पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

स्तोत्र

संकटमोचन हनुमानाष्टक

हनुमान के आठ संकट-हरण प्रसंग, अंत में भक्त की अपनी विनती और समापन-दोहा।

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सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो । ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो । देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 1 ॥

अर्थ

बाल्यकाल में आपने सूर्य को निगल लिया तो तीनों लोकों में अँधेरा छा गया। भय दूर करने का उपाय किसी को न सूझा। देवताओं की विनती पर आपने सूर्य छोड़ दिया और संकट मिटाया। इसी कारण जगत आपको संकटमोचन कहकर स्मरण करता है।

व्याख्या

यह कथात्मक-भक्ति रूपक है: सूर्य का लुप्त होना पूरे संसार के संकट का चित्र बनता है। देवताओं की विनती पर संकट का समाधान निकलता है। इसे वैज्ञानिक खगोलीय घटना का विवरण नहीं मानना चाहिए। ‘रबि’ सूर्य का लोकभाषिक रूप है।

2

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो । चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो । कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 2 ॥

अर्थ

बालि से भयभीत सुग्रीव पर्वत पर शरण लिए हुए थे। पद में मुनि के शाप का संकेत है। आपने द्विज-वेश में श्रीराम से भेंट करके उनका सुग्रीव से मिलन कराया और भय तथा शोक का निवारण किया।

व्याख्या

इस पद में ऋष्यमूक, सुग्रीव तथा राम-मिलन के कई संकेत थोड़े शब्दों में आ गए हैं। ‘कै द्विज रूप लिवाय’ की पुरानी भाषिक रचना का शब्दशः अर्थ स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा चाहता है; प्रसंग का आशय हनुमान द्वारा द्विज-वेश में मिलन कराना है। मुनि का शाप बालि की शरणस्थल तक पहुँच रोकने से जुड़ा है।

3

अंगद के संग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो । जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो । हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 3 ॥

अर्थ

सीता की खोज में निकले वानरों को बिना समाचार लौटने का भय था। समुद्र-तट पर सभी निराश और थके हुए थे। आपने सीता की सुधि पहुँचाकर उनके प्राणों और आशा को सँभाला; इसी कार्य से संकटमोचन नाम सार्थक होता है।

व्याख्या

‘सुधि’ का अर्थ केवल समाचार नहीं, किसी प्रिय के सुरक्षित होने की आश्वस्त करने वाली खबर भी है। समुद्र से घिरे दल के लिए हनुमान की सफलता विश्वास का आधार बनती है। यहाँ पराक्रम के साथ जिम्मेदारी और संवाद का महत्त्व भी है।

4

रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो । ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो । चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 4 ॥

अर्थ

रावण के बंदीगृह में राक्षसियों से घिरी सीता अत्यंत दुखी थीं। आपने लंका पहुँचकर बाधाओं का सामना किया और राम की मुद्रिका देकर उन्हें विश्वास दिलाया कि सहायता आएगी। इस प्रकार उनके शोक को दूर किया।

व्याख्या

सीता की व्यथा को उनकी दुर्बलता नहीं समझना चाहिए; वे शत्रु के नियंत्रण में अकेली हैं। राम की मुद्रिका पहचान का विश्वसनीय चिह्न बनती है। ‘असोक सों आगि’ जैसे संक्षिप्त पदांश का अर्थ पाठभेदों और विशेषज्ञ समीक्षा के साथ स्पष्ट किया जाना बाकी है।

5

बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो । लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो । आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 5 ॥

अर्थ

रावण-पुत्र के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हुए। आप वैद्य सुषेण को लाए और औषधियों वाला पर्वत उठा लाए। संजीवनी द्वारा लक्ष्मण के प्राण बचने का यह प्रसंग आपके सेवाभाव और तत्परता की स्तुति है।

व्याख्या

वर्णन में पहले वैद्य, फिर औषधि और फिर समय पर सेवा पहुँचाने की बात है। यह धार्मिक कथा है, चिकित्सा-विधि नहीं। ‘लछिमन’, ‘बैद्य’ और ‘द्रोन’ पुराने लोकभाषिक रूप हैं; वर्तमान लेखन में लक्ष्मण, वैद्य और द्रोण भी लिखे जाते हैं।

