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स्तोत्र

शिवताण्डवस्तोत्रम्

शिव के प्रचण्ड नृत्य, करुणा, तप और समभाव की लयपूर्ण संस्कृत स्तुति।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

श्लोक 1

जटाऽटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

अर्थ

जटाओं से गिरते पवित्र जल, गले की सर्पमाला और डमरू की गूँज के बीच शिव प्रचण्ड ताण्डव करते हैं; वे सबका मंगल करें।

व्याख्या

पहले पद में तीव्र गति और कल्याण एक साथ आते हैं। डमरू की ध्वनि और गंगा का प्रवाह शिव की गतिशील, फिर भी शुभकारी उपस्थिति व्यक्त करते हैं।

श्लोक 2

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥

अर्थ

शिव की जटाओं में दिव्य नदी घूमती है, ललाट पर अग्नि चमकती है और मस्तक पर बालचन्द्र सुशोभित है; उनसे मेरा अनुराग निरंतर रहे।

व्याख्या

जल, अग्नि और चन्द्रमा के विपरीत गुण एक रूप में मिलते हैं। यहाँ विश्वरूप का वर्णन व्यक्तिगत भक्ति में बदल जाता है।

श्लोक 3

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

अर्थ

पर्वतराज की पुत्री पार्वती के साथ आनंदित, करुणा-कटाक्ष से संकट शांत करने वाले दिगम्बर शिव में मेरा मन प्रसन्न हो।

व्याख्या

पार्वती की संगति और अनुग्रह की धारा इस तीव्र स्तुति को कोमल बनाती है। ‘दिगम्बर’ तपस्वी रूप का काव्यात्मक विशेषण है।

श्लोक 4

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभाकदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरासुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

अर्थ

जटाओं के सर्पों के फण-मणि का प्रकाश दिशाओं को रंगता है और शिव गजचर्म धारण किए हैं; भूतों के भर्ता मेरे मन को आनंद दें।

व्याख्या

जटाएँ, मणि, सर्प और गजचर्म का संयोजन स्तोत्र की सघन छवि रचता है। इसे प्रतीकात्मक शिव-वर्णन समझना चाहिए, व्यवहारिक निर्देश नहीं।

श्लोक 5

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखरप्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रिये चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

अर्थ

इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम से चरणपीठ फूलों की रज से धूसर है; सर्पमालाधारी चन्द्रशेखर दीर्घ कल्याण दें।

व्याख्या

देवताओं का झुकना विनय का भाव दिखाता है। जटा-संबंधी एक पद में पाठांतर है, जिसे निश्चित मूल मानकर नहीं बदलना चाहिए।

श्लोक 6

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभानिपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महः कपालि सम्पदे सरिज्जटालमस्तु नः ॥६॥

अर्थ

शिव के ललाट की ज्वाला ने कामदेव को भस्म किया, फिर भी उनके शिर पर चन्द्रकला है; कपालधारी जटाधर का तेज हमारा कल्याण करे।

व्याख्या

कामदहन एक पौराणिक प्रसंग है; इससे असंयमित वासना पर विवेक का संकेत भी लिया जाता है। अग्नि और चन्द्र की सहस्थिति महत्वपूर्ण है।

श्लोक 7

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

अर्थ

कामदेव के बाणों को ललाटाग्नि में समर्पित करने वाले त्रिनेत्र शिव, पार्वती का श्रृंगार करने वाले कुशल कलाकार भी हैं; उन्हीं में मेरी प्रीति है।

व्याख्या

तपस्वी तेज के साथ पारिवारिक स्नेह का चित्र है। यह भक्ति-काव्य की कल्पना है, किसी एक सामाजिक जीवनपद्धति का आदेश नहीं।

श्लोक 8

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥

अर्थ

शिव का गला अमावस्या की मेघाच्छन्न रात जैसा गहरा है; वे गंगा और चर्म धारण कर जगत का भार संभालते हैं; वे मंगल दें।

व्याख्या

नीलकण्ठ की प्रसिद्ध कथा इस छवि को समझाने में सहायक है, पर पद का प्रत्यक्ष काव्य-आधार रात्रि और मेघ की उपमा है।

श्लोक 9

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभाऽवलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

अर्थ

नील कमल जैसी कण्ठ-शोभा वाले शिव काम, त्रिपुर, भव-बन्धन, दक्षयज्ञ, गजासुर, अन्धक और मृत्यु के दमनकर्ता हैं; मैं उन्हें भजता हूँ।

