पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

कवच

नारायण कवच (श्रीमद्भागवत ६.८)

भागवत पुराण में विश्वरूप द्वारा इन्द्र को बताए गए नारायण-रक्षाकवच का शास्त्रीय पाठ।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान् । क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥

अर्थ

राजा परीक्षित पूछते हैं कि किस दिव्य कवच के सहारे सहस्रनेत्र इन्द्र ने शत्रुसेना को हराकर तीनों लोकों का ऐश्वर्य पाया।

व्याख्या

‘सहस्राक्ष’ इन्द्र का विशेषण है। त्रैलोक्य-विजय पुराणिक कथा का भाग है, स्वतंत्र ऐतिहासिक युद्ध-वृत्तान्त नहीं।

2

भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् । यथाततायिनः शत्रून्येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥

अर्थ

वे नारायण से सम्बद्ध उस रक्षा-विधान का परिचय चाहते हैं जिससे युद्ध में इन्द्र को विजय मिली थी।

व्याख्या

प्रश्न बताता है कि यह विशिष्ट कवच एक बड़े शास्त्रीय संवाद में स्थित है; इसे असम्बद्ध रचना की तरह नहीं दिखाना चाहिए।

3

वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते । नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥

अर्थ

शुकदेव विश्वरूप का परिचय देते हैं—त्वष्टा के पुत्र और इन्द्र के पुरोहित—जिन्होंने नारायण-कवच समझाया।

व्याख्या

शुकदेव बाहरी कथावाचक और विश्वरूप भीतर के उपदेशक हैं; स्रोत-संबंध में दोनों को अलग रखें।

4

धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ्मुखः । कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥

अर्थ

विश्वरूप प्रचलित आचमन-शुद्धि, मौन और अंगों एवं हाथों पर मन्त्राक्षरों के न्यास का सन्दर्भ बताते हैं।

व्याख्या

यह परम्परागत अनुष्ठान का वर्णन है, बिना गुरु-समीक्षा के आचमन या न्यास करने का मार्गदर्शन नहीं।

5

नारायणपरं वर्म सन्नह्येद् भय आगते । पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥

अर्थ

नारायण-केन्द्रित कवच के प्रसंग में चरण, घुटने, जंघाएँ, उदर, हृदय और वक्ष का उल्लेख है।

व्याख्या

शरीर के स्थान मूल पाठ में आए हैं; यहाँ उन्हें क्रियात्मक अनुष्ठान-निर्देश के रूप में नहीं बदला गया है।

6

मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत् । ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥

अर्थ

मुख और सिर के सन्दर्भ के बाद ‘ॐ नमो नारायणाय’ अष्टाक्षरी सूत्र तथा उसके विपरीत क्रम का नाम आता है।

व्याख्या

अष्टाक्षरी के आठ अक्षर हैं। यह ॐ नमो नारायणाय प्रार्थना है, जो द्वादशाक्षरी से अलग है।

7

करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया । प्रणवादियकारान्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ॥

अर्थ

यहाँ बारह अक्षरों वाले दूसरे मन्त्र और हाथ की उँगलियों तथा अंगूठों के पर्वों से उसका पारम्परिक सम्बन्ध बताया गया है।

व्याख्या

यह द्वादशाक्षरी ॐ नमो भगवते वासुदेवाय से सम्बन्धित है। अध्याय यहाँ उसके विन्यास का उल्लेख करता है, पूरा मन्त्र नहीं लिखता।

8

न्यसेद्धृदय ओंकारं विकारमनु मूर्धनि । षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया न्यसेत् ॥

अर्थ

विष्णु-मन्त्र के अक्षरों को हृदय, सिर, भ्रूमध्य और शिखा से जोड़ने वाली पारम्परिक भाषा है।

व्याख्या

अक्षर ‘विष्णवे नमः’ के ध्वन्यात्मक अंश हैं; हर अक्षर को स्वतंत्र शब्दार्थ देना उचित नहीं।

9

वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु । मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः ॥

अर्थ

अगले अक्षरों को नेत्रों और संधियों से जोड़कर मन्त्रधारी साधक की प्रतीकात्मक स्थिति का वर्णन है।

व्याख्या

‘मन्त्रमूर्ति’ पारम्परिक साधना-प्रतिमा है; इससे अलौकिक सफलता की निश्चित घोषणा नहीं की जाती।

10
विषय-सूची पर लौटें

सविसर्गं फडन्तं तत्सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् । ॐ विष्णवे नम इति ॥

अर्थ

दिशाओं के लिए रक्षात्मक प्रयोग की बात कहकर ‘ॐ विष्णवे नमः’ सूत्र का उल्लेख होता है।

व्याख्या

स्रोत में ‘फट्’ वाला प्रयोग आया है, पर उसे यहाँ दिशाबन्ध-विधि के निर्देश में नहीं बदला गया।

11

आत्मानं परमं ध्यायेद् ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् । विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥

अर्थ

कथा के विधान में साधक को ज्ञान, तेज, तप और छह शक्तियों से सम्पन्न परम तत्त्व का ध्यान करने को कहा गया है।

व्याख्या

छह शक्तियों की व्याख्या विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायों में भिन्न हो सकती है; एक निश्चित सूची नहीं थोपी गई।

12

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे । दरारिचर्मासिगदेषुचापपाशान् दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥

अर्थ

गरुड़ पर विराजमान अष्टभुज हरि, जिनके हाथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश हैं, उनसे सर्वरक्षा माँगी जाती है।

व्याख्या

यहाँ कवच की मुख्य स्तुति आरम्भ होती है। आठ भुजाएँ एवं आयुध वैष्णव मूर्तिकला और रक्षा-बिम्ब को जोड़ते हैं।

13

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् । स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥

अर्थ

जल में मत्स्य, स्थल पर वामन और आकाश तथा विराट जगत् के विस्तार में त्रिविक्रम से रक्षा-प्रार्थना है।

व्याख्या

अवतारों का जल, स्थल और आकाश से सम्बन्ध काव्यात्मक है, वास्तविक दुर्घटनाओं से सुरक्षा की गारंटी नहीं।

14

दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः । विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥

अर्थ

वन, दुर्गम मार्ग और युद्ध जैसे भयावह स्थानों में नृसिंह का स्मरण है, जिनकी अट्टहास-ध्वनि दिशाओं में गूँजती है।

व्याख्या

नृसिंह का उग्र रूप पुराणिक कल्पना है; गर्भपात सम्बन्धी वर्णन चिकित्सा तथ्य अथवा किसी के लिए कामना नहीं।

15

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः । रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद् भरताग्रजोऽस्मान् ॥

