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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

कवच

शिव कवचम् — शिवकवचकथनम्

शिव के अनेक रूपों की रक्षाप्रार्थना और भद्रायु की कथा से जुड़ा पुराणिक कवच।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

नमस्कृत्य महादेवं विश्वव्यापिनमीश्वरम् । वक्ष्ये शिवमयं वर्म सर्वरक्षाकरं नृणाम् ॥

अर्थ

ऋषभ सर्वव्यापी महादेव को प्रणाम कर मनुष्यों की रक्षा के लिए शिवमय कवच बताने का संकल्प करते हैं.

व्याख्या

प्रारम्भ में वक्ता ऋषभ हैं। कवच यहाँ आध्यात्मिक रक्षाप्रार्थना का नाम है; यह भौतिक अस्त्र या सुरक्षा की वैज्ञानिक गारंटी नहीं।

2

शुचौ देशे समासीनो यथावत्कल्पितासनः । जितेन्द्रियो जितप्राणश्चिन्तयेच्छिवमव्ययम् ॥

अर्थ

शुद्ध स्थान में आसनस्थ, इन्द्रिय और प्राण पर संयम रखने वाला साधक अविनाशी शिव का चिन्तन करता है।

व्याख्या

यह पारम्परिक ध्यान-आदर्श का वर्णन है, वेबसाइट पर अनुमोदित साधना-विधि नहीं।

3

हृत्पुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं स्वतेजसा व्याप्तनभोवकाशम् । अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनन्तमाद्यं ध्यायेत्परानन्दमयं महेशम् ॥

अर्थ

हृदयकमल में स्थित, सूक्ष्म, अनन्त, इन्द्रियातीत तथा परमानन्दस्वरूप महेश का ध्यान बताया गया है।

व्याख्या

हृदयकमल और व्याप्त प्रकाश आध्यात्मिक बिम्ब हैं, हृदय का कोई शरीर-विज्ञान सम्बन्धी स्थान नहीं।

4

ध्यानावधूताखिलकर्मबन्धश्चिरं चिदानन्दनिमग्नचेताः । षडक्षरन्याससमाहितात्मा शैवेन कुर्यात्कवचेन रक्षाम् ॥

अर्थ

चिदानन्द में लीन साधक कर्म-बन्धन के पार जाने की भावना से शैव कवच का आश्रय लेता है।

व्याख्या

यहाँ षडक्षर-न्यास का उल्लेख है; इसे दीक्षा या अंगन्यास करने की व्यावहारिक शिक्षा नहीं मानना चाहिए।

5

मां पातु देवोऽखिलदेवतात्मा संसारकूपे पतितं गभीरे । तन्नाम दिव्यं वरमन्त्रमूलं धुनोतु मे सर्वमघं हृदिस्थम् ॥

अर्थ

समस्त देवस्वरूप प्रभु संसाररूपी गहरे कुएँ में पड़े भक्त की रक्षा करें और उनका नाम भीतर की अशुद्धि दूर करे।

व्याख्या

संसार का कुआँ मोह और बन्धन का रूपक है; यहाँ भीतर के परिवर्तन पर भी बल है।

6

सर्वत्र मां रक्षतु विश्वमूर्त्तिर्ज्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा । अणोरणीयानुरुशक्तिरेकः स ईश्वरः पातु भयादशेषात् ॥

अर्थ

ज्योतिमय, चैतन्यस्वरूप, विश्वव्यापी ईश्वर समस्त भय से हर दिशा में रक्षा करें।

व्याख्या

अणु से सूक्ष्म और महान शक्ति—दोनों विशेषण शिव की व्यापकता और पारलौकिकता का संकेत हैं।

7

यो भूस्वरूपेण बिभर्ति विश्वं पायात्स भूमेर्गिरिशोऽष्टमूर्तिः । योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति सञ्जीनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥

अर्थ

पृथ्वी को धारण करने तथा जल में जीवनदायी रूप धारण करने वाले गिरिश भूमि और जल के भय से रक्षा करें।

व्याख्या

यह शिव के अष्टमूर्ति रूप की याद दिलाता है; दूसरे चरण का एक पद इस डिजिटल पाठ में संदिग्ध है।

8

कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा सर्वाणि यो नृत्यति भूरिलीलः । स कालरुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्वात्यादिभीतेरखिलाच्च तापात् ॥

अर्थ

कल्पान्त में नृत्य करने वाले कालरुद्र वनाग्नि, आँधी और अन्य तापों से रक्षा करें।

व्याख्या

प्रलय का चित्रण भी शरणागति का प्रसंग है; किसी प्राकृतिक आपदा से वास्तविक अभेद्यता का दावा नहीं।

9

प्रदीप्तविद्युत्कनकावभासो विद्यावराभीतिकुठारपाणिः । चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम् ॥

अर्थ

विद्युत् और स्वर्ण-सा प्रकाशमान चारमुख और त्रिनेत्र वाले तत्पुरुष पूर्व दिशा में रक्षा करें।

व्याख्या

तत्पुरुष पंचब्रह्म रूपों में एक नाम है; दिशाओं के सम्बंध परम्पराओं में बदल सकते हैं।

10
विषय-सूची पर लौटें

कुठारवेदाङ्कुशपाशशूलकपालढक्काक्षगुणान्दधानः । चतुर्मुखो नीलरुचिस्त्रिनेत्रः पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥

अर्थ

अनेक आयुध धारण करने वाले नीलवर्ण, त्रिनेत्र अघोर दक्षिण दिशा में रक्षा करें।

व्याख्या

आयुध यहाँ मूर्तिशास्त्रीय प्रतीक हैं; इनके संयुक्त शब्दों के पाठभेद विशेष ध्यान माँगते हैं।

11

कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकावभासो वेदाक्षमालावरदाभयाङ्कः । त्र्यक्षश्चतुर्वक्त्र उरुप्रभावः सद्योधिजातोवतु मां प्रतीच्याम् ॥

अर्थ

कुन्द, चन्द्र और स्फटिक के समान उज्ज्वल त्रिनेत्र सद्योजात पश्चिम दिशा की रक्षा करें।

व्याख्या

उज्ज्वल रूप कृपा का बिम्ब है; सद्योजात नाम की वर्तनी में भी संस्करणभेद मिलता है।

12

वराक्षमालाभयटङ्कहस्तः सरोजकिञ्जल्कसमानवर्णः । त्रिलोचनश्चारुचतुर्मुखो मां पायादुदीच्यां दिशि वामदेवः ॥

अर्थ

कमल-केसर जैसी कान्ति वाले चतुर्मुख वामदेव उत्तर दिशा में रक्षा करें।

व्याख्या

वरद, अक्षमाला और अभयमुद्रा शिव के विशिष्ट ध्यानरूप के संकेत हैं।

13

वेदाभयेष्टाङ्कुशटङ्कपाशकपालढक्काक्षकशूलपाणिः । सितद्युतिः पञ्चमुखोऽवतान्मामीशान ऊर्द्ध्वं परमप्रकाशः ॥

अर्थ

दीप्तिमान पंचमुख ईशान ऊपर की दिशा में रक्षा करें।

व्याख्या

चार दिशाओं के बाद ऊर्ध्व दिशा जोड़कर साधक और विश्व की प्रतीकात्मक समग्रता दिखाई गई है।

14

मूर्धानमव्यान्मम चन्द्रमौ लिर्भालं ममाव्यादथ भालनेत्रः । नेत्रे ममाव्याद्भगनेत्रहारी नासां सदा रक्षतु विश्वनाथः ॥

अर्थ

चन्द्रमौलि सिर की, भालनेत्र ललाट की, और विश्वनाथ नेत्रों तथा नासिका की रक्षा करें।

व्याख्या

डिजिटल पाठ में चन्द्रमौलि पद के बीच असामान्य रिक्ति है; मुद्रित प्रति से जाँच आवश्यक है।

