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चालीसा

श्री हनुमान चालीसा — संपूर्ण पाठ और भावार्थ

हनुमान की अवधी स्तुति का संपूर्ण देवनागरी पाठ, 43 पदों के अर्थ, हिंदी व्याख्या और प्रमाणित पाठभेदों की चर्चा।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

आरंभिक दोहा 1

श्रीगुरु चरन सरोजरज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

अर्थ

कवि गुरु के चरण-कमलों की रज से अपने मनरूपी दर्पण को निर्मल कर श्रीराम का पवित्र यश गाने का संकल्प लेते हैं, जो जीवन के चार पुरुषार्थों का मार्ग दिखाता है।

व्याख्या

दर्पण की उपमा विनम्रता और मन की स्पष्टता बताती है। चार फल सामान्यतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष माने जाते हैं; यह मंगलाचरण है, बिना प्रयत्न सभी इच्छाएँ पूरी होने की गारंटी नहीं।

आरंभिक दोहा 2

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार॥

अर्थ

अपनी अल्पबुद्धि स्वीकार कर कवि पवनकुमार को स्मरण करते हैं और बल, बुद्धि, विद्या तथा क्लेश-विकार से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।

व्याख्या

भक्ति की शुरुआत सीखने की विनम्रता से होती है। केवल शारीरिक शक्ति नहीं, विवेक और विद्या भी प्रार्थना के केंद्र में हैं।

चौपाई 1

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

अर्थ

ज्ञान और सद्गुणों के सागर, तीनों लोकों में प्रसिद्ध कपियों के श्रेष्ठ हनुमान की जय हो।

व्याख्या

आरंभिक चौपाई में हनुमान का ज्ञान और चरित्र उनके पराक्रम जितना ही महत्वपूर्ण है। तीन लोक पौराणिक विश्व-दृष्टि का संकेत हैं।

चौपाई 2

रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥

अर्थ

हनुमान श्रीराम के दूत और अपार बल के धाम हैं; वे अंजनीपुत्र और पवनसुत कहलाते हैं।

व्याख्या

अंजनीपुत्र और पवनसुत नाम कथा के अलग पहलुओं का संकेत करते हैं। उनका बल स्वामित्व दिखाने के लिए नहीं, सेवा और संदेश पहुँचाने के लिए प्रयुक्त होता है।

चौपाई 3

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥

अर्थ

हे महावीर बजरंगी, आप दुर्बुद्धि दूर कर सद्बुद्धि के साथी बनते हैं।

व्याख्या

बजरंगी नाम वज्र-जैसी दृढ़ता का बोध कराता है। यहाँ बाहरी बाधा से अधिक गलत सोच हटाने और उचित निर्णय लेने की कामना है।

चौपाई 4

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥

अर्थ

आपके स्वर्णिम रूप और सुंदर वेश की शोभा है; कानों में कुण्डल तथा घुँघराले केश हैं।

व्याख्या

यह काव्यात्मक रूप-वर्णन है, इतिहास में सिद्ध एकमात्र प्रतिमा-रूप नहीं। भिन्न क्षेत्रों की कला इन्हीं लक्षणों को अलग ढंग से दिखाती है।

चौपाई 5

हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥

अर्थ

आपके हाथ में वज्र और ध्वजा सुशोभित हैं तथा कंधे पर मूँज का जनेऊ है।

व्याख्या

कुछ पाठों और चित्रों में शस्त्र का रूप वज्र अथवा गदा समझा जाता है; चुने हुए पाठ में ‘बज्र’ है। ध्वजा निष्ठा और जनेऊ अनुशासन की सांस्कृतिक छवि है।

चौपाई 6

शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥

अर्थ

शंकर के सुवन और केसरी के नंदन हनुमान का तेज तथा प्रताप जगत में वंदित है।

व्याख्या

‘शंकर सुवन’ रामभक्ति-केंद्रित रचना में शैव संबंध दिखाता है। भिन्न परंपराओं में इसकी व्याख्या अलग है; अंजनी और केसरी से जुड़े पारिवारिक रूपों को मिटाना उचित नहीं।

चौपाई 7

विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥

अर्थ

आप विद्वान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं तथा रामकार्य करने को तत्पर रहते हैं।

व्याख्या

‘चातुर’ सेवा में लगने वाली व्यवहार-कुशल बुद्धि है। आदर्श निष्क्रिय आज्ञापालन नहीं, समय पर विवेकपूर्ण सहायता है।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥

अर्थ

आप प्रभु की कथा सुनने में रस लेते हैं और आपके हृदय में राम, लक्ष्मण व सीता बसे हैं।

व्याख्या

यहाँ कथा-श्रवण भी भक्ति है। हृदय में रामपरिवार का बसना निष्ठा और स्नेहपूर्ण स्मरण का रूपक है।

चौपाई 9

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥

अर्थ

आपने सूक्ष्म रूप में सीता को दर्शन दिए और विकट रूप से लंका दहन किया।

व्याख्या

दो विपरीत रूप परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार दिखाते हैं: सीता से मिलते समय कोमलता और विरोधी सत्ता के सामने उग्रता। ये रामकथा की कथाएँ हैं।

चौपाई 10

भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥

अर्थ

आपने भीषण रूप धारण कर असुरों को परास्त किया और रामचंद्र के कार्य सँवारे।

व्याख्या

इस चौपाई में सेवा के लिए किए गए पराक्रम की स्तुति है। युद्ध-चित्रण महाकाव्य-कथा का हिस्सा है, दैनिक जीवन में हिंसा का आदेश नहीं।

चौपाई 11

लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥

अर्थ

आप लक्ष्मण के लिए जीवनदायी औषधि लाए और प्रसन्न राम ने आपको हृदय से लगाया।

व्याख्या

संजीवनी प्रसंग संकट में निष्काम सहायता की छवि है। विभिन्न रामकथाओं में औषधि और पर्वत के विवरण बदलते हैं; यहाँ उद्धार और राम की कृतज्ञता पर जोर है।

चौपाई 12

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

अर्थ

राम ने आपकी बड़ी प्रशंसा कर कहा कि आप उनके भाई भरत के समान प्रिय हैं।

व्याख्या

भरत से तुलना हनुमान को राम के अत्यंत निकट स्नेह-संबंध में रखती है। सम्मान जन्माधारित पद से नहीं, निष्ठा से मिलता है।

