पाठ, अर्थ और व्याख्या
श्रुत्वा मुनिमुखात्पुत्रं गिरिजाया महाबलम् । पञ्चमे मासि सम्प्राप्ते मरीचिर्वीक्षितुं ययौ ॥
अर्थ
बालक के पाँचवें महीने में महर्षि मरीचि, गौरी के अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र को देखने आते हैं।
व्याख्या
यह अध्याय का कथा-प्रवेश है; अभी रक्षा-प्रार्थना आरम्भ नहीं हुई। मरीचि को आगन्तुक ऋषि कहा गया है; संक्षिप्त पाठों में वक्ता-संकेत भिन्न मिलते हैं।
भूतभव्यभविष्यज्ञः समलोष्ठाश्मकाञ्चनः । वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो न्यस्तस्वपरविभ्रमः ॥
अर्थ
आगन्तुक ऋषि भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता तथा मिट्टी, पत्थर और सोने को समान मानने वाले बताए गए हैं।
व्याख्या
‘समलोष्टाश्मकाञ्चन’ मिट्टी, पत्थर और सोने में समदृष्टि का बिम्ब है। इसे व्यवहार में उचित-अनुचित की उपेक्षा न समझें।
संहारे रक्षणे सृष्टौ मनसा जगतः क्षमः । तं दृष्ट्वा पादयोस्तस्य पतिता सखिभिः सह ॥
अर्थ
वे सृष्टि, रक्षा और संहार में समर्थ माने गए हैं; गौरी सखियों के साथ उनके चरणों में प्रणाम करती हैं।
व्याख्या
सृष्टि, पालन और संहार की क्षमता ऋषि का पुराणिक महत्त्व बताती है। गौरी का प्रणाम गुरु-सम्मान की कथा-भाषा है।
उपवेश्यासने पादौ क्षालयामास भक्तितः । तज्जलं पावनं पीत्वा सिषेचान्तर्गृहं मुदा ॥
अर्थ
गौरी ऋषि को आसन देती हैं, चरण धोती हैं और कथा के अनुसार आदरपूर्वक अतिथि-सत्कार करती हैं।
व्याख्या
अतिथि-सत्कार इस संवाद की पृष्ठभूमि है; इसे किसी अनुष्ठान की निर्देशिका के रूप में नहीं दिया गया है।
उपचारैः षोडशभिः पुपूजेश्वरभावना । उवाच पार्वती तुष्टाऽलभ्यं दृष्टं पदं हि ते ॥
अर्थ
वे सोलह उपचारों से पूजा कर उनके दुर्लभ आगमन को अपना सौभाग्य कहती हैं।
व्याख्या
‘षोडशोपचार’ सम्मान की सोलह परम्परागत विधियों का नाम है। अन्तिम पद का डिजिटल पाठ विशेष जाँच माँगता है।
अहमात्ममना देवि न व्रजामि हि कुत्रचित् । अकस्माद्ध्यानविषयस्तव पुत्रो बभूव मे ॥
अर्थ
ऋषि कहते हैं कि वे सामान्यतः अपने अन्तर्मन में स्थित रहते हैं, पर गौरी का पुत्र अचानक उनके ध्यान में आया।
व्याख्या
ध्यान में बालक के रूप का प्रकट होना ऋषि के लिए उसका आध्यात्मिक महत्त्व व्यक्त करता है; यह इतिहास-सिद्ध भेंट नहीं है।
तस्य ते दर्शनाकाङ्क्षी शिवस्याप्यहमागतः । एवमाकर्ण्य सा वाक्यं तस्यर्षेस्तनयं स्वकम् ॥
अर्थ
बालक के दर्शन की इच्छा से ऋषि आए हैं; उनका वचन सुनकर गौरी पुत्र को उनके सामने लाती हैं।
व्याख्या
चुने गए पाठ में ऋषि का वचन और कथावाचक का अगला सूत्र एक ही क्रमांक में आते हैं; पाठ संख्या बदलकर न दिखाएँ।
अतिप्रीतिमना गौरी तस्याङ्के संन्यवेशत् । ऊचे सा तं महाभाग्यं फलितं दर्शनात्तव ॥
अर्थ
आनन्दित गौरी बालक को ऋषि की गोद में रखकर इस मिलन को शुभ मानती हैं।
व्याख्या
गौरी की मातृ-स्नेहपूर्ण चिंता आगे आने वाले कवच का मूल भाव है, किसी को वश में करने की आकांक्षा नहीं।
पुण्यं च परमं प्राप्तं शुभमग्रे भविष्यति । गौरि तेऽयं सुतो ब्रह्मस्वरूपो भासते मम ॥
अर्थ
गौरी भविष्य के मंगल की आशा व्यक्त करती हैं; ऋषि बालक को ब्रह्मस्वरूप मानते हैं।
व्याख्या
इसी श्लोक में गौरी के मंगल-वचन से ऋषि के ब्रह्म-सम्बन्धी कथन की ओर परिवर्तन है।
षट्चक्रभेदनरता योगनिष्ठा महर्षयः । वायुभक्षा उपासन्ते यं ते सोऽयं तवात्मजः ॥
अर्थ
जिन परम तत्त्व को योगनिष्ठ महर्षि साधते हैं, ऋषि उसी को गौरी के पुत्र में देखते हैं।
व्याख्या
षट्चक्र का उल्लेख पारम्परिक योग-दर्शन के भीतर है; इसे आधुनिक शरीर-विज्ञान का प्रत्यक्ष निष्कर्ष न मानें।
गुणत्रयविभेदेन त्रितनुस्त्रिक्रियाकरः । यत्सत्तयाऽथ शेषोऽपि वहते मस्तके भुवम् ॥
अर्थ
तीन गुणों और तीन प्रकार के कार्यों का आधार होकर भगवान् जगत् की धारणा करते हैं—ऐसी पुराणिक अभिव्यक्ति है।
व्याख्या
‘गुणत्रय’ सत्त्व, रजस् और तमस् है। शेष द्वारा पृथ्वी-धारण पुराणिक ब्रह्माण्ड-वर्णन का बिम्ब है।
अणुरूपः स्थूलरूपः सप्तविंशतितत्त्वकृत् । चेतनाचेतनं विश्वं यद्रूपं सर्वकर्मकृत् ॥
अर्थ
बालक को अणु और विराट दोनों स्वरूपों में, सत्ताईस तत्त्वों तथा चेतन-अचेतन जगत् का आधार बताया गया है।
व्याख्या
‘अणु’ और ‘स्थूल’ आकार की सीमाओं से परे देवता को दर्शाते हैं। सत्ताईस तत्त्वों की सूची परम्परा के अनुसार समझी जानी चाहिए।
युगे दशभुजः पूर्वे सिंहारूढो विनायकः । द्वितीये षड्भुजो बर्हिवाहनः शशिसन्निभः ॥
अर्थ
प्रथम युग में सिंहवाहन दशभुज विनायक और अगले युग में मयूरवाहन षड्भुज रूप का वर्णन है।
व्याख्या
विभिन्न युगों में गणेश के रूप बताने की यह विशिष्ट परम्परा है; हर सम्प्रदाय का एकमात्र रूप-विधान नहीं।
