संपूर्ण चुना हुआ डिजिटल पाठ: ५२ श्लोक और अलग अध्याय-समापन। यह ऐतिहासिक मुद्रित प्रति से स्वीकृत मूलपाठ नहीं है।
यह कवच क्या है? यह हनुमत्कवच बृहन्नारदीय/नारदपुराण, पूर्वभाग, अध्याय ७८ से चुना गया है। सनत्कुमार नारद को बताते हैं कि कैसे राम से मारुति के कवच की शिक्षा मिली। आरम्भ के सात श्लोक कथा के हैं, श्लोक ८–१८ दिशा और अंगों की रक्षाप्रार्थना हैं, १९–३१ दिनचर्या, संकट तथा व्यापक दिव्यस्वरूप का वर्णन करते हैं, ३२–४८ हनुमान के गुणों और रामकथा के प्रसंगों की नमस्कारात्मक स्तुति हैं, और ४९–५२ में कथित फलश्रुति आती है। 1 2
यह आनन्दरामायण, सुदर्शनसंहिता या पञ्चमुख हनुमत्कवच का संयुक्त पाठ नहीं है। उन रचनाओं की कथा, मन्त्र और श्लोकसंख्या अलग हैं। 4 5 6
पाठस्थिति: संस्कृत विकिस्रोत के अध्याय को दूसरे डिजिटल पाठ से तुलना करके तैयार किया गया यह प्रावधिक, तुलना-संशोधित पाठ है। इसे किसी मुद्रित ऐतिहासिक संस्करण की शब्दशः प्रतिलिपि या स्वीकृत पाठ न मानें। विशेषतः श्लोक ७, १९, २७–२९, ४१, ४३ और ४७ का विशेषज्ञ पाठ-परीक्षण शेष है।
अध्याय-समापन
सरल अर्थ: समापन-पंक्ति इसे बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वभाग में हनुमत्कवच का अठहत्तरवाँ अध्याय बताती है। विस्तृत व्याख्या: कोलॉफन ग्रंथ और अध्याय की पारम्परिक पहचान है, कवच का तिरेपनवाँ श्लोक नहीं। शीर्षक तथा अध्याय विभाजन की ऐतिहासिक पुष्टि शेष है।
मुख्य विषय और पठन-दृष्टि
दिशा और अंगों की सुरक्षा (८–१८): स्तोत्र पूरे शरीर और विश्व-परिसर को भक्ति से जोड़ता है। ‘पूर्वतः’, ‘कण्ठे’, ‘नाभिं’ जैसे पद क्रमशः स्थान तथा शरीर के अंगों को दर्शाते हैं। यह भावात्मक मानचित्र है; किसी व्यावहारिक चिकित्सा या सुरक्षा युक्ति का विकल्प नहीं। रामसेवा की छवियाँ (३२–४८): राम की मुद्रा, सीता का शोक, समुद्र-लङ्घन, लक्ष्मण की सहायता और लंका का प्रसंग बार-बार आता है। इसलिए पराक्रम को सेवा और निष्ठा से अलग करके न पढ़ें। दिव्य स्वरूप (२५–३१): शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य तथा वैदिक रूपों के साथ हनुमान का सम्बन्ध स्तोत्र की धार्मिक भाषा है। विभिन्न परम्पराओं में हनुमान की पहचान का विवेचन एक जैसा नहीं होता। फलश्रुति (४९–५२): लिखकर धारण करने और पुनरावृत्ति का उल्लेख केवल स्रोत-सन्दर्भ में है। इस लेख से कोई दीक्षा, न्यास, तान्त्रिक प्रयोग, जप-गणना या सिद्धि-विधान अनुमोदित नहीं होता। बीमारी, विष, अग्नि या शत्रु से अजेय होने का वैज्ञानिक आश्वासन भी नहीं दिया जाता।
पाठभेद और प्रमाण
मुख्य डिजिटल संदर्भ 1 संस्कृत विकिस्रोत का अध्याय ७८ है; 2 स्वतंत्र ऑनलाइन तुलना-पाठ है, जिसकी व्यावसायिक पुनर्प्रकाशन-शर्तें कठोर हैं। श्लोक ७ में अतिरिक्त अक्षर, १९ में नामभेद, ३३ में ‘लङ्का’ का छूटा हुआ आरम्भ, ४१ में ‘मन्त्र/यन्त्र’, ४३ में ‘शर्व/शव’, और ४७ में ध्वन्यात्मक पद के भेद विशेष रूप से दर्ज हैं। श्लोक ५२ एक ही अर्धश्लोक है—उसमें नई पंक्ति नहीं बनाई गई है। 1 2