15

पायाच्छ्रुती मे श्रुतिगीतकीर्तिः कपोलमव्या त्सततं कपाली । वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो जिह्वां सदा रक्षतु वेदजिह्वः ॥

अर्थ

श्रुतियों में गाई गई कीर्ति वाले शिव कानों, कपाली कपोलों, पंचवक्त्र मुख और वेदजिह्वा जिह्वा की रक्षा करें।

व्याख्या

कान और वाणी केवल शरीर के अंग नहीं, ज्ञान ग्रहण करने तथा सत्य बोलने की प्रेरणा भी हैं।

16

कण्ठं गिरीशोऽवतु नीलकण्ठः पाणिद्वयं पातु पिनाकपाणिः । दोर्मूलमव्यान्मम धर्मबाहुर्वक्षःस्थलं दक्षमखान्तकोऽव्यात् ॥

अर्थ

नीलकण्ठ कंठ, पिनाकपाणि दोनों हाथ और दक्षयज्ञ-विनाशक शिव वक्षःस्थल की रक्षा करें।

व्याख्या

भिन्न उपाधियाँ शिव-कथाओं की स्मृति कराती हैं और शरीर के अंगों से प्रतीकात्मक रूप में जुड़ती हैं।

17

ममोदरं पातु गिरीन्द्रधन्वा मध्यं ममाव्यान्मदनान्तकारी । हेरम्बतातो मम पातु नाभिं पायात्कटी धूर्जटिरीश्वरो मे ॥

अर्थ

गिरिधन्वा उदर, कामान्तकारी मध्यभाग, हेरम्ब के पिता नाभि और धूर्जटि कटि की रक्षा करें।

व्याख्या

हेरम्ब गणेश का नाम है; ‘हेरम्बतात’ से शिव की पारिवारिक पहचान उभरती है।

18

ऊरुद्वयं पातु कुबेरमित्रो जानुद्वयं मे जगदीश्वरोऽव्यात् । जङ्घायुगं पुङ्गवकेतुरव्यात्पादौ ममाव्या त्सुरवन्द्यपादः ॥

अर्थ

कुबेरमित्र जाँघों, जगदीश्वर घुटनों तथा वृषध्वज पिंडलियों और चरणों की रक्षा करें।

व्याख्या

शरीर के छोटे-बड़े अंगों की यह सूची समग्र संरक्षण की भावनात्मक रचना बनाती है।

19

महेश्वरः पातु दिनादियामे मां मध्ययामेऽवतु वामदेवः । त्रियम्बकः पातु तृतीययामे वृषध्वजः पातु दिनान्त्ययामे ॥

अर्थ

महेश्वर दिन के आरम्भ, वामदेव मध्ययाम, त्र्यम्बक तृतीय पहर और वृषध्वज संध्याकाल की रक्षा करें।

व्याख्या

दिन के पहरों का यह क्रम काव्यात्मक सर्वकालिक प्रार्थना है, अप्रमाणित मुहूर्त-विधान नहीं।

20
विषय-सूची पर लौटें

पायान्निशादौ शशिशेखरो मां गङ्गाधरो रक्षतु मां निशीथे । गौरीपतिः पातु निशावसाने मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्वकालम् ॥

अर्थ

चन्द्रशेखर रात्रि के आरम्भ, गंगाधर आधी रात, गौरीपति रात्रि के अन्त और मृत्युंजय सर्वकाल रक्षा करें।

व्याख्या

दिन-रात का चक्र पूर्ण होता है; मृत्युंजय विशेषण शारीरिक अमरता का वचन नहीं है।

21

अन्तःस्थितं रक्षतु शङ्करो मां स्थाणुः सदा पातु बहिःस्थितं माम् । तदन्तरे पातु पतिः पशूनां सदा शिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥

अर्थ

शंकर भीतर, स्थाणु बाहर, पशुपति मध्य में और सदाशिव चारों ओर रक्षा करें।

व्याख्या

भीतर और बाहर की रक्षा को मनःस्थिति तथा बाहरी कठिनाइयों के रूप में भी समझ सकते हैं।

22

तिष्ठन्तमव्या द्भुवनैकनाथः पायाद्व्रजन्तं प्रमथाधिनाथः । वेदान्तवेद्योऽवतु मान्निषण्णं मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥

अर्थ

शिव खड़े होने, चलते, बैठे और सोते समय हर दशा में रक्षा करें।

व्याख्या

साधारण जीवन की सभी अवस्थाओं में ईश्वर-स्मरण का संकेत है; कुछ शब्दों के बीच रिक्ति संदिग्ध है।

23

मार्गेषु मां रक्षतु नीलकण्ठः शैलादिदुर्गेषु पुरत्रयारिः । अरण्यवासादिमहाप्रवासे पायान्मृगव्याध उदारशक्तिः ॥

अर्थ

नीलकण्ठ मार्गों में, त्रिपुरारि दुर्गम पहाड़ों में और मृगव्याध वन-प्रवास में रक्षा करें।

व्याख्या

कठिन यात्रा जीवन की अनिश्चितता का रूपक भी है; इससे सामान्य यात्रा-सावधानी नहीं हटती।

24

कल्पान्तकाटोपपटुप्रकोपः स्फुटाट्टहासोच्चलिताण्डकोशः । घोरारिसेनार्णवदुर्निवारमहाभयाद्रक्षतु वीरभद्रः ॥

अर्थ

प्रचण्ड वीरभद्र दुर्जेय शत्रु-सेना के भय से रक्षा करें।

व्याख्या

वीरभद्र का प्रचण्ड चित्र पुराणिक युद्ध-परिवेश से जुड़ा है, हिंसा को उचित ठहराने के लिए नहीं।

25

पत्त्यश्वमातङ्गघटावरूथसहस्रलक्षायुतकोटिभीषणम् । अक्षौहिणीनां शतमाततायिनां छिन्द्या न्मूढो घोरकुठारधारया ॥

अर्थ

असंख्य आक्रमणकारी सैन्यबल के सामने भगवान् के भयानक परशु की रक्षा-शक्ति का आह्वान है।

व्याख्या

अतिशयोक्तिपूर्ण सेनासंख्याएँ काव्य की तीव्रता बढ़ाती हैं; यह युद्धकौशल की शिक्षा नहीं है।

26

निहन्तु दस्यून्प्रलयानलार्चिर्ज्वलत्त्रिशूलं त्रिपुरान्तकस्य । शार्दूलसिंहर्क्षवृकादिहिंस्रान्सन्त्रासयत्वीशधनुःपिनाकम् ॥

अर्थ

त्रिपुरान्तक का ज्वलन्त त्रिशूल लुटेरों से तथा पिनाक धनुष हिंस्र पशुओं से रक्षा करे।

व्याख्या

चोरों और वन्य जीवों का भय पुराने यात्रा-जगत की झलक है; यह वास्तविक सुरक्षा-उपाय का विकल्प नहीं।

27

दुःस्वप्नदुःशकुनदुर्गतिदौर्मनस्यदुर्भिक्षदुर्व्यसनदुःसहदुर्यशांसि । उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्तिव्याधींश्च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥

अर्थ

जगत् के अधीश्वर बुरे स्वप्न, अशुभ संकेत, दुःख, रोग और विविध भय दूर करें।

व्याख्या

बहुत लम्बा समास अनेक आशंकाएँ गिनाता है; रोगहरण यहाँ धार्मिक याचना है, चिकित्सा का दावा नहीं।

