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स्तोत्र

शिवमहिम्नःस्तोत्रम्

शिव-महिमा के सामने वाणी की सीमा स्वीकार करते हुए दर्शन, कथाओं और भक्ति से समृद्ध स्तोत्र।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

श्लोक 1

महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः । अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ 1 ॥

अर्थ

शिव की महिमा ब्रह्मा आदि की वाणी से भी परे है; भक्त अपनी सीमित समझ के अनुसार विनम्र स्तुति अर्पित करता है.

व्याख्या

आरम्भिक श्लोक बताता है कि कोई भी स्तोत्र परम सत्य का संपूर्ण वर्णन नहीं कर सकता।

श्लोक 2

अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो- रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि । स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ 2 ॥

अर्थ

शिव वाणी और मन से परे हैं, फिर भी मन और शब्द उनके सुलभ रूप का आश्रय लेते हैं।

व्याख्या

यह निर्गुण-अवर्णनीय और साकार उपासना को एक साथ समझता है।

श्लोक 3

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत- स्तव ब्रह्मन्किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् । मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ॥ 3 ॥

अर्थ

कवि शिव को कुछ नया बताने के लिए नहीं, अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए गुणगान करता है।

व्याख्या

स्तुति का लक्ष्य अहंकार घटाना है, न कि सर्वज्ञ देव को कोई सूचना देना।

श्लोक 4

तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृ- त्त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु । अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीं विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥ 4 ॥

अर्थ

सृष्टि, स्थिति और संहार एक ही दिव्य शक्ति की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं।

व्याख्या

यह त्रिदेव की शैव व्याख्या है; अन्य परंपराओं की समझ भिन्न हो सकती है।

श्लोक 5

किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च । अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥ 5 ॥

अर्थ

श्लोक जगत की रचना, साधन और आधार को लेकर उठने वाले प्रश्नों पर विचार करता है।

व्याख्या

उत्तर तार्किक जिज्ञासा की सीमा पर भक्तिपरक मत है, कोई वैज्ञानिक सृष्टिविज्ञान नहीं।

श्लोक 6

अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगता- मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति । अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो यतो मन्दाः स्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥ 6 ॥

अर्थ

कवि पूछता है कि आश्रित जगत बिना किसी अधिष्ठान के कैसे समझा जाए।

व्याख्या

यह स्तोत्र का दार्शनिक तर्क है, सभी दर्शन-परंपराओं की एकमत स्थिति नहीं।

श्लोक 7

त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च । रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ 7 ॥

अर्थ

वेद, सांख्य, योग, पाशुपत और वैष्णव मार्ग विविध होते हुए भी एक परम लक्ष्य की ओर बहती नदियों जैसे चित्रित हैं।

व्याख्या

यह समावेशी उपमा शैव दृष्टिकोण से कही गई है, सभी मतों का ऐतिहासिक विलय नहीं।

श्लोक 8

महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् । सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्रूप्रणिहितां न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ॥ 8 ॥

अर्थ

अन्य देवताओं के ऐश्वर्य के सामने शिव के भस्म, नाग, खट्वांग और चर्म साधारण दिखते हैं, पर वे पूर्ण हैं।

व्याख्या

आत्मतृप्ति के सामने बाहरी वैभव गौण हो जाता है।

श्लोक 9

ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये । समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैर्विस्मित इव स्तुवञ्जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ॥ 9 ॥

अर्थ

जगत के स्थायित्व पर मतभेद हैं; कवि इन विवादों के बीच अपनी भाषा की सीमा पहचानता है।

व्याख्या

इसे किसी एक व्यवस्थित मत की अंतिम घोषणा मानना उचित नहीं।

तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरि विरिञ्चो हरिरधः परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुषः । ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत् स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ 10 ॥

अर्थ

ब्रह्मा-विष्णु शिव के अग्निस्तंभ का आदि-अंत नहीं पा सके; भक्तिभाव से उनकी महिमा का अनुभव होता है।

व्याख्या

यह लिंगोद्भव की धार्मिक कथा है, भौतिक घटना का प्रमाणित विवरण नहीं।

श्लोक 11

अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् । शिरःपद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबलैः स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ॥ 11 ॥

अर्थ

रावण के पराक्रम का संबंध शिव के प्रति कठोर तप और भक्ति से जोड़ा गया है।

व्याख्या

अगला श्लोक दिखाता है कि तप से मिली शक्ति भी अहंकार में बिगड़ सकती है।

श्लोक 12

अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः । अलभ्या पातालेऽप्यलसचलिताङ्गुष्ठशिरसि प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः ॥ 12 ॥

अर्थ

कैलास उठाने के रावण के अभिमान को शिव सहज ही रोक देते हैं।

व्याख्या

विनय-विहीन सामर्थ्य अपना संतुलन खो देता है।

श्लोक 13

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती- मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः । न तच्चित्रं तस्मिन्वरिवसितरि त्वच्चरणयो- र्न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥ 13 ॥

अर्थ

बाणासुर की उन्नति को भी शिवचरणों में झुकने की भक्ति से जोड़ा गया है।

व्याख्या

सिर झुकाना यहाँ विनम्रता से आत्मिक उत्थान पाने की उपमा है।

श्लोक 14

अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा- विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः । स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभयभङ्गव्यसनिनः ॥ 14 ॥

अर्थ

शिव लोकों को संकट में डालने वाला विष धारण करते हैं; उनका नीलकंठ होना करुणा का प्रतीक बनता है।

व्याख्या

यह समुद्रमंथन की पौराणिक कथा है, विष या चिकित्सा का व्यवहारिक निर्देश नहीं।

श्लोक 15

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः । स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत् स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥ 15 ॥

अर्थ

सभी को वश करने वाला कामदेव भी आत्मसंयमी शिव के सामने ठहर नहीं पाता।

व्याख्या

भाव स्वसंयम है, मानव प्रेम का सर्वथा निषेध नहीं।

श्लोक 16

मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदं पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् । मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ 16 ॥

अर्थ

शिव का विराट नृत्य ब्रह्मांड को कम्पित करता है, फिर भी उसका लक्ष्य जगत की रक्षा है।

व्याख्या

भयानक विराटता और रक्षणकारी करुणा एक साथ उभरती हैं।

श्लोक 17

वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोपमरुचिः प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते । जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि- त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः ॥ 17 ॥

