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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

कवच

देवी कवचम् (चण्डी कवच)

चण्डी-पाठ से पहले पढ़ा जाने वाला देवी का ५६-श्लोकीय संरक्षण-स्तोत्र।

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सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

प्रारंभिक पाठ

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । चामुण्डा देवता । अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम् । दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम् । श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ॥ ॐ नमश्चण्डिकायै ॥

अर्थ

पारम्परिक विनियोग ब्रह्मा को ऋषि, अनुष्टुप् को छन्द और चामुण्डा को देवता बताकर कवच को सप्तशती-पाठ के सन्दर्भ में रखता है तथा चण्डिका को नमस्कार करता है।

व्याख्या

यह पाठ में दिया गया पूजा-सन्दर्भ है, शिवगोरक्ष की ओर से न्यास, दिग्बन्ध या गूढ़ अनुष्ठान करने की विधि नहीं। इसका शब्दरूप ऐतिहासिक मुद्रित पाठ से अभी जाँचना है।

1

ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् । यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥

अर्थ

मार्कण्डेय ब्रह्मा से मनुष्यों की रक्षा करने वाला अत्यन्त गोपनीय उपदेश बताने का अनुरोध करते हैं।

व्याख्या

आरम्भिक प्रश्न कवच को गुरु-शिष्य संवाद की तरह प्रस्तुत करता है; यह स्वयं कोई अनुष्ठान-विधि नहीं है।

2

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् । देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥

अर्थ

ब्रह्मा उत्तर देते हैं कि देवी का पवित्र कवच प्राणियों के हित से जुड़ा गूढ़ उपदेश है।

व्याख्या

कवच का सामान्य अर्थ सुरक्षा-कवच है; यहाँ यह आध्यात्मिक आश्रय का बिम्ब है, धातु का वस्त्र नहीं।

3

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥

अर्थ

नवदुर्गा के पहले चार नाम शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा और कूष्माण्डा हैं।

व्याख्या

यहाँ नवदुर्गा के चार नाम हैं; उनके पूरे पर्व-कथानक इस श्लोक में नहीं कहे गए हैं।

4

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च । सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥

अर्थ

इसके बाद स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और महागौरी का उल्लेख है।

व्याख्या

पाँचवें से आठवें तक के क्रमसूचक शब्द पिछले और अगले श्लोक से जुड़े हैं।

5

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः । उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥

अर्थ

नौवाँ नाम सिद्धिदात्री है; इन नौ दुर्गा-रूपों का परिचय ब्रह्मा से जुड़ा बताया गया है।

व्याख्या

सिद्धिदात्री नौवें रूप का नाम है; इससे चमत्कारी फल की अनिवार्य गारंटी नहीं निकलती।

6

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे । विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥

अर्थ

अग्नि, युद्ध, संकट या दुर्गम परिस्थिति में पड़े लोग भय से देवी की शरण लेते हैं।

व्याख्या

युद्ध और अग्नि की छवियाँ संकटग्रस्त मनुष्य की असुरक्षा दिखाती हैं; उत्तर है शरणागति।

7

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे । नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ॥

अर्थ

स्तुति आश्वासन देती है कि शरणागत को युद्ध-संकट, विपत्ति, शोक और भय से बचाव मिलेगा।

व्याख्या

यह स्तोत्र के भीतर दिया गया आश्वासन है, वास्तविक जीवन में चोट या संकट न होने का प्रमाण नहीं।

8

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते । ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ॥

अर्थ

भक्तिभाव से देवी का स्मरण उन्नति का कारण बताया गया है; उन्हें स्मरण करने वालों की रक्षा का आश्वासन दिया गया है।

व्याख्या

स्मरण और अभ्युदय का सम्बन्ध भक्ति-वाणी में व्यक्त है; केवल आर्थिक उन्नति इसका एकमात्र अर्थ नहीं।

9
विषय-सूची पर लौटें

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना । ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ॥

अर्थ

चामुण्डा, वाराही, ऐन्द्री और वैष्णवी का वर्णन उनके विशेष आसनों और वाहनों सहित होता है।

व्याख्या

वाहन-चित्र अलग-अलग मातृकाओं को पहचान देते हैं; सभी परम्पराओं की एक जैसी मूर्तिसूची नहीं बनाते।

10

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना । लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥

अर्थ

माहेश्वरी वृषभ, कौमारी मयूर से जुड़ी हैं और लक्ष्मी कमलासन तथा कमलहस्ता कही गई हैं।

व्याख्या

लक्ष्मी का कमल युद्धरूपों के साथ रखा गया है; देवी-शक्ति के सौम्य और उग्र दोनों पक्ष उभरते हैं।

11

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना । ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥

अर्थ

ईश्वरी के श्वेत रूप और वृषभ-वाहन का तथा ब्राह्मी के हंस-वाहन और आभूषणों का वर्णन है।

व्याख्या

ब्राह्मी और ईश्वरी के चिह्नों की किसी विशिष्ट परम्परा से तुलना प्रकाशन से पहले आवश्यक है।

12

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः । नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥

अर्थ

सभी मातृशक्तियों को योग-सामर्थ्य तथा विविध रत्नाभूषणों से शोभित बताया गया है।

व्याख्या

भिन्न माताओं का साझा प्रयोजन है; आभूषण काव्यात्मक ऐश्वर्य के चिह्न हैं।

13

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः । शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ॥

अर्थ

देवियाँ रथों पर, शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल जैसे आयुध लिए दिखाई देती हैं।

व्याख्या

आयुधों की सूची पौराणिक युद्ध-प्रतीक है; इसे हिंसा के निर्देश की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।

14

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च । कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥

अर्थ

ढाल, तोमर, परशु, पाश, भाला, त्रिशूल और श्रेष्ठ धनुष आदि आयुधों का भी उल्लेख है।

व्याख्या

आयुध-शब्दों के कई विशिष्ट अर्थ हो सकते हैं; हर शब्द को एक आधुनिक हथियार से जोड़ना ठीक नहीं।

15

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च । धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥

अर्थ

इन आयुधों का प्रयोजन दैत्य-विनाश, भक्तों का अभय और देवताओं का हित बताया गया है।

व्याख्या

भीषण आयुधों के साथ अभय की कल्पना बताती है कि उग्र रूप भी भक्ति-स्तुति में क्यों आते हैं।

16

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे । महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥

अर्थ

भीषण पराक्रम, महाबल और उत्साह से युक्त, महान् भय दूर करने वाली देवी को नमस्कार है।

व्याख्या

रौद्र केवल क्रोध का वर्णन नहीं; वह महाशक्ति की प्रखरता का स्तुतिपरक रूप है।

17

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्द्धिनि । प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥

अर्थ

प्रार्थना में पूर्व दिशा के लिए ऐन्द्री और आग्नेय दिशा के लिए अग्निदेवता का आवाहन है।

व्याख्या

दिशा-रक्षा यहाँ आरम्भ होती है; आग्नेय का अर्थ दक्षिण-पूर्व है, केवल पूर्व नहीं।

18

दक्षिणेऽवतु वाराही नैरृत्यां खड्गधारिणी । प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी ॥

अर्थ

दक्षिण में वाराही, नैऋत्य में खड्गधारिणी, पश्चिम में वारुणी और वायव्य में मृगवाहिनी रक्षा करें।

व्याख्या

दिशाएँ सर्वांगीण संरक्षण का रूपक हैं; विभिन्न पूजा-पुस्तकों में देवी-नाम बदल सकते हैं।

19
विषय-सूची पर लौटें

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी । ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा ॥