28

ओन्नमो भगवते सदाशिवाय सकलतत्त्वात्मकाय सकलतत्त्वविहाराय सकललोकैककर्त्रे सकललौकैकभर्त्रे सकललोकैकहर्त्रे सकललोकैकगुरवे सकललोकैकसाक्षिणे सकलनिगमगुह्याय सकलवरप्रदाय सकलदुरितार्तिभञ्जनाय सकलजगदभयङ्कराय सकललोकैकशङ्कराय शशाङ्कशेखराय शाश्व तनिजाभासाय निर्गुणाय निरुपमाय नीरूपाय निराभासाय निरामयाय निष्प्रपञ्चाय निष्कलङ्काय निर्द्वन्द्वाय निःसङ्गाय निर्मलाय निर्गमाय नित्यरूपविभवाय निरुपमविभवाय निराधाराय नित्यशुद्धबुद्धपरिपूर्णसच्चिदानन्दाद्वयाय परमशान्तप्रकाशतेजोरूपाय जयजय महारुद्र महारौद्र भद्रावतार दुःखदावदारण महाभैरव कालभैरव कल्पान्तभैरव कपालमालाधर खट्वाङ्गखड्गचर्मपाशाङ्कुशडमरुशूलचापबाणगदाशक्तिभिं डिपालतोमरमुसलमुद्गरपट्टिशपरशुपरिघभुशुण्डीशतघ्नीचक्राद्यायुधभीषणकरसहस्र मुखदंष्ट्राकराल विकटाट्टहासविस्फारितब्रह्मामण्डल नागेन्द्र कुण्डल नागेन्द्रहार नागेन्द्रवलय नागेन्द्रचर्मधर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक विरूपाक्ष विश्वेश्वर विश्वरूप वृषभवाहन विषभूषण विश्वतोमुख सर्वतो रक्षरक्ष मां ज्वलज्वल महामृत्युभयमपमृत्युभयं नाशयनाशय रोगभयमुत्सादयोत्सादय विषसर्पभयं शमयशमय चोरभयं मारयमारय मम शत्रूनुच्चा टयोच्चाटय शूलेन विदारयविदारय कुठारेण भिन्धिभिन्धि खड्गेन छिन्धिछिन्धि खट्वाङ्गेन विपोथयविपोथय मुसलेन निष्पेषयनिष्पेषय बाणैः सन्ताडय सन्ताडय रक्षांसि भीषयभीषय भूतानि विद्रावयविद्रावय कूष्माण्डवेतालमारीगणब्रह्मराक्षसान्सन्त्रासयसन्त्रासय ममाभयं कुरुकुरु वित्रस्तं मामाश्वास याश्वासय नरकभयान्मामुद्धारयोद्धारय सञ्जीवयसञ्जीवय क्षुत्तृड्भ्यां मामाप्याययाप्यायय दुःखातुरं मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादया च्छादय त्र्यम्बक सदाशिव नमस्तेनमस्तेनमस्ते ॥

अर्थ

इस अनंकित दीर्घ गद्य-मन्त्र में सदाशिव को विश्व का साक्षी, धारक और परम प्रकाश कहकर प्रणाम किया गया है। फिर रुद्र और भैरव के उग्र नाम लेकर भय, दुःख, रोग और बाधाओं से रक्षा माँगी जाती है; हिंसात्मक क्रियापद पुराणिक पाठ का हिस्सा हैं, किसी व्यक्ति के विरुद्ध करने योग्य निर्देश नहीं।

व्याख्या

चुने गए सम्पूर्ण अध्याय में यह पाठ २७ और २८वें श्लोक के बीच आता है। डिजिटल पाठ के असामान्य समास-विभाग सहित इसे पूरा रखा गया है। दूसरे संस्करण की विस्तृत वाणी से इसे चुपचाप न बदला जाए; प्रकाशन या पाठ-विधि से पहले संस्कृत विशेषज्ञ की जाँच अनिवार्य है।

28

इत्येतत्कवचं शैवं वरदं व्याहृतं मया । सर्वबाधाप्रशमनं रहस्यं सर्व देहिनाम् ॥

अर्थ

ऋषभ कहते हैं कि उन्होंने समस्त प्राणियों के लिए शुभ और गोपनीय शैव कवच कहा है।

व्याख्या

दीर्घ गद्यात्मक आवाहन के बाद फलश्रुति आरम्भ होती है; दोनों को एक श्लोक में न मिलाएँ।

29
विषय-सूची पर लौटें

यः सदा धारयेन्मर्त्यः शैवं कवचमुत्तमम् । न तस्य जायते क्वापि भयं शम्भोरनुग्रहात् ॥

अर्थ

शम्भु की कृपा से इस कवच का आश्रय लेने वाले के भय दूर होने का परम्परागत कथन है।

व्याख्या

यह ग्रंथ के भीतर दिया धार्मिक फल-वचन है, प्रमाणित मनोवैज्ञानिक या शारीरिक सुरक्षा नहीं।

30

क्षीणायुर्मृत्युमापन्नो महारोगहतोऽपि वा । सद्यः सुखमवाप्नोति दीर्घमायुश्च विन्दति ॥

अर्थ

रोगग्रस्त या मृत्यु-संकट में पड़े व्यक्ति को सुख और दीर्घायु मिलने का धार्मिक आश्वासन दिया गया है।

व्याख्या

धार्मिक आश्वासन को स्वास्थ्य-गारंटी न समझें; बीमार व्यक्ति के लिए उचित चिकित्सा आवश्यक है।

31

सर्वदारिद्र्यशमनं सौमङ्गल्यविवर्धनम् । यो धत्ते कवचं शैवं स देवैरपि पूज्यते ॥

अर्थ

कवच से दरिद्रता शान्त होने, सौभाग्य बढ़ने और देवसम्मान मिलने का फल-वचन है।

व्याख्या

समृद्धि के कथन परम्परागत आस्था व्यक्त करते हैं, व्यावहारिक आर्थिक सलाह नहीं।

32

महापातकसङ्घातैर्मुच्यते चोपपातकैः । देहान्ते शिवमाप्नोति शिववर्मानुभावतः ॥

अर्थ

कथा में बड़े और छोटे पापों से निवृत्ति तथा अंत में शिवप्राप्ति का धार्मिक फल कहा गया है।

व्याख्या

मोक्ष की धार्मिक धारणा से किसी कर्म की नैतिक या कानूनी जवाबदेही समाप्त नहीं होती।

33

त्वमपि श्रद्धया वत्स शैवं कवच मुत्तमम् । धारयस्व मया दत्तं सद्यः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ॥

अर्थ

ऋषभ स्नेहपूर्वक शिष्य को उत्तम शैव कवच देकर कल्याण की कामना करते हैं।

व्याख्या

‘वत्स’ सम्बोधन गुरु की करुणा और शिष्य से निकटता बताता है।

34

इत्युक्त्वा ऋषभो योगी तस्मै पार्थिवसूनवे । ददौ शङ्खं महारावं खड्गं चारिनिषूदनम् ॥

अर्थ

कथावाचक कहते हैं कि ऋषभ ने राजकुमार को ऊँची ध्वनि वाला शंख तथा तलवार दी।

व्याख्या

यहाँ वक्ता सूत हैं और कथा पुनः राजकुमार भद्रायु के प्रसंग में प्रवेश करती है।

35

पुनश्च भस्म सम्मन्त्र्य तदङ्गं सर्वतोऽस्पृशत् । गजानां षट्सहस्रस्य द्विगुणं च बलं ददौ ॥

अर्थ

कथा में अभिमन्त्रित भस्म से स्पर्श कर राजकुमार को हाथियों जैसा असाधारण बल मिलने का वर्णन है।

व्याख्या

हाथियों के बल का यह पुराणिक चित्र है, प्रयोग योग्य उपचार-विधि या वैज्ञानिक दावा नहीं।

36

भस्मप्रभावात्सम्प्राप्य बलैश्वर्यधृतिस्मृतीः । स राजपुत्रः शुशुभे शरदर्क इव श्रिया ॥

अर्थ

कथा के अनुसार भस्म के प्रभाव से राजकुमार बल, ऐश्वर्य, धैर्य और स्मृति पाकर शरद्-सूर्य की तरह चमकता है।

