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आरती

आरती कुंजबिहारी की — श्रीकृष्ण आरती

कृष्ण की ब्रज-प्रभावित आरती—टेक सहित चार पद, उनके अर्थ, स्रोत और पाठभेद।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

अर्थ

हम ब्रज के कुंजों में विहार करने वाले, गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले और मुर असुर का वध करने वाले श्रीकृष्ण की आरती करते हैं।

व्याख्या

तीन नामों में भक्ति के तीन भाव साथ आते हैं। “कुंजबिहारी” वृन्दावन के निकुंजों में विहार करने वाले कृष्ण हैं। “गिरिधर” गोवर्धन उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करने वाले कृष्ण की स्मृति है 3। “मुरारी” मुर नामक असुर के वध की भागवत-कथा की ओर संकेत करता है 4। ये तीन अलग देवता नहीं, कृष्ण के विशेषण हैं। यहाँ आरती स्तुति है; दीप घुमाने की कोई निश्चित संख्या इससे निर्धारित नहीं होती।

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला। गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चन्द्र सी झलक; ललित छवि श्यामा प्यारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

अर्थ

कृष्ण के गले में वैजयंती माला है, वे मधुर मुरली बजाते हैं और कानों में कुण्डल चमकते हैं। नंद के प्रिय लाला लताओं के बीच खड़े हैं; उनका श्यामल शरीर, भौंरों-सी अलकें और कस्तूरी का तिलक मन मोहते हैं। पास में राधिका की छवि दमकती है।

व्याख्या

पहला विस्तृत पद कृष्ण-दर्शन का काव्यात्मक चित्र बनाता है। “वनमाली” वन-फूलों की माला धारण करने वाले हैं; “आली” ब्रज-काव्य में सखी का संबोधन भी हो सकता है। श्याम कांति यहाँ सौंदर्य और भक्ति की भाषा है, किसी खगोलीय रंग का वैज्ञानिक वर्णन नहीं। माला, मुरली, कुण्डल और अलकों से आरम्भ होकर कविता राधा-कृष्ण की संयुक्त छवि तक पहुँचती है। अलग-अलग वैष्णव परम्पराओं में इस छवि की व्याख्या का स्वर कुछ भिन्न हो सकता है।

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं। गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग; अतुल रति गोप कुमारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

अर्थ

कृष्ण का स्वर्णाभ मोरमुकुट शोभित है; देवता भी उनके दर्शन के लिए लालायित हैं। आकाश से पुष्प-वर्षा का भाव आता है, मुरचंग और मृदंग जैसे वाद्य बजते हैं और गोपियों का अनुपम प्रेम व्यक्त होता है।

व्याख्या

देवताओं की दर्शन-लालसा और पुष्पवृष्टि भक्ति-काव्य की उत्कट स्तुति हैं, किसी तिथि-विशेष की ऐतिहासिक रिपोर्ट नहीं। “मुरचंग” जैसे वाद्यनाम का वर्तनी-सत्यापन मुद्रित पाठ से करना बाकी है; इसे अपनी सुविधा से किसी दूसरे वाद्य के नाम में नहीं बदला गया। “रति” इस संदर्भ में गहन अनुराग का काव्यात्मक बोध कराती है; इसका एक ही आचरण-नियम सब पर थोपना उचित नहीं।

गंगाजी और चरण-महिमा

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा। स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच; चरन छवि श्रीबनवारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

अर्थ

आरती गंगाजी को हरि के चरणों से संबद्ध पवित्र धारा मानकर उनकी महिमा गाती है। गंगा कलियुग की मलिनता दूर करने वाली कही गई हैं; शिव उन्हें अपनी जटाओं में धारण करते हैं। ईश्वर-स्मरण से मोह दूर होने का भक्तिपरक भाव व्यक्त होता है।

व्याख्या

भागवतपुराण 5.17 में गंगा को विष्णु के चरण से जोड़ने वाला आख्यान मिलता है 5। शिव की जटाओं का उल्लेख गंगावतरण की व्यापक कथापरम्परा से संवाद करता है और वैष्णव-शैव प्रतीकों को जोड़ता है। “बनवारी” वन में विहार करने वाले कृष्ण का एक नाम है। “अघ हरना” आरती का धार्मिक विश्वास है; इसे प्रयोगशाला में सिद्ध परिणाम या अपने कर्मों की जिम्मेदारी से छूट बताना गलत होगा।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू। चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद; टेर सुन दीन भिखारी की॥