अर्थ

विस्तीर्ण गंगा भी शिव की जटाओं पर जलकण-सी लगती है।

व्याख्या

यह अलंकार है: मानव के लिए विराट वस्तु दिव्य परिप्रेक्ष्य में छोटी दिखाई देती है।

श्लोक 18

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति । दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधि- र्विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः ॥ 18 ॥

अर्थ

त्रिपुर-दहन में पृथ्वी रथ तथा सूर्य-चंद्र आदि दिव्य रथांग बनते हैं।

व्याख्या

असीम समर्थ के लिए यह विशाल आयोजन भी लीला-स्वरूप है।

श्लोक 19

हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयो- र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् । गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ 19 ॥

अर्थ

एक कमल कम पड़ने पर विष्णु अपना नेत्र अर्पित करने को तैयार होते हैं।

व्याख्या

यह अखंड समर्पण की कथा है, शरीर को चोट पहुँचाने की सीख नहीं।

क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते । अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ 20 ॥

अर्थ

यज्ञ का फल मात्र बाहरी कर्म से नहीं; ईश्वराराधना और श्रद्धा का भी महत्व बताया गया है।

व्याख्या

श्लोक यांत्रिक कर्मकांड को प्रश्नांकित करता है, हर पूजा का निषेध नहीं।

श्लोक 21

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता- मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः । क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ 21 ॥

अर्थ

दक्ष का भव्य यज्ञ श्रद्धाहीन होने पर निष्फल और विनाशकारी हो जाता है।

व्याख्या

यह विधिकुशलता के साथ विनम्र उद्देश्य की भी अपेक्षा रखता है।

श्लोक 22

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं गतां रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा । धनुःपाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥ 22 ॥

अर्थ

अपनी पुत्री का पीछा करते प्रजापति की कथा में शिव अनुचित इच्छा पर अंकुश लगाते हैं।

व्याख्या

यह प्राचीन पौराणिक आख्यान है; इसे ऐतिहासिक व्यक्ति का प्रमाणित वृत्तांत न समझें।

श्लोक 23

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणव- त्पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि । यदि स्त्रैणं देवी यमनिरतदेहार्धघटना- दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः ॥ 23 ॥

अर्थ

शिव कामदेव को भस्म करते हैं, पर देवी के साथ अर्धनारीश्वर रूप में भी विराजते हैं।

व्याख्या

यह वैराग्य और सहचर्य पर सतही निष्कर्षों से सावधान करता है।

श्लोक 24

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचरा- श्चिताभस्मालेपः स्रगपि नृकरोटीपरिकरः । अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि ॥ 24 ॥

अर्थ

श्मशान, भस्म और कपाल का भयंकर रूप भी भक्तों के लिए मंगल का प्रतीक बन जाता है।

व्याख्या

यह शुभ-अशुभ की सामान्य सामाजिक धारणा को उलट कर देखता है।

श्लोक 25

मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्साहितदृशः । यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥ 25 ॥

अर्थ

योगी मन को भीतर स्थिर कर जिस आनंदमय तत्व का अनुभव बताते हैं, उसे शिवस्वरूप कहते हैं।

व्याख्या

यह परंपरागत अनुभूति का वर्णन है, निश्चित प्रभाव या कठिन साधना-विधि नहीं।

श्लोक 26

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह- स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च । परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥ 26 ॥

अर्थ

सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और आत्मा—सभी को शिव का रूप कहा जाता है।

व्याख्या

यह सर्वव्यापकता का धार्मिक कथन है, शिव की सत्ता को आठ पदार्थों तक सीमित नहीं करता।

श्लोक 27

त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा- नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृति । तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः समस्तव्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ 27 ॥

अर्थ

ॐ तीन-तीन की रचनाओं को समेटते हुए तुरीय, अर्थात उनके पार के आयाम की ओर संकेत करता है।

व्याख्या

तुरीय की अवधारणा माण्डूक्य उपनिषद् में भी प्रमुख है; यहाँ उसका शैव अर्थ व्यक्त है।

श्लोक 28

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां- स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् । अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि प्रियायास्मै धात्रे प्रविहितनमस्योऽस्मि भवते ॥ 28 ॥

अर्थ

भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम और ईशान—ये आठ नाम शिव की अनेक विभूतियों का स्मरण हैं।

व्याख्या

ये एक ही शिव के नाम हैं; आठ स्वतंत्र देवों की गणना नहीं।

श्लोक 29

नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः । नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः ॥ 29 ॥

अर्थ

शिव अत्यंत समीप भी हैं और दूर भी, सूक्ष्म भी और महान भी, प्राचीन भी और नवीन भी।

व्याख्या

विरोधी विशेषण सामान्य मापदंडों से परे व्यापक सत्ता की ओर संकेत करते हैं।

बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः । जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥ 30 ॥

अर्थ

श्लोक शिव को सृष्टि के रजस, संहार के तमस, सुखदायक सत्त्व और त्रिगुणातीत पद—सबमें नमस्कार करता है।

व्याख्या

गुणों का प्रयोग यहाँ दार्शनिक-धार्मिक है, आधुनिक मनोवैज्ञानिक मापन नहीं।

श्लोक 31

कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः । इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधा- द्वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥ 31 ॥

अर्थ

कवि अपना चित्त छोटा और शिवगुण अनंत मानकर भी वाणी-पुष्प अर्पित करता है।

व्याख्या

यह आरम्भ की विनम्र स्तुति-वृत्ति को पुनः सामने लाता है।

श्लोक 32

असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी । लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥ 32 ॥

अर्थ

पर्वत काजल, समुद्र दवात, पृथ्वी कागज और सरस्वती अनवरत लेखिका हों, तब भी शिवगुण समाप्त न होंगे।

व्याख्या

विख्यात अतिशयोक्ति दिव्य महिमा की अगणनीयता का बोध कराती है।

श्लोक 33

असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले- र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य । सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो रुचिरमलघुवृत्तः स्तोत्रमेतच्चकार ॥ 33 ॥

अर्थ

समापन के एक श्लोक में चंद्रशेखर शिव के स्तोत्र के रचयिता के रूप में पुष्पदन्त का नाम आता है।

व्याख्या

आंतरिक नामोल्लेख परंपरागत रचनाकार-संबंध दिखाता है, निश्चित ऐतिहासिक हस्तलिखित प्रमाण नहीं।