चौपाई 13

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

अर्थ

असंख्य मुख आपके यश का गान करते हैं; ऐसा कहकर प्रभु ने आपको गले लगाया।

व्याख्या

‘सहस बदन’ शेषनाग के हजार मुखों की स्मृति भी दिला सकता है और अनगिनत प्रशंसकों का संकेत भी है। आलिंगन भक्ति में स्नेह का महत्त्व रेखांकित करता है।

चौपाई 14

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

अर्थ

सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, नारद, सरस्वती और अहीश अर्थात् नागराज भी आपकी स्तुति करते हैं।

व्याख्या

इस सूची में पौराणिक ज्ञान-परंपराओं के अनेक व्यक्तित्व आते हैं। ‘सारद’ सामान्यतः सरस्वती और ‘अहीसा’ शेषनाग समझे जाते हैं; ये अर्थ-निर्णय हैं।

चौपाई 15

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥

अर्थ

यम, कुबेर, दिग्पाल और बड़े विद्वान कवि भी आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते।

व्याख्या

भक्तिकाव्य की अतिशयोक्ति में अपार महिमा श्रद्धा व्यक्त करती है; इसे देवताओं के कथनों का ऐतिहासिक अभिलेख नहीं मानना चाहिए।

चौपाई 16

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

अर्थ

आपने सुग्रीव को राम से मिलाकर उनका उपकार किया और राज्यपद दिलाने में सहायता की।

व्याख्या

यहाँ हनुमान की मध्यस्थता और विश्वास दिलाने की क्षमता युद्धबल जितनी महत्वपूर्ण है। प्रसंग किष्किन्धा में राम-सुग्रीव मैत्री से जुड़ा है।

चौपाई 17

तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

अर्थ

विभीषण ने आपका परामर्श स्वीकार किया और लंका के राजा बने, ऐसा व्यापक रूप से कहा जाता है।

व्याख्या

विभीषण के निर्णय में अन्य पात्रों की भूमिका भी रामकथा की कुछ परंपराओं में प्रमुख है। चालीसा का कवि पूरी कथा को हनुमान की सलाह की संक्षिप्त प्रशंसा में समेटता है।

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

अर्थ

बाल-लीला में आपने दूर स्थित सूर्य को मधुर फल समझकर उसकी ओर छलांग लगाई।

व्याख्या

‘जुग सहस्र जोजन’ को सूर्य-पृथ्वी की वैज्ञानिक दूरी निकालने का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। यह पौराणिक भाषा में बालसुलभ ऊर्जा का चित्र है।

चौपाई 19

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥

अर्थ

प्रभु की मुद्रिका मुख में रखकर आपने समुद्र पार किया, जो आपके लिए अचरज नहीं था।

व्याख्या

सुंदरकाण्ड में अंगूठी सीता के सामने पहचान का चिह्न है। अद्भुत समुद्र-लाँघन का उद्देश्य उनका विश्वास और आशा जगाना है।

चौपाई 20

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

अर्थ

आपकी कृपा से जगत के कठिन कार्य भी सुगम होने की प्रार्थना व्यक्त की जाती है।

व्याख्या

यह दैवी सहायता में विश्वास का पद है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर कठिनाई बिना प्रयास अपने आप समाप्त हो जाएगी।

चौपाई 21

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

अर्थ

आप राम के द्वारपाल हैं; आपकी अनुमति के बिना प्रवेश नहीं होता।

व्याख्या

राम के द्वार की छवि बताती है कि हनुमान-जैसी निष्ठा, विनम्रता और सेवा साधक को रामभक्ति के निकट ले जाती है। यह उपासकों पर लागू कोई वास्तविक प्रवेश-प्रतिबंध नहीं।

चौपाई 22

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥

अर्थ

आपकी शरण में आने वालों को सुख और निर्भयता मिलने की श्रद्धा व्यक्त की गई है।

व्याख्या

यह आध्यात्मिक आश्वासन की भाषा है, हर जोखिम से भौतिक सुरक्षा की गारंटी नहीं। जीवन में आवश्यक सावधानियाँ बनी रहती हैं।

चौपाई 23

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

अर्थ

आप अपने तेज को स्वयं संभालते हैं और आपकी हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।

व्याख्या

असीम शक्ति के साथ आत्मसंयम जोड़ा गया है। हनुमान का तेज अनियंत्रित आवेग नहीं, साधी हुई शक्ति का आदर्श है।

चौपाई 24

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥

अर्थ

महावीर हनुमान का नाम लेने पर भूत-पिशाच दूर रहते हैं, ऐसी लोकभक्ति में मान्यता है।

व्याख्या

कहीं इसे शाब्दिक रूप से, कहीं भय से मुक्ति के प्रतीक रूप में समझते हैं। इससे अलौकिक घटनाओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं होती।

चौपाई 25

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

अर्थ

वीर हनुमान के निरंतर स्मरण से रोग और पीड़ा मिटने की प्रार्थना की गई है।

व्याख्या

यह भक्तिपरक सांत्वना और राहत की आशा है, चिकित्सा-पद्धति या ठीक होने का निश्चित दावा नहीं। पूजा के साथ आवश्यक इलाज जारी रखना चाहिए।

चौपाई 26

संकट तें हनुमान छुडावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

अर्थ

मन, कर्म और वचन से उनका ध्यान रखने वालों के संकट हरने की श्रद्धा व्यक्त की गई है।

व्याख्या

मन, कर्म और वचन की त्रयी आचरण की एकरूपता पर बल देती है: भक्ति केवल उच्चारण नहीं, व्यवहार में भी झलकती है।

चौपाई 27

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥

अर्थ

राम को तपस्वी राजा कहकर उनकी महिमा गाई गई है और उनके कार्यों को हनुमान द्वारा सँवारने की बात कही गई है।

व्याख्या

यह पद स्पष्ट रूप से रामकेंद्रित है। हनुमान के शैव संबंध के कारण पूरे स्तोत्र का आशय किसी दूसरी उपासना में बदलना उचित नहीं।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥

अर्थ

जो भक्त अपनी मनोकामना लेकर आता है, उसके जीवन में उत्तम फल मिलने का भक्तिपरक विश्वास व्यक्त है।

