संपादकीय स्रोत-सूचना: नीचे 1 के चयनित ऑनलाइन पाठ की टेक तथा चार विस्तृत पद दिए गए हैं। टेक-दोहराव उसी पाठ से लिया गया है। यह अप्रकाशित कार्यकारी पाठ है; किसी ऐतिहासिक संस्करण से अंतिम मिलान और अधिकार-जाँच लंबित हैं।
हर पाठ-खंड का सरल अर्थ और व्याख्या
टेक — टेक — कुंजबिहारी, गिरिधर और मुरारी
सरल अर्थ: हम ब्रज के कुंजों में विहार करने वाले, गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले और मुर असुर का वध करने वाले श्रीकृष्ण की आरती करते हैं। भाव और संदर्भ: तीन नामों में भक्ति के तीन भाव साथ आते हैं। “कुंजबिहारी” वृन्दावन के निकुंजों में विहार करने वाले कृष्ण हैं। “गिरिधर” गोवर्धन उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करने वाले कृष्ण की स्मृति है 3। “मुरारी” मुर नामक असुर के वध की भागवत-कथा की ओर संकेत करता है 4। ये तीन अलग देवता नहीं, कृष्ण के विशेषण हैं। यहाँ आरती स्तुति है; दीप घुमाने की कोई निश्चित संख्या इससे निर्धारित नहीं होती।
यह आरती क्या है?
“आरती कुंजबिहारी की” श्रीकृष्ण को संबोधित ब्रज-प्रभावित हिंदी का लोकप्रिय भक्तिगीत है। “कुंज” का अर्थ लताओं और वृक्षों से घिरा उपवन है और “बिहारी” वहाँ विहार करने वाले को कहते हैं। इस नाम में वृन्दावन का अंतरंग परिवेश जीवित हो उठता है। यह पूरी कृष्ण-जीवनी को क्रम से सुनाने वाला ग्रंथ नहीं, बल्कि सौंदर्य, संगीत, स्मरण और विनती के अनेक चित्रों से बनी आरती है। 1
पहले पदों में कृष्ण का रूप, राधा का साथ, ग्वाल-बालों का परिवेश और वाद्यों की ध्वनि उभरती है। फिर गंगाजी तथा शिव की जटाओं का उल्लेख आता है। अंतिम पद में देवता का रूप वर्णन करते-करते भक्त स्वयं बोल उठता है—मेरी पुकार भी सुनिए। दर्शन से विनय तक की यह यात्रा इस आरती के भाव को विशेष बनाती है।
भाषा, परंपरा और रचनाकार
आरती में “बजावै”, “बिलसै”, “ठाढ़े”, “स्मरन”, “रेनू” और “बेनू” जैसे ब्रज के निकट शब्द मिलते हैं। इन्हें केवल आधुनिक हिंदी का अशुद्ध रूप मानकर बदल देना उचित नहीं। सामूहिक गायन में विराम, टेक, अंतरे और अतिरिक्त आवृत्तियाँ बदल सकती हैं। यह वैदिक संस्कृत का सूक्त नहीं, स्थानीय बोलचाल और भक्ति-काव्य से जुड़ा गीत है। रचयिता और रचना-काल प्रमाणित नहीं हैं। एक संगीत-कंपनी के अभिलेख में गीतकार “Traditional” दर्ज है, पर इससे किसी विशेष कवि की रचना सिद्ध नहीं होती 7। गीता प्रेस के आरती-संग्रह का OCR पाठ भी देखा गया है; उसमें पाँच वर्णनात्मक पद और कुछ भिन्न शब्द हैं, किंतु संबंधित मुद्रित पन्नों का दृश्य-सत्यापन नहीं हुआ है 2। अतः चयनित ऑनलाइन रूप को लेखक-निर्धारित सर्वप्रथम पाठ नहीं कहा गया है।
आरती के पाँच प्रमुख भाव