व्याख्या

‘छिद्’ पदों की शृंखला अनेक पुराकथाएँ एक ताल में बाँधती है। यहाँ दमन की छवि आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थ रखती है।

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरीरसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

अर्थ

समस्त मंगल की मंजरी के मधुर रस पर मँडराने वाले भ्रमर-तुल्य शिव काम, त्रिपुर, भव, यज्ञ और दैत्यों के संहारक हैं; मैं उनका भजन करता हूँ।

व्याख्या

मधुर पुष्प-रस और तीखे संहारक नाम एक दूसरे को संतुलित करते हैं। पिछले श्लोक की आवृत्ति ही लय और भाव का आधार है।

श्लोक 11

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गलध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

अर्थ

सर्प घूमते हैं, ललाटाग्नि दहकती है और मृदंग की ‘धिमिद्धिमि’ ध्वनि शिव के प्रचण्ड ताण्डव को गति देती है; उनकी जय हो।

व्याख्या

अनुकरणध्वनि पाठ करते समय ताल का अनुभव कराती है। यह नृत्य की स्तुति है, किसी विशेष मंचीय नृत्य-विधि का पाठ्यक्रम नहीं।

श्लोक 12

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

अर्थ

कब मैं सदाशिव का ऐसा भजन करूँगा कि पत्थर और शय्या, सर्प और मोती, रत्न और मिट्टी, मित्र और शत्रु, प्रजा और राजा के प्रति समभाव हो?

व्याख्या

यहाँ ताण्डव का तेज समता की साधना बन जाता है। समभाव का अर्थ अन्याय के प्रति उदासीन रहना नहीं है।

श्लोक 13

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विमुक्तलोललोचनाललामभाललग्नकं शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

अर्थ

कब मैं दिव्य नदी के वन-आश्रय में निर्मल बुद्धि से हाथ जोड़े ‘शिव’ नाम जपते हुए संतोष पाऊँगा?

व्याख्या

विशाल विश्व-वर्णन के बाद कवि साधक का निजी प्रश्न पूछता है। एकांत की यह कामना सबके लिए अनिवार्य जीवन-निर्देश नहीं।

श्लोक 14

निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलमल्लिकानिगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः। तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं परश्रियः परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥

अर्थ

दिव्य पुष्पों और सुगन्ध से रूपायित शिव की तेजोमय शोभा दिन-रात हमारे मन में आनंद जगाए।

व्याख्या

इस पद के घने समासों और पाठभेदों के कारण पद-पद अनुवाद में सावधानी जरूरी है। यहाँ भावार्थ अस्थायी है, अंतिम शब्दार्थ नहीं।

श्लोक 15

प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनीजनाऽवहूतजल्पना। विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषणा जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥

अर्थ

प्रचण्ड तेज, अष्टसिद्धि और शुभ उत्सव-ध्वनि के मध्य ‘शिव’ नाम से विभूषित मंगल-स्वर सर्वत्र विजयी हो।

व्याख्या

विवाह-ध्वनि और सिद्धियों वाले समास कठिन हैं; विभिन्न पाठ और अर्थ मिलते हैं। इन्हें अचूक सिद्धि का वादा न समझें।

श्लोक 16

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नाऽन्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१६॥

अर्थ

स्तोत्र का समापन बताता है कि उसका स्मरण और पाठ अंतःकरण की शुद्धि तथा शिव-गुरु के प्रति भक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है।

व्याख्या

यह फलश्रुति परंपरागत आध्यात्मिक आश्वासन है, वैज्ञानिक गारंटी या अनिवार्य निश्चित जप-संख्या नहीं।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं प्रसादसमये प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

अर्थ

अंतिम फलश्रुति के अनुसार प्रदोष आदि शिवपूजन के समापन में दशमुख-सम्बद्ध स्तोत्र का पाठ करने वाले को शिव की कृपा से स्थायी समृद्धि मिलती है।

व्याख्या

रथ, गज और अश्व ऐतिहासिक समृद्धि-चिह्न हैं। यह परंपरागत आशीर्वचन है, धन-प्राप्ति का प्रमाणित वादा या रावण-लेखकत्व का ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं।

