कल्पना कीजिए कि किसी गाँव के किनारे एक योगी ठहरा है। पास में धूनी है, पहनावे में सादगी है और कानों में ऐसे कुंडल हैं जो किसी साधना-समुदाय की पहचान बन चुके हैं। लोगों को आकर्षित करने के लिए वह कोई चमत्कार नहीं दिखाता; उसकी बात का केंद्र है एक सीधा प्रश्न—जब इच्छाएँ और भय मन को लगातार खींचते रहें, तब अपने भीतर स्थिरता कैसे लाई जाए? नाथ परंपरा में गोरखनाथ, जिन्हें गोरक्षनाथ भी कहा जाता है, इसी प्रश्न से जुड़े महान गुरु के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
भक्त उन्हें महायोगी, सिद्ध गुरु और कुछ परंपराओं में शिव का स्वरूप मानते हैं। इतिहासकार उनके बारे में अधिक सावधानी से बोलते हैं। जन्मस्थान, जीवनकाल और निजी जीवन का क्रम किसी निर्विवाद समकालीन जीवनी से नहीं मिलता। उपलब्ध प्रमाण बिखरे हुए हैं—मध्यकालीन उल्लेख, शिलालेख, प्रतिमाएँ, योगग्रंथ, लोकगीत और बाद की गुरु-कथाएँ। इसलिए श्रद्धा में जीवित गोरखनाथ और इतिहास में दिखाई देने वाले गोरखनाथ के बीच अंतर बनाए रखना उनकी महत्ता घटाना नहीं, बल्कि दोनों दृष्टियों के प्रति न्याय करना है। 1 · 10
नाम, पहचान और नाथ गुरु-परंपरा
गोरक्षनाथ संस्कृत के निकट रूप में और गोरखनाथ हिंदी तथा कई बोलचाल की परंपराओं में प्रचलित नाम है। अंग्रेज़ी लेखन में Gorakshnath, Goraksha Nath और Gorakhnath जैसे रूप मिलते हैं। हिंदी तथा कई बोलचाल की परंपराओं में प्रचलित नाम है। अंग्रेज़ी लेखन में Gorakṣanātha, Goraksha Nath और Gorakhnath जैसे रूप मिलते हैं। नाथ का सामान्य अर्थ स्वामी या गुरु है। गोरक्ष शब्द की धार्मिक व्याख्याएँ संरक्षण और आध्यात्मिक सामर्थ्य से जुड़ती हैं, पर किसी लोकप्रिय व्युत्पत्ति को उनके जन्म के समय रखा गया निश्चित निजी नाम मान लेना उचित नहीं होगा। भक्त आदर से उन्हें गुरु गोरखनाथ, बाबा गोरखनाथ या गोरक्षनाथ कहते हैं।
अनेक नाथ परंपराओं में गुरु-क्रम आदिनाथ—मत्स्येन्द्रनाथ—गोरखनाथ के रूप में याद किया जाता है। आदिनाथ को शिव माना जाता है और मत्स्येन्द्रनाथ को गोरखनाथ का गुरु। यह क्रम साधना की विरासत बताता है; इसे किसी संस्थान की पूरी तरह दिनांकित सदस्य-सूची समझना गलती होगी। इसी संसार में नवनाथ और चौरासी सिद्ध के समूह महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन विभिन्न ग्रंथों तथा क्षेत्रों में उनके नामों की सूचियाँ समान नहीं हैं। सिद्ध यहाँ विशिष्ट साधना-सिद्धि प्राप्त माने जाने वाले गुरु का सम्मानसूचक शब्द है; हर अलौकिक कथा की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं। 1 · 10
नाथ योगियों से जुड़ा एक प्रचलित नाम कानफटा भी है। कुछ मठीय शाखाओं में दीक्षा के साथ कानों में विशेष कुंडल धारण करने की परंपरा है। यह उस धार्मिक समुदाय की गंभीर पहचान है; इसे केवल बाहरी विचित्रता समझना उचित नहीं। साथ ही प्रत्येक जोगी, नाथ नामधारी परिवार, गृहस्थ अनुयायी और संन्यासी को एक ही दीक्षा-व्यवस्था में नहीं रखा जा सकता। समुदायों की वास्तविक विविधता उनकी कहानी का आवश्यक हिस्सा है। 10 · 14
इतिहास क्या बताता है और कहाँ अनिश्चितता है?