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

अर्थ

नदी के तट की उज्ज्वल रेत चमकती है, वृन्दावन में बांसुरी की धुन है और चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल तथा गायें हैं। चाँदनी और मंद मुस्कान की छवि के बीच भक्त विनती करता है—हे प्रभु, इस दीन याचक की पुकार सुनिए और संसार के बंधनों से उबारिए।

व्याख्या

“रेनू” रज या रेत और “बेनू” बाँसुरी का ब्रजी रूप है। “भव-फंद” संसार में उलझन या आवागमन के बंधन की भक्ति-उपमा है। “दीन भिखारी” भक्त की विनम्रता का शब्द है; इससे गरीबी और आध्यात्मिकता के बीच कोई अनिवार्य समानता नहीं बनती। कुछ गायन-रूपों में “दीन दुखारी” भी मिलता है। दोनों पाठों को अलग दर्ज किया गया है।

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

सन्दर्भ और उपयोग

संपादकीय स्रोत-सूचना: नीचे 1 के चयनित ऑनलाइन पाठ की टेक तथा चार विस्तृत पद दिए गए हैं। टेक-दोहराव उसी पाठ से लिया गया है। यह अप्रकाशित कार्यकारी पाठ है; किसी ऐतिहासिक संस्करण से अंतिम मिलान और अधिकार-जाँच लंबित हैं।

हर पाठ-खंड का सरल अर्थ और व्याख्या

टेक — टेक — कुंजबिहारी, गिरिधर और मुरारी

सरल अर्थ: हम ब्रज के कुंजों में विहार करने वाले, गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले और मुर असुर का वध करने वाले श्रीकृष्ण की आरती करते हैं। भाव और संदर्भ: तीन नामों में भक्ति के तीन भाव साथ आते हैं। “कुंजबिहारी” वृन्दावन के निकुंजों में विहार करने वाले कृष्ण हैं। “गिरिधर” गोवर्धन उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा करने वाले कृष्ण की स्मृति है 3। “मुरारी” मुर नामक असुर के वध की भागवत-कथा की ओर संकेत करता है 4। ये तीन अलग देवता नहीं, कृष्ण के विशेषण हैं। यहाँ आरती स्तुति है; दीप घुमाने की कोई निश्चित संख्या इससे निर्धारित नहीं होती।

यह आरती क्या है?

“आरती कुंजबिहारी की” श्रीकृष्ण को संबोधित ब्रज-प्रभावित हिंदी का लोकप्रिय भक्तिगीत है। “कुंज” का अर्थ लताओं और वृक्षों से घिरा उपवन है और “बिहारी” वहाँ विहार करने वाले को कहते हैं। इस नाम में वृन्दावन का अंतरंग परिवेश जीवित हो उठता है। यह पूरी कृष्ण-जीवनी को क्रम से सुनाने वाला ग्रंथ नहीं, बल्कि सौंदर्य, संगीत, स्मरण और विनती के अनेक चित्रों से बनी आरती है। 1

पहले पदों में कृष्ण का रूप, राधा का साथ, ग्वाल-बालों का परिवेश और वाद्यों की ध्वनि उभरती है। फिर गंगाजी तथा शिव की जटाओं का उल्लेख आता है। अंतिम पद में देवता का रूप वर्णन करते-करते भक्त स्वयं बोल उठता है—मेरी पुकार भी सुनिए। दर्शन से विनय तक की यह यात्रा इस आरती के भाव को विशेष बनाती है।

भाषा, परंपरा और रचनाकार

आरती में “बजावै”, “बिलसै”, “ठाढ़े”, “स्मरन”, “रेनू” और “बेनू” जैसे ब्रज के निकट शब्द मिलते हैं। इन्हें केवल आधुनिक हिंदी का अशुद्ध रूप मानकर बदल देना उचित नहीं। सामूहिक गायन में विराम, टेक, अंतरे और अतिरिक्त आवृत्तियाँ बदल सकती हैं। यह वैदिक संस्कृत का सूक्त नहीं, स्थानीय बोलचाल और भक्ति-काव्य से जुड़ा गीत है। रचयिता और रचना-काल प्रमाणित नहीं हैं। एक संगीत-कंपनी के अभिलेख में गीतकार “Traditional” दर्ज है, पर इससे किसी विशेष कवि की रचना सिद्ध नहीं होती 7। गीता प्रेस के आरती-संग्रह का OCR पाठ भी देखा गया है; उसमें पाँच वर्णनात्मक पद और कुछ भिन्न शब्द हैं, किंतु संबंधित मुद्रित पन्नों का दृश्य-सत्यापन नहीं हुआ है 2। अतः चयनित ऑनलाइन रूप को लेखक-निर्धारित सर्वप्रथम पाठ नहीं कहा गया है।

