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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

चालीसा

श्री लक्ष्मी चालीसा — 40 चौपाइयों का सम्पूर्ण चयनित पाठ एवं हिंदी भावार्थ

लक्ष्मी चालीसा का सम्पूर्ण चयनित पाठ, प्रत्येक पद का हिंदी अर्थ और 39/40 चौपाई-पाठभेद की स्पष्ट चर्चा।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

आरम्भिक दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥

अर्थ

माता लक्ष्मी से हृदय में निवास करने और आशाएँ पूर्ण करने की प्रार्थना है।

व्याख्या

आरम्भ में समृद्धि को केवल धन तक सीमित न रखकर हृदय की शुद्धता और आशा से जोड़ा गया है।

आरम्भिक सोरठा

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूँ। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

अर्थ

भक्त हाथ जोड़कर जगदम्बा से जीवन मंगलमय बनाने की विनती करता है।

व्याख्या

सोरठा लोकभाषा का छन्द है। यहाँ विनती है, किसी गुप्त अनुष्ठान की विधि नहीं।

चौपाई 1

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥

अर्थ

भक्त समुद्र-कन्या लक्ष्मी से ज्ञान, बुद्धि और विद्या माँगता है।

व्याख्या

ज्ञान की माँग बताती है कि लक्ष्मी की कृपा को केवल धन-संग्रह समझना अधूरा होगा।

चौपाई 2

तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥

अर्थ

भक्त माता को अनुपम उपकारी मानकर अपनी आशाओं की पूर्ति चाहता है।

व्याख्या

यह भक्ति की कृतज्ञ भाषा है, आर्थिक सफलता की किसी निश्चित गारंटी का दावा नहीं।

चौपाई 3

जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥

अर्थ

सबका आधार कही गई जगज्जननी जगदम्बा की जय हो।

व्याख्या

'जगदम्बा' व्यापक देवी-भक्ति की भाषा है; विभिन्न परम्पराओं में देवी-रूपों की व्याख्या एक-सी नहीं होती।

चौपाई 4

तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥

अर्थ

माता को प्रत्येक हृदय में विराजमान मानकर भक्त अपनी विशेष प्रार्थना रखता है।

व्याख्या

'घट-घट' भीतर की दिव्य उपस्थिति का काव्यात्मक बोध कराता है, कोई भौतिक स्थान-विवरण नहीं।

चौपाई 5

जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥

अर्थ

समुद्र-कुमारी को दीन-दुःखियों की हितैषी कहा गया है।

व्याख्या

दीनजनों के प्रति करुणा समृद्धि के साथ सेवा और उत्तरदायित्व की सीख जोड़ती है।

चौपाई 6

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥

अर्थ

भक्त महारानी जगज्जननी से प्रतिदिन कृपा की प्रार्थना करता है।

व्याख्या

'भवानी' यहाँ देवी का भावमय सम्बोधन है; उससे सभी सम्प्रदायों का एक ही दर्शन सिद्ध नहीं होता।

चौपाई 7

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥

अर्थ

अपनी स्तुति को अपर्याप्त मानकर भक्त दोष भुलाकर उसकी सुध लेने को कहता है।

व्याख्या

अपनी कमी स्वीकार करना दर्शाता है कि श्रद्धा केवल निर्दोष उच्चारण पर निर्भर नहीं करती।

कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥

अर्थ

भक्त माता से कृपादृष्टि करके अपनी विनती सुनने का अनुरोध करता है।

व्याख्या

'कृपादृष्टि' अपनापन और भरोसा व्यक्त करने वाला भक्ति-साहित्य का परिचित बिम्ब है।

चौपाई 9

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥

अर्थ

लक्ष्मी को ज्ञान-बुद्धि और सुख की दात्री मानकर संकट हरने को कहा गया है।

व्याख्या

चयनित पाठ का 'ज्ञान बुद्धि जय सुख' पाठ ज्यों का त्यों रखा गया है; दूसरे पाठभेद अलग दर्ज हैं।

चौपाई 10

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥

अर्थ

स्तुति क्षीरसागर-मंथन तथा चौदह रत्नों की कथा स्मरण करती है।

व्याख्या

रत्नों की सूची अलग ग्रन्थों में बदल सकती है; यह पुराण-कथा है, दिनांकित इतिहास नहीं।

चौपाई 11

चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥

अर्थ

लक्ष्मी को समुद्र से प्राप्त सुखराशि और प्रभु की सेविका के रूप में चित्रित किया गया है।

व्याख्या

'दासी' यहाँ भक्ति-सेवा की काव्य-भाषा है, महिलाओं की सामाजिक अधीनता का नियम नहीं।

चौपाई 12

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

अर्थ

प्रभु के विविध अवतारों के साथ देवी भी बदलते रूप में उनकी सेवा करती हैं।

व्याख्या

यह वैष्णव भक्ति का भाव है; सभी शाक्त परम्पराएँ देवी और विष्णु के सम्बन्ध को समान रूप में नहीं रखतीं।

चौपाई 13

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥

अर्थ

चौपाई अयोध्या में विष्णु के मानवावतार का स्मरण करती है।

व्याख्या

यहाँ संकेत रामावतार की ओर है, जिसे परम्परा विष्णु के अवतार के रूप में समझती है।

चौपाई 14

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

अर्थ

लक्ष्मी को जनकपुर में प्रकट हुई सीता और प्रेमपूर्वक सेवा करने वाली माना गया है।

व्याख्या

सीता-लक्ष्मी की पहचान धार्मिक परम्परा का कथन है, ऐतिहासिक जन्म का प्रलेखित प्रमाण नहीं।

चौपाई 15

अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥

अर्थ

अन्तर्यामी प्रभु उन्हें स्वीकारते हैं और वे त्रिभुवन की स्वामिनी कही जाती हैं।

व्याख्या

'त्रिभुवन की स्वामी' देवी की गरिमा का स्तुतिपरक विशेषण है।

चौपाई 16

तुम सम प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहँ लौं महिमा कहौं बखानी॥