व्याख्या

शरद्-सूर्य की उपमा राजकीय तेज का बिम्ब है; किसी चमत्कार का स्वतंत्र प्रमाण नहीं।

37

तमाह प्राञ्जलिं भूयः स योगी राजनन्दनम् । एष खड्गो मया दत्तस्तपोमन्त्रानुभावतः ॥

अर्थ

ऋषभ कहते हैं कि यह तलवार उनकी तपस्या और मन्त्रशक्ति से प्राप्त उपहार है।

व्याख्या

कथा अस्त्र को वरदान के रूप में दिखाती है; यहाँ हथियार चलाने के निर्देश नहीं दिए जाते।

38

शितधारमिमं खड्गं यस्मै दर्शयसि स्फुटम् । स सद्यो म्रियते शत्रुः साक्षान्मृत्युरपि स्वयम् ॥

अर्थ

कथा में कहा गया है कि इस तलवार को दिखाने मात्र से शत्रु गिर पड़ेगा, चाहे मृत्यु ही क्यों न हो।

व्याख्या

हिंसात्मक और अलौकिक फल-वचन को केवल कथा का कथन समझें, सत्यापित कार्य-क्षमता नहीं।

39
विषय-सूची पर लौटें

अस्य शङ्खस्य निह्रादं ये शृण्वन्ति तवाहिताः । ते मूर्च्छिताः पतिष्यन्ति न्यस्तशस्त्रा विचेतना ॥

अर्थ

शंख की ध्वनि सुनकर शत्रुओं के मूर्छित होने तथा शस्त्र छोड़ने का वर्णन है।

व्याख्या

शंख का चित्र राजकीय तेज और रक्षा से जुड़ता है; इसे युद्ध-कौशल न माना जाए।

40

खड्गशङ्खाविमौ दिव्यौ परसैन्यविनाशिनौ । आत्मसैन्यस्वपक्षाणां शौर्यतेजोविवर्धनौ ॥

अर्थ

शंख और तलवार को शत्रुबल नष्ट करने तथा अपने पक्ष का साहस बढ़ाने वाला बताया गया है।

व्याख्या

यह पुराणिक युद्धभाषा है; इसे दूसरों पर बल प्रयोग का मार्गदर्शन नहीं बनाना चाहिए।

41

एतयोश्च प्रभावेन शैवेन कवचेन च । द्विषट्सहस्रनागानां बलेन महतापि च ॥

अर्थ

कवच, शंख, खड्ग तथा हाथियों के अतुल बल को राजकुमार का सहायक बताया गया है।

व्याख्या

हाथियों के बल की संख्या अन्य प्रचलित पाठ में बदलती है; चुने गए साक्ष्य का शब्द रखा गया है।

42

भस्मधारणसामर्थ्याच्छत्रुसैन्यं विजेष्यसि । प्राप्य सिंहासनं पैत्र्यं गोप्तासि पृथिवीमिमाम् ॥

अर्थ

ऋषभ युद्ध में विजय, पैतृक सिंहासन मिलने और राज्यपालन का आशीर्वाद देते हैं।

व्याख्या

राज्यप्राप्ति भद्रायु की कथा का भविष्यवचन है; हर पाठक को दिया सार्वभौम वचन नहीं।

43

इति भद्रायुषं सम्यगनुशास्य समातृकम् । ताभ्यां सम्पूजितः सोऽथ योगी स्वैरगतिर्ययौ ॥

अर्थ

भद्रायु और उसकी माता को उपदेश देकर तथा दोनों से सम्मान पाकर ऋषभ चले जाते हैं।

व्याख्या

शिष्य और माता की कृतज्ञता के साथ अध्याय समाप्त होता है; कोलॉफन अलग पाठ-इकाई है।

45
विषय-सूची पर लौटें

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां तृतीये ब्रह्मोत्तर खण्डे सीमन्तिनीमाहात्म्ये भद्रायूपाख्याने शिवकवचकथनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

अर्थ

यह स्कन्दपुराण के ब्रह्मोत्तरखण्ड के बारहवें अध्याय ‘शिवकवचकथन’ का समापन-वाक्य है, जो भद्रायु की कथा से जुड़ा है।

व्याख्या

कोलॉफन अध्याय का नाम बताता है, ४४वाँ क्रमांकित श्लोक नहीं; इसके शब्द संस्करणों में अलग हो सकते हैं।

सन्दर्भ और उपयोग

पूर्ण चयनित डिजिटल पाठ: ४३ श्लोक, एक अनंकित दीर्घ आवाहन और समापन-कोलॉफन। यह अंतिम सत्यापित मूल संस्करण नहीं है।

परिचय और पाठ-सीमा

यह स्कन्दपुराण के ब्रह्मखण्ड, ब्रह्मोत्तरखण्ड, अध्याय १२ का शिवकवचकथन है। ऋषभ योगी भद्रायु के प्रसंग में शिव का कवच कहते हैं। १–४ में आरम्भ और ध्यान, ५–२७ में विभिन्न रूप, दिशाएँ, शरीर, समय और संकट से रक्षाप्रार्थना, २७ के बाद एक बहुत लम्बा अनंकित आवाहन, २८–३३ में फलश्रुति और ३४–४३ में राजकुमार से सम्बन्धित कथा आती है। 1 2

पाठ पहचान: प्रचलित स्वतंत्र शिवकवच में मूल श्लोकों के साथ न्यास, ध्यान, पूजा आदि अतिरिक्त अनुभाग और पृथक फलश्रुति-संख्या मिल सकती है। शिवरहस्य, ब्रह्मवैवर्तपुराण तथा शिवरक्षास्तोत्र के दूसरे ‘शिव कवच’ को इस अध्याय के साथ नहीं मिलाया गया। 3

सावधानी: यह पढ़ने-समझने हेतु भाष्य है, उपदेश या दीक्षाविधि नहीं। रोगमुक्ति, अस्त्रबल, शत्रुविनाश, अलौकिक सुरक्षा आदि कथा-विश्वास हैं; इनकी व्यावहारिक पुष्टि नहीं।

अनंकित आवाहन

सरल अर्थ: इस अनंकित दीर्घ गद्य-मन्त्र में सदाशिव को विश्व का साक्षी, धारक और परम प्रकाश कहकर प्रणाम किया गया है। फिर रुद्र और भैरव के उग्र नाम लेकर भय, दुःख, रोग और बाधाओं से रक्षा माँगी जाती है; हिंसात्मक क्रियापद पुराणिक पाठ का हिस्सा हैं, किसी व्यक्ति के विरुद्ध करने योग्य निर्देश नहीं। व्याख्या: चुने गए सम्पूर्ण अध्याय में यह पाठ २७ और २८वें श्लोक के बीच आता है। डिजिटल पाठ के असामान्य समास-विभाग सहित इसे पूरा रखा गया है। दूसरे संस्करण की विस्तृत वाणी से इसे चुपचाप न बदला जाए; प्रकाशन या पाठ-विधि से पहले संस्कृत विशेषज्ञ की जाँच अनिवार्य है।

अध्याय-कोलॉफन

सरल अर्थ: यह स्कन्दपुराण के ब्रह्मोत्तरखण्ड के बारहवें अध्याय ‘शिवकवचकथन’ का समापन-वाक्य है, जो भद्रायु की कथा से जुड़ा है। व्याख्या: कोलॉफन अध्याय का नाम बताता है, ४४वाँ क्रमांकित श्लोक नहीं; इसके शब्द संस्करणों में अलग हो सकते हैं।

प्रमुख विषय

पंचब्रह्म रूप और दिशाएँ (९–१३): तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात, वामदेव और ईशान—ये शिव के बहुरूपी दिव्यत्व का वर्णन हैं। इन्हें सभी शैव शाखाओं का समान विधान न मानें। सुरक्षा का व्यापक काव्य (१४–२३): सिर से चरण तक, दिन-रात्रि और यात्राओं में शिव की शरण की कामना की गई है। अतः पाठ शरीर तथा जीवन की प्रत्येक अवस्था को स्मरण का अवसर बना देता है। उग्र भाषा और फलश्रुति (२४–४२): भयावह युद्ध-छवियाँ, रोगहरण और दीर्घायु के दावे पुराणिक धार्मिक भाषा हैं। किसी मनुष्य या पशु के विरुद्ध हिंसा, हथियार, या तन्त्र-क्रिया की अनुमति नहीं।