सन्दर्भ और उपयोग

आधार-पाठ: संस्कृत विकिस्रोत का निश्चित 16+1 पाठ; ऐतिहासिक मुद्रित प्रतियों से पूर्ण मिलान तथा अधिकार-जाँच अभी शेष है। 17वें खण्ड का अंक केवल पाठक-सुविधा के लिए जोड़ा गया है।

श्लोकानुसार सरल हिन्दी अर्थ और भावार्थ

समापन-फलश्रुति

अर्थ: अंतिम फलश्रुति के अनुसार प्रदोष आदि शिवपूजन के समापन में दशमुख-सम्बद्ध स्तोत्र का पाठ करने वाले को शिव की कृपा से स्थायी समृद्धि मिलती है। व्याख्या: रथ, गज और अश्व ऐतिहासिक समृद्धि-चिह्न हैं। यह परंपरागत आशीर्वचन है, धन-प्राप्ति का प्रमाणित वादा या रावण-लेखकत्व का ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं।

यह स्तोत्र क्या है? शिवताण्डवस्तोत्रम् संस्कृत की अत्यंत लयपूर्ण स्तुति है। इसकी तेज गति, लम्बे समास, डमरू और मृदंग की ध्वनि का अनुकरण तथा तीव्र शिव-रूप इसे विशिष्ट बनाते हैं। लेकिन स्तोत्र केवल प्रचण्डता नहीं दिखाता; पार्वती का स्नेह, शिव की करुणा, बारहवें श्लोक का समभाव और तेरहवें श्लोक की एकांत-भक्ति इसे संतुलित करते हैं। 1

ध्यान दें: यह संस्करण केवल एक निश्चित डिजिटल पाठ है। 17 पाठ-खण्डों का अर्थ सार्वभौम रूप से 17 मूल श्लोक नहीं; समापन-फलश्रुति चुने हुए स्रोत में बिना अंक की है। 12

शिव का नृत्य, लय और प्रतीक

पहले श्लोक में जटा से गंगा का जल, गले में सर्प और डमरू आते हैं; दूसरे में ललाट की अग्नि तथा बालचन्द्र है। यह जटिल छवि बताती है कि शिव में निरंतर गति और स्थिर शांति साथ हो सकते हैं। ग्यारहवें श्लोक की “धिमिद्धिमि” जैसे शब्द संगीत-सम्मत अनुभूति पैदा करते हैं, पर इससे किसी खास नृत्य-नोटेशन का दावा नहीं बनता। 1

दक्षिण भारत की चोलकालीन नटराज प्रतिमाएँ शिव के नृत्य को डमरू, अग्नि, अभय-मुद्रा और अज्ञान के प्रतीक अपस्मार के माध्यम से व्यक्त करती हैं। यह एक उपयोगी तुलनात्मक सांस्कृतिक संदर्भ है, इस स्तोत्र का प्राचीन लेखक सिद्ध करने वाला साक्ष्य नहीं। कुछ शैव व्याख्याओं में सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह—पाँच क्रियाओं—का विशेष महत्त्व है। 56

रावण की परंपरागत कथा और इतिहास

स्तोत्र के शीर्षक तथा समापन में “दशवक्त्र” का संकेत होने के कारण इसे परंपरा में रावणकृत कहा जाता है। यह धार्मिक स्मृति और रचना-परंपरा का महत्त्वपूर्ण भाग है। किंतु हमारी जाँची सामग्री में ऐसा स्वतंत्र ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है जो लेखन-काल और लेखक की पुष्टि कर दे; अतः “परंपरागत रूप से रावण से सम्बद्ध” कहना अधिक उचित है। 12

पाठांतर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?

1912 के बृहत्स्तोत्ररत्नाकर से सम्बद्ध छोटी पाठ-परंपरा का आरंभ इस संस्करण के दूसरे श्लोक से होता है। कुछ लंबे पाठों में 14वें श्लोक का जटिल पुष्प-वर्णन है, जो छोटे पाठ में अलग श्लोक नहीं है। पाँचवें, बारहवें और समापन के शब्दों में भी भेद हैं। किसी परंपरा के श्लोक को दूसरी से जोड़कर बिना घोषणा के नया पाठ नहीं बनाया गया है। 1237