गोरखनाथ को प्रायः ग्यारहवीं या बारहवीं शताब्दी में रखा जाता है, किंतु यह पक्की जन्म-मृत्यु तिथि नहीं है। शोधकर्ता वेरोनिक बुइये के सर्वेक्षण में उनके नाम के सबसे पहले दिनांक-निर्धारण योग्य उल्लेख तेरहवीं शताब्दी से बताए गए हैं। उसमें कर्नाटक के एक मंदिर से जुड़े 1279 ईस्वी के अभिलेख का उल्लेख भी पूर्ववर्ती शोध के आधार पर मिलता है। इससे मध्यकाल में उनके नाम की प्रतिष्ठा का संकेत मिलता है; यह नहीं सिद्ध होता कि बाद की हर कथा उसी व्यक्ति के जीवन में सचमुच घटी थी। पंजाब, बंगाल और दक्कन से जुड़ी जन्मस्थान-संबंधी परिकल्पनाएँ भी विद्वानों में निर्विवाद नहीं हैं। 1
प्रमाण का दूसरा प्रकार पुरातत्त्व है। महाराष्ट्र की पनहाले-काजी गुफाओं के अध्ययन में एम. एन. देशपांडे ने नाथ परंपरा से जुड़ी प्रतिमाओं और एक ऐसे स्थल की चर्चा की जिसे गोरखनाथ तथा मत्स्येन्द्रनाथ के संदर्भ में समझा गया है। किसी क्षतिग्रस्त मूर्ति के आधार पर उसका नाम निर्धारित करना तर्क और तुलना का विषय होता है। प्रतिमा पर अंकित गायों जैसे संकेत पहचान में सहायक हो सकते हैं, लेकिन मूर्ति किसी व्यक्ति के असली चेहरे का फोटो नहीं होती। इस अंतर को समझने से ऐतिहासिक सामग्री का मूल्य और स्पष्ट होता है। 13
एक और अंतर ज़रूरी है। नाथ संप्रदाय में गोरखनाथ को प्रतिष्ठापक गुरु माना जाना परंपरागत दावा है, जबकि आज दिखाई देने वाले मठों, शाखाओं, पदों और संस्थागत व्यवस्था का निर्माण अलग-अलग चरणों में हुआ। इसलिए यह कहना उचित है कि गोरखनाथ अनेक नाथ समुदायों की संस्थापक स्मृति के केंद्र हैं; यह कहना उचित नहीं कि उन्होंने स्वयं आज के प्रत्येक नाथ मठ की नींव रखी थी। किसी ग्रंथ की पांडुलिपि का वर्ष, किसी गुफा की मूर्ति का काल और किसी गुरु की जन्मतिथि एक ही बात नहीं हैं। 3 · 10
1. एक असाधारण बालक का प्रकट होना
प्रचलित कथाओं में एक स्त्री को संतान-प्राप्ति का आशीर्वाद या पवित्र भस्म मिलती है। वह आशंकित होकर उसे फेंक देती है। वर्षों बाद उसी स्थान से एक विलक्षण बालक मिलता है, जो आगे चलकर गोरखनाथ कहलाता है। किसी रूप में शिव की भूमिका मुख्य है, तो कहीं मत्स्येन्द्रनाथ बालक को खोजते हैं। स्थान, समय और घटनाओं के विवरण अलग-अलग सुनाए जाते हैं। इसे चिकित्सकीय या प्रमाणित जन्म-वृत्तांत के रूप में पढ़ना ज़रूरी नहीं। कहानी का आध्यात्मिक संकेत यह भी हो सकता है कि जिसे सामान्य दृष्टि तुच्छ या निरर्थक समझती है, वहीं असाधारण संभावना छिपी हो। 19 · 1
2. शिष्य अपने गुरु को वापस लाने जाता है
