathā kīśarūpeṇānañjanena tat | yo vibhuḥ so’hameṣo’haṃ svīyaḥ svayamaṇurbṛhat ||

  30. 30

    ṛgyajuḥsāmarūpaśca praṇavastrivṛdadhvaraḥ | tasmai svasmai ca sarvasmai nato’smyātmasamādhinā ||

  31. 31

    anekānantabrahmāṇḍadhṛte brahmasvarūpiṇe | samīraṇātmane tasmai nato’smyātmasvarūpiṇe ||

  32. 32

    namo hanumate tasmai namo mārutasūnave | namaḥ śrīrāmabhaktāya śyāmāya mahate namaḥ ||

  33. 33

    namo vānaravīrāya sugrīvasakhyakāriṇe | laṅkāvidahanāyātha mahāsāgaratāriṇe ||

  34. 34

    sītāśokavināśāya rāmamudrādharāya ca | rāvaṇāntanidānāya namaḥ sarvottarātmane ||

  35. 35

    meghanādamakhadhvaṃsakāraṇāya namo namaḥ | aśokavanavidhvaṃsakāriṇe jayadāyine ||

  36. 36

    vāyuputrāya vīrāya ākāśodaragāmine | vanapālaśiraśchetre laṅkāprāsādabhañjine ||

  37. 37

    jvalatkāñcanavarṇāya dīrghalāṅgūladhāriṇe | saumitrijayadātre ca rāmadūtāya te namaḥ ||

  38. 38

    akṣasya vadhakartre ca brahmaśastranivāriṇe | lakṣmaṇāṅgamahāśaktijātakṣatavināśine ||

  39. 39

    rakṣoghnāya ripughnāya bhūtaghnāya namo namaḥ | ṛkṣavānaravīraughaprāsādāya namo namaḥ ||

  40. 40

    parasainyabalaghnāya śastrāstraghnāya te namaḥ | viṣaghnāya dviṣaghnāya bhayaghnāya namo namaḥ ||

  41. 41

    mahāripubhayaghnāya bhaktatrāṇaikakāriṇe | parapreritamantrāṇāṃ mantrāṇāṃ stambhakāriṇe ||

  42. 42

    payaḥpāṣāṇataraṇakāraṇāya namo namaḥ | bālārkamaṇḍalagrāsakāriṇe duḥkhahāriṇe ||

  43. 43

    nakhāyudhāya bhīmāya dantāyudhadharāya ca | vihaṅgamāya śarvāya vajradehāya te namaḥ ||

  44. 44

    pratigrāmasthitāyātha bhūtapretavadhārthine | karasthaśailaśastrāya rāmaśastrāya te namaḥ ||

  45. 45

    kaupīnavāsase tubhyaṃ rāmabhaktiratāya ca | dakṣiṇāśābhāskarāya satāṃ candrodayātmane ||

  46. 46

    kṛtyākṣatavyathāghnāya sarvakleśaharāya ca | svāmyājñāpārthasaṅgrāmasakhyasañjayakāriṇe ||

  47. 47

    bhaktānāṃ divyavādeṣu saṅgrāme jayakāriṇe | kilkilāravakārāya ghoraśabdakarāya ca ||

  48. 48

    sarvāgnivyādhisaṃstambhakāriṇe bhayahāriṇe | sadā vanaphalāhārasantṛptāya viśeṣataḥ ||

  49. 49

    mahārṇavaśilābaddhasetubandhāya te namaḥ | ityetatkathitaṃ vipra māruteḥ kavacaṃ śivam ||

  50. 50

    yasmai kasmai na dātavyaṃ rakṣaṇīyaṃ prayatnataḥ | aṣṭagandhairvilikhyātha kavacaṃ dhārayettu yaḥ ||

  51. 51

    kaṇṭhe vā dakṣiṇe bāhau jayastasya pade pade | kiṃ punarbahunoktena sādhitaṃ lakṣamādarāt ||

  52. 52

    prajaptametatkavacamasādhyaṃ cāpi sādhayet ||

  53. 53

    iti śrībṛhannāradīyapurāṇe pūrvabhāge bṛhadupākhyāne tṛtīyapāde hanumatkavacanirūpaṇaṃ nāmāṣṭasaptatitamo’dhyāyaḥ || 78 ||