मयूरेश इति ख्यातो नानादैत्यनिबर्हणः । तृतीये तु युगे देवो रक्तवर्णश्चतुर्भुजः ॥
अर्थ
तीसरे युग में रक्तवर्ण चतुर्भुज गजानन और मयूर पर विराजने वाले मयूरेश का वर्णन आता है।
व्याख्या
‘मयूरेश’ गणेश की विशिष्ट उपासना-परम्परा का नाम है। युग-वर्णन क्रमांक के बीच फैलता है।
गजानन इति ख्यातो धूम्रवर्णः कलौ युगे । धूमकेतुरिति ख्यातो द्विभुजः सर्वदैत्यहा ॥
अर्थ
चौथे युग में धूम्रवर्ण द्विभुज धूमकेतु रूप को दुष्ट शक्तियों का संहारक कहा गया है।
व्याख्या
धूमकेतु इस पाठ का कलियुगी धूम्रवर्ण रूप है; इसे हर दूसरी गणेश-परम्परा पर अनिवार्य रूप से लागू न करें।
एतस्य रक्षणं गौरि दैत्येभ्यः कुरु सर्वदा । एषोऽतिचपलो बालो दैत्यान् हन्ति बहूनपि ॥
अर्थ
ऋषि गौरी से पुत्र की रक्षा करने को कहते हैं; गौरी बालक के चंचल स्वभाव और दैत्य-विजयों को याद करती हैं।
व्याख्या
यहाँ ऋषि से गौरी के वचन में बदलाव आता है। प्रचलित २७-श्लोक संक्षेप इसी स्थान से शुरू होकर अलग संख्या देता है।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम । दैत्या नानाविधा दुष्टाः साधुदेवद्रुहः खलाः । अतोऽस्य कण्ठे किञ्चित्त्वं रक्षार्थं बद्धुमर्हसि ॥
अर्थ
गौरी सोचती हैं कि आगे बालक क्या करेगा और दुष्ट शक्तियों से रक्षा का कोई उपाय चाहती हैं।
व्याख्या
गौरी कवच बाँधने योग्य रक्षा चाहती हैं; दुष्ट शक्तियों का उल्लेख पुराणिक कथानक है, वास्तविक जीवन में भय का निदान नहीं।
ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्ये युगे । त्रेतायां तु मयूरवाहनमिमं षड्बाहुकं सिद्धिदम् । द्वापारे तु गजाननं युगभुजं रक्ताङ्गरागं विभुम् । तुर्ये तु द्विभुजं सिताङ्गरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥
अर्थ
ऋषि चारों युगों में गणेश के अलग-अलग रूप तथा वाहनों के ध्यान का उल्लेख करते हैं।
व्याख्या
चार युगों का ध्यान-वर्णन एक दीर्घ छन्द में है; इसे कई कृत्रिम श्लोकों में नहीं बाँटा गया।
विनायकः शिखां पातु परमात्मा परात्परः । अतिसुन्दरकायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥
अर्थ
विनायक शिखा की और महोत्कट सिर की रक्षा करें—ऐसी प्रार्थना है।
व्याख्या
‘शिखा’ सिर का ऊपरी भाग है; ‘महोत्कट’ गणेश का नाम है। यहीं से अवयव-रक्षा की शृंखला आरम्भ होती है।
ललाटं काश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः । नयने भालचन्द्रस्तु गजास्यत्वोष्ठपल्लवौ ॥
अर्थ
काश्यप ललाट, महोदर भौंहें, भालचन्द्र नेत्र और गजास्य होंठों की रक्षा करें।
व्याख्या
महोदर, भालचन्द्र और गजास्य गणेश के विशेषण हैं। होंठों से जुड़े समास का सटीक अर्थ अनिश्चित है।
जिह्वां पातु गणक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः । वाचं विनायकः पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ॥
अर्थ
गणक्रीड़ जिह्वा, गिरिजासुत ठोड़ी, विनायक वाणी तथा दुर्मुख दाँतों की रक्षा करें।
व्याख्या
‘वाच्’ वाणी की शक्ति है, केवल जिह्वा नहीं; कवच शरीर और इन्द्रिय-क्रियाओं दोनों को समेटता है।
श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिन्तितार्थदः । गणेशस्तु मुखं कण्ठं पातु देवो गणञ्जयः ॥
अर्थ
पाशपाणि कानों, चिन्तितार्थद नाक, गणेश मुख और गणञ्जय कण्ठ की रक्षा करें।
व्याख्या
‘पाश’ गणेश की प्रतिमा में मिलने वाला फंदा है। ‘गणञ्जय’ का रूप इस डिजिटल पाठ के अनुसार है।
स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥
अर्थ
गजस्कन्ध कंधों, विघ्नविनाशन वक्ष, गणनाथ हृदय और हेरम्ब उदर की रक्षा करें।
व्याख्या
हेरम्ब और गणनाथ जैसे नाम स्नेह तथा नेतृत्व के अर्थ-क्षेत्र से जुड़े हैं।
धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः । लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥
अर्थ
धराधर पार्श्वों, विघ्नहर पीठ तथा वक्रतुण्ड गुप्तांग की रक्षा करें।
व्याख्या
गुप्तांग का उल्लेख सम्पूर्ण शरीर की रक्षा-प्रार्थना में स्वाभाविक है; इसे छिपाकर अर्थ न बदलें।
गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् । एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥
अर्थ
गणक्रीड़ घुटनों-पिंडलियों, मंगलमूर्तिमान जाँघों और एकदन्त चरणों-टखनों की रक्षा करें।
व्याख्या
इस श्लोक के व्याकरण और पाठ में वेबसाइटों का अन्तर है। शरीर-अंगों का सामान्य क्रम स्पष्ट, पर मूल रूप मुद्रित प्रति से मिलना बाकी है।
क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः । अङ्गुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥
अर्थ
क्षिप्रप्रसादन भुजाओं, आशाप्रपूरक हाथों तथा पद्महस्त उँगलियों-नाखूनों की रक्षा करें।
व्याख्या
पद्महस्त का अर्थ कमल-हस्त है; यह उसी गणेश का विशेषण है, नया देवता नहीं।
सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु । अनुक्तमपि यत्स्थानं धूमकेतुः सदाऽवतु ॥
अर्थ
मयूरेश समस्त अंगों की और धूमकेतु अनकहे अंगों की भी रक्षा करें।
व्याख्या
‘अनुक्त’ अर्थात जिन अंगों का अलग नाम नहीं लिया गया, उन्हें भी प्रार्थना में समाहित किया गया है।
आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥
अर्थ
आमोद आगे, प्रमोद पीछे, बुद्धीश पूर्व तथा सिद्धिदायक आग्नेय दिशा में रक्षा करें।
व्याख्या
अब शरीर से दिशाओं की ओर रक्षा-विधान बढ़ता है: आगे-पीछे, पूर्व और आग्नेय दिशा।
दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद् वायव्यां गजकर्णकः ॥
अर्थ
उमापुत्र दक्षिण, गणेश्वर नैऋत्य, विघ्नहर्ता पश्चिम और गजकर्णक वायव्य दिशा की रक्षा करें।
व्याख्या
दक्षिण से वायव्य तक की चार दिशाएँ अष्टदिक्-क्रम का भाग हैं। ‘विघ्न’ बाधा या अवरोध है।
कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः । दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥
अर्थ
निधिप उत्तर, ईशनन्दन ईशान, एकदन्त दिन तथा विघ्नहृत रात्रि और सन्ध्या की रक्षा करें।
व्याख्या
उत्तर और ईशान से दिशाओं का चक्र पूरा होता है; फिर दिन, रात और सन्ध्या का उल्लेख आता है।
राक्षसासुरवेतालग्रहभूतपिशाचतः । पाशाङ्कुशधरः पातु रजः सत्त्वं तमः स्मृतिम् ॥
अर्थ
पाश-अंकुशधारी गणेश कथित भयकारी जीवों से तथा स्मृति और गुणों की रक्षा करें।
व्याख्या
वेताल आदि पुराणिक शब्द हैं। रजस्, सत्त्व और तमस् दार्शनिक गुण हैं, भूत-प्रेत की अलग जातियाँ नहीं।
ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मीं च लज्जां कीर्तिं दयां कुलम् । वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारान् सुतान् सखीन् ॥
अर्थ
ज्ञान, धर्म, समृद्धि, लज्जा, कीर्ति, दया, परिवार, शरीर और आजीविका के लिए मंगल-प्रार्थना है।
व्याख्या
‘लक्ष्मी’ यहाँ सम्पन्नता या मंगल का भाव भी देती हैं; सुरक्षा में परिवार, व्यवहार और आजीविका भी आते हैं।
सर्वायुधधरः पौत्रान् मयूरेशोऽवतात्सदा । कपिलोऽजाविकं पातु गवाश्वं विकटोऽवतु ॥
अर्थ
प्रार्थना में पौत्र, पशुधन और गृहस्थ जीवन के संसाधन भी शामिल हैं।
व्याख्या
बकरियाँ, भेड़, गौ और अश्व पुराने कृषक-गृहस्थ जीवन की पृष्ठभूमि दिखाते हैं; आज की पूजा की अनिवार्य वस्तुएँ नहीं।
भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कण्ठे धारयेत्सुधीः । न भयं जायते तस्य यक्षरक्षःपिशाचतः ॥
अर्थ
कवच को भूर्जपत्र पर लिखकर गले में धारण करने और भयमुक्त रहने का पारम्परिक फल-वचन है।
व्याख्या
भूर्जपत्र पर लिखकर पहनने का कथन ताबीज की धार्मिक मान्यता है; इसे प्रमाणित सुरक्षा या यहाँ दिया गया तरीका न समझें।
त्रिसन्ध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत् । यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥
अर्थ
प्रातः-मध्याह्न-सन्ध्या पाठ से बल और यात्रा में सफलता मिलने का पारम्परिक दावा है।
व्याख्या
‘वज्रसार’ शरीर की अतिशयोक्तिपूर्ण काव्य-छवि है। चिकित्सा और यात्रा-सुरक्षा के वास्तविक उपाय इससे अलग हैं।
युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं प्राप्नुयाद्ध्रुवम् । मारणोच्चाटनाकर्षस्तम्भमोहनकर्मणि ॥
अर्थ
युद्ध में विजय और मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तम्भन जैसे कठोर तान्त्रिक प्रयोगों का भी नाम आता है।
व्याख्या
मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तम्भन और मोहन बलपूर्वक साधना-श्रेणियों के नाम हैं; यहाँ उनके प्रयोग की विधि नहीं बताई गई है।
सप्तवारं पठेद्यस्तु दिनानामेकविंशतिम् । तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥
अर्थ
सात बार इक्कीस दिन तक पढ़ने से अलग-अलग मनोरथ पूरे होने की धार्मिक प्रतिज्ञा है।
व्याख्या
सात और इक्कीस संख्याएँ मूल फल-वचन में आती हैं; यह वेबसाइट किसी फल की गारंटी वाला जप-अभियान निर्धारित नहीं करती।
एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः । कारागृहगतं सद्यो राज्ञा वध्यं च मोचयेत् ॥
अर्थ
नियत संख्या में पाठ करने पर कैद या राजदण्ड से मुक्ति मिलने का फल-वचन है।
व्याख्या
कारावास या दण्ड से मुक्ति की बात धार्मिक फलश्रुति है; यह कानूनी सलाह या न्याय-प्रक्रिया के विकल्प का दावा नहीं।
राजदर्शनवेलायां पठेद्यस्तु त्रिवारतः । स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतिं च सभां जयेत् ॥
अर्थ
राजसभा जाने से पहले तीन बार पाठ करने पर राजा और सभा को प्रभावित करने का दावा है।
व्याख्या
राजा या सभा को वश करने की भाषा ऐतिहासिक सत्ता-परिस्थिति दिखाती है; वास्तविक लोगों को नियंत्रित करने की क्षमता का प्रमाण नहीं।