अर्थ

भक्त कहता है कि देवी की शक्ति और महिमा का पूरा वर्णन सम्भव नहीं।

व्याख्या

महिमा वर्णन में भाषा की सीमा स्वीकारना स्तुति-काव्य की सामान्य विशेषता है।

चौपाई 17

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥

अर्थ

मन, कर्म और वचन से सेवा करने वाला इच्छित फल पाने की आशा रखता है।

व्याख्या

मन-कर्म-वचन की एकता आचरण की सच्चाई पर बल देती है, देवी के साथ सौदेबाजी पर नहीं।

तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भाँति मन लाई॥

अर्थ

छल-कपट छोड़कर मन लगाकर की गई पूजा को महत्त्व दिया गया है।

व्याख्या

इस चौपाई का मुख्य संदेश बाहरी दिखावे से अधिक निष्कपट भाव है।

चौपाई 19

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥

अर्थ

कवि एकाग्र मन से पाठ करने वालों के विषय में अगला आश्वासन कहता है।

व्याख्या

इसका वाक्य अगली चौपाई में पूरा होता है; दोनों को साथ पढ़ना उचित है।

चौपाई 20

ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित पावै फल सोई॥

अर्थ

स्तुति मन लगाकर पाठ करने वाले के कष्ट दूर होने और इच्छित फल पाने का आश्वासन देती है।

व्याख्या

यह पारम्परिक फलश्रुति जैसी भक्ति-आश्वासन की भाषा है, परिणामों का प्रमाणित वादा नहीं।

चौपाई 21

त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥

अर्थ

भक्त त्रिविध ताप तथा संसार-बन्धन से उबारने की करुण पुकार करता है।

व्याख्या

'त्रिविध ताप' की व्याख्या विविध दर्शन करते हैं; यह पद किसी एक पद्धति को अनिवार्य नहीं बनाता।

चौपाई 22

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥

अर्थ

ध्यान से चालीसा पढ़ने-पढ़वाने तथा सुनने-सुनाने वालों की चर्चा है।

व्याख्या

यहाँ सामूहिक या व्यक्तिगत पाठ का उल्लेख है, हर पाठक के लिए बाध्यकारी नियम नहीं।

चौपाई 23

ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥

अर्थ

चौपाई रोग न सताने, संतान और समृद्धि मिलने की भक्तिपरक बात कहती है।

व्याख्या

इसे रोग-उपचार, संतान-प्राप्ति अथवा धन-लाभ की निश्चित गारंटी न मानें; आवश्यकता पर उचित विशेषज्ञ सहायता लें।

चौपाई 24

पुत्रहीन अरु सम्पति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥

अर्थ

स्तुति संतानहीनता, निर्धनता, दृष्टि या श्रवण-असमर्थता और कुष्ठ जैसे कष्टों का उल्लेख करती है।

व्याख्या

पुराने शब्द कभी कलंकित करने वाले लग सकते हैं; रोग या दिव्यांगता किसी व्यक्ति की गरिमा कम नहीं करती।

चौपाई 25

विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥

अर्थ

पंक्ति में विप्र को बुलाकर पाठ करवाने और मन में शंका न रखने का उल्लेख है।

व्याख्या

यह स्रोत की पारम्परिक विधि-सूचना है; यह शैक्षिक लेख उसे पाठक पर अनिवार्य नहीं करता।

चौपाई 26

पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

अर्थ

चालीस दिन पाठ और गौरीश की कृपा का उल्लेख मिलता है।

व्याख्या

'गौरीश' शिव का नाम है; इससे यह रचना शिव-केंद्रित अनुष्ठान-निर्देश नहीं बन जाती।

चौपाई 27

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥

अर्थ

भक्त सुख-सम्पत्ति मिलने और अभाव दूर होने का विश्वास व्यक्त करता है।

व्याख्या

इस आशा को पहले कही गई सत्यनिष्ठा और करुणा की शिक्षा से जोड़कर समझें।

बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

अर्थ

बारहों मास पूजा करने वाले की निष्ठा की प्रशंसा है।

व्याख्या

सालभर स्मरण भक्ति का आदर्श है; सबके लिए एक समय-सारणी का विधान नहीं।

चौपाई 29

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोइ जग में कहुँ नाहीं॥

अर्थ

प्रतिदिन मन लगाकर पाठ करने वाले को अत्यन्त धन्य कहा गया है।

व्याख्या

निरन्तरता की प्रशंसा काव्यात्मक है; पाठ की संख्या से लोगों की भक्ति को तौलना उचित नहीं।

चौपाई 30

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

अर्थ

कवि कहता है कि महिमा-वर्णन अपर्याप्त है और ध्यानपूर्वक अनुभव की ओर संकेत करता है।

व्याख्या

'लेय परीक्षा' के असंदिग्ध अर्थ को लेकर पाठभेद सम्भव हैं; इसे चमत्कार जाँचने की वैज्ञानिक विधि न समझें।

चौपाई 31

करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥

अर्थ

विश्वास और नियम के साथ भक्ति करने पर हृदय में प्रेम बढ़ने की बात कही है।

व्याख्या

'प्रेम' को उपलब्धि मानना इस पद का आन्तरिक, गैर-भौतिक अर्थ खोलता है।

चौपाई 32

जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥

अर्थ

सर्वव्यापी गुणों की खान लक्ष्मी भवानी की जय कही गई है।

व्याख्या

'भवानी' यहाँ व्यापक देवी-एकत्व का भक्तिभाव है, सर्वमान्य दार्शनिक समीकरण नहीं।

चौपाई 33

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुँ नाहीं॥

अर्थ

देवी के प्रबल तेज और अनुपम दयालुता की स्तुति है।

व्याख्या

शक्ति और दया साथ आने से लक्ष्मी का स्वरूप धन तक सीमित नहीं रहता।

चौपाई 34

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥

अर्थ

अपने को अनाथ बताकर भक्त संकट से रक्षा और भक्ति देने को कहता है।

व्याख्या

संकट-निवारण के साथ भक्ति माँगना बताता है कि देवी से सम्बन्ध स्वयं में महत्त्वपूर्ण है।

