पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

मन्त्र और जप

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय — द्वादशाक्षरी मन्त्र

ध्रुव को नारद द्वारा बताया गया बारह-अक्षरी वासुदेव-नमस्कार मन्त्र—स्रोत और भावार्थ सहित।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

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विषय-सूची पर लौटें

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

अर्थ

ॐ—भगवान् वासुदेव (वैष्णव परम्परा में श्रीकृष्ण/विष्णु) को श्रद्धापूर्वक नमस्कार।

व्याख्या

यह बारह अक्षरों का पूरा संस्कृत मन्त्र ॐ, नमो, भगवते और वासुदेवाय से बना है। भागवत पुराण ४.८.५३–५४ में नारद ध्रुव से मन्त्र सुनने को कहते हैं और फिर यह सूत्र बताकर पूजा का प्रसंग खोलते हैं। नमो विनम्र नमस्कार है; उसका मूल रूप नमः है। भगवते शब्द भगवत् की चतुर्थी एकवचन है—पूज्य, ऐश्वर्ययुक्त भगवान् ‘को’। वासुदेवाय भी चतुर्थी एकवचन है—‘वासुदेव को’। दोनों सम्बोधन एक ही उपास्य के लिए हैं, दो अलग देवताओं के लिए नहीं। परम्परागत अक्षर-विभाग ॐ | न-मो | भ-ग-व-ते | वा-सु-दे-वा-य है: १ + २ + ४ + ५ = १२। भक्तिभाव में यह मन्त्र नम्रता, स्मरण और ईश्वराश्रय प्रकट कर सकता है; ये व्याख्यात्मक भाव हैं, मूल मन्त्र में जोड़े गए शब्द नहीं। पुराण में विशेष पूजा-विधान और अलौकिक फल-वर्णन भी आते हैं, पर इस शैक्षिक लेख को सबके लिए अनिवार्य विधि, पात्रता-निर्णय, चिकित्सा-लाभ या निश्चित परिणाम का वचन नहीं समझना चाहिए।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-सूचना। सबसे पहले पूरा चुना हुआ मूल संस्कृत मन्त्र, देवनागरी में दिया गया है; यहाँ कोई हिन्दी भावानुवाद मूल के स्थान पर नहीं रखा गया है। स्रोत श्रीमद्भागवत महापुराण ४.८.५४ है। चार पदों की वर्तनी का डिजिटल पाठों में मिलान किया गया है, पर किसी सुनिश्चित ऐतिहासिक संस्कृत मुद्रित प्रति के पन्नों से स्वतंत्र मिलान तथा अधिकार-अनुमोदन अभी शेष हैं। 1 2 3

सम्पूर्ण मूल मन्त्र — देवनागरी

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

हिन्दी अर्थ और व्याख्या

मूल मन्त्र — SG-DEVOTION-ॐ नमो भगवते वासुदेवाय-M001

सरल अर्थ। ॐ—भगवान् वासुदेव (वैष्णव परम्परा में श्रीकृष्ण/विष्णु) को श्रद्धापूर्वक नमस्कार। विस्तृत व्याख्या। यह बारह अक्षरों का पूरा संस्कृत मन्त्र ॐ, नमो, भगवते और वासुदेवाय से बना है। भागवत पुराण ४.८.५३–५४ में नारद ध्रुव से मन्त्र सुनने को कहते हैं और फिर यह सूत्र बताकर पूजा का प्रसंग खोलते हैं। नमो विनम्र नमस्कार है; उसका मूल रूप नमः है। भगवते शब्द भगवत् की चतुर्थी एकवचन है—पूज्य, ऐश्वर्ययुक्त भगवान् ‘को’। वासुदेवाय भी चतुर्थी एकवचन है—‘वासुदेव को’। दोनों सम्बोधन एक ही उपास्य के लिए हैं, दो अलग देवताओं के लिए नहीं। परम्परागत अक्षर-विभाग ॐ | न-मो | भ-ग-व-ते | वा-सु-दे-वा-य है: १ + २ + ४ + ५ = १२। भक्तिभाव में यह मन्त्र नम्रता, स्मरण और ईश्वराश्रय प्रकट कर सकता है; ये व्याख्यात्मक भाव हैं, मूल मन्त्र में जोड़े गए शब्द नहीं। पुराण में विशेष पूजा-विधान और अलौकिक फल-वर्णन भी आते हैं, पर इस शैक्षिक लेख को सबके लिए अनिवार्य विधि, पात्रता-निर्णय, चिकित्सा-लाभ या निश्चित परिणाम का वचन नहीं समझना चाहिए। 1 2 4