6

रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो । श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो । आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 6 ॥

अर्थ

युद्ध में नागपाश से राम तथा सेना संकट में पड़ गए। पद में कहा गया है कि आप पक्षिराज गरुड़ को लाए और बंधन कट गया। यहाँ रक्षा का कार्य सहयोग तथा समयोचित उपाय के माध्यम से प्रकट होता है।

व्याख्या

‘खगेस’ का अर्थ पक्षियों के स्वामी गरुड़ है। सर्प-बंधन से मुक्ति में उनकी उपस्थिति कथा की पारंपरिक प्रतीक-व्यवस्था से जुड़ी है। ‘सुत्रास’ जैसे शब्दरूप की व्याख्या और अन्य पाठों से तुलना अभी विशेषज्ञ जाँच के अधीन है।

7

बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो । देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो । जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 7 ॥

अर्थ

एक प्रचलित उत्तरवर्ती रामकथा के अनुसार अहिरावण राम और लक्ष्मण को पाताल ले गया और बलि देने का विचार किया। हनुमान ने वहाँ पहुँचकर सहायता की और अहिरावण को सेना सहित परास्त करके दोनों की रक्षा की।

व्याख्या

अहिरावण-प्रसंग उत्तरवर्ती एवं लोकप्रिय रामकथा-परंपराओं में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसे वाल्मीकि रामायण के सभी पाठों का अनिवार्य अंश कहना उचित नहीं होगा। यह स्तोत्र बलि करने की विधि नहीं बता रहा; वह संकट की कथा सुना रहा है।

8

काज किये बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो । कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो । बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कछु संकट होय हमारो । को नहिं जानत है जगमें कपि संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 8 ॥

अर्थ

हे वीर हनुमान, आपने देवताओं के बड़े कार्य किए हैं। मेरे जैसे असहाय का कौन-सा संकट है जो आप दूर न कर सकें? कृपा करके मेरा संकट शीघ्र हरिए। इसमें कवि अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भक्ति-प्रार्थना बना देता है।

व्याख्या

पहले सात पदों में दूसरों के संकट दूर करने वाले हनुमान का वर्णन है। आठवें में भक्त स्वयं को ‘गरीब’ यानी दीन/असहाय बताकर विनती करता है। यही परिवर्तन कथा को अपनी कठिनाई में आशा जगाने वाली प्रार्थना बनाता है; किसी परिणाम का निश्चित वादा नहीं करता।

9
विषय-सूची पर लौटें

लाल देह लाली लसे अरु धरि लाल लँगूर । बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर ॥

अर्थ

हनुमान की लाल आभा, पूँछ और वज्र के समान दृढ़ शरीर का स्मरण करते हुए कवि दानवों का दमन करने वाले वीर कपि की बार-बार जय बोलता है।

व्याख्या

समापन-दोहा आठ मत्तगयन्द छंदों से अलग छंद-रूप है। लाल वर्ण हनुमान-भक्ति के दृश्य-संसार में महत्त्वपूर्ण है; वज्र-देह दृढ़ता और अपराजेय साहस का काव्य-चित्र है।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-सूचना: चयनित मुद्रित पाठ, पृष्ठ १२३–१२६; आठ मत्तगयन्द छंद और अलग समापन-दोहा। मूल भाषा संस्कृत नहीं, पुरानी ब्रज–अवधी-प्रभावित साहित्यिक हिंदी है। 1 2

परिचय: यह स्तुति क्या कहती है? अष्टक में आठ लंबी छंद-पंक्तियों के समूह हैं। प्रत्येक पद में पहले हनुमान के संकट-हरण की एक कथा आती है और अंत में एक ही संबोधन लौटता है। सात पद भूतकाल के पराक्रम सुनाते हैं; आठवाँ पद उस भरोसे को भक्त के अपने दुःख पर लाता है। अंत का दोहा एक स्वतंत्र छंद है। 1