एक प्रसिद्ध कथा में मत्स्येन्द्रनाथ ऐसे राज्य में ठहरे हैं जहाँ राजसी सुख, स्त्रियों का संसार या आसक्ति का प्रसंग प्रमुख है। गोरखनाथ उन्हें योगमार्ग की याद दिलाने जाते हैं। कहीं वे वेश बदलते हैं, कहीं संगीत या संकेत से संदेश पहुँचाते हैं। लेकिन दूसरी नाथ व्याख्या आश्चर्यजनक मोड़ देती है: गुरु का तथाकथित पतन वास्तव में शिष्य के अभिमान की परीक्षा था। तब कहानी का प्रश्न बदल जाता है—क्या दूसरों को सुधारने की इच्छा रखने वाला साधक स्वयं अपने गर्व को पहचानता है? अलग पाठों के इस अंतर को मिटाकर गुरु को निश्चित रूप से 'भ्रष्ट' या शिष्य को निस्संदेह 'उद्धारक' बताना परंपरा की जटिलता कम कर देता है। 12 · 9
3. भरथरी और गोपीचंद: राजमहल से साधना तक
उत्तर, पश्चिम और पूर्व भारत के लोकसाहित्य में राजा भरथरी और गोपीचंद की कथाएँ बहुत प्रभावशाली रही हैं। राजसुख, संबंध, विरक्ति, परीक्षा और गुरु की शिक्षा—इन सबके बीच राजा को अपना जीवन नए ढंग से देखना पड़ता है। कुछ संस्करणों में गोरखनाथ उपस्थित हैं; दूसरे में जालंधरनाथ, हाड़िपा या अन्य गुरु प्रधान होते हैं। इसलिए सभी पात्रों को जोड़कर एक निश्चित, ऐतिहासिक गुरु-शिष्य परिवार बना देना सही नहीं होगा। इन गीतों का बड़ा योगदान यह है कि संन्यासी की शिक्षा राजदरबार और सामान्य श्रोता के बीच संवाद बन गई। मुकुट होने से मृत्यु या बिछोह नहीं मिटते; और महल छोड़ देने मात्र से मन की आसक्ति भी नहीं जाती। 7 · 10
4. नेपाल की वर्षा-कथा और गुरु का सम्मान
काठमांडू घाटी से जुड़ी एक कथा में गोरखनाथ नागों को रोककर बैठ जाते हैं। नाग जल से संबंधित माने जाते हैं, इसलिए वर्षा रुक जाती है और भारी सूखा पड़ता है। जब मत्स्येन्द्रनाथ को घाटी में लाया जाता है, तो गोरखनाथ अपने गुरु के सम्मान में उठते हैं। नाग मुक्त हो जाते हैं और वर्षा लौटती है। घटनाओं का कारण तथा यात्रा का क्रम अलग कथाओं में भिन्न है। नेपाल की कृषि, सामुदायिक चिंता और मत्स्येन्द्रनाथ की प्रतिष्ठा के संदर्भ में इसका अर्थ खुलता है। इसे मौसम-विज्ञान का विवरण या योगबल से बारिश नियंत्रित करने का प्रमाण नहीं कहा जा सकता। यह रातो मच्छिन्द्रनाथ से जुड़ी धार्मिक स्मृति है। 16
प्रतिमाएँ, कुंडल और धूनी: रूप का अर्थ
गोरखनाथ की लोकप्रिय छवियों में ध्यानस्थ योगी दिखाई देते हैं। कहीं आसन के पास धूनी है, कहीं हाथ में दंड, कमंडल या अन्य योगी-संबंधी वस्तु है। कहीं कानों के बड़े कुंडल उनकी नाथ पहचान को उभारते हैं। धूनी केवल आग की तस्वीर नहीं, बल्कि साधु-जीवन की एक धार्मिक परंपरा का प्रतीक भी है। शिव से जुड़ी भस्म या अन्य चिह्न दिखाई देने पर वे व्यापक शैव संदर्भ याद दिलाते हैं। पर सभी चित्रों के हर चिह्न का अर्थ सभी शताब्दियों में एक जैसा रहा हो, यह मानकर नहीं चलना चाहिए। 14 · 15