स्रोत

  • 1 संस्कृत विकिस्रोत, नारदपुराण पूर्वार्ध ७८ — चुने हुए अध्याय का डिजिटल आधार।
  • 2 Sanskrit Documents, Hanumatkavacham (Nārada Purāṇa) — पाठभेद तुलना; अनुमति शेष।
  • 3 Wisdom Library, Nārada Purāṇa 78.1 — अध्याय-संकेत पुष्टि।
  • 4 Ānanda Rāmāyaṇa Hanumat Kavacham — भिन्न रचना।
  • 5 Sudarśana Saṃhitā Hanumat Kavacham — भिन्न रचना।
  • 6 Pañcamukha Hanumat Kavacham — भिन्न रचना। संपादकीय चेतावनी: प्रकाशन, मूलपाठ स्वीकृति, पुनरुपयोग अधिकार तथा Aadesh सभी बंद हैं।
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1

सरल अर्थ: सनत्कुमार कहते हैं कि कार्तवीर्य के कवच के बाद वे मोह दूर करने वाला मारुति का विजयदायक कवच सुनाएँगे। विस्तृत व्याख्या: यह आरम्भ नारदपुराण के पिछले अध्याय से जुड़ता है और वक्ता सनत्कुमार को पहचानता है। कवच स्मरण द्वारा रक्षा की धार्मिक कल्पना है, भौतिक कवच नहीं।

श्लोक 2

सरल अर्थ: इसमें कवच को विघ्न, शत्रुभय और भूत-प्रेत से जुड़े पारम्परिक संकटों को मिटाने वाला कहा गया है। विस्तृत व्याख्या: ये कवच के पारम्परिक फलवचन हैं, रोग या भय से निश्चित मुक्ति का प्रमाण नहीं। भाषा में श्रद्धा का आश्वासन व्यक्त होता है।

श्लोक 3

सरल अर्थ: सनत्कुमार स्मरण करते हैं कि वे आनन्दवन में अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करते हुए राम के दर्शन के लिए गए। विस्तृत व्याख्या: यहाँ राम केवल कथा-नायक नहीं, आत्मचिन्तन में स्थित दिव्य व्यक्तित्व भी हैं; इसी से शिक्षापरम्परा की पृष्ठभूमि बनती है।

श्लोक 4

सरल अर्थ: उन्होंने देवताओं द्वारा पूजित राम को प्रणाम किया और उनके दिए हुए आसन पर बैठे। विस्तृत व्याख्या: यह आतिथ्य और विनय का प्रसंग है, शरीर-रक्षा की सूची का अंश नहीं।

श्लोक 5

सरल अर्थ: रावण-वध तक की घटनाओं के विषय में पूछने पर राम आदरपूर्वक उत्तर देते हैं। विस्तृत व्याख्या: कवच की पृष्ठभूमि रामकथा है; इसका आरम्भ किसी अनाम स्वतंत्र मन्त्र की तरह नहीं होता।

श्लोक 6

सरल अर्थ: कथा के अंत में राम मारुति का कवच देते हैं और वक्ता उसे गोपनीयता के साथ आगे बताने की बात करते हैं। विस्तृत व्याख्या: गोपनीयता का उल्लेख ग्रंथ की पवित्रता का परम्परागत संकेत है; इससे यहाँ दीक्षात्मक प्रयोग सिखाने की अनुमति नहीं मिलती।

श्लोक 7

सरल अर्थ: राम द्वारा अंजनीपुत्र से सम्बन्धित यह उपदेश लौकिक सुख और मुक्ति दोनों से जुड़ा बताया गया है। विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक के पदों में डिजिटल पाठभेद हैं; भोग-मोक्ष के फल परम्परागत विश्वास हैं, निर्विवाद ऐतिहासिक कथन नहीं।

श्लोक 8

सरल अर्थ: पूर्व में हनुमान, दक्षिण में पवनात्मज, पश्चिम में अक्षघ्न और उत्तर में समुद्र-लाँघने वाले हनुमान रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: चार दिशाओं में भिन्न नामों से एक ही हनुमान का स्मरण होता है; ‘अक्षघ्न’ रामकथा के अक्ष-वध की याद दिलाता है।

