पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

स्तोत्र

विष्णुसहस्रनाम: महाभारत का १४२-श्लोक पाठ और अर्थ

भीष्म युधिष्ठिर को विष्णु के सहस्र नामों की स्तुति सुनाते हैं; भूमिका धर्म-प्रश्न और अंत में फलश्रुति है।

पठन की सेटिंग

सेटिंग इस पृष्ठ के URL में रहती है और पिछले या अगले अध्याय में भी लागू होती है। इसे सहेजने के लिए URL बुकमार्क करें। देवनागरी का विशेष पठन फ़ॉन्ट बना रहेगा।

सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः। युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत॥१॥

अर्थ

वैशम्पायन बताते हैं कि धर्म के अनेक उपदेश सुनने के बाद युधिष्ठिर भीष्म से पुनः पूछते हैं.

व्याख्या

आरम्भ बताता है कि यह केवल शब्द-सूची नहीं, धर्म-विमर्श में कही गई स्तुति है.

2

किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्। स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥२॥

अर्थ

युधिष्ठिर पूछते हैं कि एक परम देवता और श्रेष्ठ आश्रय कौन हैं, जिनकी स्तुति-आराधना से मंगल हो.

व्याख्या

परंपरागत छह प्रश्न यहाँ आरम्भ होते हैं; वे तत्त्व-विचार के साथ उपासना का आधार भी पूछते हैं.

3

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः। किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥३॥

अर्थ

वे पूछते हैं कि श्रेष्ठ धर्म क्या है और किस नाम-स्मरण से जन्म-संसार के बंधन से मुक्ति समझी जाती है.

व्याख्या

यहाँ जप और मुक्ति प्रश्न के रूप में आए हैं, सबके लिए एक जैसी विधि के आदेश के रूप में नहीं.

4

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्। स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥४॥

अर्थ

भीष्म उत्तर देते हैं कि जागरूक मनुष्य जगत् के अनन्त पुरुषोत्तम की सहस्र नामों से स्तुति करे.

व्याख्या

भीष्म के उत्तर में विष्णु इस विशेष स्तोत्र के उपास्य रूप में स्थापित हैं.

5

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्। ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च॥५॥

अर्थ

वे अविनाशी पुरुष की भक्ति में ध्यान, स्तुति, प्रणाम और आराधना का उल्लेख करते हैं.

व्याख्या

ये भक्ति के रूप हैं; यह लेख किसी विशिष्ट कर्मकाण्ड की विधि नहीं दे रहा.

6

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्। लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत्॥६॥

अर्थ

अनादि विष्णु, समस्त लोकों के अधीश्वर की स्तुति को दुःख से ऊपर उठने का साधन बताया गया है.

व्याख्या

दुःख से परे जाने की बात भक्तिपरक प्रतिज्ञा है, तत्काल चिकित्सकीय परिणाम नहीं.

7

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्। लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम्॥७॥

अर्थ

विष्णु को धर्मज्ञ, लोकनाथ और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का मूल बताया गया है.

व्याख्या

‘सर्वभूतभवोद्भव’ धर्म-विचार को व्यापक जगत्-दृष्टि से जोड़ता है.

8

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः। यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा॥८॥

अर्थ

भीष्म अपनी इस शिक्षा में पुण्डरीकाक्ष विष्णु की भक्तिपूर्वक स्तुति को श्रेष्ठ धर्म कहते हैं.

व्याख्या

यह महाभारत के इस वक्ता का मत है; अन्य हिन्दू परंपराओं के धर्म-विवेचन अलग हो सकते हैं.

9

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः। परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम्॥९॥

अर्थ

वे परम तेज, परम तप, महद्ब्रह्म और अंतिम आश्रय के रूप में स्तुत हैं.

व्याख्या

ये सर्वोच्चता-सूचक पद आगे आने वाली नामावली की भूमिका बनाते हैं.

10
विषय-सूची पर लौटें

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम्। दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता॥१०॥

अर्थ

वे पवित्रों में पवित्र, मंगलों में मंगल और प्राणियों के अविनाशी पिता कहे गए हैं.

व्याख्या

‘पिता’ शब्द इस दर्शन में उत्पत्ति और संरक्षण का भाव है, जैविक पितृत्व नहीं.

11

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे। यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये॥११॥

अर्थ

युग के आरम्भ में प्राणी उन्हीं से उत्पन्न और युगान्त पर उन्हीं में लीन बताए गए हैं.

व्याख्या

उत्पत्ति और प्रलय चक्रीय धार्मिक ब्रह्माण्ड-विचार में रखे गए हैं.

12

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते। विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम्॥१२॥

अर्थ

भीष्म युधिष्ठिर से जगन्नाथ विष्णु के सहस्र नाम सुनने को कहते हैं.

व्याख्या

यहीं संवादात्मक भूमिका समाप्त होकर मूल नाम-श्लोकों का आरम्भ होता है.

13

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः। ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये॥१३॥

अर्थ

वे ऋषियों द्वारा गाए गए प्रसिद्ध गुणनाम कल्याणार्थ कहने का संकल्प करते हैं.

व्याख्या

‘गौण नाम’ गुणों पर आधारित हैं; समास-विच्छेद और आवृत्ति से नाम-गणना प्रभावित हो सकती है.

14

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः। भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥१॥

अर्थ

सम्पूर्ण विश्व विष्णु का नाम है; वे सृष्टि के कर्ता, धारक, अन्तर्यामी और तीनों कालों के अधीश्वर कहे गए हैं.

व्याख्या

आरम्भ के नाम दिखाई देने वाले जगत् से सब प्राणियों के आधार तक जाते हैं; ‘वषट्कार’ यज्ञ में प्रयुक्त ध्वनि की ओर संकेत करता है.

15

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः। अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च॥२॥

अर्थ

पूतात्मा और परमात्मा निर्मल, अविनाशी साक्षी तथा शरीर-क्षेत्र के ज्ञाता और मुक्तों की परम गति हैं.

व्याख्या

‘क्षेत्रज्ञ’ दार्शनिक पद है; सभी सम्प्रदाय जीव और परमात्मा का संबंध एक ही तरह नहीं समझाते.

16

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः। नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः॥३॥

अर्थ

वे योग, योगियों के नायक, प्रकृति-पुरुष के ईश्वर और नरसिंह एवं केशव नामों से वंदित हैं.

व्याख्या

यहाँ दार्शनिक नामों के साथ अवतार-रूप भी है; इसे एक ही भौतिक रूप का वर्णन न मानें.

17

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः। संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः॥४॥

अर्थ

वे सर्वव्यापी, कल्याणस्वरूप, अचल आधार, जीवों के मूल, पालनकर्ता और ईश्वर हैं.

व्याख्या

‘शिव’ और ‘शर्व’ शैव ग्रंथों में भी आते हैं; नाम-साम्य का आदर करें, सम्प्रदायों के भेद मिटाने का आग्रह नहीं.

18

स्वयंभूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः। अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः॥५॥

अर्थ

स्वयंभू, शम्भु और आदित्य जैसे नाम उन्हें अनादि, अनन्त और विश्व-व्यवस्था का आधार बताते हैं.

व्याख्या

‘धाता’ और ‘विधाता’ धारण तथा व्यवस्था के प्रतीक हैं, सृष्टि की वैज्ञानिक प्रक्रिया का विवरण नहीं.

19

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः। विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः॥६॥

अर्थ

अप्रमेय हृषीकेश, पद्मनाभ, विश्वकर्मा और ध्रुव के रूप में वे जगत् के नियामक और स्थिर आधार हैं.

व्याख्या

‘हृषीकेश’ का अर्थ इन्द्रियों का स्वामी समझा जाता है; विश्वकर्मा नाम सृष्टि-रचना की प्रतीकात्मक भाषा है.

20
विषय-सूची पर लौटें

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः। प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्॥७॥

अर्थ

अग्राह्य, शाश्वत, कृष्ण और परम मंगल के नाम ईश्वर की अगोचरता और कल्याणकारी स्वरूप को कहते हैं.

व्याख्या

वर्ण और दिशाओं के संकेत काव्यात्मक हैं; किसी एक चित्र में इन सभी अर्थों को सीमित न करें.

21

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः। हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः॥८॥

अर्थ

प्राणदाता, स्वयं प्राण, श्रेष्ठ, हिरण्यगर्भ, माधव और मधुसूदन—इन नामों में जीवन और धर्मरक्षा का स्वर है.

व्याख्या

‘मधुसूदन’ दैत्य-वध की कथा से और ‘हिरण्यगर्भ’ सृष्टितत्त्व से जुड़ा है; दोनों अर्थ अलग स्तर के हैं.

22

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः। अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥९॥

अर्थ

ईश्वर, धनुर्धर, मेधावी, अनुत्तम और कृतज्ञ के नाम सामर्थ्य के साथ विवेक और उपकार-स्मृति जोड़ते हैं.