मुद्रित ऐतिहासिक ग्रंथ या हस्तलेख से स्वतंत्र संपूर्ण मिलान नहीं हुआ है। क्या यह पञ्चमुख हनुमान कवच है? नहीं। पञ्चमुख रूप से जुड़ा कवच अलग पाठ और परम्परा है। क्या अंतिम श्लोक अधूरा है? उपलब्ध दोनों डिजिटल पाठों में ५२वाँ श्लोक केवल एक अर्धश्लोक है। शेष को कल्पना से नहीं भरा गया। क्या फलश्रुति की क्रियाएँ यहाँ सिखाई गई हैं? नहीं। उन्हें केवल ग्रंथ की परम्परागत भाषा के रूप में बताया गया है। वर्तमान फाइलें बंद संपादकीय ड्राफ्ट हैं। आंतरिक सम्बन्ध: सम्बन्धित पाठ (हनुमान), सम्बन्धित पाठ (संकटमोचन अष्टक), सम्बन्धित पाठ (ॐ हनुमते नमः)। ये स्थिर संदर्भ हैं, लाइव लिंक नहीं।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
श्लोक 1
सरल अर्थ: सनत्कुमार कहते हैं कि कार्तवीर्य के कवच के बाद वे मोह दूर करने वाला मारुति का विजयदायक कवच सुनाएँगे। विस्तृत व्याख्या: यह आरम्भ नारदपुराण के पिछले अध्याय से जुड़ता है और वक्ता सनत्कुमार को पहचानता है। कवच स्मरण द्वारा रक्षा की धार्मिक कल्पना है, भौतिक कवच नहीं।
श्लोक 2
सरल अर्थ: इसमें कवच को विघ्न, शत्रुभय और भूत-प्रेत से जुड़े पारम्परिक संकटों को मिटाने वाला कहा गया है। विस्तृत व्याख्या: ये कवच के पारम्परिक फलवचन हैं, रोग या भय से निश्चित मुक्ति का प्रमाण नहीं। भाषा में श्रद्धा का आश्वासन व्यक्त होता है।
श्लोक 3
सरल अर्थ: सनत्कुमार स्मरण करते हैं कि वे आनन्दवन में अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करते हुए राम के दर्शन के लिए गए। विस्तृत व्याख्या: यहाँ राम केवल कथा-नायक नहीं, आत्मचिन्तन में स्थित दिव्य व्यक्तित्व भी हैं; इसी से शिक्षापरम्परा की पृष्ठभूमि बनती है।
श्लोक 4
सरल अर्थ: उन्होंने देवताओं द्वारा पूजित राम को प्रणाम किया और उनके दिए हुए आसन पर बैठे। विस्तृत व्याख्या: यह आतिथ्य और विनय का प्रसंग है, शरीर-रक्षा की सूची का अंश नहीं।
श्लोक 5
सरल अर्थ: रावण-वध तक की घटनाओं के विषय में पूछने पर राम आदरपूर्वक उत्तर देते हैं। विस्तृत व्याख्या: कवच की पृष्ठभूमि रामकथा है; इसका आरम्भ किसी अनाम स्वतंत्र मन्त्र की तरह नहीं होता।
श्लोक 6
सरल अर्थ: कथा के अंत में राम मारुति का कवच देते हैं और वक्ता उसे गोपनीयता के साथ आगे बताने की बात करते हैं। विस्तृत व्याख्या: गोपनीयता का उल्लेख ग्रंथ की पवित्रता का परम्परागत संकेत है; इससे यहाँ दीक्षात्मक प्रयोग सिखाने की अनुमति नहीं मिलती।
श्लोक 7
सरल अर्थ: राम द्वारा अंजनीपुत्र से सम्बन्धित यह उपदेश लौकिक सुख और मुक्ति दोनों से जुड़ा बताया गया है। विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक के पदों में डिजिटल पाठभेद हैं; भोग-मोक्ष के फल परम्परागत विश्वास हैं, निर्विवाद ऐतिहासिक कथन नहीं।
श्लोक 8
सरल अर्थ: पूर्व में हनुमान, दक्षिण में पवनात्मज, पश्चिम में अक्षघ्न और उत्तर में समुद्र-लाँघने वाले हनुमान रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: चार दिशाओं में भिन्न नामों से एक ही हनुमान का स्मरण होता है; ‘अक्षघ्न’ रामकथा के अक्ष-वध की याद दिलाता है।
श्लोक 9