श्लोक 9

सरल अर्थ: ऊपर कपिश्रेष्ठ, नीचे केसरिनन्दन एवं विष्णुभक्त, और मध्य में पवनपुत्र की रक्षा-भावना व्यक्त है। विस्तृत व्याख्या: यहाँ ऊपर-नीचे-मध्य से सम्पूर्ण स्थान की कल्पना की गई है; बल के साथ भक्ति और परिवार-सूचक नाम भी आते हैं।

श्लोक 10

सरल अर्थ: लंका-दाह करने वाले तथा सुग्रीव के मंत्री कहे गए वायुनन्दन सिर और संकटों से रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: लंका-दहन वीरता की स्मृति है और सुग्रीव-सचिव पद हनुमान की बुद्धिमत्ता तथा सेवाभाव पर बल देता है।

श्लोक 11

सरल अर्थ: महावीर ललाट और भ्रूमध्य की तथा प्लवगेश्वर नेत्रों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: इन्द्रियों को भी रक्षा-प्रार्थना में सम्मिलित किया गया है; प्रथम चरण की एक दुर्लभ उपाधि की शब्दार्थ-जाँच शेष है।

श्लोक 12

सरल अर्थ: रामसेवक कपोल और कानों, अंजनीसूनु नासिका तथा हरीश्वर मुख की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: अंजनीपुत्र और रामकिंकर जैसे नाम बताते हैं कि हनुमान की पहचान शक्ति के साथ सेवा से भी बनती है।

श्लोक 13

सरल अर्थ: दैत्यारि कंठ, सुरारिजित् कंधों, महातेजस्वी बाहुओं तथा चरणायुध हाथों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: आयुध-संबन्धी पद वीर-काव्य के संकेत हैं; इससे वास्तविक अस्त्रप्रयोग या हिंसक निर्देश नहीं निकलते।

श्लोक 14

सरल अर्थ: नखायुध नखों, कपीश्वर उदर, मुद्रा ले जाने वाले हनुमान वक्ष तथा पार्श्व की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: ‘मुद्रा’ सीता तक राम की अँगूठी पहुँचाने का प्रसंग जगा सकती है; पद-रचना का अंतिम निर्णय पाठालोचन पर निर्भर है।

श्लोक 15

सरल अर्थ: लंकाविजयी हनुमान पीठ, रामभक्त नाभि और अनिलात्मज कटि की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: लंका से जुड़े विशेषण का पाठभेद दर्ज है; शरीर के मध्य भाग भी भक्ति की रक्षात्मक कल्पना में आते हैं।

श्लोक 16

सरल अर्थ: महाप्राज्ञ गोपनीय अंगों और जाँघों तथा लंका-प्रासाद-भंजक घुटनों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: कवच की सामान्य शैली में शरीर का कोई अंग उपेक्षित नहीं रहता; यह शरीर के प्रति समग्रता का संकेत है।

श्लोक 17

सरल अर्थ: कपिश्रेष्ठ पिंडलियों, महाबलवान गुल्फों तथा पर्वत उठाने वाले हनुमान पैरों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: पर्वत उठाने की छवि लक्ष्मण-रक्षा की कथा याद दिलाती है; वीरता का लक्ष्य यहाँ सहायता है।

श्लोक 18

सरल अर्थ: सत्त्वसम्पन्न वीर हनुमान अंगों, पैर की उँगलियों, मुख-अंगों और रोमों तक रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: अंगों से रोमों तक की प्रार्थना कवच को सम्पूर्ण शरीर की प्रतीकात्मक सुरक्षा बना देती है।

श्लोक 19

सरल अर्थ: दिन-रात, खड़े होने, चलने, बैठने, पीने और खाने की सभी अवस्थाओं में पवनसुत रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: स्मरण केवल युद्ध-संकट तक नहीं, दैनिक क्रियाओं तक फैला है; एक नाम के पाठभेद की जाँच अभी बाकी है।

श्लोक 20

सरल अर्थ: त्र्यम्बकसम्भव कहे गए हनुमान सावधान-असावधान व्यक्ति तथा नींद या गहरे जल की स्थिति में रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: ‘त्र्यम्बकसम्भव’ शैव सम्बन्ध की एक अभिव्यक्ति है; इसे सभी परम्पराओं का एकमात्र मत नहीं ठहराना चाहिए।