लॉस एंजिलिस काउंटी म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट की एक उन्नीसवीं शताब्दी की कृति में अनेक नाथ योगियों के साथ गोरखनाथ का प्रतीक पादचिह्नों के माध्यम से आता है। संग्रहालय की दूसरी कृति एक नाथ योगी को बड़े कुंडलों और सूक्ष्म-शरीर के प्रतीक-चित्रण सहित दर्शाती है। वह चित्र गोरखनाथ का प्रमाणित ऐतिहासिक व्यक्तिचित्र नहीं है। पनहाले-काजी की मूर्तियाँ भी ध्यानपूर्वक पुरातात्त्विक व्याख्या माँगती हैं। इससे वेबसाइट पर रखे जाने वाले किसी नए कलात्मक चित्र का स्थान स्पष्ट है: वह सम्मानपूर्ण चित्रांकन हो सकता है, असली ऐतिहासिक चेहरा नहीं। 13 · 14 · 15
गोरखनाथ से जुड़े विचार और शिक्षाएँ
अनुशासन, दिखावे से अलग। गोरखनाथ-संबद्ध कथाओं और वाणियों में संयम, जागरूकता और मन की परीक्षा बार-बार दिखाई देती है। बाहरी सिद्धियों की चर्चा साहित्य में मिलती है, पर पाठक के लिए मुख्य प्रश्न यह भी है कि वह अपने व्यवहार को कितना समझता है। उपदेश कभी सीधा होता है, कभी उलटबाँसी की शैली में। उलटबाँसी का उद्देश्य केवल रहस्य पैदा करना नहीं; सुनने वाले को परिचित धारणाओं पर दुबारा सोचने के लिए प्रेरित करना भी है। 9
शरीर को साधना का क्षेत्र मानना। योगसाहित्य में आसन, प्राण, नाड़ियाँ, बंध, चक्र और ध्यान जैसे शब्द आते हैं। ये विशिष्ट योगिक तथा धार्मिक अवधारणाएँ हैं; उन्हें बिना भेद किए आधुनिक शरीर-विज्ञान की सिद्ध संरचनाएँ नहीं कहा जा सकता। मध्यकालीन ग्रंथों में शरीर केवल बाधा नहीं है; उसे अनुशासित अनुभव और आत्मचिंतन से भी जोड़ा गया है। इसका अर्थ यह नहीं कि सामान्य पाठक स्वयं उन्नत प्राणायाम या कठिन क्रियाओं का प्रयोग करे। यहाँ किसी गुप्त विधि, जोखिमपूर्ण श्वास-रोक अभ्यास या दीक्षा-विधान का निर्देश नहीं दिया जा रहा। 4 · 6
गुरु का आदर और अपनी समझ का विकास। गुरु-शिष्य की कथाएँ केवल आज्ञापालन का आग्रह नहीं करतीं; उनका एक अर्थ अहंकार के प्रति सावधानी भी है। शिष्य बहुत कुछ जानकर भी सीमित दृष्टि का हो सकता है। नाथ परंपराओं में गुरु ज्ञान की जीवित कड़ी है, पर दीक्षा और अधिकार के नियम अलग-अलग शाखाओं के अपने होते हैं। सार्वजनिक जानकारी पढ़ने भर से किसी को दीक्षित घोषित नहीं किया जा सकता। गुरु के प्रति श्रद्धा का वर्णन करना किसी भी आधुनिक व्यक्ति को नैतिक प्रश्नों से ऊपर रख देना भी नहीं है।
