आधार-पाठ: संस्कृत विकिस्रोत का निश्चित 16+1 पाठ; ऐतिहासिक मुद्रित प्रतियों से पूर्ण मिलान तथा अधिकार-जाँच अभी शेष है। 17वें खण्ड का अंक केवल पाठक-सुविधा के लिए जोड़ा गया है।
श्लोकानुसार सरल हिन्दी अर्थ और भावार्थ
समापन-फलश्रुति
अर्थ: अंतिम फलश्रुति के अनुसार प्रदोष आदि शिवपूजन के समापन में दशमुख-सम्बद्ध स्तोत्र का पाठ करने वाले को शिव की कृपा से स्थायी समृद्धि मिलती है। व्याख्या: रथ, गज और अश्व ऐतिहासिक समृद्धि-चिह्न हैं। यह परंपरागत आशीर्वचन है, धन-प्राप्ति का प्रमाणित वादा या रावण-लेखकत्व का ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं।
यह स्तोत्र क्या है? शिवताण्डवस्तोत्रम् संस्कृत की अत्यंत लयपूर्ण स्तुति है। इसकी तेज गति, लम्बे समास, डमरू और मृदंग की ध्वनि का अनुकरण तथा तीव्र शिव-रूप इसे विशिष्ट बनाते हैं। लेकिन स्तोत्र केवल प्रचण्डता नहीं दिखाता; पार्वती का स्नेह, शिव की करुणा, बारहवें श्लोक का समभाव और तेरहवें श्लोक की एकांत-भक्ति इसे संतुलित करते हैं। 1
ध्यान दें: यह संस्करण केवल एक निश्चित डिजिटल पाठ है। 17 पाठ-खण्डों का अर्थ सार्वभौम रूप से 17 मूल श्लोक नहीं; समापन-फलश्रुति चुने हुए स्रोत में बिना अंक की है। 12
शिव का नृत्य, लय और प्रतीक
पहले श्लोक में जटा से गंगा का जल, गले में सर्प और डमरू आते हैं; दूसरे में ललाट की अग्नि तथा बालचन्द्र है। यह जटिल छवि बताती है कि शिव में निरंतर गति और स्थिर शांति साथ हो सकते हैं। ग्यारहवें श्लोक की “धिमिद्धिमि” जैसे शब्द संगीत-सम्मत अनुभूति पैदा करते हैं, पर इससे किसी खास नृत्य-नोटेशन का दावा नहीं बनता। 1
दक्षिण भारत की चोलकालीन नटराज प्रतिमाएँ शिव के नृत्य को डमरू, अग्नि, अभय-मुद्रा और अज्ञान के प्रतीक अपस्मार के माध्यम से व्यक्त करती हैं। यह एक उपयोगी तुलनात्मक सांस्कृतिक संदर्भ है, इस स्तोत्र का प्राचीन लेखक सिद्ध करने वाला साक्ष्य नहीं। कुछ शैव व्याख्याओं में सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह—पाँच क्रियाओं—का विशेष महत्त्व है। 56
रावण की परंपरागत कथा और इतिहास
स्तोत्र के शीर्षक तथा समापन में “दशवक्त्र” का संकेत होने के कारण इसे परंपरा में रावणकृत कहा जाता है। यह धार्मिक स्मृति और रचना-परंपरा का महत्त्वपूर्ण भाग है। किंतु हमारी जाँची सामग्री में ऐसा स्वतंत्र ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है जो लेखन-काल और लेखक की पुष्टि कर दे; अतः “परंपरागत रूप से रावण से सम्बद्ध” कहना अधिक उचित है। 12
पाठांतर क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
