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हनुमान

रामायण में हनुमान की भूमिका, श्रीराम-भक्ति, पराक्रम, बुद्धिमत्ता, संजीवनी पर्वत, हनुमान चालीसा, प्रतीक और क्षेत्रीय परंपराओं को सरल हिंदी में समझें।

संदर्भ और स्रोत
इस पृष्ठ पर

हनुमान कौन हैं?

कल्पना कीजिए—एक दूत को समुद्र पार करके ऐसी नगरी में जाना है जहाँ कोई उसका परिचित नहीं। उसे एक बंदिनी स्त्री को खोजना है, अपना परिचय विश्वसनीय ढंग से देना है और फिर उनके परिवार तक सही समाचार पहुँचाना है। इस कठिन कार्य के लिए केवल बल पर्याप्त नहीं होगा। विवेक, धैर्य, भाषा की समझ और दूसरे के दुःख के प्रति संवेदना भी चाहिए। रामायण के हनुमान इसी कारण इतने प्रिय हैं। वे असाधारण सामर्थ्य वाले वीर हैं, पर उनका सामर्थ्य किसी सिंहासन या निजी यश के लिए नहीं, श्रीराम के कार्य और माता सीता की सहायता के लिए समर्पित है। 4

हनुमान को रामभक्त, पवनपुत्र, संकट में साहस देने वाले आराध्य और सेवा के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। वे महाकाव्य में वानर समुदाय के प्रमुख वीर हैं। वानर शब्द यहाँ उस पौराणिक समुदाय के परिचय का हिस्सा है; इससे किसी आधुनिक वैज्ञानिक जीव-वर्गीकरण का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं। उनकी महिमा केवल युद्ध में नहीं दिखती। पहली भेंट में उनके सधे हुए शब्द, सीता के सामने उनकी विनम्रता और लक्ष्मण की चिकित्सा के लिए उनकी तत्परता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं। 1 · 6

हनुमान के विषय में दो स्तरों पर पढ़ना उपयोगी है। एक स्तर रामायण और अन्य प्राचीन साहित्य की कथाओं का है; दूसरा, सदियों में विकसित हुई मंदिर-परंपराओं, लोकगीतों, चित्रों और भक्तिकाव्य का। दोनों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व है, लेकिन हर लोकप्रिय कथा को एक ही प्राचीन पाठ की घटना मान लेना ठीक नहीं। आधुनिक शोध भी हनुमान की महाकाव्यीय भूमिका से व्यापक लोक-आराधना तक की यात्रा को समझने का प्रयत्न करता है। 11 · 12

नाम, परिवार और विभिन्न पहचान

हनुमान के साथ हनुमत्, आञ्जनेय/अंजनेय, अंजनीपुत्र, पवनपुत्र, वायुपुत्र, मारुति, बजरंगबली, महावीर और रामदूत जैसे नाम प्रचलित हैं। प्रत्येक नाम उनके चरित्र का कोई पक्ष सामने लाता है। अंजनेय माता अंजना से संबंध बताता है; पवनपुत्र या वायुपुत्र वायुदेव से उनका पारंपरिक संबंध व्यक्त करता है; बजरंगबली अदम्य बल की स्मृति जगाता है। ‘रामदूत’ विशेष रूप से अर्थपूर्ण है, क्योंकि इसमें हनुमान का कार्य ही उनकी पहचान बन जाता है। तमिल सहित दक्षिण भारतीय परंपराओं में अंजनेयर जैसे उच्चारण भी मिलते हैं।

लोकप्रिय वंश-कथाओं में अंजना उनकी माता और केसरी उनके पिता कहे जाते हैं। उनके जन्म और शक्ति को वायुदेव से भी जोड़ा जाता है। वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग ६६ में जाम्बवान् समुद्र-लाँघन से पहले उन्हें उनकी उत्पत्ति और सामर्थ्य याद दिलाते हैं। इस प्रसंग का अर्थ धार्मिक आख्यान के भीतर समझना चाहिए; इसे किसी ऐतिहासिक व्यक्ति की प्रमाणित वंशावली नहीं कहा जा सकता। अलग-अलग पुनर्कथनों में विवरण बदलते हैं। 2