फलश्रुति और जिम्मेदार पाठ-समझ

समापन में प्रदोष और शिवपूजन के उपरान्त पाठ का प्रसंग है। रथ, गज, अश्व और लक्ष्मी समृद्धि के पारंपरिक चित्र हैं; इनका अर्थ धन की निश्चित उपलब्धि या साधक के लिए किसी विशेष जटिल अनुष्ठान का अनिवार्य आदेश नहीं है। प्रचलित सार्वजनिक पाठ का अध्ययन और व्यक्तिगत भक्ति अलग विषय हैं; दीक्षा-आश्रित या जोखिमयुक्त साधना के निर्देश यहाँ नहीं दिए गए। 1

कठिन पद और उच्चारण

जटा — शिव के उलझे तपस्वी केश। डमरू — छोटा दोमुखी वाद्य। ताण्डव — शिव के नृत्य का ओजस्वी रूप। दिगम्बर — आकाश को वस्त्र मानने वाला तपस्वी विशेषण। समभाव — सुख-दुःख या मान-अपमान में आन्तरिक संतुलन। फलश्रुति — पाठ के परंपरागत माने गए फल का वर्णन। लंबी संस्कृत समास-श्रृंखलाओं का उच्चारण सुनकर और किसी योग्य भाषाज्ञ से जाँचकर करना उचित है।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

नाम का अर्थ क्या है?

“शिवताण्डवस्तोत्रम्” शिव के ओजस्वी नृत्य की स्तुति है। उसके सघन संस्कृत समास और ध्वनि नृत्य की लय का आभास कराते हैं। क्या इसकी रचना रावण ने की थी?

परंपरा इसे रावणकृत कहती है और समापन में भी उसका संकेत है। इससे ऐतिहासिक लेखक और निश्चित रचनाकाल स्वतंत्र रूप से सिद्ध नहीं होते। इसमें कितने श्लोक हैं?

इस चुने हुए पाठ में 16 मुख्य श्लोक और एक बिना अंक की समापन फलश्रुति है, जिसे यहाँ पाठ-सुविधा के लिए 17वाँ खण्ड कहा गया है। अन्य पाठों में गिनती अलग है। क्या यही नटराज की मूर्ति का मूल पाठ है?

दोनों में शिव-नृत्य का भाव है, लेकिन इस स्तोत्र और चोलकालीन नटराज-मूर्तियों का इतिहास अलग स्रोतों से जाना जाता है। समान प्रतीक समान रचना-काल सिद्ध नहीं करते। क्या पाठ से धन या सिद्धि निश्चित मिलती है?

फलश्रुति परंपरागत समृद्धि का आशीर्वचन है; यह जाँचकर सिद्ध किया गया परिणाम या विशेष सिद्धि प्राप्ति का विधि-विधान नहीं है। पार्वती का उल्लेख क्यों है?

तीसरे और सातवें श्लोक सहित कई स्थानों पर शिव के साथ पर्वतसुता की संगति, स्नेह और करुणा का स्मरण है। रोमन पाठ का अर्थ अंग्रेजी अनुवाद है क्या?

नहीं। रोमन पाठ वही संस्कृत शब्द IAST लिप्यंतरण में दिखाता है। वास्तविक अर्थ नीचे अलग अंग्रेजी गद्य में है। क्या यह दीक्षा वाला मंत्र है?

यह सार्वजनिक शैक्षिक स्तोत्र-पाठ है; इसमें दीक्षा, गुप्त साधना या अनधिकृत अनुष्ठान निर्देश नहीं दिए गए। अलग वेबसाइटों पर भिन्न श्लोक क्यों हैं?

पाठ-परंपराओं में क्रम, संख्या और कुछ शब्द बदलते हैं। इस संस्करण में एक आधार-साक्ष्य चुना गया है और पाठांतर अलग दर्ज हैं।

पाठ-स्रोत और सम्पादकीय सीमाएँ

  • 1 संस्कृत विकिस्रोत का निश्चित मूल पाठ (16 मुख्य श्लोक और बिना अंक की समापन फलश्रुति)।
  • 2 बृहत्स्तोत्ररत्नाकर से सम्बद्ध छोटा पाठ: क्रम एवं पदभेद तुलना।
  • 3 1912 संस्करण का पुस्तक-सूचकांक: मूल मुद्रित छवियों की पूर्ण तुलना शेष।
  • 4, 7, 8 भिन्न पाठ-संस्करणों के बारे में तुलनात्मक सन्दर्भ; इनकी आधुनिक व्याख्याएँ नहीं दोहराई गई हैं।
  • 5, 6 नटराज की कला और दर्शन के संस्थागत स्रोत।
स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on शिवताण्डवस्तोत्रम्, fixed Wikisource revision. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Verse 1

    jaṭā’ṭavīgalajjalapravāhapāvitasthale gale’valambya lambitāṃ bhujaṅgatuṅgamālikām. ḍamaḍḍamaḍḍamaḍḍamanninādavaḍḍamarvayaṃ cakāra caṇḍatāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam ||1||

