संस्करण सूचना: नीचे १९१२ के बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (क्रम ४२, मुद्रित पृ. १०७) का चयनित पाठ है। मङ्गलाचरण, पाँच अक्षर-श्लोक, छठी फलश्रुति और समापन-पंक्ति अलग रखी गई हैं। मुद्रित छवि का विशेषज्ञ पाठ-मिलान शेष है। 1 2 3
हर भाग का अर्थ और व्याख्या
आरम्भिक मङ्गलाचरण (अक्षर-श्लोक नहीं)
अर्थ: आरम्भ में श्रीगणेश को प्रणाम। व्याख्या: १९१२ के चयनित मुद्रित संस्करण में यह संक्षिप्त मङ्गलाचरण है। यह पाँच अक्षरों पर लिखे श्लोकों का भाग नहीं है और इसे स्तोत्र का अतिरिक्त अक्षर-श्लोक भी नहीं गिनना चाहिए। श्रृङ्गेरी पाठ में यह नहीं मिलता। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक १ — नकार
अर्थ: मैं ‘न’ अक्षर द्वारा स्तुत शिव को प्रणाम करता हूँ—वे सर्पराज को हार के रूप में धारण करते हैं, त्रिनेत्र महेश्वर हैं, अंगों पर भस्म लगाते हैं, नित्य, शुद्ध और दिगम्बर हैं। व्याख्या: सर्पराज का हार भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों पर शिव की निर्भय सत्ता का रूपक है। भस्म नश्वरता और अहंकार-त्याग की स्मृति कराती है; यह चित्रण अनुकरण का विधि-निर्देश नहीं है। दिगम्बर का आशय दिशाओं को वस्त्र मानने वाले विरक्त स्वरूप से है। यहाँ ‘न’ पूरे ‘नमः शिवाय’ मन्त्र का पहला अक्षर है। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक २ — मकार
अर्थ: मन्दाकिनी के जल तथा चन्दन से सुशोभित, नन्दी और प्रमथगणों के अधिपति महेश्वर को प्रणाम है। मन्दार और अनेक फूलों से पूजित उन शिव को ‘म’ अक्षर के रूप में नमन है। व्याख्या: मन्दाकिनी स्वर्गीय गङ्गा का स्मरण कराती है। नन्दी शिव से जुड़े गण और वृषभ-प्रतीक हैं; प्रमथ उनके गणों में गिने जाते हैं। पुष्प और चन्दन श्रद्धा के चिह्न हैं, किसी अनिवार्य कर्मकाण्ड की सूची नहीं। चयनित मुद्रण में ‘मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय’ है, जबकि श्रृङ्गेरी पाठ में ‘मन्दारमुख्यबहुपुष्पसुपूजिताय’ मिलता है। दोनों पाठ अलग दर्ज हैं। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक ३ — शिकार
अर्थ: गौरी के मुखरूपी कमल-समूह के लिए सूर्य के समान, दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले, नीलकण्ठ और वृषभ-ध्वजधारी शिव को ‘शि’ अक्षर के रूप में प्रणाम है। व्याख्या: कमल और सूर्य का उपमान शिव–गौरी की निकटता प्रकट करता है; इससे उनके सभी दार्शनिक स्वरूप समान हो जाते हैं, ऐसा दावा नहीं किया गया है। दक्ष-यज्ञ की कथा में अहंकार, विघटन और पुनर्स्थापना के प्रसंग आते हैं; यहाँ केवल उसका संकेत है। नीलकण्ठ समुद्रमन्थन की विष-धारण कथा का स्मरण है। मुद्रित ‘वदनाब्जवृन्द’ और श्रृङ्गेरी ‘वदनारविन्द’ अलग रूप हैं। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक ४ — वकार