हनुमान को अनेक भक्त ब्रह्मचारी, संयमी और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने वाले आदर्श के रूप में पूजते हैं। फिर भी हर क्षेत्रीय कथा में उनके जीवन के सभी विवरण समान नहीं हैं। कुछ शैव और पौराणिक परंपराओं में उन्हें शिव या रुद्र का अंश अथवा अवतार भी माना जाता है। इस मत का सम्मान करते हुए यह याद रखना आवश्यक है कि राम के प्रति उनका प्रेम और सेवा उनकी महाकाव्यीय पहचान का केंद्रीय आधार है। सुंदरकाण्ड में लंका-दहन की तुलना रुद्र के त्रिपुर-दहन से की गई है; ऐसी उपमा को अपने-आप सभी सम्प्रदायों के लिए एक समान दार्शनिक निष्कर्ष नहीं मानना चाहिए। 5

ग्रंथों में हनुमान: आरंभिक कथा से व्यापक भक्ति तक

हनुमान की प्रमुख साहित्यिक उपस्थिति वाल्मीकि रामायण में मिलती है। किष्किन्धाकाण्ड में सुग्रीव और राम का गठबंधन, सुंदरकाण्ड में सीता की खोज, तथा युद्धकाण्ड में रावण से संघर्ष के बीच उनकी भूमिका उभरती है। रामायण के रचना-विकास और अलग-अलग पाठ-परंपराओं का इतिहास जटिल है। इसलिए किसी एक निश्चित शताब्दी में हनुमान की संपूर्ण आज की पूजा-पद्धति की शुरुआत मान लेना सावधानी के विरुद्ध होगा।

महाभारत के वनपर्व में भी हनुमान और भीम के मिलन की कथा है। बाद के समय में रामकथा के अनेक भाषायी रूपों, नाटकों, लोकगीतों, स्तुतियों तथा मूर्तियों ने हनुमान-भक्ति को नये रूप दिए। राम के सहयोगी के साथ-साथ स्वतंत्र आराध्य के रूप में उनका महत्त्व कैसे बढ़ा, इस विषय पर फिलिप लुटगेंडॉर्फ जैसे शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया है। उपलब्ध पुस्तक-सार से इस सामान्य ऐतिहासिक विषय की पुष्टि होती है, पर उस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ का स्वतंत्र परीक्षण यहाँ नहीं हुआ है। 7 · 12

पाठक के लिए यह भेद सरल है: धार्मिक परंपरा किसी कथा को जीवंत अर्थ देती है, जबकि इतिहासकार यह पूछता है कि उसका कौन-सा रूप किस समय के पाठ, शिल्प या अभिलेख में सुरक्षित मिला। दोनों प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं; इनके उत्तर हमेशा एक जैसे नहीं होते।

१. श्रीराम से पहली भेंट: संवाद का अद्भुत कौशल

सीता की खोज में भटकते राम और लक्ष्मण किष्किन्धा के निकट पहुँचते हैं। सुग्रीव उन दो धनुर्धारी अपरिचित पुरुषों को देखकर सावधान हो जाते हैं। हनुमान उनके पास साधु-जैसे वेश में जाते हैं और अत्यंत विनम्रता से बातचीत आरंभ करते हैं। श्रीराम उनकी भाषा, उच्चारण और विचारपूर्ण प्रस्तुति की प्रशंसा करते हैं। हनुमान आगे बताते हैं कि वे सुग्रीव के प्रतिनिधि हैं। यही मुलाकात उस मित्रता की भूमिका बनती है जिससे सीता की खोज आगे बढ़ पाती है। इसका प्रमुख पाठ-संदर्भ किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग ३ है। 1

यह कथा हमें याद दिलाती है कि वीरता केवल शत्रु को पराजित करने में नहीं है। दूसरे की बात सुनना, उसके इरादे समझना और भरोसा पैदा करना भी सामर्थ्य है। आधुनिक पाठक इसे विवेकपूर्ण संवाद का आदर्श मान सकता है; ऐसा नैतिक निष्कर्ष हमारी व्याख्या है, ग्रंथ से उठाया गया कोई शाब्दिक उद्धरण नहीं। रामायण के बड़े संघर्षों की नींव इस शांत बातचीत पर टिकती दिखाई देती है।