अर्थ

धरती को दाँत पर उठाने वाले वराह से यात्रा में तथा लक्ष्मण सहित राम से दूरस्थ स्थानों में रक्षा की याचना है।

व्याख्या

यहाँ ‘राम’ की एक परम्परा पर्वतों पर परशुराम तथा वनवास में लक्ष्मण-सहित राम के रूप में व्याख्या करती है; इस पहचान को निर्विवाद नहीं माना गया है।

16

मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात् । दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥

अर्थ

नारायण, नर, दत्तात्रेय और कपिल से भूल, प्रमाद, योग-विचलन और कर्मबन्धन से रक्षा माँगी गई है।

व्याख्या

बाह्य भय से आगे पाठ प्रमाद, गर्व और कर्मासक्ति जैसी आन्तरिक बाधाओं की चर्चा करने लगता है।

17

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् । देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥

अर्थ

सनत्कुमार, हयग्रीव, नारद और कूर्म से कामना, देव-अवमानना, पूजा-विचलन और दुर्गति से संरक्षण की प्रार्थना है।

व्याख्या

हयग्रीव घोड़े-मुख वाले रूप का नाम है; यहाँ पूजा-आदर का आदर्श है, कोई व्यक्तिगत अनुष्ठान-विधान नहीं।

18

धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा । यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ॥

अर्थ

धन्वन्तरि, ऋषभ, यज्ञ, बलराम और नागराज से अनुचित आचरण, द्वन्द्व, लोक-संकट तथा क्रोध के प्रसंगों में रक्षा माँगी जाती है।

व्याख्या

धन्वन्तरि आरोग्य के देवस्वरूप माने जाते हैं; प्रार्थना चिकित्सा या चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं।

19

द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाषण्डगणप्रमादात् । कल्किः कलेः कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरुकृतावतारः ॥

अर्थ

व्यास, बुद्ध और कल्कि को अज्ञान, मिथ्याचरण और कलियुग के नैतिक पतन के विरुद्ध स्मरण किया गया है।

व्याख्या

बुद्ध को अवतार के रूप में देखना इस पुराण की विशिष्ट वैष्णव दृष्टि है, सभी बौद्ध परम्पराओं की मान्यता नहीं।

20
विषय-सूची पर लौटें

मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः । नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥

अर्थ

प्रातःकाल से मध्याह्न तक केशव, गोविन्द, नारायण और विष्णु के विविध रूपों का रक्षार्थ आवाहन है।

व्याख्या

दिन के अलग समय पर विभिन्न नाम कहना शास्त्र का चित्रण है, अनिवार्य नियम अथवा सत्यापित समय-सारिणी नहीं।

21

देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम् । दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ॥

अर्थ

अपराह्न, सन्ध्या और रात्रि में मधुसूदन, माधव, हृषीकेश तथा पद्मनाभ के नाम लिए गए हैं।

व्याख्या

सन्ध्या से मध्यरात्रि का क्रम बताता है कि भक्त की स्मृति समय के साथ बनी रहती है।

22

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः । दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥

अर्थ

भोर और रात के संक्रमणकाल में जनार्दन, दामोदर और विश्वेश्वर आदि रूपों से रक्षा की प्रार्थना आगे बढ़ती है।

व्याख्या

प्रातःकाल और रात्रि के नामों के अलग विभाजन परम्पराओं में मिलते हैं; यहाँ पाठानुक्रम सुरक्षित है।

23

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम् । दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥

अर्थ

भगवान् के घूमते चक्र से शत्रुसेना को वैसे नष्ट करने की प्रार्थना है जैसे अग्नि सूखी घास को जला देती है।

व्याख्या

दोहराए गए आज्ञार्थक शब्द प्रार्थना की तीव्रता बताते हैं, किसी मनुष्य के विरुद्ध हिंसा का निर्देश नहीं।

24

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि । कुष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥

अर्थ

वज्र-स्पर्श के समान तेजस्वी गदा से भयकारी विरोधी शक्तियों को दूर करने की उग्र प्रार्थना की गई है।

व्याख्या

भयकारी प्राणियों के नाम मूल धार्मिक विश्वदृष्टि से आते हैं; दोहराए हुए क्रियापद काव्य का बल बढ़ाते हैं।

25

त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन् । दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ॥

अर्थ

दिव्य शंख की प्रचण्ड ध्वनि से भूत-प्रेत और अनिष्ट दृष्टि जैसी कल्पित भयकारी शक्तियों को भगाने का आवाहन है।

व्याख्या

यहाँ दिव्य शंख की ध्वनि भय पर ईश्वर की उपस्थिति का संकेत है।

26

त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि । चक्षूंषि चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ॥

अर्थ

तलवार और ढाल के माध्यम से शत्रुशक्ति को काटने तथा दुष्ट दृष्टि ढक देने की युद्धात्मक कल्पना व्यक्त है।

व्याख्या

दिव्य अस्त्रों को संबोधित आदेश काव्यात्मक हैं, किसी को नुकसान पहुँचाने के व्यावहारिक निर्देश नहीं।

27

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च । सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योऽंहोभ्य एव च ॥

अर्थ

ग्रह-केतु, मनुष्य, सर्प, हिंसक जीव और अनिष्ट कर्मों से जुड़े विविध भय गिनाए गए हैं।

व्याख्या

ग्रह-केतु और अदृश्य शक्तियों का वर्णन पारम्परिक जगत्-दृष्टि का है; इन्हें वैज्ञानिक तथ्य नहीं कहा गया है।

28

सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपानुकीर्तनात् । प्रयान्तु सङ्क्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ॥

अर्थ

ईश्वर के नाम-रूप के गुणगान से कल्याण-विरोधी बाधाएँ शीघ्र शान्त हों—यह प्रार्थना है।

व्याख्या

‘नामरूपानुकीर्तन’ ईश्वर के नाम और स्वरूप के स्मरण द्वारा आश्रय का मुख्य भक्तिपरक विषय है।

29

गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः । रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ॥

अर्थ

छन्द और स्तुति से सम्बद्ध गरुड़ तथा विष्वक्सेन से कठिन विपत्तियों में संरक्षण माँगा गया है।

व्याख्या

गरुड़, छन्द और स्तुति के जटिल समासों की ऐतिहासिक मुद्रित पाठ से विशेषज्ञ जाँच आवश्यक है।

30
विषय-सूची पर लौटें

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः । बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ॥

अर्थ

हरि के नाम, रूप, वाहन, अस्त्र और पार्षदों से बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राण की रक्षा चाही गई है।

