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स्तोत्र

आदित्यहृदयम्: सम्पूर्ण ३१ श्लोक और सरल हिंदी अर्थ

रणभूमि में थके राम को अगस्त्य सूर्य-स्तुति सुनाते हैं; कथा में प्रकाश, साहस और मन की दृढ़ता जुड़े हैं।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥१॥

अर्थ

युद्ध से थके राम विचारमग्न खड़े हैं और रावण सामने युद्ध के लिए तैयार है।

व्याख्या

आरम्भ में नायक की थकान भी दिखाई गई है। युद्ध की कठोर परिस्थिति में चिंतन और साहस, दोनों की आवश्यकता सामने आती है। यही आगे मिलने वाले उपदेश की पृष्ठभूमि है।

2

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः ॥२॥

अर्थ

देवताओं के साथ युद्ध देखने आए आदरणीय अगस्त्य ऋषि राम के निकट जाकर उनसे बोलते हैं।

व्याख्या

अगस्त्य यहाँ योद्धा नहीं, मार्गदर्शक हैं। देवताओं की उपस्थिति महाकाव्य की धार्मिक कथा का अंग है; इसे आधुनिक इतिहास का प्रत्यक्ष विवरण नहीं समझना चाहिए।

3

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् । येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥३॥

अर्थ

अगस्त्य महाबाहु राम को संबोधित करके सनातन गुह्य उपदेश सुनने को कहते हैं, जिससे वे युद्ध में शत्रुओं पर विजय पाएँगे।

व्याख्या

'वत्स' संबोधन में गुरु का स्नेह है। 'गुह्य' का अर्थ मूल्यवान अथवा गूढ़ शिक्षा हो सकता है; इससे पाठक के लिए कोई गुप्त दीक्षा-विधि अपने-आप सिद्ध नहीं होती।

4

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम् ॥४॥

अर्थ

अगस्त्य आदित्यहृदय को पुण्यकारी, विजयदायक, शत्रुनाशक, अक्षय और अत्यंत कल्याणकारी कहकर उसके नियमित स्मरण की प्रशंसा करते हैं।

व्याख्या

ये फलवचन कथा में अगस्त्य के हैं। भक्त 'शत्रु' शब्द से भीतर की बाधाओं को भी याद कर सकता है, पर यह व्याख्यात्मक विस्तार है, मूल युद्ध-प्रसंग का प्रतिस्थापन नहीं।

5

सर्वमङ्गलमङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥५॥

अर्थ

इस स्तुति को परम मंगलकारी, पाप व शोक दूर करने वाली, चिंता शांत करने वाली और आयु बढ़ाने वाली कहा गया है।

व्याख्या

यह धार्मिक आशीर्वाद की भाषा है, चिकित्सा-परिणाम का प्रमाण नहीं। 'मङ्गल्यं' के स्थान पर 'माङ्गल्यं' भी मिलता है; पाठभेद को अलग दर्ज किया गया है।

6

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥६॥

अर्थ

राम से उदित, किरणों वाले विवस्वान भास्कर की वंदना करने को कहा जाता है, जिन्हें देव और असुर दोनों नमस्कार करते हैं।

व्याख्या

यहाँ संघर्ष से दृष्टि हटकर व्यापक प्रकाश पर जाती है। 'देवासुरनमस्कृतम्' में विरोधी समुदायों द्वारा भी मान्य प्रकाश की छवि है।

7

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः । एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥७॥

अर्थ

तेजस्वी सूर्य को सर्वदेवस्वरूप तथा अपनी किरणों से देव, असुर और लोकों का पालन करने वाला कहा गया है।

व्याख्या

'सर्वदेवात्मक' एक व्यापक धार्मिक दृष्टि है। इससे आगे आने वाले अलग-अलग देवताओं की कथाएँ और उपासना-पद्धतियाँ स्वतः एक जैसी नहीं हो जातीं।

8

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः । महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥८॥

अर्थ

सूर्य में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, धनद कुबेर, काल, यम, सोम और जलाधिपति के रूपों की स्तुति की जाती है।

व्याख्या

यह श्लोक विभिन्न देवताओं के ब्रह्माण्डीय कार्यों को सूर्य की स्तुति में समेटता है। इसे सभी परम्पराओं पर एक मत थोपने की आवश्यकता नहीं है।

9

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः । वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥९॥

अर्थ

उन्हें पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुत, मनु, वायु, अग्नि, प्रजाओं के प्राण, ऋतुकर्ता और प्रभाकर रूप में याद किया गया है।

व्याख्या

नामों में पूर्वज, प्रकृति और जीव-जगत एक साथ आते हैं। 'ऋतुकर्ता' से मौसमों की नियमितता का अनुभव भी जुड़ता है।

10
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आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥१०॥

अर्थ

वे आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान्, स्वर्ण जैसे भानु, हिरण्यरेता और दिवाकर हैं।

व्याख्या

हर नाम अलग गुण सामने रखता है—गति, पोषण, तेज और सृजन। 'हिरण्यरेता' का पाठ कुछ प्रचलित 'विश्वरेता' पाठों से अलग है।

11

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्ड अंशुमान् ॥११॥

अर्थ

अश्वों, असंख्य किरणों और अंधकार नाश करने की शक्ति से युक्त सूर्य को शम्भु, त्वष्टा, मार्तण्ड और अंशुमान् कहा गया है।