रचना और भाषा: पुस्तकों में इसका श्रेय परंपरागत रूप से गोस्वामी तुलसीदास को दिया जाता है, पर जाँचे गए पृष्ठ लेखक का प्रमाण नहीं देते। ब्रज/अवधी और पुरानी हिंदी के रूप साथ मिलते हैं। इस रचना को संस्कृत श्लोक या वाल्मीकि रामायण का शब्दशः अध्याय न समझें। 1 2 4

पदानुसार भावार्थ और व्याख्या

समापन-दोहा — समापन-दोहे में लाल आभा और वज्र-सा बल

सरल अर्थ: हनुमान की लाल आभा, पूँछ और वज्र के समान दृढ़ शरीर का स्मरण करते हुए कवि दानवों का दमन करने वाले वीर कपि की बार-बार जय बोलता है। व्याख्या और प्रसंग: समापन-दोहा आठ मत्तगयन्द छंदों से अलग छंद-रूप है। लाल वर्ण हनुमान-भक्ति के दृश्य-संसार में महत्त्वपूर्ण है; वज्र-देह दृढ़ता और अपराजेय साहस का काव्य-चित्र है। पाठ-संबंधी सावधानी: अरु / अरू; दोहा as final composition segment / four additional lines of invocations after doha। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

मत्तगयन्द: चयनित पुस्तक में छंद का नाम इसी रूप में दिया गया है। यह आठों मुख्य पदों के लिए प्रयुक्त छंद है; दोहा अलग रखा गया है। छंद के मात्रा-विन्यास की विशेषज्ञ जाँच शेष है। 1

कठिन शब्द: रबि = सूर्य; कपीस = वानर-समूह का नायक; सुधि = खबर/समाचार; मुद्रिका = अंगूठी; खगेस = पक्षिराज गरुड़; द्रोन = औषधियों से जुड़ा पर्वत; ‘गरीब’ = विनम्र/असहाय याचक। पुराने ‘सों’, ‘नहिं’, ‘दई’ को स्वतः शुद्ध करके न बदलें। प्रसंग-भेद: अहिरावण की कथा कई उत्तरवर्ती रामकथा-परंपराओं में मिलती है। संस्कृत महाकाव्य का हर संस्करण समान कथाएँ नहीं देता; कथा और ऐतिहासिक तथ्य अलग तरह की जानकारी हैं।

पाठभेद और रचना-सीमा

आठों पदों में अंतिम पंक्ति पूरी दी गई है। चयनित छपे पाठ की वर्तनी ‘रबि’, ‘द्रोन’, ‘काज किये’ तथा अंतिम दोहे में ‘अरु’ सुरक्षित रखी गई है। अन्य प्रतियों में ‘रवि’, ‘द्रोण’, ‘काज कियो’, ‘अरू’ जैसे रूप मिलते हैं। डिजिटल संस्कृत डॉक्यूमेंट्स में दोहे के बाद चार अतिरिक्त प्रार्थना-पंक्तियाँ भी आती हैं; वे चयनित मुद्रित संस्करण में नहीं हैं, इसलिए यहाँ नहीं जोड़ी गईं। उपलब्ध स्रोत और उनके प्रमाण की सीमाएँ स्रोत-सूची में हैं। 1 2 4

संबंधित रचनाएँ

हनुमान चालीसा चालीसा-रूप में अलग रचना है। हनुमान की आरती भी भिन्न भक्तिपाठ है। ये केवल स्थिर कैटलॉग-संबंध हैं; इनके सार्वजनिक URL की पुष्टि नहीं हुई है।

सामान्य प्रश्न

क्या यह संस्कृत स्तोत्र है? नहीं। नाम के अंत में “अष्टक” होने पर भी मूल भाषा पुरानी उत्तर भारतीय साहित्यिक हिंदी की ब्रज–अवधी-प्रभावित शैली है।

इसमें कितने पद हैं? आठ मत्तगयन्द पद हैं और उनके बाद एक अलग दोहा है; इसलिए नौ पाठ-इकाइयाँ दर्ज की गई हैं।

क्या तुलसीदास ने इसकी रचना की? यह परंपरागत श्रेय है। जाँचे हुए मूल पृष्ठ इसे ऐतिहासिक रूप से सिद्ध नहीं करते।

क्या इसे हनुमान चालीसा समझना चाहिए? नहीं, चालीसा और संकटमोचन हनुमानाष्टक अलग रचनाएँ हैं।