अर्थ

उत्तर में कौमारी, ईशान में शूलधारिणी, ऊपर ब्राह्मी और नीचे वैष्णवी की रक्षा-भावना रखी गई है।

व्याख्या

पिछले दो पदों के साथ आठ दिशाएँ और ऊपर-नीचे मिलकर दस दिशाएँ पूर्ण होती हैं।

20

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना । जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥

अर्थ

चामुण्डा से दसों दिशाओं में, जया से आगे और विजया से पीछे रक्षा की प्रार्थना है।

व्याख्या

जया-विजया के नाम विजय-बोधक हैं; आगे-पीछे की नियुक्ति इसी पाठ की है।

21

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता । शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥

अर्थ

बाएँ अजिता, दाएँ अपराजिता, शिखा पर उद्योतिनी और सिर पर उमा की रक्षा का उल्लेख है।

व्याख्या

बाहरी दिशाओं के बाद कवच शरीर के पास की जगहों पर केन्द्रित होने लगता है।

22

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी । त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ॥

अर्थ

मालाधरी ललाट, यशस्विनी भौंहों, त्रिनेत्रा भ्रूमध्य और यमघण्टा नासिका की रक्षा करें।

व्याख्या

ललाट और भौंहों की रक्षा के साथ शिर से पाद तक की सूची खुलती है।

23

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी । कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ॥

अर्थ

शङ्खिनी, द्वारवासिनी, कालिका और शाङ्करी का नेत्रों, कानों तथा कपोलों से सम्बन्ध बताया गया है।

व्याख्या

कालिका और शाङ्करी को मिलाकर एक नाम न बनाएं; पास के अंगों में अलग नाम हैं।

24

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका । अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ॥

अर्थ

सुगन्धा, चर्चिका और अमृतकला नासिका एवं होंठों की; सरस्वती जिह्वा की रक्षा करें।

व्याख्या

जिह्वा की रक्षक सरस्वती होने से वाणी और ज्ञान भी सुरक्षा-कल्पना का हिस्सा बनते हैं।

25

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका । घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ॥

अर्थ

कौमारी दाँतों, चण्डिका कण्ठ, चित्रघण्टा घण्टिका तथा महामाया तालु की रक्षा करें।

व्याख्या

घण्टिका यहाँ शरीर के कण्ठ-भाग का शब्द है, घंटी बजाने की प्रक्रिया नहीं।

26

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गला । ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥

अर्थ

कामाक्षी ठोड़ी, सर्वमङ्गला वाणी, भद्रकाली ग्रीवा और धनुर्धरी रीढ़ की रक्षा करें।

व्याख्या

वाणी, ग्रीवा और रीढ़ की सूची पूजा-काव्य है; यह किसी चिकित्सकीय उपचार का मानचित्र नहीं।

27

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी । स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी ॥

अर्थ

नीलग्रीवा और नलकूबरी कण्ठ-प्रदेश की, खड्गिनी कन्धों की और वज्रधारिणी भुजाओं की रक्षा करें।

व्याख्या

नलकूबरी और नलिका जैसे शब्द ऐतिहासिक मुद्रित पाठ से विशेष रूप से जाँचे जाएँ।

28

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च । नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥

अर्थ

दण्डिनी हाथों, अम्बिका अँगुलियों, शूलेश्वरी नाखूनों और कुलेश्वरी उदर-पार्श्व की रक्षा करें।

व्याख्या

अँगुलियों और नाखूनों का उल्लेख कवच की सूक्ष्म संरक्षण-कल्पना दिखाता है।

29
विषय-सूची पर लौटें

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी । हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥

अर्थ

महादेवी स्तनों, शोकविनाशिनी मन, ललिता हृदय तथा शूलधारिणी उदर की रक्षा करें।

व्याख्या

शरीर के साथ मन और शोक की रक्षा-प्रार्थना बताती है कि कवच केवल बाहरी संकट की बात नहीं करता।

30

नाभौ च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा । पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ॥

अर्थ

कामिनी नाभि, गुह्येश्वरी गुह्य-अंग और अन्य मातृरूप शरीर के निजी अंगों की रक्षा करें।

व्याख्या

निजी अंगों का उल्लेख संयम से हुआ है; यह न यौन-निर्देश है, न चिकित्सा-विधि।

31

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी । जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥

अर्थ

भगवती कटि, विन्ध्यवासिनी घुटनों और महाबला पिंडलियों की रक्षा करें।

व्याख्या

विन्ध्यवासिनी एक क्षेत्र-सम्बद्ध देवी-नाम है; इससे पाठक की परम्परा का अनुमान न लगाएँ।

32

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी । पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥

अर्थ

नारसिंही टखनों, तैजसी पाँव के ऊपरी भाग और श्री अँगुलियों तथा तलवों की रक्षा करें।

व्याख्या

यह श्लोक पैरों और तलवों तक पहुँचकर शरीर-रक्षा की अगली कड़ी पूरी करता है।

33

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी । रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥

अर्थ

दंष्ट्राकराली नाखून, ऊर्ध्वकेशिनी केश, कौबेरी रोमकूप और वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें।

व्याख्या

इसके बाद केश, त्वचा और रोमकूप तक सुरक्षा की परिकल्पना फैलती है।

34

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती । अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ॥

अर्थ

पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस और अस्थियों की; कालरात्रि आंत्र तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें।

व्याख्या

रक्त, मज्जा आदि पूर्व-आधुनिक शारीरिक श्रेणियाँ हैं; इनके आधार पर चिकित्सा-फल सिद्ध नहीं होता।

35

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा । ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ॥

अर्थ

पद्मावती पद्मकोश, चूडामणि कफ, ज्वालामुखी नख-तेज और अभेद्या सभी सन्धियों की रक्षा करें।

व्याख्या

पद्मकोश की व्याख्या परम्परानुसार अलग हो सकती है; सटीक अर्थ के लिए समीक्षा चाहिए।

36

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा । अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥

अर्थ

ब्राह्मी शुक्र, छत्रेश्वरी छाया और धर्मधारिणी अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें।

व्याख्या

मन, बुद्धि और अहंकार अलग दार्शनिक शब्द हैं; कवच में भीतरी जीवन का संरक्षण भी आता है।

37

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् । वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥

अर्थ

प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नामक जीवनवायुओं की रक्षा के लिए देवी का स्मरण है।

व्याख्या

पाँच प्राण-वायु शास्त्रीय जीवन-दृष्टि के पद हैं; इन्हें आधुनिक श्वसन-माप न समझें।

38

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी । सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥

अर्थ

योगिनी रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श से जुड़ी अनुभूतियों की, नारायणी तीनों गुणों की रक्षा करें।

व्याख्या

इन्द्रियाँ और सत्त्व-रजस्-तमस् कवच को व्यापक दार्शनिक शब्दावली से जोड़ते हैं।

39
विषय-सूची पर लौटें

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी । यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ॥

अर्थ

वाराही आयु, वैष्णवी धर्म और चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करें।

व्याख्या

अब धर्म, विद्या, धन और कीर्ति जैसे जीवन के मूल्य भी प्रार्थना में आ जाते हैं।

40

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके । पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ॥

अर्थ

इन्द्राणी कुल-परम्परा, चण्डिका पशुओं, महालक्ष्मी पुत्रों और भैरवी पत्नी की रक्षा करें।

व्याख्या

पुत्र और पत्नी जैसे सम्बन्ध पाठ के समय के पारिवारिक संसार को दर्शाते हैं; आज के सभी परिवारों की यही सीमा नहीं।

41

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा । राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥

अर्थ

सुपथा और क्षेमकरी मार्ग की तथा महालक्ष्मी और विजया राजद्वार व अन्य स्थानों में रक्षा करें।