चौपाई 35

भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥

अर्थ

भक्त भूल-चूक के लिए क्षमा और अपनी दशा देखकर दर्शन की विनती करता है।

व्याख्या

दर्शन की कामना भक्ति की अंतरंग भाषा है; इसे निश्चित प्रत्यक्ष घटना का वादा नहीं बनाना चाहिए।

चौपाई 36

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥

अर्थ

देवी की उपस्थिति के बावजूद दर्शन के अभाव में भक्त व्याकुलता कहता है।

व्याख्या

देवी के निकट माने जाने और विरह अनुभव करने का तनाव भक्ति-काव्य में परिचित है।

चौपाई 37

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥

अर्थ

भक्त अपनी अल्पबुद्धि स्वीकारकर देवी को अंतर्यामी मानता है।

व्याख्या

यह पंक्ति ज्ञान का निषेध नहीं, अपनी सीमा स्वीकारने की विनम्रता है।

रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

अर्थ

लक्ष्मी के चतुर्भुज रूप से कष्ट दूर करने की प्रार्थना है।

व्याख्या

चार भुजाएँ प्रसिद्ध प्रतिमा-रूप हैं; ऐतिहासिक मूर्तियों में रूप-भेद भी मिलते हैं।

चौपाई 39

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥

अर्थ

कवि पुनः अपनी अल्प विद्या बताकर पर्याप्त स्तुति न कर पाने की बात कहता है।

व्याख्या

विनम्रता की यह पुनरावृत्ति अगली चौपाई में आने वाली नाम-छाप की भूमिका बनती है।

चौपाई 40

रामदास अब कहै पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

अर्थ

'रामदास' नाम की छाप वाला वक्ता देवी से विपत्ति दूर करने को कहता है।

व्याख्या

'रामदास' नाम-छाप मात्र से किसी निश्चित ऐतिहासिक व्यक्ति या रचनाकाल की पुष्टि नहीं होती।

समापन दोहा 1

त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो बेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥

अर्थ

समापन दोहे में दुःख दूर करने और शत्रुओं पर विजय की पुकार है।

व्याख्या

'शत्रु' को बाहरी विरोधी या लोभ-क्रोध जैसे भीतर के दोष समझा जा सकता है; हिंसा का निर्देश नहीं।

रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

अर्थ

रामदास हाथ जोड़कर माता की कृपा-दृष्टि की अंतिम विनती करता है।

व्याख्या

अन्तिम स्वर विनम्र प्रार्थना का है, निश्चित लेन-देन का नहीं; रामदास की ऐतिहासिक पहचान अप्रमाणित है।

सन्दर्भ और उपयोग

संस्करण सूचना: एक चयनित 44-इकाई वाले डिजिटल पाठ का सम्पूर्ण पाठ नीचे है—एक आरम्भिक दोहा, एक सोरठा, 40 चौपाइयाँ और दो समापन दोहे। व्याख्या: आरम्भ में समृद्धि को केवल धन तक सीमित न रखकर हृदय की शुद्धता और आशा से जोड़ा गया है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

आरम्भिक सोरठा {#opening-soratha}

भावार्थ: भक्त हाथ जोड़कर जगदम्बा से जीवन मंगलमय बनाने की विनती करता है। व्याख्या: सोरठा लोकभाषा का छन्द है। यहाँ विनती है, किसी गुप्त अनुष्ठान की विधि नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

समापन दोहा 1 {#closing-doha-1}

भावार्थ: समापन दोहे में दुःख दूर करने और शत्रुओं पर विजय की पुकार है। व्याख्या: 'शत्रु' को बाहरी विरोधी या लोभ-क्रोध जैसे भीतर के दोष समझा जा सकता है; हिंसा का निर्देश नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

समापन दोहा 2 {#closing-doha-2}

भावार्थ: रामदास हाथ जोड़कर माता की कृपा-दृष्टि की अंतिम विनती करता है। व्याख्या: अन्तिम स्वर विनम्र प्रार्थना का है, निश्चित लेन-देन का नहीं; रामदास की ऐतिहासिक पहचान अप्रमाणित है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

लक्ष्मी चालीसा क्या है? श्री लक्ष्मी चालीसा उत्तर भारतीय हिन्दी-अवधी प्रभाव वाली देवी-भक्ति रचना है। इसमें लक्ष्मी से करुणा, ज्ञान, अनुकूल परिस्थितियों, सुख-समृद्धि और अन्ततः भक्ति की प्रार्थना की गई है। ऊपर प्रस्तुत चयनित पाठ में एक आरम्भिक दोहा, एक सोरठा, चालीस क्रमांकित चौपाइयाँ और दो अन्तिम दोहे हैं 1। यह गणना इसी पाठ-साक्ष्य की है; सभी पुस्तकों में ठीक यही क्रम और पाठ होना आवश्यक नहीं। इस संस्करण में सबसे पहले सम्पूर्ण मूल पाठ रखा गया है ताकि पाठक उसे सीधे पढ़ सकें। उसके बाद प्रत्येक पद का स्वतंत्र हिंदी भावार्थ और उसका अर्थ-सन्दर्भ दिया गया है। अंग्रेज़ी पृष्ठ पर भी शब्दों का अंग्रेज़ी अनुवाद मूल पाठ के स्थान पर नहीं दिया गया है; वहाँ वही मूल शब्द रोमन हिन्दी में हैं 2। भावार्थ और व्याख्याएँ शिवगोरक्ष के लिए नई तैयार की गई हैं।

