पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

स्तोत्र

मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं)

आठ पदों में श्रीकृष्ण के रूप, वेणु, सखाओं, यमुना और व्रज-जगत की मधुरता का भावपूर्ण गान।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ १ ॥

अर्थ

श्रीकृष्ण के अधर, मुख, नेत्र और हँसी मधुर हैं; उनका हृदय तथा चलना भी मधुर है। मधुरता के स्वामी का समस्त स्वरूप भक्त को मधुर प्रतीत होता है।

व्याख्या

आरम्भ में कवि अधर, मुख, नेत्र और हँसी का स्मरण करता है—ये ऐसे दृश्य रूप हैं जिनसे स्नेह का अनुभव सहज होता है। फिर हृदयम् द्वारा भीतरी भाव और गमनम् द्वारा चलने की शैली को भी उसी माधुर्य में रखता है। मधुर केवल स्वाद का शब्द नहीं, बल्कि प्रिय, मनोहर और स्नेहमय होने का भाव भी है। टेक का आशय यह है कि भक्त को कृष्ण के व्यक्तित्व का कोई पक्ष भक्ति से अलग नहीं दिखाई देता। यहाँ किसी एक मूर्तिरूप को सर्वमान्य या अनिवार्य नहीं बनाया गया है।

2

वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम् । चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ २ ॥

अर्थ

उनके वचन, चरित्र और लीलामय आचरण मधुर हैं। उनके वस्त्र, अंगों की लचक, चाल-ढाल और विचरण भी मधुर हैं; मधुराधिपति का सब कुछ मधुर है।

व्याख्या

इस पद में रूप से आगे बढ़कर वाणी और आचरण की मधुरता दिखाई गई है। वचनम् बोलने का ढंग है और चरितम् आचरण, कार्य तथा स्मरण की जाने वाली लीलाओं तक संकेत कर सकता है। वसनम् वस्त्र हैं; वलितम् मुड़ने, झुकने या अंग-भंगिमा की लचक से सम्बद्ध हो सकता है। चलितम् गति है और भ्रमितम् विचरण का भाव देता है। इन शब्दों की अपनी-अपनी छाया बनाए रखना आवश्यक है। अन्य डिजिटल पाठों में प्रारम्भिक शब्दों का क्रम बदला हुआ है; यहाँ चयनित मुद्रित परम्परा के वर्णित क्रम को रखा गया है।

3

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ । नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ३ ॥

अर्थ

उनकी वेणु, उनसे जुड़ी रज, उनके हाथ और दोनों चरण मधुर हैं। उनका नृत्य और सख्यभाव भी मधुर है; मधुराधिपति का सब कुछ मधुर है।

व्याख्या

वेणु कृष्ण की बाँसुरी है और रेणु व्रज की धूल का स्मरण कराती है। जिस धूल को सामान्यतः तुच्छ माना जाता है, वही प्रेम की दृष्टि से प्रिय बन जाती है। पाणि और पाद का वर्णन नृत्य की देहगत लय से भी जुड़ता है। सख्यम् का अर्थ मित्रता या सखा-सम्बन्ध है; इसमें भक्त और आराध्य के बीच आत्मीय निकटता को स्थान मिलता है। संस्कृत में मधुरो, मधुरौ और मधुरं के रूप लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं, अतः इनको एक ही शब्दरूप बनाकर नहीं लिखना चाहिए। एक डिजिटल पाठ की ‘वेणर्मधुरो’ त्रुटिपूर्ण आकृति को मूल पाठ में नहीं लिया गया है।

4

गीतं मधुरं पीतं मधुरं भक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् । रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ४ ॥

अर्थ

उनका गीत मधुर है; पीतम् के अर्थ में पीना या पीत-वर्ण का संकेत हो सकता है। भक्तम् को भोजन/पके अन्न के अर्थ में लेकर वह भी मधुर कहा गया है। उनका शयन, स्वरूप और तिलक मधुर हैं; मधुराधिपति का सब कुछ मधुर है।