1912 के बृहत्स्तोत्ररत्नाकर से सम्बद्ध छोटी पाठ-परंपरा का आरंभ इस संस्करण के दूसरे श्लोक से होता है। कुछ लंबे पाठों में 14वें श्लोक का जटिल पुष्प-वर्णन है, जो छोटे पाठ में अलग श्लोक नहीं है। पाँचवें, बारहवें और समापन के शब्दों में भी भेद हैं। किसी परंपरा के श्लोक को दूसरी से जोड़कर बिना घोषणा के नया पाठ नहीं बनाया गया है। 1237
फलश्रुति और जिम्मेदार पाठ-समझ
समापन में प्रदोष और शिवपूजन के उपरान्त पाठ का प्रसंग है। रथ, गज, अश्व और लक्ष्मी समृद्धि के पारंपरिक चित्र हैं; इनका अर्थ धन की निश्चित उपलब्धि या साधक के लिए किसी विशेष जटिल अनुष्ठान का अनिवार्य आदेश नहीं है। प्रचलित सार्वजनिक पाठ का अध्ययन और व्यक्तिगत भक्ति अलग विषय हैं; दीक्षा-आश्रित या जोखिमयुक्त साधना के निर्देश यहाँ नहीं दिए गए। 1
कठिन पद और उच्चारण
जटा — शिव के उलझे तपस्वी केश। डमरू — छोटा दोमुखी वाद्य। ताण्डव — शिव के नृत्य का ओजस्वी रूप। दिगम्बर — आकाश को वस्त्र मानने वाला तपस्वी विशेषण। समभाव — सुख-दुःख या मान-अपमान में आन्तरिक संतुलन। फलश्रुति — पाठ के परंपरागत माने गए फल का वर्णन। लंबी संस्कृत समास-श्रृंखलाओं का उच्चारण सुनकर और किसी योग्य भाषाज्ञ से जाँचकर करना उचित है।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
नाम का अर्थ क्या है?
“शिवताण्डवस्तोत्रम्” शिव के ओजस्वी नृत्य की स्तुति है। उसके सघन संस्कृत समास और ध्वनि नृत्य की लय का आभास कराते हैं। क्या इसकी रचना रावण ने की थी?
परंपरा इसे रावणकृत कहती है और समापन में भी उसका संकेत है। इससे ऐतिहासिक लेखक और निश्चित रचनाकाल स्वतंत्र रूप से सिद्ध नहीं होते। इसमें कितने श्लोक हैं?
इस चुने हुए पाठ में 16 मुख्य श्लोक और एक बिना अंक की समापन फलश्रुति है, जिसे यहाँ पाठ-सुविधा के लिए 17वाँ खण्ड कहा गया है। अन्य पाठों में गिनती अलग है। क्या यही नटराज की मूर्ति का मूल पाठ है?
दोनों में शिव-नृत्य का भाव है, लेकिन इस स्तोत्र और चोलकालीन नटराज-मूर्तियों का इतिहास अलग स्रोतों से जाना जाता है। समान प्रतीक समान रचना-काल सिद्ध नहीं करते। क्या पाठ से धन या सिद्धि निश्चित मिलती है?
फलश्रुति परंपरागत समृद्धि का आशीर्वचन है; यह जाँचकर सिद्ध किया गया परिणाम या विशेष सिद्धि प्राप्ति का विधि-विधान नहीं है। पार्वती का उल्लेख क्यों है?
तीसरे और सातवें श्लोक सहित कई स्थानों पर शिव के साथ पर्वतसुता की संगति, स्नेह और करुणा का स्मरण है। रोमन पाठ का अर्थ अंग्रेजी अनुवाद है क्या?
नहीं। रोमन पाठ वही संस्कृत शब्द IAST लिप्यंतरण में दिखाता है। वास्तविक अर्थ नीचे अलग अंग्रेजी गद्य में है। क्या यह दीक्षा वाला मंत्र है?
यह सार्वजनिक शैक्षिक स्तोत्र-पाठ है; इसमें दीक्षा, गुप्त साधना या अनधिकृत अनुष्ठान निर्देश नहीं दिए गए। अलग वेबसाइटों पर भिन्न श्लोक क्यों हैं?