इदं गणेशकवचं मुद्गलेन समीरितम् । कश्यपाय च तेनाऽथ माण्डव्याय महर्षये ॥
अर्थ
यह शिक्षा मुद्गल से कश्यप और फिर माण्डव्य ऋषि तक पहुँची—ऐसी परम्परा बताई गई है।
व्याख्या
प्रचलित २७-श्लोक पाठ में कश्यप-मुद्गल क्रम उलटा बताया जाता है; इसी कारण मूल मुद्रित प्रति से विशेष मिलान चाहिए।
मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम् । न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् । सर्वरक्षाकरं सर्वमनःकामप्रपूरकम् ॥
अर्थ
ऋषि कहते हैं कि उन्हें यह कवच कृपा से मिला और श्रद्धालु को देने योग्य ज्ञान है।
व्याख्या
इस डिजिटल रूप में श्लोक ४१ तीन अर्धपंक्तियों का है, जबकि दूसरे डिजिटल रूप में ४०वीं पंक्ति दुहराई गई है; चुपचाप समानीकरण नहीं किया गया।
अनेनास्य कृता रक्षा न बाधाऽस्य भवेत्क्वचित् । राक्षसासुरवेतालदैत्यदानवसम्भवा ॥
अर्थ
अन्त में राक्षस और दूसरी भयकारी शक्तियों से रक्षा का पारम्परिक दावा दिया गया है।
व्याख्या
समापन का कथन पुराणिक दैत्यादि से रक्षा की आस्था व्यक्त करता है; इसे किसी वास्तविक संकट का तथ्यात्मक निदान न मानें।
सन्दर्भ और उपयोग
सम्पूर्ण चुना गया मूल पाठ: ४२ श्लोक। यह पाण्डुलिपि/मुद्रित प्रति से अन्तिम सत्यापित पाठ नहीं है और प्रकाशन हेतु अनुमोदित नहीं है।
पहचान और परिचय
यह गणेशपुराण के क्रीडाखण्ड, अध्याय ८५ का समग्र ४२-श्लोक पाठ है। पहले गौरी और मरीचि ऋषि का संवाद, फिर गणेश के चार युग-रूप तथा शरीर, दिशाओं और गृहस्थ जीवन की रक्षा-प्रार्थना, और अंत में पारम्परिक फलश्रुति आती है। 1 2
महत्त्वपूर्ण पाठभेद: बहुत-सी वेबसाइटों पर मिलने वाला २७-श्लोक ‘गणेश कवच’ इसी प्रसंग के निकट से आरम्भ होता है, पर उसकी संख्या, वक्ता-परम्परा, कुछ शब्द और ‘अध्याय ८६’ का दावा भिन्न है। इस लेख में दोनों पाठों को मिलाकर एक नया पाठ नहीं बनाया गया है। मुद्रित संस्करण से निर्णय होना अभी शेष है। 3 4
गणेश की भिन्न उपाधियाँ उनके रक्षात्मक गुणों का काव्यात्मक आवाहन हैं। फलश्रुति के रोग, युद्ध, कारावास या तान्त्रिक प्रभाव संबंधी दावे श्रद्धा-परम्परा के भीतर हैं; आधुनिक चिकित्सा, सुरक्षा, कानून या लोगों पर नियंत्रण की गारंटी नहीं। यह आलेख पाठ-समझ है, न कि कवच धारण, जप-संख्या या तान्त्रिक क्रिया सिखाने का विधान।
पाठ, स्रोत और संपादकीय टिप्पणी
- मूल डिजिटल पाठ: संस्कृत विकिस्रोत पर गणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ८५ 1। उसी खण्ड के संस्कृत डॉक्युमेंट्स पाठ से चयनित स्थानों का मिलान हुआ है 2। मूल ऐतिहासिक छपाई के पृष्ठ अभी नहीं मिलाए गए।
- अलग पाठ: प्रचलित २७-श्लोक गणेश कवच 3 और 4 भिन्न क्रम एवं समाप्ति रखते हैं। उन्हें इस ४२-श्लोक पाठ में नहीं जोड़ा गया।
- पुनरावृत्ति/पाठभेद: विशेषतः १६–१८, २०–२२, २५, ३०–३२ और ४०–४१ में अलग डिजिटल पाठ हैं। ४०वें श्लोक में मुद्गल से कश्यप को उपदेश है; संक्षिप्त संस्करण में कश्यप से मुद्गल को। ४१वें श्लोक की अतिरिक्त अर्धपंक्ति पर भी स्वतंत्र निर्णय शेष है। 1 2
- अलग ग्रन्थ: पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय का गणेशहृदयकवच 5 रु्द्रयामल-संबद्ध अलग रचना है, इस पाठ की प्रमाणित प्रति नहीं।
- अधिकार: विकिस्रोत पर CC BY-SA संकेत है, और संस्कृत डॉक्युमेंट्स की डिजिटल प्रति के अपने उपयोग-प्रतिबन्ध हैं। वेबसाइट पर उपयोग से पहले अधिकार और सम्भावित शेयर-अलाइक शर्तों का विधिक परीक्षण आवश्यक है।
पाठक के लिए प्रश्नोत्तर
क्या गणेश कवच में २७ या ४२ श्लोक हैं? चुने गए पूर्ण गणेशपुराण अध्याय में ४२ हैं। अलग, प्रचलित संक्षिप्त संस्करण में २७ श्लोक गिने जाते हैं। क्या ‘गणेशपुराण अध्याय ८६’ ही इसका स्रोत है? जिन दो पूर्ण-अध्याय डिजिटल पाठों को देखा गया, उनमें कवच अध्याय ८५ है। ८६ का उल्लेख कुछ स्वतंत्र कवच-पन्नों पर है और उसकी मुद्रित प्रति से जाँच अभी जरूरी है। क्या रक्षा या फल के दावे निश्चित परिणाम हैं? नहीं। उन्हें धार्मिक फल-वचन की तरह पढ़ें; वास्तविक सुरक्षा, चिकित्सा और कानूनी उपाय अलग आवश्यक हैं। क्या इसे देखकर ताबीज या तन्त्र-विधि करनी चाहिए? यह संपादकीय अध्ययन-प्रति कोई व्यवहारिक विधि नहीं देती। परम्परा-विशिष्ट निर्देशों के लिए योग्य मार्गदर्शन और स्वतंत्र समीक्षा आवश्यक है। क्या इसका सम्बन्ध गणेशपञ्चरत्नम् से है? दोनों गणेश से सम्बद्ध हैं, पर अलग कृतियाँ हैं। गणेशपञ्चरत्नम् पहले से सम्बन्धित पाठ है।
स्रोत, श्रेय और लाइसेंस
संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।
Traditional Purāṇic text; Sanskrit Wikisource contributors. Based on Gaṇeśapurāṇa, Krīḍākhaṇḍa, chapters 81–85: chapter 85 Gaṇeśakavaca. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.