आरती के पाँच प्रमुख भाव

१. प्रेम और सान्निध्य: राधा एवं गोपियाँ कृष्ण के प्रति आत्मीय भक्ति का काव्यात्मक वातावरण रचती हैं। भिन्न वैष्णव मत इसकी व्याख्या अलग-अलग शब्दावली में करते हैं। २. शरण और संरक्षण: “गिरिधर” नाम ब्रजवासियों को गोवर्धन के नीचे आश्रय देने की भागवत-कथा याद कराता है 3। ३. सौंदर्य से स्मरण: मुरली, मोरमुकुट, वनमाला, चाँदनी और नदी-तट ध्यान तथा भाव-जागरण के चित्र हैं; ये किसी घटना के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं। ४. वैष्णव-शैव प्रतीकों का संगम: गंगा-पद में हरि के चरण और शिव की जटाएँ साथ आते हैं 5। इससे दोनों परंपराओं की सभी दार्शनिक मान्यताएँ एक जैसी सिद्ध नहीं हो जातीं। ५. विनय का स्वर: “भव-फंद” से छुड़ाने की प्रार्थना धार्मिक विश्वास की भाषा है; इससे कोई वैज्ञानिक रूप से निश्चित फल या सभी समस्याओं का उपचार सिद्ध नहीं होता।

चयनित पाठ, टेक और पाठभेद

आधार: Drik Panchang पर उपलब्ध पढ़ने योग्य पाठ, जिसमें आरंभिक टेक और चार लंबे वर्णनात्मक पद हैं। प्रत्येक पद के बाद टेक के लिए “x2” संकेत मिलता है। इस लेख में प्रत्येक पद के बाद पूरी टेक दो बार लिखी गई है, ताकि गायन-आवृत्ति स्पष्ट रहे। इसे पुरातन हस्तलिखित प्रमाण का रूप नहीं बताया गया। 1

अलग पाठ: “गिरिधर/गिरधर”, कुछ वाद्यनामों की वर्तनी तथा “दीन भिखारी/दीन दुखारी” जैसे पाठभेद मिलते हैं। किसी आधुनिक रिकॉर्डिंग के आरंभ में पृथक कृष्ण-वंदना जुड़ सकती है, पर उसे यहाँ चयनित आरती का अनिवार्य पद नहीं बनाया गया है। 6 7

मूल प्रमाण की सीमा: गीता प्रेस की पुस्तक का OCR पाठ भी देखा गया है; वहाँ पहले दो वर्णनात्मक खंड अलग-अलग पदों में हैं। मूल स्कैन-पृष्ठ से शब्द-शब्द दृश्य मिलान अब भी लंबित है। इसी तरह आधुनिक ऑनलाइन पाठ को सार्वजनिक वेबसाइट पर दोबारा छापने के अधिकार की मंजूरी अभी नहीं मिली है। 2

आरती कब गाई जाती है? कृष्ण-भक्ति में इस आरती का पाठ घर, मंदिर और जन्माष्टमी जैसे उत्सवों के संदर्भ में किया जाता है। लेकिन पाठ में कोई सार्वभौमिक अनिवार्य घड़ी या नियत गणना नहीं लिखी है। तिथि और समय के लिए अलग सत्यापित पंचांग/कैलेंडर आवश्यक है। यह लेख भक्ति-पाठ और अर्थ के लिए है, विशेष पूजा-विधि का निर्देश नहीं।

शब्दार्थ-संग्रह

शब्दइस आरती में अर्थ
कुंजबिहारीवृन्दावन के निकुंजों में विहार करने वाले कृष्ण
गिरिधरगोवर्धन पर्वत उठाने वाले
मुरारीमुर असुर का वध करने वाले कृष्ण
बैजंतीपारंपरिक पुष्पमाला का नाम
वनमालीवनमाला धारण करने वाले
आलीसखी या सहचरी के लिए काव्य-संबोधन
दरसनदर्शन
रेनूधूल या महीन रेत
बेनूबाँसुरी
भव-फंदसांसारिक उलझन या बंधन की उपमा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आरती कुंजबिहारी की किसकी आरती है? यह श्रीकृष्ण की ब्रज-प्रभावित हिंदी आरती है, जिसमें वृन्दावन, राधा, मुरली और कृष्ण-भक्ति का वर्णन है।

