अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र और जनक के संवाद का अध्ययन करें—मूल संस्कृत, अनुवाद और वैकल्पिक व्याख्या के साथ।

20 अध्याय · 298 श्लोक

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अध्याय

  1. अध्याय 1आत्मज्ञान का उपदेश (प्रथम प्रकरण)
  2. अध्याय 2आत्मबोध पर जनक का आश्चर्य (द्वितीय प्रकरण)
  3. अध्याय 3आत्मज्ञान की कसौटी — आक्षेपोपदेश (तीसरा प्रकरण)
  4. अध्याय 4आत्मज्ञानी की सहज स्वतंत्रता — चौथा प्रकरण
  5. अध्याय 5चार दृष्टियाँ, एक शांत आधार — पाँचवाँ प्रकरण
  6. अध्याय 6चार उपमाएँ और आत्मा की असीमता — छठा प्रकरण
  7. अध्याय 7असीम महासागर में आत्म-अनुभव — सातवाँ प्रकरण
  8. अध्याय 8बंधन और मुक्ति: चित्त की पकड़ से परे — आठवाँ प्रकरण
  9. अध्याय 9निर्वेद और सहज स्वतंत्रता — नवाँ प्रकरण
  10. अध्याय 10चाह से विराम तक — उपशमाष्टकम्
  11. अध्याय 11जानने से सहज शांति — ज्ञानाष्टकम्
  12. अध्याय 12सहज आत्मस्थिति — “मैं इसी प्रकार स्थित हूँ”
  13. अध्याय 13सहज सुख में स्थित — यथासुखसप्तकम्
  14. अध्याय 14स्वाभाविक शान्ति — शान्तिचतुष्टयम्
  15. अध्याय 15तत्त्व का बोध — तत्त्वोपदेशविंशतिका
  16. अध्याय 16विशेष उपदेश — अपने स्वरूप में स्थिरता
  17. अध्याय 17तत्त्वस्वरूप — ज्ञान और मुक्त जीवन के बीस श्लोक
  18. अध्याय 18शान्तिशतक — शांति के सौ श्लोक
  19. अध्याय 19कैवल्य-निर्वाण के आठ श्लोक
  20. अध्याय 20सभी धारणाओं से परे आत्मस्वरूप
इस संस्करण के बारे में · स्रोत और संदर्भ

Khemraj / Lakṣmīveṅkaṭeśvara (1911)

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