व्याख्या

‘अमित फल’ महिमा का व्यापक शब्द है। इसे सदिच्छा और सेवा के संदर्भ में पढ़ना बेहतर है, किसी निश्चित फल का सौदा समझना नहीं।

चौपाई 29

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

अर्थ

चारों युगों में आपकी महिमा प्रकाशित बताई जाती है और जगत में उसका यश फैला है।

व्याख्या

चार युग पारंपरिक कालचक्र की संकल्पना हैं। यहाँ स्थायी महिमा का बोध है, आधुनिक इतिहास की वर्ष-दर-वर्ष गणना नहीं।

चौपाई 30

साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥

अर्थ

आप साधु-संतों के रक्षक, दुष्ट शक्तियों के विनाशक और राम के प्रिय कहलाते हैं।

व्याख्या

साधु-संतों की रक्षा समुदाय के कल्याण से जुड़ी है। असुर-विनाश की काव्य-भाषा किसी असहमत व्यक्ति को राक्षस ठहराने की छूट नहीं देती।

चौपाई 31

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

अर्थ

जनकनंदिनी सीता ने आपको आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दान का वर दिया, ऐसी मान्यता है।

व्याख्या

अलग ग्रंथों में सिद्धियों और निधियों की सूचियाँ बदल सकती हैं। यह भक्तिकथा का वरदान है, किसी साधक के लिए अलौकिक शक्तियों की गारंटी नहीं।

चौपाई 32

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥

अर्थ

आपके पास रामभक्ति का अमृत-तत्त्व है और आप सदा रघुपति के सेवक बने रहते हैं।

व्याख्या

‘राम रसायन’ भक्ति के रूपांतरणकारी अमृत का रूपक है, कोई रासायनिक दवा नहीं। इसका केंद्र प्रेम और निरंतर सेवा है।

चौपाई 33

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै॥

अर्थ

आपकी भक्ति से राम की प्राप्ति और जन्म-जन्मांतर के दुःख मिटने की कामना बताई गई है।

व्याख्या

हनुमान यहाँ उपासक को स्वयं से आगे राम तक ले जाने वाले मार्गदर्शक हैं। जन्म-जन्मांतर का कथन धार्मिक दृष्टिकोण है, प्रयोग से सिद्ध प्रक्रिया नहीं।

चौपाई 34

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥

अर्थ

अंत समय रामधाम की प्राप्ति अथवा हरिभक्त रूप में जन्म की श्रद्धा व्यक्त होती है।

व्याख्या

परलोक और पुनर्जन्म की दोनों छवियाँ भक्ति के निरंतर रहने की कामना हैं। इन्हें निश्चित भविष्यवाणी नहीं बताना चाहिए।

चौपाई 35

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्ब सुख करई॥

अर्थ

इस पद में अन्य देवताओं पर चित्त न लगाकर हनुमान की सेवा में सुख पाने की एकनिष्ठ भक्ति व्यक्त है।

व्याख्या

यह इस स्तुति की एकनिष्ठ भक्ति की वाणी है; अन्य हिंदू उपासनाओं पर सार्वभौमिक निषेध नहीं।

चौपाई 36

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

अर्थ

बलवान हनुमान का स्मरण करने वालों के संकट और पीड़ा मिटने की प्रार्थना है।

व्याख्या

कठिन समय में साहस जगाने के लिए आश्वासन दोहराया गया है। भक्तिकाव्य का दोहराव वैज्ञानिक प्रमाण नहीं बन जाता।

चौपाई 37

जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

अर्थ

हनुमान गोसाईं की बार-बार जय हो; वे गुरु के समान कृपा करें।

व्याख्या

‘गोसाईं’ और ‘गुरुदेव’ के संबोधन हनुमान को आध्यात्मिक पथप्रदर्शक भी बनाते हैं। इससे सामान्य पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य होने का निष्कर्ष नहीं निकलता।

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥

अर्थ

रचना में सौ बार पाठ करने वाले के बंधन से छूटने और सुख पाने का फल बताया गया है।

व्याख्या

यहाँ ‘सत बार’ का अर्थ सामान्यतः सौ पाठ लिया जाता है, पर गिनती की परंपराएँ भिन्न हैं। यह पारंपरिक फलश्रुति है, सुनिश्चित परिणाम या अनिवार्य साधना-विधान नहीं।

चौपाई 39

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

अर्थ

जो हनुमान चालीसा पढ़ता है उसे सिद्धि मिलने की आस्था व्यक्त की गई है और गौरीश को साक्षी कहा गया है।

व्याख्या

‘गौरीश’ पार्वतीपति शिव का नाम है। इस प्रकार फलश्रुति में शैव संबोधन आता है। ‘सिद्धि’ को हर बार अलौकिक शक्ति मानना आवश्यक नहीं।

चौपाई 40

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥

अर्थ

तुलसीदास स्वयं को सदा हरि का सेवक कहकर प्रभु से हृदय में निवास की प्रार्थना करते हैं।

व्याख्या

‘तुलसीदास’ की कवि-छाप रचना के भीतर है। यह पारंपरिक श्रेय का महत्त्वपूर्ण संकेत है, किंतु अपने-आप मूल पांडुलिपि या निश्चित रचनाकाल सिद्ध नहीं करती।

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

अर्थ

हे पवनपुत्र, संकटहारी और मंगलमूर्ति, राम, लक्ष्मण तथा सीता सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।

व्याख्या

समापन में बाहरी पराक्रम की स्तुति हृदय की अंतरंग प्रार्थना बन जाती है। हनुमान के साथ राम, लक्ष्मण और सीता का स्मरण पूरे स्तोत्र की भक्ति-दिशा स्पष्ट करता है।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-सूचना: यहाँ दो आरंभिक दोहे, 40 चौपाइयाँ और एक समापन दोहे वाला 43 पदों का पूरा चयनित अवधी पाठ दिया गया है 1। देवनागरी पाठ में आधुनिक हिंदी अनुवाद नहीं मिलाया गया। ऐतिहासिक मुद्रित प्रति से स्वतंत्र मिलान और अंतिम विधिक समीक्षा बाकी है; स्थिति है।

आरंभिक दोहा 1 {#opening-doha-1-meaning}

अर्थ: कवि गुरु के चरण-कमलों की रज से अपने मनरूपी दर्पण को निर्मल कर श्रीराम का पवित्र यश गाने का संकल्प लेते हैं, जो जीवन के चार पुरुषार्थों का मार्ग दिखाता है। व्याख्या: दर्पण की उपमा विनम्रता और मन की स्पष्टता बताती है। चार फल सामान्यतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष माने जाते हैं; यह मंगलाचरण है, बिना प्रयत्न सभी इच्छाएँ पूरी होने की गारंटी नहीं।