व्याख्या

यहाँ केवल शक्ति की नहीं, विवेक और किए गए सत्कर्म की पहचान की भी स्तुति है.

23

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः। अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः॥१०॥

अर्थ

सुरेश, शरण, शर्म, विश्वरेता, अहः और संवत्सर—वे आश्रय तथा समय की व्यवस्था से जुड़े हैं.

व्याख्या

काल-संबंधी नाम देवता की स्तुति को जीवन के दिन-वर्ष के अनुभव से जोड़ते हैं.

24

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः। वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः॥११॥

अर्थ

अज, अच्युत और सर्वेश्वर के नाम अजन्मा, अविचल आधार तथा योग से परे व्यापक सत्ता को दर्शाते हैं.

व्याख्या

‘अच्युत’ अपने स्वरूप से न च्युत होने वाला है; भक्त के जीवन में हर कठिनाई मिटने का वादा नहीं.

25

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः। अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः॥१२॥

अर्थ

वसु, वसुमना, सत्य, सम और पुण्डरीकाक्ष के नाम संपदा, उदारता, सत्य और समभाव को जोड़ते हैं.

व्याख्या

बार-बार आने वाले ‘वृष’ पद धर्म और सामर्थ्य की ओर संकेत करते हैं; हर बार एक ही सरल अर्थ पर्याप्त नहीं.

26

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः। अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः॥१३॥

अर्थ

रुद्र, बहुशिरा, विश्वयोनि, अमृत और महातपा के नाम व्यापकता, अमरता और तप का बोध देते हैं.

व्याख्या

स्तोत्र दूसरे हिन्दू परम्पराओं के नाम भी लेता है, किंतु यहाँ उनका संदर्भ विष्णु-स्तुति है.

27

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः। वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः॥१४॥

अर्थ

सर्वग, सर्वविद्, जनार्दन और वेद-वेदाङ्ग से जुड़े नाम सर्वव्यापक ज्ञान को व्यक्त करते हैं.

व्याख्या

यहाँ ‘वेद’ ज्ञान और ईश-नाम दोनों है; इसे मनुष्य के हर तथ्य के प्रायोगिक ज्ञान का कथन न समझें.

28

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः। चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः॥१५॥

अर्थ

लोकाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, चतुरात्मा, चतुर्व्यूह और चतुर्भुज—ये विविध प्रकट रूपों के नाम हैं.

व्याख्या

‘चतुर्व्यूह’ वैष्णव दर्शन में विशेष अर्थ रखता है; संप्रदायानुसार विवेचन अलग हो सकता है.

29

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः। अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः॥१६॥

अर्थ

भ्राजिष्णु, भोजन, भोक्ता, सहिष्णु, विजय और पुनर्वसु के नाम पोषण तथा पुनर्नवीकरण का भाव रखते हैं.

व्याख्या

‘भोजन’ और ‘भोक्ता’ को साथ रखकर परस्पर निर्भरता बताई गई है; यह भोजन-पद्धति का निर्देश नहीं.

30
विषय-सूची पर लौटें

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः। अतीन्द्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः॥१७॥

अर्थ

उपेन्द्र, वामन, अमोघ, शुचि, नियम और यम के नाम अवतार तथा संयम का संगम हैं.

व्याख्या

‘वामन’ अवतार-कथा से और ‘नियम-यम’ आचरण से जुड़े हैं; इनके अर्थों को अलग पहचानें.

31

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः। अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥१८॥

अर्थ

वेद्य, वैद्य, सदायोगी, अतीन्द्रिय, महाबल के नाम ज्ञेयता, आरोग्य-रूपक और शक्ति का बोध देते हैं.

व्याख्या

‘वैद्य’ जैसे शब्द आरोग्य-रूपक हैं; स्तोत्र पढ़ना किसी रोग के उपचार का प्रमाण नहीं.

32

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः। अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक्॥१९॥

अर्थ

महाबुद्धि, महावीर्य, महाशक्ति, महाद्युति और अनिर्देश्यवपु—वे शब्दों के परे महिमा दर्शाते हैं.

व्याख्या

बार-बार ‘महा’ आने से महिमा का प्रभाव बढ़ता है; इसे संख्यात्मक माप की तरह न लें.

33

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः। अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः॥२०॥

अर्थ

महेष्वास, महीभर्ता, श्रीनिवास, गोविन्द और सतां गति में रक्षण और आश्रय का भाव है.

व्याख्या

‘श्रीनिवास’ लक्ष्मी से संबंध दिखाता है; ‘गोविन्द’ की परंपरागत व्युत्पत्तियाँ अनेक हैं.

34

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः। हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥२१॥

अर्थ

मरीचि, हंस, सुपर्ण, भुजगोत्तम, हिरण्यनाभ और पद्मनाभ विविध सृष्टि-चित्र सामने रखते हैं.

व्याख्या

पक्षी, सर्प और नाभि के बिंब प्रतीकात्मक हैं; ये जीव-विज्ञान का वर्णन नहीं हैं.

35

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः। अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥२२॥

अर्थ

अमृत्यु, सिंह, स्थिर, शास्ता और सुरारिहा के नाम निर्भयता और नियमन का संकेत देते हैं.

व्याख्या

युद्ध-संबंधी नाम भक्तिगीत में हैं; इन्हें किसी मनुष्य के प्रति हिंसा का औचित्य न बनाएँ.

36

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः। निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः॥२३॥

अर्थ

गुरुतम, धाम, सत्य, वाचस्पति तथा निमिष-अनिमिष के नाम सत्य और दृष्टि के आयाम हैं.

व्याख्या

‘निमिष-अनिमिष’ आँख बंद-खुलने का विरोधाभास है, सतत जागरूकता का काव्यात्मक संकेत.

37

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः। सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥२४॥

अर्थ

अग्रणी, न्याय, नेता, सहस्रमूर्धा, सहस्राक्ष और विश्वात्मा सर्वव्याप्त नेतृत्व का बोध देते हैं.

व्याख्या

सहस्र सिर-नेत्र का आशय ब्रह्मांडीय अनेकता है; यह शारीरिक गणना नहीं.

38

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः संप्रमर्दनः। अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः॥२५॥

अर्थ

आवर्तन, संवर्तन, वह्नि, अनिल और धरणीधर सृष्टि-चक्र और धारण-शक्ति दिखाते हैं.

व्याख्या

सृष्टि के ये क्रियापद निरंतरता, परिवर्तन और लय की धार्मिक रूपक-भाषा हैं.

39

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः। सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः॥२६॥

अर्थ

सुप्रसाद, प्रसन्नात्मा, विश्वधृक्, नारायण और नर में कृपा तथा विश्वाधार का भाव है.

व्याख्या

‘नारायण-नर’ के अनेक शास्त्रीय अर्थ हैं; एक लोकव्युत्पत्ति को अंतिम न मानें.

40
विषय-सूची पर लौटें

असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः। सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥२७॥

अर्थ

असंख्येय, अप्रमेयात्मा, शुचि, सिद्धसंकल्प और सिद्धिसाधन में अगणनीयता और पूर्णता है.

व्याख्या

‘सिद्धि’ का अर्थ सफलता/पूर्णता भी है; इसे अलौकिक शक्ति की गारंटी न बताएँ.

41

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः। वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः॥२८॥

अर्थ

वृष-संबंधी नाम धर्म, वृद्धि, विविक्तता और श्रुतिसागर की विशालता व्यक्त करते हैं.

व्याख्या

अन्तिम सहस्रनाम शब्द-सूची बनाने से पहले इन समासों के पृथक विशेषज्ञ अर्थ जाँचना आवश्यक है.

42

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः। नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः॥२९॥

अर्थ

सुभुज, वाग्मी, महेन्द्र, वसुद, बृहद्रूप और प्रकाशन के नाम वैभव तथा प्रकाश दिखाते हैं.

व्याख्या

‘शिपिविष्ट’ कठिन प्राचीन नाम है; इसके लिए सरल एक-शब्द अर्थ देना भ्रामक हो सकता है.

43

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः। ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥३०॥

अर्थ

ओजस्, तेजस्, प्रकाशात्मा, मन्त्र, चन्द्रांशु और भास्करद्युति ज्ञान की ज्योति दिखाते हैं.

व्याख्या

चन्द्र और सूर्य यहाँ पूरक उपमाएँ हैं, खगोल की प्रतिद्वन्द्वी धारणाएँ नहीं.

44

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः। औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥३१॥

अर्थ

भानु, सुरेश्वर, औषध, जगतः सेतु और सत्यधर्मपराक्रम में प्रकाश, संरक्षण और धर्मबल है.

व्याख्या

‘औषध’ रूपक है; पाठ को चिकित्सा के स्थान पर रखने का निर्देश नहीं.