२. समुद्र पार करना और सीता को श्रीराम की अंगूठी देना

खोज-दल समुद्र के तट पर पहुँचता है। आगे लंका है, लेकिन इतनी बड़ी दूरी पार कौन करे? जाम्बवान् हनुमान को उनकी क्षमता का स्मरण कराते हैं। हनुमान अपने उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं और समुद्र लाँघते हैं। सुंदरकाण्ड का आरंभ इस विशाल यात्रा से होता है। मार्ग की चुनौतियाँ दिखाती हैं कि केवल तेज गति नहीं, सावधानी और लक्ष्य की समझ भी आवश्यक है। 2 · 3

लंका में सीता को खोज लेना काम का एक हिस्सा है; उन्हें यह विश्वास दिलाना दूसरा। कैद में बैठी सीता के सामने एक अपरिचित दूत राम का संदेश लेकर आता है। हनुमान उन्हें श्रीराम की मुद्रिका—अंगूठी—दिखाते हैं। यह पहचान का प्रमाण बनती है। वे सीता के दुःख को छोटा बताकर टालते नहीं, बल्कि आशा दिलाते हैं। सुंदरकाण्ड, सर्ग ३६ में अंगूठी का प्रसंग हनुमान की विश्वसनीयता, संवेदनशीलता और मर्यादित वाणी को बहुत सुंदर ढंग से उभारता है। 4

इस दृश्य का भाव समझना महत्त्वपूर्ण है। हनुमान चाहते तो अपनी अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन कर सकते थे, पर यहाँ भरोसा शक्ति-प्रदर्शन से नहीं बनता। पहचान, सत्य और उचित संदेश से बनता है। इसीलिए उन्हें रामदूत कहना उनके व्यक्तित्व को समझने की कुंजी है।

३. लंका-दहन: पराक्रम और युद्ध की कठिन वास्तविकता

सीता से भेंट के बाद हनुमान का रावण की सेना से सामना होता है। कथा में उनकी पूँछ में आग लगाई जाती है और वही अग्नि लंका के भवनों तक पहुँचती है। सुंदरकाण्ड, सर्ग ५४ में इस घटना का विस्तार है। भक्तिकाव्य में इसे अन्याय के विरुद्ध साहस की विजय के रूप में गाया जाता है। लेकिन मूल आख्यान नगर में फैली आग, भय और विनाश का वर्णन भी करता है। इस असहज पक्ष की उपेक्षा करके इसे केवल खेल या उत्सव बताना संतुलित पठन नहीं होगा। 5

एक पाठक इसे अहंकार के पतन का प्रतीक देख सकता है, तो दूसरा युद्ध के भयानक परिणामों पर भी विचार कर सकता है। दोनों स्तरों को समझना संभव है। हनुमान की बड़ी भूमिका सीता की रक्षा के लिए राम के अभियान को आगे बढ़ाना है, न कि हिंसा को किसी सामान्य मानवीय समस्या का समाधान घोषित करना। धार्मिक कथा का अध्ययन आज के जीवन में हिंसक आचरण की अनुमति नहीं बनता।

४. संजीवनी का पर्वत: जब बुद्धि ने बल को दिशा दी

युद्ध में लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल होते हैं। वैद्य सुषेण को दूर स्थित पर्वत से विशिष्ट औषधियाँ चाहिए। हनुमान वहाँ पहुँचते हैं, पर आवश्यक वनस्पतियों की ठीक पहचान नहीं कर पाते। लौटकर अनुमान से कोई गलत औषधि देने के बजाय वे पर्वत की चोटी ही उठाकर ले आते हैं। सुषेण उसमें से आवश्यक औषधियाँ निकालते हैं और लक्ष्मण का उपचार करते हैं। यहाँ उपयोग किए गए ऑनलाइन पाठ में यह प्रसंग युद्धकाण्ड, सर्ग १०१ में है। कुछ संस्करणों में सर्ग-संख्या अलग मिल सकती है; इसलिए संदर्भ की जाँच करते समय घटना और प्रयुक्त संस्करण दोनों देखें। 6

कथा की चमत्कारिकता भारतीय स्मृति का बड़ा हिस्सा है। साथ ही इसमें समस्या सुलझाने की अद्भुत कल्पना भी है। हनुमान अपनी जानकारी की सीमा पहचानते हैं। वे कठिन परिस्थिति में जिम्मेदारी से निर्णय लेते हैं। आज इसे समर्पित प्रयास और सूझबूझ की प्रेरणा के रूप में पढ़ा जा सकता है, लेकिन इसे किसी औषधि की वैज्ञानिक पहचान या चिकित्सा से संबंधित प्रमाणित दावा नहीं कहा जाना चाहिए।