आरंभिक दोहा 2 {#opening-doha-2-meaning}

अर्थ: अपनी अल्पबुद्धि स्वीकार कर कवि पवनकुमार को स्मरण करते हैं और बल, बुद्धि, विद्या तथा क्लेश-विकार से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। व्याख्या: भक्ति की शुरुआत सीखने की विनम्रता से होती है। केवल शारीरिक शक्ति नहीं, विवेक और विद्या भी प्रार्थना के केंद्र में हैं।

समापन दोहा {#closing-doha-meaning}

अर्थ: हे पवनपुत्र, संकटहारी और मंगलमूर्ति, राम, लक्ष्मण तथा सीता सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए। व्याख्या: समापन में बाहरी पराक्रम की स्तुति हृदय की अंतरंग प्रार्थना बन जाती है। हनुमान के साथ राम, लक्ष्मण और सीता का स्मरण पूरे स्तोत्र की भक्ति-दिशा स्पष्ट करता है।

हनुमान चालीसा को समझें

चालीसा क्या है और इसकी रचना-रूपरेखा क्या है?

‘चालीसा’ शब्द चालीस से बना है। यह अवधी की भक्ति-रचना है, जिसके आरंभ में दो दोहे, बीच में चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। दोहा और चौपाई अलग छंद-रूप हैं। कुल गिने गए 43 पदों में चालीस मुख्य चौपाइयाँ ही चालीसा नाम का आधार हैं। रचना का पारंपरिक श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को मिलता है। अंतिम चौपाई में ‘तुलसीदास’ की कवि-छाप भी है, किंतु इससे किसी निश्चित वर्ष या कवि के हस्तलिखित मूल-पाठ का प्रमाण अपने आप नहीं मिलता 1 8।

पाठ में कथा कैसे आगे बढ़ती है? यह पूरे रामायण का नया संक्षेप नहीं, हनुमान के गुणों और सेवाकार्यों की स्तुति है। प्रारंभ की चौपाइयाँ उनका ज्ञान, शक्ति, रूप और रामसेवा की तत्परता बताती हैं। मध्य भाग में सीता-खोज, समुद्र-लाँघना, लंका, लक्ष्मण का उद्धार, सुग्रीव और विभीषण से जुड़े प्रसंग आते हैं। आगे भक्तों की रक्षा, साहस और मन की शुद्धि की प्रार्थना है। अंतिम दोहे में राम, लक्ष्मण और सीता के साथ हनुमान को हृदय में बसाने का निवेदन किया गया है। इस क्रम का आदर्श है विवेक और सेवा से नियंत्रित पराक्रम।

शिव-संबंध और रामभक्ति में कोई विरोध है क्या? छठी चौपाई में ‘शंकर सुवन’ और उनतालीसवीं में ‘गौरीसा’ शब्द आते हैं, जो शिव से जुड़े हैं। साथ ही संपूर्ण स्तुति में राम का कार्य, रामपरिवार और रामभक्ति प्रमुख हैं। कुछ परंपराएँ हनुमान को शिव का अंश या रूप मानती हैं; अन्य उनकी अंजनी-केसरी से जुड़ी कथा और रामसेवा पर विशेष जोर देती हैं। शिवगोरक्ष दोनों संदर्भों को आदरपूर्वक अलग पहचानता है। चुने पाठ में ‘शंकर सुवन’ है, ‘शंकर स्वयं’ नहीं 1 5।

कथा, प्रतीक और उनके अर्थ

उन्नीसवीं चौपाई की मुद्रिका राम की ओर से सीता के लिए भरोसे और पहचान का चिह्न है। समुद्र पार करना संकल्पित सेवा की छवि है। अठारहवीं चौपाई में सूर्य को फल समझना पौराणिक बाललीला है; ‘जुग सहस्र जोजन’ से आधुनिक सूर्य-दूरी की वैज्ञानिक गणना करना विश्वसनीय पद्धति नहीं। इकतीसवीं चौपाई के आठ सिद्धि और नौ निधि के विवरण अलग ग्रंथों में बदलते हैं। भूत-पिशाच, रोग और संकट से रक्षा वाले पद आस्था के कथन हैं; इन्हें उपचार या सभी खतरों से निश्चित बचाव का वैज्ञानिक दावा नहीं कहना चाहिए।

पाठक के जीवन में कौन-से आदर्श आते हैं? प्रारंभ में कवि शुद्ध मन, बल, बुद्धि और विद्या की प्रार्थना करते हैं। आगे मित्रता निभाना, अनुशासन, परिस्थिति के अनुसार उचित कार्य, विनम्रता और सहानुभूति जैसे आदर्श हैं। अंतिम भाग की फलश्रुति पाठ से मिलने वाले धार्मिक फलों का पारंपरिक कथन है। परिवारों में पाठ की गिनती और समय अलग हो सकते हैं। यह लेख किसी संख्या को अनिवार्य नहीं बताता, न निश्चित परिणाम देता है। सामान्य सार्वजनिक पाठ का वर्गीकरण PUBLIC का प्रस्ताव है; कोई विशेष साधना-विधि यहाँ नहीं सिखाई गई 1।

पाठ-साक्षी और पाठभेद

इस मसौदे में 43 अवधी पदों वाले एक निश्चित GitHub संशोधन को आधार बनाया गया है 1। यह आधुनिक डिजिटल प्रतिलेख है, इतिहास-समर्थित आलोचनात्मक संस्करण नहीं। गीता प्रेस की मुद्रित प्रतियों के अभिलेख उपलब्ध हैं 2 3, पर इस कार्य के लिए उनके हर पृष्ठ की स्वतंत्र दृश्य-जाँच अभी नहीं हुई। मूल पाठ में दूसरे संस्करण के शब्द चुपचाप नहीं मिलाए गए 5 7। प्राचीन तुलसीदास-सम्बद्ध रचना का मूल पाठ समय की दृष्टि से संभवतः सार्वजनिक क्षेत्र में आता है, लेकिन आधुनिक प्रतिलेखन, किसी मुद्रित संपादक की टिप्पणियाँ, अनुवाद और चित्र के अधिकार अलग प्रश्न हैं। चुने गए डेटा-रिपॉजिटरी का लाइसेंस MIT है, जिसके कॉपीराइट नोटिस © 2024 Adiyogi Arts का उल्लेख स्रोत-सूची में रखा गया है। अन्य वेबसाइटों के आधुनिक अर्थों की नकल नहीं की गई। प्रकाशन से पहले लाइसेंस की लागू शर्तों और मूल पाठ की विधिक स्थिति की समीक्षा आवश्यक है।