व्याख्या

यहाँ पाठभेद अर्थ को सीधे प्रभावित करता है। चयनित १९२८ संस्करण की रिपोर्ट में भक्तं है, जबकि अनेक लोकप्रिय पाठों में भुक्तं आता है। संस्कृत में भक्तम् पके हुए अन्न/भोजन का अर्थ दे सकता है; भुक्तम् भोगी या खाई गई वस्तु की ओर संकेत करता है। मुद्रित शब्द का अर्थ विशेषज्ञ से जँचवाना होगा, इसलिए उसे बिना टिप्पणी ‘भुक्तम्’ नहीं बनाया गया है। पीतम् के लिए पिया हुआ तथा पीत-वर्ण से जुड़ी व्याख्या में भी सावधानी चाहिए। सुप्तम् का सौंदर्य यह है कि विश्राम जैसा साधारण दृश्य भी भक्त के लिए प्रेम का विषय बन जाता है।

5

करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम् । वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ५ ॥

अर्थ

उनका करना मधुर है और पार उतारने का कार्य भी मधुर है; हरना और रमण करना मधुर है। वमितम् से निकलने/उत्सर्जित होने तथा शमितम् से शान्त करने की क्रिया का भाव व्यक्त होता है; कवि इन सबको मधुर मानता है।

व्याख्या

यह पद शब्दार्थ की दृष्टि से कठिन है। करणम्, तरणम्, हरणम्, रमणम् क्रियाओं से बने भाववाचक रूप हैं, किन्तु कवि प्रत्येक को किसी एक निश्चित कथा से नहीं बाँधता। हरणम् में कृष्ण की माखनचोरी जैसी लीला का स्मरण सम्भव है, पर यही शाब्दिक अर्थ अनिवार्य नहीं। वमितम् का सामान्य अर्थ बाहर निकाला/उत्सर्जित किया हुआ है; उसे मनमाने ढंग से ‘दिया हुआ वरदान’ कहना प्रामाणिक शब्दार्थ नहीं होगा। शमितम् शान्त किए हुए का बोध देता है। कुछ पाठों में रमणम् के स्थान पर स्मरणम् भी मिलता है; इस पाठांतर से भाव बदलता है। इन विशेष शब्दों पर संस्कृत विशेषज्ञ की समीक्षा आवश्यक है।

6

गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीचिर्मधुरा । सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ६ ॥

अर्थ

गुञ्जा के दाने और माला मधुर हैं; यमुना और उसकी तरंगें मधुर हैं। नदी का जल और कमल भी मधुर हैं—मधुरता के स्वामी का समूचा व्रज-परिवेश मधुर है।

व्याख्या

पहले पदों में अधिकतर कृष्ण का स्वरूप और उनकी चेष्टा थी; अब उनके आसपास का व्रज भी माधुर्य से भर जाता है। गुञ्जा रंगीन छोटे बीज हैं जिनका अलंकरण में उल्लेख मिलता है; माला पुष्प या मनकों की माला हो सकती है। यमुना, वीचि, सलिल, कमल मिलकर नदी और तट का दृश्य बनाते हैं। वीचिर्मधुरा संधियुक्त रूप है; कुछ पाठों का वीची मधुरा रूप केवल आधुनिक वर्तनी नहीं, व्याकरण की दृष्टि से भी जाँचना चाहिए। नदी को भक्ति में पवित्र मानना और उसके भौतिक जल की स्वास्थ्य-सुरक्षा का दावा करना अलग बातें हैं।

7

गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं भुक्तं मधुरम् । इष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ७ ॥

अर्थ

गोपी मधुर हैं और श्रीकृष्ण की लीला मधुर है। युक्तम् से जुड़े/मिले हुए, भुक्तम् से भोगे हुए, इष्टम् से प्रिय और शिष्टम् से सुसंस्कृत या मर्यादित भाव का संकेत है; कवि इन सबको मधुर कहता है।

व्याख्या

सातवाँ पद पाठ-निर्धारण के लिए सबसे संवेदनशील है। रिपोर्ट किए गए १९२८ मुद्रित पाठ में युक्तं/भुक्तं और इष्टं/शिष्टं है। संस्कृत-डॉक्यूमेंट्स में युक्तं/मुक्तं, दृष्टं/शिष्टं मिलता है, जबकि विकिस्रोत के एक परिवर्तनीय पाठ में राधा मधुरा मिलनं मधुरम् पंक्ति है। ये भिन्न पाठ हैं—इन्हें जोड़कर नया श्लोक बनाना ठीक नहीं होगा। गोपी व्रज की सखी और लीला ईश्वर की खेलमयी गतिविधि है। इन प्रसंगों को भक्ति के सम्बन्धों की अनेकता में समझना चाहिए; हर निकटता को केवल लौकिक प्रेम कहना आवश्यक नहीं। इष्टम् और शिष्टम् की अर्थ-छटा विशेषज्ञ से जँचनी है।