सरल अर्थ: ऊपर कपिश्रेष्ठ, नीचे केसरिनन्दन एवं विष्णुभक्त, और मध्य में पवनपुत्र की रक्षा-भावना व्यक्त है। विस्तृत व्याख्या: यहाँ ऊपर-नीचे-मध्य से सम्पूर्ण स्थान की कल्पना की गई है; बल के साथ भक्ति और परिवार-सूचक नाम भी आते हैं।
श्लोक 10
सरल अर्थ: लंका-दाह करने वाले तथा सुग्रीव के मंत्री कहे गए वायुनन्दन सिर और संकटों से रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: लंका-दहन वीरता की स्मृति है और सुग्रीव-सचिव पद हनुमान की बुद्धिमत्ता तथा सेवाभाव पर बल देता है।
श्लोक 11
सरल अर्थ: महावीर ललाट और भ्रूमध्य की तथा प्लवगेश्वर नेत्रों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: इन्द्रियों को भी रक्षा-प्रार्थना में सम्मिलित किया गया है; प्रथम चरण की एक दुर्लभ उपाधि की शब्दार्थ-जाँच शेष है।
श्लोक 12
सरल अर्थ: रामसेवक कपोल और कानों, अंजनीसूनु नासिका तथा हरीश्वर मुख की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: अंजनीपुत्र और रामकिंकर जैसे नाम बताते हैं कि हनुमान की पहचान शक्ति के साथ सेवा से भी बनती है।
श्लोक 13
सरल अर्थ: दैत्यारि कंठ, सुरारिजित् कंधों, महातेजस्वी बाहुओं तथा चरणायुध हाथों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: आयुध-संबन्धी पद वीर-काव्य के संकेत हैं; इससे वास्तविक अस्त्रप्रयोग या हिंसक निर्देश नहीं निकलते।
श्लोक 14
सरल अर्थ: नखायुध नखों, कपीश्वर उदर, मुद्रा ले जाने वाले हनुमान वक्ष तथा पार्श्व की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: ‘मुद्रा’ सीता तक राम की अँगूठी पहुँचाने का प्रसंग जगा सकती है; पद-रचना का अंतिम निर्णय पाठालोचन पर निर्भर है।
श्लोक 15
सरल अर्थ: लंकाविजयी हनुमान पीठ, रामभक्त नाभि और अनिलात्मज कटि की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: लंका से जुड़े विशेषण का पाठभेद दर्ज है; शरीर के मध्य भाग भी भक्ति की रक्षात्मक कल्पना में आते हैं।
श्लोक 16
सरल अर्थ: महाप्राज्ञ गोपनीय अंगों और जाँघों तथा लंका-प्रासाद-भंजक घुटनों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: कवच की सामान्य शैली में शरीर का कोई अंग उपेक्षित नहीं रहता; यह शरीर के प्रति समग्रता का संकेत है।
श्लोक 17
सरल अर्थ: कपिश्रेष्ठ पिंडलियों, महाबलवान गुल्फों तथा पर्वत उठाने वाले हनुमान पैरों की रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: पर्वत उठाने की छवि लक्ष्मण-रक्षा की कथा याद दिलाती है; वीरता का लक्ष्य यहाँ सहायता है।
श्लोक 18
सरल अर्थ: सत्त्वसम्पन्न वीर हनुमान अंगों, पैर की उँगलियों, मुख-अंगों और रोमों तक रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: अंगों से रोमों तक की प्रार्थना कवच को सम्पूर्ण शरीर की प्रतीकात्मक सुरक्षा बना देती है।
श्लोक 19
सरल अर्थ: दिन-रात, खड़े होने, चलने, बैठने, पीने और खाने की सभी अवस्थाओं में पवनसुत रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: स्मरण केवल युद्ध-संकट तक नहीं, दैनिक क्रियाओं तक फैला है; एक नाम के पाठभेद की जाँच अभी बाकी है।