व्याख्या

सात अश्व सूर्य-गति की पारंपरिक छवि हैं। 'मार्तण्ड अंशुमान्' के आसपास मुद्रित शब्द-विभाजन की स्वतंत्र संस्कृत-जाँच आवश्यक है।

12

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः । अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥१२॥

अर्थ

वे हिरण्यगर्भ, शिशिर, तपन, भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदिति-पुत्र, शङ्ख और शीत-नाशक हैं।

व्याख्या

'शिशिर' और 'तपन' के विपरीत भाव स्तुति को व्यापक बनाते हैं। सूर्य के लिए 'शङ्ख' दुर्लभ पद है; उसका विशिष्ट अर्थ टीकाओं की सहायता से देखना चाहिए।

13

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथी प्लवङ्गमः ॥१३॥

अर्थ

उन्हें आकाशनाथ, तम-भेदी, ऋक्-यजुः-साम के पारगामी, वर्षादाता, जलमित्र और विन्ध्य-मार्ग में चलने वाला कहा गया है।

व्याख्या

यहाँ वैदिक ज्ञान, वर्षा और आकाशीय मार्ग साथ रखे गए हैं। विन्ध्य-वीथी पुरानी भौगोलिक-खगोलीय कल्पना है; इससे आधुनिक गणना निकालना उचित नहीं।

14

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः । कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥१४॥

अर्थ

वे आतपी, मण्डली, मृत्यु, पिङ्गल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजा, रक्तवर्ण तथा सभी प्राणियों के उद्गम हैं।

व्याख्या

'मृत्यु' जैसे कठोर शब्द के साथ सृजन भी आता है; परिवर्तन और समाप्ति जीवन के चक्र में जुड़े दिखते हैं। 'कवि' का भाव यहाँ ऋषितुल्य द्रष्टा भी है।

15

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥१५॥

अर्थ

नक्षत्र-ग्रह-ताराओं के अधिपति, जगत के पोषक, तेजस्वियों में तेजस्वी और द्वादश रूपों वाले सूर्य को नमस्कार है।

व्याख्या

'द्वादशात्मन्' को बारह आदित्यों अथवा वर्ष के बारह भागों से जोड़ा जाता है। यह धार्मिक ब्रह्माण्ड-दृष्टि है, आधुनिक खगोल-विज्ञान की सूची नहीं।

16

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमे गिरये नमः । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥१६॥

अर्थ

पूर्व और पश्चिम के पर्वत-रूपकों से संबद्ध सूर्य, ज्योतिसमूहों के स्वामी और दिन के अधिपति को प्रणाम है।

व्याख्या

उदय-अस्त को पूर्व-पश्चिम के पर्वतों से व्यक्त किया गया है। मुद्रित 'पश्चिमे गिरये' के स्थान पर 'पश्चिमायाद्रये' भी मिलता है; यह पाठभेद खुला रखा गया है।

17

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः । नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥१७॥

अर्थ

विजय और मंगल के दाता, हरित अश्वों वाले तथा सहस्रकिरण आदित्य को बार-बार नमस्कार है।

व्याख्या

'नमो नमः' से आवर्तन का लयात्मक सौन्दर्य आता है। इसे परिणाम की निश्चित संख्या-आधारित गारंटी नहीं समझना चाहिए।

18

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः । नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥१८॥

अर्थ

उग्र, वीर, सारङ्ग नाम से स्तुत तथा कमलों को खिलाने वाले मार्ताण्ड सूर्य को नमस्कार है।

व्याख्या

उग्र विशेषणों के बीच कमल-जागरण की कोमल छवि आती है। 'सारङ्ग' बहुअर्थी पद है; सूर्य-संदर्भ का अर्थ बताना चाहिए, पर उसे निर्विवाद न मानें।

19

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥१९॥

अर्थ

ब्रह्मा, ईशान और अच्युत के अधिपति, तेजस्वी सूर्य तथा रौद्र, सर्वभक्षी रूप वाले को नमस्कार है।

व्याख्या

सूर्य का तेज पोषक और प्रचंड दोनों रूपों में प्रकट होता है। यह स्तुति का सार्वभौमत्व-बोध है, दूसरे देवताओं की अलग परम्पराओं का निषेध नहीं।

20
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तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥२०॥

अर्थ

अंधकार, हिम, शत्रुता और कृतघ्नता के नाशक, अमित स्वरूप तथा ज्योतियों के स्वामी को प्रणाम है।

व्याख्या

लगातार 'घ्न' शब्द तीव्र निवारण का भाव लाते हैं। नैतिक अर्थ में अज्ञान या कृतघ्नता से मुक्ति समझी जा सकती है; किसी व्यक्ति के प्रति हिंसा का निर्देश नहीं।

21

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥२१॥

अर्थ

तप्त सोने जैसे तेज वाले, अग्निस्वरूप, विश्वकर्मा, अंधकार-भंजक और लोकसाक्षी सूर्य को प्रणाम है।

व्याख्या

'लोकसाक्षी' प्रकाश और जिम्मेदारी को जोड़ता है। काव्य-चित्र में ऐसा तेज है जिसके सामने कर्म छिपते नहीं।

22

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥२२॥

अर्थ

उन्हें प्राणियों का संहार और पुनः सृजन करने वाला कहा गया है; किरणों द्वारा वे सुखाते, तपाते और वर्षा कराते हैं।