व्याख्या

बुद्धि, मन और प्राण का उल्लेख दिखाता है कि संरक्षण केवल शारीरिक ही नहीं, आन्तरिक संवेदना का भी बिम्ब है।

31

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् । सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥

अर्थ

समस्त दृश्य और अदृश्य जगत् का आधार भगवान् ही हैं—इस दार्शनिक सत्य के आधार पर उपद्रव-शमन की याचना है।

व्याख्या

सत्-असत् का आधार भगवान् हैं—यह वैष्णव तत्त्वदर्शन है, आधुनिक विज्ञान का प्रतिपादन नहीं।

32

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम् । भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥

अर्थ

भगवान् के भूषण, शस्त्र और चिह्न उनकी ही मायाशक्ति के रूप माने गए हैं, स्वतन्त्र प्रतिद्वन्द्वी देवता नहीं।

व्याख्या

भगवान् के चिह्न और आयुध उनकी शक्ति के प्रकटीकरण हैं; दर्शनानुसार विस्तृत अर्थ भिन्न हो सकते हैं।

33

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः । पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥

अर्थ

सर्वज्ञ और सर्वव्यापक हरि से अपने सभी रूपों द्वारा सर्वत्र-सर्वदा रक्षा करने की विनती है।

व्याख्या

‘सर्वग’ का अर्थ सर्वव्यापक है; इससे वास्तविक जोखिम से पूर्ण मुक्ति का तथ्यात्मक वचन नहीं निकलता।

34

विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंहः । प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ॥

अर्थ

ऊपर-नीचे, भीतर-बाहर और सभी दिशाओं में नृसिंह से संरक्षण माँगा गया है, जिनका तेज भय का निवारण करता है।

व्याख्या

सभी दिशाओं के साथ भीतर और बाहर नृसिंह का आवाहन कवच की परिधि को पूरा करता है।

35

मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम् । विजेष्यसेऽञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ॥

अर्थ

विश्वरूप इन्द्र से कहते हैं कि नारायण-कवच सुना दिया गया; अब इसकी सहायता से युद्ध में विजय का आश्वासन दिया गया है।

व्याख्या

‘मघवन्’ इन्द्र का संबोधन है। इस श्लोक पर विश्वरूप की मुख्य शिक्षा पूरी होती है।

36

एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा । पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥

अर्थ

कथा में कहा गया है कि इस रक्षाविद्या का धारण करने वाला दूसरों के भय को भी शान्त कर सकता है।

व्याख्या

दूसरों के भय-शमन का फल धार्मिक वचन है, सत्यापित कारण-परिणाम नहीं।

37

न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् । राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥

अर्थ

राजाओं, चोरों, ग्रहदोषों और रोगों से निर्भय रहने का धार्मिक फल-वचन यहाँ आता है।

व्याख्या

रोग या संकट से सुरक्षा के दावे पारम्परिक फल-वचन हैं; उन्हें वास्तविक गारंटी नहीं मानना चाहिए।

38

इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन् द्विजः । योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरुधन्वनि ॥

अर्थ

कौशिक नामक ब्राह्मण के रेगिस्तान में योगधारणा द्वारा देह-त्याग की पारम्परिक कथा आरम्भ होती है।

व्याख्या

कौशिक की योगसमाधि से देह-त्याग की कथा प्रतीकात्मक आख्यान है; यहाँ खतरनाक क्रियाओं की अनुशंसा नहीं।

39

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा । ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ॥

अर्थ

गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान में उस स्थान के ऊपर से निकलते हैं जहाँ कौशिक के अवशेष पड़े थे।

व्याख्या

चित्ररथ का परिचय ऋषि-अवशेषों के प्रति सम्मान वाले पुराणिक आख्यान की भूमिका है।

40
विषय-सूची पर लौटें

गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक्शिराः । स वालिखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः । प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ॥

अर्थ

कथा में चित्ररथ का विमान गिरता है; ऋषियों की सलाह पर वे अवशेष सरस्वती में विसर्जित कर पुनः अपने लोक लौटते हैं।

व्याख्या

विमान के गिरने का उल्लेख धार्मिक कथा है, प्राचीन यान-तकनीक का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं; यहाँ अन्त्येष्टि-विधि नहीं सिखाई जा रही।

41

य इदं शृणुयात्काले यो धारयति चादृतः । तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥

अर्थ

शुकदेव फलश्रुति देते हैं—इस पाठ को आदरपूर्वक सुनने या स्मरण रखने पर निर्भयता का धार्मिक आश्वासन है।

व्याख्या

भय-निवारण का फल भक्तिपरक आश्वासन है; व्यावहारिक सुरक्षा के उपाय फिर भी आवश्यक हैं।

42
विषय-सूची पर लौटें

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः । त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् ॥

अर्थ

अन्त में कहा गया है कि इन्द्र ने विश्वरूप से यह विद्या पाकर असुरों को हराया और त्रैलोक्य का वैभव प्राप्त किया।

व्याख्या

अन्तिम श्लोक आरम्भिक प्रश्न का उत्तर पूरा करता है—इन्द्र को कवच कहाँ से मिला और क्या कथित फल हुआ।

सन्दर्भ और उपयोग

परिचय और शास्त्रीय पहचान

नारायण कवच कोई अलग से रची हुई आधुनिक प्रार्थना नहीं, बल्कि श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कन्ध, अष्टम अध्याय के ४२ श्लोकों की एक प्रसिद्ध रक्षा-सम्बन्धी शिक्षा है। परीक्षित के प्रश्न से कथा आरम्भ होती है; शुकदेव विश्वरूप द्वारा इन्द्र को कही गई रक्षाविद्या सुनाते हैं। ४–११ में पारम्परिक न्यास एवं मन्त्र-विन्यास का वर्णन, १२–३४ में हरि तथा अवतारों की रक्षा-स्तुति, और ३५–४२ में शिक्षा का समापन, फल-वर्णन तथा कथानक आता है। 1 2

पाठ-सीमा और पुनः उपयोग। यहाँ पूरे मूल अध्याय का प्रारम्भिक पाठ रखा गया है। आगे किसी भागवत-शास्त्र पृष्ठ के साथ इसका एक ही मूल संस्कृत अभिलेख जोड़ा जाए; दो भिन्न संस्करण अलग-अलग ‘प्रामाणिक’ बनाकर न प्रकाशित किए जाएँ। अष्टाक्षरी ‘ॐ नमो नारायणाय’ की अलग प्रविष्टि ॐ नमो नारायणाय तथा द्वादशाक्षरी की ॐ नमो भगवते वासुदेवाय है। 1 6