रोमन पाठ कैसे पढ़ें? अंग्रेज़ी पृष्ठ का रोमन पाठ हिंदी/अवधी के उच्चारण के लिए है, अंग्रेज़ी भाषा में कविता का अनुवाद नहीं। aa सामान्यतः आ, ee ई और oo ऊ का संकेत है। यह पाठक-सुलभ लिखावट है, विशेषज्ञ स्तर का IAST लिप्यंतरण नहीं। उच्चारण की सूक्ष्मता समझने के लिए देवनागरी देखें। पाठ की गति सभी परिवारों में एक-सी होना आवश्यक नहीं। शीर्षक और अंक मूल चालीसा की अतिरिक्त पंक्तियाँ नहीं हैं।

उपयोगी शब्दार्थ

  • दोहा: विशेष छंद-विन्यास वाला दो पंक्तियों का पद।
  • चौपाई: उत्तर भारतीय काव्य में प्रयुक्त छंद; यहाँ मुख्य चालीस पद।
  • पवनसुत: वायुदेव से सम्बद्ध हनुमान का नाम।
  • संकट: कठिनाई, कष्ट या आपत्ति।
  • सेवा: श्रद्धा और समर्पण से किया गया सहायक कार्य।
  • फलश्रुति: पाठ के पारंपरिक धार्मिक फल बताने वाला अंश।
  • सिद्धि / निधि: धार्मिक ग्रंथों में वर्णित उपलब्धियाँ अथवा निधियाँ; उनकी सूचियाँ भिन्न हो सकती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

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पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Opening doha 1

    Shri Guru charan saroj raj, nij manu mukuru sudhaari Baranaun Raghubar bimal jasu, jo daayaku phal chaari

  2. Opening doha 2

    Buddhiheen tanu jaanike, sumiraun Pavan-Kumaar Bal buddhi bidya dehu mohin, harahu kales bikaar

  3. Chaupai 1

    Jai Hanuman gyaan gun saagar Jai Kapees tihun lok ujaagar

  4. Chaupai 2

    Raamdoot atulit bal dhaama Anjani-putra Pavansut naama

  5. Chaupai 3

    Mahaabeer bikram Bajrangi Kumati nivaar sumati ke sangi

  6. Chaupai 4

    Kanchan baran biraaj subesa Kaanan kundal kunchit kesa

  7. Chaupai 5

    Haath bajra aur dhwaja biraajai Kaandhe moonj janeu saajai

  8. Chaupai 6

    Shankar suvan Kesari nandan Tej prataap maha jag bandan

  9. Chaupai 7

    Bidyavaan guni ati chaatur Raam kaaj karibe ko aatur

  10. Chaupai 8

    Prabhu charitra sunibe ko rasiya Raam Lakhan Seeta man basiya

  11. Chaupai 9

    Sookshm roop dhari Siyahin dikhaava Bikat roop dhari Lank jaraava

  12. Chaupai 10

    Bheem roop dhari asur sanhaare Raamchandra ke kaaj sanwaare

  13. Chaupai 11

    Laay sajeevan Lakhan jiyaaye Shri Raghubeer harashi ur laaye

  14. Chaupai 12

    Raghupati keenhi bahut badaai Tum mam priya Bharatahi sam bhaai

  15. Chaupai 13

    Sahas badan tumharo jas gaavain As kahi Shripati kanth lagaavain

  16. Chaupai 14

    Sanakaadik Brahmaadi muneesa Naarad Saarad sahit aheesa

  17. Chaupai 15

    Jam Kuber digpaal jahaan te Kabi kobid kahi sake kahaan te

  18. Chaupai 16

    Tum upkaar Sugreevahin keenha Raam milaay raaj pad deenha

  19. Chaupai 17

    Tumharo mantra Vibheeshan maana Lankeshwar bhae sab jag jaana

  20. Chaupai 18

    Jug sahasra jojan par bhaanu Leelyo taahi madhur phal jaanu

  21. Chaupai 19

    Prabhu mudrika meli mukh maahin Jaladhi laanghi gaye acharaj naahin

  22. Chaupai 20

    Durgam kaaj jagat ke jete Sugam anugrah tumhare tete

  23. Chaupai 21

    Raam duaare tum rakhwaare Hot na aagya binu paisaare

  24. Chaupai 22

    Sab sukh lahai tumhaari sarna Tum rakshak kaahu ko dar na

  25. Chaupai 23

    Aapan tej samhaaro aapai Teenon lok haank ten kaanpai

  26. Chaupai 24

    Bhoot pisaach nikat nahin aavai Mahaabeer jab naam sunaavai

  27. Chaupai 25

    Naasai rog harai sab peera Japat nirantar Hanumat beera

  28. Chaupai 26

    Sankat ten Hanuman chhudaavai Man kram bachan dhyaan jo laavai

  29. Chaupai 27

    Sab par Raam tapasvi raaja Tin ke kaaj sakal tum saaja

  30. Chaupai 28

    Aur manorath jo koi laavai Soi amit jeevan phal paavai

  31. Chaupai 29

    Chaaron jug parataap tumhaara Hai parasiddh jagat ujiyaara

  32. Chaupai 30

    Saadhu-sant ke tum rakhwaare Asur nikandan Raam dulaare

  33. Chaupai 31

    Asht siddhi nau nidhi ke daata As bar deen Jaanki maata

  34. Chaupai 32

    Raam rasaayan tumhare paasa Sada raho Raghupati ke daasa

  35. Chaupai 33

    Tumhare bhajan Raam ko paavai Janam-janam ke dukh bisaraavai

  36. Chaupai 34

    Ant kaal Raghubar pur jaai Jahaan janm Hari-bhakt kahaai

  37. Chaupai 35

    Aur devata chitt na dharai Hanumat sei sarb sukh karai

  38. Chaupai 36

    Sankat katai mitai sab peera Jo sumirai Hanumat balbeera

  39. Chaupai 37

    Jai jai jai Hanuman Gosaain Kripa karahu Gurudev ki naain

  40. Chaupai 38

    Jo sat baar paath kar koi Chhootahi bandi maha sukh hoi

  41. Chaupai 39

    Jo yah padhai Hanuman Chaaleesa Hoy siddhi saakhi Gaureesa

  42. Chaupai 40

    Tulsidas sada Hari chera Keejai Naath hriday mahan dera

  43. Closing doha

    Pavantanay sankat haran mangal moorati roop Raam Lakhan Seeta sahit hriday basahu sur bhoop