45

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः। कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः॥३२॥

अर्थ

भूतभव्यभवन्नाथ, पवन, पावन, कामहा और कामप्रद में समय, शुद्धि और इच्छा का द्वंद्व है.

व्याख्या

कामना की पूर्ति और उससे ऊपर उठने के नाम साथ हैं; यह हर मानवीय आवश्यकता दबाने का आदेश नहीं.

46

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः। अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥३३॥

अर्थ

युगादिकृत्, नैकमाय, अदृश्य, व्यक्तरूप और अनन्तजित् सृष्टि और अगोचरता दिखाते हैं.

व्याख्या

‘माया’ की व्याख्या विभिन्न वेदान्तों में अलग है; एक मत को ही अंतिम न मानें.

47

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः। क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः॥३४॥

अर्थ

इष्ट, शिष्टेष्ट, क्रोधहा, कर्ता, विश्वबाहु और महीधर में नैतिक अनुशासन तथा शक्ति है.

व्याख्या

क्रोध के विपरीत नामों का अर्थ सोच-समझकर करें; अनियंत्रित क्रोध की प्रशंसा नहीं है.

48

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः। अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥३५॥

अर्थ

अच्युत, प्राण, प्राणद, अपांनिधि और अधिष्ठान जीवन तथा स्थिर आश्रय के नाम हैं.

व्याख्या

‘वासवानुज’ वामन-कथा में इन्द्र के संबंध की ओर संकेत करता है.

49

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः। वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः॥३६॥

अर्थ

स्कन्द, धुर्य, वरद, वासुदेव और आदिदेव के नाम जिम्मेदारी, अनुग्रह तथा प्रकाश हैं.

व्याख्या

‘पुरन्दर’ और ‘स्कन्द’ अन्य देव-परंपराओं में भी आते हैं; यहाँ स्तुति का विषय विष्णु हैं.

50
विषय-सूची पर लौटें

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः। अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः॥३७॥

अर्थ

अशोक, तारण, तार, शौरि, अनुकूल और पद्मनिभेक्षण में करुणा तथा साहस है.

व्याख्या

कमल-जैसी दृष्टि वीरता और संकट-पार की भाषा के बीच कोमलता जोड़ती है.

51

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्। महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥३८॥

अर्थ

पद्मनाभ, अरविन्दाक्ष, शरीरभृत्, महर्द्धि और गरुडध्वज में पालन और ऐश्वर्य का भाव है.

व्याख्या

गरुड़ध्वज एक मूर्तिकला-संकेत है; आसपास के सारे बिंब शाब्दिक नहीं मानें.

52

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः। सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः॥३९॥

अर्थ

अतुल, भीम, सर्वलक्षणलक्षण्य, लक्ष्मीवान और समितिञ्जय महिमा तथा विजय के नाम हैं.

व्याख्या

‘शरभ’ के अर्थ कई संदर्भों में भिन्न हैं; अन्य परंपराओं का इतिहास मिटाए बिना अर्थ दर्ज करें.

53

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः। महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः॥४०॥

अर्थ

मार्ग, हेतु, दामोदर, महीधर और वेगवान ईश्वर को साध्य-पथ तथा रक्षक रूप में कहते हैं.

व्याख्या

‘दामोदर’ कृष्ण की डोरी से बाँधने वाली बाल-लीला से जुड़ा है; इसमें प्रेम का अर्थ प्रमुख है.

54

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः। करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः॥४१॥

अर्थ

उद्भव, कारण, करण, कर्ता, गहन और गुह सृष्टि के कारण और रहस्य का वर्णन हैं.

व्याख्या

‘करण’ साधन और ‘कारण’ हेतु में भेद है; यह दार्शनिक रूप से महत्वपूर्ण है.

55

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः। परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः॥४२॥

अर्थ

व्यवसाय, व्यवस्था, संस्थान, स्थानद, तुष्ट और शुभेक्षण व्यवस्था तथा पोषण दर्शाते हैं.

व्याख्या

व्यवस्था की स्तुति का अर्थ किसी विशेष राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को दैवी आदेश मानना नहीं है.

56

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः। वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः॥४३॥

अर्थ

राम, विराम, विरज, मार्ग, नय, धर्म और धर्मविदुत्तम के नाम विश्रान्ति और नीति से जुड़े हैं.

व्याख्या

‘विरज/विरत’ पाठभेद से अर्थ बदलता है; चुना हुआ पाठ तथा विकल्प अलग रखें.

57

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः। हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः॥४४॥

अर्थ

वैकुण्ठ, प्राण, प्रणव, हिरण्यगर्भ और अधोक्षज के नाम जीवनीशक्ति तथा इन्द्रियातीतता का बोध देते हैं.

व्याख्या

‘अधोक्षज’ की व्याख्या व्यापक है; एक सीधा हिंदी शब्द सब मत नहीं समेटता.

58

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः। उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः॥४५॥

अर्थ

ऋतु, सुदर्शन, काल, संवत्सर, विश्राम और विश्वदक्षिण समय तथा विश्रान्ति का भाव देते हैं.

व्याख्या

‘सुदर्शन’ उत्तम दर्शन और प्रसिद्ध चक्र—दोनों संबंधित अर्थ रख सकता है.

59

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्। अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः॥४६॥

अर्थ

विस्तार, प्रमाण, बीज, अर्थ और अनर्थ में जगत् का विस्तार तथा लाभ-हानि से परे सत्ता दिखती है.

व्याख्या

‘अर्थ-अनर्थ’ की जोड़ी अहित का समर्थन नहीं, मूल्य और उसकी सीमाओं का संकेत है.

60
विषय-सूची पर लौटें

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः। नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥४७॥

अर्थ

अनिर्विण्ण, धर्मयूप, महामख, नक्षत्री, क्षम और समीहन में यज्ञ, काल और धैर्य है.

व्याख्या

‘धर्मयूप’ ऐतिहासिक यज्ञ-भाषा है; यह लेख अनुष्ठान की विधि नहीं सिखाता.

61

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः। सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्॥४८॥

अर्थ

यज्ञ, इज्य, क्रतु, सत्र, विमुक्तात्मा, सर्वज्ञ और ज्ञानमुत्तम में उपासना तथा ज्ञान हैं.

व्याख्या

यह पद्य बाह्य अर्पण से आगे जाकर विवेकपूर्ण उपासना में ज्ञान का स्थान बताता है.

62

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्। मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः॥४९॥

अर्थ

सुव्रत, सुमुख, सुखद, सुहृत्, जितक्रोध और वीरबाहु मित्रता तथा आत्मसंयम जोड़ते हैं.

व्याख्या

‘जितक्रोध’ आत्मसंयम की स्तुति है; क्रोध अनुभव करने वाले व्यक्ति का अपमान नहीं.

63

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः॥५०॥

अर्थ

स्ववश, व्यापी, नैकात्मा, वत्सल, वत्सी और रत्नगर्भ में व्यापकता तथा वात्सल्य है.

व्याख्या

‘वत्स’ से जुड़े शब्द ब्रह्मांडीय महिमा में स्नेह और निकटता जोड़ते हैं.

64

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्। अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः॥५१॥

अर्थ

धर्मगुप्, धर्मकृत्, धर्मी, सत्-असत् और क्षर-अक्षर के नाम जगत् के परिवर्तनशील-अविनाशी स्तर जोड़ते हैं.

व्याख्या

‘सत्-असत्’ और ‘क्षर-अक्षर’ दार्शनिक युग्म हैं, व्यवहार में सच-झूठ का भेद नकारने के लिए नहीं.

65

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः। आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः॥५२॥

अर्थ

गभस्तिनेमि, सत्त्वस्थ, आदिदेव, महादेव और देवभृद्गुरु सर्वोच्चता तथा प्रकाश के नाम हैं.

व्याख्या

यहाँ शैव परंपरा के परिचित नाम भी हैं; तुलना सावधानी और सम्मान से हो.

66

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः। शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥५३॥

अर्थ

उत्तरो, गोपति, गोप्ता, ज्ञानगम्य, पुरातन और भूरिदक्षिण पालन तथा दानशीलता के भाव हैं.

व्याख्या

‘गोपति’ का अर्थ गौ, पृथ्वी और इन्द्रिय आदि अनेक व्युत्पत्तियों से जोड़ा जाता है.

67

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः। विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्त्वतांपतिः॥५४॥

अर्थ

सोम, अमृत, विनय, जय, सत्यसन्ध और सात्त्वतांपति में नम्रता और वैष्णव पहचान दिखती है.

व्याख्या

‘सात्त्वत’ नाम विशेष वैष्णव परंपरा से जुड़ा है, फिर भी इस पाठ के पाठक व्यापक हैं.

68

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः। अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः॥५५॥

अर्थ

जीव, साक्षी, मुकुन्द, अनन्तात्मा तथा अन्तक में सजीवता, मुक्ति और लय के भाव हैं.