श्लोक 34

अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत् पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः । स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथात्र प्रचुरतरधनायुःपुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥ 34 ॥

अर्थ

यह श्लोक श्रद्धा से पाठ करने वाले के लिए पुण्य, आयु और यश की कामना कहता है।

व्याख्या

फलश्रुति को धार्मिक आशीर्वचन समझें, सुनिश्चित भौतिक परिणाम नहीं।

श्लोक 35

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः । अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥ 35 ॥

अर्थ

स्तोत्र महेश, महिम्न-स्तुति, अघोर-मंत्र और गुरु-तत्त्व की सर्वोच्च महत्ता का गान करता है।

व्याख्या

यह शैव स्तुतिपरक भाषा है; अन्य साधना-पथों के प्रति तिरस्कार की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 36

दीक्षादानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः । महिम्नस्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ 36 ॥

अर्थ

महिम्नस्तोत्र-पाठ की महिमा को दान, तप, तीर्थ और अन्य कर्मों से भी बढ़कर कहा गया है।

व्याख्या

यह भक्तिकाव्य की महिमा-भाषा है, नैतिक कर्म छोड़ने का निर्देश नहीं।

श्लोक 37

कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः । स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात् स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥ 37 ॥

अर्थ

कुसुमदशन या पुष्पदन्त नामक गंधर्व द्वारा शिवकृपा पुनः पाने के लिए स्तोत्र रचने की कथा कही जाती है।

व्याख्या

इसे परंपरागत रचनाकथा मानें, प्रमाणित जीवन-वृत्त नहीं।

श्लोक 38

सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः । व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ 38 ॥

अर्थ

श्रद्धापूर्वक पाठ को शिव-सान्निध्य प्राप्ति से जोड़ा गया है।

व्याख्या

परलोक-संबंधी फल आस्था का विषय है।

श्लोक 39

श्रीपुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेण । कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥ 39 ॥

अर्थ

पुष्पदन्त से सम्बद्ध स्तोत्र को श्रद्धा से स्मरण करना महेश को प्रिय बताया गया है।

व्याख्या

यह चयनित चालीस-श्लोकी समापन का हिस्सा है; अन्य पाठों में परिशिष्ट-क्रम बदलता है।

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः । अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ 40 ॥

अर्थ

अंतिम श्लोक में स्वयं स्तोत्र को शंकरचरणों में वाङ्मयी पूजा के रूप में अर्पित किया गया है।

व्याख्या

निष्कर्ष यह कि श्रद्धायुक्त वाणी भी पूजा बन सकती है।

सन्दर्भ और उपयोग

शिवमहिम्नःस्तोत्रम् क्या है? शिवमहिम्नःस्तोत्रम् संस्कृत का प्रसिद्ध शैव स्तोत्र है। इसकी विशेषता यह है कि आरम्भ में ही कवि स्वीकार करता है—वाणी, बुद्धि और देवताओं की सामर्थ्य भी शिव-महिमा की पूरी सीमा नहीं जान सकती। इसलिए वह अपनी छोटी-सी स्तुति को अहंकार का प्रदर्शन नहीं, श्रद्धा का अर्पण मानता है। यह भाव स्तोत्र को केवल प्रशंसा नहीं रहने देता; वह नम्रता और आत्मचिंतन का पाठ बन जाता है। 1 3

रचना में निर्गुण, अवर्णनीय शिव की चर्चा के साथ ब्रह्मांडीय रूप, रुद्रस्वरूप और भक्त के लिए सुलभ देवता के अनेक रूप सामने आते हैं। सातवें श्लोक की नदियों-समुद्र वाली उपमा अनेक मार्गों की बात करती है, किंतु एक विशिष्ट शैव दृष्टिकोण से; यह सब दार्शनिक मतों के समान होने का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।

कौन-सा पाठ चुना गया और चालीस अथवा तैंतालीस क्यों? इस संस्करण का आधार बृहत्स्तोत्ररत्नाकर के 40 श्लोकों वाला मुद्रित पाठ-परिवार है। व्यावहारिक प्रतिलेख के लिए संस्कृत विकिस्रोत पर उपलब्ध 1953 संस्करण देखा गया और 1912 के स्कैन तथा अन्य संदर्भों से चुने हुए पाठांतर मिलाए गए। 1912 के सभी पृष्ठों का अक्षरशः मिलान अभी पूरा नहीं हुआ, इसलिए इसे प्रमाणित अंतिम आलोचनात्मक पाठ नहीं कहा जा रहा। 1 2

कुछ लोकप्रिय पाठों में 43 श्लोक हैं। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स में शिवरहस्य-संबंधी समानांतर पाठ और अतिरिक्त श्लोकों का भी उल्लेख है। यहाँ इन अतिरिक्त पद्यों को चालीस-श्लोकी पाठ में जोड़कर नया मिश्रित संस्करण नहीं बनाया गया। चयनित पाठ में 32वें श्लोक के बाद रचनाकार-परिचय तथा फलश्रुति आदि आते हैं। 3

रचना का क्रम और अर्थ-प्रवाह

श्लोक 1–3 — वाणी की सीमा। कवि मानता है कि शिव किसी वर्णन से समाप्त नहीं हो जाते। गुणगान करना अपनी वाणी और चित्त को विनम्र बनाना है। श्लोक 4–9 — दर्शन और विविध मार्ग। सृष्टि, गुण, दर्शन, पाशुपत तथा अन्य मार्ग और शिव के तपस्वी चिह्नों का वर्णन है। सातवें श्लोक का खुलापन महत्वपूर्ण है, लेकिन वास्तविक दार्शनिक मतभेद मिटाता नहीं। श्लोक 10–24 — पौराणिक प्रसंग। अग्निस्तंभ, रावण, बाणासुर, नीलकंठ, कामदहन, तांडव, गंगा, त्रिपुर, विष्णु का नेत्रार्पण और दक्षयज्ञ—ये प्रसंग शैव काव्य को जीवंत बनाते हैं। इन्हें श्रद्धापरक आख्यान के रूप में ही समझना चाहिए। श्लोक 25–32 — आंतरिक अनुभव और सर्वव्यापकता। योगियों की अनुभूति, प्रकृति के तत्वों में शिव, ॐ तथा तुरीय और सरस्वती द्वारा भी अनंत गुण न लिख सकने की प्रसिद्ध उपमा आती है। श्लोक 33–40 — रचना-परंपरा और फलश्रुति। पुष्पदन्त का उल्लेख, पाठ के फल की धार्मिक प्रशंसा और अंत में वाणी को पूजा मानकर समर्पण है। आयु, धन या मुक्ति संबंधी वचन धार्मिक आशीर्वाद हैं, वैज्ञानिक गारंटी नहीं।