चालीस और उन्तालीस चौपाइयों का पाठभेद

यहाँ 44 पाठ-इकाइयाँ हैं, लेकिन चौपाइयाँ 40 हैं: शेष चार इकाइयाँ आरम्भिक दोहा, सोरठा और दो समापन दोहे हैं। दूसरे ऑनलाइन परिवार में केवल 39 चौपाइयाँ मिलती हैं। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स पर एक अन्य आरम्भिक वन्दना तथा कुछ भिन्न शब्द मिलते हैं 4, 5। किसी भी भिन्न पाठ से पंक्तियाँ उठाकर काल्पनिक 'आदर्श पाठ' बनाने के बजाय इस संस्करण ने एक ही 40-चौपाई साक्ष्य को अक्षुण्ण रखा है। अन्तिम चौपाई और दोहे में 'रामदास' नाम आता है। यह रचनाकार की 'छाप' या काव्यगत नाम हो सकता है, किन्तु इससे किसी निश्चित ऐतिहासिक रामदास की पहचान अथवा रचना की शताब्दी सिद्ध नहीं होती। ऐसा दावा करने के लिए काल-निर्धारित पाठ, प्रामाणिक ग्रन्थ-सूची और पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण चाहिए।

लक्ष्मी का अर्थ केवल धन नहीं

लक्ष्मी को शुभता, उन्नति, सौन्दर्य, कल्याण और समृद्धि से जोड़ा जाता है। किंतु इस चालीसा की पहली ही चौपाई में 'ज्ञान बुद्धि विद्या' माँगी गई है और अठारहवीं चौपाई कपट छोड़ने को कहती है। इसलिए लक्ष्मी-भक्ति को केवल धन प्राप्त करने की युक्ति मानना अनुचित होगा। आवश्यकता के लिए पर्याप्त साधन चाहना स्वाभाविक है, परन्तु सही आचरण, न्याय, करुणा और विवेक भी रचना का महत्त्वपूर्ण संदेश हैं। मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम में सुरक्षित सातवीं शताब्दी की लक्ष्मी प्रतिमा यह भी बताती है कि देवी के ऐतिहासिक रूप आज के प्रचलित चित्रों से कहीं अधिक विविध रहे हैं 7। सिन्धु-सुता यानी समुद्र-कन्या का सम्बोधन क्षीरसागर-मंथन की पुराणकथा से सम्बन्ध रखता है। भागवत पुराण, स्कन्ध 8, अध्याय 8 में समुद्र-मंथन से विविध वस्तुओं और लक्ष्मी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है 6। चौदह रत्नों की सूचियाँ और क्रम परम्पराओं में अलग हो सकते हैं; यह काव्य पुराणकथा का स्मरण है, प्रत्यक्ष ऐतिहासिक विवरण नहीं। ब्रिटिश म्यूज़ियम में वर्णित समुद्र-मंथन चित्र में भी लक्ष्मी और अन्य रत्नों की विविध कलात्मक पहचान दिखती है 9।

विष्णु, राम और सीता से सम्बन्ध

चौपाई 12–15 में देवी को प्रभु के विभिन्न अवतारों के साथ रूप बदलकर प्रकट होने वाली बताया गया है। अयोध्या में विष्णु के रामावतार और जनकपुर में सीता का संकेत स्पष्ट है। सीता को लक्ष्मी का रूप मानना एक धार्मिक-वैष्णव परम्परागत पहचान है; यह किसी ऐतिहासिक जन्म का प्रमाण नहीं और न सभी शाक्त दर्शनों की एकमात्र व्याख्या। 'दासी बनि सेवा' जैसी भाषा को भक्त के प्रेमपूर्ण समर्पण के रूप में पढ़ना चाहिए, महिलाओं की सामाजिक अधीनता का आदेश मानकर नहीं। लक्ष्मी-विष्णु सम्बन्ध की ऐतिहासिक प्रतिमाओं में भी क्षेत्रीय रूप-भेद मिलते हैं 8।

रचना की भाव-यात्रा

आरम्भ से नौवीं चौपाई तक माता की कृपा, बुद्धि और दया का स्वर है। दसवीं से सोलहवीं चौपाई में सागर-मंथन, विष्णु और सीता का कथा-संसार खुलता है। सत्रहवीं से बीसवीं में मन-कर्म-वचन, कपट-त्याग और सच्ची सेवा पर बल आता है। इक्कीसवीं से इकतीसवीं में संकटग्रस्त भक्त की इच्छा, पाठ और साधना की परम्परागत भाषा है। अन्तिम चौपाइयों में विनम्रता, क्षमा, दर्शन की लालसा, भक्ति और रामदास नाम की छाप मिलती है। इस क्रम में लक्ष्मी की छवि केवल वरदान-दात्री की नहीं, भक्त के जीवन में विवेक और प्रेम जगाने वाली माता की बनती है।

रोग, संतान और धन सम्बन्धी कथनों को कैसे समझें? चालीसा में रोग-शान्ति, संतान, धन, संकट-मुक्ति और शत्रु-विनाश की पारम्परिक फलश्रुति जैसी पंक्तियाँ हैं। इन्हें मूल पाठ से हटाना उचित नहीं, लेकिन चिकित्सा, संतान-प्राप्ति या आर्थिक परिणाम की वैज्ञानिक गारंटी के रूप में प्रस्तुत करना भी सही नहीं। जरूरत होने पर चिकित्सकीय, मानसिक-स्वास्थ्य, प्रजनन या वित्तीय विशेषज्ञों की सहायता लें। चौबीसवीं चौपाई में बीमारी और दिव्यांगता के लिए पुराने शब्द हैं; वे ऐतिहासिक पाठ का हिस्सा हैं, किसी व्यक्ति की गरिमा या मूल्य का निर्णय नहीं। पच्चीसवीं में विप्र से पाठ करवाने और छब्बीसवीं में चालीस दिनों का कथन मिलता है; शिवगोरक्ष इन्हें पाठ-साक्ष्य के रूप में दिखाता है, सबके लिए अनिवार्य अनुष्ठान नहीं बताता। अन्तिम दोहे में 'शत्रु' को बाहरी विरोध या भीतर के लोभ-क्रोध जैसे अवगुणों के रूप में समझा जा सकता है। यह लेख हिंसा, वैर या किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाने की शिक्षा नहीं देता।

