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आरती

आरती कीजै हनुमान लला की — हनुमान आरती

हनुमान लला की चयनित पूर्ण आरती, सरल भावार्थ और स्रोत-पाठ की सावधानियों सहित।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट-दलन रघुनाथ कला की॥

अर्थ

आइए, प्रिय हनुमान लला की आरती करें; वे दुष्टता के दमनकर्ता तथा श्रीराम की शक्ति और सेवा-भाव के प्रतीक हैं।

व्याख्या

“लला” अत्यंत स्नेह का संबोधन है। अपार पराक्रम वाले हनुमान के लिए यह शब्द भक्त का वात्सल्य प्रकट करता है। “रघुनाथ कला” को राम की शक्ति, सामर्थ्य या प्रभाव के रूप में समझा जाता है, किन्तु यह किसी एक दार्शनिक मत का अंतिम निर्धारण नहीं है। आरम्भ में सबको आरती में सम्मिलित होने का निमंत्रण है। गाने के समय टेक बार-बार आ सकती है; पुस्तक में उसकी पुनरावृत्ति का तरीका अलग हो सकता है।

2

जाके बल से गिरिवर काँपै। रोग-दोष जाके निकट न झाँपै॥ अंजनि-पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥

अर्थ

जिनके बल के सामने बड़े पर्वत भी काँपते हैं, जिनके निकट रोग और दोष न पहुँचने की कल्पना की गई है; वे अंजनी-पुत्र हनुमान महाबली और सज्जनों के सहायक हैं।

व्याख्या

पर्वत काँपने का दृश्य भक्ति-काव्य की अतिशयोक्ति है—इससे असाधारण साहस का अनुभव कराया जाता है। रोग-दोष से रक्षा का कथन श्रद्धा का भाव है; इसे बीमारी से निश्चित बचाव या उपचार का चिकित्सकीय प्रमाण नहीं समझना चाहिए। “अंजनि-पुत्र” में माता अंजना का स्नेहिल स्मरण है। अंतिम पंक्ति बताती है कि हनुमान का बल केवल प्रदर्शन नहीं, संतों तथा जरूरतमंदों की सहायता से सार्थक होता है।

3

दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सीय सुधि लाये॥ लंका सो कोट समुद्र-सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥

अर्थ

श्रीराम अपने वीर दूत हनुमान को भेजते हैं। वे समुद्र पार कर सीता का समाचार लाते हैं और रामकथा के प्रसंग में लंका-दहन करते हैं। लंका का दुर्ग और समुद्र का विस्तार भी पवनपुत्र को रोक नहीं पाता।

व्याख्या

“दे बीरा” लोकभाषिक प्रयोग है; “बीड़ा देना” जैसे परंपरागत साहसपूर्ण दायित्व के संकेत से इसे समझा जा सकता है, पर शब्द के सभी स्थानीय अर्थ निश्चित नहीं हैं। “सीय सुधि” का आशय माता सीता का समाचार है। हनुमान की यात्रा में वीरता के साथ खोज, विश्वास और आशा लौटाने का भाव प्रमुख है। समुद्र तथा लंका के किले का वर्णन सेवा के मार्ग की कठिनाई को बड़ा करके दिखाता है; इसे आधुनिक इतिहास-वृत्तांत नहीं मानना चाहिए।

4

लंका जारि असुर संहारे। सीतारामजी के काज सँवारे॥ लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे॥

अर्थ

हनुमान लंका में असुरों से संघर्ष करके सीता–राम का कार्य सँवारते हैं। लक्ष्मण के मूर्छित होने पर वे रामकथा में जीवनरक्षक औषधि लाकर उनके प्राण बचाते हैं।

व्याख्या

यह पद रामकथा के अलग-अलग प्रसंगों को चार पंक्तियों में समेटता है। “काज सँवारे” में अपने यश से अधिक सीता–राम के कार्य को पूरा करने का भाव है। “सकारे” पुराने पाठ का शब्द है; कई व्याख्याओं में इसे भोर से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके क्षेत्रीय अर्थ की समीक्षा बाकी है। संजीवनी पर्वत लाते हनुमान के चित्र भी परंपरा में बने हैं। यह कथा-आधारित स्तुति है, वास्तविक रोगों में उपचार छोड़ने का निर्देश नहीं।