प्रमुख शब्द और प्रतीक

महिमा — ऐसी महानता जिसका पूर्ण परिमाण नहीं हो सकता। हर — दुःख या बंधन हरने वाले शिव का नाम। पशुपति — प्राणियों के अधिपति; विशिष्ट शैव परंपराओं में भी महत्वपूर्ण नाम। त्रिपुर — तीन पुरियों से जुड़ी पौराणिक कथा। नीलकंठ — संसार-रक्षा के लिए विष धारण करने वाला रूप। तुरीय — सामान्य तीन अवस्थाओं से परे बताई जाने वाली चैतन्य-अवस्था। फलश्रुति — पाठ के धार्मिक फल बताने वाला भाग, भौतिक परिणामों का प्रमाण नहीं।

रचयिता, इतिहास और पाठांतर

समापन श्लोकों में पुष्पदन्त का नाम है। परंपरा उन्हें गंधर्व मानती है और स्तोत्र-रचना की कथा सुनाती है। यह परंपरागत रचनाकार-संबंध है, जन्म-वर्ष या हस्तलिखित मूल-पांडुलिपि का इतिहास-सिद्ध प्रमाण नहीं। 1 3 4

पाँचवें श्लोक में किमुपादान, चौदहवें में भुवनभयभङ्ग, सोलहवें में जगद्रक्षायै, सत्रहवें में जगद्द्वीपाकारं, छब्बीसवें में न विद्मस्तत्तत्त्वं और उनतीसवें में शर्वाय जैसे पाठांतर महत्वपूर्ण हैं। यहाँ अपनाए गए संपादकीय पाठ को स्रोत-सूची में स्पष्ट दर्ज किया गया है; विशेषज्ञ द्वारा मूल छपे पृष्ठों से अंतिम मिलान लंबित है। 2 3

पाठ, श्रद्धा और साधना की सीमा

यह सामान्य पाठकों के लिए संस्कृत स्तोत्र का शैक्षिक और भक्तिपरक पाठ है। पाठ और अर्थ समझने के लिए किसी विशेष गूढ़ अनुष्ठान का निर्देश आवश्यक नहीं। कोई सार्वभौमिक जप-संख्या, प्राणायाम-विधि, दीक्षा-नियम या निश्चित फल घोषित नहीं किया गया है। विशेष परंपरागत विधियों पर अलग से योग्य आचार्य और संपादकीय समीक्षा अपेक्षित है। पर्व अथवा मुहूर्त की जानकारी स्वतंत्र स्वीकृत पंचांग प्रणाली से ही आएगी।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

1. शिवमहिम्नःस्तोत्रम् किस भाषा में है? इसका मूल संस्कृत में है। हिन्दी लेख में मूल देवनागरी पाठ दिया गया है; अर्थ नीचे अलग हैं। 2. इसे किसने लिखा? इसे परंपरा में पुष्पदन्त की रचना माना जाता है। यह आधुनिक जीवनी-संबंधी प्रमाण से अलग बात है। 3. इसमें 40 या 43 श्लोक हैं? दोनों पाठ-परिवार मिलते हैं। यहाँ चालीस श्लोकों वाला एक पहचान योग्य मुद्रित पाठ चुना गया है। 4. अनेक साधना-मार्गों का उल्लेख क्यों है? सातवाँ श्लोक अलग-अलग रास्तों को समुद्र की ओर जाती नदियों जैसा कहता है। यह शैव काव्य-दृष्टि है। 5. अग्निस्तंभ का प्रसंग कहाँ आता है? दसवें श्लोक में ब्रह्मा और विष्णु द्वारा शिवरूप की सीमा खोजने की कथा आती है। 6. ॐ और तुरीय का संबंध क्या है? सत्ताईसवाँ श्लोक ॐ को त्रिकों और उनसे परे तुरीय से जोड़ता है; माण्डूक्य उपनिषद् में भी तुरीय की व्याख्या प्रसिद्ध है। 7. क्या पाठ से धन या रोग-मुक्ति की गारंटी है? नहीं। फलश्रुति में दिए आश्वासन श्रद्धा-परंपरा के कथन हैं, वैज्ञानिक रूप से निश्चित परिणाम नहीं। 8. क्या इसे बिना दीक्षा पढ़ सकते हैं? सामान्य साहित्यिक और भक्तिपरक पठन सार्वजनिक है; विशिष्ट दीक्षा-आधारित विधियाँ अलग समीक्षा का विषय हैं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on शिवमहिम्नःस्तोत्रम् — Sanskrit Wikisource typed 1953 Bṛhatstotraratnākara text. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Verse 1

    mahimnaḥ pāraṃ te paramaviduṣo yadyasadṛśī stutirbrahmādīnāmapi tadavasannāstvayi giraḥ . athāvācyaḥ sarvaḥ svamatipariṇāmāvadhi gṛṇan mamāpyeṣa stotre hara nirapavādaḥ parikaraḥ || 1 ||

  2. Verse 2

    atītaḥ panthānaṃ tava ca mahimā vāṅmanasayo- ratadvyāvṛttyā yaṃ cakitamabhidhatte śrutirapi . sa kasya stotavyaḥ katividhaguṇaḥ kasya viṣayaḥ pade tvarvācīne patati na manaḥ kasya na vacaḥ || 2 ||

  3. Verse 3

    madhusphītā vācaḥ paramamamṛtaṃ nirmitavata- stava brahmankiṃ vāgapi suragurorvismayapadam . mama tvetāṃ vāṇīṃ guṇakathanapuṇyena bhavataḥ punāmītyarthe’smin puramathana buddhirvyavasitā || 3 ||

  4. Verse 4

    tavaiśvaryaṃ yattajjagadudayarakṣāpralayakṛ- ttrayīvastu vyastaṃ tisṛṣu guṇabhinnāsu tanuṣu . abhavyānāmasminvarada ramaṇīyāmaramaṇīṃ vihantuṃ vyākrośīṃ vidadhata ihaike jaḍadhiyaḥ || 4 ||