पाठभेद, स्रोत और प्रामाणिकता

चुना गया डिजिटल पाठ 1 है; संस्कृत विकिस्रोत 2 से अध्यायसीमा और अनेक स्थानों की तुलना हुई। मुद्रित या हस्तलिखित प्रति की स्वतंत्र पृष्ठवार जाँच अभी नहीं हुई। विशेषतः श्लोक ७, १०–११, १४, २२, दीर्घ आवाहन, २८ और ३५/४१ में पाठभेद या असामान्य रिक्तियाँ दर्ज हैं। 3 केवल तुलना है; उस पोर्टल की पुनर्प्रकाशन-शर्तें स्वतंत्र हैं। पुराना ब्रह्मोत्तरखण्ड हस्तलेख 5 और 6 आगे जाँच के उम्मीदवार हैं, सत्यापित पाठ-साक्ष्य नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या शिव कवच के सभी पाठ एक जैसे हैं? नहीं। अलग पुराणों और परम्पराओं में इस नाम के अलग ग्रंथ या संक्षिप्त पाठ मिलते हैं। क्या इसमें केवल २७ श्लोक हैं? इस चुने गए सम्पूर्ण अध्याय में ४३ क्रमांकित श्लोक और २७ के बाद एक दीर्घ गद्यात्मक आवाहन है; छोटी पाठपरम्परा की संख्या अलग है। क्या इसे पढ़ने से रोग या संकट निश्चित रूप से समाप्त हो जाएंगे? ऐसा वैज्ञानिक आश्वासन नहीं है। यह श्रद्धा और काव्यात्मक शरणागति का ग्रंथ है। क्या यहाँ न्यास, दीक्षा और प्रयोग बताए गए हैं? नहीं। पुराणिक उल्लेखों को पाठ-संदर्भ में समझाया गया है, क्रियात्मक मार्गदर्शन नहीं दिया गया। क्या सामग्री प्रकाशित है? नहीं। स्रोत-अनुमति, मूलपाठ, विशेषज्ञ समीक्षा और चित्र-संपत्ति जाँच के बाद ही आगे विचार होगा। सम्बंधित विषय: सम्बन्धित पाठ (शिव), सम्बन्धित पाठ (नमः शिवाय), सम्बन्धित पाठ (महामृत्युञ्जय)।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Ancient Skanda Purana, Brahmottarakhanda12. Comparative electronic witness: Sanskrit Wikisource contributors, CC BY-SA4.0. Supplied class-nasal/orthographic reading retained with43 verses, intervening prose and colophon. No modern Vishvasa commentary or scan included; no independent glyph certification claimed. Original manuscript wording and unit sequence retained. Roman rendering, meanings and explanations: ShivGoraksh. No source recording, scan image or modern third-party explanation is reproduced. Independent textual certification remains incomplete.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    namaskṛtya mahādevaṃ viśvavyāpinamīśvaram | vakṣye śivamayaṃ varma sarvarakṣākaraṃ nṛṇām ||

  2. 2

    śucau deśe samāsīno yathāvatkalpitāsanaḥ | jitendriyo jitaprāṇaścintayecchivamavyayam ||

  3. 3

    hṛtpuṇḍarīkāntarasanniviṣṭaṃ svatejasā vyāptanabhovakāśam | atīndriyaṃ sūkṣmamanantamādyaṃ dhyāyetparānandamayaṃ maheśam ||

  4. 4

    dhyānāvadhūtākhilakarmabandhaściraṃ cidānandanimagnacetāḥ | ṣaḍakṣaranyāsasamāhitātmā śaivena kuryātkavacena rakṣām ||

  5. 5

    māṃ pātu devo’khiladevatātmā saṃsārakūpe patitaṃ gabhīre | tannāma divyaṃ varamantramūlaṃ dhunotu me sarvamaghaṃ hṛdistham ||

  6. 6

    sarvatra māṃ rakṣatu viśvamūrttirjyotirmayānandaghanaścidātmā | aṇoraṇīyānuruśaktirekaḥ sa īśvaraḥ pātu bhayādaśeṣāt ||

  7. 7

    yo bhūsvarūpeṇa bibharti viśvaṃ pāyātsa bhūmergiriśo’ṣṭamūrtiḥ | yo’pāṃ svarūpeṇa nṛṇāṃ karoti sañjīnaṃ so’vatu māṃ jalebhyaḥ ||

  8. 8

    kalpāvasāne bhuvanāni dagdhvā sarvāṇi yo nṛtyati bhūrilīlaḥ | sa kālarudro’vatu māṃ davāgnervātyādibhīterakhilācca tāpāt ||

  9. 9

    pradīptavidyutkanakāvabhāso vidyāvarābhītikuṭhārapāṇiḥ | caturmukhastatpuruṣastrinetraḥ prācyāṃ sthitaṃ rakṣatu māmajasram ||

  10. 10

    kuṭhāravedāṅkuśapāśaśūlakapālaḍhakkākṣaguṇāndadhānaḥ | caturmukho nīlarucistrinetraḥ pāyādaghoro diśi dakṣiṇasyām ||

  11. 11

    kundenduśaṅkhasphaṭikāvabhāso vedākṣamālāvaradābhayāṅkaḥ | tryakṣaścaturvaktra uruprabhāvaḥ sadyodhijātovatu māṃ pratīcyām ||

  12. 12

    varākṣamālābhayaṭaṅkahastaḥ sarojakiñjalkasamānavarṇaḥ | trilocanaścārucaturmukho māṃ pāyādudīcyāṃ diśi vāmadevaḥ ||

  13. 13

    vedābhayeṣṭāṅkuśaṭaṅkapāśakapālaḍhakkākṣakaśūlapāṇiḥ | sitadyutiḥ pañcamukho’vatānmāmīśāna ūrddhvaṃ paramaprakāśaḥ ||

  14. 14

    mūrdhānamavyānmama candramau lirbhālaṃ mamāvyādatha bhālanetraḥ | netre mamāvyādbhaganetrahārī nāsāṃ sadā rakṣatu viśvanāthaḥ ||

  15. 15

    pāyācchrutī me śrutigītakīrtiḥ kapolamavyā tsatataṃ kapālī | vaktraṃ sadā rakṣatu pañcavaktro jihvāṃ sadā rakṣatu vedajihvaḥ ||

  16. 16

    kaṇṭhaṃ girīśo’vatu nīlakaṇṭhaḥ pāṇidvayaṃ pātu pinākapāṇiḥ | dormūlamavyānmama dharmabāhurvakṣaḥsthalaṃ dakṣamakhāntako’vyāt ||

  17. 17

    mamodaraṃ pātu girīndradhanvā madhyaṃ mamāvyānmadanāntakārī | herambatāto mama pātu nābhiṃ pāyātkaṭī dhūrjaṭirīśvaro me ||

  18. 18

    ūrudvayaṃ pātu kuberamitro jānudvayaṃ me jagadīśvaro’vyāt | jaṅghāyugaṃ puṅgavaketuravyātpādau mamāvyā tsuravandyapādaḥ ||

  19. 19

    maheśvaraḥ pātu dinādiyāme māṃ madhyayāme’vatu vāmadevaḥ | triyambakaḥ pātu tṛtīyayāme vṛṣadhvajaḥ pātu dināntyayāme ||

  20. 20

    pāyānniśādau śaśiśekharo māṃ gaṅgādharo rakṣatu māṃ niśīthe | gaurīpatiḥ pātu niśāvasāne mṛtyuñjayo rakṣatu sarvakālam ||

  21. 21

    antaḥsthitaṃ rakṣatu śaṅkaro māṃ sthāṇuḥ sadā pātu bahiḥsthitaṃ mām | tadantare pātu patiḥ paśūnāṃ sadā śivo rakṣatu māṃ samantāt ||