5

पैठि पताल तोरि जम-कारे। अहिरावन की भुजा उखारे॥ बायें भुजा असुरदल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे॥

अर्थ

वे पाताल में प्रवेश कर भयावह बंधनों को तोड़ते और अहिरावण को पराजित करते हैं। उनकी बाईं और दाईं भुजा की छवि दुष्टता का प्रतिरोध तथा भक्तों की रक्षा—दोनों को एक साथ रखती है।

व्याख्या

अहिरावण/महीरावण का पाताल-प्रसंग रामकथा की बाद की और क्षेत्रीय परंपराओं में विकसित हुआ है; इसे वाल्मीकि रामायण के मूल पाठ का निश्चित प्रसंग बताना ठीक नहीं। “जम-कारे” शब्द का पाठ एवं अर्थ विशेष समीक्षा माँगता है; यम/मृत्यु-संबंधी भयावह बंधन जैसी सावधान व्याख्या उचित है। बाईं-दाईं भुजा से शक्ति के दो पक्ष दिखते हैं—अन्याय को रोकना और आश्रित की रक्षा करना।

6
विषय-सूची पर लौटें

सुर नर मुनि आरती उतारे। जय जय जय हनुमान उचारे॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥ जो हनुमानजी की आरति गावै। बसि बैकुंठ परम पद पावै॥

अर्थ

देवता, मनुष्य और मुनि हनुमान की आरती कर उनकी जय बोलते हैं। स्वर्ण थाल में कपूर की ज्योति है और माता अंजना स्वयं आरती करती हैं। अंतिम पंक्ति में श्रद्धापूर्वक आरती गाने वाले के परम आध्यात्मिक कल्याण की आशा व्यक्त होती है।

व्याख्या

अंत युद्ध में नहीं, आरती की ज्योति के सामने होता है। माता अंजना का उपस्थित होना वीर हनुमान को पुत्र के स्नेहपूर्ण रूप में भी देखने देता है। देवता, मनुष्य और मुनि साथ जुड़कर सामूहिक भक्ति का दृश्य रचते हैं। “बैकुंठ” वैष्णव भक्तिभाषा का शब्द है और आरती की राम-केंद्रित भावना के अनुकूल है। “परम पद” की प्राप्ति आस्था-आधारित धार्मिक आशा है, किसी निश्चित संख्या में पाठ करने से प्रमाणित मिलने वाला परिणाम नहीं। इस चयनित स्रोत का अंत यहीं है; कुछ अन्य पाठों में तुलसीदास का नाम लेकर अतिरिक्त पंक्तियाँ आती हैं।

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित पाठ: गीता प्रेस, आरती संग्रह भाग २, मुद्रित पृष्ठ ९४–९५। एक टेक और उसके बाद ग्यारह दो-पंक्तीय पदों को छह पाठक-खंडों में रखा गया है। मूल पृष्ठ-छवि की अंतिम जाँच और पुनर्प्रकाशन-अधिकार की स्वीकृति शेष है। 1

टेक

सरल अर्थ: आइए, प्रिय हनुमान लला की आरती करें; वे दुष्टता के दमनकर्ता तथा श्रीराम की शक्ति और सेवा-भाव के प्रतीक हैं। व्याख्या: “लला” अत्यंत स्नेह का संबोधन है। अपार पराक्रम वाले हनुमान के लिए यह शब्द भक्त का वात्सल्य प्रकट करता है। “रघुनाथ कला” को राम की शक्ति, सामर्थ्य या प्रभाव के रूप में समझा जाता है, किन्तु यह किसी एक दार्शनिक मत का अंतिम निर्धारण नहीं है। आरम्भ में सबको आरती में सम्मिलित होने का निमंत्रण है। गाने के समय टेक बार-बार आ सकती है; पुस्तक में उसकी पुनरावृत्ति का तरीका अलग हो सकता है।

यह किस प्रकार की आरती है?