8

गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा । दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ८ ॥

अर्थ

ग्वाले और गायें मधुर हैं; चराने की लाठी और सृष्टि मधुर हैं। दलितम् से टूटे/कुचले हुए और फलितम् से फल पाने या फलित होने के भाव का संकेत है; भक्त के लिए मधुराधिपति से जुड़ी सब वस्तुएँ मधुर हैं।

व्याख्या

अन्तिम पद में व्रज का ग्रामीण जीवन पूर्ण रूप से उपस्थित है। गोपा ग्वाले हैं, गावः गायें और यष्टि गायें चराने की लाठी है। सृष्टि शब्द दृश्य को पूरे जगत तक फैलाता है। दलितम्/फलितम् की जोड़ी टूटने या दबने और फलित होने का काव्यात्मक विरोध रचती है। इसे किसी की हानि को नैतिक रूप से उचित ठहराने की आज्ञा नहीं पढ़ना चाहिए। आरम्भ के अधर से अन्तिम सृष्टि तक, हर पद की टेक भक्त की प्रेम-दृष्टि को एक सूत्र में बाँधती है। चयनित पाठ में इसके बाद कोई नौवाँ श्लोक या अनिवार्य फलश्रुति नहीं है।

9
विषय-सूची पर लौटें

इति श्रीवल्लभाचार्यविरचितं मधुराष्टकं समाप्तम् ॥

अर्थ

इस समापन-वाक्य के अनुसार श्रीवल्लभाचार्य-विरचित मधुराष्टक यहाँ समाप्त होता है।

व्याख्या

यह समापन-पंक्ति है, नौवाँ स्तोत्र-पद नहीं। इससे उस संस्करण की रचयिता-परम्परा ज्ञात होती है; केवल कोलॉफन से ऐतिहासिक लेखकत्व स्वतः सिद्ध नहीं होता। संस्कृत-डॉक्यूमेंट्स में समापन के लिए सम्पूर्णम् मिलता है।

सन्दर्भ और उपयोग

संस्करण-सूचना: १९२८ के पुष्टिमार्गीयस्तोत्ररत्नाकर से सम्बद्ध रिपोर्ट किए गए आठ-पदीय पाठ का प्रारूप। मूल स्कैन के पृष्ठों का इस कार्य में स्वतन्त्र प्रत्यक्ष मिलान नहीं हो पाया; पाठभेद, शब्दार्थ और अधिकार-स्वीकृति की जाँच शेष है। 1 2

मधुराष्टक का परिचय

मधुर शब्द का अर्थ केवल मीठा स्वाद नहीं, बल्कि प्रिय, मनोहर और स्नेह से भरा हुआ भी है। बार-बार आने वाली टेक “मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्” कहती है कि मधुरता के अधिपति श्रीकृष्ण का सब कुछ भक्त को प्रिय लगता है। पहले अधर और मुस्कान, फिर वाणी, वेणु, यमुना, गोप-गोपी, गायें और अन्त में सृष्टि तक—स्तुति का विस्तार होता जाता है। यह प्रेम-दृष्टि की कविता है, भौतिक वस्तुओं की मिठास या हर परिस्थिति के सुखद होने का तथ्यात्मक दावा नहीं। 1 2

पुष्टिमार्ग के संदर्भ में, जो श्रीवल्लभाचार्य की परम्परा से जुड़ा है, कृष्ण की कृपा, सेवा और लीला के प्रति आत्मीयता को महत्त्व मिलता है। इसलिए धूल, माला, बाँसुरी, शयन और चरवाहे की लाठी जैसे छोटे-से दृश्य भी भक्त के लिए रसपूर्ण बनते हैं। स्तोत्र का अध्ययन करना किसी विशिष्ट दीक्षा या कर्मकाण्ड को स्वतः ग्रहण करना नहीं है। 6

