चयनित पाठ: रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड में स्थित आठ स्तुति-छन्द तथा उनसे पृथक फलश्रुति। विकिस्रोत के सोलह अर्धश्लोकों को आठ श्लोकों में जोड़ा गया है। कुछ सन्धि/वर्तनी का सम्पादकीय मानकीकरण हुआ है; ऐतिहासिक मुद्रित संस्करण से अंतिम पाठ-मिलान शेष है। 1 2 3
फलश्रुति
अर्थ: हर अर्थात् शिव को प्रसन्न करने के लिए एक ब्राह्मण ने यह रुद्राष्टक कहा। समापन फलश्रुति के अनुसार जो लोग इसे भक्तिभाव से पढ़ते हैं, उन पर शम्भु प्रसन्न होते हैं। व्याख्या: यह फलश्रुति आठ मुख्य स्तुति-छन्दों से अलग है और कथाकार की दृष्टि से बोलती है। उत्तरकाण्ड के प्रसंग में शापित शिष्य के लिए उसका ब्राह्मण गुरु शिव की कृपा चाहता है। ‘शम्भु प्रसन्न होते हैं’ को परम्परा की भक्ति-प्रतिज्ञा समझना चाहिए, किसी रोग के उपचार या निश्चित फल की वैज्ञानिक गारंटी नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 3
रुद्राष्टकम् क्या है? रुद्राष्टकम् गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आया संस्कृत का आठ-श्लोकी स्तोत्र है। इसकी कथा काकभुशुण्डि के पूर्वजन्म के प्रसंग से जुड़ती है: शिवमन्दिर में शिष्य द्वारा गुरु का अनादर होने पर शिव का कोप प्रकट होता है; गुरु शिष्य के कल्याण के लिए स्तुति करता है। इस प्रकार स्तोत्र केवल शिव-रूप का वर्णन नहीं, गुरु-भक्ति और क्षमा की कथा का भी हिस्सा है। 2 3 5
आठ मूल छन्द भुजङ्गप्रयात में हैं। अन्त में ‘रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तम्’ से शुरू होने वाला अलग अनुष्टुप् छन्द है, जिसे हमने फलश्रुति के रूप में नौवाँ पठन-इकाई बनाया है; उसे ‘आठवें के बाद एक और अष्टकम्-श्लोक’ नहीं माना गया। 1 3 4
स्तोत्र का भाव-प्रवाह: निर्गुण से करुणा तक
प्रथम दो श्लोक शिव को निर्गुण, निराकार, चिदाकाश, तुरीय और ओंकारमूल कहते हैं। अगले दो श्लोक हिमगौर शरीर, गंगा, चन्द्र, नाग, नीलकण्ठ और मुण्डमाला का दर्शन कराते हैं। पाँचवें और छठे श्लोक में परमशक्ति तथा करुणा का संगम है। सातवाँ भक्ति और शान्ति का सम्बन्ध स्थापित करता है। आठवाँ श्लोक किसी उपलब्धि की घोषणा नहीं, ‘मैं योग-जप-पूजा नहीं जानता’ कहकर शरण लेने की मार्मिक प्रार्थना है। यही स्तोत्र की आन्तरिक यात्रा है।
रामभक्ति और शिवभक्ति का सम्बन्ध
यह स्तुति शिव के लिए है, लेकिन रामकथा के भीतर स्थित है। इससे तुलसीदास के मानस की व्यापक धार्मिक दृष्टि उजागर होती है: राम के प्रति भक्ति और शिव के प्रति सम्मान को अनिवार्य प्रतिद्वन्द्वी नहीं माना गया। फिर भी किसी एक काव्य के आधार पर सभी वैष्णव, शैव, नाथ या शाक्त सम्प्रदायों के मत को एक जैसा कहना गलत होगा।
कठिन शब्द और उनके अर्थ
| पद | सरल अर्थ |
|---|---|
| निर्वाणरूप | बन्धन-मुक्ति का स्वरूप |
| चिदाकाश | चेतना की असीमता का रूपक |
| तुरीय | साधारण तीन अवस्थाओं से परे चौथी चेतन-अवस्था का दार्शनिक संकेत |
| नीलकण्ठ | विषधारण से जुड़ा शिव का नाम |
| भवानीपति | भवानी/पार्वती के सहचर शिव |
| त्रयःशूल | परम्परागत व्याख्या में तीन प्रकार के ताप |
| मन्मथारी | कामदेव से जुड़ी शिव-कथा का नाम |
| फलश्रुति | रचना के अंत में बताया गया पाठ का पारम्परिक फल |