व्याख्या

‘मुकुन्द’ मुक्ति से जुड़ता है; ‘अन्तक’ अंत की शक्ति है, मृत्यु की महिमा का निर्देश नहीं.

69

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः। आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः॥५६॥

अर्थ

अज, प्रमोदन, आनन्द, नन्द और त्रिविक्रम सहज आनन्द तथा विराट गति का बोध देते हैं.

व्याख्या

‘त्रिविक्रम’ वामन के तीन पगों वाली पौराणिक कथा से जुड़ता है.

70
विषय-सूची पर लौटें

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः। त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्॥५७॥

अर्थ

महर्षि, कपिलाचार्य, मेदिनीपति, त्रिपद और कृतान्तकृत् ज्ञान तथा व्यापक सत्ता व्यक्त करते हैं.

व्याख्या

‘कपिलाचार्य’ की व्याख्या मतभेदपूर्ण हो सकती है; बिना प्रमाण एक ही जीवनकथा न थोपें.

71

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी। गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः॥५८॥

अर्थ

महावराह, गोविन्द, गुह्य, गम्भीर तथा चक्रगदाधर अवतार और रहस्य-भाव को जोड़ते हैं.

व्याख्या

वराह की छवि पृथ्वी-उद्धार कथा से और चक्र-गदा रक्षण के प्रतीक से जुड़ती है.

72

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणोऽच्युतः। वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः॥५९॥

अर्थ

अजित, कृष्ण, संकर्षण, वरुण, वृक्ष, पुष्कराक्ष तथा महामना अजेयता और आधार दर्शाते हैं.

व्याख्या

‘संकर्षण’ व्यूह तथा कृष्ण-परंपरा में विशिष्ट नाम है; अर्थ सभी मतों में समान नहीं.

73

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः। आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः॥६०॥

अर्थ

भगवान्, आनन्दी, वनमाली, हलायुध और आदित्य नाम सौन्दर्य, बल तथा सूर्य-ज्योति को जोड़ते हैं.

व्याख्या

‘हलायुध’ बलराम से जुड़ा है; ऐसे नाम विविध अवतारों को स्तुति में जोड़ते हैं.

74

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः। दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः॥६१॥

अर्थ

सुधन्वा, खण्डपरशु, सर्वदृक्, व्यास, वाचस्पति तथा अयोनिज शस्त्र, विद्या और अजन्मा सत्ता दर्शाते हैं.

व्याख्या

‘व्यास’ नाम से महाभारत के हर पाठ-स्तर के ऐतिहासिक रचनाकार का प्रश्न हल नहीं होता.

75

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्॥६२॥

अर्थ

त्रिसामा, सामग, साम, निर्वाण, भेषज, भिषक् और शान्ति संगीत, विरक्ति तथा शान्ति जोड़ते हैं.

व्याख्या

चिकित्सा जैसे शब्द भक्तिपरक हैं; उनसे उपचार रोकने की सलाह नहीं निकलती.

76

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः। गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः॥६३॥

अर्थ

शुभाङ्ग, शान्तिद, स्रष्टा, गोहित, गोपति और वृषप्रिय में कल्याण और संरक्षण हैं.

व्याख्या

‘गो’ अनेक अर्थ रखता है; इस पद्य को संकीर्ण राजनीतिक अर्थ में सीमित न करें.

77

अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः॥६४॥

अर्थ

अनिवर्ती, क्षेमकृत्, श्रीवत्सवक्षाः, श्रीवास और श्रीपति में रक्षा तथा लक्ष्मी-संबंध है.

व्याख्या

यह पद लक्ष्मी-विष्णु संबंध का सुंदर उदाहरण है; लक्ष्मी इकाई से जोड़ सकते हैं, काल्पनिक URL नहीं बनाएँ.

78

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः। श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः॥६५॥

अर्थ

श्रीद, श्रीश, श्रीनिवास, श्रीधर, श्रेयः और लोकत्रयाश्रय में मंगल तथा व्यापक आश्रय है.

व्याख्या

‘श्री’ देवी और मंगलमय समृद्धि दोनों का पद है; केवल धन तक अर्थ सीमित न रखें.

79

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः। विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥६६॥

अर्थ

स्वक्ष, शतानन्द, नन्दि, विजितात्मा, सत्कीर्ति तथा छिन्नसंशय प्रसन्नता और आत्मसंयम बताते हैं.

व्याख्या

‘छिन्नसंशय’ मूल संशय के निवारण का भाव है; जिज्ञासा करने पर रोक नहीं.

80
विषय-सूची पर लौटें

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः। भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः॥६७॥

अर्थ

सर्वतश्चक्षुः, शाश्वतस्थिर, भूति, विशोक और शोकनाशन जागरूकता तथा सांत्वना के नाम हैं.

व्याख्या

शोकनाशन सांत्वना की भक्तिपरक भाषा है; हर वास्तविक दुःख समाप्त होने की गारंटी नहीं.

81

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः। अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः॥६८॥

अर्थ

अर्चिष्मान्, अर्चित, विशुद्धात्मा, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न तथा अमितविक्रम शक्ति और शुद्धि के रूप हैं.

व्याख्या

‘अनिरुद्ध’ और ‘प्रद्युम्न’ कुछ वैष्णव व्यूह-परंपराओं से जुड़े नाम हैं.

82

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः। त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः॥६९॥

अर्थ

कालनेमिनिहा, त्रिलोकेश, केशव, केशिहा और हरि रक्षक-अवतार की कथाएँ स्मरण कराते हैं.

व्याख्या

दैत्य-नाम पौराणिक कथाओं में हैं; उन्हें जीवित व्यक्तियों पर आरोपित न करें.

83

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः। अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनंजयः॥७०॥

अर्थ

कामदेव, कामपाल, कान्त, अनिर्देश्यवपुः, अनन्त तथा धनंजय स्नेह और असीमता कहते हैं.

व्याख्या

‘काम’ से बने शब्द इच्छा और प्रेम के सूक्ष्म भेद रखते हैं; सबको एक अर्थ न दें.

84

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः। ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः॥७१॥

अर्थ

ब्रह्मण्य, ब्रह्मकृत्, ब्रह्म, ब्रह्मविद्, ब्रह्मज्ञ तथा ब्राह्मणप्रिय ब्रह्मज्ञान की श्रृंखला है.

व्याख्या

नपुंसक ‘ब्रह्म’ (परम तत्त्व), ‘ब्रह्मा’ (स्रष्टा) और सामाजिक पदों का भेद आवश्यक है.

85

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः। महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥७२॥

अर्थ

महाक्रम, महाकर्मा, महातेज, महायज्ञ, महायज्वा और महाहविः सभी यज्ञ-पक्ष जोड़ते हैं.

व्याख्या

यज्ञ में अलग दिखाई देने वाली भूमिकाओं को एक ही आधार में रखकर एकता का बोध कराया गया है.

86

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः। पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः॥७३॥

अर्थ

स्तव्य, स्तोत्र, स्तुति, स्तोता, पूर्ण तथा पुण्यकीर्ति में आराध्य और आराधना मिलते हैं.

व्याख्या

इस पद्य में स्तोत्र, स्तुति और स्तोता एक साथ हैं; पाठ करना भी अर्थ का हिस्सा बनता है.

87

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः। वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः॥७४॥

अर्थ

मनोजव, तीर्थकर, वसुप्रद, वासुदेव और हविः गति, पारगमन तथा अर्पण दर्शाते हैं.

व्याख्या

बार-बार ‘वसु’ आने से संपदा, निवास और कल्याण जुड़े हैं; व्युत्पत्ति सावधानी से करें.

88

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः। शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥७५॥

अर्थ

सद्गति, सत्कृति, सत्परायण, यदुश्रेष्ठ और सुयामुन कृष्ण-संबंध तथा कल्याण का बोध देते हैं.

व्याख्या

यमुना-संबंधी नाम विराट ईश्वर को एक परिचित भक्तिभूमि से जोड़ते हैं.

89

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः। दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः॥७६॥

अर्थ

भूतावास, सर्वासुनिलय, दर्पहा और अपराजित जीवों के आधार और अभिमान-शमन का भाव हैं.

व्याख्या

अहंकार हटाने का अर्थ अपने आचरण का अवलोकन है, दूसरे का अपमान नहीं.

90
विषय-सूची पर लौटें

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्। अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः॥७७॥

अर्थ

विश्वमूर्ति, महामूर्ति, अमूर्तिमान्, अनेकमूर्ति और अव्यक्त अनेक रूप एवं अरूप को जोड़ते हैं.

व्याख्या

रूप और अरूप की विरोधाभासी भाषा स्तोत्र की व्यापक दृष्टि है, लिपिकीय भूल नहीं.