समापन — समापन-पंक्ति (नौवाँ श्लोक नहीं)

सरल अर्थ: इस समापन-वाक्य के अनुसार श्रीवल्लभाचार्य-विरचित मधुराष्टक यहाँ समाप्त होता है। व्याख्या: यह समापन-पंक्ति है, नौवाँ स्तोत्र-पद नहीं। इससे उस संस्करण की रचयिता-परम्परा ज्ञात होती है; केवल कोलॉफन से ऐतिहासिक लेखकत्व स्वतः सिद्ध नहीं होता। संस्कृत-डॉक्यूमेंट्स में समापन के लिए सम्पूर्णम् मिलता है। पाठ-टिप्पणी: समाप्तम् / सम्पूर्णम्। ये अलग साक्ष्यों के पाठ हैं; मूल चयनित पंक्ति में मिश्रित नहीं किए गए हैं।

मुख्य शब्दों को समझें

  • मधुर: प्रिय, मधुर, मनोहर या स्नेहमय।
  • मधुराधिपति: मधुरता के अधिपति; इस स्तोत्र में श्रीकृष्ण।
  • लीला: भक्तिपरम्परा में ईश्वर की खेलमयी चेष्टा।
  • सख्य: मित्रवत् आत्मीय सम्बन्ध।
  • रेणु: धूल; व्रज में कृष्ण के चरणों और विचरण की स्मृति से जुड़ी।
  • गुञ्जा: अलंकार के लिए प्रयुक्त छोटे रंगीन बीज।
  • भक्तम् / भुक्तम्: चौथे श्लोक का महत्त्वपूर्ण पाठभेद; बिना स्रोत-जाँच एक को दूसरे में नहीं बदलना चाहिए।

अलग-अलग पुस्तकों और पाठों में भिन्न शब्द क्यों मिलते हैं? आठ पदों की मुख्य सीमा अधिकांश स्रोतों में मिलती है, लेकिन शब्दों में भेद हैं। रिपोर्ट किए गए १९२८ पाठ में चौथे पद पर भक्तं, सातवें पर भुक्तं और इष्टं मिलता है। संस्कृत-डॉक्यूमेंट्स में इनके स्थान पर भुक्तं, मुक्तं और दृष्टं हैं। संस्कृत विकिस्रोत के एक पाठ में सातवें पद की राधा मधुरा मिलनं मधुरम् पंक्ति भी आती है। पाँचवें श्लोक में रमणं / स्मरणं का भेद भी ज्ञात है 7। किसी पाठ को दूसरे में चुपचाप मिलाना प्रमाणिक सम्पादन नहीं होगा। यहाँ अलग फलश्रुति या नवाँ पद नहीं जोड़ा गया है। 2 3 4

सामान्य प्रश्न

क्या मधुराष्टकम् आरती है? नहीं। यह आठ श्लोकों का संस्कृत स्तोत्र है। आरती कुञ्जबिहारी की एक अलग रचना है। हिन्दी पृष्ठ में मूल संस्कृत कहाँ है? सबसे ऊपर संपूर्ण देवनागरी पाठ है; उसके बाद हिन्दी अर्थ और व्याख्या अलग हैं। अंग्रेज़ी पृष्ठ में इन्हीं मूल शब्दों का IAST रोमन रूप दिया गया है। ‘भक्तं’ और ‘भुक्तं’ में कौन-सा सही है? इस प्रारूप का चयन रिपोर्ट किए गए १९२८ मुद्रित पाठ के अनुसार है। अन्य प्रचलित पाठ में ‘भुक्तं’ है; स्वतन्त्र मुद्रित-पृष्ठ जाँच और संस्कृत समीक्षा से पहले अंतिम निर्णय नहीं मानना चाहिए। नौवाँ श्लोक या कोई फलश्रुति क्यों नहीं? चयनित रचना में आठ श्लोक हैं। नीचे की समापन-पंक्ति कोलॉफन है, नौवाँ छन्द नहीं। क्या पुष्टिमार्ग की दीक्षा लेकर ही पाठ पढ़ सकते हैं? साहित्यिक अध्ययन के लिए ऐसी शर्त यहाँ नहीं रखी गई है। सम्प्रदाय की विशिष्ट साधना और दीक्षा की परम्पराएँ इस शैक्षिक पाठ से अलग विषय हैं। क्या रचयिता का नाम निश्चित है? वल्लभाचार्य के नाम से परम्परागत श्रेय मिलता है, लेकिन केवल समापन-वाक्य से ऐतिहासिक लेखकत्व स्वतः सिद्ध नहीं होता।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    adharaṃ madhuraṃ vadanaṃ madhuraṃ nayanaṃ madhuraṃ hasitaṃ madhuram | hṛdayaṃ madhuraṃ gamanaṃ madhuraṃ madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 1 ||