व्याख्या

राजद्वार प्राचीन राजकीय सम्पर्क का संकेत है; यात्रा और सार्वजनिक व्यवहार की चिन्ता भी यहाँ है।

42

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु । तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥

अर्थ

पहले के कवच-वर्णन में जो कुछ छूट गया है, उसकी रक्षा की प्रार्थना जयन्ती से की गई है।

व्याख्या

जो स्थान छूट गया उसके लिए अलग प्रार्थना बताती है कि सब आशंकाएँ गिनना सम्भव नहीं।

43

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः । कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ॥

अर्थ

पाठ कहता है कि कल्याण चाहने वाला व्यक्ति देवी-कवच के संरक्षण के भाव को साथ रखकर चले।

व्याख्या

'एक पग न चलना' स्तोत्र की भावात्मक भाषा है; शिवगोरक्ष इसे अनिवार्य आचरण नहीं घोषित करता।

44

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् । परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥

अर्थ

फलश्रुति कवच-स्मरण से सफलता, कामना-पूर्ति और विशेष समृद्धि का दावा करती है।

व्याख्या

निश्चित फल-प्राप्ति फलश्रुति की धार्मिक घोषणा है; उसे सिद्ध तथ्य न बनाया जाए।

45

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः । त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ॥

अर्थ

कवच-आश्रित व्यक्ति को निर्भय, अपराजित और त्रिलोक में सम्मानित बताया गया है।

व्याख्या

युद्ध में अजेय होने का चित्र सुरक्षा-रूपक है, व्यक्तिगत सुरक्षा की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

46

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् । यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ॥

अर्थ

देवी का कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ और श्रद्धा से किए जाने वाले पाठ के योग्य बताया गया है।

व्याख्या

त्रिसन्ध्या का अर्थ दिन के तीन संधिकाल हैं; शब्दार्थ बताना जप की समय-सारणी देना नहीं।

47

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः । जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥

अर्थ

यह पद दैवी सामर्थ्य, विजय तथा अकाल-मृत्यु से मुक्त दीर्घायु का वचन देता है।

व्याख्या

शतायु और अकालमृत्यु का धार्मिक वाक्य स्वास्थ्य की गारंटी या चिकित्सा का विकल्प नहीं है।

48

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः । स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ॥

अर्थ

स्तुति में रोग, विविध हानिकारक तत्व और विष के प्रभाव समाप्त होने का धार्मिक दावा है।

व्याख्या

रोग और विष से रक्षा की भाषा आस्था का कथन है; संक्रमण या विषाक्तता की चिकित्सा नहीं।

49
विषय-सूची पर लौटें

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले । भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चौपदेशिकाः ॥

अर्थ

अभिचार-संबद्ध क्रियाओं और भूमि, आकाश तथा जल से जुड़े भयकारक तत्वों का उल्लेख है।

व्याख्या

अभिचार पुराने धार्मिक सन्दर्भ का शब्द है; उसे करने या काटने की कोई विधि यहाँ नहीं सिखाई जाती।

50

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा । अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ॥

अर्थ

डाकिनी, शाकिनी आदि अनेक भयप्रद शक्तियों का उल्लेख तत्कालीन धार्मिक कल्पना के अनुसार है।

व्याख्या

डाकिनी-शाकिनी के अर्थ परम्परा के अनुसार बदलते हैं; सभी सम्प्रदाय इन्हें हमेशा भयावह नहीं मानते।

51

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः । ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः ॥

अर्थ

ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, राक्षस, वेताल और भैरव आदि की सूची आगे चलती है।

व्याख्या

अदृश्य भयकारकों की सूची पुरानी धर्म-दृष्टि का हिस्सा है; इससे सामान्य जीवन में अनावश्यक भय न बढ़े।

52

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते । मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥

अर्थ

कवच को हृदय में धारण करने वाले के सामने ऐसे भय नष्ट होने और मान-प्रतिष्ठा बढ़ने का दावा है।

व्याख्या

हृदय में कवच धारण करना स्मरण का भाव भी हो सकता है; प्रतिष्ठा-फल फिर भी पाठ का दावा है।

53

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले । जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ॥

अर्थ

यह पद कीर्ति का आश्वासन देता है और कवच को सप्तशती-पाठ से पहले रखने की परम्परा बताता है।

व्याख्या

सप्तशती का स्पष्ट उल्लेख पाठ-परम्परा का सम्बन्ध दिखाता है, पर कवच चौदहवाँ अध्याय नहीं है।

54

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् । तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी ॥

अर्थ

फलश्रुति सन्तति के पृथ्वी, पर्वत और वनों के रहने तक बने रहने का वर्णन करती है।

व्याख्या

वंश-निरन्तरता की प्रार्थना पारम्परिक पारिवारिक आदर्श से जुड़ी है; इसे सन्तान-प्राप्ति की गारंटी न मानें।

55

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् । प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ॥

अर्थ

महामाया की कृपा से मृत्यु के बाद देवताओं के लिए भी दुर्लभ परम पद मिलने का कथन है।

व्याख्या

मरणोपरान्त परम पद धार्मिक विश्वदृष्टि का कथन है; इसका अनुभवजन्य सत्यापन दावा नहीं है।

56

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ ॐ ॥

अर्थ

अन्तिम अर्धश्लोक परम अवस्था और शिव के साथ आनन्द की बात करता है।

व्याख्या

चुने हुए पाठ का अन्त अर्धश्लोक और ॐ से होता है; छन्द पूरा दिखाने हेतु दूसरी पंक्ति गढ़ना उचित नहीं।

इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम् ।

अर्थ

इस प्रकार देवी-कवच का पाठ पूर्ण हुआ।

व्याख्या

समापन-पंक्ति चुने हुए पाठ का अन्त बताती है; यह अलग क्रमांकित श्लोक नहीं है।

सन्दर्भ और उपयोग

परिचय और पाठ की पहचान

देवी कवचम् में भक्त देवी से दसों दिशाओं, शरीर के विभिन्न अंगों, मन, प्राण और जीवन के सम्बन्धों की रक्षा की प्रार्थना करता है। यह केवल युद्ध के समय पहने जाने वाले किसी बाहरी कवच का चित्र नहीं है। नवदुर्गाओं, मातृकाओं और अनेक देवी-रूपों के माध्यम से काव्य मानव-जीवन की असुरक्षा, शरणागति और आशा को व्यक्त करता है। अन्त के फलश्रुति पद धार्मिक लाभों का वर्णन करते हैं। 1 2

पाठ की पहचान: यहाँ ५६ क्रमांकित श्लोकों वाला सम्पूर्ण चयनित डिजिटल पाठ दिया गया है, न कि किसी बड़े स्तोत्र का छोटा अंश। प्रारम्भिक विनियोग और समापन-पंक्ति अलग रखे गए हैं—इस प्रकार कुल ५८ पठन-इकाइयाँ हैं। कुछ अन्य पाठों में ६१ श्लोक मिलते हैं; उनके क्रम को यहाँ के ५६-पाठ से मिला नहीं दिया गया है। कथा-फलक में मार्कण्डेय पूछते और ब्रह्मा उत्तर देते हैं; इससे किसी ऐतिहासिक रचयिता का प्रमाण नहीं मिलता। कवच को चण्डी/दुर्गा-सप्तशती का पूर्वाङ्ग माना जाता है, पर यह देवीमाहात्म्य के तेरह मुख्य अध्यायों में से कोई अध्याय नहीं है। 1 4 6