91

एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम्। लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः॥७८॥

अर्थ

एक, नैक, अनुत्तम पद, लोकबन्धु और भक्तवत्सल एकता, बहुरूपता और स्नेह दिखाते हैं.

व्याख्या

‘कः’ और ‘किं’ जैसे छोटे नामों की विशेष व्याख्या है; साधारण प्रश्नवाचक अर्थ पर्याप्त नहीं.

92

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः॥७९॥

अर्थ

सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वीरहा, अचल और चल तेजस्विता तथा स्थिर-गतिशील विरोधाभास दर्शाते हैं.

व्याख्या

‘शून्य’ को ईश्वर का अभाव कहना उचित नहीं; यह संदर्भ-विशेष दार्शनिक नाम है.

93

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्। सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः॥८०॥

अर्थ

अमानी, मानद, मान्य, त्रिलोकधृक्, सुमेधा और सत्यमेधा विनय तथा प्रज्ञा जोड़ते हैं.

व्याख्या

‘अमानी-मानद-मान्य’ अहंकारहीनता, सम्मान देने और सम्मानयोग्यता का भेद दिखाते हैं.

94

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः। प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः॥८१॥

अर्थ

तेजोवृष, सर्वशस्त्रभृतांवर, प्रग्रह, निग्रह और गदाग्रज संयमित सामर्थ्य के नाम हैं.

व्याख्या

‘प्रग्रह-निग्रह’ में ग्रहण और रोकना साथ है; शक्ति विवेक से बँधी रहती है.

95

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः। चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्॥८२॥

अर्थ

चतुर्मूर्ति, चतुर्व्यूह, चतुर्गतिः, चतुर्वेदविद् और एकपात विविधता में व्यवस्था दर्शाते हैं.

व्याख्या

चार-चार के समूह धार्मिक प्रतीकात्मक योजनाएँ हैं; हर वास्तविक वस्तु के चार भाग होने का दावा नहीं.

96

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः। दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा॥८३॥

अर्थ

दुर्जय, दुरतिक्रम, दुर्लभ, दुर्गम और दुरारिहा कठिनाई तथा संरक्षण की भाषा है.

व्याख्या

कठिनता के नाम साधना में गंभीरता बताते हैं; पाठक में निराशा पैदा करना उद्देश्य नहीं.

97

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः। इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः॥८४॥

अर्थ

शुभाङ्ग, लोकसारङ्ग, सुतन्तु, तन्तुवर्धन और महाकर्मा विश्व के ताने-बाने का बोध देते हैं.

व्याख्या

‘तन्तु’ का बिंब संबंधों और निरंतरता का है; यह यांत्रिक नक्शा नहीं.

98

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः। अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी॥८५॥

अर्थ

सुन्दर, रत्ननाभ, सुलोचन, अर्क, जयन्त और सर्वविज्जयी सौन्दर्य तथा विजय कहते हैं.

व्याख्या

यहाँ रूप-सौन्दर्य, ज्ञान और विजय को एक ही स्तुति में पिरोया गया है.

99

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः। महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः॥८६॥

अर्थ

सुवर्णबिन्दु, अक्षोभ्य, सर्ववागीश्वरेश्वर, महाह्रद और महानिधि अपरिमेय गहराई दिखाते हैं.

व्याख्या

ताल, गर्त और निधि के रूपक अनन्तता दिखाते हैं, ईश्वर के भौतिक पते नहीं.

100
विषय-सूची पर लौटें

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः। अमृतांशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः॥८७॥

अर्थ

कुमुद, कुन्द, पर्जन्य, पावन, अमृतांश और सर्वतोमुख जीवनदायी कोमलता बताते हैं.

व्याख्या

प्रकृति-बिंब युद्ध-प्रधान पदों के बीच जीवन की परस्पर निर्भरता दिखाते हैं.

101

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः। न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः॥८८॥

अर्थ

सुलभ, सुव्रत, सिद्ध, न्यग्रोध, अश्वत्थ और चाणूरनिषूदन निकटता तथा कृष्णकथा जोड़ते हैं.

व्याख्या

वृक्ष-नाम धार्मिक प्रतीकों से जुड़े हैं; ‘उदुम्बर’ वाला डिजिटल पाठ मिलान माँगता है.

102

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः। अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः॥८९॥

अर्थ

सहस्रार्चि, सप्तजिह्व, अमूर्ति, अचिन्त्य और भयनाशन अग्नि और अगोचरता दर्शाते हैं.

व्याख्या

‘सप्तजिह्व’ वैदिक अग्नि की याद दिलाता है; यहाँ कोई अग्नि-विधि नहीं सिखाई जा रही.

103

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्। अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः॥९०॥

अर्थ

अणु, बृहत्, कृश, स्थूल, गुणभृत् और निर्गुण विरोधी आकारों से असीमता दिखाते हैं.

व्याख्या

‘निर्गुण’ का अर्थ वेदान्त-सम्प्रदायों में अलग है; एक अर्थ थोपना उचित नहीं.

104

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः। आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः॥९१॥

अर्थ

भारभृत्, योगी, योगीश, आश्रम, श्रमण तथा सर्वकामद आश्रय और प्रयत्न बताते हैं.

व्याख्या

‘श्रमण’ और ‘आश्रम’ को केवल आधुनिक संस्था के अर्थ में न पढ़ें.

105

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः। अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः॥९२॥

अर्थ

धनुर्धर, धनुर्वेद, दमयिता, दम और अपराजित संयम के साथ युद्ध-सामर्थ्य जोड़ते हैं.

व्याख्या

मुख्य भाव अनुशासन है, किसी को धमकाने का धार्मिक आधार नहीं.

106

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः। अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः॥९३॥

अर्थ

सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्यधर्मपरायण, प्रियकृत् और प्रीतिवर्धन सच्चाई तथा प्रेम जोड़ते हैं.

व्याख्या

‘सत्त्व’ दार्शनिक गुण भी है और सामान्य सद्गुण भी; इन दोनों स्तरों को पहचानें.

107

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः। रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः॥९४॥

अर्थ

विहायसगति, ज्योति, रवि, सूर्य और सविता जगत् को प्रकाशित करने वाली ज्योति हैं.

व्याख्या

सूर्य-नाम होने से यह पाठ वैदिक सावित्री/गायत्री मन्त्र बन नहीं जाता.

108

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः। अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः॥९५॥

अर्थ

अनन्त, सुखद, अग्रज, सदामर्षी और लोकाधिष्ठान अनन्तता तथा धैर्य का भाव हैं.

व्याख्या

‘सदामर्षी’ सहनशीलता का भाव है; अन्याय के प्रति निष्क्रिय रहने का आदेश नहीं.

109

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः। स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः॥९६॥

अर्थ

सनातनतम, कपिल, अव्यय, स्वस्तिद और स्वस्तिकृत् शुभता एवं अनश्वरता बताते हैं.

व्याख्या

‘स्वस्ति’ कल्याण का मंगल-सूचक पद है, माँगने पर परिणाम की गारंटी नहीं.

110
विषय-सूची पर लौटें

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः। शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः॥९७॥

अर्थ

अरौद्र, चक्री, विक्रमी, शब्दातिग, शिशिर और शर्वरीकर शक्ति के साथ शीतलता जोड़ते हैं.

व्याख्या

‘शब्दातिग’ बताता है कि नामों से स्तुति करते हुए भी परम तत्त्व शब्द से परे है.

111

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः। विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥९८॥

अर्थ

अक्रूर, पेशल, दक्ष, क्षमिणांवर, वीतभय तथा पुण्यश्रवणकीर्तन सद्व्यवहार और निर्भयता कहते हैं.

व्याख्या

यह कोमल भाषा स्तोत्र के उग्र और विराट वर्णनों का संतुलन करती है.

112

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः। वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः॥९९॥

अर्थ

उत्तारण, दुष्कृतिहा, रक्षण, जीवन और दुःस्वप्ननाशन संकट से पार लगाने का भाव हैं.

व्याख्या

स्वप्न और रक्षा के वर्णन आस्था-भाषा हैं; नींद संबंधी चिकित्सकीय परिणाम का वादा नहीं.

113

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः। चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः॥१००॥

अर्थ

अनन्तरूप, अनन्तश्री, जितमन्यु, गभीरात्मा और दिशो व्यापकता तथा संयम दिखाते हैं.

व्याख्या

दिशाओं की भाषा सर्वव्यापकता बताती है, नक्शे के निर्देशांक नहीं.

114

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः। जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः॥१०१॥

अर्थ

अनादि, लक्ष्मी, जनन, जनजन्मादि, भीम और भीमपराक्रम में जन्म और संरक्षण है.

व्याख्या

विष्णु-स्तोत्र में ‘लक्ष्मी’ को व्याकरण और देवी-संबंध दोनों के संदर्भ से पढ़ना चाहिए.