पाठ का लाइसेंस
इस पाठ के लेख और पदवार व्याख्या में अर्थ की अलग अभिव्यक्तियाँ हैं; दोनों प्रस्तुत हैं।
संस्करण का मूल रोमन पाठ
इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।
- 1
śrutvā munimukhātputraṃ girijāyā mahābalam | pañcame māsi samprāpte marīcirvīkṣituṃ yayau ||
- 2
bhūtabhavyabhaviṣyajñaḥ samaloṣṭhāśmakāñcanaḥ | vedaśāstrārthatattvajño nyastasvaparavibhramaḥ ||
- 3
saṃhāre rakṣaṇe sṛṣṭau manasā jagataḥ kṣamaḥ | taṃ dṛṣṭvā pādayostasya patitā sakhibhiḥ saha ||
- 4
upaveśyāsane pādau kṣālayāmāsa bhaktitaḥ | tajjalaṃ pāvanaṃ pītvā siṣecāntargṛhaṃ mudā ||
- 5
upacāraiḥ ṣoḍaśabhiḥ pupūjeśvarabhāvanā | uvāca pārvatī tuṣṭā’labhyaṃ dṛṣṭaṃ padaṃ hi te ||
- 6
ahamātmamanā devi na vrajāmi hi kutracit | akasmāddhyānaviṣayastava putro babhūva me ||
- 7
tasya te darśanākāṅkṣī śivasyāpyahamāgataḥ | evamākarṇya sā vākyaṃ tasyarṣestanayaṃ svakam ||
- 8
atiprītimanā gaurī tasyāṅke saṃnyaveśat | ūce sā taṃ mahābhāgyaṃ phalitaṃ darśanāttava ||
- 9
puṇyaṃ ca paramaṃ prāptaṃ śubhamagre bhaviṣyati | gauri te’yaṃ suto brahmasvarūpo bhāsate mama ||
- 10
ṣaṭcakrabhedanaratā yoganiṣṭhā maharṣayaḥ | vāyubhakṣā upāsante yaṃ te so’yaṃ tavātmajaḥ ||
- 11
guṇatrayavibhedena tritanustrikriyākaraḥ | yatsattayā’tha śeṣo’pi vahate mastake bhuvam ||
- 12
aṇurūpaḥ sthūlarūpaḥ saptaviṃśatitattvakṛt | cetanācetanaṃ viśvaṃ yadrūpaṃ sarvakarmakṛt ||
- 13
yuge daśabhujaḥ pūrve siṃhārūḍho vināyakaḥ | dvitīye ṣaḍbhujo barhivāhanaḥ śaśisannibhaḥ ||
- 14
mayūreśa iti khyāto nānādaityanibarhaṇaḥ | tṛtīye tu yuge devo raktavarṇaścaturbhujaḥ ||
- 15
gajānana iti khyāto dhūmravarṇaḥ kalau yuge | dhūmaketuriti khyāto dvibhujaḥ sarvadaityahā ||
- 16
etasya rakṣaṇaṃ gauri daityebhyaḥ kuru sarvadā | eṣo’ticapalo bālo daityān hanti bahūnapi ||
- 17
agre kiṃ karma karteti na jāne munisattama | daityā nānāvidhā duṣṭāḥ sādhudevadruhaḥ khalāḥ | ato’sya kaṇṭhe kiñcittvaṃ rakṣārthaṃ baddhumarhasi ||
- 18
dhyāyet siṃhagataṃ vināyakamamuṃ digbāhumādye yuge | tretāyāṃ tu mayūravāhanamimaṃ ṣaḍbāhukaṃ siddhidam | dvāpāre tu gajānanaṃ yugabhujaṃ raktāṅgarāgaṃ vibhum | turye tu dvibhujaṃ sitāṅgaruciraṃ sarvārthadaṃ sarvadā ||
- 19
vināyakaḥ śikhāṃ pātu paramātmā parātparaḥ | atisundarakāyastu mastakaṃ sumahotkaṭaḥ ||
- 20
lalāṭaṃ kāśyapaḥ pātu bhrūyugaṃ tu mahodaraḥ | nayane bhālacandrastu gajāsyatvoṣṭhapallavau ||
- 21
jihvāṃ pātu gaṇakrīḍaścubukaṃ girijāsutaḥ | vācaṃ vināyakaḥ pātu dantān rakṣatu durmukhaḥ ||
- 22
śravaṇau pāśapāṇistu nāsikāṃ cintitārthadaḥ | gaṇeśastu mukhaṃ kaṇṭhaṃ pātu devo gaṇañjayaḥ ||
- 23
skandhau pātu gajaskandhaḥ stanau vighnavināśanaḥ | hṛdayaṃ gaṇanāthastu herambo jaṭharaṃ mahān ||
- 24
dharādharaḥ pātu pārśvau pṛṣṭhaṃ vighnaharaḥ śubhaḥ | liṅgaṃ guhyaṃ sadā pātu vakratuṇḍo mahābalaḥ ||
- 25
gaṇakrīḍo jānujaṅghe ūrū maṅgalamūrtimān | ekadanto mahābuddhiḥ pādau gulphau sadā’vatu ||
- 26
kṣipraprasādano bāhū pāṇī āśāprapūrakaḥ | aṅgulīśca nakhān pātu padmahasto’rināśanaḥ ||
- 27
sarvāṅgāni mayūreśo viśvavyāpī sadā’vatu | anuktamapi yatsthānaṃ dhūmaketuḥ sadā’vatu ||
- 28
āmodastvagrataḥ pātu pramodaḥ pṛṣṭhato’vatu | prācyāṃ rakṣatu buddhīśa āgneyyāṃ siddhidāyakaḥ ||
- 29
dakṣiṇasyāmumāputro naiṛtyāṃ tu gaṇeśvaraḥ | pratīcyāṃ vighnahartā’vyād vāyavyāṃ gajakarṇakaḥ ||
- 30
kauberyāṃ nidhipaḥ pāyādīśānyāmīśanandanaḥ | divā’vyādekadantastu rātrau sandhyāsu vighnahṛt ||
- 31
rākṣasāsuravetālagrahabhūtapiśācataḥ | pāśāṅkuśadharaḥ pātu rajaḥ sattvaṃ tamaḥ smṛtim ||
- 32
jñānaṃ dharmaṃ ca lakṣmīṃ ca lajjāṃ kīrtiṃ dayāṃ kulam | vapurdhanaṃ ca dhānyaṃ ca gṛhaṃ dārān sutān sakhīn ||
- 33
sarvāyudhadharaḥ pautrān mayūreśo’vatātsadā | kapilo’jāvikaṃ pātu gavāśvaṃ vikaṭo’vatu ||
- 34
bhūrjapatre likhitvedaṃ yaḥ kaṇṭhe dhārayetsudhīḥ | na bhayaṃ jāyate tasya yakṣarakṣaḥpiśācataḥ ||
- 35