अर्थ: जिनके मस्तक की वसिष्ठ, कुम्भोद्भव ऋषि, गौतम आदि श्रेष्ठ मुनि और देवता पूजा करते हैं तथा जिनके नेत्र चन्द्र, सूर्य और अग्नि हैं, उन शिव को ‘व’ अक्षर से प्रणाम है। व्याख्या: कुम्भोद्भव का सम्बन्ध सामान्यतः अगस्त्य से किया जाता है, पर श्लोक का प्रत्यक्ष शब्द ‘कुम्भ से जन्मे’ है—शब्दार्थ और परम्परागत पहचान का भेद सुरक्षित रखना चाहिए। चन्द्र, सूर्य और अग्नि शिव के तीन नेत्रों की पारम्परिक छवि है, कोई शारीरिक या खगोलीय वैज्ञानिक विवरण नहीं। यहाँ देवताओं के साथ ऋषियों की भी श्रद्धा व्यक्त होती है। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक ५ — यकार
अर्थ: यक्षस्वरूप, जटाधारी, हाथ में पिनाक धनुष रखने वाले, सनातन, दिव्य और दिगम्बर शिव को ‘य’ अक्षर के रूप में प्रणाम है। व्याख्या: चयनित मुद्रण में ‘यक्षस्वरूप’ है; कुछ पाठ ‘यज्ञस्वरूप’ कहते हैं। दोनों अर्थ अलग हैं, इसलिए इस व्याख्या में यक्ष-पाठ रखा गया है और कोई असमर्थित विशिष्ट यक्ष-कथा नहीं जोड़ी गई। पिनाक शिव का धनुष है। पाँचवाँ अक्षर ‘य’ आने पर न–म–शि–वा–य का क्रम पूरा होता है; श्लोक में ‘यकाराय’ उसी अक्षर का निर्देश है। सम्बन्धित पाठ · 1 2
समापन फलश्रुति — पाँच अक्षर-श्लोकों से अलग
अर्थ: फलश्रुति कहती है कि शिव के सान्निध्य में इस पवित्र पञ्चाक्षर स्तोत्र का पाठ करने वाला शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनन्दित होता है। व्याख्या: यह भक्तिपरक फल-वचन है, किसी निश्चित या परीक्षणयोग्य परिणाम की गारंटी नहीं। १९१२ के मुद्रित संस्करण में यह पाँच अक्षर-श्लोकों के बाद छठे क्रम पर है। श्रृङ्गेरी पाठ पाँचवें श्लोक पर समाप्त होता है; फलश्रुति का होना या न होना एक वास्तविक पाठ-सीमा का अन्तर है। सम्बन्धित पाठ · 1 2
समापन कोलोफ़न — मुद्रित पाठ में रचनाकार-सूचना
अर्थ: इस प्रकार शिवपञ्चाक्षरस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ; इस मुद्रित समापन-पंक्ति में रचना शङ्कराचार्य को समर्पित है। व्याख्या: समापन-पंक्ति बताती है कि मुद्रित संस्करण पाठ को कैसे श्रेय देता है; उससे ऐतिहासिक लेखक स्वतः सिद्ध नहीं होता। १९१२ के संस्करण में शङ्कराचार्य का नाम है, जिसकी पारम्परिक मान्यता बताई गई है, पर स्वतंत्र लेखकीय प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ। यह न कोई छठा मन्त्राक्षर है, न अलग स्तुति-श्लोक। सम्बन्धित पाठ · 1 2
यह स्तोत्र क्या है? शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् संस्कृत की एक संक्षिप्त शिव-स्तुति है। इसके पाँच मुख्य श्लोक ‘न–म–शि–वा–य’ के क्रम से शिव के स्वरूप का गुणगान करते हैं। हर श्लोक के अंत में उसी अक्षर का नाम आता है। यहाँ चयनित १९१२ के मुद्रित संस्करण में पहले गणेश-वन्दना, पाँच स्तुति-श्लोक, फिर अलग फलश्रुति और समापन-पंक्ति भी है। इन अतिरिक्त भागों को पाँच अक्षर-श्लोकों में नहीं मिलाया गया है। 1 2 3