स्रोत-स्थिति। दो डिजिटल प्रदर्शनों से क्रम की जाँच की गई है, किन्तु किसी चुने हुए ऐतिहासिक मुद्रण से सभी ४२ श्लोकों का प्रत्यक्ष मिलान और पुनर्वितरण अधिकार का निर्णय अभी नहीं हुआ है। कुछ संयुक्ताक्षर एवं संधि-स्थान विशेष समीक्षा माँगते हैं। इसलिए यह संशोधनाधीन सम्पादकीय प्रति है। 1 2 5

अर्थ समझने की सीमा। यह किसी के जीवन, रोग, संकट या युद्ध-परिणाम की गारंटी नहीं है। प्रबल आयुध-वर्णन काव्य-पुराणिक है। अंगन्यास, मन्त्रदीक्षा, दिशाबन्ध आदि का उल्लेख मूल पाठ में है, पर इस लेख में कोई अनुष्ठान-विधि नहीं सिखाई जा रही।

सभी श्लोकों के अर्थ और व्याख्या

पाठ के प्रमुख विषय

रक्षा का आध्यात्मिक बिम्ब

कवच का सामान्य अर्थ सुरक्षित रखने वाला आवरण है। यहाँ भगवान् का नाम, रूप, अस्त्र, वाहन और पार्षद जीवन के विविध पक्षों को ईश्वर के आश्रय में रखने के बिम्ब बनते हैं। जल, स्थल, वन, यात्रा, समय और मन—इन सबमें अलग-अलग दिव्य रूपों को स्मरण किया गया है। 1

अवतार और समय

श्लोक १३–१९ में मत्स्य, वामन, त्रिविक्रम, नृसिंह, वराह, राम, दत्तात्रेय, कपिल आदि का उल्लेख है। २०–२२ में दिन-रात के अलग चरणों में हरि के विविध नाम आते हैं। यह एक वैष्णव काव्य-कल्पना है; परम्पराओं में नामों और उनके अर्थों की व्याख्या अलग हो सकती है। 1 4

शस्त्रों और फलश्रुति का सन्दर्भ

श्लोक २३–२६ का युद्ध-बिम्ब भय के सामने दिव्य संरक्षण का आह्वान करता है। ३५–४२ में विजय, निर्भयता और रोग-निवारण जैसे फल बताये जाते हैं। उन्हें पाठ की धार्मिक मान्यताओं के रूप में पढ़ना उचित है, सामान्य चिकित्सा या वास्तविक सुरक्षा का आश्वासन समझना नहीं। 1

पाठभेद और सम्पादकीय प्रश्न

  • ६.८.१० में ‘ॐ विष्णवे नम इति’ का स्रोत-पाठ और सामान्य पृथक् मन्त्र ‘ॐ विष्णवे नमः’ अलग रखना चाहिए। 1
  • ६.८.१२ के कठिन आयुध-समास और ६.८.१५ में ‘राम’ की पहचान के लिए प्रामाणिक मुद्रित पाठ व भाष्य की जाँच अपेक्षित है। 1 2
  • ६.८.२४, ६.८.२७, ६.८.२९ और ६.८.३४ के रूप-पाठ तथा ६.८.४० के तीन पंक्तियों वाले श्लोक की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है। 1 3
  • वक्ता-परिवर्तन श्लोक १, ३, ४ और ४१ पर अलग दिखाया गया है; उसे श्लोक-संख्या में नहीं जोड़ा गया। 1

सामान्य प्रश्न

नारायण कवच कहाँ आता है? श्रीमद्भागवत के षष्ठ स्कन्ध, अष्टम अध्याय में। इस चयन में कुल ४२ श्लोक हैं। 1

क्या पूरा अध्याय कवच का मन्त्र है? नहीं। उसमें प्रश्न, पारम्परिक विधि का वर्णन, स्तुति, फल और कथा शामिल हैं। स्तुति का मुख्य भाग १२–३४ में है। 1

क्या ‘ॐ नमो नारायणाय’ वही कवच है? वह मंत्र श्लोक ६ में उद्धृत अष्टाक्षरी है, लेकिन पूरे कवच-अध्याय के बराबर नहीं। 1

क्या इससे निश्चित रोग-मुक्ति या सुरक्षा होती है? यह धार्मिक फल-वचन है, चिकित्सकीय या अन्य वास्तविक परिणाम की गारंटी नहीं। क्या यहाँ अंगन्यास की विधि मिलेगी? नहीं। यह पाठ और उसका अर्थ है; व्यक्तिगत साधना-विधि के लिए परम्परा-विशेषज्ञ की समीक्षा अलग होगी।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Ancient Bhagavata Purana6.8, complete forty-two-unit selected Narayana Kavacha chapter. Stotrams expressly permits reuse of classical Sanskrit separately from its own modern meanings and presentation (Terms of Use). Supplied readings remain unchanged; alternate witness is comparative only. Original manuscript wording and unit sequence retained. Roman rendering, meanings and explanations: ShivGoraksh. No source recording, scan image or modern third-party explanation is reproduced. Independent textual certification remains incomplete.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    yayā guptaḥ sahasrākṣaḥ savāhān ripusainikān | krīḍanniva vinirjitya trilokyā bubhuje śriyam ||

  2. 2

    bhagavaṃstanmamākhyāhi varma nārāyaṇātmakam | yathātatāyinaḥ śatrūnyena gupto’jayanmṛdhe ||

  3. 3

    vṛtaḥ purohitastvāṣṭro mahendrāyānupṛcchate | nārāyaṇākhyaṃ varmāha tadihaikamanāḥ śṛṇu ||

  4. 4

    dhautāṅghripāṇirācamya sapavitra udaṅmukhaḥ | kṛtasvāṅgakaranyāso mantrābhyāṃ vāgyataḥ śuciḥ ||

  5. 5

    nārāyaṇaparaṃ varma sannahyed bhaya āgate | pādayorjānunorūrvorudare hṛdyathorasi ||

  6. 6

    mukhe śirasyānupūrvyādoṃkārādīni vinyaset | oṃ namo nārāyaṇāyeti viparyayamathāpi vā ||

  7. 7

    karanyāsaṃ tataḥ kuryād dvādaśākṣaravidyayā | praṇavādiyakārāntamaṅgulyaṅguṣṭhaparvasu ||

  8. 8

    nyaseddhṛdaya oṃkāraṃ vikāramanu mūrdhani | ṣakāraṃ tu bhruvormadhye ṇakāraṃ śikhayā nyaset ||

  9. 9

    vekāraṃ netrayoryuñjyānnakāraṃ sarvasandhiṣu | makāramastramuddiśya mantramūrtirbhaved budhaḥ ||