  2. Verse 2

    jaṭākaṭāhasambhramabhramannilimpanirjharīvilolavīcivallarīvirājamānamūrddhani. dhagaddhagaddhagajjvalallalāṭapaṭṭapāvake kiśoracandraśekhare ratiḥ pratikṣaṇaṃ mama ||2||

  3. Verse 3

    dharādharendranandinīvilāsabandhubandhurasphuraddigantasantatipramodamānamānase. kṛpākaṭākṣadhoraṇīniruddhadurdharāpadi kvaciddigambare mano vinodametu vastuni ||3||

  4. Verse 4

    jaṭābhujaṅgapiṅgalasphuratphaṇāmaṇiprabhākadambakuṅkumadravapraliptadigvadhūmukhe. madāndhasindhurāsuratvaguttarīyamedure mano vinodamadbhutaṃ bibhartu bhūtabhartari ||4||

  5. Verse 5

    sahasralocanaprabhṛtyaśeṣalekhaśekharaprasūnadhūlidhoraṇīvidhūsarāṅghripīṭhabhūḥ. bhujaṅgarājamālayā nibaddhajāṭajūṭakaḥ śriye cirāya jāyatāṃ cakorabandhuśekharaḥ ||5||

  6. Verse 6

    lalāṭacatvarajvaladdhanañjayasphuliṅgabhānipītapañcasāyakaṃ namannilimpanāyakam. sudhāmayūkhalekhayā virājamānaśekharaṃ mahaḥ kapāli sampade sarijjaṭālamastu naḥ ||6||

  7. Verse 7

    karālabhālapaṭṭikādhagaddhagaddhagajjvaladdhanañjayāhutīkṛtapracaṇḍapañcasāyake. dharādharendranandinīkucāgracitrapatrakaprakalpanaikaśilpini trilocane ratirmama ||7||

  8. Verse 8

    navīnameghamaṇḍalīniruddhadurdharasphuratkuhūniśīthinītamaḥprabandhabaddhakandharaḥ. nilimpanirjharīdharastanotu kṛttisindhuraḥ kalānidhānabandhuraḥ śriyaṃ jagaddhurandharaḥ ||8||

  9. Verse 9

    praphullanīlapaṅkajaprapañcakālimaprabhā’valambikaṇṭhakandalīruciprabaddhakandharam. smaracchidaṃ puracchidaṃ bhavacchidaṃ makhacchidaṃ gajacchidāndhakacchidaṃ tamantakacchidaṃ bhaje ||9||

  10. Verse 10

    akharvasarvamaṅgalākalākadambamañjarīrasapravāhamādhurīvijṛmbhaṇāmadhuvratam. smarāntakaṃ purāntakaṃ bhavāntakaṃ makhāntakaṃ gajāntakāndhakāntakaṃ tamantakāntakaṃ bhaje ||10||

  11. Verse 11

    jayatvadabhravibhramabhramadbhujaṅgamaśvasadvinirgamatkramasphuratkarālabhālahavyavāṭ. dhimiddhimiddhimiddhvananmṛdaṅgatuṅgamaṅgaladhvanikramapravartitapracaṇḍatāṇḍavaḥ śivaḥ ||11||

  12. Verse 12

    dṛṣadvicitratalpayorbhujaṅgamauktikasrajorgariṣṭharatnaloṣṭhayoḥ suhṛdvipakṣapakṣayoḥ. tṛṇāravindacakṣuṣoḥ prajāmahīmahendrayoḥ samapravṛttikaḥ kadā sadāśivaṃ bhajāmyaham ||12||

  13. Verse 13

    kadā nilimpanirjharīnikuñjakoṭare vasan vimuktadurmatiḥ sadā śiraḥsthamañjaliṃ vahan. vimuktalolalocanālalāmabhālalagnakaṃ śiveti mantramuccaran kadā sukhī bhavāmyaham ||13||