  5. Verse 5

    kimīhaḥ kiṃkāyaḥ sa khalu kimupāyastribhuvanaṃ kimādhāro dhātā sṛjati kimupādāna iti ca . atarkyaiśvarye tvayyanavasaraduḥstho hatadhiyaḥ kutarko’yaṃ kāṃścinmukharayati mohāya jagataḥ || 5 ||

  6. Verse 6

    ajanmāno lokāḥ kimavayavavanto’pi jagatā- madhiṣṭhātāraṃ kiṃ bhavavidhiranādṛtya bhavati . anīśo vā kuryādbhuvanajanane kaḥ parikaro yato mandāḥ svāṃ pratyamaravara saṃśerata ime || 6 ||

  7. Verse 7

    trayī sāṃkhyaṃ yogaḥ paśupatimataṃ vaiṣṇavamiti prabhinne prasthāne paramidamadaḥ pathyamiti ca . rucīnāṃ vaicitryādṛjukuṭilanānāpathajuṣāṃ nṛṇāmeko gamyastvamasi payasāmarṇava iva || 7 ||

  8. Verse 8

    mahokṣaḥ khaṭvāṅgaṃ paraśurajinaṃ bhasma phaṇinaḥ kapālaṃ cetīyattava varada tantropakaraṇam . surāstāṃ tāmṛddhiṃ dadhati tu bhavadbhrūpraṇihitāṃ na hi svātmārāmaṃ viṣayamṛgatṛṣṇā bhramayati || 8 ||

  9. Verse 9

    dhruvaṃ kaścitsarvaṃ sakalamaparastvadhruvamidaṃ paro dhrauvyādhrauvye jagati gadati vyastaviṣaye . samaste’pyetasminpuramathana tairvismita iva stuvañjihremi tvāṃ na khalu nanu dhṛṣṭā mukharatā || 9 ||

  10. Verse 10

    tavaiśvaryaṃ yatnādyadupari viriñco hariradhaḥ paricchettuṃ yātāvanalamanalaskandhavapuṣaḥ . tato bhaktiśraddhābharagurugṛṇadbhyāṃ giriśa yat svayaṃ tasthe tābhyāṃ tava kimanuvṛttirna phalati || 10 ||

  11. Verse 11

    ayatnādāpādya tribhuvanamavairavyatikaraṃ daśāsyo yadbāhūnabhṛta raṇakaṇḍūparavaśān . śiraḥpadmaśreṇīracitacaraṇāmbhoruhabalaiḥ sthirāyāstvadbhaktestripurahara visphūrjitamidam || 11 ||

  12. Verse 12

    amuṣya tvatsevāsamadhigatasāraṃ bhujavanaṃ balātkailāse’pi tvadadhivasatau vikramayataḥ . alabhyā pātāle’pyalasacalitāṅguṣṭhaśirasi pratiṣṭhā tvayyāsīddhruvamupacito muhyati khalaḥ || 12 ||

  13. Verse 13

    yadṛddhiṃ sutrāmṇo varada paramoccairapi satī- madhaścakre bāṇaḥ parijanavidheyatribhuvanaḥ . na taccitraṃ tasminvarivasitari tvaccaraṇayo- rna kasyāpyunnatyai bhavati śirasastvayyavanatiḥ || 13 ||

  14. Verse 14

    akāṇḍabrahmāṇḍakṣayacakitadevāsurakṛpā- vidheyasyāsīdyastrinayana viṣaṃ saṃhṛtavataḥ . sa kalmāṣaḥ kaṇṭhe tava na kurute na śriyamaho vikāro’pi ślāghyo bhuvanabhayabhaṅgavyasaninaḥ || 14 ||

  15. Verse 15

    asiddhārthā naiva kvacidapi sadevāsuranare nivartante nityaṃ jagati jayino yasya viśikhāḥ . sa paśyannīśa tvāmitarasurasādhāraṇamabhūt smaraḥ smartavyātmā na hi vaśiṣu pathyaḥ paribhavaḥ || 15 ||

  16. Verse 16

    mahī pādāghātādvrajati sahasā saṃśayapadaṃ padaṃ viṣṇorbhrāmyadbhujaparigharugṇagrahagaṇam . muhurdyaurdausthyaṃ yātyanibhṛtajaṭātāḍitataṭā jagadrakṣāyai tvaṃ naṭasi nanu vāmaiva vibhutā || 16 ||

  17. Verse 17

    viyadvyāpī tārāgaṇaguṇitaphenopamaruciḥ pravāho vārāṃ yaḥ pṛṣatalaghudṛṣṭaḥ śirasi te . jagaddvīpākāraṃ jaladhivalayaṃ tena kṛtami- tyanenaivonneyaṃ dhṛtamahima divyaṃ tava vapuḥ || 17 ||

  18. Verse 18

    rathaḥ kṣoṇī yantā śatadhṛtiragendro dhanuratho rathāṅge candrārkau rathacaraṇapāṇiḥ śara iti . didhakṣoste ko’yaṃ tripuratṛṇamāḍambaravidhi- rvidheyaiḥ krīḍantyo na khalu paratantrāḥ prabhudhiyaḥ || 18 ||

  19. Verse 19

    hariste sāhasraṃ kamalabalimādhāya padayo- ryadekone tasminnijamudaharannetrakamalam . gato bhaktyudrekaḥ pariṇatimasau cakravapuṣā trayāṇāṃ rakṣāyai tripurahara jāgarti jagatām || 19 ||

  20. Verse 20

    kratau supte jāgrattvamasi phalayoge kratumatāṃ kva karma pradhvastaṃ phalati puruṣārādhanamṛte . atastvāṃ samprekṣya kratuṣu phaladānapratibhuvaṃ śrutau śraddhāṃ baddhvā dṛḍhaparikaraḥ karmasu janaḥ || 20 ||

  21. Verse 21

    kriyādakṣo dakṣaḥ kratupatiradhīśastanubhṛtā- mṛṣīṇāmārtvijyaṃ śaraṇada sadasyāḥ suragaṇāḥ . kratubhraṃśastvattaḥ kratuphalavidhānavyasanino dhruvaṃ kartuḥ śraddhāvidhuramabhicārāya hi makhāḥ || 21 ||