प्रमुख शब्द

श्री / लक्ष्मी: शुभता, सौभाग्य और समृद्धि की देवी; सिन्धु-सुता: समुद्र की पुत्री; क्षीरसागर: समुद्र-मंथन की पुराणकथा का समुद्र; दोहा, सोरठा, चौपाई: लोकभाषा की छन्दात्मक या सम्पादकीय पाठ-इकाइयाँ; भक्ति: प्रेमपूर्वक श्रद्धा; दर्शन: देवी की अनुभूत उपस्थिति और उनके रूप का अवलोकन; फलश्रुति: पाठ के पुण्य या फल की पारम्परिक चर्चा; रामदास: रचना के अन्त में आया नाम, जिसकी ऐतिहासिक पहचान निश्चित नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यहाँ लक्ष्मी चालीसा का पूरा पाठ है? हाँ, चयनित नित्या डिजिटल पाठ के सभी 44 छन्द-इकाइयाँ हैं, जिनमें ठीक चालीस चौपाइयाँ हैं। अन्य पुस्तकों के पाठ-भेद अलग हो सकते हैं।

कुछ जगह 39 चौपाइयाँ क्यों मिलती हैं? वे अलग पाठ-परम्परा या सम्पादकीय विभाजन का अनुसरण करती हैं। हमने भिन्न संस्करण की पंक्तियाँ मिलाकर नया पाठ नहीं बनाया 5।

अंग्रेज़ी पृष्ठ पर शब्द अंग्रेज़ी हो जाते हैं? नहीं। वहाँ पाठ के मूल हिन्दी-अवधी शब्द ही रोमन लिपि में हैं; उनका अलग अंग्रेज़ी भावार्थ आगे मिलता है।

क्या रामदास रचनाकार हैं? अन्त में उनका नाम आता है, पर कोई निश्चित ऐतिहासिक पहचान और रचनाकाल अभी प्रमाणित नहीं।

क्या लक्ष्मी केवल धन की देवी हैं? नहीं। यहाँ ज्ञान, विवेक, निष्कपटता, सेवा, करुणा और भक्ति का भी महत्त्व है।

पाठ से बीमारी, धन या संतान के मामले में निश्चित लाभ होगा? ऐसी वैज्ञानिक गारंटी नहीं दी जा सकती। ये पाठ के श्रद्धापूर्ण कथन हैं, विशेषज्ञ चिकित्सा या व्यवहारिक योजना का विकल्प नहीं।

सिन्धु-सुता का अर्थ क्या है? समुद्र की पुत्री; क्षीरसागर-मंथन की देवी-प्राकट्य कथा से सम्बन्धित नाम।

क्या पुरोहित बुलाना और चालीस दिन पाठ करना सबके लिए ज़रूरी है? यह एक चयनित रचना में वर्णित परम्परा है, शिवगोरक्ष द्वारा निर्देशित सार्वभौम आवश्यकता नहीं।

क्या इस फाइल को सीधे प्रकाशित कर सकते हैं? नहीं।

मूल स्रोत और संदर्भ

  • 1 https://getnitya.com/data/lakshmi/lakshmi-chalisa/dev.json
  • 2 https://getnitya.com/data/lakshmi/lakshmi-chalisa/roman.json
  • 3 https://getnitya.com/en/about/data/
  • 4 https://sanskritdocuments.org/doc_z_otherlang_hindi/laxmi40.html
  • 5 https://valkala.com/lakshmi-chalisa
  • 6 https://webmail.bhagavata.org/canto8/chapter8.html
  • 7–9 विस्तृत संग्रहालय स्रोत स्रोत-सूची में हैं।
स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Text-only source: Nitya (getnitya.com), permitted for any purpose. Romanization, meanings and explanations newly prepared by ShivGoraksh.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Opening Doha

    Matu Lakshmi Kari Kripa, Karo Hriday Mein Vaas Manokamna Siddh Kari, Puravahu Meri Aas

  2. Opening Soratha

    Yahi Mor Ardas, Haath Jod Vinti Karun Sab Vidhi Karau Suvas, Jai Janani Jagdambika