अंग्रेजी पृष्ठ पर मूल आरती का अनुवाद होगा? नहीं। पहले वही मूल हिंदी/ब्रज शब्द रोमन अक्षरों यानी हिंग्लिश में होंगे; अंग्रेजी अर्थ बाद में आएँगे।

इस संस्करण में कितने पद हैं? एक आरंभिक टेक और चार वर्णनात्मक पद हैं। टेक की आवृत्ति को अलग पद मानने से गिनती बदल सकती है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं? प्रमाणित ऐतिहासिक रचयिता और रचना-काल नहीं मिले। “Traditional” जैसे रिकॉर्डिंग श्रेय को अंतिम ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं माना गया है।

श्रीकृष्ण को गिरिधर क्यों कहा जाता है? गोवर्धन पर्वत धारण कर ब्रजवासियों की रक्षा करने की भागवतपुराण 10.25 वाली कथा के कारण।

राधा और मुरली का उल्लेख क्यों है? ये ब्रज-कृष्ण भक्ति के प्रेम, आकर्षण और सान्निध्य के महत्त्वपूर्ण प्रतीक हैं; परंपराओं में इनके अर्थ का बल बदल सकता है।

कृष्ण की आरती में गंगा का प्रसंग क्यों आता है? विष्णु के चरणों से गंगा के संबंध और शिव की जटाओं में उनके आविर्भाव की धार्मिक कथाओं का काव्यात्मक स्मरण है।

कौन-से शब्द अलग-अलग मिलते हैं? जैसे गिरिधर/गिरधर तथा दीन भिखारी/दीन दुखारी। दूसरे पाठ को बिना सूचना आधार-पाठ में नहीं मिलाया गया।

क्या टेक दो बार गाना अनिवार्य है? इस चयनित ऑनलाइन पाठ में x2 संकेत है, पर इसे सभी समुदायों का सार्वभौमिक नियम नहीं माना गया है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

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पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Refrain — Kunj Bihari, Giridhar, Murari

    Aarti Kunj Bihari Ki, Shri Giridhar Krishna Murari Ki.

  2. Vanamali, Radha and the flute

    Gale Mein Baijanti Mala, Bajavai Murali Madhur Bala. Shravan Mein Kundal Jhalakala, Nand Ke Anand Nandalala. Gagan Sam Ang Kanti Kali, Radhika Chamak Rahi Aali. Latan Mein Thadhe Banamali; Bhramar Si Alak, Kasturi Tilak, Chandra Si Jhalak; Lalit Chhavi Shyama Pyari Ki.

  3. Peacock crown, music and the cowherd community

    Kanakamay Mor Mukut Bilasai, Devata Darasan Ko Tarasain. Gagan Son Suman Rasi Barasai; Baje Murachang, Madhur Miradang, Gwalin Sang; Atul Rati Gop Kumari Ki.

  4. The Ganga and the holy feet

    Jahan Te Prakat Bhai Ganga, Kalush Kali Harini Shri Ganga. Smaran Te Hot Moh Bhanga; Basi Shiv Sees, Jata Ke Beech, Harai Agh Keech; Charan Chhavi Shri Banwari Ki.

  5. Yamuna-bank landscape and the humble appeal

    Chamakti Ujjval Tat Renu, Baj Rahi Vrindavan Benu. Chahun Disi Gopi Gwal Dhenu; Hansat Mridu Mand, Chandani Chand, Katat Bhav Phand; Ter Sun Deen Bhikhari Ki.

स्रोत और संपादकीय स्थिति

  • 1 Drik Panchang — चयनित ऑनलाइन मूल पाठ।
  • 2 गीता प्रेस आरती-संग्रह की अभिलेख-सूची और OCR पाठ (मुद्रित पृष्ठ का दृश्य मिलान लंबित)।
  • 3 भागवतपुराण 10.25 — गोवर्धन।
  • 4 भागवतपुराण 10.59 — मुर।
  • 5 भागवतपुराण 5.17 — गंगा का वैष्णव प्रसंग।
  • 6 Sanatan Bodh — तुलनात्मक पाठभेद।
  • 7 Saregama — रिकॉर्डिंग-श्रेय, लेखकत्व का निर्णायक प्रमाण नहीं।
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