पाठ-परंपराओं में क्रम, संख्या और कुछ शब्द बदलते हैं। इस संस्करण में एक आधार-साक्ष्य चुना गया है और पाठांतर अलग दर्ज हैं।
पाठ-स्रोत और सम्पादकीय सीमाएँ
- 1 संस्कृत विकिस्रोत का निश्चित मूल पाठ (16 मुख्य श्लोक और बिना अंक की समापन फलश्रुति)।
- 2 बृहत्स्तोत्ररत्नाकर से सम्बद्ध छोटा पाठ: क्रम एवं पदभेद तुलना।
- 3 1912 संस्करण का पुस्तक-सूचकांक: मूल मुद्रित छवियों की पूर्ण तुलना शेष।
- 4, 7, 8 भिन्न पाठ-संस्करणों के बारे में तुलनात्मक सन्दर्भ; इनकी आधुनिक व्याख्याएँ नहीं दोहराई गई हैं।
- 5, 6 नटराज की कला और दर्शन के संस्थागत स्रोत।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
श्लोक 1
अर्थ: जटाओं से गिरते पवित्र जल, गले की सर्पमाला और डमरू की गूँज के बीच शिव प्रचण्ड ताण्डव करते हैं; वे सबका मंगल करें। व्याख्या: पहले पद में तीव्र गति और कल्याण एक साथ आते हैं। डमरू की ध्वनि और गंगा का प्रवाह शिव की गतिशील, फिर भी शुभकारी उपस्थिति व्यक्त करते हैं।
श्लोक 2
अर्थ: शिव की जटाओं में दिव्य नदी घूमती है, ललाट पर अग्नि चमकती है और मस्तक पर बालचन्द्र सुशोभित है; उनसे मेरा अनुराग निरंतर रहे। व्याख्या: जल, अग्नि और चन्द्रमा के विपरीत गुण एक रूप में मिलते हैं। यहाँ विश्वरूप का वर्णन व्यक्तिगत भक्ति में बदल जाता है।
श्लोक 3
अर्थ: पर्वतराज की पुत्री पार्वती के साथ आनंदित, करुणा-कटाक्ष से संकट शांत करने वाले दिगम्बर शिव में मेरा मन प्रसन्न हो। व्याख्या: पार्वती की संगति और अनुग्रह की धारा इस तीव्र स्तुति को कोमल बनाती है। ‘दिगम्बर’ तपस्वी रूप का काव्यात्मक विशेषण है।
श्लोक 4
अर्थ: जटाओं के सर्पों के फण-मणि का प्रकाश दिशाओं को रंगता है और शिव गजचर्म धारण किए हैं; भूतों के भर्ता मेरे मन को आनंद दें। व्याख्या: जटाएँ, मणि, सर्प और गजचर्म का संयोजन स्तोत्र की सघन छवि रचता है। इसे प्रतीकात्मक शिव-वर्णन समझना चाहिए, व्यवहारिक निर्देश नहीं।
श्लोक 5
अर्थ: इन्द्र आदि देवताओं के प्रणाम से चरणपीठ फूलों की रज से धूसर है; सर्पमालाधारी चन्द्रशेखर दीर्घ कल्याण दें। व्याख्या: देवताओं का झुकना विनय का भाव दिखाता है। जटा-संबंधी एक पद में पाठांतर है, जिसे निश्चित मूल मानकर नहीं बदलना चाहिए।
श्लोक 6
अर्थ: शिव के ललाट की ज्वाला ने कामदेव को भस्म किया, फिर भी उनके शिर पर चन्द्रकला है; कपालधारी जटाधर का तेज हमारा कल्याण करे। व्याख्या: कामदहन एक पौराणिक प्रसंग है; इससे असंयमित वासना पर विवेक का संकेत भी लिया जाता है। अग्नि और चन्द्र की सहस्थिति महत्वपूर्ण है।
श्लोक 7
अर्थ: कामदेव के बाणों को ललाटाग्नि में समर्पित करने वाले त्रिनेत्र शिव, पार्वती का श्रृंगार करने वाले कुशल कलाकार भी हैं; उन्हीं में मेरी प्रीति है। व्याख्या: तपस्वी तेज के साथ पारिवारिक स्नेह का चित्र है। यह भक्ति-काव्य की कल्पना है, किसी एक सामाजिक जीवनपद्धति का आदेश नहीं।