पढ़ने का क्रम: पहले पूरा देवनागरी मूल पाठ है, उसके बाद प्रत्येक श्लोक का हिन्दी अर्थ और अलग व्याख्या। संरक्षण, रोग-मुक्ति, विजय, सन्तान, दीर्घायु और मृत्यु-पश्चात् फल के कथन आस्था-सम्बन्धी फलश्रुति हैं; चिकित्सा या जीवन-सुरक्षा का प्रमाण नहीं। यहाँ न्यास, दीक्षा, दिग्बन्ध, प्रयोग या जप-संख्या जैसी विशेष विधियाँ नहीं बताई जातीं। 1

श्लोकानुसार अर्थ और व्याख्या

विनियोग

अर्थ: पारम्परिक विनियोग ब्रह्मा को ऋषि, अनुष्टुप् को छन्द और चामुण्डा को देवता बताकर कवच को सप्तशती-पाठ के सन्दर्भ में रखता है तथा चण्डिका को नमस्कार करता है। व्याख्या: यह पाठ में दिया गया पूजा-सन्दर्भ है, शिवगोरक्ष की ओर से न्यास, दिग्बन्ध या गूढ़ अनुष्ठान करने की विधि नहीं। इसका शब्दरूप ऐतिहासिक मुद्रित पाठ से अभी जाँचना है।

समापन

अर्थ: इस प्रकार देवी-कवच का पाठ पूर्ण हुआ। व्याख्या: समापन-पंक्ति चुने हुए पाठ का अन्त बताती है; यह अलग क्रमांकित श्लोक नहीं है।

कवच की रचना और अर्थ-परम्परा

नवदुर्गा (३–५): आरम्भ के पद देवी के नौ रूपों को क्रम से पहचानते हैं। इन्हें पढ़ते हुए अलग-अलग पर्व-परम्पराओं के अनुष्ठानों को बिना स्रोत जोड़े यहाँ न मिला दें। मातृकाएँ और आयुध (९–१६): वाहन और आयुध भिन्न देवी-शक्तियों के सहयोग को चित्रित करते हैं। इनका नैतिक या प्रतीकात्मक अर्थ निकालना शिवगोरक्ष की व्याख्या है; उसे मूल संस्कृत का शब्दशः अर्थ नहीं कहा गया है। दिशाएँ (१७–२१) और शरीर (२२–३८): प्रार्थना पूर्व-पश्चिम, ऊर्ध्व-अधो से लेकर इन्द्रियों, अंगों और भीतरी जीवन-क्रियाओं तक फैलती है। यह श्रद्धापूर्ण कल्पना है, आधुनिक शरीर-विज्ञान नहीं। परिवार और जीवन (३९–४२): धर्म, विद्या, यात्रा और सम्बन्ध रचना के सामाजिक परिवेश को सामने रखते हैं। फलश्रुति (४३–५६): निर्भयता, रोग-नाश, सम्पत्ति, सन्तति और मुक्ति के आश्वासन धार्मिक कथन हैं; आज के पाठक के लिए गारंटी नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यह देवीमाहात्म्य का चौदहवाँ अध्याय है? नहीं। यह चण्डी/सप्तशती के पूर्वाङ्ग पाठ से जुड़ा स्तोत्र है। मूल देवीमाहात्म्य के तेरह कथात्मक अध्याय अलग हैं। 6

कहीं ५६ और कहीं ६१ श्लोक क्यों मिलते हैं? भिन्न पाठ-विभाजन और पाठ-परम्पराएँ हैं। इस संस्करण में प्रमाणित पहचान के साथ चयनित ५६-श्लोकीय पाठ रखा गया है; दूसरी परम्परा का पाठ जोड़कर संख्या नहीं बढ़ाई गई। 1 4

'कवच' क्या पहनने वाली कोई वस्तु है? सामान्य अर्थ में कवच रक्षा करने वाला आवरण है; इस स्तोत्र में विविध देवी-नामों के माध्यम से आध्यात्मिक रक्षा की प्रार्थना की जाती है। इससे दुर्घटना या बीमारी से शत-प्रतिशत सुरक्षा का प्रमाण नहीं मिलता।

विनियोग में न्यास की बात है; क्या यह विधि बताई गई है? नहीं। मूल पाठ का विनियोग दिखाया गया है, पर न्यास, दिग्बन्ध, दीक्षा या किसी अनुष्ठान के चरण नहीं सिखाए गए। उस विषय में अलग विशेषज्ञ समीक्षा चाहिए।

क्या रोग और विष से बचाव को चिकित्सा का विकल्प समझें? नहीं। रोग-विष से मुक्ति के कथन फलश्रुति की आस्थामूलक भाषा हैं। बीमारी, चोट या विषाक्तता में उपयुक्त चिकित्सकीय सहायता लेना आवश्यक है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on देव्याः कवचम् — Sanskrit Wikisource. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Opening liturgical text

    oṃ asya śrīcaṇḍīkavacasya brahmā ṛṣiḥ | anuṣṭup chandaḥ | cāmuṇḍā devatā | aṅganyāsoktamātaro bījam | digbandhadevatāstattvam | śrījagadambāprītyarthe saptaśatīpāṭhāṅgatvena jape viniyogaḥ || oṃ namaścaṇḍikāyai ||

  2. 1

    oṃ yadguhyaṃ paramaṃ loke sarvarakṣākaraṃ nṛṇām | yanna kasyacidākhyātaṃ tanme brūhi pitāmaha ||

  3. 2

    asti guhyatamaṃ vipra sarvabhūtopakārakam | devyāstu kavacaṃ puṇyaṃ tacchṛṇuṣva mahāmune ||

  4. 3

    prathamaṃ śailaputrī ca dvitīyaṃ brahmacāriṇī | tṛtīyaṃ candraghaṇṭeti kūṣmāṇḍeti caturthakam ||

  5. 4

    pañcamaṃ skandamāteti ṣaṣṭhaṃ kātyāyanīti ca | saptamaṃ kālarātrīti mahāgaurīti cāṣṭamam ||

  6. 5

    navamaṃ siddhidātrī ca navadurgāḥ prakīrtitāḥ | uktānyetāni nāmāni brahmaṇaiva mahātmanā ||

  7. 6

    agninā dahyamānastu śatrumadhye gato raṇe | viṣame durgame caiva bhayārtāḥ śaraṇaṃ gatāḥ ||

  8. 7

    na teṣāṃ jāyate kiṃcidaśubhaṃ raṇasaṃkaṭe | nāpadaṃ tasya paśyāmi śokaduḥkhabhayaṃ na hi ||

  9. 8

    yaistu bhaktyā smṛtā nūnaṃ teṣāṃ vṛddhiḥ prajāyate | ye tvāṃ smaranti deveśi rakṣase tānna saṃśayaḥ ||

  10. 9

    pretasaṃsthā tu cāmuṇḍā vārāhī mahiṣāsanā | aindrī gajasamārūḍhā vaiṣṇavī garuḍāsanā ||

  11. 10

    māheśvarī vṛṣārūḍhā kaumārī śikhivāhanā | lakṣmīḥ padmāsanā devī padmahastā haripriyā ||

  12. 11

    śvetarūpadharā devī īśvarī vṛṣavāhanā | brāhmī haṃsasamārūḍhā sarvābharaṇabhūṣitā ||

  13. 12

    ityetā mātaraḥ sarvāḥ sarvayogasamanvitāḥ | nānābharaṇaśobhāḍhyā nānāratnopaśobhitāḥ ||

  14. 13

    dṛśyante rathamārūḍhā devyaḥ krodhasamākulāḥ | śaṅkhaṃ cakraṃ gadāṃ śaktiṃ halaṃ ca musalāyudham ||