श्लोक 21

सरल अर्थ: स्थल, आकाश, अग्नि, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, युद्ध और गहन संकट में विराट रूपधारी हनुमान रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: विविध स्थलों की सूची व्यापक शरण-भावना दिखाती है; अग्नि या दुर्घटना से अभेद्य होने का तथ्यात्मक दावा नहीं।

श्लोक 22

सरल अर्थ: ग्रंथ में वर्णित डाकिनी, शाकिनी, पिशाच, सर्प और भयावह शक्तियों से विभु हनुमान रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: ये प्राचीन धार्मिक कल्पनाएँ हैं; इन्हें सत्यापित अलौकिक ख़तरों के रूप में स्वीकार करना आवश्यक नहीं।

श्लोक 23

सरल अर्थ: दिव्यदेहधारी, बुद्धिमान तथा भक्तों के रक्षक हनुमान हर दिशा से संरक्षण दें। विस्तृत व्याख्या: विशिष्ट भय के बाद फिर व्यापक रक्षा-भाव आता है; ‘साधकेन्द्रावन’ समास की व्याख्या विशेषज्ञ समीक्षा के अधीन है।

श्लोक 24

सरल अर्थ: जिनके भीषण रूप से भयावह शक्तियाँ भागती हैं, वे सर्वज्ञ तथा सृष्टि-पालक रूप में रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: यह पद हनुमान को रामकथा के पात्र से बढ़ाकर विराट रक्षक रूप देता है; यह स्तोत्र का धार्मिक दृष्टिकोण है।

श्लोक 25

सरल अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा सूर्य-मण्डल से संबद्ध दिव्य रूप तीनों काल में रक्षा करे। विस्तृत व्याख्या: यह बहुरूपी ईश्वर-भाव का काव्य है; इससे विभिन्न संप्रदायों के विशिष्ट दार्शनिक मत मिट नहीं जाते।

श्लोक 26

सरल अर्थ: दैत्य, देवता, मनुष्य, पशु, स्थावर और जंगम सभी हनुमान के प्रबल शब्द को सुनते हैं। विस्तृत व्याख्या: वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है; इसलिए २६ और २७ का अर्थ संयुक्त सन्दर्भ में समझें।

श्लोक 27

सरल अर्थ: पिछले श्लोक में वर्णित प्राणी भय तथा भयमुक्ति से जुड़ते हैं और हनुमान की कथाएँ कल्प-कल्प में सुनी जाती हैं। विस्तृत व्याख्या: समास और वाक्यरचना कठिन हैं; सम्भव अर्थ दिव्य महिमा का विस्मय और शरण से निर्भयता का मेल है।

श्लोक 28

सरल अर्थ: रामपरायण हनुमान श्रेष्ठ साधक की रक्षा करें; आगे दृश्य जगत् में दिव्य व्याप्ति का संकेत आता है। विस्तृत व्याख्या: दूसरा चरण अगले श्लोक के दार्शनिक कथन से जुड़ता है; इसीलिए उसका अर्थ सावधानी से प्रस्तुत है।

श्लोक 29

सरल अर्थ: दृश्य जगत् को हनुमान के दिव्य रूप से व्याप्त समझने तथा सूक्ष्म और विराट एक साथ देखने का आग्रह है। विस्तृत व्याख्या: इस स्थान का पाठ और व्याकरण कठिन है; ‘मैं वही हूँ’ जैसी भाषा को किसी एक निश्चित दर्शन का प्रमाण न मानें।

श्लोक 30

सरल अर्थ: ऋक्, यजुः, साम, प्रणव तथा यज्ञ से संबद्ध रूप की उपासना कर वक्ता भीतर से प्रणाम करता है। विस्तृत व्याख्या: वैदिक पदों का प्रयोग हनुमान की महिमा के लिए है; कवच को स्वयं वेद की ऋचा घोषित करना गलत होगा।

श्लोक 31

सरल अर्थ: अनन्त ब्रह्माण्ड धारण करने वाले, वायुसम्बद्ध तथा ब्रह्मस्वरूप हनुमान को वक्ता प्रणाम करता है। विस्तृत व्याख्या: यहाँ कवच अंगरक्षा से आगे बढ़कर व्यापक ब्रह्मतत्त्व और परम शक्ति की स्तुति बन जाता है।