व्याख्या

यहाँ जीवनचक्र, ताप और वर्षा की अनुभूति जुड़ती है। इसे प्रत्येक वर्षा की आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

23

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः । एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥२३॥

अर्थ

प्राणियों में स्थित सूर्य उनके सोने पर भी जागता है; उसे अग्निहोत्र और उसके फल का स्वरूप कहा गया है।

व्याख्या

जागरण-निद्रा का विरोध विश्व की निरंतरता का ध्यान दिलाता है। अग्निहोत्र का उल्लेख पाठ में है; इससे बिना समीक्षा की अग्नि-विधि नहीं बनाई जाती।

24

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥२४॥

अर्थ

वेद, यज्ञ, उनके फल तथा संसार के कर्तव्यों को प्रभु रवि के व्यापक स्वरूप में देखा गया है।

व्याख्या

ज्ञान, कर्म और कर्मफल को एक व्यापक दृष्टि में रखा गया है। यज्ञ का नाम आने से यह श्लोक विधिपुस्तिका नहीं बन जाता।

25

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥२५॥

अर्थ

अगस्त्य राघव से कहते हैं कि संकट, कठिनाई, वन और भय में सूर्य का कीर्तन करने वाला निराशा में नहीं डूबता।

व्याख्या

यह भक्ति में दिया गया आश्वासन है; वास्तविक संकट अपने-आप समाप्त होने का प्रमाण नहीं। सुरक्षा, उपचार और विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक बने रहते हैं।

26

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् । एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥२६॥

अर्थ

अगस्त्य राम को एकाग्र मन से जगत्पति का पूजन करने और तीन बार पाठ के बाद विजय पाने का आश्वासन देते हैं।

व्याख्या

तीन बार पाठ की बात युद्ध-प्रसंग में अगस्त्य का कथन है। यहाँ उसका सन्दर्भ बताया जाता है, परिणाम की निश्चित गारंटी या विस्तृत कर्मकाण्ड नहीं दिया जाता।

27

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि । एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥२७॥

अर्थ

अगस्त्य कहते हैं कि राम इसी समय रावण का वध करेंगे, और फिर अपने आगमन की तरह लौट जाते हैं।

व्याख्या

युद्ध दोबारा शुरू होने से पहले गुरु का उपदेश पूरा होता है। इसके बाद वक्ता का सीधा उपदेश समाप्त होकर कथा का वर्णन लौटता है।

28

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा । धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥२८॥

अर्थ

उपदेश सुनकर राघव का शोक दूर होता है; वे प्रसन्न और संयत होकर उसे मन में धारण करते हैं।

व्याख्या

बाहरी युद्ध-कर्म से पहले राम की मनःस्थिति बदलती है। स्तोत्र का सहज मानवीय पक्ष यही है कि एकाग्रता से संकल्प को बल मिल सकता है।

29

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥२९॥

अर्थ

आदित्य की ओर ध्यान करके पाठ के बाद राम को हर्ष मिलता है; वे तीन बार आचमन कर धनुष उठा लेते हैं।

व्याख्या

ये राम के कार्यों का कथात्मक वर्णन हैं, पाठक को सीधे सूर्य की ओर देखने का निर्देश नहीं। सूर्य को नंगी आँख से घूरना हानिकारक हो सकता है।

30
विषय-सूची पर लौटें

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् । सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥३०॥

अर्थ

राम रावण को देखकर प्रसन्न एवं दृढ़चित्त होकर युद्ध की ओर बढ़ते हैं और उसे पराजित करने का संकल्प करते हैं।

व्याख्या

'सर्वयत्न' का अर्थ पूरा प्रयत्न है। कथा केवल उच्चारण नहीं, श्रद्धा के साथ नवीनीकृत आत्मबल और कर्मठता भी दिखाती है।

31

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः । निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१॥

अर्थ

देवताओं के मध्य सूर्य राम को देखकर प्रसन्न होते हैं और निशाचरराज के अंत को निकट जानकर शीघ्र बढ़ने को कहते हैं।

व्याख्या

अन्तिम श्लोक आरम्भ में उपस्थित देवसमुदाय की ओर लौटता है। इस तरह पूरे इकतीस-श्लोक प्रसंग का कथात्मक चक्र पूरा होता है।

32
विषय-सूची पर लौटें

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे सप्तोत्तरशततमः सर्गः ॥१०७॥

अर्थ

यह कोलोफन इस संस्करण में वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड का एक सौ सातवाँ सर्ग समाप्त होने की सूचना देता है।

व्याख्या

यह संस्करण का समापन-सूत्र है, आदित्यहृदय का बत्तीसवाँ श्लोक नहीं। दूसरे संस्करणों में यही प्रसंग सर्ग १०५ के रूप में मिलता है।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-सूचना: गोविन्दराज-टीका सहित रामायण के सर्ग १०७ पर आधारित, तीसरे पक्ष के मुद्रित-पाठ-आश्रित डिजिटल प्रतिलेखन के अनुसार ३१ श्लोक व पृथक् सर्गान्त। पुरानी प्रति की छवियों से स्वतंत्र मिलान अभी नहीं हुआ है। 1 2