महाभारत में हनुमान और भीम

महाभारत के वनपर्व में भीम वन में आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन रास्ते में एक वृद्ध वानर लेटा है। भीम उसे हटने के लिए कहते हैं। वानर शांत स्वर में सुझाव देता है कि यदि वे आगे जाना चाहते हैं तो उसकी पूँछ एक ओर कर दें। भीम अपनी प्रचंड शक्ति से भी पूँछ नहीं हिला पाते। तब उन्हें अपने अहंकार का बोध होता है। वृद्ध वानर स्वयं को हनुमान बताते हैं, जो वायुदेव से जुड़े होने के कारण भीम के बड़े भाई के रूप में भी समझे जाते हैं। के. एम. गांगुली के ऐतिहासिक अंग्रेज़ी अनुवाद में यह प्रसंग वनपर्व के लगभग खंड CXLVI में है; संस्कृत आलोचनात्मक संस्करण की क्रम-संख्या अलग से जाँची जानी चाहिए। 7

यह प्रसंग रामायण में सीता की खोज का अगला अध्याय नहीं, बल्कि दूसरे महाकाव्य की स्वतंत्र कथा है। उसका संदेश सरल और गहरा है: बलवान होना और अपनी सीमाएँ पहचानना विरोधी बातें नहीं। भीम का विनम्र होना उनकी वीरता घटाता नहीं, उसे अधिक परिपक्व बनाता है। लोकप्रिय कथाओं में अर्जुन के ध्वज पर हनुमान की उपस्थिति भी कही जाती है; उसके सटीक पाठ-संदर्भ की अलग पुष्टि किए बिना यहाँ कोई श्लोक-संख्या नहीं दी गई है।

हनुमान के स्वरूप, आयुध और प्रतीक

आज अधिकांश लोग हनुमान की कल्पना गदा लिए, पर्वत उठाए या श्रीराम के सामने हाथ जोड़े हुए करते हैं। पर ऐतिहासिक मूर्तियों और चित्रों में उनके रूप बहुत विविध हैं। कहीं वे झुके हुए, सेवाभाव से हाथ उठाए खड़े हैं; कहीं युद्ध के वीर; कहीं पहाड़ लिए उड़ते हुए; और कहीं राम-सीता के निकट शांत भक्त। उनका वानरमुख और पूँछ पहचान के प्रमुख संकेत बनते हैं, पर देहभंगिमा हमेशा एक जैसी नहीं रहती।

न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम में सुरक्षित ग्यारहवीं शताब्दी की चोल-कांस्य प्रतिमा में हनुमान श्रीराम से आदरपूर्वक संवाद की मुद्रा में हैं। वहाँ उनका मानव-सदृश शरीर और वानर-लक्षण साथ दिखाई देते हैं। लगभग १८०० के राजस्थान के एक चित्र में वे औषधि-पर्वत उठाए हुए हैं। स्मिथसोनियन के संग्रह में लगभग १७०० का मेवाड़ चित्र राम और सीता के साथ उनका संबंध दिखाता है। ये वस्तुएँ अपने-अपने युग की कला और भक्ति का प्रमाण हैं, महाकाव्य की घटनाओं के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक चित्र नहीं। 8 · 9 · 10

गदा सामर्थ्य और रक्षण का लोकप्रिय प्रतीक है, लेकिन हर प्राचीन प्रतिमा में गदा होना आवश्यक नहीं। पर्वत संजीवनी की कथा का स्मरण कराता है। हाथ जोड़े हुए मुद्रा सेवा और विनय का भाव व्यक्त करती है। कुछ आधुनिक भक्तिचित्रों में हनुमान अपना वक्ष खोलकर भीतर श्रीराम और सीता का दर्शन कराते हैं। ऐसी छवि हृदय में आराध्य की उपस्थिति का रूपक है, शारीरिक रचना के बारे में कोई तथ्यात्मक कथन नहीं। इसी तरह सिंदूर या लाल-नारंगी रंग के धार्मिक अर्थ क्षेत्र-विशेष की परंपरा के आधार पर समझने चाहिए।

