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स्तोत्र

श्रीरुद्राष्टकम् — सम्पूर्ण पाठ और अर्थ

शिव के निराकार चैतन्य से नीलकण्ठ स्वरूप तक की आठ संस्कृत स्तुतियाँ, जिनका समापन विनम्र शरणागति में होता है।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥

अर्थ

मैं ईशानों के ईश शिव को प्रणाम करता हूँ। वे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक और ब्रह्म तथा वेदस्वरूप हैं। वे अपने स्वरूप में स्थित, गुणों और विकल्पों से परे, इच्छा से रहित तथा चेतना के आकाश के समान अनन्त हैं।

व्याख्या

पहले श्लोक में जटा, गंगा या त्रिशूल नहीं, बल्कि शिव का व्यापक चैतन्य-स्वरूप सामने आता है। ‘निर्गुण’ का अर्थ यह नहीं कि आगे वर्णित करुणामय शिव से विरोध है; स्तोत्र दोनों दृष्टियों को स्थान देता है। ‘चिदाकाश’ चेतना की असीमता का रूपक है और ‘आकाशवास’ निर्लिप्त योगी की छवि भी जगाता है।

2

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥

अर्थ

मैं उस निराकार शिव को नमस्कार करता हूँ जो ओंकार के मूल और तुरीय कहे गए हैं। वे वाणी, सामान्य ज्ञान और इन्द्रियों की पहुँच से परे, गिरीश, महाकाल के भी काल, विकराल होते हुए भी कृपालु, गुणों के आगार तथा संसार से परे हैं।

व्याख्या

‘तुरीय’ शब्द उपनिषदों की उस चेतना-अवस्था की याद दिलाता है जिसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे बताया जाता है; यह उपनिषद का सीधा उद्धरण नहीं है। ‘कराल’ और ‘कृपाल’ का साथ रहना महत्त्वपूर्ण है—शिव की शक्ति भयावह लग सकती है, पर स्तुति का सम्बोधन करुणा की ओर जाता है। पदच्छेद के पाठान्तर स्रोतों में सुरक्षित हैं।

3

तुषाराद्रिसङ्काशगौरं गभीरं मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् । स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥

अर्थ

शिव हिमाच्छादित पर्वत के समान गौर, अत्यन्त गम्भीर और असंख्य कामदेवों से भी अधिक शोभायमान हैं। उनके जटाजूट में सुन्दर गंगा लहराती हैं, ललाट पर बालचन्द्र चमकता है और कण्ठ में सर्प शोभित हैं।

व्याख्या

निर्गुण स्वरूप के बाद अब मूर्तिमान शिव की झाँकी है। हिमालय की शान्ति, गंगा का प्रवाह, चन्द्रमा की कालगत लय और कण्ठ के सर्प एक ही रूप में मिलते हैं। ‘करोड़ों कामदेवों की कान्ति’ काव्यात्मक अतिशयोक्ति है; इसका उद्देश्य शिव की अनुपम शोभा व्यक्त करना है, कोई गणना करना नहीं।

4

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् । मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥

अर्थ

मैं सबके स्वामी प्रिय शंकर को भजता हूँ। उनके कुण्डल हिलते हैं, भौंहें और विशाल नेत्र मनोहर हैं, मुख प्रसन्न है, कण्ठ नीला है और वे दयालु हैं। वे पशुराज के चर्म का वस्त्र और मुण्डमाला धारण करते हैं।

व्याख्या

नीलकण्ठ का नाम समुद्रमन्थन में विष को धारण करने की कथा से जुड़ता है। पशुचर्म और मुण्डमाला वैराग्य, अनित्यता तथा सांसारिक आडम्बर से दूरी की प्रतीकात्मक छवियाँ हैं, अनुकरण के लिए अनुष्ठानिक निर्देश नहीं। ‘मृगाधीश’ को सामान्यतः पशुराज से जोड़ा जाता है; इसे हर पाठ में अनिवार्यतः ‘बाघ’ कहना उचित नहीं। ‘भ्रूसुनेत्र’ पद का पाठालोचन अभी अपेक्षित है।

5

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशमखण्डमजं भानुकोटिप्रकाशम् । त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥

अर्थ

मैं भवानीपति शिव को भजता हूँ, जो प्रचण्ड, श्रेष्ठ, निर्भीक, परमेश्वर, अखण्ड तथा अजन्मा हैं और करोड़ों सूर्यों जैसी प्रभा से युक्त कहे गए हैं। त्रिशूलधारी शिव तीन प्रकार के दुःखों का मूल नाश करते हैं और सच्चे भाव से पाए जाते हैं।

व्याख्या

‘त्रयःशूल’ को परम्परा में आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—तीन तापों—से जोड़ा जाता है, पर समास का शास्त्रीय परीक्षण अलग से शेष है। ‘भावगम्य’ बताता है कि यहाँ शुष्क प्रदर्शन से अधिक श्रद्धा और अन्तःकरण का भाव महत्त्वपूर्ण है। ‘भवानीपति’ नाम शिव-शक्ति सम्बन्ध को सीधे स्तुति के केन्द्र में लाता है।

6

कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी । चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥

अर्थ

हे काल की सीमाओं से परे कल्याणमय प्रभु, कल्पान्त करने वाले, सज्जनों को आनन्द देने वाले, त्रिपुरासुर के विजेता, चिदानन्दस्वरूप और मोह को हटाने वाले कामारि! कृपा कीजिए, कृपा कीजिए।

व्याख्या

‘पुरारी’ त्रिपुर-विजय की कथा तथा ‘मन्मथारी’ कामदेव के दहन की कथा को याद दिलाते हैं। दोनों प्रसंग अलग हैं, किन्तु मोह और आसक्ति पर विजय के सूत्र से जुड़े हैं। ‘प्रसीद, प्रसीद’ की पुनरावृत्ति पाठक को दिखाती है कि वैभव-वर्णन अब विनम्र कृपा-याचना बन चुका है।

7

न यावदुमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावत्सुखं शान्तिसन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥७॥

अर्थ

कवि कहता है कि जब तक मनुष्य उमानाथ के चरणकमलों की भक्ति नहीं करता, तब तक इस लोक और परलोक में स्थायी सुख, शान्ति तथा सन्ताप से मुक्ति दुर्लभ रहती है। सभी प्राणियों में वास करने वाले प्रभु, कृपा कीजिए।

व्याख्या

यह स्तोत्र के वक्ता का भक्ति-सिद्धान्त है, सभी मनुष्यों के मानसिक स्वास्थ्य अथवा दूसरे मार्गों का सार्वभौम परीक्षण नहीं। ‘चरणकमल’ शरण, विनय और निरन्तर स्मरण का रूपक है। अन्त में ‘सर्वभूताधिवास’ कहकर ईश्वर को सभी प्राणियों के भीतर देखने की भावना उभरती है।

8

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् । जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥८॥

अर्थ

हे शम्भु! मैं योग, जप या विधिपूर्वक पूजा करना नहीं जानता, पर सदा आपको प्रणाम करता हूँ। जरा, जन्म और दुःखों की बाढ़ से पीड़ित, शरणागत मुझे बचाइए, हे ईश, हे शम्भो।

व्याख्या

अन्तिम श्लोक में बड़ी दार्शनिक भाषा पीछे रह जाती है। भक्त स्वीकार करता है कि उसे विधियों पर गर्व करने का आधार नहीं, फिर भी वह शरण ले सकता है। इसका अर्थ योग, जप या पूजा का निषेध नहीं; यह आध्यात्मिक अहंकार के स्थान पर विनय को प्रतिष्ठित करता है। रक्षा की याचना धार्मिक प्रार्थना है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं।

9
विषय-सूची पर लौटें

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥

अर्थ

हर अर्थात् शिव को प्रसन्न करने के लिए एक ब्राह्मण ने यह रुद्राष्टक कहा। समापन फलश्रुति के अनुसार जो लोग इसे भक्तिभाव से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं।

व्याख्या

यह फलश्रुति आठ मुख्य स्तुति-छन्दों से अलग है और कथाकार की दृष्टि से बोलती है। उत्तरकाण्ड के प्रसंग में शापित शिष्य के लिए उसका ब्राह्मण गुरु शिव की कृपा चाहता है। ‘शम्भु प्रसन्न होते हैं’ को परम्परा की भक्ति-प्रतिज्ञा समझना चाहिए, किसी रोग के उपचार या निश्चित फल की वैज्ञानिक गारंटी नहीं।