  10. 10

    savisargaṃ phaḍantaṃ tatsarvadikṣu vinirdiśet | oṃ viṣṇave nama iti ||

  11. 11

    ātmānaṃ paramaṃ dhyāyed dhyeyaṃ ṣaṭśaktibhiryutam | vidyātejastapomūrtimimaṃ mantramudāharet ||

  12. 12

    oṃ harirvidadhyānmama sarvarakṣāṃ nyastāṅghripadmaḥ patagendrapṛṣṭhe | darāricarmāsigadeṣucāpapāśān dadhāno’ṣṭaguṇo’ṣṭabāhuḥ ||

  13. 13

    jaleṣu māṃ rakṣatu matsyamūrtiryādogaṇebhyo varuṇasya pāśāt | sthaleṣu māyāvaṭuvāmano’vyāt trivikramaḥ khe’vatu viśvarūpaḥ ||

  14. 14

    durgeṣvaṭavyājimukhādiṣu prabhuḥ pāyānnṛsiṃho’surayūthapāriḥ | vimuñcato yasya mahāṭṭahāsaṃ diśo vinedurnyapataṃśca garbhāḥ ||

  15. 15

    rakṣatvasau mādhvani yajñakalpaḥ svadaṃṣṭrayonnītadharo varāhaḥ | rāmo’drikūṭeṣvatha vipravāse salakṣmaṇo’vyād bharatāgrajo’smān ||

  16. 16

    māmugradharmādakhilātpramādānnārāyaṇaḥ pātu naraśca hāsāt | dattastvayogādatha yoganāthaḥ pāyādguṇeśaḥ kapilaḥ karmabandhāt ||

  17. 17

    sanatkumāro’vatu kāmadevāddhayaśīrṣā māṃ pathi devahelanāt | devarṣivaryaḥ puruṣārcanāntarāt kūrmo harirmāṃ nirayādaśeṣāt ||

  18. 18

    dhanvantarirbhagavān pātvapathyād dvandvād bhayādṛṣabho nirjitātmā | yajñaśca lokādavatājjanāntād balo gaṇāt krodhavaśādahīndraḥ ||

  19. 19

    dvaipāyano bhagavānaprabodhād buddhastu pāṣaṇḍagaṇapramādāt | kalkiḥ kaleḥ kālamalāt prapātu dharmāvanāyorukṛtāvatāraḥ ||

  20. 20

    māṃ keśavo gadayā prātaravyād govinda āsaṅgavamāttaveṇuḥ | nārāyaṇaḥ prāhṇa udāttaśaktirmadhyandine viṣṇurarīndrapāṇiḥ ||

  21. 21

    devo’parāhṇe madhuhogradhanvā sāyaṃ tridhāmāvatu mādhavo mām | doṣe hṛṣīkeśa utārdharātre niśītha eko’vatu padmanābhaḥ ||

  22. 22

    śrīvatsadhāmāpararātra īśaḥ pratyūṣa īśo’sidharo janārdanaḥ | dāmodaro’vyādanusandhyaṃ prabhāte viśveśvaro bhagavān kālamūrtiḥ ||

  23. 23

    cakraṃ yugāntānalatigmanemi bhramat samantād bhagavatprayuktam | dandagdhi dandagdhyarisainyamāśu kakṣaṃ yathā vātasakho hutāśaḥ ||

  24. 24

    gade’śanisparśanavisphuliṅge niṣpiṇḍhi niṣpiṇḍhyajitapriyāsi | kuṣmāṇḍavaināyakayakṣarakṣobhūtagrahāṃścūrṇaya cūrṇayārīn ||

  25. 25

    tvaṃ yātudhānapramathapretamātṛpiśācavipragrahaghoradṛṣṭīn | darendra vidrāvaya kṛṣṇapūrito bhīmasvano’rerhṛdayāni kampayan ||

  26. 26

    tvaṃ tigmadhārāsivarārisainyamīśaprayukto mama chindhi chindhi | cakṣūṃṣi carmañchatacandra chādaya dviṣāmaghonāṃ hara pāpacakṣuṣām ||

  27. 27

    yanno bhayaṃ grahebhyo’bhūt ketubhyo nṛbhya eva ca | sarīsṛpebhyo daṃṣṭribhyo bhūtebhyo’ṃhobhya eva ca ||

  28. 28

    sarvāṇyetāni bhagavannāmarūpānukīrtanāt | prayāntu saṅkṣayaṃ sadyo ye naḥ śreyaḥpratīpakāḥ ||

  29. 29

    garuḍo bhagavān stotrastobhaśchandomayaḥ prabhuḥ | rakṣatvaśeṣakṛcchrebhyo viṣvaksenaḥ svanāmabhiḥ ||

  30. 30

    sarvāpadbhyo harernāmarūpayānāyudhāni naḥ | buddhīndriyamanaḥprāṇān pāntu pārṣadabhūṣaṇāḥ ||

  31. 31

    yathā hi bhagavāneva vastutaḥ sadasacca yat | satyenānena naḥ sarve yāntu nāśamupadravāḥ ||

  32. 32

    yathaikātmyānubhāvānāṃ vikalparahitaḥ svayam | bhūṣaṇāyudhaliṅgākhyā dhatte śaktīḥ svamāyayā ||

  33. 33

    tenaiva satyamānena sarvajño bhagavān hariḥ | pātu sarvaiḥ svarūpairnaḥ sadā sarvatra sarvagaḥ ||

  34. 34

    vidikṣu dikṣūrdhvamadhaḥ samantādantarbahirbhagavānnārasiṃhaḥ | prahāpayam̐llokabhayaṃ svanena svatejasā grastasamastatejāḥ ||

  35. 35

    maghavannidamākhyātaṃ varma nārāyaṇātmakam | vijeṣyase’ñjasā yena daṃśito’surayūthapān ||

  36. 36

    etad dhārayamāṇastu yaṃ yaṃ paśyati cakṣuṣā | padā vā saṃspṛśet sadyaḥ sādhvasāt sa vimucyate ||

  37. 37

    na kutaścidbhayaṃ tasya vidyāṃ dhārayato bhavet | rājadasyugrahādibhyo vyādhyādibhyaśca karhicit ||

  38. 38

    imāṃ vidyāṃ purā kaścitkauśiko dhārayan dvijaḥ | yogadhāraṇayā svāṅgaṃ jahau sa marudhanvani ||

  39. 39

    tasyopari vimānena gandharvapatirekadā | yayau citrarathaḥ strībhirvṛto yatra dvijakṣayaḥ ||

  40. 40

    gaganānnyapatat sadyaḥ savimāno hyavākśirāḥ | sa vālikhilyavacanādasthīnyādāya vismitaḥ | prāsya prācīsarasvatyāṃ snātvā dhāma svamanvagāt ||