प्रसंग, पाठ-सीमा और महत्व

यह स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड का कथा-प्रसंग है। रावण के सामने युद्ध से थके राम को अगस्त्य ऋषि सूर्य की महिमा बताते हैं। श्लोक १–२ युद्धभूमि की स्थिति बताते हैं; ३–२७ में ऋषि का उपदेश, सूर्यनाम और स्तुति है; २८–३१ में राम के मनोभाव तथा युद्ध की पुनः तैयारी दिखाई देती है। इस प्रकार केवल देवता-नामों का संग्रह नहीं, एक सम्पूर्ण कथात्मक अनुभव हमारे सामने आता है। 1 3

'आदित्य' अदिति-पुत्र सूर्य को कहता है, और 'हृदय' स्तोत्र के मुख्य सार या आंतरिक केन्द्र का भाव देता है। श्लोक ७–९ में सूर्य को अनेक देवताओं के स्वरूप के रूप में देखा गया है; यह पाठ की स्तुतिपरक धार्मिक दृष्टि है। श्लोक २५–२६ के आश्वासन कथा में अगस्त्य द्वारा राम को दिए गए हैं। बीमारी, मानसिक तनाव या खतरे से निश्चित मुक्ति का वैज्ञानिक प्रमाण इनमें नहीं दिया गया है। पाठभेद: चुने हुए संस्करण में सर्ग संख्या १०७ है, लेकिन कुछ संस्करणों में यही प्रसंग १०५ है। पाँचवें श्लोक के मङ्गल्यं/माङ्गल्यं, ग्यारहवें के मार्तण्ड, सोलहवें के पश्चिमे गिरये/पश्चिमायाद्रये, तथा तीसरे पक्ष द्वारा दर्ज अन्य भेद स्रोत-सूची में सुरक्षित हैं। मूल पाठ में इनको जोड़कर मिश्रित संस्करण नहीं बनाया गया। 1 3 4

सुरक्षा और साहित्यिक भेद: २९वें श्लोक में राम का सूर्य की ओर देखना कथा है, पाठकों के लिए सूर्य को नंगी आँख से घूरने का निर्देश नहीं। आचमन और त्रिवार पाठ का उल्लेख भी प्रसंग के रूप में रखा गया है; यहाँ कोई अलग अनुष्ठान-विधि नहीं बनाई गई है।

श्लोकानुसार हिंदी भावार्थ और व्याख्या

नीचे अर्थ हर मूल श्लोक से संबद्ध है; यह प्राचीन टीका का शब्दशः अनुवाद नहीं, स्वतंत्र समझाने वाला लेखन है।

सर्गान्त और इसकी भूमिका

सरल अर्थ: यह कोलोफन इस संस्करण में वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड का एक सौ सातवाँ सर्ग समाप्त होने की सूचना देता है। व्याख्या: यह संस्करण का समापन-सूत्र है, आदित्यहृदय का बत्तीसवाँ श्लोक नहीं। दूसरे संस्करणों में यही प्रसंग सर्ग १०५ के रूप में मिलता है।

पाठ की प्रमुख विशेषताएँ

प्रकाश और विवेक: सूर्य की किरणें अंधकार मिटाने का स्वाभाविक बिम्ब बनती हैं; काव्य में इससे दिशा और समझ की भावना जुड़ती है। समय और परिवर्तन: ऋतु, मृत्यु, वर्षा और पुनर्सृजन जैसे नाम समय के बड़े चक्र की ओर इशारा करते हैं। उपासना और कर्म: अन्त में राम केवल आनंदित नहीं होते—धनुष लेकर पूर्ण यत्न से आगे भी बढ़ते हैं। स्रोत और सम्पादकीय सावधानी: प्राचीन संस्कृत शब्दों का सम्पूर्ण चयनित डिजिटल पाठ प्रस्तुत है, पर निर्दिष्ट मुद्रित स्रोत के समस्त पृष्ठों से स्वतंत्र जाँच अभी बाकी है। वर्तमान IAST लिप्यंतरण यांत्रिक और मूल हिन्दी/अंग्रेज़ी विवेचन स्वतंत्र लेखन है; दोनों पर पारंगत सम्पादक की अंतिम स्वीकृति आवश्यक है। इसके लिए किसी तीसरे पक्ष की आधुनिक व्याख्या को अपना नहीं बताया गया है। 1 2

सामान्य प्रश्न

क्या आदित्यहृदयम् केवल सूर्य के नाम हैं? नहीं। इसमें राम की स्थिति, अगस्त्य का उपदेश, नाम-स्तुति और पुनः युद्ध के लिए तैयारी, सभी हैं। कितने श्लोक हैं? चुने हुए अध्याय में ३१ मुख्य श्लोक हैं और उनके बाद एक पृथक् सर्गान्त है। सर्ग १०५ या १०७? संस्करण के अनुसार दोनों संख्याएँ मिलती हैं। यहाँ सर्ग १०७ के आधार का पाठ चुना गया है। क्या पाठ करने से युद्ध या रोग में निश्चित विजय मिलती है? यह कथात्मक-धार्मिक आश्वासन है; इसे निश्चित जीवन-परिणाम अथवा चिकित्सा के विकल्प की तरह नहीं मानना चाहिए। क्या सूर्य को सीधे देखना आवश्यक है? नहीं; कथा में वर्णित देखने को आधुनिक सुरक्षित आचरण का निर्देश नहीं बनाया गया है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Ancient Valmiki Ramayana hymn, selected Govindaraja/Yuddha sarga107 reading:31 verses and colophon. Independent comparison: Sanskrit Wikisource contributors, Adityahridayam, revision192642, CC BY-SA4.0; supplied sandhi/orthographic variants and edition-specific colophon retained. Historical corroboration: T. R. Krishnacharya, Yuddhakanda,1913. Original manuscript wording and unit sequence retained. Roman rendering, meanings and explanations: ShivGoraksh. No source recording, scan image or modern third-party explanation is reproduced. Independent textual certification remains incomplete.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    tato yuddhapariśrāntaṃ samare cintayā sthitam | rāvaṇaṃ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam ||1||