क्या यह हर संकट दूर करने की गारंटी देता है? नहीं। यह विश्वास और सहारे की भक्तिपूर्ण प्रार्थना है; चिकित्सा, सुरक्षा या अन्य व्यावहारिक सहायता का विकल्प नहीं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Traditional Tulsidas-tradition hymn. Reusable text-only comparison: Nitya, permitted for any purpose. Historical witness: Pt. Hari Shankar Shastri, 1 Mein100Pustak,1900, printed173. Supplied nasal spelling and closing doha preserved. Original manuscript wording and unit sequence retained. Roman rendering, meanings and explanations: ShivGoraksh. No source recording, scan image or modern third-party explanation is reproduced. Independent textual certification remains incomplete.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    Bāl samay rabi bhakṣi liyo tab tīnhuṃ lok bhayo andhiyāro | Tāhi soṃ trās bhayo jag ko yah saṅkaṭ kāhu soṃ jāt na ṭāro | Devan āni karī bintī tab chāṃṛi diyo rabi kaṣṭ nivāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 1 ||

  2. 2

    Bāli kī trās kapīs basai giri jāt mahāprabhu panth nihāro | Cauṃki mahā muni sāp diyo tab cāhiy kaun bicār bicāro | Kai dvij rūp livāy mahāprabhu so tum dās ke sok nivāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 2 ||

  3. 3

    Aṅgad ke saṅg len gaye siy khoj kapīs yah bain ucāro | Jīvat nā bacihau ham so ju binā sudhi lāe ihāṃ pagu dhāro | Heri thake taṭ sindhu sabai tab lāy siyā-sudhi prān ubāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 3 ||

  4. 4

    Rāvan trās daī siy ko sab rākṣasi soṃ kahi sok nivāro | Tāhi samay hanumān mahāprabhu jāy mahā rajnīcar māro | Cāhat sīy asok soṃ āgi su dai prabhu mudrikā sok nivāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 4 ||

  5. 5

    Bān lagyo ur lachhiman ke tab prān taje sut rāvan māro | Lai gṛh baidy suṣen samet tabai giri dron su bīr upāro | Āni sajīvan hāth daī tab lachhiman ke tum prān ubāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 5 ||

  6. 6

    Rāvan juddh ajān kiyo tab nāg ki phāṃs sabai sir ḍāro | Śrīraghunāth samet sabai dal moh bhayo yah saṅkaṭ bhāro | Āni khages tabai hanumān ju bandhan kāṭi sutrās nivāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 6 ||

  7. 7

    Bandhu samet jabai ahirāvan lai raghunāth patāl sidhāro | Debihiṃ pūji bhalī bidhi soṃ bali deu sabai mili mantra bicāro | Jāy sahāy bhayo tab hī ahirāvan sainy samet saṃhāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 7 ||

  8. 8

    Kāj kiye baṛ devan ke tum bīr mahāprabhu dekhi bicāro | Kaun so saṅkaṭ mor garīb ko jo tumsoṃ nahiṃ jāt hai ṭāro | Begi haro hanumān mahāprabhu jo kachu saṅkaṭ hoy hamāro | ko nahiṃ jānat hai jagmeṃ kapi saṅkaṭmocan nām tihāro || 8 ||

  9. 9

    Lāl deh lālī lase aru dhari lāl laṅgūr | Bajr deh dānav dalan jay jay jay kapi sūr ||

स्रोत और संस्करण-संबंधी टिप्पणियाँ

  • 1 Śrīrāmacaritamānasa / Śrīhanumānacālīsā anthology containing Saṅkaṭamocana Hanumānāṣṭak — https://elibrary.gcecj.org/public/images/post/1714987480.sunderkand-paath-hindi%20.pdf
  • 2 Sankatamochana Hanumanashtaka (Hindi) — https://sanskritdocuments.org/doc_z_otherlang_hindi/sankatamochana.html
  • 3 Shri Hanuman Chalisha (Gita Press) — https://archive.org/details/xqZf_shri-hanuman-chalisha-gita-press
  • 4 Sankat Mochan Hanuman Ashtak in Hindi with Meaning — https://nidarshanavedh.com/mantras/hanuman-ashtak/
  • 5 Sankat Mochan Hanumanashtak text and sources — https://myarchana.in/stotram/sankat-mochan-hanumanashtak
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