115

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः। ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः॥१०२॥

अर्थ

आधारनिलय, प्रजागर, सत्पथाचार, प्राणद और प्रणव जीवन तथा उचित आचरण दिखाते हैं.

व्याख्या

‘प्रणव’ पवित्र अक्षर का नाम है; यहाँ किसी दीक्षा-प्रक्रिया का विधान नहीं है.

116

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः। तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः॥१०३॥

अर्थ

प्रमाण, प्राणनिलय, प्राणजीवन, तत्त्व और जन्ममृत्युजरातिगः जीवनाधार और परम सत्य कहते हैं.

व्याख्या

‘तत्त्व’ वास्तविक सिद्धान्त है; जन्म-मृत्यु से परे नाम जैविक अमरता का वादा नहीं.

117

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः। यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः॥१०४॥

अर्थ

भूर्भुवःस्वस्तरु, सविता, प्रपितामह, यज्ञ, यज्ञपति और यज्ञवाहन विश्व-आधार तथा अर्पण हैं.

व्याख्या

यज्ञ के अनेक पद एक दार्शनिक एकता व्यक्त करते हैं; यह यज्ञ-विधि पुस्तिका नहीं.

118

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुक् यज्ञसाधनः। यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च॥१०५॥

अर्थ

यज्ञभृत्, यज्ञकृत्, यज्ञगुह्य, अन्न और अन्नाद में यज्ञ का पूर्ण चक्र समाया है.

व्याख्या

‘अन्न-अन्नाद’ पद्य 16 के पोषण-भाव को पूर्ण करता है; इसमें परस्पर आश्रय प्रकट है.

119

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः। देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः॥१०६॥

अर्थ

आत्मयोनि, स्वयंजात, सामगायन, देवकीनन्दन, स्रष्टा और पापनाशन उत्पत्ति तथा कृष्णकथा जोड़ते हैं.

व्याख्या

‘देवकीनन्दन’ विश्वव्यापक स्तुति को कृष्ण के जीवन-कथानक से जोड़ता है.

120
विषय-सूची पर लौटें

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः॥१०७॥

अर्थ

शङ्खभृत्, नन्दकी, चक्री, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर और सर्वप्रहरणायुध अंतिम आयुध-नाम हैं.

व्याख्या

ये आयुध-नाम सहस्रनाम के मूल क्रम का समापन हैं; कुछ पाठों में अंतिम नाम दोहराकर रक्षा-पद्य अलग पढ़ा जाता है.

121

इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः। नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्॥१॥

अर्थ

भीष्म कहते हैं कि स्तुत्य केशव के दिव्य सहस्रनाम पूरे सुनाए गए हैं.

व्याख्या

यह नाम-क्रम का समापन है; स्वयं सहस्र नामों में अगला नाम नहीं है.

122

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्। नाशुभं प्राप्नुयात्किंचित्सोऽमुत्रेह च मानवः॥२॥

अर्थ

यहाँ सुनने और कीर्तन को इस लोक तथा परलोक में मंगलकारी बताया गया है.

व्याख्या

यह फलश्रुति की पारंपरिक प्रतिज्ञा है, परीक्षण योग्य निश्चित परिणाम नहीं.

123

वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत्। वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्॥३॥

अर्थ

इस पद्य में उस काल के वर्ण-सम्बन्धी शब्दों द्वारा भिन्न लाभ बताए गए हैं.

व्याख्या

वर्णाधारित प्राचीन भाषा को ईमानदारी से समझाएँ; जन्म-आधारित भेदभाव का समर्थन नहीं है.

124

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्। कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी चाप्नुयात्प्रजाम्॥४॥

अर्थ

धर्म, अर्थ, कामना या संतान चाहने वालों के लिए फल की आशा व्यक्त की गई है.

व्याख्या

इसे भक्तिपरक आशा समझें, संतान या धन की निश्चित प्राप्ति का वादा नहीं.

125

भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः। सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत्॥५॥

अर्थ

इस पद्य में भक्तिभाव और एकाग्रचित्त से वासुदेव के नामों का स्मरण करने वाले की चर्चा है.

व्याख्या

यहाँ शुद्धि धार्मिक साहित्य का प्रसंग है; इससे पाठ पढ़ने पर किसी के प्रवेश-प्रतिबंध का नियम न निकालें.

126

यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च। अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥६॥

अर्थ

यहाँ यश, सम्मान, स्थिर श्री और परम श्रेय की भक्तिपरक कामना है.

व्याख्या

‘श्रेयस्’ का अर्थ क्षणिक सांसारिक लाभ से कहीं व्यापक हो सकता है.

127

न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति। भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः॥७॥

अर्थ

निर्भयता, तेज, शक्ति और आरोग्य को अपेक्षित फल बताया गया है.

व्याख्या

इससे रोग-प्रतिरोध की चिकित्सकीय गारंटी सिद्ध नहीं होती.

128

रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात्। भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः॥८॥

अर्थ

रोग, बंधन, भय और विपत्ति से मुक्ति की प्रार्थनात्मक आशा व्यक्त है.

व्याख्या

रोग-विषयक कथन पारंपरिक विश्वास है; ज़रूरत पर उपचार आवश्यक रहता है.

129

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम्। स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः॥९॥

अर्थ

यह पुरुषोत्तम की भक्ति से कठिनाइयाँ पार करने का विश्वास व्यक्त करता है.

व्याख्या

मुख्य बिंब संकट-पार करना है, व्यवहारिक प्रयत्न छोड़ देना नहीं.

130
विषय-सूची पर लौटें

वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः। सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम्॥१०॥

अर्थ

वासुदेव में आश्रय लेने वाले को चित्तशुद्धि तथा सनातन ब्रह्म की ओर अग्रसर बताया है.

व्याख्या

यह आध्यात्मिक आदर्श है, किसी व्यक्ति के नैतिक मूल्य का आकलन नहीं.

131

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित्। जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते॥११॥

अर्थ

वासुदेव-भक्ति से जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग के भय से ऊपर उठने का भाव है.

व्याख्या

यह पद्य नहीं कहता कि उपासक को वास्तविक वृद्धावस्था या बीमारी नहीं होगी.

132

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः। युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः॥१२॥

अर्थ

श्रद्धा से पाठ को आत्मसुख, क्षमा, धैर्य, स्मृति और यश से जोड़ा गया है.

व्याख्या

ये सार्थक नैतिक आकांक्षाएँ हैं; आवश्यक मानसिक स्वास्थ्य-सेवा का विकल्प नहीं.

133

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः। भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे॥१३॥

अर्थ

आदर्श भक्त को मत्सर, लोभ, क्रोध और अशुभ विचार से दूर बताया गया है.

व्याख्या

यह नैतिक प्रेरणा है, साधारण मानवीय कमी के कारण किसी को लज्जित करने का आधार नहीं.

134

द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः। वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः॥१४॥

अर्थ

आकाश, सूर्य-चन्द्र, दिशाओं, पृथ्वी और महासागर को वासुदेव से धारित कहा गया है.

व्याख्या

यह भक्तिपरक विश्व-दृष्टि है, खगोलीय प्रक्रिया का वैज्ञानिक वर्णन नहीं.

135

ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम्। जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम्॥१५॥

अर्थ

देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष और अन्य प्राणी कृष्ण की व्यापक सत्ता में स्थित बताए गए हैं.

व्याख्या

ये पौराणिक वर्ग हैं; उन्हें आधुनिक मनुष्यों के समूहों पर आरोपित न करें.

136

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः। वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च॥१६॥

अर्थ

इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ वासुदेवात्मक माने गए हैं.

व्याख्या

‘क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ’ की भाषा गीता की याद दिलाती है, किंतु दोनों पाठ अलग हैं.

137

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्प्यते। आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः॥१७॥

अर्थ

यहाँ आचार को प्रथम और धर्म का आधार कहा गया है; अच्युत धर्माधिपति हैं.

व्याख्या

‘आचार’ पर बल बताता है कि केवल पाठ नहीं, जीवन का व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण है.

138

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः। जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम्॥१८॥

अर्थ

ऋषि, पितर, देव और समस्त चर-अचर जगत् को नारायण से उद्भूत कहा गया है.

व्याख्या

यह पवित्र उत्पत्ति की धार्मिक अवधारणा है, जैविक वंशावली नहीं.

139

योगो ज्ञानं तथा सांख्यं विद्याः शिल्पादिकर्म च। वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात्॥१९॥

अर्थ

योग, ज्ञान, सांख्य, शिल्प, विद्या और शास्त्र जनार्दन से उत्पन्न बताए गए हैं.

व्याख्या

विद्या की व्यापकता यहाँ प्रशंसनीय है; स्वतंत्र जिज्ञासा रोकना इसका उद्देश्य नहीं.