भक्ति, सेवा और नैतिक शिक्षा

हनुमान की शक्ति की विशेषता है कि उसका दिशा-निर्देश प्रेम करता है। भक्ति यानी ईश्वर के प्रति समर्पित प्रेम; सेवा यानी किसी के हित के लिए किया गया कार्य; और दास्य-भाव यानी अपने आराध्य के प्रति प्रेमपूर्ण सेवक का दृष्टिकोण। इन शब्दों को समझने से हनुमान की अनेक कथाएँ आपस में जुड़ती हैं। पहली भेंट में वे योग्य संवादकर्ता हैं, अशोक-वाटिका में भरोसेमंद दूत, युद्ध में संकट-मोचक और भीम के सामने विनय सिखाने वाले बड़े भाई। 11

यहाँ एक सूक्ष्म बात है। हनुमान की विनम्रता का अर्थ निष्क्रिय रहना नहीं। वे निर्णय लेते हैं, जोखिम उठाते हैं, और आवश्यकता पड़ने पर अपनी पूरी शक्ति लगाते हैं। दूसरी ओर, बल का उपयोग निजी अहंकार के लिए नहीं करते—कम से कम भक्तिपरंपरा उन्हें इसी आदर्श रूप में देखती है। इसलिए ज्ञान, साहस, अनुशासन और करुणा उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग गुण नहीं, एक ही चरित्र के सहयोगी पक्ष हैं।

राम-केन्द्रित वैष्णव भक्ति में हनुमान आदर्श रामभक्त हैं। कुछ शैव मत उन्हें रुद्र या शिव से जोड़ते हैं। अन्य समुदाय उनकी स्वतंत्र आराधना, वायुपुत्र रूप या संकटों में संरक्षण देने वाले स्वरूप पर बल देते हैं। इन संबंधों को एक-दूसरे का खंडन मानना आवश्यक नहीं, लेकिन सबको एक ही प्राचीन मत का कथन कहना भी उचित नहीं। किस परंपरा की बात हो रही है, यह स्पष्ट रखना ही सम्मानजनक और विश्वसनीय तरीका है। 12

रामकथा, हनुमान चालीसा और साहित्य

वाल्मीकि रामायण हनुमान से जुड़े उन प्रमुख प्रसंगों का आधार है जिनका यहाँ विवेचन हुआ। महाभारत में उनका एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रसंग आता है। क्षेत्रीय भाषाओं में कही और गाई जाने वाली रामकथाओं ने हनुमान को लोगों के घरों, उत्सवों, नाट्यमंचों और संगीत से जोड़ा। तुलसीदास से संबद्ध रामचरितमानस उत्तर भारत की प्रमुख भक्तिपरंपराओं में विशेष स्थान रखता है। वह संस्कृत वाल्मीकि रामायण से संबंधित होते हुए भी अलग रचना है; दोनों को शब्दशः एक ही ग्रंथ नहीं समझना चाहिए। 13

हनुमान चालीसा क्या है?

हनुमान चालीसा एक अत्यंत लोकप्रिय भक्तिस्तुति है, जिसमें चालीस चौपाइयाँ हैं। इसकी परंपरागत भाषा अवधी मानी जाती है और आरंभ तथा अंत में दोहे भी आते हैं। इसका श्रेय सामान्यतः गोस्वामी तुलसीदास को दिया जाता है। इसमें हनुमान के बल, विवेक, विनय और रामभक्ति की स्तुति की जाती है। इसे पढ़ना या सुनना उत्तर भारत सहित कई क्षेत्रों में घर-घर की भक्ति का हिस्सा है। मंगलवार और शनिवार का संबंध भी अनेक स्थानीय पूजा-प्रथाओं से जुड़ा है।

लेखक-संबंधी सावधानी: धार्मिक परंपरा में तुलसीदास का नाम व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, पर साहित्येतिहास में इस रचना के प्रामाणिक लेखन और शैली पर प्रश्न भी उठाए गए हैं। इसलिए अध्ययन-पृष्ठ पर ‘परंपरागत रूप से तुलसीदास से संबद्ध’ कहना अधिक सावधान अभिव्यक्ति है। यह विवाद चालीसा की जीवंत लोकप्रियता को नकारता नहीं। लुटगेंडॉर्फ के प्रकाशित शोध में इस विषय की चर्चा है। 13