trisandhyaṃ japate yastu vajrasāratanurbhavet | yātrākāle paṭhedyastu nirvighnena phalaṃ labhet ||
- 36
yuddhakāle paṭhedyastu vijayaṃ prāpnuyāddhruvam | māraṇoccāṭanākarṣastambhamohanakarmaṇi ||
- 37
saptavāraṃ paṭhedyastu dinānāmekaviṃśatim | tattatphalamavāpnoti sādhako nātra saṃśayaḥ ||
- 38
ekaviṃśativāraṃ ca paṭhettāvaddināni yaḥ | kārāgṛhagataṃ sadyo rājñā vadhyaṃ ca mocayet ||
- 39
rājadarśanavelāyāṃ paṭhedyastu trivārataḥ | sa rājānaṃ vaśaṃ nītvā prakṛtiṃ ca sabhāṃ jayet ||
- 40
idaṃ gaṇeśakavacaṃ mudgalena samīritam | kaśyapāya ca tenā’tha māṇḍavyāya maharṣaye ||
- 41
mahyaṃ sa prāha kṛpayā kavacaṃ sarvasiddhidam | na deyaṃ bhaktihīnāya deyaṃ śraddhāvate śubham | sarvarakṣākaraṃ sarvamanaḥkāmaprapūrakam ||
- 42
anenāsya kṛtā rakṣā na bādhā’sya bhavetkvacit | rākṣasāsuravetāladaityadānavasambhavā ||
- Gaṇeśapurāṇa, Krīḍākhaṇḍa, chapters 81–85: chapter 85 Gaṇeśakavaca · स्रोत खोलें
- Śrī Gaṇeśapurāṇam, Part 2 Uttarakhanda/Krīḍākhaṇḍa · स्रोत खोलें
- Śrī Gaṇeśa Kavacha (standalone 27-verse devotional recension) · स्रोत खोलें
- Śrī Gaṇeśakavacam (Sanskrit Wikisource standalone) · स्रोत खोलें
- Gaṇeśahṛdayakavaca manuscript, ca. 1700–1850 · स्रोत खोलें
- Ganesh Puran (Upasana Khand), Munshi Naval Kishore, 1889 · स्रोत खोलें
- ShivGoraksh Devotion Master Curriculum, Image Reuse edition
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
श्लोक 1 — गणेशपुराण २.८५.1
अर्थ: बालक के पाँचवें महीने में महर्षि मरीचि, गौरी के अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र को देखने आते हैं। व्याख्या: यह अध्याय का कथा-प्रवेश है; अभी रक्षा-प्रार्थना आरम्भ नहीं हुई। मरीचि को आगन्तुक ऋषि कहा गया है; संक्षिप्त पाठों में वक्ता-संकेत भिन्न मिलते हैं।
श्लोक 2 — गणेशपुराण २.८५.2
अर्थ: आगन्तुक ऋषि भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता तथा मिट्टी, पत्थर और सोने को समान मानने वाले बताए गए हैं। व्याख्या: ‘समलोष्टाश्मकाञ्चन’ मिट्टी, पत्थर और सोने में समदृष्टि का बिम्ब है। इसे व्यवहार में उचित-अनुचित की उपेक्षा न समझें।
श्लोक 3 — गणेशपुराण २.८५.3
अर्थ: वे सृष्टि, रक्षा और संहार में समर्थ माने गए हैं; गौरी सखियों के साथ उनके चरणों में प्रणाम करती हैं। व्याख्या: सृष्टि, पालन और संहार की क्षमता ऋषि का पुराणिक महत्त्व बताती है। गौरी का प्रणाम गुरु-सम्मान की कथा-भाषा है।
श्लोक 4 — गणेशपुराण २.८५.4
अर्थ: गौरी ऋषि को आसन देती हैं, चरण धोती हैं और कथा के अनुसार आदरपूर्वक अतिथि-सत्कार करती हैं। व्याख्या: अतिथि-सत्कार इस संवाद की पृष्ठभूमि है; इसे किसी अनुष्ठान की निर्देशिका के रूप में नहीं दिया गया है।
श्लोक 5 — गणेशपुराण २.८५.5
अर्थ: वे सोलह उपचारों से पूजा कर उनके दुर्लभ आगमन को अपना सौभाग्य कहती हैं। व्याख्या: ‘षोडशोपचार’ सम्मान की सोलह परम्परागत विधियों का नाम है। अन्तिम पद का डिजिटल पाठ विशेष जाँच माँगता है।
श्लोक 6 — गणेशपुराण २.८५.6
अर्थ: ऋषि कहते हैं कि वे सामान्यतः अपने अन्तर्मन में स्थित रहते हैं, पर गौरी का पुत्र अचानक उनके ध्यान में आया। व्याख्या: ध्यान में बालक के रूप का प्रकट होना ऋषि के लिए उसका आध्यात्मिक महत्त्व व्यक्त करता है; यह इतिहास-सिद्ध भेंट नहीं है।
श्लोक 7 — गणेशपुराण २.८५.7
अर्थ: बालक के दर्शन की इच्छा से ऋषि आए हैं; उनका वचन सुनकर गौरी पुत्र को उनके सामने लाती हैं। व्याख्या: चुने गए पाठ में ऋषि का वचन और कथावाचक का अगला सूत्र एक ही क्रमांक में आते हैं; पाठ संख्या बदलकर न दिखाएँ।
श्लोक 8 — गणेशपुराण २.८५.8
अर्थ: आनन्दित गौरी बालक को ऋषि की गोद में रखकर इस मिलन को शुभ मानती हैं। व्याख्या: गौरी की मातृ-स्नेहपूर्ण चिंता आगे आने वाले कवच का मूल भाव है, किसी को वश में करने की आकांक्षा नहीं।
श्लोक 9 — गणेशपुराण २.८५.9
अर्थ: गौरी भविष्य के मंगल की आशा व्यक्त करती हैं; ऋषि बालक को ब्रह्मस्वरूप मानते हैं। व्याख्या: इसी श्लोक में गौरी के मंगल-वचन से ऋषि के ब्रह्म-सम्बन्धी कथन की ओर परिवर्तन है।
श्लोक 10 — गणेशपुराण २.८५.10
अर्थ: जिन परम तत्त्व को योगनिष्ठ महर्षि साधते हैं, ऋषि उसी को गौरी के पुत्र में देखते हैं। व्याख्या: षट्चक्र का उल्लेख पारम्परिक योग-दर्शन के भीतर है; इसे आधुनिक शरीर-विज्ञान का प्रत्यक्ष निष्कर्ष न मानें।