  22. Verse 22

    prajānāthaṃ nātha prasabhamabhikaṃ svāṃ duhitaraṃ gatāṃ rohidbhūtāṃ riramayiṣumṛṣyasya vapuṣā . dhanuḥpāṇeryātaṃ divamapi sapatrākṛtamamuṃ trasantaṃ te’dyāpi tyajati na mṛgavyādharabhasaḥ || 22 ||

  23. Verse 23

    svalāvaṇyāśaṃsā dhṛtadhanuṣamahnāya tṛṇava- tpuraḥ pluṣṭaṃ dṛṣṭvā puramathana puṣpāyudhamapi . yadi straiṇaṃ devī yamaniratadehārdhaghaṭanā- davaiti tvāmaddhā bata varada mugdhā yuvatayaḥ || 23 ||

  24. Verse 24

    śmaśāneṣvākrīḍā smarahara piśācāḥ sahacarā- ścitābhasmālepaḥ sragapi nṛkaroṭīparikaraḥ . amaṅgalyaṃ śīlaṃ tava bhavatu nāmaivamakhilaṃ tathāpi smartṝṇāṃ varada paramaṃ maṅgalamasi || 24 ||

  25. Verse 25

    manaḥ pratyakcitte savidhamavadhāyāttamarutaḥ prahṛṣyadromāṇaḥ pramadasalilotsāhitadṛśaḥ . yadālokyāhlādaṃ hrada iva nimajjyāmṛtamaye dadhatyantastattvaṃ kimapi yaminastatkila bhavān || 25 ||

  26. Verse 26

    tvamarkastvaṃ somastvamasi pavanastvaṃ hutavaha- stvamāpastvaṃ vyoma tvamu dharaṇirātmā tvamiti ca . paricchinnāmevaṃ tvayi pariṇatā bibhrati giraṃ na vidmastattattvaṃ vayamiha tu yattvaṃ na bhavasi || 26 ||

  27. Verse 27

    trayīṃ tisro vṛttīstribhuvanamatho trīnapi surā- nakārādyairvarṇaistribhirabhidadhattīrṇavikṛti . turīyaṃ te dhāma dhvanibhiravarundhānamaṇubhiḥ samastavyastaṃ tvāṃ śaraṇada gṛṇātyomiti padam || 27 ||

  28. Verse 28

    bhavaḥ śarvo rudraḥ paśupatirathograḥ saha mahāṃ- stathā bhīmeśānāviti yadabhidhānāṣṭakamidam . amuṣminpratyekaṃ pravicarati deva śrutirapi priyāyāsmai dhātre pravihitanamasyo’smi bhavate || 28 ||

  29. Verse 29

    namo nediṣṭhāya priyadava daviṣṭhāya ca namo namaḥ kṣodiṣṭhāya smarahara mahiṣṭhāya ca namaḥ . namo varṣiṣṭhāya trinayana yaviṣṭhāya ca namo namaḥ sarvasmai te tadidamiti śarvāya ca namaḥ || 29 ||

  30. Verse 30

    bahularajase viśvotpattau bhavāya namo namaḥ prabalatamase tatsaṃhāre harāya namo namaḥ . janasukhakṛte sattvodriktau mṛḍāya namo namaḥ pramahasi pade nistraiguṇye śivāya namo namaḥ || 30 ||

  31. Verse 31

    kṛśapariṇati cetaḥ kleśavaśyaṃ kva cedaṃ kva ca tava guṇasīmollaṅghinī śaśvadṛddhiḥ . iti cakitamamandīkṛtya māṃ bhaktirādhā- dvarada caraṇayoste vākyapuṣpopahāram || 31 ||

  32. Verse 32

    asitagirisamaṃ syātkajjalaṃ sindhupātre surataruvaraśākhā lekhanī patramurvī . likhati yadi gṛhītvā śāradā sarvakālaṃ tadapi tava guṇānāmīśa pāraṃ na yāti || 32 ||

  33. Verse 33

    asurasuramunīndrairarcitasyendumaule- rgrathitaguṇamahimno nirguṇasyeśvarasya . sakalaguṇavariṣṭhaḥ puṣpadantābhidhāno ruciramalaghuvṛttaḥ stotrametaccakāra || 33 ||

  34. Verse 34

    aharaharanavadyaṃ dhūrjaṭeḥ stotrametat paṭhati paramabhaktyā śuddhacittaḥ pumānyaḥ . sa bhavati śivaloke rudratulyastathātra pracurataradhanāyuḥputravānkīrtimāṃśca || 34 ||

  35. Verse 35

    maheśānnāparo devo mahimno nāparā stutiḥ . aghorānnāparo mantro nāsti tattvaṃ guroḥ param || 35 ||

  36. Verse 36

    dīkṣādānaṃ tapastīrthaṃ jñānaṃ yāgādikāḥ kriyāḥ . mahimnastavapāṭhasya kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm || 36 ||

  37. Verse 37

    kusumadaśananāmā sarvagandharvarājaḥ śaśidharavaramaulerdevadevasya dāsaḥ . sa khalu nijamahimno bhraṣṭa evāsya roṣāt stavanamidamakārṣīddivyadivyaṃ mahimnaḥ || 37 ||

  38. Verse 38

    suravaramunipūjyaṃ svargamokṣaikahetuṃ paṭhati yadi manuṣyaḥ prāñjalirnānyacetāḥ . vrajati śivasamīpaṃ kinnaraiḥ stūyamānaḥ stavanamidamamoghaṃ puṣpadantapraṇītam || 38 ||

  39. Verse 39

    śrīpuṣpadantamukhapaṅkajanirgatena stotreṇa kilbiṣahareṇa harapriyeṇa . kaṇṭhasthitena paṭhitena samāhitena suprīṇito bhavati bhūtapatirmaheśaḥ || 39 ||

  40. Verse 40

    ityeṣā vāṅmayī pūjā śrīmacchaṅkarapādayoḥ . arpitā tena deveśaḥ prīyatāṃ me sadāśivaḥ || 40 ||

स्रोत एवं संपादकीय टिप्पणी

मुख्य और तुलनात्मक पाठ: 1, 2, 3; ऐतिहासिक संदर्भ: 4, 5। मूल संस्कृत, आधुनिक प्रतिलेख, लिप्यंतरण तथा शिवगोरक्ष के स्वतंत्र अर्थों के अधिकार अलग-अलग दर्ज हैं। कोई सार्वजनिक वेबसाइट मार्ग या आदेश-संग्रह सक्रिय नहीं किया गया है।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1 — अर्थ