इस लेख में चालीसा की सभी चौपाइयाँ या किसी आधुनिक अनुवाद की सामग्री पुनर्प्रकाशित नहीं की गई है। श्लोक-दर-श्लोक अध्ययन के लिए मान्य पाठ-संस्करण और अनुवाद-अधिकार की अलग जाँच आवश्यक होगी। चालीसा को किसी वैदिक सूक्त या वाल्मीकि रामायण के अध्याय के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

पर्व, मंदिर और दैनिक भक्ति

हनुमान के मंदिरों में दर्शन, स्तुति, रामकथा का पाठ या श्रवण, सामूहिक कीर्तन, प्रसाद और सेवा जैसे सार्वजनिक धार्मिक व्यवहार प्रचलित हैं। भक्त अपने-अपने परिवार, गुरु और स्थानीय मंदिर की परंपरा के अनुसार इन्हें अपनाते हैं। मंगलवार या शनिवार को विशेष पूजा की मान्यता बहुत-से क्षेत्रों में है, पर इसे सबके लिए एक जैसा अनिवार्य नियम नहीं कहना चाहिए।

हनुमान जयंती/जन्मोत्सव उनके जन्म की स्मृति से जुड़ा पर्व है। विभिन्न राज्यों और परंपराओं में इसकी तिथि और उत्सव-रीति में अंतर मिलता है; इसलिए किसी प्रकाशित कैलेंडर में तिथि देते समय स्थानीय पंचांग और संबंधित परंपरा की पुष्टि करनी होगी। उपवास, विशेष मंत्र या साधना से संबंधित विवरणों में और भी अधिक सावधानी चाहिए। ऐसी सामग्री का परिचय शैक्षिक ढंग से दिया जा सकता है, किंतु किसी विधि से चमत्कार, रोग-निवारण अथवा निश्चित मनोवैज्ञानिक परिणाम की गारंटी नहीं दी जानी चाहिए।

सामान्य प्रश्न और भ्रांतियाँ

क्या हनुमान देवता हैं या राम के भक्त? दोनों पहचानें हिंदू धार्मिक व्यवहार में साथ मिलती हैं। वे स्वयं पूजनीय हैं और राम के अनन्य सेवक भी माने जाते हैं।

क्या हनुमान और शिव एक ही हैं? कुछ शैव परंपराएँ हनुमान को शिव या रुद्र का अंश मानती हैं। यह समस्त हिंदू परंपराओं में एकमात्र मत नहीं है। राम के प्रति उनकी भक्ति को अलग से समझना आवश्यक है।

क्या संजीवनी पर्वत का प्रसंग वैज्ञानिक प्रमाण है? नहीं। यह पवित्र महाकाव्य की कथा है, जिससे भक्त सेवा और प्रयत्न का अर्थ ग्रहण करते हैं। इससे किसी आधुनिक औषधि का चिकित्सकीय प्रभाव सिद्ध नहीं होता।

पवनपुत्र नाम का अर्थ क्या है? वायुदेव से हनुमान के पारंपरिक संबंध का स्मरण कराने वाला नाम।

क्या हनुमान चालीसा वाल्मीकि रामायण में है? नहीं। यह स्वतंत्र, बाद की भक्तिकाव्य-परंपरा की स्तुति है।

क्या हर प्रतिमा में हनुमान गदा लिए होते हैं? नहीं। ऐतिहासिक उदाहरणों में हाथ जोड़े, संवाद करते, खड़े और पर्वत उठाए हुए रूप भी मिलते हैं।

शब्दावली

शब्दसंक्षिप्त अर्थ
वानररामायण में वर्णित वानर-सदृश वीर समुदाय
भक्तिईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण
सेवादूसरे के हित या आराध्य की प्रसन्नता के लिए किया कार्य
रामदूतश्रीराम का संदेशवाहक
पवनपुत्र / वायुपुत्रवायुदेव से संबंधित पारंपरिक नाम
गदाशक्ति और रक्षण से जुड़ा लोकप्रिय आयुध
सुंदरकाण्डरामायण का वह भाग जिसमें हनुमान की लंका-यात्रा प्रमुख है
चालीसायहाँ चालीस चौपाइयों वाली स्तुति
दोहा / चौपाईउत्तर भारतीय काव्य की छंद-विधाएँ
दास्य-भावभक्त का प्रेमपूर्ण सेवक-भाव
संदर्भ और स्रोत (13)