  2. 2

    vacanaṃ madhuraṃ caritaṃ madhuraṃ vasanaṃ madhuraṃ valitaṃ madhuram | calitaṃ madhuraṃ bhramitaṃ madhuraṃ madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 2 ||

  3. 3

    veṇurmadhuro reṇurmadhuraḥ pāṇirmadhuraḥ pādau madhurau | nṛtyaṃ madhuraṃ sakhyaṃ madhuraṃ madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 3 ||

  4. 4

    gītaṃ madhuraṃ pītaṃ madhuraṃ bhaktaṃ madhuraṃ suptaṃ madhuram | rūpaṃ madhuraṃ tilakaṃ madhuraṃ madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 4 ||

  5. 5

    karaṇaṃ madhuraṃ taraṇaṃ madhuraṃ haraṇaṃ madhuraṃ ramaṇaṃ madhuram | vamitaṃ madhuraṃ śamitaṃ madhuraṃ madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 5 ||

  6. 6

    guñjā madhurā mālā madhurā yamunā madhurā vīcirmadhurā | salilaṃ madhuraṃ kamalaṃ madhuraṃ madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 6 ||

  7. 7

    gopī madhurā līlā madhurā yuktaṃ madhuraṃ bhuktaṃ madhuram | iṣṭaṃ madhuraṃ śiṣṭaṃ madhuram madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 7 ||

  8. 8

    gopā madhurā gāvo madhurā yaṣṭirmadhurā sṛṣṭirmadhurā | dalitaṃ madhuraṃ phalitaṃ madhuram madhurādhipaterakhilaṃ madhuram || 8 ||

  9. 9

    iti śrīvallabhācāryaviracitaṃ madhurāṣṭakaṃ samāptam ||

स्रोत, संस्करण और रचयिता

चयनित प्रारूप का आधार श्री हरिशंकर शास्त्री सम्पादित पुष्टिमार्गीयस्तोत्ररत्नाकर का बनारस में प्रकाशित १९२८ संस्करण है। एक स्रोत-संबद्ध डिजिटल पाठ इस स्तोत्र को मद १८, मुद्रित पृष्ठ ५५–५७ तथा स्कैन के पृष्ठ ६६–६८ पर रखता है। पुस्तक का अभिलेख मिला है, पर मूल स्कैन-पृष्ठों का प्रत्यक्ष मिलान नहीं हो सका, इसलिए पूर्ण आठ पद उपस्थित होने पर भी पाठ-सत्यापन आंशिक है। 1 2

परम्परा में रचयिता श्रीवल्लभाचार्य माने जाते हैं। समापन-पंक्ति और कुछ पाण्डुलिपि-सूची प्रविष्टियाँ भी यह नाम देती हैं, किन्तु सम्पादकीय दृष्टि से इन्हें रचनाकाल का निर्विवाद ऐतिहासिक प्रमाण नहीं कहा जा सकता। 5

स्रोत एवं सम्पादकीय सावधानियाँ

1 १९२८ ऐतिहासिक संस्करण का अभिलेख; 2 उससे जुड़ा आधुनिक पाठ और पाठभेद; 3 संस्कृत-डॉक्यूमेंट्स; 4 संस्कृत विकिस्रोत; 5 इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की पाण्डुलिपि-सूची; 6 पुष्टिमार्ग का सन्दर्भ; 7 पाँचवें श्लोक का वैकल्पिक पाठ। मूल URL, विधिक स्थिति, पाठभेद और प्रकाशन-सीमाओं के लिए स्रोत-सूची देखें।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1 — मुख, मुस्कान और हृदय की मधुरता