“आरती कीजै हनुमान लला की” हनुमान जी की हिंदी लोकभाषिक आरती है। यह न वैदिक संस्कृत मंत्र है और न हनुमान चालीसा का दूसरा नाम। इसके आरंभ में हनुमान को प्रेम से “लला” कहकर पुकारा गया है। आगे उनके द्वारा माता सीता की खोज, श्रीराम की सेवा, लंका का प्रसंग, लक्ष्मण की सहायता और पाताल से जुड़ी परवर्ती कथा का स्मरण आता है। अंत में माता अंजना आरती करती दिखाई देती हैं। इस प्रकार गीत बल की स्तुति होते हुए भी सेवा, स्नेह और सामूहिक भक्ति को केंद्र में रखता है। 1 4

शिवगोरक्ष का व्यापक विषय शिव–शक्ति–नाथ परंपराएँ हैं, लेकिन इससे हनुमान की इस विशिष्ट रामभक्ति-केंद्रित आरती को जबरन किसी एक शैव व्याख्या में नहीं बदलना चाहिए। अनेक समुदायों में हनुमान के धार्मिक संबंध अलग प्रकार से समझे जाते हैं; पहले इस गीत के अपने शब्दों का सम्मान आवश्यक है।

हमने कौन-सा मूल पाठ चुना है? यह पाठ इंटरनेट आर्काइव में उपलब्ध गीता प्रेस के आरती संग्रह, भाग २ पर आधारित है। इसके मुद्रित पृष्ठ ९४–९५ के OCR पाठ में एक टेक के बाद ग्यारह दो-पंक्तीय पद हैं। पढ़ने की सुविधा के लिए टेक तथा उसके बाद २, २, २, २, ३ पदों के पाँच समूह बनाए गए हैं। इसलिए “पाँच पद”, “छह खंड” और “बारह दोहे-जैसी इकाइयाँ” अलग गिनती-पद्धतियों को सूचित कर सकते हैं; किसी गिनती को सभी प्रचलनों के लिए सार्वभौमिक नहीं मानना चाहिए। 1

ऑनलाइन OCR में अक्षर-संबंधी त्रुटियाँ मिलती हैं। अन्य उपलब्ध पाठों से मिलाकर कुछ स्पष्ट अंतराल और शब्द-विभाजन अस्थायी रूप से सुधारे गए हैं, पर मुद्रित पृष्ठों की छवि से अंतिम मिलान अभी नहीं हुआ। इसीलिए संपूर्ण चयनित क्रम मौजूद होने पर भी स्रोत-पाठ को आंशिक रूप से सत्यापित रखा गया है। देवनागरी शब्दों का रूप जानबूझकर आधुनिक संस्कृत या खड़ी बोली बनाकर नहीं बदला गया। 3 4

महाबली हनुमान: बल का उद्देश्य सेवा

आरती बार-बार हनुमान का साहस दिखाती है, पर हर बड़े कार्य के पीछे किसी दूसरे की आवश्यकता है। वे श्रीराम के दूत बनते हैं, माता सीता का समाचार पहुँचाते हैं, लक्ष्मण के लिए औषधि लाते हैं और भक्तों की रक्षा के प्रतीक बनते हैं। “सीतारामजी के काज सँवारे” इस रचना का भावसूत्र कहा जा सकता है: बल अपना यश बढ़ाने के लिए नहीं, धर्ममय कार्य और सहायता के लिए है। संजीवनी वाला चित्र भारतीय कला में भी महत्वपूर्ण रहा है। मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट में राजस्थान के लगभग १८०० ईस्वी के चित्र का विवरण हनुमान को औषधीय पर्वत ले जाते हुए दिखाता है। यह भक्ति-कथा के कला-संबंधी प्रसार का ऐतिहासिक प्रमाण है; असाधारण घटना का आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं। 5

अहिरावण और रामकथा की अनेक परंपराएँ

पाताल जाकर अहिरावण का सामना करने का प्रसंग अनेक परवर्ती और क्षेत्रीय रामकथा-रूपों से जुड़ा है। “अहिरावण” और “महीरावण” के नाम तथा संबंधित घटनाओं में भिन्नताएँ हो सकती हैं। ब्रिटिश लाइब्रेरी की एक चित्र-सूची में “महीरावण और हनुमान का युद्ध” अंकित है। इससे ऐसे कथा-रूप की चित्रपरंपरा का पता चलता है; यह दावा नहीं निकलता कि हर विवरण वाल्मीकि रामायण के मूल पाठ में भी मिलता है। 6