  22. 22

    tiṣṭhantamavyā dbhuvanaikanāthaḥ pāyādvrajantaṃ pramathādhināthaḥ | vedāntavedyo’vatu mānniṣaṇṇaṃ māmavyayaḥ pātu śivaḥ śayānam ||

  23. 23

    mārgeṣu māṃ rakṣatu nīlakaṇṭhaḥ śailādidurgeṣu puratrayāriḥ | araṇyavāsādimahāpravāse pāyānmṛgavyādha udāraśaktiḥ ||

  24. 24

    kalpāntakāṭopapaṭuprakopaḥ sphuṭāṭṭahāsoccalitāṇḍakośaḥ | ghorārisenārṇavadurnivāramahābhayādrakṣatu vīrabhadraḥ ||

  25. 25

    pattyaśvamātaṅgaghaṭāvarūthasahasralakṣāyutakoṭibhīṣaṇam | akṣauhiṇīnāṃ śatamātatāyināṃ chindyā nmūḍho ghorakuṭhāradhārayā ||

  26. 26

    nihantu dasyūnpralayānalārcirjvalattriśūlaṃ tripurāntakasya | śārdūlasiṃharkṣavṛkādihiṃsrānsantrāsayatvīśadhanuḥpinākam ||

  27. 27

    duḥsvapnaduḥśakunadurgatidaurmanasyadurbhikṣadurvyasanaduḥsahaduryaśāṃsi | utpātatāpaviṣabhītimasadgrahārtivyādhīṃśca nāśayatu me jagatāmadhīśaḥ ||

  28. 28

    onnamo bhagavate sadāśivāya sakalatattvātmakāya sakalatattvavihārāya sakalalokaikakartre sakalalaukaikabhartre sakalalokaikahartre sakalalokaikagurave sakalalokaikasākṣiṇe sakalanigamaguhyāya sakalavarapradāya sakaladuritārtibhañjanāya sakalajagadabhayaṅkarāya sakalalokaikaśaṅkarāya śaśāṅkaśekharāya śāśva tanijābhāsāya nirguṇāya nirupamāya nīrūpāya nirābhāsāya nirāmayāya niṣprapañcāya niṣkalaṅkāya nirdvandvāya niḥsaṅgāya nirmalāya nirgamāya nityarūpavibhavāya nirupamavibhavāya nirādhārāya nityaśuddhabuddhaparipūrṇasaccidānandādvayāya paramaśāntaprakāśatejorūpāya jayajaya mahārudra mahāraudra bhadrāvatāra duḥkhadāvadāraṇa mahābhairava kālabhairava kalpāntabhairava kapālamālādhara khaṭvāṅgakhaḍgacarmapāśāṅkuśaḍamaruśūlacāpabāṇagadāśaktibhiṃ ḍipālatomaramusalamudgarapaṭṭiśaparaśuparighabhuśuṇḍīśataghnīcakrādyāyudhabhīṣaṇakarasahasra mukhadaṃṣṭrākarāla vikaṭāṭṭahāsavisphāritabrahmāmaṇḍala nāgendra kuṇḍala nāgendrahāra nāgendravalaya nāgendracarmadhara mṛtyuñjaya tryambaka tripurāntaka virūpākṣa viśveśvara viśvarūpa vṛṣabhavāhana viṣabhūṣaṇa viśvatomukha sarvato rakṣarakṣa māṃ jvalajvala mahāmṛtyubhayamapamṛtyubhayaṃ nāśayanāśaya rogabhayamutsādayotsādaya viṣasarpabhayaṃ śamayaśamaya corabhayaṃ mārayamāraya mama śatrūnuccā ṭayoccāṭaya śūlena vidārayavidāraya kuṭhāreṇa bhindhibhindhi khaḍgena chindhichindhi khaṭvāṅgena vipothayavipothaya musalena niṣpeṣayaniṣpeṣaya bāṇaiḥ santāḍaya santāḍaya rakṣāṃsi bhīṣayabhīṣaya bhūtāni vidrāvayavidrāvaya kūṣmāṇḍavetālamārīgaṇabrahmarākṣasānsantrāsayasantrāsaya mamābhayaṃ kurukuru vitrastaṃ māmāśvāsa yāśvāsaya narakabhayānmāmuddhārayoddhāraya sañjīvayasañjīvaya kṣuttṛḍbhyāṃ māmāpyāyayāpyāyaya duḥkhāturaṃ māmānandayānandaya śivakavacena māmācchādayā cchādaya tryambaka sadāśiva namastenamastenamaste ||

  29. 28

    ityetatkavacaṃ śaivaṃ varadaṃ vyāhṛtaṃ mayā | sarvabādhāpraśamanaṃ rahasyaṃ sarva dehinām ||

  30. 29

    yaḥ sadā dhārayenmartyaḥ śaivaṃ kavacamuttamam | na tasya jāyate kvāpi bhayaṃ śambhoranugrahāt ||

  31. 30

    kṣīṇāyurmṛtyumāpanno mahārogahato’pi vā | sadyaḥ sukhamavāpnoti dīrghamāyuśca vindati ||

  32. 31

    sarvadāridryaśamanaṃ saumaṅgalyavivardhanam | yo dhatte kavacaṃ śaivaṃ sa devairapi pūjyate ||

  33. 32

    mahāpātakasaṅghātairmucyate copapātakaiḥ | dehānte śivamāpnoti śivavarmānubhāvataḥ ||

  34. 33

    tvamapi śraddhayā vatsa śaivaṃ kavaca muttamam | dhārayasva mayā dattaṃ sadyaḥ śreyo hyavāpsyasi ||

  35. 34

    ityuktvā ṛṣabho yogī tasmai pārthivasūnave | dadau śaṅkhaṃ mahārāvaṃ khaḍgaṃ cāriniṣūdanam ||

  36. 35

    punaśca bhasma sammantrya tadaṅgaṃ sarvato’spṛśat | gajānāṃ ṣaṭsahasrasya dviguṇaṃ ca balaṃ dadau ||

  37. 36

    bhasmaprabhāvātsamprāpya balaiśvaryadhṛtismṛtīḥ | sa rājaputraḥ śuśubhe śaradarka iva śriyā ||

  38. 37

    tamāha prāñjaliṃ bhūyaḥ sa yogī rājanandanam | eṣa khaḍgo mayā dattastapomantrānubhāvataḥ ||

  39. 38

    śitadhāramimaṃ khaḍgaṃ yasmai darśayasi sphuṭam | sa sadyo mriyate śatruḥ sākṣānmṛtyurapi svayam ||

  40. 39

    asya śaṅkhasya nihrādaṃ ye śṛṇvanti tavāhitāḥ | te mūrcchitāḥ patiṣyanti nyastaśastrā vicetanā ||

  41. 40

    khaḍgaśaṅkhāvimau divyau parasainyavināśinau | ātmasainyasvapakṣāṇāṃ śauryatejovivardhanau ||

  42. 41

    etayośca prabhāvena śaivena kavacena ca | dviṣaṭsahasranāgānāṃ balena mahatāpi ca ||

  43. 42

    bhasmadhāraṇasāmarthyācchatrusainyaṃ vijeṣyasi | prāpya siṃhāsanaṃ paitryaṃ goptāsi pṛthivīmimām ||

  44. 43

    iti bhadrāyuṣaṃ samyaganuśāsya samātṛkam | tābhyāṃ sampūjitaḥ so’tha yogī svairagatiryayau ||

  45. 45

    iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ tṛtīye brahmottara khaṇḍe sīmantinīmāhātmye bhadrāyūpākhyāne śivakavacakathanaṃ nāma dvādaśo’dhyāyaḥ || 12 ||