श्लोक 11 — गणेशपुराण २.८५.11
अर्थ: तीन गुणों और तीन प्रकार के कार्यों का आधार होकर भगवान् जगत् की धारणा करते हैं—ऐसी पुराणिक अभिव्यक्ति है। व्याख्या: ‘गुणत्रय’ सत्त्व, रजस् और तमस् है। शेष द्वारा पृथ्वी-धारण पुराणिक ब्रह्माण्ड-वर्णन का बिम्ब है।
श्लोक 12 — गणेशपुराण २.८५.12
अर्थ: बालक को अणु और विराट दोनों स्वरूपों में, सत्ताईस तत्त्वों तथा चेतन-अचेतन जगत् का आधार बताया गया है। व्याख्या: ‘अणु’ और ‘स्थूल’ आकार की सीमाओं से परे देवता को दर्शाते हैं। सत्ताईस तत्त्वों की सूची परम्परा के अनुसार समझी जानी चाहिए।
श्लोक 13 — गणेशपुराण २.८५.13
अर्थ: प्रथम युग में सिंहवाहन दशभुज विनायक और अगले युग में मयूरवाहन षड्भुज रूप का वर्णन है। व्याख्या: विभिन्न युगों में गणेश के रूप बताने की यह विशिष्ट परम्परा है; हर सम्प्रदाय का एकमात्र रूप-विधान नहीं।
श्लोक 14 — गणेशपुराण २.८५.14
अर्थ: तीसरे युग में रक्तवर्ण चतुर्भुज गजानन और मयूर पर विराजने वाले मयूरेश का वर्णन आता है। व्याख्या: ‘मयूरेश’ गणेश की विशिष्ट उपासना-परम्परा का नाम है। युग-वर्णन क्रमांक के बीच फैलता है।
श्लोक 15 — गणेशपुराण २.८५.15
अर्थ: चौथे युग में धूम्रवर्ण द्विभुज धूमकेतु रूप को दुष्ट शक्तियों का संहारक कहा गया है। व्याख्या: धूमकेतु इस पाठ का कलियुगी धूम्रवर्ण रूप है; इसे हर दूसरी गणेश-परम्परा पर अनिवार्य रूप से लागू न करें।
श्लोक 16 — गणेशपुराण २.८५.16
अर्थ: ऋषि गौरी से पुत्र की रक्षा करने को कहते हैं; गौरी बालक के चंचल स्वभाव और दैत्य-विजयों को याद करती हैं। व्याख्या: यहाँ ऋषि से गौरी के वचन में बदलाव आता है। प्रचलित २७-श्लोक संक्षेप इसी स्थान से शुरू होकर अलग संख्या देता है।
श्लोक 17 — गणेशपुराण २.८५.17
अर्थ: गौरी सोचती हैं कि आगे बालक क्या करेगा और दुष्ट शक्तियों से रक्षा का कोई उपाय चाहती हैं। व्याख्या: गौरी कवच बाँधने योग्य रक्षा चाहती हैं; दुष्ट शक्तियों का उल्लेख पुराणिक कथानक है, वास्तविक जीवन में भय का निदान नहीं।
श्लोक 18 — गणेशपुराण २.८५.18
अर्थ: ऋषि चारों युगों में गणेश के अलग-अलग रूप तथा वाहनों के ध्यान का उल्लेख करते हैं। व्याख्या: चार युगों का ध्यान-वर्णन एक दीर्घ छन्द में है; इसे कई कृत्रिम श्लोकों में नहीं बाँटा गया।
श्लोक 19 — गणेशपुराण २.८५.19
अर्थ: विनायक शिखा की और महोत्कट सिर की रक्षा करें—ऐसी प्रार्थना है। व्याख्या: ‘शिखा’ सिर का ऊपरी भाग है; ‘महोत्कट’ गणेश का नाम है। यहीं से अवयव-रक्षा की शृंखला आरम्भ होती है।
श्लोक 20 — गणेशपुराण २.८५.20
अर्थ: काश्यप ललाट, महोदर भौंहें, भालचन्द्र नेत्र और गजास्य होंठों की रक्षा करें। व्याख्या: महोदर, भालचन्द्र और गजास्य गणेश के विशेषण हैं। होंठों से जुड़े समास का सटीक अर्थ अनिश्चित है।
श्लोक 21 — गणेशपुराण २.८५.21
अर्थ: गणक्रीड़ जिह्वा, गिरिजासुत ठोड़ी, विनायक वाणी तथा दुर्मुख दाँतों की रक्षा करें। व्याख्या: ‘वाच्’ वाणी की शक्ति है, केवल जिह्वा नहीं; कवच शरीर और इन्द्रिय-क्रियाओं दोनों को समेटता है।
श्लोक 22 — गणेशपुराण २.८५.22
अर्थ: पाशपाणि कानों, चिन्तितार्थद नाक, गणेश मुख और गणञ्जय कण्ठ की रक्षा करें। व्याख्या: ‘पाश’ गणेश की प्रतिमा में मिलने वाला फंदा है। ‘गणञ्जय’ का रूप इस डिजिटल पाठ के अनुसार है।
श्लोक 23 — गणेशपुराण २.८५.23
अर्थ: गजस्कन्ध कंधों, विघ्नविनाशन वक्ष, गणनाथ हृदय और हेरम्ब उदर की रक्षा करें। व्याख्या: हेरम्ब और गणनाथ जैसे नाम स्नेह तथा नेतृत्व के अर्थ-क्षेत्र से जुड़े हैं।
श्लोक 24 — गणेशपुराण २.८५.24
अर्थ: धराधर पार्श्वों, विघ्नहर पीठ तथा वक्रतुण्ड गुप्तांग की रक्षा करें। व्याख्या: गुप्तांग का उल्लेख सम्पूर्ण शरीर की रक्षा-प्रार्थना में स्वाभाविक है; इसे छिपाकर अर्थ न बदलें।
श्लोक 25 — गणेशपुराण २.८५.25
अर्थ: गणक्रीड़ घुटनों-पिंडलियों, मंगलमूर्तिमान जाँघों और एकदन्त चरणों-टखनों की रक्षा करें। व्याख्या: इस श्लोक के व्याकरण और पाठ में वेबसाइटों का अन्तर है। शरीर-अंगों का सामान्य क्रम स्पष्ट, पर मूल रूप मुद्रित प्रति से मिलना बाकी है।
श्लोक 26 — गणेशपुराण २.८५.26
अर्थ: क्षिप्रप्रसादन भुजाओं, आशाप्रपूरक हाथों तथा पद्महस्त उँगलियों-नाखूनों की रक्षा करें। व्याख्या: पद्महस्त का अर्थ कमल-हस्त है; यह उसी गणेश का विशेषण है, नया देवता नहीं।
श्लोक 27 — गणेशपुराण २.८५.27