पाठ और पाठान्तर: क्या निश्चित है, क्या शेष है? मुख्य स्तोत्र के आठ श्लोक तथा पृथक फलश्रुति कई उपलब्ध स्रोतों में मिलते हैं। पर एक विकिस्रोत पृष्ठ इन्हें सोलह अर्ध-छन्दों में गिनता है, जबकि अन्य आठ पूर्ण श्लोक छापते हैं। कुछ पाठों में ‘गिरा ज्ञान गोतीत’, ‘भ्रू सुनेत्र’, ‘कल्पान्तकारी’, ‘दुःखौघ’ और सन्धि-विच्छेद में फर्क है। पुराने मुद्रित पाठ के ऑनलाइन पृष्ठ में स्पष्ट प्रतिलिपि-त्रुटियाँ भी दिखती हैं; इसलिए इस प्रस्तुति का प्रत्येक अक्षर किसी एक पुरानी प्रति से यथावत प्रमाणित कह देना ठीक नहीं। 1 2 3 4
मूल रचना तुलसीदास की मानस-परम्परा का हिस्सा है। इस संस्करण में संस्कृत का चुना हुआ मानकीकृत पाठ, नया रोमन लिप्यंतरण और ShivGoraksh द्वारा रचित हिन्दी/अंग्रेज़ी अर्थ हैं। मुद्रित प्रतियों के चित्रों से पंक्तिवार मिलान, अधिकार-समीक्षा और विद्वत्परीक्षण के बाद ही प्रकाशन पर विचार होगा।
परम्परा और अभ्यास की सीमा
यह सार्वजनिक पाठ के लिए एक शिक्षात्मक स्तोत्र है। भक्ति से शम्भु के प्रसन्न होने का वाक्य फलश्रुति का धार्मिक कथन है; इससे रोग-मुक्ति, नौकरी, धन या किसी निश्चित समय में परिणाम का वादा नहीं बनता। इसमें दीक्षा-निर्देश, न्यास, जटिल मन्त्र-विधि या निश्चित संख्या में जप करने का आदेश नहीं दिया जा रहा। विशेष परम्पराओं की विधियों की अलग समीक्षा आवश्यक है।
अन्य सामग्री से सम्बन्ध
सम्बन्धित पाठ (शिव), सम्बन्धित पाठ (शंकर), सम्बन्धित पाठ (पार्वती), सम्बन्धित पाठ (शिवलिंग का प्रतीकार्थ), सम्बन्धित पाठ (शिवमहिम्नःस्तोत्रम्) और सम्बन्धित पाठ (शिवताण्डवस्तोत्रम्) उपयुक्त सम्बन्धित विषय हैं। इनकी वेबसाइट कड़ियाँ अभी सत्यापित/सक्रिय नहीं मानी गई हैं।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
श्लोक 1
अर्थ: मैं ईशानों के ईश शिव को प्रणाम करता हूँ। वे मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक और ब्रह्म तथा वेदस्वरूप हैं। वे अपने स्वरूप में स्थित, गुणों और विकल्पों से परे, इच्छा से रहित तथा चेतना के आकाश के समान अनन्त हैं। व्याख्या: पहले श्लोक में जटा, गंगा या त्रिशूल नहीं, बल्कि शिव का व्यापक चैतन्य-स्वरूप सामने आता है। ‘निर्गुण’ का अर्थ यह नहीं कि आगे वर्णित करुणामय शिव से विरोध है; स्तोत्र दोनों दृष्टियों को स्थान देता है। ‘चिदाकाश’ चेतना की असीमता का रूपक है और ‘आकाशवास’ निर्लिप्त योगी की छवि भी जगाता है। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक 2
अर्थ: मैं उस निराकार शिव को नमस्कार करता हूँ जो ओंकार के मूल और तुरीय कहे गए हैं। वे वाणी, सामान्य ज्ञान और इन्द्रियों की पहुँच से परे, गिरीश, महाकाल के भी काल, विकराल होते हुए भी कृपालु, गुणों के आगार तथा संसार से परे हैं। व्याख्या: ‘तुरीय’ शब्द उपनिषदों की उस चेतना-अवस्था की याद दिलाता है जिसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे बताया जाता है; यह उपनिषद का सीधा उद्धरण नहीं है। ‘कराल’ और ‘कृपाल’ का साथ रहना महत्त्वपूर्ण है—शिव की शक्ति भयावह लग सकती है, पर स्तुति का सम्बोधन करुणा की ओर जाता है। पदच्छेद के पाठान्तर स्रोतों में सुरक्षित हैं। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक 3
अर्थ: शिव हिमाच्छादित पर्वत के समान गौर, अत्यन्त गम्भीर और असंख्य कामदेवों से भी अधिक शोभायमान हैं। उनके जटाजूट में सुन्दर गंगा लहराती हैं, ललाट पर बालचन्द्र चमकता है और कण्ठ में सर्प शोभित हैं। व्याख्या: निर्गुण स्वरूप के बाद अब मूर्तिमान शिव की झाँकी है। हिमालय की शान्ति, गंगा का प्रवाह, चन्द्रमा की कालगत लय और कण्ठ के सर्प एक ही रूप में मिलते हैं। ‘करोड़ों कामदेवों की कान्ति’ काव्यात्मक अतिशयोक्ति है; इसका उद्देश्य शिव की अनुपम शोभा व्यक्त करना है, कोई गणना करना नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक 4