शिव की महिमा ब्रह्मा आदि की वाणी से भी परे है; भक्त अपनी सीमित समझ के अनुसार विनम्र स्तुति अर्पित करता है. व्याख्या: आरम्भिक श्लोक बताता है कि कोई भी स्तोत्र परम सत्य का संपूर्ण वर्णन नहीं कर सकता।

श्लोक 2 — अर्थ

शिव वाणी और मन से परे हैं, फिर भी मन और शब्द उनके सुलभ रूप का आश्रय लेते हैं। व्याख्या: यह निर्गुण-अवर्णनीय और साकार उपासना को एक साथ समझता है।

श्लोक 3 — अर्थ

कवि शिव को कुछ नया बताने के लिए नहीं, अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए गुणगान करता है। व्याख्या: स्तुति का लक्ष्य अहंकार घटाना है, न कि सर्वज्ञ देव को कोई सूचना देना।

श्लोक 4 — अर्थ

सृष्टि, स्थिति और संहार एक ही दिव्य शक्ति की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। व्याख्या: यह त्रिदेव की शैव व्याख्या है; अन्य परंपराओं की समझ भिन्न हो सकती है।

श्लोक 5 — अर्थ

श्लोक जगत की रचना, साधन और आधार को लेकर उठने वाले प्रश्नों पर विचार करता है। व्याख्या: उत्तर तार्किक जिज्ञासा की सीमा पर भक्तिपरक मत है, कोई वैज्ञानिक सृष्टिविज्ञान नहीं।

श्लोक 6 — अर्थ

कवि पूछता है कि आश्रित जगत बिना किसी अधिष्ठान के कैसे समझा जाए। व्याख्या: यह स्तोत्र का दार्शनिक तर्क है, सभी दर्शन-परंपराओं की एकमत स्थिति नहीं।

श्लोक 7 — अर्थ

वेद, सांख्य, योग, पाशुपत और वैष्णव मार्ग विविध होते हुए भी एक परम लक्ष्य की ओर बहती नदियों जैसे चित्रित हैं। व्याख्या: यह समावेशी उपमा शैव दृष्टिकोण से कही गई है, सभी मतों का ऐतिहासिक विलय नहीं।

श्लोक 8 — अर्थ

अन्य देवताओं के ऐश्वर्य के सामने शिव के भस्म, नाग, खट्वांग और चर्म साधारण दिखते हैं, पर वे पूर्ण हैं। व्याख्या: आत्मतृप्ति के सामने बाहरी वैभव गौण हो जाता है।

श्लोक 9 — अर्थ

जगत के स्थायित्व पर मतभेद हैं; कवि इन विवादों के बीच अपनी भाषा की सीमा पहचानता है। व्याख्या: इसे किसी एक व्यवस्थित मत की अंतिम घोषणा मानना उचित नहीं।

श्लोक 10 — अर्थ

ब्रह्मा-विष्णु शिव के अग्निस्तंभ का आदि-अंत नहीं पा सके; भक्तिभाव से उनकी महिमा का अनुभव होता है। व्याख्या: यह लिंगोद्भव की धार्मिक कथा है, भौतिक घटना का प्रमाणित विवरण नहीं।

श्लोक 11 — अर्थ

रावण के पराक्रम का संबंध शिव के प्रति कठोर तप और भक्ति से जोड़ा गया है। व्याख्या: अगला श्लोक दिखाता है कि तप से मिली शक्ति भी अहंकार में बिगड़ सकती है।

श्लोक 12 — अर्थ

कैलास उठाने के रावण के अभिमान को शिव सहज ही रोक देते हैं। व्याख्या: विनय-विहीन सामर्थ्य अपना संतुलन खो देता है।

श्लोक 13 — अर्थ

बाणासुर की उन्नति को भी शिवचरणों में झुकने की भक्ति से जोड़ा गया है। व्याख्या: सिर झुकाना यहाँ विनम्रता से आत्मिक उत्थान पाने की उपमा है।

श्लोक 14 — अर्थ

शिव लोकों को संकट में डालने वाला विष धारण करते हैं; उनका नीलकंठ होना करुणा का प्रतीक बनता है। व्याख्या: यह समुद्रमंथन की पौराणिक कथा है, विष या चिकित्सा का व्यवहारिक निर्देश नहीं।

श्लोक 15 — अर्थ

सभी को वश करने वाला कामदेव भी आत्मसंयमी शिव के सामने ठहर नहीं पाता। व्याख्या: भाव स्वसंयम है, मानव प्रेम का सर्वथा निषेध नहीं।

श्लोक 16 — अर्थ

शिव का विराट नृत्य ब्रह्मांड को कम्पित करता है, फिर भी उसका लक्ष्य जगत की रक्षा है। व्याख्या: भयानक विराटता और रक्षणकारी करुणा एक साथ उभरती हैं।

श्लोक 17 — अर्थ

विस्तीर्ण गंगा भी शिव की जटाओं पर जलकण-सी लगती है। व्याख्या: यह अलंकार है: मानव के लिए विराट वस्तु दिव्य परिप्रेक्ष्य में छोटी दिखाई देती है।

श्लोक 18 — अर्थ

त्रिपुर-दहन में पृथ्वी रथ तथा सूर्य-चंद्र आदि दिव्य रथांग बनते हैं। व्याख्या: असीम समर्थ के लिए यह विशाल आयोजन भी लीला-स्वरूप है।

श्लोक 19 — अर्थ

एक कमल कम पड़ने पर विष्णु अपना नेत्र अर्पित करने को तैयार होते हैं। व्याख्या: यह अखंड समर्पण की कथा है, शरीर को चोट पहुँचाने की सीख नहीं।

श्लोक 20 — अर्थ

यज्ञ का फल मात्र बाहरी कर्म से नहीं; ईश्वराराधना और श्रद्धा का भी महत्व बताया गया है। व्याख्या: श्लोक यांत्रिक कर्मकांड को प्रश्नांकित करता है, हर पूजा का निषेध नहीं।

श्लोक 21 — अर्थ

दक्ष का भव्य यज्ञ श्रद्धाहीन होने पर निष्फल और विनाशकारी हो जाता है। व्याख्या: यह विधिकुशलता के साथ विनम्र उद्देश्य की भी अपेक्षा रखता है।