  2. 2

    daivataiśca samāgamya draṣṭumabhyāgato raṇam | upāgamyābravīdrāmamagastyo bhagavān ṛṣiḥ ||2||

  3. 3

    rāma rāma mahābāho śṛṇu guhyaṃ sanātanam | yena sarvānarīn vatsa samare vijayiṣyasi ||3||

  4. 4

    ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam | jayāvahaṃ japennityamakṣayyaṃ paramaṃ śivam ||4||

  5. 5

    sarvamaṅgalamaṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam | cintāśokapraśamanamāyurvardhanamuttamam ||5||

  6. 6

    raśmimantaṃ samudyantaṃ devāsuranamaskṛtam | pūjayasva vivasvantaṃ bhāskaraṃ bhuvaneśvaram ||6||

  7. 7

    sarvadevātmako hyeṣa tejasvī raśmibhāvanaḥ | eṣa devāsuragaṇām̐llokān pāti gabhastibhiḥ ||7||

  8. 8

    eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ | mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hyapāṃ patiḥ ||8||

  9. 9

    pitaro vasavaḥ sādhyā hyaśvinau maruto manuḥ | vāyurvahniḥ prajāprāṇa ṛtukartā prabhākaraḥ ||9||

  10. 10

    ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān | suvarṇasadṛśo bhānurhiraṇyaretā divākaraḥ ||10||

  11. 11

    haridaśvaḥ sahasrārciḥ saptasaptirmarīcimān | timironmathanaḥ śambhustvaṣṭā mārtaṇḍa aṃśumān ||11||

  12. 12

    hiraṇyagarbhaḥ śiśirastapano bhāskaro raviḥ | agnigarbho'diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśiranāśanaḥ ||12||

  13. 13

    vyomanāthastamobhedī ṛgyajuḥsāmapāragaḥ | ghanavṛṣṭirapāṃ mitro vindhyavīthī plavaṅgamaḥ ||13||

  14. 14

    ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarvatāpanaḥ | kavirviśvo mahātejā raktaḥ sarvabhavodbhavaḥ ||14||

  15. 15

    nakṣatragrahatārāṇāmadhipo viśvabhāvanaḥ | tejasāmapi tejasvī dvādaśātmannamo'stu te ||15||

  16. 16

    namaḥ pūrvāya giraye paścime giraye namaḥ | jyotirgaṇānāṃ pataye dinādhipataye namaḥ ||16||

  17. 17

    jayāya jayabhadrāya haryaśvāya namo namaḥ | namo namaḥ sahasrāṃśo ādityāya namo namaḥ ||17||

  18. 18

    nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ | namaḥ padmaprabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ ||18||

  19. 19

    brahmeśānācyuteśāya sūryāyādityavarcase | bhāsvate sarvabhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ ||19||

  20. 20

    tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane | kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṃ pataye namaḥ ||20||

  21. 21

    taptacāmīkarābhāya vahnaye viśvakarmaṇe | namastamo'bhinighnāya rucaye lokasākṣiṇe ||21||

  22. 22

    nāśayatyeṣa vai bhūtaṃ tadeva sṛjati prabhuḥ | pāyatyeṣa tapatyeṣa varṣatyeṣa gabhastibhiḥ ||22||

  23. 23

    eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ | eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām ||23||

  24. 24

    vedāśca kratavaścaiva kratūnāṃ phalameva ca | yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ ||24||

  25. 25

    enamāpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca | kīrtayan puruṣaḥ kaścinnāvasīdati rāghava ||25||

  26. 26

    pūjayasvainamekāgro devadevaṃ jagatpatim | etat triguṇitaṃ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi ||26||

  27. 27

    asmin kṣaṇe mahābāho rāvaṇaṃ tvaṃ vadhiṣyasi | evamuktvā tadā'gastyo jagāma ca yathāgatam ||27||

  28. 28

    etacchrutvā mahātejā naṣṭaśoko'bhavattadā | dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān ||28||

  29. 29

    ādityaṃ prekṣya japtvā tu paraṃ harṣamavāptavān | trirācamya śucirbhūtvā dhanurādāya vīryavān ||29||

  30. 30

    rāvaṇaṃ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat | sarvayatnena mahatā vadhe tasya dhṛto'bhavat ||30||

  31. 31

    atha raviravadannirīkṣya rāmaṃ muditamanāḥ paramaṃ prahṛṣyamāṇaḥ | niśicarapatisaṃkṣayaṃ viditvā suragaṇamadhyagato vacastvareti ||31||

  32. 32

    ityārṣe śrīmadrāmāyaṇe vālmīkīye ādikāvye yuddhakāṇḍe saptottaraśatatamaḥ sargaḥ ||107||