यह स्रोत-सूची लेख के साथ दी गई है। स्रोत का लिंक स्वतंत्र पाठ-सत्यापन या पुनः उपयोग अनुमति का प्रमाण नहीं है।

  1. Vālmīki Rāmāyaṇa: Kiṣkindhā-kāṇḍa 3

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  2. Vālmīki Rāmāyaṇa: Kiṣkindhā-kāṇḍa 66

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  3. Vālmīki Rāmāyaṇa: Sundara-kāṇḍa 1

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  4. Vālmīki Rāmāyaṇa: Sundara-kāṇḍa 36

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  5. Vālmīki Rāmāyaṇa: Sundara-kāṇḍa 54

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  6. Vālmīki Rāmāyaṇa: Yuddha-kāṇḍa 101 (online edition)

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  7. Mahābhārata: Vana-parvan, Section CXLVI

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  8. Hanuman Conversing

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  9. Hanuman Bearing the Mountaintop with Medicinal Herbs

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  10. Hanuman standing before Rama and Sita

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  11. Hanuman

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  12. Hanuman's Tale: The Messages of a Divine Monkey

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  13. The Life of a Text: Performing the Ramcaritmanas of Tulsidas

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लेख में दी गई विस्तृत स्रोत-टिप्पणियाँ

स्रोत और आगे का अध्ययन

  1. 1. वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड ३, राम और हनुमान की भेंट: https://sanskritdocuments.org/sites/valmikiramayan/kish/sarga3/kishkindharoman3.htm
  2. 2. वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड ६६, जाम्बवान् द्वारा हनुमान के जन्म और बल का स्मरण: https://www.sanskritdocuments.org/sites/valmikiramayan/kish/sarga66/kishkindharoman66.htm
  3. 3. वाल्मीकि रामायण, सुंदरकाण्ड १, समुद्र-लाँघन: https://www.valmikiramayan.net/sundara/sarga1/sundarasans1.htm
  4. 4. वाल्मीकि रामायण, सुंदरकाण्ड ३६, सीता को श्रीराम की मुद्रिका: https://sanskritdocuments.org/sites/valmikiramayan/sundara/sarga36/sundarasans36.htm
  5. 5. वाल्मीकि रामायण, सुंदरकाण्ड ५४, लंका-दहन: https://sanskritdocuments.org/sites/valmikiramayan/sundara/sarga54/sundara_54_prose.htm
  6. 6. वाल्मीकि रामायण, इस डिजिटल संस्करण में युद्धकाण्ड १०१, औषधि-पर्वत: https://sanskritdocuments.org/sites/valmikiramayan/yuddha/sarga101/yuddha_101_prose.htm
  7. 7. महाभारत, वनपर्व, गांगुली अनुवाद का खंड CXLVI, भीम-हनुमान संवाद: https://sacred-texts.com/book/the-mahabharata-book-3-vana-parva/shell/section-cxlvi
  8. 8. मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम, Hanuman Conversing, ११वीं सदी की चोल प्रतिमा: https://www.metmuseum.org/art/collection/search/38945
  9. 9. मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम, Hanuman Bearing the Mountaintop with Medicinal Herbs, लगभग १८०० का राजस्थानी चित्र: https://www.metmuseum.org/art/collection/search/37960
  10. 10. स्मिथसोनियन नेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ एशियन आर्ट, Hanuman standing before Rama and Sita, लगभग १७००: https://asia.si.edu/explore-art-culture/collections/search/edanmdm%3Afsg_F1938.17/
  11. 11. जेरेमी सॉल, “Hanuman,” Oxford Bibliographies in Hinduism (२०२३), उपलब्ध परिचय: https://academic.oup.com/reference/62357/reference-article-abstract/554518489
  12. 12. फिलिप लुटगेंडॉर्फ, Hanuman's Tale: The Messages of a Divine Monkey (Oxford University Press, २००७), उपलब्ध सार व विषयसूची: https://academic.oup.com/book/36076
  13. 13. फिलिप लुटगेंडॉर्फ, The Life of a Text: Performing the Ramcaritmanas of Tulsidas (University of California Press, १९९१), ऑनलाइन शैक्षिक पुस्तक: https://publishing.cdlib.org/ucpressebooks/public/book/the-life-of-a-text-performing-the-ramcaritmanas-of-tulsidas.html
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