सरल अर्थ: श्रीकृष्ण के अधर, मुख, नेत्र और हँसी मधुर हैं; उनका हृदय तथा चलना भी मधुर है। मधुरता के स्वामी का समस्त स्वरूप भक्त को मधुर प्रतीत होता है। व्याख्या: आरम्भ में कवि अधर, मुख, नेत्र और हँसी का स्मरण करता है—ये ऐसे दृश्य रूप हैं जिनसे स्नेह का अनुभव सहज होता है। फिर हृदयम् द्वारा भीतरी भाव और गमनम् द्वारा चलने की शैली को भी उसी माधुर्य में रखता है। मधुर केवल स्वाद का शब्द नहीं, बल्कि प्रिय, मनोहर और स्नेहमय होने का भाव भी है। टेक का आशय यह है कि भक्त को कृष्ण के व्यक्तित्व का कोई पक्ष भक्ति से अलग नहीं दिखाई देता। यहाँ किसी एक मूर्तिरूप को सर्वमान्य या अनिवार्य नहीं बनाया गया है।

श्लोक 2 — वाणी, आचरण और चेष्टा

सरल अर्थ: उनके वचन, चरित्र और लीलामय आचरण मधुर हैं। उनके वस्त्र, अंगों की लचक, चाल-ढाल और विचरण भी मधुर हैं; मधुराधिपति का सब कुछ मधुर है। व्याख्या: इस पद में रूप से आगे बढ़कर वाणी और आचरण की मधुरता दिखाई गई है। वचनम् बोलने का ढंग है और चरितम् आचरण, कार्य तथा स्मरण की जाने वाली लीलाओं तक संकेत कर सकता है। वसनम् वस्त्र हैं; वलितम् मुड़ने, झुकने या अंग-भंगिमा की लचक से सम्बद्ध हो सकता है। चलितम् गति है और भ्रमितम् विचरण का भाव देता है। इन शब्दों की अपनी-अपनी छाया बनाए रखना आवश्यक है। अन्य डिजिटल पाठों में प्रारम्भिक शब्दों का क्रम बदला हुआ है; यहाँ चयनित मुद्रित परम्परा के वर्णित क्रम को रखा गया है। पाठ-टिप्पणी: वचनं ... चरितं ... वसनं / वसनं ... चरितं ... वचनं। ये अलग साक्ष्यों के पाठ हैं; मूल चयनित पंक्ति में मिश्रित नहीं किए गए हैं।

श्लोक 3 — बाँसुरी, रज, नृत्य और सख्यभाव

सरल अर्थ: उनकी वेणु, उनसे जुड़ी रज, उनके हाथ और दोनों चरण मधुर हैं। उनका नृत्य और सख्यभाव भी मधुर है; मधुराधिपति का सब कुछ मधुर है। व्याख्या: वेणु कृष्ण की बाँसुरी है और रेणु व्रज की धूल का स्मरण कराती है। जिस धूल को सामान्यतः तुच्छ माना जाता है, वही प्रेम की दृष्टि से प्रिय बन जाती है। पाणि और पाद का वर्णन नृत्य की देहगत लय से भी जुड़ता है। सख्यम् का अर्थ मित्रता या सखा-सम्बन्ध है; इसमें भक्त और आराध्य के बीच आत्मीय निकटता को स्थान मिलता है। संस्कृत में मधुरो, मधुरौ और मधुरं के रूप लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं, अतः इनको एक ही शब्दरूप बनाकर नहीं लिखना चाहिए। एक डिजिटल पाठ की ‘वेणर्मधुरो’ त्रुटिपूर्ण आकृति को मूल पाठ में नहीं लिया गया है। पाठ-टिप्पणी: वेणुर्मधुरो / वेणर्मधुरो। ये अलग साक्ष्यों के पाठ हैं; मूल चयनित पंक्ति में मिश्रित नहीं किए गए हैं।