140
विषय-सूची पर लौटें

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः। त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः॥२०॥

अर्थ

एक विष्णु अनगिनत पृथक प्राणियों और तीनों लोकों में अविनाशी आत्मरूप से व्यापते हैं.

व्याख्या

एकता और विविधता दोनों कही गई हैं; सभी दर्शन एक ही मत के नहीं बन जाते.

141

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम्। पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च॥२१॥

अर्थ

श्रेय और सुख चाहने वाले के लिए व्यास-कीर्तित स्तोत्र पढ़ने की प्रेरणा दी गई है.

व्याख्या

‘व्यास’ ग्रंथ की परंपरागत प्रामाणिकता बताते हैं; महाकाव्य के पाठ-इतिहास का प्रश्न अलग है.

142
विषय-सूची पर लौटें

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम्। भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम्॥२२॥

अर्थ

अंत में अज, अव्यय और पुष्कराक्ष प्रभु की भक्ति से पराभव न होने की आशा व्यक्त है.

व्याख्या

यह आध्यात्मिक आश्वासन है, हर सांसारिक प्रतियोगिता में विजय की गारंटी नहीं.

सन्दर्भ और उपयोग

सम्पादकीय पाठ: महाभारत का डिजिटल १४२-श्लोक पाठ; मुद्रित स्रोत और अधिकार की स्वतंत्र स्वीकृति शेष। पहले सम्पूर्ण मूल संस्कृत।

इस पाठ का संदर्भ

महाभारत के अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर भीष्म से परम आश्रय, स्तुति, स्मरण और धर्म के बारे में पूछते हैं। भीष्म का उत्तर विष्णु के विराट, नैतिक, करुणामय, वीर तथा दार्शनिक नामों से भरा स्तोत्र है। इस संपादकीय पाठ में १३ संवाद-श्लोक, १०७ मूल सहस्रनाम-श्लोक और २२ फलश्रुति-श्लोक हैं; बाद में जुड़ी पाठ-परंपराओं की प्रार्थनाएँ अलग रखी गई हैं। सहस्रनाम का अर्थ ‘हज़ार नाम’ है। संस्कृत के संधियुक्त पदों को बिना व्याकरण के काटकर ठीक एक हज़ार स्वतंत्र नाम प्रमाणित नहीं किए जा सकते; टीकाकार कुछ पदों का अलग-अलग विश्लेषण करते हैं। यहाँ मुख्य नामावली के सभी १०७ श्लोक हैं, पर एक-एक करके सत्यापित सहस्र नामों की शब्द-सूची अभी नहीं है। दस-दस श्लोक के समूह में पढ़ने से ‘श्री’, ‘धर्म’, ‘सत्त्व’, ‘यज्ञ’, ‘आत्मा’ और ‘अनन्त’ जैसे पदों का सम्बन्ध अधिक स्पष्ट होता है। यह बहु-परंपरागत महाभारत में स्थित एक वैष्णव स्तुति है। इसमें ‘शिव’, ‘रुद्र’ और ‘महादेव’ जैसे नाम भी आते हैं। एक परंपरा का अर्थ दूसरी परंपरा पर थोपने के बजाय संबंधित दार्शनिक तथा भक्ति-संदर्भ का आदर करना आवश्यक है। नीचे के अर्थ आरम्भिक समझ के लिए हैं, सभी आचार्यों की टीकाओं का स्थानापन्न नहीं।

पाठ-सत्यापन और प्रकाशन की स्थिति

चयनित डिजिटल स्रोत की पूरी १४२-श्लोक शृंखला यहाँ दी गई है। संस्कृत विकिस्रोत पर यह पाठ संस्कृत डॉक्यूमेंट्स से रूपांतरित बताया गया है; मूल साइट के पुनर्प्रकाशन नियम वेबसाइट प्रचार में उपयोग सीमित करते हैं। १९१० के एक मुद्रित ऐतिहासिक स्रोत का विवरण मिला है, पर इस सत्र में उसके सभी पृष्ठों से स्वतंत्र मिलान नहीं हुआ। संस्कृत शब्द, यांत्रिक IAST लिप्यंतरण, पुनःउपयोग अधिकार और सहस्र नामों की व्यक्तिगत गिनती विशेषज्ञ जाँच के अधीन हैं। प्रकाशन तथा आदेश (Aadesh) में उपयोग बंद रहेगा।

पाठांतर और श्लोक संख्या

कई पुस्तिकाओं में १०७वें मूल श्लोक के बाद वनमाली गदी शार्ङ्गी रक्षा-पद्य को १०८वाँ श्लोक कहा जाता है। आरम्भिक विनियोग, न्यास, ध्यान, अतिरिक्त संवाद और गीता-पद्य भक्ति-पाठ में प्रचलित हैं, किंतु यहाँ चयनित १४२-श्लोक महाभारत अध्याय में उन्हें चुपचाप नहीं मिलाया गया है। अलग महाभारत संस्करणों में अध्याय क्रमांक १४९, १४० या १३५ मिलता है।

संवाद: अर्थ और व्याख्या

संवाद 1

अर्थ: वैशम्पायन बताते हैं कि धर्म के अनेक उपदेश सुनने के बाद युधिष्ठिर भीष्म से पुनः पूछते हैं. व्याख्या: आरम्भ बताता है कि यह केवल शब्द-सूची नहीं, धर्म-विमर्श में कही गई स्तुति है.

संवाद 2

अर्थ: युधिष्ठिर पूछते हैं कि एक परम देवता और श्रेष्ठ आश्रय कौन हैं, जिनकी स्तुति-आराधना से मंगल हो. व्याख्या: परंपरागत छह प्रश्न यहाँ आरम्भ होते हैं; वे तत्त्व-विचार के साथ उपासना का आधार भी पूछते हैं.

संवाद 3

अर्थ: वे पूछते हैं कि श्रेष्ठ धर्म क्या है और किस नाम-स्मरण से जन्म-संसार के बंधन से मुक्ति समझी जाती है. व्याख्या: यहाँ जप और मुक्ति प्रश्न के रूप में आए हैं, सबके लिए एक जैसी विधि के आदेश के रूप में नहीं.

संवाद 4

अर्थ: भीष्म उत्तर देते हैं कि जागरूक मनुष्य जगत् के अनन्त पुरुषोत्तम की सहस्र नामों से स्तुति करे. व्याख्या: भीष्म के उत्तर में विष्णु इस विशेष स्तोत्र के उपास्य रूप में स्थापित हैं.

संवाद 5

अर्थ: वे अविनाशी पुरुष की भक्ति में ध्यान, स्तुति, प्रणाम और आराधना का उल्लेख करते हैं. व्याख्या: ये भक्ति के रूप हैं; यह लेख किसी विशिष्ट कर्मकाण्ड की विधि नहीं दे रहा.

संवाद 6

अर्थ: अनादि विष्णु, समस्त लोकों के अधीश्वर की स्तुति को दुःख से ऊपर उठने का साधन बताया गया है. व्याख्या: दुःख से परे जाने की बात भक्तिपरक प्रतिज्ञा है, तत्काल चिकित्सकीय परिणाम नहीं.

संवाद 7

अर्थ: विष्णु को धर्मज्ञ, लोकनाथ और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का मूल बताया गया है. व्याख्या: ‘सर्वभूतभवोद्भव’ धर्म-विचार को व्यापक जगत्-दृष्टि से जोड़ता है.

संवाद 8

अर्थ: भीष्म अपनी इस शिक्षा में पुण्डरीकाक्ष विष्णु की भक्तिपूर्वक स्तुति को श्रेष्ठ धर्म कहते हैं. व्याख्या: यह महाभारत के इस वक्ता का मत है; अन्य हिन्दू परंपराओं के धर्म-विवेचन अलग हो सकते हैं.

संवाद 9

अर्थ: वे परम तेज, परम तप, महद्ब्रह्म और अंतिम आश्रय के रूप में स्तुत हैं. व्याख्या: ये सर्वोच्चता-सूचक पद आगे आने वाली नामावली की भूमिका बनाते हैं.

संवाद 10

अर्थ: वे पवित्रों में पवित्र, मंगलों में मंगल और प्राणियों के अविनाशी पिता कहे गए हैं. व्याख्या: ‘पिता’ शब्द इस दर्शन में उत्पत्ति और संरक्षण का भाव है, जैविक पितृत्व नहीं.

संवाद 11

अर्थ: युग के आरम्भ में प्राणी उन्हीं से उत्पन्न और युगान्त पर उन्हीं में लीन बताए गए हैं. व्याख्या: उत्पत्ति और प्रलय चक्रीय धार्मिक ब्रह्माण्ड-विचार में रखे गए हैं.

संवाद 12

अर्थ: भीष्म युधिष्ठिर से जगन्नाथ विष्णु के सहस्र नाम सुनने को कहते हैं. व्याख्या: यहीं संवादात्मक भूमिका समाप्त होकर मूल नाम-श्लोकों का आरम्भ होता है.