रचनाकार कौन हैं? रामानंद और तुलसीदास संबंधी सावधानी

रचनाकार को निश्चित रूप से पहचानना अभी संभव नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास में स्वामी रामानंद से संबद्ध एक भिन्न हनुमान आरती दी है। दूसरी ओर, कुछ गेय या मुद्रित रूपों में तुलसीदास के नाम वाली अंतिम पंक्ति मिलती है। हमारे चुने गीता प्रेस पाठ में वह अंतिम पंक्ति नहीं है। केवल किसी बाद की पंक्ति में कवि का नाम दिखाई देना या किसी दूसरे संस्करण का ऐतिहासिक उल्लेख मिलना एक ही रचनाकार का निर्विवाद प्रमाण नहीं। अतः उचित विवरण है: “पारंपरिक आरती; विशिष्ट रचनाकार का श्रेय विवादित।” 1 2 3

कठिन तथा सुंदर शब्दों का सरल अर्थ

लला — प्यारा बच्चा या स्नेह से संबोधित प्रिय व्यक्ति। रघुनाथ — भगवान राम। कला — संदर्भानुसार राम की शक्ति या प्रभाव। सीय/सिय — सीता का लोकभाषिक रूप। सुधि — समाचार या पता। पवनसुत — पवनदेव के पुत्र। सजीवन/संजीवनी — रामकथा का जीवनदायी औषधि-संबंधी संकेत। कंचन थार — सोने की थाली। परम पद — धार्मिक भाष्य में सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था। मूल में “कीजै”, “जाके”, “पैठि”, “गावै” जैसे रूप गीत के लयात्मक सौंदर्य का हिस्सा हैं। विशेषकर “बीरा”, “सकारे” और “जम-कारे” के शब्दार्थ की विद्वत समीक्षा आवश्यक है। इसलिए जहाँ निश्चित अर्थ नहीं है, वहाँ व्याख्या ने अपनी सीमा खुलकर मानी है।

पाठभेद क्यों मिलते हैं? एक पाठ में “झाँपै” के स्थान पर “झाँके” गाया जाता है। किसी में “सीतारामजी” के स्थान पर “सियारामजी” है। “लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे” की जगह “पड़े धरणी में” भी मिलता है। कुछ संस्करणों में तुलसीदास का नाम लेकर अंतिम दो पंक्तियाँ जुड़ जाती हैं। रामचंद्र शुक्ल द्वारा उद्धृत रामानंद-संबद्ध पाठ में तो क्रम और कई शब्द ही अलग हैं। ये अलग स्रोत-साक्ष्य हैं; केवल लोकप्रिय होने से किसी पंक्ति को इस चयनित मूल पाठ में चुपचाप नहीं जोड़ सकते। 1 2 3

इस आरती का भक्ति-महत्त्व

उत्तर भारत के कई घरों में आरती पूजन के समापन पर गाई जाती है। मंगलवार, शनिवार तथा हनुमान से संबंधित पर्वों पर इसका पाठ सुनाई देता है, पर पारिवारिक, मंदिर और क्षेत्रीय नियम एक जैसे नहीं होते। शैक्षिक सामग्री में दीपक जलाने की अनिवार्य प्रक्रिया, शुभ समय, संख्या-आधारित फल या दीक्षा-संबंधी निर्देश देने का दावा नहीं किया गया है; आवश्यकता होने पर इन्हें पृथक विशेषज्ञ-समीक्षित पूजा सामग्री में रखना चाहिए। 4

रोगों से रक्षा और परम पद की प्राप्ति जैसे कथन धार्मिक विश्वास और आध्यात्मिक आशा के रूप में समझने चाहिए, न कि चिकित्सा के स्थानापन्न या सभी के लिए सुनिश्चित फल के रूप में। इस आरती का स्थायी नैतिक संदेश है—अपना सामर्थ्य दूसरों की सहायता में लगाना।

सामान्य प्रश्न

१. क्या यहाँ संपूर्ण आरती है? हाँ, चयनित गीता प्रेस OCR पाठ की टेक सहित बाद की सभी ग्यारह दो-पंक्तीय इकाइयाँ मौजूद हैं। पृष्ठ-छवि से अंतिम मिलान और पुनर्प्रकाशन-अधिकार की स्वीकृति शेष है। 1

२. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर अंग्रेज़ी अनुवाद के बजाय Roman Hindi क्यों है? ताकि देवनागरी न जानने वाले पाठक भी वही मूल हिंदी शब्द रोमन अक्षरों में पढ़ और गा सकें। अंग्रेज़ी अर्थ पूरे मूल पाठ के बाद अलग दिया गया है।