अर्थ: मैं सबके स्वामी प्रिय शंकर को भजता हूँ। उनके कुण्डल हिलते हैं, भौंहें और विशाल नेत्र मनोहर हैं, मुख प्रसन्न है, कण्ठ नीला है और वे दयालु हैं। वे पशुराज के चर्म का वस्त्र और मुण्डमाला धारण करते हैं। व्याख्या: नीलकण्ठ का नाम समुद्रमन्थन में विष को धारण करने की कथा से जुड़ता है। पशुचर्म और मुण्डमाला वैराग्य, अनित्यता तथा सांसारिक आडम्बर से दूरी की प्रतीकात्मक छवियाँ हैं, अनुकरण के लिए अनुष्ठानिक निर्देश नहीं। ‘मृगाधीश’ को सामान्यतः पशुराज से जोड़ा जाता है; इसे हर पाठ में अनिवार्यतः ‘बाघ’ कहना उचित नहीं। ‘भ्रूसुनेत्र’ पद का पाठालोचन अभी अपेक्षित है। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक 5
अर्थ: मैं भवानीपति शिव को भजता हूँ, जो प्रचण्ड, श्रेष्ठ, निर्भीक, परमेश्वर, अखण्ड तथा अजन्मा हैं और करोड़ों सूर्यों जैसी प्रभा से युक्त कहे गए हैं। त्रिशूलधारी शिव तीन प्रकार के दुःखों का मूल नाश करते हैं और सच्चे भाव से पाए जाते हैं। व्याख्या: ‘त्रयःशूल’ को परम्परा में आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—तीन तापों—से जोड़ा जाता है, पर समास का शास्त्रीय परीक्षण अलग से शेष है। ‘भावगम्य’ बताता है कि यहाँ शुष्क प्रदर्शन से अधिक श्रद्धा और अन्तःकरण का भाव महत्त्वपूर्ण है। ‘भवानीपति’ नाम शिव-शक्ति सम्बन्ध को सीधे स्तुति के केन्द्र में लाता है। सम्बन्धित पाठ · 1 2
श्लोक 6
अर्थ: हे काल की सीमाओं से परे कल्याणमय प्रभु, कल्पान्त करने वाले, सज्जनों को आनन्द देने वाले, त्रिपुरासुर के विजेता, चिदानन्दस्वरूप और मोह को हटाने वाले कामारि! कृपा कीजिए, कृपा कीजिए। व्याख्या: ‘पुरारी’ त्रिपुर-विजय की कथा तथा ‘मन्मथारी’ कामदेव के दहन की कथा को याद दिलाते हैं। दोनों प्रसंग अलग हैं, किन्तु मोह और आसक्ति पर विजय के सूत्र से जुड़े हैं। ‘प्रसीद, प्रसीद’ की पुनरावृत्ति पाठक को दिखाती है कि वैभव-वर्णन अब विनम्र कृपा-याचना बन चुका है। सम्बन्धित पाठ · 1 3
श्लोक 7
अर्थ: कवि कहता है कि जब तक मनुष्य उमानाथ के चरणकमलों की भक्ति नहीं करता, तब तक इस लोक और परलोक में स्थायी सुख, शान्ति तथा सन्ताप से मुक्ति दुर्लभ रहती है। सभी प्राणियों में वास करने वाले प्रभु, कृपा कीजिए। व्याख्या: यह स्तोत्र के वक्ता का भक्ति-सिद्धान्त है, सभी मनुष्यों के मानसिक स्वास्थ्य अथवा दूसरे मार्गों का सार्वभौम परीक्षण नहीं। ‘चरणकमल’ शरण, विनय और निरन्तर स्मरण का रूपक है। अन्त में ‘सर्वभूताधिवास’ कहकर ईश्वर को सभी प्राणियों के भीतर देखने की भावना उभरती है। सम्बन्धित पाठ · 1 3
श्लोक 8
अर्थ: हे शम्भु! मैं योग, जप या विधिपूर्वक पूजा करना नहीं जानता, पर सदा आपको प्रणाम करता हूँ। जरा, जन्म और दुःखों की बाढ़ से पीड़ित, शरणागत मुझे बचाइए, हे ईश, हे शम्भो। व्याख्या: अन्तिम श्लोक में बड़ी दार्शनिक भाषा पीछे रह जाती है। भक्त स्वीकार करता है कि उसे विधियों पर गर्व करने का आधार नहीं, फिर भी वह शरण ले सकता है। इसका अर्थ योग, जप या पूजा का निषेध नहीं; यह आध्यात्मिक अहंकार के स्थान पर विनय को प्रतिष्ठित करता है। रक्षा की याचना धार्मिक प्रार्थना है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 3