  15. 14

    kheṭakaṃ tomaraṃ caiva paraśuṃ pāśameva ca | kuntāyudhaṃ triśūlaṃ ca śārṅgamāyudhamuttamam ||

  16. 15

    daityānāṃ dehanāśāya bhaktānāmabhayāya ca | dhārayantyāyudhānītthaṃ devānāṃ ca hitāya vai ||

  17. 16

    namaste’stu mahāraudre mahāghoraparākrame | mahābale mahotsāhe mahābhayavināśini ||

  18. 17

    trāhi māṃ devi duṣprekṣye śatrūṇāṃ bhayavarddhini | prācyāṃ rakṣatu māmaindrī āgneyyāmagnidevatā ||

  19. 18

    dakṣiṇe’vatu vārāhī nairṛtyāṃ khaḍgadhāriṇī | pratīcyāṃ vāruṇī rakṣedvāyavyāṃ mṛgavāhinī ||

  20. 19

    udīcyāṃ pātu kaumārī aiśānyāṃ śūladhāriṇī | ūrdhvaṃ brahmāṇi me rakṣedadhastādvaiṣṇavī tathā ||

  21. 20

    evaṃ daśa diśo rakṣeccāmuṇḍā śavavāhanā | jayā me cāgrataḥ pātu vijayā pātu pṛṣṭhataḥ ||

  22. 21

    ajitā vāmapārśve tu dakṣiṇe cāparājitā | śikhāmudyotinī rakṣedumā mūrdhni vyavasthitā ||

  23. 22

    mālādharī lalāṭe ca bhruvau rakṣedyaśasvinī | trinetrā ca bhruvormadhye yamaghaṇṭā ca nāsike ||

  24. 23

    śaṅkhinī cakṣuṣormadhye śrotrayordvāravāsinī | kapolau kālikā rakṣetkarṇamūle tu śāṅkarī ||

  25. 24

    nāsikāyāṃ sugandhā ca uttaroṣṭhe ca carcikā | adhare cāmṛtakalā jihvāyāṃ ca sarasvatī ||

  26. 25

    dantān rakṣatu kaumārī kaṇṭhadeśe tu caṇḍikā | ghaṇṭikāṃ citraghaṇṭā ca mahāmāyā ca tāluke ||

  27. 26

    kāmākṣī cibukaṃ rakṣedvācaṃ me sarvamaṅgalā | grīvāyāṃ bhadrakālī ca pṛṣṭhavaṃśe dhanurdharī ||

  28. 27

    nīlagrīvā bahiḥkaṇṭhe nalikāṃ nalakūbarī | skandhayoḥ khaḍginī rakṣedbāhū me vajradhāriṇī ||

  29. 28

    hastayordaṇḍinī rakṣedambikā cāṅgulīṣu ca | nakhāñchūleśvarī rakṣetkukṣau rakṣetkuleśvarī ||

  30. 29

    stanau rakṣenmahādevī manaḥśokavināśinī | hṛdaye lalitā devī udare śūladhāriṇī ||

  31. 30

    nābhau ca kāminī rakṣedguhyaṃ guhyeśvarī tathā | pūtanā kāmikā meḍhraṃ gude mahiṣavāhinī ||

  32. 31

    kaṭyāṃ bhagavatī rakṣejjānunī vindhyavāsinī | jaṅghe mahābalā rakṣetsarvakāmapradāyinī ||

  33. 32

    gulphayornārasiṃhī ca pādapṛṣṭhe tu taijasī | pādāṅgulīṣu śrī rakṣetpādādhastalavāsinī ||

  34. 33

    nakhān daṃṣṭrākarālī ca keśāṃścaivordhvakeśinī | romakūpeṣu kauberī tvacaṃ vāgīśvarī tathā ||

  35. 34

    raktamajjāvasāmāṃsānyasthimedāṃsi pārvatī | antrāṇi kālarātriśca pittaṃ ca mukuṭeśvarī ||

  36. 35

    padmāvatī padmakośe kaphe cūḍāmaṇistathā | jvālāmukhī nakhajvālāmabhedyā sarvasandhiṣu ||

  37. 36

    śukraṃ brahmāṇi me rakṣecchāyāṃ chatreśvarī tathā | ahaṃkāraṃ mano buddhiṃ rakṣenme dharmadhāriṇī ||

  38. 37

    prāṇāpānau tathā vyānamudānaṃ ca samānakam | vajrahastā ca me rakṣetprāṇaṃ kalyāṇaśobhanā ||

  39. 38

    rase rūpe ca gandhe ca śabde sparśe ca yoginī | sattvaṃ rajastamaścaiva rakṣennārāyaṇī sadā ||

  40. 39

    āyū rakṣatu vārāhī dharmaṃ rakṣatu vaiṣṇavī | yaśaḥ kīrtiṃ ca lakṣmīṃ ca dhanaṃ vidyāṃ ca cakriṇī ||

  41. 40

    gotramindrāṇi me rakṣetpaśūnme rakṣa caṇḍike | putrān rakṣenmahālakṣmīrbhāryāṃ rakṣatu bhairavī ||

  42. 41

    panthānaṃ supathā rakṣenmārgaṃ kṣemakarī tathā | rājadvāre mahālakṣmīrvijayā sarvataḥ sthitā ||

  43. 42

    rakṣāhīnaṃ tu yatsthānaṃ varjitaṃ kavacena tu | tatsarvaṃ rakṣa me devi jayantī pāpanāśinī ||

  44. 43

    padamekaṃ na gacchettu yadīcchecchubhamātmanaḥ | kavacenāvṛto nityaṃ yatra yatraiva gacchati ||

  45. 44

    tatra tatrārthalābhaśca vijayaḥ sārvakāmikaḥ | yaṃ yaṃ cintayate kāmaṃ taṃ taṃ prāpnoti niścitam | paramaiśvaryamatulaṃ prāpsyate bhūtale pumān ||

  46. 45

    nirbhayo jāyate martyaḥ saṃgrāmeṣvaparājitaḥ | trailokye tu bhavetpūjyaḥ kavacenāvṛtaḥ pumān ||

  47. 46

    idaṃ tu devyāḥ kavacaṃ devānāmapi durlabham | yaḥ paṭhetprayato nityaṃ trisandhyaṃ śraddhayānvitaḥ ||

  48. 47

    daivī kalā bhavettasya trailokyeṣvaparājitaḥ | jīvedvarṣaśataṃ sāgramapamṛtyuvivarjitaḥ ||

  49. 48

    naśyanti vyādhayaḥ sarve lūtāvisphoṭakādayaḥ | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva kṛtrimaṃ cāpi yadviṣam ||

  50. 49

    abhicārāṇi sarvāṇi mantrayantrāṇi bhūtale | bhūcarāḥ khecarāścaiva jalajāścaupadeśikāḥ ||

  51. 50

    sahajā kulajā mālā ḍākinī śākinī tathā | antarikṣacarā ghorā ḍākinyaśca mahābalāḥ ||

  52. 51

    grahabhūtapiśācāśca yakṣagandharvarākṣasāḥ | brahmarākṣasavetālāḥ kūṣmāṇḍā bhairavādayaḥ ||

  53. 52

    naśyanti darśanāttasya kavace hṛdi saṃsthite | mānonnatirbhavedrājñastejovṛddhikaraṃ param ||

  54. 53

    yaśasā vardhate so’pi kīrtimaṇḍitabhūtale | japetsaptaśatīṃ caṇḍīṃ kṛtvā tu kavacaṃ purā ||

  55. 54

    yāvadbhūmaṇḍalaṃ dhatte saśailavanakānanam | tāvattiṣṭhati medinyāṃ santatiḥ putrapautrikī ||