श्लोक 22 — अर्थ

अपनी पुत्री का पीछा करते प्रजापति की कथा में शिव अनुचित इच्छा पर अंकुश लगाते हैं। व्याख्या: यह प्राचीन पौराणिक आख्यान है; इसे ऐतिहासिक व्यक्ति का प्रमाणित वृत्तांत न समझें।

श्लोक 23 — अर्थ

शिव कामदेव को भस्म करते हैं, पर देवी के साथ अर्धनारीश्वर रूप में भी विराजते हैं। व्याख्या: यह वैराग्य और सहचर्य पर सतही निष्कर्षों से सावधान करता है।

श्लोक 24 — अर्थ

श्मशान, भस्म और कपाल का भयंकर रूप भी भक्तों के लिए मंगल का प्रतीक बन जाता है। व्याख्या: यह शुभ-अशुभ की सामान्य सामाजिक धारणा को उलट कर देखता है।

श्लोक 25 — अर्थ

योगी मन को भीतर स्थिर कर जिस आनंदमय तत्व का अनुभव बताते हैं, उसे शिवस्वरूप कहते हैं। व्याख्या: यह परंपरागत अनुभूति का वर्णन है, निश्चित प्रभाव या कठिन साधना-विधि नहीं।

श्लोक 26 — अर्थ

सूर्य, चंद्र, वायु, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और आत्मा—सभी को शिव का रूप कहा जाता है। व्याख्या: यह सर्वव्यापकता का धार्मिक कथन है, शिव की सत्ता को आठ पदार्थों तक सीमित नहीं करता।

श्लोक 27 — अर्थ

ॐ तीन-तीन की रचनाओं को समेटते हुए तुरीय, अर्थात उनके पार के आयाम की ओर संकेत करता है। व्याख्या: तुरीय की अवधारणा माण्डूक्य उपनिषद् में भी प्रमुख है; यहाँ उसका शैव अर्थ व्यक्त है।

श्लोक 28 — अर्थ

भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम और ईशान—ये आठ नाम शिव की अनेक विभूतियों का स्मरण हैं। व्याख्या: ये एक ही शिव के नाम हैं; आठ स्वतंत्र देवों की गणना नहीं।

श्लोक 29 — अर्थ

शिव अत्यंत समीप भी हैं और दूर भी, सूक्ष्म भी और महान भी, प्राचीन भी और नवीन भी। व्याख्या: विरोधी विशेषण सामान्य मापदंडों से परे व्यापक सत्ता की ओर संकेत करते हैं।

श्लोक 30 — अर्थ

श्लोक शिव को सृष्टि के रजस, संहार के तमस, सुखदायक सत्त्व और त्रिगुणातीत पद—सबमें नमस्कार करता है। व्याख्या: गुणों का प्रयोग यहाँ दार्शनिक-धार्मिक है, आधुनिक मनोवैज्ञानिक मापन नहीं।

श्लोक 31 — अर्थ

कवि अपना चित्त छोटा और शिवगुण अनंत मानकर भी वाणी-पुष्प अर्पित करता है। व्याख्या: यह आरम्भ की विनम्र स्तुति-वृत्ति को पुनः सामने लाता है।

श्लोक 32 — अर्थ

पर्वत काजल, समुद्र दवात, पृथ्वी कागज और सरस्वती अनवरत लेखिका हों, तब भी शिवगुण समाप्त न होंगे। व्याख्या: विख्यात अतिशयोक्ति दिव्य महिमा की अगणनीयता का बोध कराती है।

श्लोक 33 — अर्थ

समापन के एक श्लोक में चंद्रशेखर शिव के स्तोत्र के रचयिता के रूप में पुष्पदन्त का नाम आता है। व्याख्या: आंतरिक नामोल्लेख परंपरागत रचनाकार-संबंध दिखाता है, निश्चित ऐतिहासिक हस्तलिखित प्रमाण नहीं।

श्लोक 34 — अर्थ

यह श्लोक श्रद्धा से पाठ करने वाले के लिए पुण्य, आयु और यश की कामना कहता है। व्याख्या: फलश्रुति को धार्मिक आशीर्वचन समझें, सुनिश्चित भौतिक परिणाम नहीं।

श्लोक 35 — अर्थ

स्तोत्र महेश, महिम्न-स्तुति, अघोर-मंत्र और गुरु-तत्त्व की सर्वोच्च महत्ता का गान करता है। व्याख्या: यह शैव स्तुतिपरक भाषा है; अन्य साधना-पथों के प्रति तिरस्कार की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 36 — अर्थ

महिम्नस्तोत्र-पाठ की महिमा को दान, तप, तीर्थ और अन्य कर्मों से भी बढ़कर कहा गया है। व्याख्या: यह भक्तिकाव्य की महिमा-भाषा है, नैतिक कर्म छोड़ने का निर्देश नहीं।

श्लोक 37 — अर्थ

कुसुमदशन या पुष्पदन्त नामक गंधर्व द्वारा शिवकृपा पुनः पाने के लिए स्तोत्र रचने की कथा कही जाती है। व्याख्या: इसे परंपरागत रचनाकथा मानें, प्रमाणित जीवन-वृत्त नहीं।

श्लोक 38 — अर्थ

श्रद्धापूर्वक पाठ को शिव-सान्निध्य प्राप्ति से जोड़ा गया है। व्याख्या: परलोक-संबंधी फल आस्था का विषय है।

श्लोक 39 — अर्थ

पुष्पदन्त से सम्बद्ध स्तोत्र को श्रद्धा से स्मरण करना महेश को प्रिय बताया गया है। व्याख्या: यह चयनित चालीस-श्लोकी समापन का हिस्सा है; अन्य पाठों में परिशिष्ट-क्रम बदलता है।

श्लोक 40 — अर्थ

अंतिम श्लोक में स्वयं स्तोत्र को शंकरचरणों में वाङ्मयी पूजा के रूप में अर्पित किया गया है। व्याख्या: निष्कर्ष यह कि श्रद्धायुक्त वाणी भी पूजा बन सकती है।

  1. शिवमहिम्नःस्तोत्रम् — Sanskrit Wikisource typed 1953 Bṛhatstotraratnākara text · स्रोत खोलें
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  4. Shiva Mahimna Stotra — hymn tradition and authorship overview · स्रोत खोलें
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