श्लोक 20
सरल अर्थ: त्र्यम्बकसम्भव कहे गए हनुमान सावधान-असावधान व्यक्ति तथा नींद या गहरे जल की स्थिति में रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: ‘त्र्यम्बकसम्भव’ शैव सम्बन्ध की एक अभिव्यक्ति है; इसे सभी परम्पराओं का एकमात्र मत नहीं ठहराना चाहिए।
श्लोक 21
सरल अर्थ: स्थल, आकाश, अग्नि, पर्वत, समुद्र, वृक्ष, युद्ध और गहन संकट में विराट रूपधारी हनुमान रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: विविध स्थलों की सूची व्यापक शरण-भावना दिखाती है; अग्नि या दुर्घटना से अभेद्य होने का तथ्यात्मक दावा नहीं।
श्लोक 22
सरल अर्थ: ग्रंथ में वर्णित डाकिनी, शाकिनी, पिशाच, सर्प और भयावह शक्तियों से विभु हनुमान रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: ये प्राचीन धार्मिक कल्पनाएँ हैं; इन्हें सत्यापित अलौकिक ख़तरों के रूप में स्वीकार करना आवश्यक नहीं।
श्लोक 23
सरल अर्थ: दिव्यदेहधारी, बुद्धिमान तथा भक्तों के रक्षक हनुमान हर दिशा से संरक्षण दें। विस्तृत व्याख्या: विशिष्ट भय के बाद फिर व्यापक रक्षा-भाव आता है; ‘साधकेन्द्रावन’ समास की व्याख्या विशेषज्ञ समीक्षा के अधीन है।
श्लोक 24
सरल अर्थ: जिनके भीषण रूप से भयावह शक्तियाँ भागती हैं, वे सर्वज्ञ तथा सृष्टि-पालक रूप में रक्षा करें। विस्तृत व्याख्या: यह पद हनुमान को रामकथा के पात्र से बढ़ाकर विराट रक्षक रूप देता है; यह स्तोत्र का धार्मिक दृष्टिकोण है।
श्लोक 25
सरल अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर तथा सूर्य-मण्डल से संबद्ध दिव्य रूप तीनों काल में रक्षा करे। विस्तृत व्याख्या: यह बहुरूपी ईश्वर-भाव का काव्य है; इससे विभिन्न संप्रदायों के विशिष्ट दार्शनिक मत मिट नहीं जाते।
श्लोक 26
सरल अर्थ: दैत्य, देवता, मनुष्य, पशु, स्थावर और जंगम सभी हनुमान के प्रबल शब्द को सुनते हैं। विस्तृत व्याख्या: वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है; इसलिए २६ और २७ का अर्थ संयुक्त सन्दर्भ में समझें।
श्लोक 27
सरल अर्थ: पिछले श्लोक में वर्णित प्राणी भय तथा भयमुक्ति से जुड़ते हैं और हनुमान की कथाएँ कल्प-कल्प में सुनी जाती हैं। विस्तृत व्याख्या: समास और वाक्यरचना कठिन हैं; सम्भव अर्थ दिव्य महिमा का विस्मय और शरण से निर्भयता का मेल है।
श्लोक 28
सरल अर्थ: रामपरायण हनुमान श्रेष्ठ साधक की रक्षा करें; आगे दृश्य जगत् में दिव्य व्याप्ति का संकेत आता है। विस्तृत व्याख्या: दूसरा चरण अगले श्लोक के दार्शनिक कथन से जुड़ता है; इसीलिए उसका अर्थ सावधानी से प्रस्तुत है।
श्लोक 29
सरल अर्थ: दृश्य जगत् को हनुमान के दिव्य रूप से व्याप्त समझने तथा सूक्ष्म और विराट एक साथ देखने का आग्रह है। विस्तृत व्याख्या: इस स्थान का पाठ और व्याकरण कठिन है; ‘मैं वही हूँ’ जैसी भाषा को किसी एक निश्चित दर्शन का प्रमाण न मानें।
श्लोक 30
सरल अर्थ: ऋक्, यजुः, साम, प्रणव तथा यज्ञ से संबद्ध रूप की उपासना कर वक्ता भीतर से प्रणाम करता है। विस्तृत व्याख्या: वैदिक पदों का प्रयोग हनुमान की महिमा के लिए है; कवच को स्वयं वेद की ऋचा घोषित करना गलत होगा।