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित पाठ: रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड में स्थित आठ स्तुति-छन्द तथा उनसे पृथक फलश्रुति। विकिस्रोत के सोलह अर्धश्लोकों को आठ श्लोकों में जोड़ा गया है। कुछ सन्धि/वर्तनी का सम्पादकीय मानकीकरण हुआ है; ऐतिहासिक मुद्रित संस्करण से अंतिम पाठ-मिलान शेष है। 1 2 3

फलश्रुति

अर्थ: हर अर्थात् शिव को प्रसन्न करने के लिए एक ब्राह्मण ने यह रुद्राष्टक कहा। समापन फलश्रुति के अनुसार जो लोग इसे भक्तिभाव से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं। व्याख्या: यह फलश्रुति आठ मुख्य स्तुति-छन्दों से अलग है और कथाकार की दृष्टि से बोलती है। उत्तरकाण्ड के प्रसंग में शापित शिष्य के लिए उसका ब्राह्मण गुरु शिव की कृपा चाहता है। ‘शम्भु प्रसन्न होते हैं’ को परम्परा की भक्ति-प्रतिज्ञा समझना चाहिए, किसी रोग के उपचार या निश्चित फल की वैज्ञानिक गारंटी नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 3

रुद्राष्टकम् क्या है? रुद्राष्टकम् गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आया संस्कृत का आठ-श्लोकी स्तोत्र है। इसकी कथा काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म के प्रसंग से जुड़ती है: शिवमन्दिर में शिष्य द्वारा गुरु का अनादर होने पर शिव का कोप प्रकट होता है; गुरु शिष्य के कल्याण के लिए स्तुति करता है। इस प्रकार स्तोत्र केवल शिव-रूप का वर्णन नहीं, गुरु-भक्ति और क्षमा की कथा का भी हिस्सा है। 2 3 5

आठ मूल छन्द भुजङ्गप्रयात में हैं। अन्त में ‘रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तम्’ से शुरू होने वाला अलग अनुष्टुप् छन्द है, जिसे हमने फलश्रुति के रूप में नौवाँ पठन-इकाई बनाया है; उसे ‘आठवें के बाद एक और अष्टकम्-श्लोक’ नहीं माना गया। 1 3 4

स्तोत्र का भाव-प्रवाह: निर्गुण से करुणा तक

प्रथम दो श्लोक शिव को निर्गुण, निराकार, चिदाकाश, तुरीय और ओंकारमूल कहते हैं। अगले दो श्लोक हिमगौर शरीर, गंगा, चन्द्र, नाग, नीलकण्ठ और मुण्डमाला का दर्शन कराते हैं। पाँचवें और छठे श्लोक में परमशक्ति तथा करुणा का संगम है। सातवाँ भक्ति और शान्ति का सम्बन्ध स्थापित करता है। आठवाँ श्लोक किसी उपलब्धि की घोषणा नहीं, ‘मैं योग-जप-पूजा नहीं जानता’ कहकर शरण लेने की मार्मिक प्रार्थना है। यही स्तोत्र की आन्तरिक यात्रा है।

रामभक्ति और शिवभक्ति का सम्बन्ध

यह स्तुति शिव के लिए है, लेकिन रामकथा के भीतर स्थित है। इससे तुलसीदास के मानस की व्यापक धार्मिक दृष्टि उजागर होती है: राम के प्रति भक्ति और शिव के प्रति सम्मान को अनिवार्य प्रतिद्वन्द्वी नहीं माना गया। फिर भी किसी एक काव्य के आधार पर सभी वैष्णव, शैव, नाथ या शाक्त सम्प्रदायों के मत को एक जैसा कहना गलत होगा।