  14. Verse 14

    nilimpanāthanāgarīkadambamaulamallikānigumphanirbharakṣaranmadhūṣṇikāmanoharaḥ. tanotu no manomudaṃ vinodinīmaharniśaṃ paraśriyaḥ paraṃ padaṃ tadaṅgajatviṣāṃ cayaḥ ||14||

  15. Verse 15

    pracaṇḍavāḍavānalaprabhāśubhapracāraṇī mahāṣṭasiddhikāminījanā’vahūtajalpanā. vimuktavāmalocanāvivāhakālikadhvaniḥ śiveti mantrabhūṣaṇā jagajjayāya jāyatām ||15||

  16. Verse 16

    imaṃ hi nityamevamuktamuttamottamaṃ stavaṃ paṭhansmaranbruvannaro viśuddhimetisantatam. hare gurau subhaktimāśu yāti nā’nyathā gatiṃ vimohanaṃ hi dehināṃ suśaṅkarasya cintanam ||16||

  17. Closing benediction — verse 17

    pūjāvasānasamaye daśavaktragītaṃ yaḥ śambhupūjanaparaṃ paṭhati pradoṣe. tasya sthirāṃ rathagajendraturaṅgayuktāṃ lakṣmīṃ prasādasamaye pradadāti śambhuḥ ||17||

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1

अर्थ: जटाओं से गिरते पवित्र जल, गले की सर्पमाला और डमरू की गूँज के बीच शिव प्रचण्ड ताण्डव करते हैं; वे सबका मंगल करें। व्याख्या: पहले पद में तीव्र गति और कल्याण एक साथ आते हैं। डमरू की ध्वनि और गंगा का प्रवाह शिव की गतिशील, फिर भी शुभकारी उपस्थिति व्यक्त करते हैं।

श्लोक 2

अर्थ: शिव की जटाओं में दिव्य नदी घूमती है, ललाट पर अग्नि चमकती है और मस्तक पर बालचन्द्र सुशोभित है; उनसे मेरा अनुराग निरंतर रहे। व्याख्या: जल, अग्नि और चन्द्रमा के विपरीत गुण एक रूप में मिलते हैं। यहाँ विश्वरूप का वर्णन व्यक्तिगत भक्ति में बदल जाता है।

श्लोक 3

अर्थ: पर्वतराज की पुत्री पार्वती के साथ आनंदित, करुणा-कटाक्ष से संकट शांत करने वाले दिगम्बर शिव में मेरा मन प्रसन्न हो। व्याख्या: पार्वती की संगति और अनुग्रह की धारा इस तीव्र स्तुति को कोमल बनाती है। ‘दिगम्बर’ तपस्वी रूप का काव्यात्मक विशेषण है।

श्लोक 4

अर्थ: जटाओं के सर्पों के फण-मणि का प्रकाश दिशाओं को रंगता है और शिव गजचर्म धारण किए हैं; भूतों के भर्ता मेरे मन को आनंद दें। व्याख्या: जटाएँ, मणि, सर्प और गजचर्म का संयोजन स्तोत्र की सघन छवि रचता है। इसे प्रतीकात्मक शिव-वर्णन समझना चाहिए, व्यवहारिक निर्देश नहीं।

श्लोक 5

अर्थ: इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम से चरणपीठ फूलों की रज से धूसर है; सर्पमालाधारी चन्द्रशेखर दीर्घ कल्याण दें। व्याख्या: देवताओं का झुकना विनय का भाव दिखाता है। जटा-संबंधी एक पद में पाठांतर है, जिसे निश्चित मूल मानकर नहीं बदलना चाहिए।

श्लोक 6

अर्थ: शिव के ललाट की ज्वाला ने कामदेव को भस्म किया, फिर भी उनके शिर पर चन्द्रकला है; कपालधारी जटाधर का तेज हमारा कल्याण करे। व्याख्या: कामदहन एक पौराणिक प्रसंग है; इससे असंयमित वासना पर विवेक का संकेत भी लिया जाता है। अग्नि और चन्द्र की सहस्थिति महत्वपूर्ण है।