पिंड और ब्रह्मांड। सिद्धसिद्धान्तपद्धति नामक ग्रंथ में पिंड—अर्थात व्यक्ति के शरीर और अस्तित्व—को व्यापक विश्व के संबंध में देखा गया है। ग्रंथ के छह उपदेशों में शरीर की उत्पत्ति, विचार, अनुभूति, आधार, परम सत्य से सामरस्य और अवधूत योगी के लक्षण जैसे विषय आते हैं। यह नाथ दार्शनिक भाषा का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है, न कि मानव शरीर की आधुनिक वैज्ञानिक पाठ्यपुस्तक। इसका काल और गोरखनाथ की निजी लेखकीय भूमिका विद्वानों के बीच विवादित है। 7 · 3
उनसे जोड़े गए ग्रंथ और वाणी का संसार
गोरखनाथ के नाम के साथ गोरक्षशतक, विवेकमार्तण्ड, सिद्धसिद्धान्तपद्धति, योगबीज, गोरखबानी और कई अन्य रचनाएँ जोड़ी जाती हैं। लेकिन ग्रंथ का नाम, उसकी अलग-अलग पांडुलिपियाँ, पाठ-रूप और वास्तविक रचनाकार चार भिन्न प्रश्न हैं। शोध से पता चलता है कि जिस नाम गोरक्षशतक से एक प्राचीन योगरचना पहचानी जाती है, वही नाम विवेकमार्तण्ड के कुछ अन्य पाठ-रूपों के लिए भी प्रयुक्त हुआ। केवल ग्रंथ के अंत में किसी गुरु का नाम मिलना उस गुरु के अपने हाथ से लिखने का प्रमाण नहीं है। 4 · 8
गोरखबानी में गोरख नाम से प्रसारित पद, सबद और संवाद मिलते हैं। इनकी भाषा सहज भी लगती है और कहीं-कहीं जानबूझकर उलट भी दी जाती है। इससे शिष्य अपनी स्थिर धारणाओं से बाहर सोचने लगता है। पर कई पीढ़ियों में विकसित रचनाओं को एक व्यक्ति का शब्दशः जीवन-वृत्तांत बताना गलत होगा। सी. मरेवा कारवोस्की का शोध दिखाता है कि ऐसे साहित्य में किसी आदरणीय गुरु के नाम से जुड़ी लेखक-परंपरा स्वयं धार्मिक अधिकार का निर्माण करती है। इसलिए यहाँ 'गोरखनाथ से संबद्ध वाणी' कहना अधिक सावधान अभिव्यक्ति है। 9
पंद्रहवीं शताब्दी की हठप्रदीपिका, जिसका संकलन स्वात्माराम ने किया, मत्स्येन्द्र और गोरक्ष को पूर्ववर्ती प्रतिष्ठित योगियों में रखती है। इससे यह नहीं निकलता कि गोरखनाथ ही उस पुस्तक के लेखक थे। आज का शोध पुराने हठयोग की अनेक धाराएँ और उनके बौद्ध सहित विभिन्न धार्मिक संपर्क सामने लाता है। इसलिए 'पूरा हठयोग केवल एक व्यक्ति ने बनाया' जैसा दावा ऐतिहासिक रूप से असावधान है। 5 · 6
शिवगोरक्ष के अलग से तैयार किए गए भगवद्गीता, देवीमाहात्म्य और अष्टावक्रगीता ग्रंथों के संदर्भ में भी सावधानी ज़रूरी है। किसी विचार में समानता होने से यह सिद्ध नहीं होता कि उस ग्रंथ में गोरखनाथ का व्यक्तिशः उल्लेख है। इन तीनों को उनके जीवन का प्रत्यक्ष स्रोत नहीं बताया गया है। जब तक किसी विशेष नाथ-ग्रंथ के संस्करण में श्लोक या पद जाँचे न जाएँ, उसके शब्दों को गोरखनाथ का निश्चित मूल कथन मानकर उद्धृत नहीं करना चाहिए।
भारत और नेपाल में परंपरा के क्षेत्रीय रूप