१. प्रेम और सान्निध्य: राधा एवं गोपियाँ कृष्ण के प्रति आत्मीय भक्ति का काव्यात्मक वातावरण रचती हैं। भिन्न वैष्णव मत इसकी व्याख्या अलग-अलग शब्दावली में करते हैं। २. शरण और संरक्षण: “गिरिधर” नाम ब्रजवासियों को गोवर्धन के नीचे आश्रय देने की भागवत-कथा याद कराता है 3। ३. सौंदर्य से स्मरण: मुरली, मोरमुकुट, वनमाला, चाँदनी और नदी-तट ध्यान तथा भाव-जागरण के चित्र हैं; ये किसी घटना के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं। ४. वैष्णव-शैव प्रतीकों का संगम: गंगा-पद में हरि के चरण और शिव की जटाएँ साथ आते हैं 5। इससे दोनों परंपराओं की सभी दार्शनिक मान्यताएँ एक जैसी सिद्ध नहीं हो जातीं। ५. विनय का स्वर: “भव-फंद” से छुड़ाने की प्रार्थना धार्मिक विश्वास की भाषा है; इससे कोई वैज्ञानिक रूप से निश्चित फल या सभी समस्याओं का उपचार सिद्ध नहीं होता।
चयनित पाठ, टेक और पाठभेद
आधार: Drik Panchang पर उपलब्ध पढ़ने योग्य पाठ, जिसमें आरंभिक टेक और चार लंबे वर्णनात्मक पद हैं। प्रत्येक पद के बाद टेक के लिए “x2” संकेत मिलता है। इस लेख में प्रत्येक पद के बाद पूरी टेक दो बार लिखी गई है, ताकि गायन-आवृत्ति स्पष्ट रहे। इसे पुरातन हस्तलिखित प्रमाण का रूप नहीं बताया गया। 1
अलग पाठ: “गिरिधर/गिरधर”, कुछ वाद्यनामों की वर्तनी तथा “दीन भिखारी/दीन दुखारी” जैसे पाठभेद मिलते हैं। किसी आधुनिक रिकॉर्डिंग के आरंभ में पृथक कृष्ण-वंदना जुड़ सकती है, पर उसे यहाँ चयनित आरती का अनिवार्य पद नहीं बनाया गया है। 6 7
मूल प्रमाण की सीमा: गीता प्रेस की पुस्तक का OCR पाठ भी देखा गया है; वहाँ पहले दो वर्णनात्मक खंड अलग-अलग पदों में हैं। मूल स्कैन-पृष्ठ से शब्द-शब्द दृश्य मिलान अब भी लंबित है। इसी तरह आधुनिक ऑनलाइन पाठ को सार्वजनिक वेबसाइट पर दोबारा छापने के अधिकार की मंजूरी अभी नहीं मिली है। 2
आरती कब गाई जाती है? कृष्ण-भक्ति में इस आरती का पाठ घर, मंदिर और जन्माष्टमी जैसे उत्सवों के संदर्भ में किया जाता है। लेकिन पाठ में कोई सार्वभौमिक अनिवार्य घड़ी या नियत गणना नहीं लिखी है। तिथि और समय के लिए अलग सत्यापित पंचांग/कैलेंडर आवश्यक है। यह लेख भक्ति-पाठ और अर्थ के लिए है, विशेष पूजा-विधि का निर्देश नहीं।
शब्दार्थ-संग्रह
| शब्द | इस आरती में अर्थ |
|---|---|
| कुंजबिहारी | वृन्दावन के निकुंजों में विहार करने वाले कृष्ण |
| गिरिधर | गोवर्धन पर्वत उठाने वाले |
| मुरारी | मुर असुर का वध करने वाले कृष्ण |
| बैजंती | पारंपरिक पुष्पमाला का नाम |
| वनमाली | वनमाला धारण करने वाले |
| आली | सखी या सहचरी के लिए काव्य-संबोधन |
| दरसन | दर्शन |
| रेनू | धूल या महीन रेत |
| बेनू | बाँसुरी |
| भव-फंद | सांसारिक उलझन या बंधन की उपमा |





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
पद 1 — वनमाली, राधिका और मुरली