श्लोक 32

सरल अर्थ: मारुतसुत, महान् रामभक्त हनुमान को बार-बार नमस्कार किया गया है। विस्तृत व्याख्या: यहीं से नमस्कारात्मक नामावली आरम्भ होती है जिसमें पराक्रम और प्रेमभक्ति साथ चलते हैं।

श्लोक 33

सरल अर्थ: सुग्रीव के मित्र, समुद्र लाँघने और लंका-दहन करने वाले वानरवीर को नमस्कार है। विस्तृत व्याख्या: ये दोनों घटनाएँ सीता-खोज के अभियान से जुड़ी हैं; संदर्भ के बिना इन्हें स्वतंत्र हिंसा का आदर्श न बनाएँ।

श्लोक 34

सरल अर्थ: सीता का शोक दूर करने, राम की मुद्रा लेकर जाने और रावण-विनाश में योगदान देने वाले हनुमान को प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: मुद्रा विश्वास और पहचान का चिह्न है; हनुमान की सेवा में आश्वासन देना युद्ध-वीरता जितना महत्त्वपूर्ण है।

श्लोक 35

सरल अर्थ: मेघनाद के यज्ञ में बाधा और अशोक-वाटिका विध्वंस का स्मरण कर विजयदायी हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: यह रामकथा के युद्ध प्रसंग का वर्णन है; किसी वास्तविक धार्मिक अनुष्ठान को बाधित करने की सलाह नहीं।

श्लोक 36

सरल अर्थ: वायुपुत्र हनुमान के आकाशगमन और लंका के रक्षकों से संघर्ष की वीरगाथा कही गई है। विस्तृत व्याख्या: यह क्रियात्मक चित्रण कर्तव्य के प्रति दृढ़ता का रूपक बनता है, न कि साधक के लिए आचरण-निर्देश।

श्लोक 37

सरल अर्थ: स्वर्ण-तेज से दीप्त, दीर्घपूँछ वाले रामदूत तथा सौमित्रि की सहायता करने वाले हनुमान को नमस्कार है। विस्तृत व्याख्या: ‘सौमित्रि’ लक्ष्मण का नाम है; इस स्मरण में रूपवैभव से अधिक सेवा और सहायता की प्रतिष्ठा है।

श्लोक 38

सरल अर्थ: अक्ष-वध, ब्रह्मास्त्र का सामना करने तथा लक्ष्मण के गंभीर घाव से जुड़ी रक्षा-कथा के लिए उनका गुणगान है। विस्तृत व्याख्या: रामकथा के अनेक प्रसंग एक ही श्लोक में संक्षेपित हैं; विवरण सभी संस्करणों में समान हों, यह आवश्यक नहीं।

श्लोक 39

सरल अर्थ: विरोधी शक्तियों का दमन करने और वानर-ऋक्ष वीरों का सहारा बनने वाले हनुमान को बार-बार प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: वीररस का युद्ध-सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण है; इसे आज किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का आह्वान नहीं समझना चाहिए।

श्लोक 40

सरल अर्थ: शत्रुसेना, अस्त्र-शस्त्र, विष, द्वेष और भय पर विजय के लिए हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: विषनिवारण सहित सभी दावे स्तोत्र की धार्मिक भाषा हैं; वास्तविक विषाक्तता में तत्काल चिकित्सकीय सहायता चाहिए।

श्लोक 41

सरल अर्थ: महाशत्रुओं के भय तथा दूसरे के द्वारा भेजे गए बाधक मन्त्रों को रोकने की शक्ति के रूप में हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: ‘मन्त्र-स्तम्भन’ पुराने धार्मिक विश्वासों का उल्लेख है; इससे किसी प्रकार का तान्त्रिक प्रयोग सिखाया नहीं जा रहा।

श्लोक 42

सरल अर्थ: समुद्र पर शिलाओं से सेतु बनने और बाल्यकाल में सूर्य को फल समझने की कथा से हनुमान का स्मरण है। विस्तृत व्याख्या: सेतु का प्रसंग रामसेना से और सूर्य को फल समझने की कथा हनुमान के बालचरित से संबंधित है।

श्लोक 43

सरल अर्थ: नख-दन्त को आयुध मानने वाले, वज्र-सी देह वाले पराक्रमी हनुमान को प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: उग्र रूप रक्षक-वीरता का प्रतीक है; ‘शर्व’ और ‘विहंगम’ जैसे पदों की विशेष पाठ-जाँच अपेक्षित है।