स्रोत-संकेत

  • 1 गोविन्दराज-मुद्रित पाठ पर आधारित आधुनिक शोधित डिजिटल प्रस्तुति; सभी ३१ श्लोक और पाठभेद: https://www.valkala.com/aditya-hridaya-stotra
  • 2 गोविन्दराज-टीका सहित युद्धकाण्ड की ऐतिहासिक स्कैन-कॉपी (मूल छवियाँ स्वतंत्र रूप से नहीं मिलाई गईं): https://commons.wikimedia.org/w/index.php?oldid=189384421&title=File:%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D-%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1%E0%A4%AE%E0%A5%8D.djvu
  • 3 युद्धकाण्ड सर्ग १०५ की अलग डिजिटल पाठ-परम्परा: https://sanskritdocuments.org/sites/valmikiramayan/yuddha/sarga105/yuddhasans105.htm
  • 4 पाठान्तर हेतु स्तोत्रसंहिता: https://stotrasamhita.github.io/stotra/navagraha/aditya-hrdayam/
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1

सरल अर्थ: युद्ध से थके राम विचारमग्न खड़े हैं और रावण सामने युद्ध के लिए तैयार है। व्याख्या: आरम्भ में नायक की थकान भी दिखाई गई है। युद्ध की कठोर परिस्थिति में चिंतन और साहस, दोनों की आवश्यकता सामने आती है। यही आगे मिलने वाले उपदेश की पृष्ठभूमि है।

श्लोक 2

सरल अर्थ: देवताओं के साथ युद्ध देखने आए आदरणीय अगस्त्य ऋषि राम के निकट जाकर उनसे बोलते हैं। व्याख्या: अगस्त्य यहाँ योद्धा नहीं, मार्गदर्शक हैं। देवताओं की उपस्थिति महाकाव्य की धार्मिक कथा का अंग है; इसे आधुनिक इतिहास का प्रत्यक्ष विवरण नहीं समझना चाहिए।

श्लोक 3

सरल अर्थ: अगस्त्य महाबाहु राम को संबोधित करके सनातन गुह्य उपदेश सुनने को कहते हैं, जिससे वे युद्ध में शत्रुओं पर विजय पाएँगे। व्याख्या: 'वत्स' संबोधन में गुरु का स्नेह है। 'गुह्य' का अर्थ मूल्यवान अथवा गूढ़ शिक्षा हो सकता है; इससे पाठक के लिए कोई गुप्त दीक्षा-विधि अपने-आप सिद्ध नहीं होती।

श्लोक 4

सरल अर्थ: अगस्त्य आदित्यहृदय को पुण्यकारी, विजयदायक, शत्रुनाशक, अक्षय और अत्यंत कल्याणकारी कहकर उसके नियमित स्मरण की प्रशंसा करते हैं। व्याख्या: ये फलवचन कथा में अगस्त्य के हैं। भक्त 'शत्रु' शब्द से भीतर की बाधाओं को भी याद कर सकता है, पर यह व्याख्यात्मक विस्तार है, मूल युद्ध-प्रसंग का प्रतिस्थापन नहीं।

श्लोक 5

सरल अर्थ: इस स्तुति को परम मंगलकारी, पाप व शोक दूर करने वाली, चिंता शांत करने वाली और आयु बढ़ाने वाली कहा गया है। व्याख्या: यह धार्मिक आशीर्वाद की भाषा है, चिकित्सा-परिणाम का प्रमाण नहीं। 'मङ्गल्यं' के स्थान पर 'माङ्गल्यं' भी मिलता है; पाठभेद को अलग दर्ज किया गया है।

श्लोक 6

सरल अर्थ: राम से उदित, किरणों वाले विवस्वान भास्कर की वंदना करने को कहा जाता है, जिन्हें देव और असुर दोनों नमस्कार करते हैं। व्याख्या: यहाँ संघर्ष से दृष्टि हटकर व्यापक प्रकाश पर जाती है। 'देवासुरनमस्कृतम्' में विरोधी समुदायों द्वारा भी मान्य प्रकाश की छवि है।

श्लोक 7

सरल अर्थ: तेजस्वी सूर्य को सर्वदेवस्वरूप तथा अपनी किरणों से देव, असुर और लोकों का पालन करने वाला कहा गया है। व्याख्या: 'सर्वदेवात्मक' एक व्यापक धार्मिक दृष्टि है। इससे आगे आने वाले अलग-अलग देवताओं की कथाएँ और उपासना-पद्धतियाँ स्वतः एक जैसी नहीं हो जातीं।

श्लोक 8

सरल अर्थ: सूर्य में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, धनद कुबेर, काल, यम, सोम और जलाधिपति के रूपों की स्तुति की जाती है। व्याख्या: यह श्लोक विभिन्न देवताओं के ब्रह्माण्डीय कार्यों को सूर्य की स्तुति में समेटता है। इसे सभी परम्पराओं पर एक मत थोपने की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 9

सरल अर्थ: उन्हें पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुत, मनु, वायु, अग्नि, प्रजाओं के प्राण, ऋतुकर्ता और प्रभाकर रूप में याद किया गया है। व्याख्या: नामों में पूर्वज, प्रकृति और जीव-जगत एक साथ आते हैं। 'ऋतुकर्ता' से मौसमों की नियमितता का अनुभव भी जुड़ता है।

श्लोक 10

सरल अर्थ: वे आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान्, स्वर्ण जैसे भानु, हिरण्यरेता और दिवाकर हैं। व्याख्या: हर नाम अलग गुण सामने रखता है—गति, पोषण, तेज और सृजन। 'हिरण्यरेता' का पाठ कुछ प्रचलित 'विश्वरेता' पाठों से अलग है।