उत्तर प्रदेश का गोरखपुर गोरखनाथ भक्ति का प्रमुख जीवित केंद्र है। वहाँ का गोरखनाथ मठ धार्मिक गतिविधियों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों से भी जुड़ा है। जिला प्रशासन नगर की पहचान को योगी गोरखनाथ की परंपरा से जोड़ता है। यह वर्तमान संस्था की वास्तविक जानकारी है; इससे यह तय नहीं हो जाता कि नगर की प्रत्येक पुरानी घटना को उनके व्यक्तिगत जीवनकाल से जोड़ा जा सकता है। 11
नेपाल की धार्मिक स्मृति में गोरखनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, वर्षा और राजसत्ता संबंधी विविध कथाएँ मिलती हैं। महाराष्ट्र की गुफाओं में नाथ कलात्मक संदर्भ हैं। राजस्थान, पंजाब, बंगाल और अन्य क्षेत्रों में लोकगीत तथा गुरु-कथाएँ अलग-अलग ढंग से विकसित हुईं। वेरोनिक बुइये के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि नाथ समाज में भ्रमणशील साधुओं के साथ मठीय जीवन की संगठित परंपरा भी है। दोनों स्वरूपों की मौजूदगी से यह विरासत टिकती रही है। 10 · 13 · 16
कुछ नाथ भक्त गोरखनाथ को शिवस्वरूप मानते हैं, दूसरे उन्हें मुख्यतः सिद्ध गुरु मानते हैं; किसी स्थानीय परिवार के लिए उनका नाम लोककथा और उत्सव से जुड़ा हो सकता है। व्यापक नाथ इतिहास का संपर्क शैव, शाक्त, बौद्ध, सूफी और विभिन्न लोकभाषाई संसारों से रहा है। किंतु हर साझा प्रतीक को किसी एक संप्रदाय की अनन्य संपत्ति बना देना या सभी परंपराओं को बिल्कुल समान घोषित कर देना, दोनों अतिसरलीकरण हैं। 1 · 10
भक्ति, त्योहार और सार्वजनिक आचार
गोरखपुर में भक्त गुरु का स्मरण करते हैं, मंदिर जाते हैं और अपनी परंपरा के अनुसार अर्पण करते हैं। मकर संक्रांति से जुड़ा खिचड़ी मेला यहाँ विशेष प्रसिद्ध है। सरकारी पर्यटन और जिला स्रोत इस आयोजन, आने वाले श्रद्धालुओं तथा खिचड़ी अर्पित करने की परंपरा का उल्लेख करते हैं। मेला कितने दिनों तक चलेगा और विशेष आयोजन किस नागरिक तिथि पर होंगे, यह हर वर्ष के आधिकारिक कार्यक्रम से देखना चाहिए; किसी पुराने पृष्ठ पर लिखी तारीख को हमेशा के लिए स्थिर नियम नहीं बनाना चाहिए। 17 · 18
सार्वजनिक स्तर पर गुरु-भक्ति, भजन, धार्मिक साहित्य और नाथ जीवन के प्रतीकों के बारे में जानकारी दी जा सकती है। इसके विपरीत दीक्षा में कान-छेदन, वंश-परंपरा के निजी मंत्र, कठिन प्राणायाम, विशेष तांत्रिक क्रियाएँ तथा गोपनीय शिक्षाएँ अलग विषय हैं। किसी वेबसाइट का लेख उन्हें करने की अनुमति, चिकित्सकीय सलाह या परिणाम की गारंटी नहीं देता। ऐसी प्रक्रियाओं के विस्तृत निर्देश यहाँ जानबूझकर नहीं दिए गए हैं। श्रद्धालुओं के अनुभवों का सम्मान करना और चमत्कार या स्वास्थ्यलाभ की सार्वभौमिक गारंटी न देना साथ-साथ संभव है।