  56. 55

    dehānte paramaṃ sthānaṃ yatsurairapi durlabham | prāpnoti puruṣo nityaṃ mahāmāyāprasādataḥ ||

  57. 56

    labhate paramaṃ rūpaṃ śivena saha modate || oṃ ||

  58. Closing colophon

    iti devyāḥ kavacaṃ sampūrṇam |

स्रोत, पाठभेद और सम्पादकीय निर्णय

  • आधार पाठ में ५६ क्रमांकित श्लोक हैं; विनियोग और समापन अलग हैं। दूसरी प्रचलित प्रस्तुति ६१ श्लोक गिनती है। दोनों को एक ही क्रमांक मानना गलत होगा; भविष्य में मुद्रित स्रोतों का पूरा तुलनात्मक मिलान आवश्यक है। 1 4
  • संस्कृत विकिस्रोत में पच्चमं, ब्राहमी, जिव्हा जैसी सम्भावित मुद्रण/टंकण त्रुटियाँ दिखती हैं। इन स्थानों के चुने हुए रूप स्रोत-सूची में दर्ज हैं; विशेषकर ५०वें श्लोक के 'सहजा/सहसा' और ५६वें की अन्तिम पंक्ति की विशेष जाँच आवश्यक है। 1 2
  • १९१७ के पाण्शीकर/निर्णयसागर मुद्रण को ऐतिहासिक तुलना हेतु चिह्नित किया गया है; इस कार्य के लिए उसके पृष्ठ अभी नहीं मिलाए गए। गीता प्रेस के ५६-श्लोकीय मुद्रण का उल्लेख सहायक अनुसंधान-सूत्र है, प्रत्यक्ष सत्यापन नहीं। 3 5
  • यहाँ आधुनिक वेबसाइटों के हिन्दी-अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं लिए गए। विकिस्रोत की लाइसेंस-शर्तों और संस्कृत डॉक्यूमेंट्स की पुनर्प्रकाशन-सीमाओं की अलग कानूनी जाँच होगी। 1 2

संदर्भ-सूची

  • 1 संस्कृत विकिस्रोत का ५६-श्लोकीय पाठ: https://sa.wikisource.org/wiki/देव्याः_कवचम्
  • 2 संस्कृत डॉक्यूमेंट्स — केवल पाठ-तुलना, पुनर्प्रकाशन-प्रतिबन्ध लागू: https://sanskritdocuments.org/doc_devii/dkavach.html
  • 3 १९१७ का पाण्शीकर/निर्णयसागर मुद्रण; यहाँ प्रत्यक्ष मिलान शेष: https://archive.org/details/SaptashatiNirnayaSagarPress
  • 4 ६१-श्लोकीय दूसरी परम्परा: https://www.aghori.it/devi_kavacham_eng.htm
  • 5 गीता प्रेस के मुद्रित संस्करणों के बारे में द्वितीयक विवरण: https://www.valkala.com/devi-kavach
  • 6 शिवगोरक्ष का आन्तरिक देवीमाहात्म्य शोध-नोट। कोई वेबसाइट पृष्ठ प्रकाशित नहीं हुआ है और आदेश के लिए यह पाठ उपलब्ध नहीं कराया गया है।
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1

अर्थ: मार्कण्डेय ब्रह्मा से मनुष्यों की रक्षा करने वाला अत्यन्त गोपनीय उपदेश बताने का अनुरोध करते हैं। व्याख्या: आरम्भिक प्रश्न कवच को गुरु-शिष्य संवाद की तरह प्रस्तुत करता है; यह स्वयं कोई अनुष्ठान-विधि नहीं है।

श्लोक 2

अर्थ: ब्रह्मा उत्तर देते हैं कि देवी का पवित्र कवच प्राणियों के हित से जुड़ा गूढ़ उपदेश है। व्याख्या: कवच का सामान्य अर्थ सुरक्षा-कवच है; यहाँ यह आध्यात्मिक आश्रय का बिम्ब है, धातु का वस्त्र नहीं।

श्लोक 3

अर्थ: नवदुर्गा के पहले चार नाम शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा और कूष्माण्डा हैं। व्याख्या: यहाँ नवदुर्गा के चार नाम हैं; उनके पूरे पर्व-कथानक इस श्लोक में नहीं कहे गए हैं।

श्लोक 4

अर्थ: इसके बाद स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और महागौरी का उल्लेख है। व्याख्या: पाँचवें से आठवें तक के क्रमसूचक शब्द पिछले और अगले श्लोक से जुड़े हैं।

श्लोक 5

अर्थ: नौवाँ नाम सिद्धिदात्री है; इन नौ दुर्गा-रूपों का परिचय ब्रह्मा से जुड़ा बताया गया है। व्याख्या: सिद्धिदात्री नौवें रूप का नाम है; इससे चमत्कारी फल की अनिवार्य गारंटी नहीं निकलती।

श्लोक 6

अर्थ: अग्नि, युद्ध, संकट या दुर्गम परिस्थिति में पड़े लोग भय से देवी की शरण लेते हैं। व्याख्या: युद्ध और अग्नि की छवियाँ संकटग्रस्त मनुष्य की असुरक्षा दिखाती हैं; उत्तर है शरणागति।

श्लोक 7

अर्थ: स्तुति आश्वासन देती है कि शरणागत को युद्ध-संकट, विपत्ति, शोक और भय से बचाव मिलेगा। व्याख्या: यह स्तोत्र के भीतर दिया गया आश्वासन है, वास्तविक जीवन में चोट या संकट न होने का प्रमाण नहीं।

श्लोक 8

अर्थ: भक्तिभाव से देवी का स्मरण उन्नति का कारण बताया गया है; उन्हें स्मरण करने वालों की रक्षा का आश्वासन दिया गया है। व्याख्या: स्मरण और अभ्युदय का सम्बन्ध भक्ति-वाणी में व्यक्त है; केवल आर्थिक उन्नति इसका एकमात्र अर्थ नहीं।

श्लोक 9

अर्थ: चामुण्डा, वाराही, ऐन्द्री और वैष्णवी का वर्णन उनके विशेष आसनों और वाहनों सहित होता है। व्याख्या: वाहन-चित्र अलग-अलग मातृकाओं को पहचान देते हैं; सभी परम्पराओं की एक जैसी मूर्तिसूची नहीं बनाते।

श्लोक 10

अर्थ: माहेश्वरी वृषभ, कौमारी मयूर से जुड़ी हैं और लक्ष्मी कमलासन तथा कमलहस्ता कही गई हैं। व्याख्या: लक्ष्मी का कमल युद्धरूपों के साथ रखा गया है; देवी-शक्ति के सौम्य और उग्र दोनों पक्ष उभरते हैं।

श्लोक 11

अर्थ: ईश्वरी के श्वेत रूप और वृषभ-वाहन का तथा ब्राह्मी के हंस-वाहन और आभूषणों का वर्णन है। व्याख्या: ब्राह्मी और ईश्वरी के चिह्नों की किसी विशिष्ट परम्परा से तुलना प्रकाशन से पहले आवश्यक है।

श्लोक 12

अर्थ: सभी मातृशक्तियों को योग-सामर्थ्य तथा विविध रत्नाभूषणों से शोभित बताया गया है। व्याख्या: भिन्न माताओं का साझा प्रयोजन है; आभूषण काव्यात्मक ऐश्वर्य के चिह्न हैं।

श्लोक 13

अर्थ: देवियाँ रथों पर, शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल जैसे आयुध लिए दिखाई देती हैं। व्याख्या: आयुधों की सूची पौराणिक युद्ध-प्रतीक है; इसे हिंसा के निर्देश की तरह नहीं पढ़ना चाहिए।