अर्थ: मयूरेश समस्त अंगों की और धूमकेतु अनकहे अंगों की भी रक्षा करें। व्याख्या: ‘अनुक्त’ अर्थात जिन अंगों का अलग नाम नहीं लिया गया, उन्हें भी प्रार्थना में समाहित किया गया है।
श्लोक 28 — गणेशपुराण २.८५.28
अर्थ: आमोद आगे, प्रमोद पीछे, बुद्धीश पूर्व तथा सिद्धिदायक आग्नेय दिशा में रक्षा करें। व्याख्या: अब शरीर से दिशाओं की ओर रक्षा-विधान बढ़ता है: आगे-पीछे, पूर्व और आग्नेय दिशा।
श्लोक 29 — गणेशपुराण २.८५.29
अर्थ: उमापुत्र दक्षिण, गणेश्वर नैऋत्य, विघ्नहर्ता पश्चिम और गजकर्णक वायव्य दिशा की रक्षा करें। व्याख्या: दक्षिण से वायव्य तक की चार दिशाएँ अष्टदिक्-क्रम का भाग हैं। ‘विघ्न’ बाधा या अवरोध है।
श्लोक 30 — गणेशपुराण २.८५.30
अर्थ: निधिप उत्तर, ईशनन्दन ईशान, एकदन्त दिन तथा विघ्नहृत रात्रि और सन्ध्या की रक्षा करें। व्याख्या: उत्तर और ईशान से दिशाओं का चक्र पूरा होता है; फिर दिन, रात और सन्ध्या का उल्लेख आता है।
श्लोक 31 — गणेशपुराण २.८५.31
अर्थ: पाश-अंकुशधारी गणेश कथित भयकारी जीवों से तथा स्मृति और गुणों की रक्षा करें। व्याख्या: वेताल आदि पुराणिक शब्द हैं। रजस्, सत्त्व और तमस् दार्शनिक गुण हैं, भूत-प्रेत की अलग जातियाँ नहीं।
श्लोक 32 — गणेशपुराण २.८५.32
अर्थ: ज्ञान, धर्म, समृद्धि, लज्जा, कीर्ति, दया, परिवार, शरीर और आजीविका के लिए मंगल-प्रार्थना है। व्याख्या: ‘लक्ष्मी’ यहाँ सम्पन्नता या मंगल का भाव भी देती हैं; सुरक्षा में परिवार, व्यवहार और आजीविका भी आते हैं।
श्लोक 33 — गणेशपुराण २.८५.33
अर्थ: प्रार्थना में पौत्र, पशुधन और गृहस्थ जीवन के संसाधन भी शामिल हैं। व्याख्या: बकरियाँ, भेड़, गौ और अश्व पुराने कृषक-गृहस्थ जीवन की पृष्ठभूमि दिखाते हैं; आज की पूजा की अनिवार्य वस्तुएँ नहीं।
श्लोक 34 — गणेशपुराण २.८५.34
अर्थ: कवच को भूर्जपत्र पर लिखकर गले में धारण करने और भयमुक्त रहने का पारम्परिक फल-वचन है। व्याख्या: भूर्जपत्र पर लिखकर पहनने का कथन ताबीज की धार्मिक मान्यता है; इसे प्रमाणित सुरक्षा या यहाँ दिया गया तरीका न समझें।
श्लोक 35 — गणेशपुराण २.८५.35
अर्थ: प्रातः-मध्याह्न-सन्ध्या पाठ से बल और यात्रा में सफलता मिलने का पारम्परिक दावा है। व्याख्या: ‘वज्रसार’ शरीर की अतिशयोक्तिपूर्ण काव्य-छवि है। चिकित्सा और यात्रा-सुरक्षा के वास्तविक उपाय इससे अलग हैं।
श्लोक 36 — गणेशपुराण २.८५.36
अर्थ: युद्ध में विजय और मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तम्भन जैसे कठोर तान्त्रिक प्रयोगों का भी नाम आता है। व्याख्या: मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तम्भन और मोहन बलपूर्वक साधना-श्रेणियों के नाम हैं; यहाँ उनके प्रयोग की विधि नहीं बताई गई है।
श्लोक 37 — गणेशपुराण २.८५.37
अर्थ: सात बार इक्कीस दिन तक पढ़ने से अलग-अलग मनोरथ पूरे होने की धार्मिक प्रतिज्ञा है। व्याख्या: सात और इक्कीस संख्याएँ मूल फल-वचन में आती हैं; यह वेबसाइट किसी फल की गारंटी वाला जप-अभियान निर्धारित नहीं करती।
श्लोक 38 — गणेशपुराण २.८५.38
अर्थ: नियत संख्या में पाठ करने पर कैद या राजदण्ड से मुक्ति मिलने का फल-वचन है। व्याख्या: कारावास या दण्ड से मुक्ति की बात धार्मिक फलश्रुति है; यह कानूनी सलाह या न्याय-प्रक्रिया के विकल्प का दावा नहीं।
श्लोक 39 — गणेशपुराण २.८५.39
अर्थ: राजसभा जाने से पहले तीन बार पाठ करने पर राजा और सभा को प्रभावित करने का दावा है। व्याख्या: राजा या सभा को वश करने की भाषा ऐतिहासिक सत्ता-परिस्थिति दिखाती है; वास्तविक लोगों को नियंत्रित करने की क्षमता का प्रमाण नहीं।
श्लोक 40 — गणेशपुराण २.८५.40
अर्थ: यह शिक्षा मुद्गल से कश्यप और फिर माण्डव्य ऋषि तक पहुँची—ऐसी परम्परा बताई गई है। व्याख्या: प्रचलित २७-श्लोक पाठ में कश्यप-मुद्गल क्रम उलटा बताया जाता है; इसी कारण मूल मुद्रित प्रति से विशेष मिलान चाहिए।
श्लोक 41 — गणेशपुराण २.८५.41
अर्थ: ऋषि कहते हैं कि उन्हें यह कवच कृपा से मिला और श्रद्धालु को देने योग्य ज्ञान है। व्याख्या: इस डिजिटल रूप में श्लोक ४१ तीन अर्धपंक्तियों का है, जबकि दूसरे डिजिटल रूप में ४०वीं पंक्ति दुहराई गई है; चुपचाप समानीकरण नहीं किया गया।
श्लोक 42 — गणेशपुराण २.८५.42
अर्थ: अन्त में राक्षस और दूसरी भयकारी शक्तियों से रक्षा का पारम्परिक दावा दिया गया है। व्याख्या: समापन का कथन पुराणिक दैत्यादि से रक्षा की आस्था व्यक्त करता है; इसे किसी वास्तविक संकट का तथ्यात्मक निदान न मानें।