चार पदों का शब्दार्थ

ॐ। इस मन्त्र का पहला पूरा उच्चारित अक्षर है। अनेक भारतीय परम्पराओं में इसे प्रणव कहा जाता है। यहाँ यह स्रोत में उपस्थित मूल मन्त्र का हिस्सा है, केवल बाद में लगा सजावटी उच्चारण नहीं। अन्य वैदिक-उपनिषदिक ग्रन्थों में ॐ की विस्तृत व्याख्याएँ हैं; उन सबको इस एक पुराण-पंक्ति का शब्दार्थ मानकर मिलाना उचित नहीं। 1 4

नमो। इसका अर्थ है नमस्कार, प्रणति या श्रद्धाभाव। संस्कृत का मूल रूप नमः है; आगे के शब्द के साथ संधि में नमो बनता है। इसलिए शब्दार्थ में नमः लिखना उपयोगी हो सकता है, पर मन्त्र का प्रमाणित क्रम बदलकर ॐ नमः भगवते… छापना इस पाठ के अनुरूप नहीं होगा। 1 2

भगवते। भगवत् शब्द की चतुर्थी एकवचन—‘भगवान् को’, ‘पूज्य प्रभु को’। वैष्णव धर्मचिन्तन में ‘भगवान्’ दिव्य गुणों के पूर्ण आश्रय के लिए भी प्रयुक्त होता है। वह दार्शनिक विवरण परम्परा-आधारित अर्थ का विस्तार है; शब्द का व्याकरणिक रूप उससे अलग पहचाना जा सकता है। 2 6

वासुदेवाय। वासुदेव नाम की चतुर्थी एकवचन—‘वासुदेव को’। भागवत की वैष्णव कथा में यह श्रीकृष्ण को सम्बोधित करता है, जिनका सम्बन्ध विष्णु से समझाया जाता है। श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव और भगवान् का नाम वासुदेव संस्कृत में अलग स्वर-दीर्घता के साथ लिखा जाता है; सामान्य रोमन वर्तनी इस अन्तर को छिपा सकती है। भगवते तथा वासुदेवाय इस मन्त्र में एक ही आराध्य की ओर संकेत करते हैं, दो अलग देवताओं की ओर नहीं। 1 2

बारह अक्षरों की गणना

द्वादश = बारह; अक्षर = यहाँ उच्चारित वर्णसमूह या ध्वनि-इकाई। विभाजन है: ॐ (१), न-मो (२), भ-ग-व-ते (४), वा-सु-दे-वा-य (५)। योग १२ है। यह संख्या लिखावट के दिखाई देने वाले अक्षरों की नहीं बल्कि संस्कृत ध्वनि-इकाइयों की है। भागवत ६.८.७ में भी प्रणव से आरम्भ होकर ‘य’ पर समाप्त होने वाली द्वादशाक्षर विद्या का उल्लेख है; वहाँ चारों मूल पद ज्यों-के-त्यों फिर नहीं लिखे गए हैं। 1 4

भागवत पुराण में यह मन्त्र कहाँ है? ध्रुव की कथा में देवर्षि नारद शिक्षा देते हैं। स्कन्ध ४, अध्याय ८, श्लोक ५३ में वे एक विशेष जप्य मन्त्र सुनाने की बात कहते हैं। श्लोक ५४ की शुरुआत ॐ नमो भगवते वासुदेवाय से होती है। इसके बाद उसी श्लोक में देश और काल के अनुरूप पूजा-उपचार की बात है। वे बाद वाले वाक्य मन्त्र के अतिरिक्त अक्षर नहीं हैं। इसलिए यहाँ चुना हुआ मन्त्र पूरा है, किन्तु इसे समूचे श्लोक ५४ या अध्याय का पूरा उद्धरण बताना गलत होगा। 1 2 5