श्लोक 14

अर्थ: ढाल, तोमर, परशु, पाश, भाला, त्रिशूल और श्रेष्ठ धनुष आदि आयुधों का भी उल्लेख है। व्याख्या: आयुध-शब्दों के कई विशिष्ट अर्थ हो सकते हैं; हर शब्द को एक आधुनिक हथियार से जोड़ना ठीक नहीं।

श्लोक 15

अर्थ: इन आयुधों का प्रयोजन दैत्य-विनाश, भक्तों का अभय और देवताओं का हित बताया गया है। व्याख्या: भीषण आयुधों के साथ अभय की कल्पना बताती है कि उग्र रूप भी भक्ति-स्तुति में क्यों आते हैं।

श्लोक 16

अर्थ: भीषण पराक्रम, महाबल और उत्साह से युक्त, महान् भय दूर करने वाली देवी को नमस्कार है। व्याख्या: रौद्र केवल क्रोध का वर्णन नहीं; वह महाशक्ति की प्रखरता का स्तुतिपरक रूप है।

श्लोक 17

अर्थ: प्रार्थना में पूर्व दिशा के लिए ऐन्द्री और आग्नेय दिशा के लिए अग्निदेवता का आवाहन है। व्याख्या: दिशा-रक्षा यहाँ आरम्भ होती है; आग्नेय का अर्थ दक्षिण-पूर्व है, केवल पूर्व नहीं।

श्लोक 18

अर्थ: दक्षिण में वाराही, नैऋत्य में खड्गधारिणी, पश्चिम में वारुणी और वायव्य में मृगवाहिनी रक्षा करें। व्याख्या: दिशाएँ सर्वांगीण संरक्षण का रूपक हैं; विभिन्न पूजा-पुस्तकों में देवी-नाम बदल सकते हैं।

श्लोक 19

अर्थ: उत्तर में कौमारी, ईशान में शूलधारिणी, ऊपर ब्राह्मी और नीचे वैष्णवी की रक्षा-भावना रखी गई है। व्याख्या: पिछले दो पदों के साथ आठ दिशाएँ और ऊपर-नीचे मिलकर दस दिशाएँ पूर्ण होती हैं।

श्लोक 20

अर्थ: चामुण्डा से दसों दिशाओं में, जया से आगे और विजया से पीछे रक्षा की प्रार्थना है। व्याख्या: जया-विजया के नाम विजय-बोधक हैं; आगे-पीछे की नियुक्ति इसी पाठ की है।

श्लोक 21

अर्थ: बाएँ अजिता, दाएँ अपराजिता, शिखा पर उद्योतिनी और सिर पर उमा की रक्षा का उल्लेख है। व्याख्या: बाहरी दिशाओं के बाद कवच शरीर के पास की जगहों पर केन्द्रित होने लगता है।

श्लोक 22

अर्थ: मालाधरी ललाट, यशस्विनी भौंहों, त्रिनेत्रा भ्रूमध्य और यमघण्टा नासिका की रक्षा करें। व्याख्या: ललाट और भौंहों की रक्षा के साथ शिर से पाद तक की सूची खुलती है।

श्लोक 23

अर्थ: शङ्खिनी, द्वारवासिनी, कालिका और शाङ्करी का नेत्रों, कानों तथा कपोलों से सम्बन्ध बताया गया है। व्याख्या: कालिका और शाङ्करी को मिलाकर एक नाम न बनाएं; पास के अंगों में अलग नाम हैं।

श्लोक 24

अर्थ: सुगन्धा, चर्चिका और अमृतकला नासिका एवं होंठों की; सरस्वती जिह्वा की रक्षा करें। व्याख्या: जिह्वा की रक्षक सरस्वती होने से वाणी और ज्ञान भी सुरक्षा-कल्पना का हिस्सा बनते हैं।

श्लोक 25

अर्थ: कौमारी दाँतों, चण्डिका कण्ठ, चित्रघण्टा घण्टिका तथा महामाया तालु की रक्षा करें। व्याख्या: घण्टिका यहाँ शरीर के कण्ठ-भाग का शब्द है, घंटी बजाने की प्रक्रिया नहीं।

श्लोक 26

अर्थ: कामाक्षी ठोड़ी, सर्वमङ्गला वाणी, भद्रकाली ग्रीवा और धनुर्धरी रीढ़ की रक्षा करें। व्याख्या: वाणी, ग्रीवा और रीढ़ की सूची पूजा-काव्य है; यह किसी चिकित्सकीय उपचार का मानचित्र नहीं।

श्लोक 27

अर्थ: नीलग्रीवा और नलकूबरी कण्ठ-प्रदेश की, खड्गिनी कन्धों की और वज्रधारिणी भुजाओं की रक्षा करें। व्याख्या: नलकूबरी और नलिका जैसे शब्द ऐतिहासिक मुद्रित पाठ से विशेष रूप से जाँचे जाएँ।

श्लोक 28

अर्थ: दण्डिनी हाथों, अम्बिका अँगुलियों, शूलेश्वरी नाखूनों और कुलेश्वरी उदर-पार्श्व की रक्षा करें। व्याख्या: अँगुलियों और नाखूनों का उल्लेख कवच की सूक्ष्म संरक्षण-कल्पना दिखाता है।

श्लोक 29

अर्थ: महादेवी स्तनों, शोकविनाशिनी मन, ललिता हृदय तथा शूलधारिणी उदर की रक्षा करें। व्याख्या: शरीर के साथ मन और शोक की रक्षा-प्रार्थना बताती है कि कवच केवल बाहरी संकट की बात नहीं करता।

श्लोक 30

अर्थ: कामिनी नाभि, गुह्येश्वरी गुह्य-अंग और अन्य मातृरूप शरीर के निजी अंगों की रक्षा करें। व्याख्या: निजी अंगों का उल्लेख संयम से हुआ है; यह न यौन-निर्देश है, न चिकित्सा-विधि।

श्लोक 31

अर्थ: भगवती कटि, विन्ध्यवासिनी घुटनों और महाबला पिंडलियों की रक्षा करें। व्याख्या: विन्ध्यवासिनी एक क्षेत्र-सम्बद्ध देवी-नाम है; इससे पाठक की परम्परा का अनुमान न लगाएँ।

श्लोक 32

अर्थ: नारसिंही टखनों, तैजसी पाँव के ऊपरी भाग और श्री अँगुलियों तथा तलवों की रक्षा करें। व्याख्या: यह श्लोक पैरों और तलवों तक पहुँचकर शरीर-रक्षा की अगली कड़ी पूरी करता है।

श्लोक 33

अर्थ: दंष्ट्राकराली नाखून, ऊर्ध्वकेशिनी केश, कौबेरी रोमकूप और वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें। व्याख्या: इसके बाद केश, त्वचा और रोमकूप तक सुरक्षा की परिकल्पना फैलती है।

श्लोक 34

अर्थ: पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस और अस्थियों की; कालरात्रि आंत्र तथा मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें। व्याख्या: रक्त, मज्जा आदि पूर्व-आधुनिक शारीरिक श्रेणियाँ हैं; इनके आधार पर चिकित्सा-फल सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 35

अर्थ: पद्मावती पद्मकोश, चूडामणि कफ, ज्वालामुखी नख-तेज और अभेद्या सभी सन्धियों की रक्षा करें। व्याख्या: पद्मकोश की व्याख्या परम्परानुसार अलग हो सकती है; सटीक अर्थ के लिए समीक्षा चाहिए।