पद 1 — बाल-हनुमान सूर्य छोड़कर जगत का संकट दूर करते हैं

सरल अर्थ: बाल्यकाल में आपने सूर्य को निगल लिया तो तीनों लोकों में अँधेरा छा गया। भय दूर करने का उपाय किसी को न सूझा। देवताओं की विनती पर आपने सूर्य छोड़ दिया और संकट मिटाया। इसी कारण जगत आपको संकटमोचन कहकर स्मरण करता है। व्याख्या और प्रसंग: यह कथात्मक-भक्ति रूपक है: सूर्य का लुप्त होना पूरे संसार के संकट का चित्र बनता है। देवताओं की विनती पर संकट का समाधान निकलता है। इसे वैज्ञानिक खगोलीय घटना का विवरण नहीं मानना चाहिए। ‘रबि’ सूर्य का लोकभाषिक रूप है। पाठ-संबंधी सावधानी: रबि / रवि; तीनहुँ / तीनी; तिहारो / तुम्हारो। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

पद 2 — सुग्रीव के दुःख में राम से मिलन का मार्ग

सरल अर्थ: बालि से भयभीत सुग्रीव पर्वत पर शरण लिए हुए थे। पद में मुनि के शाप का संकेत है। आपने द्विज-वेश में श्रीराम से भेंट करके उनका सुग्रीव से मिलन कराया और भय तथा शोक का निवारण किया। व्याख्या और प्रसंग: इस पद में ऋष्यमूक, सुग्रीव तथा राम-मिलन के कई संकेत थोड़े शब्दों में आ गए हैं। ‘कै द्विज रूप लिवाय’ की पुरानी भाषिक रचना का शब्दशः अर्थ स्वतंत्र विशेषज्ञ समीक्षा चाहता है; प्रसंग का आशय हनुमान द्वारा द्विज-वेश में मिलन कराना है। मुनि का शाप बालि की शरणस्थल तक पहुँच रोकने से जुड़ा है। पाठ-संबंधी सावधानी: बसै / बसे। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

पद 3 — सीता की खोज और आशा का संदेश

सरल अर्थ: सीता की खोज में निकले वानरों को बिना समाचार लौटने का भय था। समुद्र-तट पर सभी निराश और थके हुए थे। आपने सीता की सुधि पहुँचाकर उनके प्राणों और आशा को सँभाला; इसी कार्य से संकटमोचन नाम सार्थक होता है। व्याख्या और प्रसंग: ‘सुधि’ का अर्थ केवल समाचार नहीं, किसी प्रिय के सुरक्षित होने की आश्वस्त करने वाली खबर भी है। समुद्र से घिरे दल के लिए हनुमान की सफलता विश्वास का आधार बनती है। यहाँ पराक्रम के साथ जिम्मेदारी और संवाद का महत्त्व भी है। पाठ-संबंधी सावधानी: हेरि थके / हरि थके। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

पद 4 — अशोक-वाटिका में सीता को धीरज

सरल अर्थ: रावण के बंदीगृह में राक्षसियों से घिरी सीता अत्यंत दुखी थीं। आपने लंका पहुँचकर बाधाओं का सामना किया और राम की मुद्रिका देकर उन्हें विश्वास दिलाया कि सहायता आएगी। इस प्रकार उनके शोक को दूर किया। व्याख्या और प्रसंग: सीता की व्यथा को उनकी दुर्बलता नहीं समझना चाहिए; वे शत्रु के नियंत्रण में अकेली हैं। राम की मुद्रिका पहचान का विश्वसनीय चिह्न बनती है। ‘असोक सों आगि’ जैसे संक्षिप्त पदांश का अर्थ पाठभेदों और विशेषज्ञ समीक्षा के साथ स्पष्ट किया जाना बाकी है। पाठ-संबंधी सावधानी: राक्षसि / राक्षसी। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