स्रोत और संपादकीय सुरक्षा

मुख्य निश्चित डिजिटल पाठ 1। मुद्रित प्रतियों के प्रमाण/खोज 2 3, पुराने संस्करण की सूचना 4, पाठभेद 5, अन्य संपूर्ण पाठ-संरचना 6, पुस्तक-पहचान 7, तुलसीदास की पाठ-प्रदर्शन परंपरा पर शोध 8 और अवधी की ग्रंथ-सूची 9। पूरा साक्ष्य व अधिकार-विवरण स्रोत-सूची में है।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

नीचे दिए गए सभी 43 पद मूल पाठ-अभिलेख के समान स्थिर पद-क्रम से जुड़े हैं। अर्थ और टिप्पणियाँ शिवगोरक्ष की स्वतंत्र संपादकीय रचना हैं, किसी आधुनिक अनुवाद की नकल नहीं।

चौपाई 1 {#chaupai-01-meaning}

अर्थ: ज्ञान और सद्गुणों के सागर, तीनों लोकों में प्रसिद्ध कपियों के श्रेष्ठ हनुमान की जय हो। व्याख्या: आरंभिक चौपाई में हनुमान का ज्ञान और चरित्र उनके पराक्रम जितना ही महत्वपूर्ण है। तीन लोक पौराणिक विश्व-दृष्टि का संकेत हैं।

चौपाई 2 {#chaupai-02-meaning}

अर्थ: हनुमान श्रीराम के दूत और अपार बल के धाम हैं; वे अंजनीपुत्र और पवनसुत कहलाते हैं। व्याख्या: अंजनीपुत्र और पवनसुत नाम कथा के अलग पहलुओं का संकेत करते हैं। उनका बल स्वामित्व दिखाने के लिए नहीं, सेवा और संदेश पहुँचाने के लिए प्रयुक्त होता है।

चौपाई 3 {#chaupai-03-meaning}

अर्थ: हे महावीर बजरंगी, आप दुर्बुद्धि दूर कर सद्बुद्धि के साथी बनते हैं। व्याख्या: बजरंगी नाम वज्र-जैसी दृढ़ता का बोध कराता है। यहाँ बाहरी बाधा से अधिक गलत सोच हटाने और उचित निर्णय लेने की कामना है।

चौपाई 4 {#chaupai-04-meaning}

अर्थ: आपके स्वर्णिम रूप और सुंदर वेश की शोभा है; कानों में कुण्डल तथा घुँघराले केश हैं। व्याख्या: यह काव्यात्मक रूप-वर्णन है, इतिहास में सिद्ध एकमात्र प्रतिमा-रूप नहीं। भिन्न क्षेत्रों की कला इन्हीं लक्षणों को अलग ढंग से दिखाती है।

चौपाई 5 {#chaupai-05-meaning}

अर्थ: आपके हाथ में वज्र और ध्वजा सुशोभित हैं तथा कंधे पर मूँज का जनेऊ है। व्याख्या: कुछ पाठों और चित्रों में शस्त्र का रूप वज्र अथवा गदा समझा जाता है; चुने हुए पाठ में ‘बज्र’ है। ध्वजा निष्ठा और जनेऊ अनुशासन की सांस्कृतिक छवि है।

चौपाई 6 {#chaupai-06-meaning}

अर्थ: शंकर के सुवन और केसरी के नंदन हनुमान का तेज तथा प्रताप जगत में वंदित है। व्याख्या: ‘शंकर सुवन’ रामभक्ति-केंद्रित रचना में शैव संबंध दिखाता है। भिन्न परंपराओं में इसकी व्याख्या अलग है; अंजनी और केसरी से जुड़े पारिवारिक रूपों को मिटाना उचित नहीं।

चौपाई 7 {#chaupai-07-meaning}

अर्थ: आप विद्वान, गुणी और अत्यंत चतुर हैं तथा रामकार्य करने को तत्पर रहते हैं। व्याख्या: ‘चातुर’ सेवा में लगने वाली व्यवहार-कुशल बुद्धि है। आदर्श निष्क्रिय आज्ञापालन नहीं, समय पर विवेकपूर्ण सहायता है।

चौपाई 8 {#chaupai-08-meaning}

अर्थ: आप प्रभु की कथा सुनने में रस लेते हैं और आपके हृदय में राम, लक्ष्मण व सीता बसे हैं। व्याख्या: यहाँ कथा-श्रवण भी भक्ति है। हृदय में रामपरिवार का बसना निष्ठा और स्नेहपूर्ण स्मरण का रूपक है।

चौपाई 9 {#chaupai-09-meaning}

अर्थ: आपने सूक्ष्म रूप में सीता को दर्शन दिए और विकट रूप से लंका दहन किया। व्याख्या: दो विपरीत रूप परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार दिखाते हैं: सीता से मिलते समय कोमलता और विरोधी सत्ता के सामने उग्रता। ये रामकथा की कथाएँ हैं।

चौपाई 10 {#chaupai-10-meaning}

अर्थ: आपने भीषण रूप धारण कर असुरों को परास्त किया और रामचंद्र के कार्य सँवारे। व्याख्या: इस चौपाई में सेवा के लिए किए गए पराक्रम की स्तुति है। युद्ध-चित्रण महाकाव्य-कथा का हिस्सा है, दैनिक जीवन में हिंसा का आदेश नहीं।

चौपाई 11 {#chaupai-11-meaning}

अर्थ: आप लक्ष्मण के लिए जीवनदायी औषधि लाए और प्रसन्न राम ने आपको हृदय से लगाया। व्याख्या: संजीवनी प्रसंग संकट में निष्काम सहायता की छवि है। विभिन्न रामकथाओं में औषधि और पर्वत के विवरण बदलते हैं; यहाँ उद्धार और राम की कृतज्ञता पर जोर है।