श्लोक 36

अर्थ: ब्राह्मी शुक्र, छत्रेश्वरी छाया और धर्मधारिणी अहंकार, मन तथा बुद्धि की रक्षा करें। व्याख्या: मन, बुद्धि और अहंकार अलग दार्शनिक शब्द हैं; कवच में भीतरी जीवन का संरक्षण भी आता है।

श्लोक 37

अर्थ: प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नामक जीवनवायुओं की रक्षा के लिए देवी का स्मरण है। व्याख्या: पाँच प्राण-वायु शास्त्रीय जीवन-दृष्टि के पद हैं; इन्हें आधुनिक श्वसन-माप न समझें।

श्लोक 38

अर्थ: योगिनी रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श से जुड़ी अनुभूतियों की, नारायणी तीनों गुणों की रक्षा करें। व्याख्या: इन्द्रियाँ और सत्त्व-रजस्-तमस् कवच को व्यापक दार्शनिक शब्दावली से जोड़ते हैं।

श्लोक 39

अर्थ: वाराही आयु, वैष्णवी धर्म और चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन तथा विद्या की रक्षा करें। व्याख्या: अब धर्म, विद्या, धन और कीर्ति जैसे जीवन के मूल्य भी प्रार्थना में आ जाते हैं।

श्लोक 40

अर्थ: इन्द्राणी कुल-परम्परा, चण्डिका पशुओं, महालक्ष्मी पुत्रों और भैरवी पत्नी की रक्षा करें। व्याख्या: पुत्र और पत्नी जैसे सम्बन्ध पाठ के समय के पारिवारिक संसार को दर्शाते हैं; आज के सभी परिवारों की यही सीमा नहीं।

श्लोक 41

अर्थ: सुपथा और क्षेमकरी मार्ग की तथा महालक्ष्मी और विजया राजद्वार व अन्य स्थानों में रक्षा करें। व्याख्या: राजद्वार प्राचीन राजकीय सम्पर्क का संकेत है; यात्रा और सार्वजनिक व्यवहार की चिन्ता भी यहाँ है।

श्लोक 42

अर्थ: पहले के कवच-वर्णन में जो कुछ छूट गया है, उसकी रक्षा की प्रार्थना जयन्ती से की गई है। व्याख्या: जो स्थान छूट गया उसके लिए अलग प्रार्थना बताती है कि सब आशंकाएँ गिनना सम्भव नहीं।

श्लोक 43

अर्थ: पाठ कहता है कि कल्याण चाहने वाला व्यक्ति देवी-कवच के संरक्षण के भाव को साथ रखकर चले। व्याख्या: 'एक पग न चलना' स्तोत्र की भावात्मक भाषा है; शिवगोरक्ष इसे अनिवार्य आचरण नहीं घोषित करता।

श्लोक 44

अर्थ: फलश्रुति कवच-स्मरण से सफलता, कामना-पूर्ति और विशेष समृद्धि का दावा करती है। व्याख्या: निश्चित फल-प्राप्ति फलश्रुति की धार्मिक घोषणा है; उसे सिद्ध तथ्य न बनाया जाए।

श्लोक 45

अर्थ: कवच-आश्रित व्यक्ति को निर्भय, अपराजित और त्रिलोक में सम्मानित बताया गया है। व्याख्या: युद्ध में अजेय होने का चित्र सुरक्षा-रूपक है, व्यक्तिगत सुरक्षा की निश्चित भविष्यवाणी नहीं।

श्लोक 46

अर्थ: देवी का कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ और श्रद्धा से किए जाने वाले पाठ के योग्य बताया गया है। व्याख्या: त्रिसन्ध्या का अर्थ दिन के तीन संधिकाल हैं; शब्दार्थ बताना जप की समय-सारणी देना नहीं।

श्लोक 47

अर्थ: यह पद दैवी सामर्थ्य, विजय तथा अकाल-मृत्यु से मुक्त दीर्घायु का वचन देता है। व्याख्या: शतायु और अकालमृत्यु का धार्मिक वाक्य स्वास्थ्य की गारंटी या चिकित्सा का विकल्प नहीं है।

श्लोक 48

अर्थ: स्तुति में रोग, विविध हानिकारक तत्व और विष के प्रभाव समाप्त होने का धार्मिक दावा है। व्याख्या: रोग और विष से रक्षा की भाषा आस्था का कथन है; संक्रमण या विषाक्तता की चिकित्सा नहीं।

श्लोक 49

अर्थ: अभिचार-संबद्ध क्रियाओं और भूमि, आकाश तथा जल से जुड़े भयकारक तत्वों का उल्लेख है। व्याख्या: अभिचार पुराने धार्मिक सन्दर्भ का शब्द है; उसे करने या काटने की कोई विधि यहाँ नहीं सिखाई जाती।

श्लोक 50

अर्थ: डाकिनी, शाकिनी आदि अनेक भयप्रद शक्तियों का उल्लेख तत्कालीन धार्मिक कल्पना के अनुसार है। व्याख्या: डाकिनी-शाकिनी के अर्थ परम्परा के अनुसार बदलते हैं; सभी सम्प्रदाय इन्हें हमेशा भयावह नहीं मानते।

श्लोक 51

अर्थ: ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, राक्षस, वेताल और भैरव आदि की सूची आगे चलती है। व्याख्या: अदृश्य भयकारकों की सूची पुरानी धर्म-दृष्टि का हिस्सा है; इससे सामान्य जीवन में अनावश्यक भय न बढ़े।

श्लोक 52

अर्थ: कवच को हृदय में धारण करने वाले के सामने ऐसे भय नष्ट होने और मान-प्रतिष्ठा बढ़ने का दावा है। व्याख्या: हृदय में कवच धारण करना स्मरण का भाव भी हो सकता है; प्रतिष्ठा-फल फिर भी पाठ का दावा है।

श्लोक 53

अर्थ: यह पद कीर्ति का आश्वासन देता है और कवच को सप्तशती-पाठ से पहले रखने की परम्परा बताता है। व्याख्या: सप्तशती का स्पष्ट उल्लेख पाठ-परम्परा का सम्बन्ध दिखाता है, पर कवच चौदहवाँ अध्याय नहीं है।

श्लोक 54

अर्थ: फलश्रुति सन्तति के पृथ्वी, पर्वत और वनों के रहने तक बने रहने का वर्णन करती है। व्याख्या: वंश-निरन्तरता की प्रार्थना पारम्परिक पारिवारिक आदर्श से जुड़ी है; इसे सन्तान-प्राप्ति की गारंटी न मानें।

श्लोक 55

अर्थ: महामाया की कृपा से मृत्यु के बाद देवताओं के लिए भी दुर्लभ परम पद मिलने का कथन है। व्याख्या: मरणोपरान्त परम पद धार्मिक विश्वदृष्टि का कथन है; इसका अनुभवजन्य सत्यापन दावा नहीं है।

श्लोक 56

अर्थ: अन्तिम अर्धश्लोक परम अवस्था और शिव के साथ आनन्द की बात करता है। व्याख्या: चुने हुए पाठ का अन्त अर्धश्लोक और ॐ से होता है; छन्द पूरा दिखाने हेतु दूसरी पंक्ति गढ़ना उचित नहीं।

  1. देव्याः कवचम् — Sanskrit Wikisource · स्रोत खोलें
  2. Devī Kavacha (dkavach.itx) · स्रोत खोलें
  3. Śrī Durgā Saptaśatī, edited by Vāsudeva Lakṣmaṇa Śāstrī Paṇśīkar · स्रोत खोलें
  4. Devi Kavacham (61-verse reader) · स्रोत खोलें
  5. Shri Devyah Kavacham — scan-collected 56-verse reader · स्रोत खोलें
  6. इस पाठ के तुलनात्मक स्रोत और संस्करण-टिप्पणियाँ