श्लोक 4 — गान, भोजन, विश्राम, रूप और तिलक

सरल अर्थ: उनका गीत मधुर है; पीतम् के अर्थ में पीना या पीत-वर्ण का संकेत हो सकता है। भक्तम् को भोजन/पके अन्न के अर्थ में लेकर वह भी मधुर कहा गया है। उनका शयन, स्वरूप और तिलक मधुर हैं; मधुराधिपति का सब कुछ मधुर है। व्याख्या: यहाँ पाठभेद अर्थ को सीधे प्रभावित करता है। चयनित १९२८ संस्करण की रिपोर्ट में भक्तं है, जबकि अनेक लोकप्रिय पाठों में भुक्तं आता है। संस्कृत में भक्तम् पके हुए अन्न/भोजन का अर्थ दे सकता है; भुक्तम् भोगी या खाई गई वस्तु की ओर संकेत करता है। मुद्रित शब्द का अर्थ विशेषज्ञ से जँचवाना होगा, इसलिए उसे बिना टिप्पणी ‘भुक्तम्’ नहीं बनाया गया है। पीतम् के लिए पिया हुआ तथा पीत-वर्ण से जुड़ी व्याख्या में भी सावधानी चाहिए। सुप्तम् का सौंदर्य यह है कि विश्राम जैसा साधारण दृश्य भी भक्त के लिए प्रेम का विषय बन जाता है। पाठ-टिप्पणी: भक्तं मधुरं / भुक्तं मधुरं। ये अलग साक्ष्यों के पाठ हैं; मूल चयनित पंक्ति में मिश्रित नहीं किए गए हैं।

श्लोक 5 — कर्म, तारना, हरना, रमण और शमन

सरल अर्थ: उनका करना मधुर है और पार उतारने का कार्य भी मधुर है; हरना और रमण करना मधुर है। वमितम् से निकलने/उत्सर्जित होने तथा शमितम् से शान्त करने की क्रिया का भाव व्यक्त होता है; कवि इन सबको मधुर मानता है। व्याख्या: यह पद शब्दार्थ की दृष्टि से कठिन है। करणम्, तरणम्, हरणम्, रमणम् क्रियाओं से बने भाववाचक रूप हैं, किन्तु कवि प्रत्येक को किसी एक निश्चित कथा से नहीं बाँधता। हरणम् में कृष्ण की माखनचोरी जैसी लीला का स्मरण सम्भव है, पर यही शाब्दिक अर्थ अनिवार्य नहीं। वमितम् का सामान्य अर्थ बाहर निकाला/उत्सर्जित किया हुआ है; उसे मनमाने ढंग से ‘दिया हुआ वरदान’ कहना प्रामाणिक शब्दार्थ नहीं होगा। शमितम् शान्त किए हुए का बोध देता है। कुछ पाठों में रमणम् के स्थान पर स्मरणम् भी मिलता है; इस पाठांतर से भाव बदलता है। इन विशेष शब्दों पर संस्कृत विशेषज्ञ की समीक्षा आवश्यक है। पाठ-टिप्पणी: रमणं / स्मरणं। ये अलग साक्ष्यों के पाठ हैं; मूल चयनित पंक्ति में मिश्रित नहीं किए गए हैं।

श्लोक 6 — गुञ्जा, माला और यमुना का परिवेश

सरल अर्थ: गुञ्जा के दाने और माला मधुर हैं; यमुना और उसकी तरंगें मधुर हैं। नदी का जल और कमल भी मधुर हैं—मधुरता के स्वामी का समूचा व्रज-परिवेश मधुर है। व्याख्या: पहले पदों में अधिकतर कृष्ण का स्वरूप और उनकी चेष्टा थी; अब उनके आसपास का व्रज भी माधुर्य से भर जाता है। गुञ्जा रंगीन छोटे बीज हैं जिनका अलंकरण में उल्लेख मिलता है; माला पुष्प या मनकों की माला हो सकती है। यमुना, वीचि, सलिल, कमल मिलकर नदी और तट का दृश्य बनाते हैं। वीचिर्मधुरा संधियुक्त रूप है; कुछ पाठों का वीची मधुरा रूप केवल आधुनिक वर्तनी नहीं, व्याकरण की दृष्टि से भी जाँचना चाहिए। नदी को भक्ति में पवित्र मानना और उसके भौतिक जल की स्वास्थ्य-सुरक्षा का दावा करना अलग बातें हैं। पाठ-टिप्पणी: वीचिर्मधुरा / वीची मधुरा। ये अलग साक्ष्यों के पाठ हैं; मूल चयनित पंक्ति में मिश्रित नहीं किए गए हैं।