कठिन शब्द और उनके अर्थ

पदसरल अर्थ
निर्वाणरूपबन्धन-मुक्ति का स्वरूप
चिदाकाशचेतना की असीमता का रूपक
तुरीयसाधारण तीन अवस्थाओं से परे चौथी चेतन-अवस्था का दार्शनिक संकेत
नीलकण्ठविषधारण से जुड़ा शिव का नाम
भवानीपतिभवानी/पार्वती के सहचर शिव
त्रयःशूलपरम्परागत व्याख्या में तीन प्रकार के ताप
मन्मथारीकामदेव से जुड़ी शिव-कथा का नाम
फलश्रुतिरचना के अंत में बताया गया पाठ का पारम्परिक फल

पाठ और पाठान्तर: क्या निश्चित है, क्या शेष है? मुख्य स्तोत्र के आठ श्लोक तथा पृथक फलश्रुति कई उपलब्ध स्रोतों में मिलते हैं। पर एक विकिस्रोत पृष्ठ इन्हें सोलह अर्ध-छन्दों में गिनता है, जबकि अन्य आठ पूर्ण श्लोक छापते हैं। कुछ पाठों में ‘गिरा ज्ञान गोतीत’, ‘भ्रू सुनेत्र’, ‘कल्पान्तकारी’, ‘दुःखौघ’ और सन्धि-विच्छेद में फर्क है। पुराने मुद्रित पाठ के ऑनलाइन पृष्ठ में स्पष्ट प्रतिलिपि-त्रुटियाँ भी दिखती हैं; इसलिए इस प्रस्तुति का प्रत्येक अक्षर किसी एक पुरानी प्रति से यथावत प्रमाणित कह देना ठीक नहीं। 1 2 3 4

मूल रचना तुलसीदास की मानस-परम्परा का हिस्सा है। इस संस्करण में संस्कृत का चुना हुआ मानकीकृत पाठ, नया रोमन लिप्यंतरण और ShivGoraksh द्वारा रचित हिन्दी/अंग्रेज़ी अर्थ हैं। मुद्रित प्रतियों के चित्रों से पंक्तिवार मिलान, अधिकार-समीक्षा और विद्वत्परीक्षण के बाद ही प्रकाशन पर विचार होगा।

परम्परा और अभ्यास की सीमा

यह सार्वजनिक पाठ के लिए एक शिक्षात्मक स्तोत्र है। भक्ति से शम्भु के प्रसन्न होने का वाक्य फलश्रुति का धार्मिक कथन है; इससे रोग-मुक्ति, नौकरी, धन या किसी निश्चित समय में परिणाम का वादा नहीं बनता। इसमें दीक्षा-निर्देश, न्यास, जटिल मन्त्र-विधि या निश्चित संख्या में जप करने का आदेश नहीं दिया जा रहा। विशेष परम्पराओं की विधियों की अलग समीक्षा आवश्यक है।

अन्य सामग्री से सम्बन्ध

सम्बन्धित पाठ (शिव), सम्बन्धित पाठ (शंकर), सम्बन्धित पाठ (पार्वती), सम्बन्धित पाठ (शिवलिंग का प्रतीकार्थ), सम्बन्धित पाठ (शिवमहिम्नःस्तोत्रम्) और सम्बन्धित पाठ (शिवताण्डवस्तोत्रम्) उपयुक्त सम्बन्धित विषय हैं। इनकी वेबसाइट कड़ियाँ अभी सत्यापित/सक्रिय नहीं मानी गई हैं।

सामान्य प्रश्न

रुद्राष्टकम् किसने रचा? यह गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस-परम्परा में स्थित संस्कृत रचना है। कथा के भीतर इसे ब्राह्मण गुरु शिव के सामने गाते हैं—कथानक का वक्ता और ग्रन्थ का रचनाकार अलग स्तर हैं।

रुद्राष्टकम् में कितने श्लोक हैं? आठ मुख्य स्तुति-श्लोक हैं और उनसे अलग एक फलश्रुति है। कुछ डिजिटल स्रोत आठ श्लोकों को सोलह अर्ध-इकाइयों में छापते हैं।

क्या रुद्राष्टकम् वैदिक ऋचा है? नहीं। यह रामचरितमानस में निबद्ध संस्कृत स्तोत्र है, वैदिक संहिता की स्वरांकित ऋचा नहीं।