श्लोक 8
अर्थ: शिव का गला अमावस्या की मेघाच्छन्न रात जैसा गहरा है; वे गंगा और चर्म धारण कर जगत का भार संभालते हैं; वे मंगल दें। व्याख्या: नीलकण्ठ की प्रसिद्ध कथा इस छवि को समझाने में सहायक है, पर पद का प्रत्यक्ष काव्य-आधार रात्रि और मेघ की उपमा है।
श्लोक 9
अर्थ: नील कमल जैसी कण्ठ-शोभा वाले शिव काम, त्रिपुर, भव-बन्धन, दक्षयज्ञ, गजासुर, अन्धक और मृत्यु के दमनकर्ता हैं; मैं उन्हें भजता हूँ। व्याख्या: ‘छिद्’ पदों की शृंखला अनेक पुराकथाएँ एक ताल में बाँधती है। यहाँ दमन की छवि आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थ रखती है।
श्लोक 10
अर्थ: समस्त मंगल की मंजरी के मधुर रस पर मँडराने वाले भ्रमर-तुल्य शिव काम, त्रिपुर, भव, यज्ञ और दैत्यों के संहारक हैं; मैं उनका भजन करता हूँ। व्याख्या: मधुर पुष्प-रस और तीखे संहारक नाम एक दूसरे को संतुलित करते हैं। पिछले श्लोक की आवृत्ति ही लय और भाव का आधार है।
श्लोक 11
अर्थ: सर्प घूमते हैं, ललाटाग्नि दहकती है और मृदंग की ‘धिमिद्धिमि’ ध्वनि शिव के प्रचण्ड ताण्डव को गति देती है; उनकी जय हो। व्याख्या: अनुकरणध्वनि पाठ करते समय ताल का अनुभव कराती है। यह नृत्य की स्तुति है, किसी विशेष मंचीय नृत्य-विधि का पाठ्यक्रम नहीं।
श्लोक 12
अर्थ: कब मैं सदाशिव का ऐसा भजन करूँगा कि पत्थर और शय्या, सर्प और मोती, रत्न और मिट्टी, मित्र और शत्रु, प्रजा और राजा के प्रति समभाव हो? व्याख्या: यहाँ ताण्डव का तेज समता की साधना बन जाता है। समभाव का अर्थ अन्याय के प्रति उदासीन रहना नहीं है।
श्लोक 13
अर्थ: कब मैं दिव्य नदी के वन-आश्रय में निर्मल बुद्धि से हाथ जोड़े ‘शिव’ नाम जपते हुए संतोष पाऊँगा? व्याख्या: विशाल विश्व-वर्णन के बाद कवि साधक का निजी प्रश्न पूछता है। एकांत की यह कामना सबके लिए अनिवार्य जीवन-निर्देश नहीं।
श्लोक 14
अर्थ: दिव्य पुष्पों और सुगन्ध से रूपायित शिव की तेजोमय शोभा दिन-रात हमारे मन में आनंद जगाए। व्याख्या: इस पद के घने समासों और पाठभेदों के कारण पद-पद अनुवाद में सावधानी जरूरी है। यहाँ भावार्थ अस्थायी है, अंतिम शब्दार्थ नहीं।
श्लोक 15
अर्थ: प्रचण्ड तेज, अष्टसिद्धि और शुभ उत्सव-ध्वनि के मध्य ‘शिव’ नाम से विभूषित मंगल-स्वर सर्वत्र विजयी हो। व्याख्या: विवाह-ध्वनि और सिद्धियों वाले समास कठिन हैं; विभिन्न पाठ और अर्थ मिलते हैं। इन्हें अचूक सिद्धि का वादा न समझें।
श्लोक 16
अर्थ: स्तोत्र का समापन बताता है कि उसका स्मरण और पाठ अंतःकरण की शुद्धि तथा शिव-गुरु के प्रति भक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है। व्याख्या: यह फलश्रुति परंपरागत आध्यात्मिक आश्वासन है, वैज्ञानिक गारंटी या अनिवार्य निश्चित जप-संख्या नहीं।