‘पञ्चाक्षर’ का सामान्य अर्थ परम्परा में ‘नमः शिवाय’ के पाँच मन्त्राक्षरों से है। बहुत से भक्त ॐ नमः शिवाय कहते हैं; ॐ जोड़ने पर षडक्षर का प्रयोग भी मिलता है। किन्तु इससे इस विशिष्ट स्तोत्र में छठा अक्षर-श्लोक उत्पन्न नहीं हो जाता। यह पाठ-सम्बन्धी जानकारी है, दीक्षा या गुप्त अनुष्ठान का निर्देश नहीं।
पाँच अक्षर — पाँच दृष्टियाँ
| अक्षर | श्लोक | प्रमुख बिम्ब | सरल मनन |
|---|---|---|---|
| न | १ | सर्पमाला, भस्म, त्रिनेत्र, दिगम्बर | नश्वरता और निर्भयता |
| म | २ | मन्दाकिनी, चन्दन, नन्दी, पुष्प | श्रद्धा और कोमलता |
| शि | ३ | गौरी, दक्ष-यज्ञ, नीलकण्ठ, वृषध्वज | सम्बन्ध, जिम्मेदारी और संयम |
| वा | ४ | ऋषि, सूर्य, चन्द्र, अग्नि | अनेक रूपों का प्रकाश |
| य | ५ | यक्षस्वरूप, जटा, पिनाक | रहस्य और सनातनता |
यह तालिका शिवगोरक्ष की नई शिक्षात्मक व्याख्या है; अक्षरों को निश्चित चमत्कार, स्वास्थ्य-लाभ या अनिवार्य परिणाम देने वाला नहीं बताया गया है।
पाठ का स्वरूप और इतिहास
इस संस्करण का आधार बृहत्स्तोत्ररत्नाकर, निर्णयसागर प्रेस, १९१२, क्रमांक ४२, मुद्रित पृष्ठ १०७ है (डिजिटल स्कैन में पृष्ठ ११५)। पूरे पाठ में गणेश मङ्गलाचरण, पाँच क्रमांकित श्लोक, उनसे अलग छठा फलश्रुति-श्लोक और पारम्परिक रचनाकार बताने वाली समापन-पंक्ति है। संस्कृत विकिस्रोत का उसी पृष्ठ का OCR देखा गया है, किन्तु ऐतिहासिक छवि का स्वतंत्र पंक्ति-दर-पंक्ति विशेषज्ञ मिलान अभी नहीं हुआ। OCR में भी कुछ स्पष्ट त्रुटियाँ हैं। इसीलिए वर्तमान पाठ की सामान्य संस्कृत वर्तनी को अन्य साक्षियों से मिलाकर सम्पादकीय रूप से लिखा गया है। 1 2 6
श्रृङ्गेरी शारदा पीठ का प्रतिष्ठित पाठ पाँचवें श्लोक के बाद समाप्त होता है। दूसरे श्लोक में मन्दार-पुष्प का संयुक्त पद, तीसरे में गौरी के मुख-कमल का उपमान और पाँचवें में ‘यक्ष/यज्ञ’ जैसे पाठ-भेद मिलते हैं। हमने अलग-अलग स्रोतों को मिलाकर कृत्रिम मूल पाठ नहीं बनाया है। 3 5
१९१२ के मुद्रण की समापन-पंक्ति स्तोत्र को शङ्कराचार्य-विरचित बताती है। यह आदरणीय परम्परागत श्रेय है; केवल इतनी बात से किसी निश्चित ऐतिहासिक शङ्कराचार्य की लेखकीयता सिद्ध नहीं होती। मुद्रण-वर्ष से रचना-वर्ष भी तय नहीं होता। इस स्तोत्र से किसी सार्वभौम पाठ-संख्या, अनिवार्य दिन या सभी शैव सम्प्रदायों की समान साधना-पद्धति का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
शिव का रूप — प्रतीक और अर्थ