  3. Chaupai 1

    Sindhu Suta Main Sumirau Tohi Gyan Buddhi Vidya Do Mohi

  4. Chaupai 2

    Tum Saman Nahin Koi Upkari Sab Vidhi Puravahu Aas Hamari

  5. Chaupai 3

    Jai Jai Jagat Janani Jagdamba Sabki Tum Hi Ho Avalamba

  6. Chaupai 4

    Tum Hi Ho Sab Ghat Ghat Vasi Vinti Yahi Hamari Khasi

  7. Chaupai 5

    Jag Janani Jai Sindhu Kumari Deenan Ki Tum Ho Hitkari

  8. Chaupai 6

    Vinvau Nitya Tumahin Maharani Kripa Karau Jag Janani Bhavani

  9. Chaupai 7

    Kehi Vidhi Stuti Karau Tihari Sudhi Lijai Apradh Bisari

  10. Chaupai 8

    Kripa Drishti Chitavo Mam Ori Jag Janani Vinti Sun Mori

  11. Chaupai 9

    Gyan Buddhi Jai Sukh Ki Data Sankat Haro Hamari Mata

  12. Chaupai 10

    Ksheer Sindhu Jab Vishnu Mathayo Chaudah Ratna Sindhu Mein Payo

  13. Chaupai 11

    Chaudah Ratna Mein Tum Sukhrasi Seva Kiyo Prabhu Bani Dasi

  14. Chaupai 12

    Jab Jab Janam Jahan Prabhu Linha Roop Badal Tahan Seva Kinha

  15. Chaupai 13

    Swayam Vishnu Jab Nar Tanu Dhara Linheu Avadhpuri Avatara

  16. Chaupai 14

    Tab Tum Pragat Janakpur Mahin Seva Kiyo Hriday Pulkahin

  17. Chaupai 15

    Apnayo Tohi Antaryami Vishva Vidit Tribhuvan Ki Swami

  18. Chaupai 16

    Tum Sam Prabal Shakti Nahin Aani Kahan Lau Mahima Kahau Bakhani

  19. Chaupai 17

    Man Kram Vachan Karai Sevkai Man Ichchhit Vanchhit Phal Pai

  20. Chaupai 18

    Taji Chhal Kapat Aur Chaturai Poojahin Vividh Bhanti Man Lai

  21. Chaupai 19

    Aur Haal Main Kahau Bujhai Jo Yah Path Karai Man Lai

  22. Chaupai 20

    Tako Koi Kasht Na Hoi Man Ichchhit Pavai Phal Soi

  23. Chaupai 21

    Trahi Trahi Jai Dukh Nivarini Trividh Taap Bhav Bandhan Harini

  24. Chaupai 22

    Jo Chalisa Padhai Padhavai Dhyan Lagakar Sunai Sunavai

  25. Chaupai 23

    Takau Koi Na Rog Satavai Putra Aadi Dhan Sampatti Pavai

  26. Chaupai 24

    Putraheen Aru Sampati Heena Andh Badhir Kodhi Ati Deena

  27. Chaupai 25

    Vipra Bolay Kai Path Karavai Shanka Dil Mein Kabhi Na Lavai

  28. Chaupai 26

    Path Karavai Din Chalisa Ta Par Kripa Karain Gaurisa

  29. Chaupai 27

    Sukh Sampatti Bahut Si Pavai Kami Nahin Kahu Ki Aavai

  30. Chaupai 28

    Barah Maas Karai Jo Pooja Tehi Sam Dhanya Aur Nahin Dooja

  31. Chaupai 29

    Pratidin Path Karai Man Mahin Un Sam Koi Jag Mein Kahun Nahin

  32. Chaupai 30

    Bahuvidhi Kya Main Karau Badai Ley Pariksha Dhyan Lagai

  33. Chaupai 31

    Kari Vishvas Karai Vrat Nema Hoy Siddh Upjai Ur Prema

  34. Chaupai 32

    Jai Jai Jai Lakshmi Bhavani Sab Mein Vyapit Ho Gun Khani

  35. Chaupai 33

    Tumhro Tej Prabal Jag Mahin Tum Sam Kou Dayalu Kahun Nahin

  36. Chaupai 34

    Mohi Anath Ki Sudhi Ab Lijai Sankat Kaati Bhakti Mohi Dijai

  37. Chaupai 35

    Bhool Chook Kari Kshama Hamari Darshan Dijai Dasha Nihari

  38. Chaupai 36

    Bin Darshan Vyakul Adhikari Tumahi Achhat Dukh Sahte Bhari

  39. Chaupai 37

    Nahin Mohin Gyan Buddhi Hai Tan Mein Sab Janat Ho Apne Man Mein

  40. Chaupai 38

    Roop Chaturbhuj Karke Dharan Kasht Mor Ab Karahu Nivaran

  41. Chaupai 39

    Kehi Prakar Main Karau Badai Gyan Buddhi Mohi Nahin Adhikai

  42. Chaupai 40

    Ramdas Ab Kahai Pukari Karo Door Tum Vipati Hamari

  43. Closing Doha 1

    Trahi Trahi Dukh Harini, Haro Begi Sab Traas Jayati Jayati Jai Lakshmi, Karo Shatru Ko Naash

  44. Closing Doha 2

    Ramdas Dhari Dhyan Nit, Vinay Karat Kar Jor Matu Lakshmi Das Par, Karahu Daya Ki Kor

स्रोत, अधिकार और समीक्षा की स्थिति

मूल पाठ-साक्ष्य: नित्या के 40-चौपाई वाले देवनागरी डेटा 1 और उसी की रोमन-हिन्दी फाइल 2। नित्या अपने पारम्परिक मूल पाठ को सार्वजनिक क्षेत्र में बताता है, किन्तु अपनी आधुनिक अर्थ-व्याख्याओं को अलग लाइसेंस देता है 3। यहाँ उसकी अर्थ-व्याख्या कॉपी नहीं की गई है। सार्वजनिक क्षेत्र का प्रकाशकीय दावा हर देश में कानूनी अधिकार-स्वीकृति या प्राचीन रचनाकार की पहचान का स्वतंत्र प्रमाण नहीं है। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के स्वयंसेवी प्रतिलेखन को बिना अनुमति पुनः प्रकाशित न करने की चेतावनी है; इसलिए वह केवल तुलना के लिए देखा गया 4। स्वतंत्र पुरानी मुद्रित प्रति से पंक्ति-पंक्ति मिलान, ऐतिहासिक लेखक-समीक्षा, मूल अधिकार, दोनों भाषाओं का विशेषज्ञ परीक्षण और चित्र-फाइल जाँच बाकी है। अभी लेख साइट पर प्रकाशित अथवा आदेश (Aadesh) में सम्मिलित करने के लिए स्वीकृत नहीं है।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

चौपाई 1 {#chaupai-01}

भावार्थ: भक्त समुद्र-कन्या लक्ष्मी से ज्ञान, बुद्धि और विद्या माँगता है। व्याख्या: ज्ञान की माँग बताती है कि लक्ष्मी की कृपा को केवल धन-संग्रह समझना अधूरा होगा। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 2 {#chaupai-02}

भावार्थ: भक्त माता को अनुपम उपकारी मानकर अपनी आशाओं की पूर्ति चाहता है। व्याख्या: यह भक्ति की कृतज्ञ भाषा है, आर्थिक सफलता की किसी निश्चित गारंटी का दावा नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 3 {#chaupai-03}

भावार्थ: सबका आधार कही गई जगज्जननी जगदम्बा की जय हो। व्याख्या: 'जगदम्बा' व्यापक देवी-भक्ति की भाषा है; विभिन्न परम्पराओं में देवी-रूपों की व्याख्या एक-सी नहीं होती। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 4 {#chaupai-04}

भावार्थ: माता को प्रत्येक हृदय में विराजमान मानकर भक्त अपनी विशेष प्रार्थना रखता है। व्याख्या: 'घट-घट' भीतर की दिव्य उपस्थिति का काव्यात्मक बोध कराता है, कोई भौतिक स्थान-विवरण नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 5 {#chaupai-05}