चौपाई 12 {#chaupai-12-meaning}

अर्थ: राम ने आपकी बड़ी प्रशंसा कर कहा कि आप उनके भाई भरत के समान प्रिय हैं। व्याख्या: भरत से तुलना हनुमान को राम के अत्यंत निकट स्नेह-संबंध में रखती है। सम्मान जन्माधारित पद से नहीं, निष्ठा से मिलता है।

चौपाई 13 {#chaupai-13-meaning}

अर्थ: असंख्य मुख आपके यश का गान करते हैं; ऐसा कहकर प्रभु ने आपको गले लगाया। व्याख्या: ‘सहस बदन’ शेषनाग के हजार मुखों की स्मृति भी दिला सकता है और अनगिनत प्रशंसकों का संकेत भी है। आलिंगन भक्ति में स्नेह का महत्त्व रेखांकित करता है।

चौपाई 14 {#chaupai-14-meaning}

अर्थ: सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, नारद, सरस्वती और अहीश अर्थात् नागराज भी आपकी स्तुति करते हैं। व्याख्या: इस सूची में पौराणिक ज्ञान-परंपराओं के अनेक व्यक्तित्व आते हैं। ‘सारद’ सामान्यतः सरस्वती और ‘अहीसा’ शेषनाग समझे जाते हैं; ये अर्थ-निर्णय हैं।

चौपाई 15 {#chaupai-15-meaning}

अर्थ: यम, कुबेर, दिग्पाल और बड़े विद्वान कवि भी आपकी महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। व्याख्या: भक्तिकाव्य की अतिशयोक्ति में अपार महिमा श्रद्धा व्यक्त करती है; इसे देवताओं के कथनों का ऐतिहासिक अभिलेख नहीं मानना चाहिए।

चौपाई 16 {#chaupai-16-meaning}

अर्थ: आपने सुग्रीव को राम से मिलाकर उनका उपकार किया और राज्यपद दिलाने में सहायता की। व्याख्या: यहाँ हनुमान की मध्यस्थता और विश्वास दिलाने की क्षमता युद्धबल जितनी महत्वपूर्ण है। प्रसंग किष्किन्धा में राम-सुग्रीव मैत्री से जुड़ा है।

चौपाई 17 {#chaupai-17-meaning}

अर्थ: विभीषण ने आपका परामर्श स्वीकार किया और लंका के राजा बने, ऐसा व्यापक रूप से कहा जाता है। व्याख्या: विभीषण के निर्णय में अन्य पात्रों की भूमिका भी रामकथा की कुछ परंपराओं में प्रमुख है। चालीसा का कवि पूरी कथा को हनुमान की सलाह की संक्षिप्त प्रशंसा में समेटता है।

चौपाई 18 {#chaupai-18-meaning}

अर्थ: बाल-लीला में आपने दूर स्थित सूर्य को मधुर फल समझकर उसकी ओर छलांग लगाई। व्याख्या: ‘जुग सहस्र जोजन’ को सूर्य-पृथ्वी की वैज्ञानिक दूरी निकालने का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। यह पौराणिक भाषा में बालसुलभ ऊर्जा का चित्र है।

चौपाई 19 {#chaupai-19-meaning}

अर्थ: प्रभु की मुद्रिका मुख में रखकर आपने समुद्र पार किया, जो आपके लिए अचरज नहीं था। व्याख्या: सुंदरकाण्ड में अंगूठी सीता के सामने पहचान का चिह्न है। अद्भुत समुद्र-लाँघन का उद्देश्य उनका विश्वास और आशा जगाना है।

चौपाई 20 {#chaupai-20-meaning}

अर्थ: आपकी कृपा से जगत के कठिन कार्य भी सुगम होने की प्रार्थना व्यक्त की जाती है। व्याख्या: यह दैवी सहायता में विश्वास का पद है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर कठिनाई बिना प्रयास अपने आप समाप्त हो जाएगी।

चौपाई 21 {#chaupai-21-meaning}

अर्थ: आप राम के द्वारपाल हैं; आपकी अनुमति के बिना प्रवेश नहीं होता। व्याख्या: राम के द्वार की छवि बताती है कि हनुमान-जैसी निष्ठा, विनम्रता और सेवा साधक को रामभक्ति के निकट ले जाती है। यह उपासकों पर लागू कोई वास्तविक प्रवेश-प्रतिबंध नहीं।

चौपाई 22 {#chaupai-22-meaning}

अर्थ: आपकी शरण में आने वालों को सुख और निर्भयता मिलने की श्रद्धा व्यक्त की गई है। व्याख्या: यह आध्यात्मिक आश्वासन की भाषा है, हर जोखिम से भौतिक सुरक्षा की गारंटी नहीं। जीवन में आवश्यक सावधानियाँ बनी रहती हैं।

चौपाई 23 {#chaupai-23-meaning}

अर्थ: आप अपने तेज को स्वयं संभालते हैं और आपकी हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं। व्याख्या: असीम शक्ति के साथ आत्मसंयम जोड़ा गया है। हनुमान का तेज अनियंत्रित आवेग नहीं, साधी हुई शक्ति का आदर्श है।

चौपाई 24 {#chaupai-24-meaning}

अर्थ: महावीर हनुमान का नाम लेने पर भूत-पिशाच दूर रहते हैं, ऐसी लोकभक्ति में मान्यता है। व्याख्या: कहीं इसे शाब्दिक रूप से, कहीं भय से मुक्ति के प्रतीक रूप में समझते हैं। इससे अलौकिक घटनाओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं होती।

चौपाई 25 {#chaupai-25-meaning}

अर्थ: वीर हनुमान के निरंतर स्मरण से रोग और पीड़ा मिटने की प्रार्थना की गई है। व्याख्या: यह भक्तिपरक सांत्वना और राहत की आशा है, चिकित्सा-पद्धति या ठीक होने का निश्चित दावा नहीं। पूजा के साथ आवश्यक इलाज जारी रखना चाहिए।

चौपाई 26 {#chaupai-26-meaning}

अर्थ: मन, कर्म और वचन से उनका ध्यान रखने वालों के संकट हरने की श्रद्धा व्यक्त की गई है। व्याख्या: मन, कर्म और वचन की त्रयी आचरण की एकरूपता पर बल देती है: भक्ति केवल उच्चारण नहीं, व्यवहार में भी झलकती है।