  41. 41

    ya idaṃ śṛṇuyātkāle yo dhārayati cādṛtaḥ | taṃ namasyanti bhūtāni mucyate sarvato bhayāt ||

  42. 42

    etāṃ vidyāmadhigato viśvarūpācchatakratuḥ | trailokyalakṣmīṃ bubhuje vinirjitya mṛdhe’surān ||

स्रोत और अनुमति

1 Stotrams, मूल ४२-श्लोक पाठ; 2 Eternal Raga, तुलना; 3 Sanskrit Sahitya, अध्याय-सन्दर्भ; 4 Vedabase, संरचनात्मक एवं भाष्य तुलना (आधुनिक अनुवाद यहाँ पुनरुत्पादित नहीं); 5 ब्रिटिश लाइब्रेरी EAP, भावी पाण्डुलिपि-जाँच का सम्भावित स्रोत; 6 शिवगोरक्ष मास्टर पाठ्यक्रम। विस्तृत URL और स्थिति स्रोत-सूची में हैं।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1 — भागवत ६.८.1

अर्थ: राजा परीक्षित पूछते हैं कि किस दिव्य कवच के सहारे सहस्रनेत्र इन्द्र ने शत्रुसेना को हराकर तीनों लोकों का ऐश्वर्य पाया। व्याख्या: ‘सहस्राक्ष’ इन्द्र का विशेषण है। त्रैलोक्य-विजय पुराणिक कथा का भाग है, स्वतंत्र ऐतिहासिक युद्ध-वृत्तान्त नहीं।

श्लोक 2 — भागवत ६.८.2

अर्थ: वे नारायण से सम्बद्ध उस रक्षा-विधान का परिचय चाहते हैं जिससे युद्ध में इन्द्र को विजय मिली थी। व्याख्या: प्रश्न बताता है कि यह विशिष्ट कवच एक बड़े शास्त्रीय संवाद में स्थित है; इसे असम्बद्ध रचना की तरह नहीं दिखाना चाहिए।

श्लोक 3 — भागवत ६.८.3

अर्थ: शुकदेव विश्वरूप का परिचय देते हैं—त्वष्टा के पुत्र और इन्द्र के पुरोहित—जिन्होंने नारायण-कवच समझाया। व्याख्या: शुकदेव बाहरी कथावाचक और विश्वरूप भीतर के उपदेशक हैं; स्रोत-संबंध में दोनों को अलग रखें।

श्लोक 4 — भागवत ६.८.4

अर्थ: विश्वरूप प्रचलित आचमन-शुद्धि, मौन और अंगों एवं हाथों पर मन्त्राक्षरों के न्यास का सन्दर्भ बताते हैं। व्याख्या: यह परम्परागत अनुष्ठान का वर्णन है, बिना गुरु-समीक्षा के आचमन या न्यास करने का मार्गदर्शन नहीं।

श्लोक 5 — भागवत ६.८.5

अर्थ: नारायण-केन्द्रित कवच के प्रसंग में चरण, घुटने, जंघाएँ, उदर, हृदय और वक्ष का उल्लेख है। व्याख्या: शरीर के स्थान मूल पाठ में आए हैं; यहाँ उन्हें क्रियात्मक अनुष्ठान-निर्देश के रूप में नहीं बदला गया है।

श्लोक 6 — भागवत ६.८.6

अर्थ: मुख और सिर के सन्दर्भ के बाद ‘ॐ नमो नारायणाय’ अष्टाक्षरी सूत्र तथा उसके विपरीत क्रम का नाम आता है। व्याख्या: अष्टाक्षरी के आठ अक्षर हैं। यह ॐ नमो नारायणाय प्रार्थना है, जो द्वादशाक्षरी से अलग है।

श्लोक 7 — भागवत ६.८.7

अर्थ: यहाँ बारह अक्षरों वाले दूसरे मन्त्र और हाथ की उँगलियों तथा अंगूठों के पर्वों से उसका पारम्परिक सम्बन्ध बताया गया है। व्याख्या: यह द्वादशाक्षरी ॐ नमो भगवते वासुदेवाय से सम्बन्धित है। अध्याय यहाँ उसके विन्यास का उल्लेख करता है, पूरा मन्त्र नहीं लिखता।

श्लोक 8 — भागवत ६.८.8

अर्थ: विष्णु-मन्त्र के अक्षरों को हृदय, सिर, भ्रूमध्य और शिखा से जोड़ने वाली पारम्परिक भाषा है। व्याख्या: अक्षर ‘विष्णवे नमः’ के ध्वन्यात्मक अंश हैं; हर अक्षर को स्वतंत्र शब्दार्थ देना उचित नहीं।

श्लोक 9 — भागवत ६.८.9

अर्थ: अगले अक्षरों को नेत्रों और संधियों से जोड़कर मन्त्रधारी साधक की प्रतीकात्मक स्थिति का वर्णन है। व्याख्या: ‘मन्त्रमूर्ति’ पारम्परिक साधना-प्रतिमा है; इससे अलौकिक सफलता की निश्चित घोषणा नहीं की जाती।

श्लोक 10 — भागवत ६.८.10

अर्थ: दिशाओं के लिए रक्षात्मक प्रयोग की बात कहकर ‘ॐ विष्णवे नमः’ सूत्र का उल्लेख होता है। व्याख्या: स्रोत में ‘फट्’ वाला प्रयोग आया है, पर उसे यहाँ दिशाबन्ध-विधि के निर्देश में नहीं बदला गया।

श्लोक 11 — भागवत ६.८.11

अर्थ: कथा के विधान में साधक को ज्ञान, तेज, तप और छह शक्तियों से सम्पन्न परम तत्त्व का ध्यान करने को कहा गया है। व्याख्या: छह शक्तियों की व्याख्या विभिन्न वैष्णव सम्प्रदायों में भिन्न हो सकती है; एक निश्चित सूची नहीं थोपी गई।

श्लोक 12 — भागवत ६.८.12

अर्थ: गरुड़ पर विराजमान अष्टभुज हरि, जिनके हाथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष और पाश हैं, उनसे सर्वरक्षा माँगी जाती है। व्याख्या: यहाँ कवच की मुख्य स्तुति आरम्भ होती है। आठ भुजाएँ एवं आयुध वैष्णव मूर्तिकला और रक्षा-बिम्ब को जोड़ते हैं।

श्लोक 13 — भागवत ६.८.13

अर्थ: जल में मत्स्य, स्थल पर वामन और आकाश तथा विराट जगत् के विस्तार में त्रिविक्रम से रक्षा-प्रार्थना है। व्याख्या: अवतारों का जल, स्थल और आकाश से सम्बन्ध काव्यात्मक है, वास्तविक दुर्घटनाओं से सुरक्षा की गारंटी नहीं।