स्कन्ध ६, अध्याय ८, श्लोक ७ में नारायण कवच के साथ द्वादशाक्षरी का वर्णन आता है। यह दूसरी पाठ-संदर्भ-स्थिति है और उसमें न्यास-विधि का प्रसंग है। उस प्रसंग को बिना विशेषज्ञ अनुमोदन के साधना के निर्देश के रूप में यहाँ जोड़ना उचित नहीं। 4

वैष्णव परम्परा में वासुदेव की उपासना

भागवत के इस प्रसंग में वासुदेव व्यक्तिगत भक्ति का केन्द्र हैं। 'भगवते' के सम्मान और 'वासुदेवाय' की आत्मीयता से भक्त को कृष्ण-स्मरण, कृतज्ञता तथा शरणागति का भाव मिल सकता है। वैष्णव सम्प्रदायों में इन भावों की व्याख्या एक जैसी नहीं है। शिवगोरक्ष पर ऐसी बातें पाठ-विशिष्ट वैष्णव दृष्टिकोण बताकर रखी गई हैं; उनसे अन्य शैव, शाक्त या दार्शनिक परम्पराओं की मान्यताओं को मिटाया नहीं जा रहा। 1 6

मन्त्र में कोई भौतिक इच्छा, व्यापार की शर्त या निश्चित फल माँगने वाला वाक्य नहीं है। इसे अनेक भक्त अपने भीतर नम्रता और श्रद्धा जगाने वाला संबोधन मान सकते हैं। यह स्वतन्त्र सम्पादकीय भाव-व्याख्या है, मूल में छिपा अतिरिक्त पद नहीं।

पढ़ना, समझना और औपचारिक साधना अलग हैं

भागवत-कथा में नारद गुरु के रूप में दिखाई देते हैं। आधुनिक वैष्णव परम्पराओं में दीक्षा, मन्त्र-उपदेश और सार्वजनिक नाम-स्मरण की पद्धतियों में भिन्नता मिलती है। एक गौड़ीय सम्प्रदाय-सम्बद्ध टीका गुरु-मार्गदर्शन को विशेष स्थान देती है, पर उसी से सभी परम्पराओं के लिए अनिवार्य पात्रता-नियम बनाना उचित नहीं। यह लेख मन्त्र पढ़ने और उसका अर्थ समझने के लिए है; जप-संख्या, विशेष समय, न्यास, उपासना-सामग्री, श्वास-नियन्त्रण या दीक्षा का निर्देश नहीं देता। 2 4 6

पुराणों में आने वाले दिव्य फल और अलौकिक घटनाएँ श्रद्धा-सम्बन्धी कथन हैं। उनका उल्लेख किसी बीमारी के उपचार, धन की निश्चित प्राप्ति अथवा सामान्य जीवन की घटनाओं पर प्रमाणित चमत्कारिक असर के वैज्ञानिक वादे की तरह नहीं किया गया है।

पाठभेद और सम्पादकीय सीमाएँ

  1. ॐ / ओं; विराम-चिह्न। डिजिटल पाठों में लिपि एवं विराम-चिह्न अलग हो सकते हैं। यहाँ मन्त्र की पाठक-सुविधा के लिए अन्त में ॥ जोड़ा गया है; यह उच्चारित तेरहवाँ अक्षर नहीं और न किसी विशेष पाण्डुलिपि का दावा है। 1 2 3
  2. नमो / नमः। नमः शब्दकोशीय मूल है, लेकिन मन्त्र का चुना हुआ रूप नमो है। दोनों को बिना प्रमाण ऐतिहासिक पाण्डुलिपि-भेद नहीं कहना चाहिए। 1 2
  3. भगवते / भगवत्। चतुर्थी रूप को मूल प्रातिपदिक से नहीं बदलना चाहिए। 2
  4. वासुदेव / वसुदेव। दीर्घ और ह्रस्व 'आ/अ' का भेद पहचानना आवश्यक है; साधारण अंग्रेज़ी वर्तनी से मूल संस्कृत निश्चित नहीं होती। 1
  5. अष्टाक्षरी और द्वादशाक्षरी। ॐ नमो नारायणाय आठ अक्षर वाला अलग मन्त्र है (SG-DEVOTION-ॐ नमो नारायणाय); उसे इसमें मिलाना पाठ-संशोधन की भूल होगी। 4
  6. मुद्रित स्रोत का प्रश्न। कई डिजिटल पृष्ठ एक ही पाठ दिखाते हैं, पर इससे उनका स्वतन्त्र पाण्डुलिपि-साक्ष्य सिद्ध नहीं हो जाता। इस कार्य के लिए कोई निश्चित ऐतिहासिक मुद्रित संस्कृत पृष्ठ अभी प्रत्यक्ष नहीं मिलाया गया है। इसलिए स्रोत-जाँच और अधिकार-स्थिति को आंशिक ही रखा गया है। 1 3 5