४. क्या यह तुलसीदासजी की रचना है? अभी निश्चित नहीं। कुछ बाद के रूप तुलसीदास का नाम जोड़ते हैं; एक पुरानी साहित्यिक कृति दूसरे स्वरूप को रामानंद से जोड़ती है। 2 3

५. हनुमानजी को “लला” क्यों कहते हैं? इस संबोधन में स्नेह और वात्सल्य का भाव है—महावीर को भी अपने प्रिय बालक की तरह पुकारना।

६. अहिरावण की कथा कहाँ मिलती है? यह रामकथा की विस्तृत और अनेक क्षेत्रीय परंपराओं का प्रसंग है; इसे सीधे वाल्मीकि के मूल पाठ का उद्धरण नहीं कहना चाहिए। 6

७. क्या आरती से रोग निश्चित ठीक होते हैं? नहीं। ऐसा दावा श्रद्धा का धार्मिक कथन है; चिकित्सा एवं आवश्यक देखभाल का विकल्प नहीं है।

८. क्या हर पद के बाद टेक दोहरानी चाहिए? बहुत-से परिवार ऐसा गाते हैं; इस पाठ में टेक को स्रोत की तरह आरंभ में एक बार लिखा गया है और अतिरिक्त दोहराव को अलग गायन-परंपरा माना गया है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Comparative traditional words: Nitya (getnitya.com), permitted for any purpose. Existing Sitaram and jay spellings and six-unit segmentation retained; no Gita Press translation or scan republished. Original manuscript wording and unit sequence retained. Roman rendering, meanings and explanations: ShivGoraksh. No source recording, scan image or modern third-party explanation is reproduced. Independent textual certification remains incomplete.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    Aarti Kijai Hanuman Lala Ki. Dusht-Dalan Raghunath Kala Ki.

  2. 2

    Jaake Bal Se Girivar Kaanpai. Rog-Dosh Jaake Nikat Na Jhaanpai. Anjani-Putra Maha Baldaai. Santan Ke Prabhu Sada Sahaai.

  3. 3

    De Beera Raghunath Pathaaye. Lanka Jaari Siya Sudhi Laaye. Lanka So Kot Samudra-Si Khaai. Jaat Pavansut Baar Na Laai.

  4. 4

    Lanka Jaari Asur Sanhaare. Sita-Ram Ji Ke Kaaj Sanvaare. Lakshman Moorchhit Pade Sakaare. Aani Sajeevan Praan Ubaare.

  5. 5

    Paithi Pataal Tori Jam-Kaare. Ahiraavan Ki Bhuja Ukhaare. Baayen Bhuja Asurdal Maare. Dahine Bhuja Santjan Taare.

  6. 6

    Sur Nar Muni Aarti Utaare. Jai Jai Jai Hanuman Uchaare. Kanchan Thaar Kapoor Lau Chhaai. Aarti Karat Anjana Maai. Jo Hanumanji Ki Aarti Gaavai. Basi Baikunth Param Pad Paavai.

स्रोत एवं संपादकीय सूचना

मुख्य स्रोत: गीता प्रेस आरती संग्रह, भाग २, मुद्रित पृष्ठ ९४–९५ (इंटरनेट आर्काइव स्कैन और OCR)। रामचंद्र शुक्ल की हिंदी साहित्य का इतिहास में संबंधित भिन्न आरती तथा संग्रहालय के सहायक संदर्भ हैं। विवरण स्रोत-सूची में 1 से 7 तक दिए गए हैं।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

पद 1

सरल अर्थ: जिनके बल के सामने बड़े पर्वत भी काँपते हैं, जिनके निकट रोग और दोष न पहुँचने की कल्पना की गई है; वे अंजनी-पुत्र हनुमान महाबली और सज्जनों के सहायक हैं। व्याख्या: पर्वत काँपने का दृश्य भक्ति-काव्य की अतिशयोक्ति है—इससे असाधारण साहस का अनुभव कराया जाता है। रोग-दोष से रक्षा का कथन श्रद्धा का भाव है; इसे बीमारी से निश्चित बचाव या उपचार का चिकित्सकीय प्रमाण नहीं समझना चाहिए। “अंजनि-पुत्र” में माता अंजना का स्नेहिल स्मरण है। अंतिम पंक्ति बताती है कि हनुमान का बल केवल प्रदर्शन नहीं, संतों तथा जरूरतमंदों की सहायता से सार्थक होता है।