श्लोक 31
सरल अर्थ: अनन्त ब्रह्माण्ड धारण करने वाले, वायुसम्बद्ध तथा ब्रह्मस्वरूप हनुमान को वक्ता प्रणाम करता है। विस्तृत व्याख्या: यहाँ कवच अंगरक्षा से आगे बढ़कर व्यापक ब्रह्मतत्त्व और परम शक्ति की स्तुति बन जाता है।
श्लोक 32
सरल अर्थ: मारुतसुत, महान् रामभक्त हनुमान को बार-बार नमस्कार किया गया है। विस्तृत व्याख्या: यहीं से नमस्कारात्मक नामावली आरम्भ होती है जिसमें पराक्रम और प्रेमभक्ति साथ चलते हैं।
श्लोक 33
सरल अर्थ: सुग्रीव के मित्र, समुद्र लाँघने और लंका-दहन करने वाले वानरवीर को नमस्कार है। विस्तृत व्याख्या: ये दोनों घटनाएँ सीता-खोज के अभियान से जुड़ी हैं; संदर्भ के बिना इन्हें स्वतंत्र हिंसा का आदर्श न बनाएँ।
श्लोक 34
सरल अर्थ: सीता का शोक दूर करने, राम की मुद्रा लेकर जाने और रावण-विनाश में योगदान देने वाले हनुमान को प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: मुद्रा विश्वास और पहचान का चिह्न है; हनुमान की सेवा में आश्वासन देना युद्ध-वीरता जितना महत्त्वपूर्ण है।
श्लोक 35
सरल अर्थ: मेघनाद के यज्ञ में बाधा और अशोक-वाटिका विध्वंस का स्मरण कर विजयदायी हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: यह रामकथा के युद्ध प्रसंग का वर्णन है; किसी वास्तविक धार्मिक अनुष्ठान को बाधित करने की सलाह नहीं।
श्लोक 36
सरल अर्थ: वायुपुत्र हनुमान के आकाशगमन और लंका के रक्षकों से संघर्ष की वीरगाथा कही गई है। विस्तृत व्याख्या: यह क्रियात्मक चित्रण कर्तव्य के प्रति दृढ़ता का रूपक बनता है, न कि साधक के लिए आचरण-निर्देश।
श्लोक 37
सरल अर्थ: स्वर्ण-तेज से दीप्त, दीर्घपूँछ वाले रामदूत तथा सौमित्रि की सहायता करने वाले हनुमान को नमस्कार है। विस्तृत व्याख्या: ‘सौमित्रि’ लक्ष्मण का नाम है; इस स्मरण में रूपवैभव से अधिक सेवा और सहायता की प्रतिष्ठा है।
श्लोक 38
सरल अर्थ: अक्ष-वध, ब्रह्मास्त्र का सामना करने तथा लक्ष्मण के गंभीर घाव से जुड़ी रक्षा-कथा के लिए उनका गुणगान है। विस्तृत व्याख्या: रामकथा के अनेक प्रसंग एक ही श्लोक में संक्षेपित हैं; विवरण सभी संस्करणों में समान हों, यह आवश्यक नहीं।
श्लोक 39
सरल अर्थ: विरोधी शक्तियों का दमन करने और वानर-ऋक्ष वीरों का सहारा बनने वाले हनुमान को बार-बार प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: वीररस का युद्ध-सन्दर्भ महत्त्वपूर्ण है; इसे आज किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का आह्वान नहीं समझना चाहिए।
श्लोक 40
सरल अर्थ: शत्रुसेना, अस्त्र-शस्त्र, विष, द्वेष और भय पर विजय के लिए हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: विषनिवारण सहित सभी दावे स्तोत्र की धार्मिक भाषा हैं; वास्तविक विषाक्तता में तत्काल चिकित्सकीय सहायता चाहिए।
श्लोक 41
सरल अर्थ: महाशत्रुओं के भय तथा दूसरे के द्वारा भेजे गए बाधक मन्त्रों को रोकने की शक्ति के रूप में हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: ‘मन्त्र-स्तम्भन’ पुराने धार्मिक विश्वासों का उल्लेख है; इससे किसी प्रकार का तान्त्रिक प्रयोग सिखाया नहीं जा रहा।