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1

सरल अर्थ: ऋषभ सर्वव्यापी महादेव को प्रणाम कर मनुष्यों की रक्षा के लिए शिवमय कवच बताने का संकल्प करते हैं. व्याख्या: प्रारम्भ में वक्ता ऋषभ हैं। कवच यहाँ आध्यात्मिक रक्षाप्रार्थना का नाम है; यह भौतिक अस्त्र या सुरक्षा की वैज्ञानिक गारंटी नहीं।

श्लोक 2

सरल अर्थ: शुद्ध स्थान में आसनस्थ, इन्द्रिय और प्राण पर संयम रखने वाला साधक अविनाशी शिव का चिन्तन करता है। व्याख्या: यह पारम्परिक ध्यान-आदर्श का वर्णन है, वेबसाइट पर अनुमोदित साधना-विधि नहीं।

श्लोक 3

सरल अर्थ: हृदयकमल में स्थित, सूक्ष्म, अनन्त, इन्द्रियातीत तथा परमानन्दस्वरूप महेश का ध्यान बताया गया है। व्याख्या: हृदयकमल और व्याप्त प्रकाश आध्यात्मिक बिम्ब हैं, हृदय का कोई शरीर-विज्ञान सम्बन्धी स्थान नहीं।

श्लोक 4

सरल अर्थ: चिदानन्द में लीन साधक कर्म-बन्धन के पार जाने की भावना से शैव कवच का आश्रय लेता है। व्याख्या: यहाँ षडक्षर-न्यास का उल्लेख है; इसे दीक्षा या अंगन्यास करने की व्यावहारिक शिक्षा नहीं मानना चाहिए।

श्लोक 5

सरल अर्थ: समस्त देवस्वरूप प्रभु संसाररूपी गहरे कुएँ में पड़े भक्त की रक्षा करें और उनका नाम भीतर की अशुद्धि दूर करे। व्याख्या: संसार का कुआँ मोह और बन्धन का रूपक है; यहाँ भीतर के परिवर्तन पर भी बल है।

श्लोक 6

सरल अर्थ: ज्योतिमय, चैतन्यस्वरूप, विश्वव्यापी ईश्वर समस्त भय से हर दिशा में रक्षा करें। व्याख्या: अणु से सूक्ष्म और महान शक्ति—दोनों विशेषण शिव की व्यापकता और पारलौकिकता का संकेत हैं।

श्लोक 7

सरल अर्थ: पृथ्वी को धारण करने तथा जल में जीवनदायी रूप धारण करने वाले गिरिश भूमि और जल के भय से रक्षा करें। व्याख्या: यह शिव के अष्टमूर्ति रूप की याद दिलाता है; दूसरे चरण का एक पद इस डिजिटल पाठ में संदिग्ध है।

श्लोक 8

सरल अर्थ: कल्पान्त में नृत्य करने वाले कालरुद्र वनाग्नि, आँधी और अन्य तापों से रक्षा करें। व्याख्या: प्रलय का चित्रण भी शरणागति का प्रसंग है; किसी प्राकृतिक आपदा से वास्तविक अभेद्यता का दावा नहीं।

श्लोक 9

सरल अर्थ: विद्युत् और स्वर्ण-सा प्रकाशमान चारमुख और त्रिनेत्र वाले तत्पुरुष पूर्व दिशा में रक्षा करें। व्याख्या: तत्पुरुष पंचब्रह्म रूपों में एक नाम है; दिशाओं के सम्बंध परम्पराओं में बदल सकते हैं।

श्लोक 10

सरल अर्थ: अनेक आयुध धारण करने वाले नीलवर्ण, त्रिनेत्र अघोर दक्षिण दिशा में रक्षा करें। व्याख्या: आयुध यहाँ मूर्तिशास्त्रीय प्रतीक हैं; इनके संयुक्त शब्दों के पाठभेद विशेष ध्यान माँगते हैं।

श्लोक 11

सरल अर्थ: कुन्द, चन्द्र और स्फटिक के समान उज्ज्वल त्रिनेत्र सद्योजात पश्चिम दिशा की रक्षा करें। व्याख्या: उज्ज्वल रूप कृपा का बिम्ब है; सद्योजात नाम की वर्तनी में भी संस्करणभेद मिलता है।

श्लोक 12

सरल अर्थ: कमल-केसर जैसी कान्ति वाले चतुर्मुख वामदेव उत्तर दिशा में रक्षा करें। व्याख्या: वरद, अक्षमाला और अभयमुद्रा शिव के विशिष्ट ध्यानरूप के संकेत हैं।

श्लोक 13

सरल अर्थ: दीप्तिमान पंचमुख ईशान ऊपर की दिशा में रक्षा करें। व्याख्या: चार दिशाओं के बाद ऊर्ध्व दिशा जोड़कर साधक और विश्व की प्रतीकात्मक समग्रता दिखाई गई है।

श्लोक 14

सरल अर्थ: चन्द्रमौलि सिर की, भालनेत्र ललाट की, और विश्वनाथ नेत्रों तथा नासिका की रक्षा करें। व्याख्या: डिजिटल पाठ में चन्द्रमौलि पद के बीच असामान्य रिक्ति है; मुद्रित प्रति से जाँच आवश्यक है।

श्लोक 15

सरल अर्थ: श्रुतियों में गाई गई कीर्ति वाले शिव कानों, कपाली कपोलों, पंचवक्त्र मुख और वेदजिह्वा जिह्वा की रक्षा करें। व्याख्या: कान और वाणी केवल शरीर के अंग नहीं, ज्ञान ग्रहण करने तथा सत्य बोलने की प्रेरणा भी हैं।

श्लोक 16

सरल अर्थ: नीलकण्ठ कंठ, पिनाकपाणि दोनों हाथ और दक्षयज्ञ-विनाशक शिव वक्षःस्थल की रक्षा करें। व्याख्या: भिन्न उपाधियाँ शिव-कथाओं की स्मृति कराती हैं और शरीर के अंगों से प्रतीकात्मक रूप में जुड़ती हैं।

श्लोक 17

सरल अर्थ: गिरिधन्वा उदर, कामान्तकारी मध्यभाग, हेरम्ब के पिता नाभि और धूर्जटि कटि की रक्षा करें। व्याख्या: हेरम्ब गणेश का नाम है; ‘हेरम्बतात’ से शिव की पारिवारिक पहचान उभरती है।

श्लोक 18

सरल अर्थ: कुबेरमित्र जाँघों, जगदीश्वर घुटनों तथा वृषध्वज पिंडलियों और चरणों की रक्षा करें। व्याख्या: शरीर के छोटे-बड़े अंगों की यह सूची समग्र संरक्षण की भावनात्मक रचना बनाती है।

श्लोक 19

सरल अर्थ: महेश्वर दिन के आरम्भ, वामदेव मध्ययाम, त्र्यम्बक तृतीय पहर और वृषध्वज संध्याकाल की रक्षा करें। व्याख्या: दिन के पहरों का यह क्रम काव्यात्मक सर्वकालिक प्रार्थना है, अप्रमाणित मुहूर्त-विधान नहीं।

श्लोक 20

सरल अर्थ: चन्द्रशेखर रात्रि के आरम्भ, गंगाधर आधी रात, गौरीपति रात्रि के अन्त और मृत्युंजय सर्वकाल रक्षा करें। व्याख्या: दिन-रात का चक्र पूर्ण होता है; मृत्युंजय विशेषण शारीरिक अमरता का वचन नहीं है।

श्लोक 21

सरल अर्थ: शंकर भीतर, स्थाणु बाहर, पशुपति मध्य में और सदाशिव चारों ओर रक्षा करें। व्याख्या: भीतर और बाहर की रक्षा को मनःस्थिति तथा बाहरी कठिनाइयों के रूप में भी समझ सकते हैं।

श्लोक 22

सरल अर्थ: शिव खड़े होने, चलते, बैठे और सोते समय हर दशा में रक्षा करें। व्याख्या: साधारण जीवन की सभी अवस्थाओं में ईश्वर-स्मरण का संकेत है; कुछ शब्दों के बीच रिक्ति संदिग्ध है।