श्लोक 14 — भागवत ६.८.14

अर्थ: वन, दुर्गम मार्ग और युद्ध जैसे भयावह स्थानों में नृसिंह का स्मरण है, जिनकी अट्टहास-ध्वनि दिशाओं में गूँजती है। व्याख्या: नृसिंह का उग्र रूप पुराणिक कल्पना है; गर्भपात सम्बन्धी वर्णन चिकित्सा तथ्य अथवा किसी के लिए कामना नहीं।

श्लोक 15 — भागवत ६.८.15

अर्थ: धरती को दाँत पर उठाने वाले वराह से यात्रा में तथा लक्ष्मण सहित राम से दूरस्थ स्थानों में रक्षा की याचना है। व्याख्या: यहाँ ‘राम’ की एक परम्परा पर्वतों पर परशुराम तथा वनवास में लक्ष्मण-सहित राम के रूप में व्याख्या करती है; इस पहचान को निर्विवाद नहीं माना गया है।

श्लोक 16 — भागवत ६.८.16

अर्थ: नारायण, नर, दत्तात्रेय और कपिल से भूल, प्रमाद, योग-विचलन और कर्मबन्धन से रक्षा माँगी गई है। व्याख्या: बाह्य भय से आगे पाठ प्रमाद, गर्व और कर्मासक्ति जैसी आन्तरिक बाधाओं की चर्चा करने लगता है।

श्लोक 17 — भागवत ६.८.17

अर्थ: सनत्कुमार, हयग्रीव, नारद और कूर्म से कामना, देव-अवमानना, पूजा-विचलन और दुर्गति से संरक्षण की प्रार्थना है। व्याख्या: हयग्रीव घोड़े-मुख वाले रूप का नाम है; यहाँ पूजा-आदर का आदर्श है, कोई व्यक्तिगत अनुष्ठान-विधान नहीं।

श्लोक 18 — भागवत ६.८.18

अर्थ: धन्वन्तरि, ऋषभ, यज्ञ, बलराम और नागराज से अनुचित आचरण, द्वन्द्व, लोक-संकट तथा क्रोध के प्रसंगों में रक्षा माँगी जाती है। व्याख्या: धन्वन्तरि आरोग्य के देवस्वरूप माने जाते हैं; प्रार्थना चिकित्सा या चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं।

श्लोक 19 — भागवत ६.८.19

अर्थ: व्यास, बुद्ध और कल्कि को अज्ञान, मिथ्याचरण और कलियुग के नैतिक पतन के विरुद्ध स्मरण किया गया है। व्याख्या: बुद्ध को अवतार के रूप में देखना इस पुराण की विशिष्ट वैष्णव दृष्टि है, सभी बौद्ध परम्पराओं की मान्यता नहीं।

श्लोक 20 — भागवत ६.८.20

अर्थ: प्रातःकाल से मध्याह्न तक केशव, गोविन्द, नारायण और विष्णु के विविध रूपों का रक्षार्थ आवाहन है। व्याख्या: दिन के अलग समय पर विभिन्न नाम कहना शास्त्र का चित्रण है, अनिवार्य नियम अथवा सत्यापित समय-सारिणी नहीं।

श्लोक 21 — भागवत ६.८.21

अर्थ: अपराह्न, सन्ध्या और रात्रि में मधुसूदन, माधव, हृषीकेश तथा पद्मनाभ के नाम लिए गए हैं। व्याख्या: सन्ध्या से मध्यरात्रि का क्रम बताता है कि भक्त की स्मृति समय के साथ बनी रहती है।

श्लोक 22 — भागवत ६.८.22

अर्थ: भोर और रात के संक्रमणकाल में जनार्दन, दामोदर और विश्वेश्वर आदि रूपों से रक्षा की प्रार्थना आगे बढ़ती है। व्याख्या: प्रातःकाल और रात्रि के नामों के अलग विभाजन परम्पराओं में मिलते हैं; यहाँ पाठानुक्रम सुरक्षित है।

श्लोक 23 — भागवत ६.८.23

अर्थ: भगवान् के घूमते चक्र से शत्रुसेना को वैसे नष्ट करने की प्रार्थना है जैसे अग्नि सूखी घास को जला देती है। व्याख्या: दोहराए गए आज्ञार्थक शब्द प्रार्थना की तीव्रता बताते हैं, किसी मनुष्य के विरुद्ध हिंसा का निर्देश नहीं।

श्लोक 24 — भागवत ६.८.24

अर्थ: वज्र-स्पर्श के समान तेजस्वी गदा से भयकारी विरोधी शक्तियों को दूर करने की उग्र प्रार्थना की गई है। व्याख्या: भयकारी प्राणियों के नाम मूल धार्मिक विश्वदृष्टि से आते हैं; दोहराए हुए क्रियापद काव्य का बल बढ़ाते हैं।

श्लोक 25 — भागवत ६.८.25

अर्थ: दिव्य शंख की प्रचण्ड ध्वनि से भूत-प्रेत और अनिष्ट दृष्टि जैसी कल्पित भयकारी शक्तियों को भगाने का आवाहन है। व्याख्या: यहाँ दिव्य शंख की ध्वनि भय पर ईश्वर की उपस्थिति का संकेत है।

श्लोक 26 — भागवत ६.८.26

अर्थ: तलवार और ढाल के माध्यम से शत्रुशक्ति को काटने तथा दुष्ट दृष्टि ढक देने की युद्धात्मक कल्पना व्यक्त है। व्याख्या: दिव्य अस्त्रों को संबोधित आदेश काव्यात्मक हैं, किसी को नुकसान पहुँचाने के व्यावहारिक निर्देश नहीं।

श्लोक 27 — भागवत ६.८.27

अर्थ: ग्रह-केतु, मनुष्य, सर्प, हिंसक जीव और अनिष्ट कर्मों से जुड़े विविध भय गिनाए गए हैं। व्याख्या: ग्रह-केतु और अदृश्य शक्तियों का वर्णन पारम्परिक जगत्-दृष्टि का है; इन्हें वैज्ञानिक तथ्य नहीं कहा गया है।

श्लोक 28 — भागवत ६.८.28

अर्थ: ईश्वर के नाम-रूप के गुणगान से कल्याण-विरोधी बाधाएँ शीघ्र शान्त हों—यह प्रार्थना है। व्याख्या: ‘नामरूपानुकीर्तन’ ईश्वर के नाम और स्वरूप के स्मरण द्वारा आश्रय का मुख्य भक्तिपरक विषय है।