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह पूरा मूल मन्त्र है? हाँ, चुना हुआ चार पदों का मन्त्र पूरा है। भागवत ४.८.५४ के आगे के कथन या ध्रुव की समूची कथा इसमें मन्त्र की तरह सम्मिलित नहीं हैं। 1

सरल शब्दार्थ क्या है? “ॐ—भगवान् वासुदेव को सादर नमस्कार।” 2

द्वादशाक्षरी क्यों कहते हैं? क्योंकि इसकी ध्वनि-इकाइयाँ १ + २ + ४ + ५ = १२ हैं। 4

वासुदेव श्रीकृष्ण हैं या विष्णु? वैष्णव परम्पराओं में यह नाम श्रीकृष्ण से सम्बद्ध है और विष्णु की सत्ता से भी जोड़ा जाता है; विवेचन मतानुसार अलग हो सकता है। 6

क्या यही नारायण अष्टाक्षरी है? नहीं। वह आठ-अक्षरी ॐ नमो नारायणाय है, जिसके लिए अलग SG-DEVOTION-ॐ नमो नारायणाय उपलब्ध है। क्या दीक्षा के बिना इस मन्त्र को पढ़ना निषिद्ध है? औपचारिक साधना के विषय में गुरु-सम्प्रदायों के नियम अलग हैं। यह सार्वजनिक शैक्षिक पाठ किसी एक मत का सार्वभौमिक निषेध या अनुमति घोषित नहीं करता। 6

क्या यहाँ किसी निश्चित जप-संख्या का निर्देश है? नहीं। यह लेख किसी विशेष साधना-विधि को संचालन हेतु स्वीकृत नहीं करता। 1 4

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Traditional anonymous Purāṇic work; volunteer Sanskrit Wikisource text. Based on Śrīmad-Bhāgavata Mahāpurāṇa, Canto 4, Chapter 8 — Sanskrit Wikisource. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    oṃ namo bhagavate vāsudevāya ||

स्रोत और प्रकाशन-स्थिति

1 संस्कृत विकिस्रोत, भागवत ४.८.५३–५४; 2 भक्तिवेदान्त पुस्तक न्यास का संस्कृत प्रदर्शन; 3 विज़डम लाइब्रेरी का पाठ; 4 भागवत ६.८.७; 5 गीताप्रेस-संबद्ध डिजिटल प्रदर्शन; 6 आधुनिक गौड़ीय परम्परा की टीका; 7 दूसरे विकिस्रोत पृष्ठ का रूप। सभी URL तथा अधिकार-संबन्धी सावधानियाँ स्रोत-सूची में दी गई हैं। हिन्दी अनुवाद और टिप्पणी मौलिक रूप से लिखी गई है।

  1. Śrīmad-Bhāgavata Mahāpurāṇa, Canto 4, Chapter 8 — Sanskrit Wikisource · स्रोत खोलें
  2. Śrīmad-Bhāgavatam 4.8.54 (Sanskrit and IAST display) · स्रोत खोलें
  3. Śrīmad Bhāgavata Purāṇa (Sanskrit) 4.8.54 · स्रोत खोलें
  4. Śrīmad-Bhāgavata 6.8.7 (Nārāyaṇa Kavaca context) · स्रोत खोलें
  5. Śrīmad-Bhāgavata 4.8.54 in Gita Press-associated digital presentation · स्रोत खोलें
  6. Śrīmad-Bhāgavata 4.8.54 — publisher commentary on Dvādaśākṣara and initiation · स्रोत खोलें
  7. Śrīmad-Bhāgavatam 4.8.54 — independent Sanskrit verse locator · स्रोत खोलें