चौपाई 27 {#chaupai-27-meaning}

अर्थ: राम को तपस्वी राजा कहकर उनकी महिमा गाई गई है और उनके कार्यों को हनुमान द्वारा सँवारने की बात कही गई है। व्याख्या: यह पद स्पष्ट रूप से रामकेंद्रित है। हनुमान के शैव संबंध के कारण पूरे स्तोत्र का आशय किसी दूसरी उपासना में बदलना उचित नहीं।

चौपाई 28 {#chaupai-28-meaning}

अर्थ: जो भक्त अपनी मनोकामना लेकर आता है, उसके जीवन में उत्तम फल मिलने का भक्तिपरक विश्वास व्यक्त है। व्याख्या: ‘अमित फल’ महिमा का व्यापक शब्द है। इसे सदिच्छा और सेवा के संदर्भ में पढ़ना बेहतर है, किसी निश्चित फल का सौदा समझना नहीं।

चौपाई 29 {#chaupai-29-meaning}

अर्थ: चारों युगों में आपकी महिमा प्रकाशित बताई जाती है और जगत में उसका यश फैला है। व्याख्या: चार युग पारंपरिक कालचक्र की संकल्पना हैं। यहाँ स्थायी महिमा का बोध है, आधुनिक इतिहास की वर्ष-दर-वर्ष गणना नहीं।

चौपाई 30 {#chaupai-30-meaning}

अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक, दुष्ट शक्तियों के विनाशक और राम के प्रिय कहलाते हैं। व्याख्या: साधु-संतों की रक्षा समुदाय के कल्याण से जुड़ी है। असुर-विनाश की काव्य-भाषा किसी असहमत व्यक्ति को राक्षस ठहराने की छूट नहीं देती।

चौपाई 31 {#chaupai-31-meaning}

अर्थ: जनकनंदिनी सीता ने आपको आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दान का वर दिया, ऐसी मान्यता है। व्याख्या: अलग ग्रंथों में सिद्धियों और निधियों की सूचियाँ बदल सकती हैं। यह भक्तिकथा का वरदान है, किसी साधक के लिए अलौकिक शक्तियों की गारंटी नहीं।

चौपाई 32 {#chaupai-32-meaning}

अर्थ: आपके पास रामभक्ति का अमृत-तत्त्व है और आप सदा रघुपति के सेवक बने रहते हैं। व्याख्या: ‘राम रसायन’ भक्ति के रूपांतरणकारी अमृत का रूपक है, कोई रासायनिक दवा नहीं। इसका केंद्र प्रेम और निरंतर सेवा है।

चौपाई 33 {#chaupai-33-meaning}

अर्थ: आपकी भक्ति से राम की प्राप्ति और जन्म-जन्मांतर के दुःख मिटने की कामना बताई गई है। व्याख्या: हनुमान यहाँ उपासक को स्वयं से आगे राम तक ले जाने वाले मार्गदर्शक हैं। जन्म-जन्मांतर का कथन धार्मिक दृष्टिकोण है, प्रयोग से सिद्ध प्रक्रिया नहीं।

चौपाई 34 {#chaupai-34-meaning}

अर्थ: अंत समय रामधाम की प्राप्ति अथवा हरिभक्त रूप में जन्म की श्रद्धा व्यक्त होती है। व्याख्या: परलोक और पुनर्जन्म की दोनों छवियाँ भक्ति के निरंतर रहने की कामना हैं। इन्हें निश्चित भविष्यवाणी नहीं बताना चाहिए।

चौपाई 35 {#chaupai-35-meaning}

अर्थ: इस पद में अन्य देवताओं पर चित्त न लगाकर हनुमान की सेवा में सुख पाने की एकनिष्ठ भक्ति व्यक्त है। व्याख्या: यह इस स्तुति की एकनिष्ठ भक्ति की वाणी है; अन्य हिंदू उपासनाओं पर सार्वभौमिक निषेध नहीं।

चौपाई 36 {#chaupai-36-meaning}

अर्थ: बलवान हनुमान का स्मरण करने वालों के संकट और पीड़ा मिटने की प्रार्थना है। व्याख्या: कठिन समय में साहस जगाने के लिए आश्वासन दोहराया गया है। भक्तिकाव्य का दोहराव वैज्ञानिक प्रमाण नहीं बन जाता।

चौपाई 37 {#chaupai-37-meaning}

अर्थ: हनुमान गोसाईं की बार-बार जय हो; वे गुरु के समान कृपा करें। व्याख्या: ‘गोसाईं’ और ‘गुरुदेव’ के संबोधन हनुमान को आध्यात्मिक पथप्रदर्शक भी बनाते हैं। इससे सामान्य पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य होने का निष्कर्ष नहीं निकलता।

चौपाई 38 {#chaupai-38-meaning}

अर्थ: रचना में सौ बार पाठ करने वाले के बंधन से छूटने और सुख पाने का फल बताया गया है। व्याख्या: यहाँ ‘सत बार’ का अर्थ सामान्यतः सौ पाठ लिया जाता है, पर गिनती की परंपराएँ भिन्न हैं। यह पारंपरिक फलश्रुति है, सुनिश्चित परिणाम या अनिवार्य साधना-विधान नहीं।

चौपाई 39 {#chaupai-39-meaning}

अर्थ: जो हनुमान चालीसा पढ़ता है उसे सिद्धि मिलने की आस्था व्यक्त की गई है और गौरीश को साक्षी कहा गया है। व्याख्या: ‘गौरीश’ पार्वतीपति शिव का नाम है। इस प्रकार फलश्रुति में शैव संबोधन आता है। ‘सिद्धि’ को हर बार अलौकिक शक्ति मानना आवश्यक नहीं।

चौपाई 40 {#chaupai-40-meaning}

अर्थ: तुलसीदास स्वयं को सदा हरि का सेवक कहकर प्रभु से हृदय में निवास की प्रार्थना करते हैं। व्याख्या: ‘तुलसीदास’ की कवि-छाप रचना के भीतर है। यह पारंपरिक श्रेय का महत्त्वपूर्ण संकेत है, किंतु अपने-आप मूल पांडुलिपि या निश्चित रचनाकाल सिद्ध नहीं करती।

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