पद 2

सरल अर्थ: श्रीराम अपने वीर दूत हनुमान को भेजते हैं। वे समुद्र पार कर सीता का समाचार लाते हैं और रामकथा के प्रसंग में लंका-दहन करते हैं। लंका का दुर्ग और समुद्र का विस्तार भी पवनपुत्र को रोक नहीं पाता। व्याख्या: “दे बीरा” लोकभाषिक प्रयोग है; “बीड़ा देना” जैसे परंपरागत साहसपूर्ण दायित्व के संकेत से इसे समझा जा सकता है, पर शब्द के सभी स्थानीय अर्थ निश्चित नहीं हैं। “सीय सुधि” का आशय माता सीता का समाचार है। हनुमान की यात्रा में वीरता के साथ खोज, विश्वास और आशा लौटाने का भाव प्रमुख है। समुद्र तथा लंका के किले का वर्णन सेवा के मार्ग की कठिनाई को बड़ा करके दिखाता है; इसे आधुनिक इतिहास-वृत्तांत नहीं मानना चाहिए।

पद 3

सरल अर्थ: हनुमान लंका में असुरों से संघर्ष करके सीता–राम का कार्य सँवारते हैं। लक्ष्मण के मूर्छित होने पर वे रामकथा में जीवनरक्षक औषधि लाकर उनके प्राण बचाते हैं। व्याख्या: यह पद रामकथा के अलग-अलग प्रसंगों को चार पंक्तियों में समेटता है। “काज सँवारे” में अपने यश से अधिक सीता–राम के कार्य को पूरा करने का भाव है। “सकारे” पुराने पाठ का शब्द है; कई व्याख्याओं में इसे भोर से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके क्षेत्रीय अर्थ की समीक्षा बाकी है। संजीवनी पर्वत लाते हनुमान के चित्र भी परंपरा में बने हैं। यह कथा-आधारित स्तुति है, वास्तविक रोगों में उपचार छोड़ने का निर्देश नहीं।

पद 4

सरल अर्थ: वे पाताल में प्रवेश कर भयावह बंधनों को तोड़ते और अहिरावण को पराजित करते हैं। उनकी बाईं और दाईं भुजा की छवि दुष्टता का प्रतिरोध तथा भक्तों की रक्षा—दोनों को एक साथ रखती है। व्याख्या: अहिरावण/महीरावण का पाताल-प्रसंग रामकथा की बाद की और क्षेत्रीय परंपराओं में विकसित हुआ है; इसे वाल्मीकि रामायण के मूल पाठ का निश्चित प्रसंग बताना ठीक नहीं। “जम-कारे” शब्द का पाठ एवं अर्थ विशेष समीक्षा माँगता है; यम/मृत्यु-संबंधी भयावह बंधन जैसी सावधान व्याख्या उचित है। बाईं-दाईं भुजा से शक्ति के दो पक्ष दिखते हैं—अन्याय को रोकना और आश्रित की रक्षा करना।

पद 5

सरल अर्थ: देवता, मनुष्य और मुनि हनुमान की आरती कर उनकी जय बोलते हैं। स्वर्ण थाल में कपूर की ज्योति है और माता अंजना स्वयं आरती करती हैं। अंतिम पंक्ति में श्रद्धापूर्वक आरती गाने वाले के परम आध्यात्मिक कल्याण की आशा व्यक्त होती है। व्याख्या: अंत युद्ध में नहीं, आरती की ज्योति के सामने होता है। माता अंजना का उपस्थित होना वीर हनुमान को पुत्र के स्नेहपूर्ण रूप में भी देखने देता है। देवता, मनुष्य और मुनि साथ जुड़कर सामूहिक भक्ति का दृश्य रचते हैं। “बैकुंठ” वैष्णव भक्तिभाषा का शब्द है और आरती की राम-केंद्रित भावना के अनुकूल है। “परम पद” की प्राप्ति आस्था-आधारित धार्मिक आशा है, किसी निश्चित संख्या में पाठ करने से प्रमाणित मिलने वाला परिणाम नहीं। इस चयनित स्रोत का अंत यहीं है; कुछ अन्य पाठों में तुलसीदास का नाम लेकर अतिरिक्त पंक्तियाँ आती हैं।

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