भावार्थ: समुद्र-कुमारी को दीन-दुःखियों की हितैषी कहा गया है। व्याख्या: दीनजनों के प्रति करुणा समृद्धि के साथ सेवा और उत्तरदायित्व की सीख जोड़ती है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 6 {#chaupai-06}

भावार्थ: भक्त महारानी जगज्जननी से प्रतिदिन कृपा की प्रार्थना करता है। व्याख्या: 'भवानी' यहाँ देवी का भावमय सम्बोधन है; उससे सभी सम्प्रदायों का एक ही दर्शन सिद्ध नहीं होता। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 7 {#chaupai-07}

भावार्थ: अपनी स्तुति को अपर्याप्त मानकर भक्त दोष भुलाकर उसकी सुध लेने को कहता है। व्याख्या: अपनी कमी स्वीकार करना दर्शाता है कि श्रद्धा केवल निर्दोष उच्चारण पर निर्भर नहीं करती। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 8 {#chaupai-08}

भावार्थ: भक्त माता से कृपादृष्टि करके अपनी विनती सुनने का अनुरोध करता है। व्याख्या: 'कृपादृष्टि' अपनापन और भरोसा व्यक्त करने वाला भक्ति-साहित्य का परिचित बिम्ब है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 9 {#chaupai-09}

भावार्थ: लक्ष्मी को ज्ञान-बुद्धि और सुख की दात्री मानकर संकट हरने को कहा गया है। व्याख्या: चयनित पाठ का 'ज्ञान बुद्धि जय सुख' पाठ ज्यों का त्यों रखा गया है; दूसरे पाठभेद अलग दर्ज हैं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 10 {#chaupai-10}

भावार्थ: स्तुति क्षीरसागर-मंथन तथा चौदह रत्नों की कथा स्मरण करती है। व्याख्या: रत्नों की सूची अलग ग्रन्थों में बदल सकती है; यह पुराण-कथा है, दिनांकित इतिहास नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 11 {#chaupai-11}

भावार्थ: लक्ष्मी को समुद्र से प्राप्त सुखराशि और प्रभु की सेविका के रूप में चित्रित किया गया है। व्याख्या: 'दासी' यहाँ भक्ति-सेवा की काव्य-भाषा है, महिलाओं की सामाजिक अधीनता का नियम नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 12 {#chaupai-12}

भावार्थ: प्रभु के विविध अवतारों के साथ देवी भी बदलते रूप में उनकी सेवा करती हैं। व्याख्या: यह वैष्णव भक्ति का भाव है; सभी शाक्त परम्पराएँ देवी और विष्णु के सम्बन्ध को समान रूप में नहीं रखतीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 13 {#chaupai-13}

भावार्थ: चौपाई अयोध्या में विष्णु के मानवावतार का स्मरण करती है। व्याख्या: यहाँ संकेत रामावतार की ओर है, जिसे परम्परा विष्णु के अवतार के रूप में समझती है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 14 {#chaupai-14}

भावार्थ: लक्ष्मी को जनकपुर में प्रकट हुई सीता और प्रेमपूर्वक सेवा करने वाली माना गया है। व्याख्या: सीता-लक्ष्मी की पहचान धार्मिक परम्परा का कथन है, ऐतिहासिक जन्म का प्रलेखित प्रमाण नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 15 {#chaupai-15}

भावार्थ: अन्तर्यामी प्रभु उन्हें स्वीकारते हैं और वे त्रिभुवन की स्वामिनी कही जाती हैं। व्याख्या: 'त्रिभुवन की स्वामी' देवी की गरिमा का स्तुतिपरक विशेषण है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 16 {#chaupai-16}

भावार्थ: भक्त कहता है कि देवी की शक्ति और महिमा का पूरा वर्णन सम्भव नहीं। व्याख्या: महिमा वर्णन में भाषा की सीमा स्वीकारना स्तुति-काव्य की सामान्य विशेषता है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 17 {#chaupai-17}

भावार्थ: मन, कर्म और वचन से सेवा करने वाला इच्छित फल पाने की आशा रखता है। व्याख्या: मन-कर्म-वचन की एकता आचरण की सच्चाई पर बल देती है, देवी के साथ सौदेबाजी पर नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 18 {#chaupai-18}

भावार्थ: छल-कपट छोड़कर मन लगाकर की गई पूजा को महत्त्व दिया गया है। व्याख्या: इस चौपाई का मुख्य संदेश बाहरी दिखावे से अधिक निष्कपट भाव है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 19 {#chaupai-19}

भावार्थ: कवि एकाग्र मन से पाठ करने वालों के विषय में अगला आश्वासन कहता है। व्याख्या: इसका वाक्य अगली चौपाई में पूरा होता है; दोनों को साथ पढ़ना उचित है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 20 {#chaupai-20}

भावार्थ: स्तुति मन लगाकर पाठ करने वाले के कष्ट दूर होने और इच्छित फल पाने का आश्वासन देती है। व्याख्या: यह पारम्परिक फलश्रुति जैसी भक्ति-आश्वासन की भाषा है, परिणामों का प्रमाणित वादा नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 21 {#chaupai-21}

भावार्थ: भक्त त्रिविध ताप तथा संसार-बन्धन से उबारने की करुण पुकार करता है। व्याख्या: 'त्रिविध ताप' की व्याख्या विविध दर्शन करते हैं; यह पद किसी एक पद्धति को अनिवार्य नहीं बनाता। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 22 {#chaupai-22}

भावार्थ: ध्यान से चालीसा पढ़ने-पढ़वाने तथा सुनने-सुनाने वालों की चर्चा है। व्याख्या: यहाँ सामूहिक या व्यक्तिगत पाठ का उल्लेख है, हर पाठक के लिए बाध्यकारी नियम नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 23 {#chaupai-23}

भावार्थ: चौपाई रोग न सताने, संतान और समृद्धि मिलने की भक्तिपरक बात कहती है। व्याख्या: इसे रोग-उपचार, संतान-प्राप्ति अथवा धन-लाभ की निश्चित गारंटी न मानें; आवश्यकता पर उचित विशेषज्ञ सहायता लें। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 24 {#chaupai-24}