श्लोक 42
सरल अर्थ: समुद्र पर शिलाओं से सेतु बनने और बाल्यकाल में सूर्य को फल समझने की कथा से हनुमान का स्मरण है। विस्तृत व्याख्या: सेतु का प्रसंग रामसेना से और सूर्य को फल समझने की कथा हनुमान के बालचरित से संबंधित है।
श्लोक 43
सरल अर्थ: नख-दन्त को आयुध मानने वाले, वज्र-सी देह वाले पराक्रमी हनुमान को प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: उग्र रूप रक्षक-वीरता का प्रतीक है; ‘शर्व’ और ‘विहंगम’ जैसे पदों की विशेष पाठ-जाँच अपेक्षित है।
श्लोक 44
सरल अर्थ: ग्राम-ग्राम में स्मरणीय, हाथ में पर्वत धारण करने वाले तथा राम के आयुध-सदृश सेवक की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: ‘रामशस्त्र’ राम की आज्ञा में समर्पित बल का रूपक है; भूत-प्रेत विनाश का उल्लेख वास्तविक हिंसक कार्यादेश नहीं।
श्लोक 45
सरल अर्थ: कौपीनधारी, रामभक्ति में रत हनुमान सज्जनों के लिए चन्द्रोदय और दक्षिण दिशा में सूर्य के समान कहे गए हैं। विस्तृत व्याख्या: सूर्य और चन्द्र की उपमा में शक्ति तथा शीतल करुणा दोनों भाव मिलते हैं; कौपीन सादगी का चिह्न है।
श्लोक 46
सरल अर्थ: क्लेशों को हरने, स्वामी की आज्ञा निभाने और संग्राम में साथियों की सहायता करने वाले हनुमान की स्तुति है। विस्तृत व्याख्या: कुछ समासों का पाठ अस्पष्ट है; निष्ठापूर्ण सेवा का मुख्य आशय स्पष्ट है, युद्ध-घटना का हर ब्योरा नहीं।
श्लोक 47
सरल अर्थ: युद्ध में साथ देने तथा प्रबल किलकारी और सिंहनाद करने वाले हनुमान का स्मरण है। विस्तृत व्याख्या: ध्वनि का अनुकरण करने वाला शब्द विभिन्न पाठों में बदलता है; यहाँ किसी रूप को अंतिम उच्चारण नहीं बताया गया।
श्लोक 48
सरल अर्थ: अग्नि, व्याधि और भय शांत करने वाले तथा वनफलों से संतुष्ट हनुमान को प्रणाम है। विस्तृत व्याख्या: रोगहरण का कथन श्रद्धापरक है, चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं; वनफलों से संतोष सादगी दिखाता है।
श्लोक 49
सरल अर्थ: सागर के शिलासेतु से जुड़ी स्तुति के बाद वक्ता कहता है कि मारुति का यह शुभ कवच कहा जा चुका है। विस्तृत व्याख्या: यह श्लोक स्तुति के अंत और फलश्रुति के आरम्भ को एक साथ रखता है; कोई भाग हटाया नहीं गया है।
श्लोक 50
सरल अर्थ: फलश्रुति में इसे सावधानी से रखने तथा सुगन्धित पदार्थों से लिखकर धारण करने का उल्लेख है। विस्तृत व्याख्या: यह प्राचीन अनुष्ठान का वर्णन भर है; यहाँ सामग्री, क्रम, सिद्धि या दीक्षा-विधि का निर्देश नहीं है।
श्लोक 51
सरल अर्थ: परम्परागत कथन में इसे धारण करने वाले की सफलता और दीर्घ जप-साधना का संकेत मिलता है। विस्तृत व्याख्या: जप-संख्या या सफलता का आश्वासन यहाँ नहीं दिया गया; यह मूल पाठ की फलश्रुति है, व्यावहारिक सलाह नहीं।
श्लोक 52
सरल अर्थ: अंतिम अर्धश्लोक में कथित है कि कवच-जप से कठिन लक्ष्य भी साधे जा सकते हैं। विस्तृत व्याख्या: जाँचे गए पाठ में श्लोक ५२ आधा है; छन्द पूरा दिखाने के लिए कोई कल्पित अतिरिक्त पंक्ति नहीं जोड़ी गई है।