श्लोक 7 — गोपी, लीला, मिलन, भोग और प्रिय वस्तु

सरल अर्थ: गोपी मधुर हैं और श्रीकृष्ण की लीला मधुर है। युक्तम् से जुड़े/मिले हुए, भुक्तम् से भोगे हुए, इष्टम् से प्रिय और शिष्टम् से सुसंस्कृत या मर्यादित भाव का संकेत है; कवि इन सबको मधुर कहता है। व्याख्या: सातवाँ पद पाठ-निर्धारण के लिए सबसे संवेदनशील है। रिपोर्ट किए गए १९२८ मुद्रित पाठ में युक्तं/भुक्तं और इष्टं/शिष्टं है। संस्कृत-डॉक्यूमेंट्स में युक्तं/मुक्तं, दृष्टं/शिष्टं मिलता है, जबकि विकिस्रोत के एक परिवर्तनीय पाठ में राधा मधुरा मिलनं मधुरम् पंक्ति है। ये भिन्न पाठ हैं—इन्हें जोड़कर नया श्लोक बनाना ठीक नहीं होगा। गोपी व्रज की सखी और लीला ईश्वर की खेलमयी गतिविधि है। इन प्रसंगों को भक्ति के सम्बन्धों की अनेकता में समझना चाहिए; हर निकटता को केवल लौकिक प्रेम कहना आवश्यक नहीं। इष्टम् और शिष्टम् की अर्थ-छटा विशेषज्ञ से जँचनी है। पाठ-टिप्पणी: युक्तं मधुरं भुक्तं मधुरम् / युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम्; युक्तं मधुरं भुक्तं मधुरम् / राधा मधुरा मिलनं मधुरम्; इष्टं मधुरं / दृष्टं मधुरं। ये अलग साक्ष्यों के पाठ हैं; मूल चयनित पंक्ति में मिश्रित नहीं किए गए हैं।

श्लोक 8 — ग्वाले, गायें, यष्टि और फलित होने वाला जगत

सरल अर्थ: ग्वाले और गायें मधुर हैं; चराने की लाठी और सृष्टि मधुर हैं। दलितम् से टूटे/कुचले हुए और फलितम् से फल पाने या फलित होने के भाव का संकेत है; भक्त के लिए मधुराधिपति से जुड़ी सब वस्तुएँ मधुर हैं। व्याख्या: अन्तिम पद में व्रज का ग्रामीण जीवन पूर्ण रूप से उपस्थित है। गोपा ग्वाले हैं, गावः गायें और यष्टि गायें चराने की लाठी है। सृष्टि शब्द दृश्य को पूरे जगत तक फैलाता है। दलितम्/फलितम् की जोड़ी टूटने या दबने और फलित होने का काव्यात्मक विरोध रचती है। इसे किसी की हानि को नैतिक रूप से उचित ठहराने की आज्ञा नहीं पढ़ना चाहिए। आरम्भ के अधर से अन्तिम सृष्टि तक, हर पद की टेक भक्त की प्रेम-दृष्टि को एक सूत्र में बाँधती है। चयनित पाठ में इसके बाद कोई नौवाँ श्लोक या अनिवार्य फलश्रुति नहीं है।

  1. Puṣṭimārgīya Stotraratnākara (1928), edited by Hariśaṅkara Śāstrī · स्रोत खोलें
  2. Madhurashtakam — historical-print checked transcription and variant apparatus · स्रोत खोलें
  3. madhurAShTakaM (madhurst.itx) · स्रोत खोलें
  4. मधुराष्टकम् — Sanskrit Wikisource · स्रोत खोलें
  5. Stotra — Volume 5, Part 4 (manuscript title index) · स्रोत खोलें
  6. Pushti Marg — Encyclopedia of Hinduism entry, reported J. G. Lochtefeld · स्रोत खोलें
  7. Madhurashtakam (alternate popular recitation) · स्रोत खोलें
  8. MadhurAShTakaM with meanings (madhunew.itx) · स्रोत खोलें