भावार्थ: स्तुति संतानहीनता, निर्धनता, दृष्टि या श्रवण-असमर्थता और कुष्ठ जैसे कष्टों का उल्लेख करती है। व्याख्या: पुराने शब्द कभी कलंकित करने वाले लग सकते हैं; रोग या दिव्यांगता किसी व्यक्ति की गरिमा कम नहीं करती। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 25 {#chaupai-25}

भावार्थ: पंक्ति में विप्र को बुलाकर पाठ करवाने और मन में शंका न रखने का उल्लेख है। व्याख्या: यह स्रोत की पारम्परिक विधि-सूचना है; यह शैक्षिक लेख उसे पाठक पर अनिवार्य नहीं करता। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 26 {#chaupai-26}

भावार्थ: चालीस दिन पाठ और गौरीश की कृपा का उल्लेख मिलता है। व्याख्या: 'गौरीश' शिव का नाम है; इससे यह रचना शिव-केंद्रित अनुष्ठान-निर्देश नहीं बन जाती। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 27 {#chaupai-27}

भावार्थ: भक्त सुख-सम्पत्ति मिलने और अभाव दूर होने का विश्वास व्यक्त करता है। व्याख्या: इस आशा को पहले कही गई सत्यनिष्ठा और करुणा की शिक्षा से जोड़कर समझें। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 28 {#chaupai-28}

भावार्थ: बारहों मास पूजा करने वाले की निष्ठा की प्रशंसा है। व्याख्या: सालभर स्मरण भक्ति का आदर्श है; सबके लिए एक समय-सारणी का विधान नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 29 {#chaupai-29}

भावार्थ: प्रतिदिन मन लगाकर पाठ करने वाले को अत्यन्त धन्य कहा गया है। व्याख्या: निरन्तरता की प्रशंसा काव्यात्मक है; पाठ की संख्या से लोगों की भक्ति को तौलना उचित नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 30 {#chaupai-30}

भावार्थ: कवि कहता है कि महिमा-वर्णन अपर्याप्त है और ध्यानपूर्वक अनुभव की ओर संकेत करता है। व्याख्या: 'लेय परीक्षा' के असंदिग्ध अर्थ को लेकर पाठभेद सम्भव हैं; इसे चमत्कार जाँचने की वैज्ञानिक विधि न समझें। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 31 {#chaupai-31}

भावार्थ: विश्वास और नियम के साथ भक्ति करने पर हृदय में प्रेम बढ़ने की बात कही है। व्याख्या: 'प्रेम' को उपलब्धि मानना इस पद का आन्तरिक, गैर-भौतिक अर्थ खोलता है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 32 {#chaupai-32}

भावार्थ: सर्वव्यापी गुणों की खान लक्ष्मी भवानी की जय कही गई है। व्याख्या: 'भवानी' यहाँ व्यापक देवी-एकत्व का भक्तिभाव है, सर्वमान्य दार्शनिक समीकरण नहीं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 33 {#chaupai-33}

भावार्थ: देवी के प्रबल तेज और अनुपम दयालुता की स्तुति है। व्याख्या: शक्ति और दया साथ आने से लक्ष्मी का स्वरूप धन तक सीमित नहीं रहता। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 34 {#chaupai-34}

भावार्थ: अपने को अनाथ बताकर भक्त संकट से रक्षा और भक्ति देने को कहता है। व्याख्या: संकट-निवारण के साथ भक्ति माँगना बताता है कि देवी से सम्बन्ध स्वयं में महत्त्वपूर्ण है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 35 {#chaupai-35}

भावार्थ: भक्त भूल-चूक के लिए क्षमा और अपनी दशा देखकर दर्शन की विनती करता है। व्याख्या: दर्शन की कामना भक्ति की अंतरंग भाषा है; इसे निश्चित प्रत्यक्ष घटना का वादा नहीं बनाना चाहिए। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 36 {#chaupai-36}

भावार्थ: देवी की उपस्थिति के बावजूद दर्शन के अभाव में भक्त व्याकुलता कहता है। व्याख्या: देवी के निकट माने जाने और विरह अनुभव करने का तनाव भक्ति-काव्य में परिचित है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 37 {#chaupai-37}

भावार्थ: भक्त अपनी अल्पबुद्धि स्वीकारकर देवी को अंतर्यामी मानता है। व्याख्या: यह पंक्ति ज्ञान का निषेध नहीं, अपनी सीमा स्वीकारने की विनम्रता है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 38 {#chaupai-38}

भावार्थ: लक्ष्मी के चतुर्भुज रूप से कष्ट दूर करने की प्रार्थना है। व्याख्या: चार भुजाएँ प्रसिद्ध प्रतिमा-रूप हैं; ऐतिहासिक मूर्तियों में रूप-भेद भी मिलते हैं। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 39 {#chaupai-39}

भावार्थ: कवि पुनः अपनी अल्प विद्या बताकर पर्याप्त स्तुति न कर पाने की बात कहता है। व्याख्या: विनम्रता की यह पुनरावृत्ति अगली चौपाई में आने वाली नाम-छाप की भूमिका बनती है। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 40 {#chaupai-40}

भावार्थ: 'रामदास' नाम की छाप वाला वक्ता देवी से विपत्ति दूर करने को कहता है। व्याख्या: 'रामदास' नाम-छाप मात्र से किसी निश्चित ऐतिहासिक व्यक्ति या रचनाकाल की पुष्टि नहीं होती। स्थायी पाठ-ID: सम्बन्धित पाठ · 1

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  2. Lakshmi Chalisa — Nitya Roman (easy) parallel open-data witness · स्रोत खोलें
  3. Nitya Open Data: Licensing and reuse statement · स्रोत खोलें
  4. Shri Laxmi Chalisa (laxmi40.itx) · स्रोत खोलें
  5. Shri Lakshmi Chalisa: 39-chaupai edition and variant audit · स्रोत खोलें
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  7. Lakshmi, Goddess of Prosperity — 7th century brass · स्रोत खोलें
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