श्लोक 29 — भागवत ६.८.29

अर्थ: छन्द और स्तुति से सम्बद्ध गरुड़ तथा विष्वक्सेन से कठिन विपत्तियों में संरक्षण माँगा गया है। व्याख्या: गरुड़, छन्द और स्तुति के जटिल समासों की ऐतिहासिक मुद्रित पाठ से विशेषज्ञ जाँच आवश्यक है।

श्लोक 30 — भागवत ६.८.30

अर्थ: हरि के नाम, रूप, वाहन, अस्त्र और पार्षदों से बुद्धि, इन्द्रिय, मन और प्राण की रक्षा चाही गई है। व्याख्या: बुद्धि, मन और प्राण का उल्लेख दिखाता है कि संरक्षण केवल शारीरिक ही नहीं, आन्तरिक संवेदना का भी बिम्ब है।

श्लोक 31 — भागवत ६.८.31

अर्थ: समस्त दृश्य और अदृश्य जगत् का आधार भगवान् ही हैं—इस दार्शनिक सत्य के आधार पर उपद्रव-शमन की याचना है। व्याख्या: सत्-असत् का आधार भगवान् हैं—यह वैष्णव तत्त्वदर्शन है, आधुनिक विज्ञान का प्रतिपादन नहीं।

श्लोक 32 — भागवत ६.८.32

अर्थ: भगवान् के भूषण, शस्त्र और चिह्न उनकी ही मायाशक्ति के रूप माने गए हैं, स्वतन्त्र प्रतिद्वन्द्वी देवता नहीं। व्याख्या: भगवान् के चिह्न और आयुध उनकी शक्ति के प्रकटीकरण हैं; दर्शनानुसार विस्तृत अर्थ भिन्न हो सकते हैं।

श्लोक 33 — भागवत ६.८.33

अर्थ: सर्वज्ञ और सर्वव्यापक हरि से अपने सभी रूपों द्वारा सर्वत्र-सर्वदा रक्षा करने की विनती है। व्याख्या: ‘सर्वग’ का अर्थ सर्वव्यापक है; इससे वास्तविक जोखिम से पूर्ण मुक्ति का तथ्यात्मक वचन नहीं निकलता।

श्लोक 34 — भागवत ६.८.34

अर्थ: ऊपर-नीचे, भीतर-बाहर और सभी दिशाओं में नृसिंह से संरक्षण माँगा गया है, जिनका तेज भय का निवारण करता है। व्याख्या: सभी दिशाओं के साथ भीतर और बाहर नृसिंह का आवाहन कवच की परिधि को पूरा करता है।

श्लोक 35 — भागवत ६.८.35

अर्थ: विश्वरूप इन्द्र से कहते हैं कि नारायण-कवच सुना दिया गया; अब इसकी सहायता से युद्ध में विजय का आश्वासन दिया गया है। व्याख्या: ‘मघवन्’ इन्द्र का संबोधन है। इस श्लोक पर विश्वरूप की मुख्य शिक्षा पूरी होती है।

श्लोक 36 — भागवत ६.८.36

अर्थ: कथा में कहा गया है कि इस रक्षाविद्या का धारण करने वाला दूसरों के भय को भी शान्त कर सकता है। व्याख्या: दूसरों के भय-शमन का फल धार्मिक वचन है, सत्यापित कारण-परिणाम नहीं।

श्लोक 37 — भागवत ६.८.37

अर्थ: राजाओं, चोरों, ग्रहदोषों और रोगों से निर्भय रहने का धार्मिक फल-वचन यहाँ आता है। व्याख्या: रोग या संकट से सुरक्षा के दावे पारम्परिक फल-वचन हैं; उन्हें वास्तविक गारंटी नहीं मानना चाहिए।

श्लोक 38 — भागवत ६.८.38

अर्थ: कौशिक नामक ब्राह्मण के रेगिस्तान में योगधारणा द्वारा देह-त्याग की पारम्परिक कथा आरम्भ होती है। व्याख्या: कौशिक की योगसमाधि से देह-त्याग की कथा प्रतीकात्मक आख्यान है; यहाँ खतरनाक क्रियाओं की अनुशंसा नहीं।

श्लोक 39 — भागवत ६.८.39

अर्थ: गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान में उस स्थान के ऊपर से निकलते हैं जहाँ कौशिक के अवशेष पड़े थे। व्याख्या: चित्ररथ का परिचय ऋषि-अवशेषों के प्रति सम्मान वाले पुराणिक आख्यान की भूमिका है।

श्लोक 40 — भागवत ६.८.40

अर्थ: कथा में चित्ररथ का विमान गिरता है; ऋषियों की सलाह पर वे अवशेष सरस्वती में विसर्जित कर पुनः अपने लोक लौटते हैं। व्याख्या: विमान के गिरने का उल्लेख धार्मिक कथा है, प्राचीन यान-तकनीक का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं; यहाँ अन्त्येष्टि-विधि नहीं सिखाई जा रही।

श्लोक 41 — भागवत ६.८.41

अर्थ: शुकदेव फलश्रुति देते हैं—इस पाठ को आदरपूर्वक सुनने या स्मरण रखने पर निर्भयता का धार्मिक आश्वासन है। व्याख्या: भय-निवारण का फल भक्तिपरक आश्वासन है; व्यावहारिक सुरक्षा के उपाय फिर भी आवश्यक हैं।

श्लोक 42 — भागवत ६.८.42

अर्थ: अन्त में कहा गया है कि इन्द्र ने विश्वरूप से यह विद्या पाकर असुरों को हराया और त्रैलोक्य का वैभव प्राप्त किया। व्याख्या: अन्तिम श्लोक आरम्भिक प्रश्न का उत्तर पूरा करता है—इन्द्र को कवच कहाँ से मिला और क्या कथित फल हुआ।

  1. Śrīmad-Bhāgavatam, Skandha 6, Chapter 8 — The Nārāyaṇa Armour · स्रोत खोलें
  2. Śrīmad-Bhāgavatam 6.8 — Nārāyaṇa-kavaca Shield · स्रोत खोलें
  3. Śrīmad-Bhāgavatam 6.8 — Sanskrit chapter text · स्रोत खोलें
  4. Śrīmad-Bhāgavatam 6.8: The Nārāyaṇa-kavaca Shield · स्रोत खोलें
  5. Bhāgavatapurāṇa, Sixth Skandha Sanskrit manuscript · स्रोत खोलें
  6. ShivGoraksh Devotion Master Curriculum — Image Reuse
  7. Additional reusable textual witness (comparison, not a replacement edition) · स्रोत खोलें