यहाँ शिव योगी भी हैं और करुणामय ईश्वर भी। उनकी भस्म और सर्पमाला मृत्यु-बोध तथा निर्भयता जगाती हैं; गङ्गाजल और चन्दन उसी रूप की सौम्यता दिखाते हैं। गौरी की उपस्थिति शिव–शक्ति के सम्बन्ध की झलक है। नीलकण्ठ का नाम विष-धारण की कथा का संकेत देता है। चन्द्र, सूर्य और अग्नि शिव के त्रिनेत्र का परिचित काव्यमय वर्णन हैं—इन्हें आधुनिक शरीर-विज्ञान या खगोल-गणना का दावा नहीं बनाना चाहिए।
‘दिगम्बर’ योगी के वैराग्य का शब्द है; इसे हर पाठक के लिए बाहरी आचरण की आज्ञा नहीं माना गया है। इसी प्रकार ‘प्रमथ’ शिव-गण का उल्लेख है, इससे किसी गोपनीय आह्वान-विधि की अनुमति नहीं निकलती। मूल पाठ और उसकी अर्थ-सीमाओं को अलग रखना ही श्रद्धापूर्ण और जिम्मेदार अध्ययन है।
पाठ, ध्यान और परम्परा
सार्वजनिक रूप में उपलब्ध संस्कृत स्तोत्र का अर्थ पढ़ना, स्मरण करना और उसके साहित्यिक सौन्दर्य को समझना सामान्य शिक्षात्मक कार्य है। जिन परम्पराओं में निजी मन्त्र-साधना के लिए गुरु-दीक्षा आवश्यक मानी जाती है, उनके नियम इस लेख से स्वतः प्राप्त नहीं हो जाते। फलश्रुति शिवलोक और शिव-सान्निध्य का भक्तिपरक आश्वासन देती है; इसे निश्चित या वैज्ञानिक रूप से परीक्षित परिणाम नहीं कहा गया है।
आवश्यक शब्द
सामान्य प्रश्न
१. स्तोत्र में पाँच श्लोक हैं या छह? पाँच मुख्य श्लोक पाँच अक्षरों के हैं। चयनित १९१२ के संस्करण में उनके बाद अलग फलश्रुति छठे क्रम पर है। अन्य पाठ पाँचवें श्लोक पर समाप्त होते हैं। २. ॐ छठा स्तोत्र-श्लोक क्यों नहीं है? यहाँ वर्णित पाँच अक्षर ‘नमः शिवाय’ हैं। इनके पहले ॐ लगाना प्रसिद्ध है, पर उसके लिए इस स्तोत्र में कोई नया श्लोक जोड़ना सही नहीं। ३. इसकी रचना किसने की? अनेक परम्पराएँ शङ्कराचार्य को रचनाकार कहती हैं और मुद्रित समापन-पंक्ति भी यही कहती है। ऐतिहासिक लेखकीयता का स्वतंत्र प्रमाण अभी स्थापित नहीं है। ४. क्या इसका अर्थ पढ़ने के लिए दीक्षा चाहिए? सार्वजनिक स्तोत्र का अध्ययन और किसी परम्परा की दीक्षा-सम्बद्ध विशिष्ट मन्त्र-साधना अलग विषय हैं। यहाँ साधना-अधिकार का दावा नहीं किया गया है। ५. यक्षस्वरूप और यज्ञस्वरूप में क्या अन्तर है? ‘यक्षस्वरूप’ यक्ष के रूप का संकेत है, जबकि ‘यज्ञस्वरूप’ यज्ञ के स्वरूप का। हमारे चयनित मुद्रण में पहला रूप है। ६. तीसरे नेत्र का अर्थ क्या है? शैव प्रतीकों में यह विशेष दृष्टि का चिह्न है; सूर्य, चन्द्र और अग्नि की त्रयी भी इससे जुड़ी है। यह शारीरिक संरचना का वैज्ञानिक विवरण नहीं है। ७. फलश्रुति क्या कहती है? वह शिव के निकट पाठ करने वाले के शिवलोक-प्राप्ति और शिव-सान्निध्य में आनन्द का वर्णन करती है। यह आस्था का वचन है, गारंटी नहीं। ८. क्या इसे ऐतिहासिक उद्धरण का अंतिम पाठ मान सकते हैं? यह स्रोत-संदर्भ सहित शैक्षिक संस्करण है। आलोचनात्मक उद्धरण के लिए मुद्रित स्कैन और भविष्य के विशेषज्ञ पाठ-मिलान को देखना चाहिए।