पद 1 — वनमाली, राधिका और मुरली

सरल अर्थ: कृष्ण के गले में वैजयंती माला है, वे मधुर मुरली बजाते हैं और कानों में कुण्डल चमकते हैं। नंद के प्रिय लाला लताओं के बीच खड़े हैं; उनका श्यामल शरीर, भौंरों-सी अलकें और कस्तूरी का तिलक मन मोहते हैं। पास में राधिका की छवि दमकती है। भाव और संदर्भ: पहला विस्तृत पद कृष्ण-दर्शन का काव्यात्मक चित्र बनाता है। “वनमाली” वन-फूलों की माला धारण करने वाले हैं; “आली” ब्रज-काव्य में सखी का संबोधन भी हो सकता है। श्याम कांति यहाँ सौंदर्य और भक्ति की भाषा है, किसी खगोलीय रंग का वैज्ञानिक वर्णन नहीं। माला, मुरली, कुण्डल और अलकों से आरम्भ होकर कविता राधा-कृष्ण की संयुक्त छवि तक पहुँचती है। अलग-अलग वैष्णव परम्पराओं में इस छवि की व्याख्या का स्वर कुछ भिन्न हो सकता है।

पद 2 — मोरमुकुट, वाद्य और गोपी-समुदाय

सरल अर्थ: कृष्ण का स्वर्णाभ मोरमुकुट शोभित है; देवता भी उनके दर्शन के लिए लालायित हैं। आकाश से पुष्प-वर्षा का भाव आता है, मुरचंग और मृदंग जैसे वाद्य बजते हैं और गोपियों का अनुपम प्रेम व्यक्त होता है। भाव और संदर्भ: देवताओं की दर्शन-लालसा और पुष्पवृष्टि भक्ति-काव्य की उत्कट स्तुति हैं, किसी तिथि-विशेष की ऐतिहासिक रिपोर्ट नहीं। “मुरचंग” जैसे वाद्यनाम का वर्तनी-सत्यापन मुद्रित पाठ से करना बाकी है; इसे अपनी सुविधा से किसी दूसरे वाद्य के नाम में नहीं बदला गया। “रति” इस संदर्भ में गहन अनुराग का काव्यात्मक बोध कराती है; इसका एक ही आचरण-नियम सब पर थोपना उचित नहीं।

पद 3 — गंगाजी और चरण-महिमा

सरल अर्थ: आरती गंगाजी को हरि के चरणों से संबद्ध पवित्र धारा मानकर उनकी महिमा गाती है। गंगा कलियुग की मलिनता दूर करने वाली कही गई हैं; शिव उन्हें अपनी जटाओं में धारण करते हैं। ईश्वर-स्मरण से मोह दूर होने का भक्तिपरक भाव व्यक्त होता है। भाव और संदर्भ: भागवतपुराण 5.17 में गंगा को विष्णु के चरण से जोड़ने वाला आख्यान मिलता है 5। शिव की जटाओं का उल्लेख गंगावतरण की व्यापक कथापरम्परा से संवाद करता है और वैष्णव-शैव प्रतीकों को जोड़ता है। “बनवारी” वन में विहार करने वाले कृष्ण का एक नाम है। “अघ हरना” आरती का धार्मिक विश्वास है; इसे प्रयोगशाला में सिद्ध परिणाम या अपने कर्मों की जिम्मेदारी से छूट बताना गलत होगा।

पद 4 — वृन्दावन का तट और विनम्र प्रार्थना

सरल अर्थ: नदी के तट की उज्ज्वल रेत चमकती है, वृन्दावन में बांसुरी की धुन है और चारों ओर गोपियाँ, ग्वाल तथा गायें हैं। चाँदनी और मंद मुस्कान की छवि के बीच भक्त विनती करता है—हे प्रभु, इस दीन याचक की पुकार सुनिए और संसार के बंधनों से उबारिए। भाव और संदर्भ: “रेनू” रज या रेत और “बेनू” बाँसुरी का ब्रजी रूप है। “भव-फंद” संसार में उलझन या आवागमन के बंधन की भक्ति-उपमा है। “दीन भिखारी” भक्त की विनम्रता का शब्द है; इससे गरीबी और आध्यात्मिकता के बीच कोई अनिवार्य समानता नहीं बनती। कुछ गायन-रूपों में “दीन दुखारी” भी मिलता है। दोनों पाठों को अलग दर्ज किया गया है।

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  8. Additional reusable textual witness (comparison, not a replacement edition) · स्रोत खोलें