सामान्य प्रश्न और प्रचलित भ्रांतियाँ
क्या गोरखनाथ वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति थे? मध्यकाल से उनके नाम के प्रमाण उपलब्ध हैं और उनके प्रभाव को बाद की संस्थाओं, ग्रंथों तथा कला में देखा जा सकता है। पर निर्विवाद जन्मस्थान, सटीक जीवनकाल और सभी जीवन-घटनाओं का प्रमाण नहीं है। भक्ति की दृष्टि उन्हें कालातीत गुरु मान सकती है।
क्या मत्स्येन्द्रनाथ सचमुच उनके गुरु थे? नाथ परंपरा में यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण गुरु-शिष्य संबंध है। इसकी धार्मिक प्रतिष्ठा स्पष्ट है, किंतु उपलब्ध प्रमाणों से दोनों की व्यक्तिगत मुलाकातों का भरोसेमंद क्रम तैयार नहीं किया जा सकता।
क्या हठयोग की रचना अकेले गोरखनाथ ने की? नहीं। हठयोग की परंपराएँ अनेक समुदायों और ग्रंथों से जुड़ी हैं। गोरखनाथ उसकी स्मृति के प्रमुख गुरु हैं, पर संपूर्ण इतिहास को एक व्यक्ति के आविष्कार तक सीमित नहीं किया जा सकता। 6
क्या उनके नाम के सभी ग्रंथ उन्होंने स्वयं लिखे? ऐसा निष्कर्ष प्रमाणित नहीं है। पांडुलिपियों के रूप, रचनाकाल और नामांकन अलग-अलग हैं। कई बार गुरु का नाम किसी लेखन परंपरा की आध्यात्मिक मान्यता भी व्यक्त करता है।
क्या बड़े कुंडल दिखाई दें तो चित्र गोरखनाथ का ही है? नहीं। कुंडल और अन्य चिह्न नाथ योगियों की सामुदायिक पहचान भी हो सकते हैं। किसी मूर्ति की विशिष्ट पहचान के लिए उसका स्थान, काल और कलात्मक संदर्भ देखना चाहिए।
वे गुरु हैं या देवता? नाथ गुरु-परंपरा में वे महान आचार्य हैं। कुछ भक्त उन्हें शिवस्वरूप मानकर पूजते हैं। पहला परिचय ऐतिहासिक और परंपरागत है, दूसरा विशिष्ट धार्मिक विश्वास का कथन है—दोनों के स्तर अलग हैं।
शब्दावली
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| आदिनाथ | नाथ परंपराओं में आदि गुरु; प्रायः शिव के रूप में पहचाने जाते हैं। |
| अवधूत | वैराग्यशील साधक; अर्थ ग्रंथ तथा परंपरा के अनुसार बदलता है। |
| धूनी | कुछ संन्यासी परंपराओं में धार्मिक रूप से संरक्षित अग्नि। |
| गोरखबानी | गोरख नाम से प्रसारित पद और उपदेश-साहित्य। |
| हठयोग | ऐतिहासिक योग-ग्रंथों और साधनाओं का समूह; आधुनिक व्यायाम-पद्धति का मात्र पर्याय नहीं। |
| कानफटा | विशेष कुंडल और दीक्षा-चिह्नों से जुड़ा नाथ योगियों का प्रचलित नाम। |
| मठ | धार्मिक निवास, संस्था या गुरु-केंद्र। |
| नाथ / सिद्ध | स्वामी या गुरु / साधना में सिद्ध माने जाने वाले साधक। |
| पिंड | कुछ नाथ दार्शनिक ग्रंथों में व्यक्ति का देहगत सूक्ष्म जगत। |
| संप्रदाय | गुरु-शिष्य और सामुदायिक प्रसारण से बनी धार्मिक परंपरा। |