क्या आठवाँ श्लोक योग या पूजा को गलत कहता है? नहीं। वह भक्त की विनम्रता और शरणागति पर बल देता है, साधना-पद्धतियों का निषेध नहीं करता।

क्या इसे पढ़ने से निश्चित फल मिलता है? फलश्रुति श्रद्धापूर्वक पाठ पर शम्भु की प्रसन्नता व्यक्त करती है। इसे किसी सांसारिक या चिकित्सकीय फल की निश्चित गारंटी नहीं माना जाता।

क्या यह केवल शैवों के लिए है? यह शिव-स्तुति है, लेकिन रामकथा के भीतर आती है। इसका अध्ययन अनेक धार्मिक पृष्ठभूमियों के पाठक कर सकते हैं; परम्परागत व्यवहार भिन्न हो सकता है।

‘तुरीय’ और ‘चिदाकाश’ का क्या मतलब है? ये चेतना की सामान्य अनुभूति से परे व्यापक स्वरूप को दिखाने वाले दार्शनिक शब्द हैं, न कि भौतिक आकाश का शाब्दिक वैज्ञानिक सिद्धान्त।

क्या फलश्रुति को मूल आठ छन्दों में गिनना चाहिए? नहीं। अर्थ और छन्द दोनों दृष्टियों से उसे अलग रखना अधिक स्पष्ट है। इस संस्करण का कुल पठन-क्रम नौ इकाइयों का है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Traditional Sanskrit text within Tulsidas’s Rāmacaritamānasa. Based on रुद्राष्टकम् — Sanskrit Wikisource, fixed oldid 334499. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    namāmīśamīśānanirvāṇarūpaṃ vibhuṃ vyāpakaṃ brahmavedasvarūpam | nijaṃ nirguṇaṃ nirvikalpaṃ nirīhaṃ cidākāśamākāśavāsaṃ bhaje'ham ||1||

  2. 2

    nirākāramoṃkāramūlaṃ turīyaṃ girājñānagotītamīśaṃ girīśam | karālaṃ mahākālakālaṃ kṛpālaṃ guṇāgārasaṃsārapāraṃ nato'ham ||2||

  3. 3

    tuṣārādrisaṅkāśagauraṃ gabhīraṃ manobhūtakoṭiprabhāśrīśarīram | sphuranmaulikallolinī cārugaṅgā lasadbhālabālendu kaṇṭhe bhujaṅgā ||3||

  4. 4

    calatkuṇḍalaṃ bhrūsunetraṃ viśālaṃ prasannānanaṃ nīlakaṇṭhaṃ dayālam | mṛgādhīśacarmāmbaraṃ muṇḍamālaṃ priyaṃ śaṅkaraṃ sarvanāthaṃ bhajāmi ||4||

  5. 5

    pracaṇḍaṃ prakṛṣṭaṃ pragalbhaṃ pareśamakhaṇḍamajaṃ bhānukoṭiprakāśam | trayaḥśūlanirmūlanaṃ śūlapāṇiṃ bhaje'haṃ bhavānīpatiṃ bhāvagamyam ||5||

  6. 6

    kalātītakalyāṇakalpāntakārī sadā sajjanānandadātā purārī | cidānandasandohamohāpahārī prasīda prasīda prabho manmathārī ||6||

  7. 7

    na yāvadumānāthapādāravindaṃ bhajantīha loke pare vā narāṇām | na tāvatsukhaṃ śāntisantāpanāśaṃ prasīda prabho sarvabhūtādhivāsam ||7||

  8. 8

    na jānāmi yogaṃ japaṃ naiva pūjāṃ nato'haṃ sadā sarvadā śambhu tubhyam | jarājanmaduḥkhaughatātapyamānaṃ prabho pāhi āpannamāmīśa śambho ||8||

  9. 9

    rudrāṣṭakamidaṃ proktaṃ vipreṇa haratoṣaye | ye paṭhanti narā bhaktyā teṣāṃ śambhuḥ prasīdati ||

स्रोत और सम्पादकीय स्थिति

मुख्य चुना हुआ पाठ: 1; मानस का मुद्रित-साक्ष्य-स्थल: 2, 3; स्वतंत्र पाठ-समीक्षा: 4, 5। 6 का कॉपीराइट-प्रतिबन्ध ध्यान में रखकर उससे पाठ नहीं उठाया गया है। प्रकाशन-अवस्था:

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1

अर्थ: मैं ईशानों के ईश शिव को प्रणाम करता हूँ। वे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक और ब्रह्म तथा वेदस्वरूप हैं। वे अपने स्वरूप में स्थित, गुणों और विकल्पों से परे, इच्छा से रहित तथा चेतना के आकाश के समान अनन्त हैं। व्याख्या: पहले श्लोक में जटा, गंगा या त्रिशूल नहीं, बल्कि शिव का व्यापक चैतन्य-स्वरूप सामने आता है। ‘निर्गुण’ का अर्थ यह नहीं कि आगे वर्णित करुणामय शिव से विरोध है; स्तोत्र दोनों दृष्टियों को स्थान देता है। ‘चिदाकाश’ चेतना की असीमता का रूपक है और ‘आकाशवास’ निर्लिप्त योगी की छवि भी जगाता है। सम्बन्धित पाठ · 1 2

श्लोक 2

अर्थ: मैं उस निराकार शिव को नमस्कार करता हूँ जो ओंकार के मूल और तुरीय कहे गए हैं। वे वाणी, सामान्य ज्ञान और इन्द्रियों की पहुँच से परे, गिरीश, महाकाल के भी काल, विकराल होते हुए भी कृपालु, गुणों के आगार तथा संसार से परे हैं। व्याख्या: ‘तुरीय’ शब्द उपनिषदों की उस चेतना-अवस्था की याद दिलाता है जिसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे बताया जाता है; यह उपनिषद का सीधा उद्धरण नहीं है। ‘कराल’ और ‘कृपाल’ का साथ रहना महत्त्वपूर्ण है—शिव की शक्ति भयावह लग सकती है, पर स्तुति का सम्बोधन करुणा की ओर जाता है। पदच्छेद के पाठान्तर स्रोतों में सुरक्षित हैं। सम्बन्धित पाठ · 1 2

श्लोक 3

अर्थ: शिव हिमाच्छादित पर्वत के समान गौर, अत्यन्त गम्भीर और असंख्य कामदेवों से भी अधिक शोभायमान हैं। उनके जटाजूट में सुन्दर गंगा लहराती हैं, ललाट पर बालचन्द्र चमकता है और कण्ठ में सर्प शोभित हैं। व्याख्या: निर्गुण स्वरूप के बाद अब मूर्तिमान शिव की झाँकी है। हिमालय की शान्ति, गंगा का प्रवाह, चन्द्रमा की कालगत लय और कण्ठ के सर्प एक ही रूप में मिलते हैं। ‘करोड़ों कामदेवों की कान्ति’ काव्यात्मक अतिशयोक्ति है; इसका उद्देश्य शिव की अनुपम शोभा व्यक्त करना है, कोई गणना करना नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 2

श्लोक 4

अर्थ: मैं सबके स्वामी प्रिय शंकर को भजता हूँ। उनके कुण्डल हिलते हैं, भौंहें और विशाल नेत्र मनोहर हैं, मुख प्रसन्न है, कण्ठ नीला है और वे दयालु हैं। वे पशुराज के चर्म का वस्त्र और मुण्डमाला धारण करते हैं। व्याख्या: नीलकण्ठ का नाम समुद्रमन्थन में विष को धारण करने की कथा से जुड़ता है। पशुचर्म और मुण्डमाला वैराग्य, अनित्यता तथा सांसारिक आडम्बर से दूरी की प्रतीकात्मक छवियाँ हैं, अनुकरण के लिए अनुष्ठानिक निर्देश नहीं। ‘मृगाधीश’ को सामान्यतः पशुराज से जोड़ा जाता है; इसे हर पाठ में अनिवार्यतः ‘बाघ’ कहना उचित नहीं। ‘भ्रूसुनेत्र’ पद का पाठालोचन अभी अपेक्षित है। सम्बन्धित पाठ · 1 2