श्लोक 11

सरल अर्थ: अश्वों, असंख्य किरणों और अंधकार नाश करने की शक्ति से युक्त सूर्य को शम्भु, त्वष्टा, मार्तण्ड और अंशुमान् कहा गया है। व्याख्या: सात अश्व सूर्य-गति की पारंपरिक छवि हैं। 'मार्तण्ड अंशुमान्' के आसपास मुद्रित शब्द-विभाजन की स्वतंत्र संस्कृत-जाँच आवश्यक है।

श्लोक 12

सरल अर्थ: वे हिरण्यगर्भ, शिशिर, तपन, भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदिति-पुत्र, शङ्ख और शीत-नाशक हैं। व्याख्या: 'शिशिर' और 'तपन' के विपरीत भाव स्तुति को व्यापक बनाते हैं। सूर्य के लिए 'शङ्ख' दुर्लभ पद है; उसका विशिष्ट अर्थ टीकाओं की सहायता से देखना चाहिए।

श्लोक 13

सरल अर्थ: उन्हें आकाशनाथ, तम-भेदी, ऋक्-यजुः-साम के पारगामी, वर्षादाता, जलमित्र और विन्ध्य-मार्ग में चलने वाला कहा गया है। व्याख्या: यहाँ वैदिक ज्ञान, वर्षा और आकाशीय मार्ग साथ रखे गए हैं। विन्ध्य-वीथी पुरानी भौगोलिक-खगोलीय कल्पना है; इससे आधुनिक गणना निकालना उचित नहीं।

श्लोक 14

सरल अर्थ: वे आतपी, मण्डली, मृत्यु, पिङ्गल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजा, रक्तवर्ण तथा सभी प्राणियों के उद्गम हैं। व्याख्या: 'मृत्यु' जैसे कठोर शब्द के साथ सृजन भी आता है; परिवर्तन और समाप्ति जीवन के चक्र में जुड़े दिखते हैं। 'कवि' का भाव यहाँ ऋषितुल्य द्रष्टा भी है।

श्लोक 15

सरल अर्थ: नक्षत्र-ग्रह-ताराओं के अधिपति, जगत के पोषक, तेजस्वियों में तेजस्वी और द्वादश रूपों वाले सूर्य को नमस्कार है। व्याख्या: 'द्वादशात्मन्' को बारह आदित्यों अथवा वर्ष के बारह भागों से जोड़ा जाता है। यह धार्मिक ब्रह्माण्ड-दृष्टि है, आधुनिक खगोल-विज्ञान की सूची नहीं।

श्लोक 16

सरल अर्थ: पूर्व और पश्चिम के पर्वत-रूपकों से संबद्ध सूर्य, ज्योतिसमूहों के स्वामी और दिन के अधिपति को प्रणाम है। व्याख्या: उदय-अस्त को पूर्व-पश्चिम के पर्वतों से व्यक्त किया गया है। मुद्रित 'पश्चिमे गिरये' के स्थान पर 'पश्चिमायाद्रये' भी मिलता है; यह पाठभेद खुला रखा गया है।

श्लोक 17

सरल अर्थ: विजय और मंगल के दाता, हरित अश्वों वाले तथा सहस्रकिरण आदित्य को बार-बार नमस्कार है। व्याख्या: 'नमो नमः' से आवर्तन का लयात्मक सौन्दर्य आता है। इसे परिणाम की निश्चित संख्या-आधारित गारंटी नहीं समझना चाहिए।

श्लोक 18

सरल अर्थ: उग्र, वीर, सारङ्ग नाम से स्तुत तथा कमलों को खिलाने वाले मार्ताण्ड सूर्य को नमस्कार है। व्याख्या: उग्र विशेषणों के बीच कमल-जागरण की कोमल छवि आती है। 'सारङ्ग' बहुअर्थी पद है; सूर्य-संदर्भ का अर्थ बताना चाहिए, पर उसे निर्विवाद न मानें।

श्लोक 19

सरल अर्थ: ब्रह्मा, ईशान और अच्युत के अधिपति, तेजस्वी सूर्य तथा रौद्र, सर्वभक्षी रूप वाले को नमस्कार है। व्याख्या: सूर्य का तेज पोषक और प्रचंड दोनों रूपों में प्रकट होता है। यह स्तुति का सार्वभौमत्व-बोध है, दूसरे देवताओं की अलग परम्पराओं का निषेध नहीं।

श्लोक 20

सरल अर्थ: अंधकार, हिम, शत्रुता और कृतघ्नता के नाशक, अमित स्वरूप तथा ज्योतियों के स्वामी को प्रणाम है। व्याख्या: लगातार 'घ्न' शब्द तीव्र निवारण का भाव लाते हैं। नैतिक अर्थ में अज्ञान या कृतघ्नता से मुक्ति समझी जा सकती है; किसी व्यक्ति के प्रति हिंसा का निर्देश नहीं।

श्लोक 21

सरल अर्थ: तप्त सोने जैसे तेज वाले, अग्निस्वरूप, विश्वकर्मा, अंधकार-भंजक और लोकसाक्षी सूर्य को प्रणाम है। व्याख्या: 'लोकसाक्षी' प्रकाश और जिम्मेदारी को जोड़ता है। काव्य-चित्र में ऐसा तेज है जिसके सामने कर्म छिपते नहीं।