पद 5 — लक्ष्मण के लिए सुषेण और संजीवनी

सरल अर्थ: रावण-पुत्र के बाण से लक्ष्मण मूर्छित हुए। आप वैद्य सुषेण को लाए और औषधियों वाला पर्वत उठा लाए। संजीवनी द्वारा लक्ष्मण के प्राण बचने का यह प्रसंग आपके सेवाभाव और तत्परता की स्तुति है। व्याख्या और प्रसंग: वर्णन में पहले वैद्य, फिर औषधि और फिर समय पर सेवा पहुँचाने की बात है। यह धार्मिक कथा है, चिकित्सा-विधि नहीं। ‘लछिमन’, ‘बैद्य’ और ‘द्रोन’ पुराने लोकभाषिक रूप हैं; वर्तमान लेखन में लक्ष्मण, वैद्य और द्रोण भी लिखे जाते हैं। पाठ-संबंधी सावधानी: द्रोन / द्रोण। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

पद 6 — नागपाश से मुक्ति और गरुड़ का आगमन

सरल अर्थ: युद्ध में नागपाश से राम तथा सेना संकट में पड़ गए। पद में कहा गया है कि आप पक्षिराज गरुड़ को लाए और बंधन कट गया। यहाँ रक्षा का कार्य सहयोग तथा समयोचित उपाय के माध्यम से प्रकट होता है। व्याख्या और प्रसंग: ‘खगेस’ का अर्थ पक्षियों के स्वामी गरुड़ है। सर्प-बंधन से मुक्ति में उनकी उपस्थिति कथा की पारंपरिक प्रतीक-व्यवस्था से जुड़ी है। ‘सुत्रास’ जैसे शब्दरूप की व्याख्या और अन्य पाठों से तुलना अभी विशेषज्ञ जाँच के अधीन है। पाठ-संबंधी सावधानी: नाग कि फाँस / नाग की फाँस। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

पद 7 — अहिरावण के प्रसंग में राम-लक्ष्मण की रक्षा

सरल अर्थ: एक प्रचलित उत्तरवर्ती रामकथा के अनुसार अहिरावण राम और लक्ष्मण को पाताल ले गया और बलि देने का विचार किया। हनुमान ने वहाँ पहुँचकर सहायता की और अहिरावण को सेना सहित परास्त करके दोनों की रक्षा की। व्याख्या और प्रसंग: अहिरावण-प्रसंग उत्तरवर्ती एवं लोकप्रिय रामकथा-परंपराओं में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसे वाल्मीकि रामायण के सभी पाठों का अनिवार्य अंश कहना उचित नहीं होगा। यह स्तोत्र बलि करने की विधि नहीं बता रहा; वह संकट की कथा सुना रहा है। पाठ-संबंधी सावधानी: देबिहिं / देविहिं। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

पद 8 — बीते पराक्रम से अपनी पीड़ा की प्रार्थना तक

सरल अर्थ: हे वीर हनुमान, आपने देवताओं के बड़े कार्य किए हैं। मेरे जैसे असहाय का कौन-सा संकट है जो आप दूर न कर सकें? कृपा करके मेरा संकट शीघ्र हरिए। इसमें कवि अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भक्ति-प्रार्थना बना देता है। व्याख्या और प्रसंग: पहले सात पदों में दूसरों के संकट दूर करने वाले हनुमान का वर्णन है। आठवें में भक्त स्वयं को ‘गरीब’ यानी दीन/असहाय बताकर विनती करता है। यही परिवर्तन कथा को अपनी कठिनाई में आशा जगाने वाली प्रार्थना बनाता है; किसी परिणाम का निश्चित वादा नहीं करता। पाठ-संबंधी सावधानी: काज किये / काज कियो; तुमसों / तुमसे। विकल्पों को मूल पाठ में नहीं मिलाया गया है।

  1. Śrīrāmacaritamānasa / Śrīhanumānacālīsā anthology containing Saṅkaṭamocana Hanumānāṣṭak · स्रोत खोलें
  2. Sankatamochana Hanumanashtaka (Hindi) · स्रोत खोलें
  3. Shri Hanuman Chalisha (Gita Press) · स्रोत खोलें
  4. Sankat Mochan Hanuman Ashtak in Hindi with Meaning · स्रोत खोलें
  5. Sankat Mochan Hanumanashtak text and sources · स्रोत खोलें
  6. Additional reusable textual witness (comparison, not a replacement edition) · स्रोत खोलें