श्लोक 7

अर्थ: कामदेव के बाणों को ललाटाग्नि में समर्पित करने वाले त्रिनेत्र शिव, पार्वती का श्रृंगार करने वाले कुशल कलाकार भी हैं; उन्हीं में मेरी प्रीति है। व्याख्या: तपस्वी तेज के साथ पारिवारिक स्नेह का चित्र है। यह भक्ति-काव्य की कल्पना है, किसी एक सामाजिक जीवनपद्धति का आदेश नहीं।

श्लोक 8

अर्थ: शिव का गला अमावस्या की मेघाच्छन्न रात जैसा गहरा है; वे गंगा और चर्म धारण कर जगत का भार संभालते हैं; वे मंगल दें। व्याख्या: नीलकण्ठ की प्रसिद्ध कथा इस छवि को समझाने में सहायक है, पर पद का प्रत्यक्ष काव्य-आधार रात्रि और मेघ की उपमा है।

श्लोक 9

अर्थ: नील कमल जैसी कण्ठ-शोभा वाले शिव काम, त्रिपुर, भव-बन्धन, दक्षयज्ञ, गजासुर, अन्धक और मृत्यु के दमनकर्ता हैं; मैं उन्हें भजता हूँ। व्याख्या: ‘छिद्’ पदों की शृंखला अनेक पुराकथाएँ एक ताल में बाँधती है। यहाँ दमन की छवि आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थ रखती है।

श्लोक 10

अर्थ: समस्त मंगल की मंजरी के मधुर रस पर मँडराने वाले भ्रमर-तुल्य शिव काम, त्रिपुर, भव, यज्ञ और दैत्यों के संहारक हैं; मैं उनका भजन करता हूँ। व्याख्या: मधुर पुष्प-रस और तीखे संहारक नाम एक दूसरे को संतुलित करते हैं। पिछले श्लोक की आवृत्ति ही लय और भाव का आधार है।

श्लोक 11

अर्थ: सर्प घूमते हैं, ललाटाग्नि दहकती है और मृदंग की ‘धिमिद्धिमि’ ध्वनि शिव के प्रचण्ड ताण्डव को गति देती है; उनकी जय हो। व्याख्या: अनुकरणध्वनि पाठ करते समय ताल का अनुभव कराती है। यह नृत्य की स्तुति है, किसी विशेष मंचीय नृत्य-विधि का पाठ्यक्रम नहीं।

श्लोक 12

अर्थ: कब मैं सदाशिव का ऐसा भजन करूँगा कि पत्थर और शय्या, सर्प और मोती, रत्न और मिट्टी, मित्र और शत्रु, प्रजा और राजा के प्रति समभाव हो? व्याख्या: यहाँ ताण्डव का तेज समता की साधना बन जाता है। समभाव का अर्थ अन्याय के प्रति उदासीन रहना नहीं है।

श्लोक 13

अर्थ: कब मैं दिव्य नदी के वन-आश्रय में निर्मल बुद्धि से हाथ जोड़े ‘शिव’ नाम जपते हुए संतोष पाऊँगा? व्याख्या: विशाल विश्व-वर्णन के बाद कवि साधक का निजी प्रश्न पूछता है। एकांत की यह कामना सबके लिए अनिवार्य जीवन-निर्देश नहीं।

श्लोक 14

अर्थ: दिव्य पुष्पों और सुगन्ध से रूपायित शिव की तेजोमय शोभा दिन-रात हमारे मन में आनंद जगाए। व्याख्या: इस पद के घने समासों और पाठभेदों के कारण पद-पद अनुवाद में सावधानी जरूरी है। यहाँ भावार्थ अस्थायी है, अंतिम शब्दार्थ नहीं।

श्लोक 15

अर्थ: प्रचण्ड तेज, अष्टसिद्धि और शुभ उत्सव-ध्वनि के मध्य ‘शिव’ नाम से विभूषित मंगल-स्वर सर्वत्र विजयी हो। व्याख्या: विवाह-ध्वनि और सिद्धियों वाले समास कठिन हैं; विभिन्न पाठ और अर्थ मिलते हैं। इन्हें अचूक सिद्धि का वादा न समझें।

श्लोक 16

अर्थ: स्तोत्र का समापन बताता है कि उसका स्मरण और पाठ अंतःकरण की शुद्धि तथा शिव-गुरु के प्रति भक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है। व्याख्या: यह फलश्रुति परंपरागत आध्यात्मिक आश्वासन है, वैज्ञानिक गारंटी या अनिवार्य निश्चित जप-संख्या नहीं।

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