श्लोक 22

सरल अर्थ: उन्हें प्राणियों का संहार और पुनः सृजन करने वाला कहा गया है; किरणों द्वारा वे सुखाते, तपाते और वर्षा कराते हैं। व्याख्या: यहाँ जीवनचक्र, ताप और वर्षा की अनुभूति जुड़ती है। इसे प्रत्येक वर्षा की आधुनिक वैज्ञानिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

श्लोक 23

सरल अर्थ: प्राणियों में स्थित सूर्य उनके सोने पर भी जागता है; उसे अग्निहोत्र और उसके फल का स्वरूप कहा गया है। व्याख्या: जागरण-निद्रा का विरोध विश्व की निरंतरता का ध्यान दिलाता है। अग्निहोत्र का उल्लेख पाठ में है; इससे बिना समीक्षा की अग्नि-विधि नहीं बनाई जाती।

श्लोक 24

सरल अर्थ: वेद, यज्ञ, उनके फल तथा संसार के कर्तव्यों को प्रभु रवि के व्यापक स्वरूप में देखा गया है। व्याख्या: ज्ञान, कर्म और कर्मफल को एक व्यापक दृष्टि में रखा गया है। यज्ञ का नाम आने से यह श्लोक विधिपुस्तिका नहीं बन जाता।

श्लोक 25

सरल अर्थ: अगस्त्य राघव से कहते हैं कि संकट, कठिनाई, वन और भय में सूर्य का कीर्तन करने वाला निराशा में नहीं डूबता। व्याख्या: यह भक्ति में दिया गया आश्वासन है; वास्तविक संकट अपने-आप समाप्त होने का प्रमाण नहीं। सुरक्षा, उपचार और विवेकपूर्ण निर्णय आवश्यक बने रहते हैं।

श्लोक 26

सरल अर्थ: अगस्त्य राम को एकाग्र मन से जगत्पति का पूजन करने और तीन बार पाठ के बाद विजय पाने का आश्वासन देते हैं। व्याख्या: तीन बार पाठ की बात युद्ध-प्रसंग में अगस्त्य का कथन है। यहाँ उसका सन्दर्भ बताया जाता है, परिणाम की निश्चित गारंटी या विस्तृत कर्मकाण्ड नहीं दिया जाता।

श्लोक 27

सरल अर्थ: अगस्त्य कहते हैं कि राम इसी समय रावण का वध करेंगे, और फिर अपने आगमन की तरह लौट जाते हैं। व्याख्या: युद्ध दोबारा शुरू होने से पहले गुरु का उपदेश पूरा होता है। इसके बाद वक्ता का सीधा उपदेश समाप्त होकर कथा का वर्णन लौटता है।

श्लोक 28

सरल अर्थ: उपदेश सुनकर राघव का शोक दूर होता है; वे प्रसन्न और संयत होकर उसे मन में धारण करते हैं। व्याख्या: बाहरी युद्ध-कर्म से पहले राम की मनःस्थिति बदलती है। स्तोत्र का सहज मानवीय पक्ष यही है कि एकाग्रता से संकल्प को बल मिल सकता है।

श्लोक 29

सरल अर्थ: आदित्य की ओर ध्यान करके पाठ के बाद राम को हर्ष मिलता है; वे तीन बार आचमन कर धनुष उठा लेते हैं। व्याख्या: ये राम के कार्यों का कथात्मक वर्णन हैं, पाठक को सीधे सूर्य की ओर देखने का निर्देश नहीं। सूर्य को नंगी आँख से घूरना हानिकारक हो सकता है।

श्लोक 30

सरल अर्थ: राम रावण को देखकर प्रसन्न एवं दृढ़चित्त होकर युद्ध की ओर बढ़ते हैं और उसे पराजित करने का संकल्प करते हैं। व्याख्या: 'सर्वयत्न' का अर्थ पूरा प्रयत्न है। कथा केवल उच्चारण नहीं, श्रद्धा के साथ नवीनीकृत आत्मबल और कर्मठता भी दिखाती है।

श्लोक 31

सरल अर्थ: देवताओं के मध्य सूर्य राम को देखकर प्रसन्न होते हैं और निशाचरराज के अंत को निकट जानकर शीघ्र बढ़ने को कहते हैं। व्याख्या: अन्तिम श्लोक आरम्भ में उपस्थित देवसमुदाय की ओर लौटता है। इस तरह पूरे इकतीस-श्लोक प्रसंग का कथात्मक चक्र पूरा होता है।

  1. Āditya Hṛdaya Stotra — 31-verse Sanskrit digital transcription and editorial variants tied to Govindarāja-commentary print · स्रोत खोलें
  2. Vālmīkirāmāyaṇam Yuddhakāṇḍam, with Govindarāja commentary (digitized scan) · स्रोत खोलें
  3. Valmiki Ramayana Yuddha Kanda Sarga 105 Devanagari text · स्रोत खोलें
  4. Ādityahṛdayam — StotraSamhita · स्रोत खोलें
  5. Ādityahṛdayam — Sanskrit Documents site text/reuse caution · स्रोत खोलें
  6. Ādityahṛdayam, Sanskrit Wikisource edited reading · स्रोत खोलें
  7. Additional reusable textual witness (comparison, not a replacement edition) · स्रोत खोलें