श्लोक 44

सरल अर्थ: ग्राम-ग्राम में स्मरणीय, हाथ में पर्वत धारण करने वाले तथा राम के आयुध-सदृश सेवक की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: ‘रामशस्त्र’ राम की आज्ञा में समर्पित बल का रूपक है; भूत-प्रेत विनाश का उल्लेख वास्तविक हिंसक कार्यादेश नहीं।

श्लोक 45

सरल अर्थ: कौपीनधारी, रामभक्ति में रत हनुमान सज्जनों के लिए चन्द्रोदय और दक्षिण दिशा में सूर्य के समान कहे गए हैं। विस्तृत व्याख्या: सूर्य और चन्द्र की उपमा में शक्ति तथा शीतल करुणा दोनों भाव मिलते हैं; कौपीन सादगी का चिह्न है।

श्लोक 46

सरल अर्थ: क्लेशों को हरने, स्वामी की आज्ञा निभाने और संग्राम में साथियों की सहायता करने वाले हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: कुछ समासों का पाठ अस्पष्ट है; निष्ठापूर्ण सेवा का मुख्य आशय स्पष्ट है, युद्ध-घटना का हर ब्योरा नहीं।

श्लोक 47

सरल अर्थ: युद्ध में साथ देने तथा प्रबल किलकारी और सिंहनाद करने वाले हनुमान का स्मरण है। विस्तृत व्याख्या: ध्वनि का अनुकरण करने वाला शब्द विभिन्न पाठों में बदलता है; यहाँ किसी रूप को अंतिम उच्चारण नहीं बताया गया।

श्लोक 48

सरल अर्थ: अग्नि, व्याधि और भय शांत करने वाले तथा वनफलों से संतुष्ट हनुमान को प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: रोगहरण का कथन श्रद्धापरक है, चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं; वनफलों से संतोष सादगी दिखाता है।

श्लोक 49

सरल अर्थ: सागर के शिलासेतु से जुड़ी स्तुति के बाद वक्ता कहता है कि मारुति का यह शुभ कवच कहा जा चुका है। विस्तृत व्याख्या: यह श्लोक स्तुति के अंत और फलश्रुति के आरम्भ को एक साथ रखता है; कोई भाग हटाया नहीं गया है।

श्लोक 50

सरल अर्थ: फलश्रुति में इसे सावधानी से रखने तथा सुगन्धित पदार्थों से लिखकर धारण करने का उल्लेख है। विस्तृत व्याख्या: यह प्राचीन अनुष्ठान का वर्णन भर है; यहाँ सामग्री, क्रम, सिद्धि या दीक्षा-विधि का निर्देश नहीं है।

श्लोक 51

सरल अर्थ: परम्परागत कथन में इसे धारण करने वाले की सफलता और दीर्घ जप-साधना का संकेत मिलता है। विस्तृत व्याख्या: जप-संख्या या सफलता का आश्वासन यहाँ नहीं दिया गया; यह मूल पाठ की फलश्रुति है, व्यावहारिक सलाह नहीं।

श्लोक 52

सरल अर्थ: अंतिम अर्धश्लोक में कथित है कि कवच-जप से कठिन लक्ष्य भी साधे जा सकते हैं। विस्तृत व्याख्या: जाँचे गए पाठ में श्लोक ५२ आधा है; छन्द पूरा दिखाने के लिए कोई कल्पित अतिरिक्त पंक्ति नहीं जोड़ी गई है।

  1. नारदपुराणम् — पूर्वार्धः, अध्यायः ७८, Sanskrit Wikisource · स्रोत खोलें
  2. Shri Hanumat Kavacham — Narada Purana, Sanskrit Documents · स्रोत खोलें
  3. Nārada Purāṇa, Pūrvabhāga 78.1 on Wisdom Library · स्रोत खोलें
  4. Hanumat Kavacham — Ānanda Rāmāyaṇa, Sanskrit Documents · स्रोत खोलें
  5. Hanumat Kavacham — Sudarśana Saṃhitā, Sanskrit Documents · स्रोत खोलें
  6. Pañcamukha Hanumat Kavacham — Sanskrit Documents · स्रोत खोलें