श्लोक 23

सरल अर्थ: नीलकण्ठ मार्गों में, त्रिपुरारि दुर्गम पहाड़ों में और मृगव्याध वन-प्रवास में रक्षा करें। व्याख्या: कठिन यात्रा जीवन की अनिश्चितता का रूपक भी है; इससे सामान्य यात्रा-सावधानी नहीं हटती।

श्लोक 24

सरल अर्थ: प्रचण्ड वीरभद्र दुर्जेय शत्रु-सेना के भय से रक्षा करें। व्याख्या: वीरभद्र का प्रचण्ड चित्र पुराणिक युद्ध-परिवेश से जुड़ा है, हिंसा को उचित ठहराने के लिए नहीं।

श्लोक 25

सरल अर्थ: असंख्य आक्रमणकारी सैन्यबल के सामने भगवान् के भयानक परशु की रक्षा-शक्ति का आह्वान है। व्याख्या: अतिशयोक्तिपूर्ण सेनासंख्याएँ काव्य की तीव्रता बढ़ाती हैं; यह युद्धकौशल की शिक्षा नहीं है।

श्लोक 26

सरल अर्थ: त्रिपुरान्तक का ज्वलन्त त्रिशूल लुटेरों से तथा पिनाक धनुष हिंस्र पशुओं से रक्षा करे। व्याख्या: चोरों और वन्य जीवों का भय पुराने यात्रा-जगत की झलक है; यह वास्तविक सुरक्षा-उपाय का विकल्प नहीं।

श्लोक 27

सरल अर्थ: जगत् के अधीश्वर बुरे स्वप्न, अशुभ संकेत, दुःख, रोग और विविध भय दूर करें। व्याख्या: बहुत लम्बा समास अनेक आशंकाएँ गिनाता है; रोगहरण यहाँ धार्मिक याचना है, चिकित्सा का दावा नहीं।

श्लोक 28

सरल अर्थ: ऋषभ कहते हैं कि उन्होंने समस्त प्राणियों के लिए शुभ और गोपनीय शैव कवच कहा है। व्याख्या: दीर्घ गद्यात्मक आवाहन के बाद फलश्रुति आरम्भ होती है; दोनों को एक श्लोक में न मिलाएँ।

श्लोक 29

सरल अर्थ: शम्भु की कृपा से इस कवच का आश्रय लेने वाले के भय दूर होने का परम्परागत कथन है। व्याख्या: यह ग्रंथ के भीतर दिया धार्मिक फल-वचन है, प्रमाणित मनोवैज्ञानिक या शारीरिक सुरक्षा नहीं।

श्लोक 30

सरल अर्थ: रोगग्रस्त या मृत्यु-संकट में पड़े व्यक्ति को सुख और दीर्घायु मिलने का धार्मिक आश्वासन दिया गया है। व्याख्या: धार्मिक आश्वासन को स्वास्थ्य-गारंटी न समझें; बीमार व्यक्ति के लिए उचित चिकित्सा आवश्यक है।

श्लोक 31

सरल अर्थ: कवच से दरिद्रता शान्त होने, सौभाग्य बढ़ने और देवसम्मान मिलने का फल-वचन है। व्याख्या: समृद्धि के कथन परम्परागत आस्था व्यक्त करते हैं, व्यावहारिक आर्थिक सलाह नहीं।

श्लोक 32

सरल अर्थ: कथा में बड़े और छोटे पापों से निवृत्ति तथा अंत में शिवप्राप्ति का धार्मिक फल कहा गया है। व्याख्या: मोक्ष की धार्मिक धारणा से किसी कर्म की नैतिक या कानूनी जवाबदेही समाप्त नहीं होती।

श्लोक 33

सरल अर्थ: ऋषभ स्नेहपूर्वक शिष्य को उत्तम शैव कवच देकर कल्याण की कामना करते हैं। व्याख्या: ‘वत्स’ सम्बोधन गुरु की करुणा और शिष्य से निकटता बताता है।

श्लोक 34

सरल अर्थ: कथावाचक कहते हैं कि ऋषभ ने राजकुमार को ऊँची ध्वनि वाला शंख तथा तलवार दी। व्याख्या: यहाँ वक्ता सूत हैं और कथा पुनः राजकुमार भद्रायु के प्रसंग में प्रवेश करती है।

श्लोक 35

सरल अर्थ: कथा में अभिमन्त्रित भस्म से स्पर्श कर राजकुमार को हाथियों जैसा असाधारण बल मिलने का वर्णन है। व्याख्या: हाथियों के बल का यह पुराणिक चित्र है, प्रयोग योग्य उपचार-विधि या वैज्ञानिक दावा नहीं।

श्लोक 36

सरल अर्थ: कथा के अनुसार भस्म के प्रभाव से राजकुमार बल, ऐश्वर्य, धैर्य और स्मृति पाकर शरद्-सूर्य की तरह चमकता है। व्याख्या: शरद्-सूर्य की उपमा राजकीय तेज का बिम्ब है; किसी चमत्कार का स्वतंत्र प्रमाण नहीं।

श्लोक 37

सरल अर्थ: ऋषभ कहते हैं कि यह तलवार उनकी तपस्या और मन्त्रशक्ति से प्राप्त उपहार है। व्याख्या: कथा अस्त्र को वरदान के रूप में दिखाती है; यहाँ हथियार चलाने के निर्देश नहीं दिए जाते।

श्लोक 38

सरल अर्थ: कथा में कहा गया है कि इस तलवार को दिखाने मात्र से शत्रु गिर पड़ेगा, चाहे मृत्यु ही क्यों न हो। व्याख्या: हिंसात्मक और अलौकिक फल-वचन को केवल कथा का कथन समझें, सत्यापित कार्य-क्षमता नहीं।

श्लोक 39

सरल अर्थ: शंख की ध्वनि सुनकर शत्रुओं के मूर्छित होने तथा शस्त्र छोड़ने का वर्णन है। व्याख्या: शंख का चित्र राजकीय तेज और रक्षा से जुड़ता है; इसे युद्ध-कौशल न माना जाए।

श्लोक 40

सरल अर्थ: शंख और तलवार को शत्रुबल नष्ट करने तथा अपने पक्ष का साहस बढ़ाने वाला बताया गया है। व्याख्या: यह पुराणिक युद्धभाषा है; इसे दूसरों पर बल प्रयोग का मार्गदर्शन नहीं बनाना चाहिए।

श्लोक 41

सरल अर्थ: कवच, शंख, खड्ग तथा हाथियों के अतुल बल को राजकुमार का सहायक बताया गया है। व्याख्या: हाथियों के बल की संख्या अन्य प्रचलित पाठ में बदलती है; चुने गए साक्ष्य का शब्द रखा गया है।

श्लोक 42

सरल अर्थ: ऋषभ युद्ध में विजय, पैतृक सिंहासन मिलने और राज्यपालन का आशीर्वाद देते हैं। व्याख्या: राज्यप्राप्ति भद्रायु की कथा का भविष्यवचन है; हर पाठक को दिया सार्वभौम वचन नहीं।

श्लोक 43

सरल अर्थ: भद्रायु और उसकी माता को उपदेश देकर तथा दोनों से सम्मान पाकर ऋषभ चले जाते हैं। व्याख्या: शिष्य और माता की कृतज्ञता के साथ अध्याय समाप्त होता है; कोलॉफन अलग पाठ-इकाई है।

  1. Skanda Purana, Brahmottara-khanda 12: Śivakavacakathanam (Vishvasa online reading) · स्रोत खोलें
  2. Skanda Purana Brahmottara chapter 12 (Sanskrit Wikisource) · स्रोत खोलें
  3. Shiva Kavacham, Rishabha tradition (Sanskrit Documents) · स्रोत खोलें
  4. Description of Sivakavaca, Skanda Purana Brahmottara 12, translated by G V Tagare · स्रोत खोलें
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