सरल अर्थ: कृष्ण के गले में वैजयंती माला है, वे मधुर मुरली बजाते हैं और कानों में कुण्डल चमकते हैं। नंद के प्रिय लाला लताओं के बीच खड़े हैं; उनका श्यामल शरीर, भौंरों-सी अलकें और कस्तूरी का तिलक मन मोहते हैं। पास में राधिका की छवि दमकती है। भाव और संदर्भ: पहला विस्तृत पद कृष्ण-दर्शन का काव्यात्मक चित्र बनाता है। “वनमाली” वन-फूलों की माला धारण करने वाले हैं; “आली” ब्रज-काव्य में सखी का संबोधन भी हो सकता है। श्याम कांति यहाँ सौंदर्य और भक्ति की भाषा है, किसी खगोलीय रंग का वैज्ञानिक वर्णन नहीं। माला, मुरली, कुण्डल और अलकों से आरम्भ होकर कविता राधा-कृष्ण की संयुक्त छवि तक पहुँचती है। अलग-अलग वैष्णव परम्पराओं में इस छवि की व्याख्या का स्वर कुछ भिन्न हो सकता है।
पद 2 — मोरमुकुट, वाद्य और गोपी-समुदाय
सरल अर्थ: कृष्ण का स्वर्णाभ मोरमुकुट शोभित है; देवता भी उनके दर्शन के लिए लालायित हैं। आकाश से पुष्प-वर्षा का भाव आता है, मुरचंग और मृदंग जैसे वाद्य बजते हैं और गोपियों का अनुपम प्रेम व्यक्त होता है। भाव और संदर्भ: देवताओं की दर्शन-लालसा और पुष्पवृष्टि भक्ति-काव्य की उत्कट स्तुति हैं, किसी तिथि-विशेष की ऐतिहासिक रिपोर्ट नहीं। “मुरचंग” जैसे वाद्यनाम का वर्तनी-सत्यापन मुद्रित पाठ से करना बाकी है; इसे अपनी सुविधा से किसी दूसरे वाद्य के नाम में नहीं बदला गया। “रति” इस संदर्भ में गहन अनुराग का काव्यात्मक बोध कराती है; इसका एक ही आचरण-नियम सब पर थोपना उचित नहीं।
पद 3 — गंगाजी और चरण-महिमा
सरल अर्थ: आरती गंगाजी को हरि के चरणों से संबद्ध पवित्र धारा मानकर उनकी महिमा गाती है। गंगा कलियुग की मलिनता दूर करने वाली कही गई हैं; शिव उन्हें अपनी जटाओं में धारण करते हैं। ईश्वर-स्मरण से मोह दूर होने का भक्तिपरक भाव व्यक्त होता है। भाव और संदर्भ: भागवतपुराण 5.17 में गंगा को विष्णु के चरण से जोड़ने वाला आख्यान मिलता है 5। शिव की जटाओं का उल्लेख गंगावतरण की व्यापक कथापरम्परा से संवाद करता है और वैष्णव-शैव प्रतीकों को जोड़ता है। “बनवारी” वन में विहार करने वाले कृष्ण का एक नाम है। “अघ हरना” आरती का धार्मिक विश्वास है; इसे प्रयोगशाला में सिद्ध परिणाम या अपने कर्मों की जिम्मेदारी से छूट बताना गलत होगा।
पद 4 — वृन्दावन का तट और विनम्र प्रार्थना
सरल अर्थ: नदी के तट की उज्ज्वल रेत चमकती है, वृन्दावन में बांसुरी की धुन है और चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल तथा गायें हैं। चाँदनी और मंद मुस्कान की छवि के बीच भक्त विनती करता है—हे प्रभु, इस दीन याचक की पुकार सुनिए और संसार के बंधनों से उबारिए। भाव और संदर्भ: “रेनू” रज या रेत और “बेनू” बाँसुरी का ब्रजी रूप है। “भव-फंद” संसार में उलझन या आवागमन के बंधन की भक्ति-उपमा है। “दीन भिखारी” भक्त की विनम्रता का शब्द है; इससे गरीबी और आध्यात्मिकता के बीच कोई अनिवार्य समानता नहीं बनती। कुछ गायन-रूपों में “दीन दुखारी” भी मिलता है। दोनों पाठों को अलग दर्ज किया गया है।