श्लोक 5

अर्थ: मैं भवानीपति शिव को भजता हूँ, जो प्रचण्ड, श्रेष्ठ, निर्भीक, परमेश्वर, अखण्ड तथा अजन्मा हैं और करोड़ों सूर्यों जैसी प्रभा से युक्त कहे गए हैं। त्रिशूलधारी शिव तीन प्रकार के दुःखों का मूल नाश करते हैं और सच्चे भाव से पाए जाते हैं। व्याख्या: ‘त्रयःशूल’ को परम्परा में आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—तीन तापों—से जोड़ा जाता है, पर समास का शास्त्रीय परीक्षण अलग से शेष है। ‘भावगम्य’ बताता है कि यहाँ शुष्क प्रदर्शन से अधिक श्रद्धा और अन्तःकरण का भाव महत्त्वपूर्ण है। ‘भवानीपति’ नाम शिव-शक्ति सम्बन्ध को सीधे स्तुति के केन्द्र में लाता है। सम्बन्धित पाठ · 1 2

श्लोक 6

अर्थ: हे काल की सीमाओं से परे कल्याणमय प्रभु, कल्पान्त करने वाले, सज्जनों को आनन्द देने वाले, त्रिपुरासुर के विजेता, चिदानन्दस्वरूप और मोह को हटाने वाले कामारि! कृपा कीजिए, कृपा कीजिए। व्याख्या: ‘पुरारी’ त्रिपुर-विजय की कथा तथा ‘मन्मथारी’ कामदेव के दहन की कथा को याद दिलाते हैं। दोनों प्रसंग अलग हैं, किन्तु मोह और आसक्ति पर विजय के सूत्र से जुड़े हैं। ‘प्रसीद, प्रसीद’ की पुनरावृत्ति पाठक को दिखाती है कि वैभव-वर्णन अब विनम्र कृपा-याचना बन चुका है। सम्बन्धित पाठ · 1 3

श्लोक 7

अर्थ: कवि कहता है कि जब तक मनुष्य उमानाथ के चरणकमलों की भक्ति नहीं करता, तब तक इस लोक और परलोक में स्थायी सुख, शान्ति तथा सन्ताप से मुक्ति दुर्लभ रहती है। सभी प्राणियों में वास करने वाले प्रभु, कृपा कीजिए। व्याख्या: यह स्तोत्र के वक्ता का भक्ति-सिद्धान्त है, सभी मनुष्यों के मानसिक स्वास्थ्य अथवा दूसरे मार्गों का सार्वभौम परीक्षण नहीं। ‘चरणकमल’ शरण, विनय और निरन्तर स्मरण का रूपक है। अन्त में ‘सर्वभूताधिवास’ कहकर ईश्वर को सभी प्राणियों के भीतर देखने की भावना उभरती है। सम्बन्धित पाठ · 1 3

श्लोक 8

अर्थ: हे शम्भु! मैं योग, जप या विधिपूर्वक पूजा करना नहीं जानता, पर सदा आपको प्रणाम करता हूँ। जरा, जन्म और दुःखों की बाढ़ से पीड़ित, शरणागत मुझे बचाइए, हे ईश, हे शम्भो। व्याख्या: अन्तिम श्लोक में बड़ी दार्शनिक भाषा पीछे रह जाती है। भक्त स्वीकार करता है कि उसे विधियों पर गर्व करने का आधार नहीं, फिर भी वह शरण ले सकता है। इसका अर्थ योग, जप या पूजा का निषेध नहीं; यह आध्यात्मिक अहंकार के स्थान पर विनय को प्रतिष्ठित करता है। रक्षा की याचना धार्मिक प्रार्थना है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 3

  1. रुद्राष्टकम् — Sanskrit Wikisource, fixed oldid 334499 · स्रोत खोलें
  2. रामचरितमानस scanned edition — proofread page 1185 (printed p. 1016) · स्रोत खोलें
  3. रामचरितमानस scanned edition — proofread page 1186 (printed pagination ambiguous in HTML transcription) · स्रोत खोलें
  4. Rudrashtakam — Arunachala Ashrama archival devotional page · स्रोत खोलें
  5. Shri Rudrashtakam and editorial comparison · स्रोत खोलें
  6. श्रीरुद्राष्टकं तुलसीदासकृतम् — Sanskrit Documents transliteration dossier · स्रोत खोलें