संवाद 13

अर्थ: वे ऋषियों द्वारा गाए गए प्रसिद्ध गुणनाम कल्याणार्थ कहने का संकल्प करते हैं. व्याख्या: ‘गौण नाम’ गुणों पर आधारित हैं; समास-विच्छेद और आवृत्ति से नाम-गणना प्रभावित हो सकती है.

१०७ नाम-श्लोकों के क्रमवार अर्थ

सहस्रनाम 1

अर्थ: सम्पूर्ण विश्व विष्णु का नाम है; वे सृष्टि के कर्ता, धारक, अन्तर्यामी और तीनों कालों के अधीश्वर कहे गए हैं. व्याख्या: आरम्भ के नाम दिखाई देने वाले जगत् से सब प्राणियों के आधार तक जाते हैं; ‘वषट्कार’ यज्ञ में प्रयुक्त ध्वनि की ओर संकेत करता है.

सहस्रनाम 2

अर्थ: पूतात्मा और परमात्मा निर्मल, अविनाशी साक्षी तथा शरीर-क्षेत्र के ज्ञाता और मुक्तों की परम गति हैं. व्याख्या: ‘क्षेत्रज्ञ’ दार्शनिक पद है; सभी सम्प्रदाय जीव और परमात्मा का संबंध एक ही तरह नहीं समझाते.

सहस्रनाम 3

अर्थ: वे योग, योगियों के नायक, प्रकृति-पुरुष के ईश्वर और नरसिंह एवं केशव नामों से वंदित हैं. व्याख्या: यहाँ दार्शनिक नामों के साथ अवतार-रूप भी है; इसे एक ही भौतिक रूप का वर्णन न मानें.

सहस्रनाम 4

अर्थ: वे सर्वव्यापी, कल्याणस्वरूप, अचल आधार, जीवों के मूल, पालनकर्ता और ईश्वर हैं. व्याख्या: ‘शिव’ और ‘शर्व’ शैव ग्रंथों में भी आते हैं; नाम-साम्य का आदर करें, सम्प्रदायों के भेद मिटाने का आग्रह नहीं.

सहस्रनाम 5

अर्थ: स्वयंभू, शम्भु और आदित्य जैसे नाम उन्हें अनादि, अनन्त और विश्व-व्यवस्था का आधार बताते हैं. व्याख्या: ‘धाता’ और ‘विधाता’ धारण तथा व्यवस्था के प्रतीक हैं, सृष्टि की वैज्ञानिक प्रक्रिया का विवरण नहीं.

सहस्रनाम 6

अर्थ: अप्रमेय हृषीकेश, पद्मनाभ, विश्वकर्मा और ध्रुव के रूप में वे जगत् के नियामक और स्थिर आधार हैं. व्याख्या: ‘हृषीकेश’ का अर्थ इन्द्रियों का स्वामी समझा जाता है; विश्वकर्मा नाम सृष्टि-रचना की प्रतीकात्मक भाषा है.

सहस्रनाम 7

अर्थ: अग्राह्य, शाश्वत, कृष्ण और परम मंगल के नाम ईश्वर की अगोचरता और कल्याणकारी स्वरूप को कहते हैं. व्याख्या: वर्ण और दिशाओं के संकेत काव्यात्मक हैं; किसी एक चित्र में इन सभी अर्थों को सीमित न करें.

सहस्रनाम 8

अर्थ: प्राणदाता, स्वयं प्राण, श्रेष्ठ, हिरण्यगर्भ, माधव और मधुसूदन—इन नामों में जीवन और धर्मरक्षा का स्वर है. व्याख्या: ‘मधुसूदन’ दैत्य-वध की कथा से और ‘हिरण्यगर्भ’ सृष्टितत्त्व से जुड़ा है; दोनों अर्थ अलग स्तर के हैं.

सहस्रनाम 9

अर्थ: ईश्वर, धनुर्धर, मेधावी, अनुत्तम और कृतज्ञ के नाम सामर्थ्य के साथ विवेक और उपकार-स्मृति जोड़ते हैं. व्याख्या: यहाँ केवल शक्ति की नहीं, विवेक और किए गए सत्कर्म की पहचान की भी स्तुति है.

सहस्रनाम 10

अर्थ: सुरेश, शरण, शर्म, विश्वरेता, अहः और संवत्सर—वे आश्रय तथा समय की व्यवस्था से जुड़े हैं. व्याख्या: काल-संबंधी नाम देवता की स्तुति को जीवन के दिन-वर्ष के अनुभव से जोड़ते हैं.

सहस्रनाम 11

अर्थ: अज, अच्युत और सर्वेश्वर के नाम अजन्मा, अविचल आधार तथा योग से परे व्यापक सत्ता को दर्शाते हैं. व्याख्या: ‘अच्युत’ अपने स्वरूप से न च्युत होने वाला है; भक्त के जीवन में हर कठिनाई मिटने का वादा नहीं.

सहस्रनाम 12

अर्थ: वसु, वसुमना, सत्य, सम और पुण्डरीकाक्ष के नाम संपदा, उदारता, सत्य और समभाव को जोड़ते हैं. व्याख्या: बार-बार आने वाले ‘वृष’ पद धर्म और सामर्थ्य की ओर संकेत करते हैं; हर बार एक ही सरल अर्थ पर्याप्त नहीं.

सहस्रनाम 13

अर्थ: रुद्र, बहुशिरा, विश्वयोनि, अमृत और महातपा के नाम व्यापकता, अमरता और तप का बोध देते हैं. व्याख्या: स्तोत्र दूसरे हिन्दू परम्पराओं के नाम भी लेता है, किंतु यहाँ उनका संदर्भ विष्णु-स्तुति है.

सहस्रनाम 14

अर्थ: सर्वग, सर्वविद्, जनार्दन और वेद-वेदाङ्ग से जुड़े नाम सर्वव्यापक ज्ञान को व्यक्त करते हैं. व्याख्या: यहाँ ‘वेद’ ज्ञान और ईश-नाम दोनों है; इसे मनुष्य के हर तथ्य के प्रायोगिक ज्ञान का कथन न समझें.

सहस्रनाम 15

अर्थ: लोकाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, चतुरात्मा, चतुर्व्यूह और चतुर्भुज—ये विविध प्रकट रूपों के नाम हैं. व्याख्या: ‘चतुर्व्यूह’ वैष्णव दर्शन में विशेष अर्थ रखता है; संप्रदायानुसार विवेचन अलग हो सकता है.

सहस्रनाम 16

अर्थ: भ्राजिष्णु, भोजन, भोक्ता, सहिष्णु, विजय और पुनर्वसु के नाम पोषण तथा पुनर्नवीकरण का भाव रखते हैं. व्याख्या: ‘भोजन’ और ‘भोक्ता’ को साथ रखकर परस्पर निर्भरता बताई गई है; यह भोजन-पद्धति का निर्देश नहीं.

सहस्रनाम 17

अर्थ: उपेन्द्र, वामन, अमोघ, शुचि, नियम और यम के नाम अवतार तथा संयम का संगम हैं. व्याख्या: ‘वामन’ अवतार-कथा से और ‘नियम-यम’ आचरण से जुड़े हैं; इनके अर्थों को अलग पहचानें.

सहस्रनाम 18

अर्थ: वेद्य, वैद्य, सदायोगी, अतीन्द्रिय, महाबल के नाम ज्ञेयता, आरोग्य-रूपक और शक्ति का बोध देते हैं. व्याख्या: ‘वैद्य’ जैसे शब्द आरोग्य-रूपक हैं; स्तोत्र पढ़ना किसी रोग के उपचार का प्रमाण नहीं.

सहस्रनाम 19

अर्थ: महाबुद्धि, महावीर्य, महाशक्ति, महाद्युति और अनिर्देश्यवपु—वे शब्दों के परे महिमा दर्शाते हैं. व्याख्या: बार-बार ‘महा’ आने से महिमा का प्रभाव बढ़ता है; इसे संख्यात्मक माप की तरह न लें.

सहस्रनाम 20

अर्थ: महेष्वास, महीभर्ता, श्रीनिवास, गोविन्द और सतां गति में रक्षण और आश्रय का भाव है. व्याख्या: ‘श्रीनिवास’ लक्ष्मी से संबंध दिखाता है; ‘गोविन्द’ की परंपरागत व्युत्पत्तियाँ अनेक हैं.

सहस्रनाम 21

अर्थ: मरीचि, हंस, सुपर्ण, भुजगोत्तम, हिरण्यनाभ और पद्मनाभ विविध सृष्टि-चित्र सामने रखते हैं. व्याख्या: पक्षी, सर्प और नाभि के बिंब प्रतीकात्मक हैं; ये जीव-विज्ञान का वर्णन नहीं हैं.

सहस्रनाम 22

अर्थ: अमृत्यु, सिंह, स्थिर, शास्ता और सुरारिहा के नाम निर्भयता और नियमन का संकेत देते हैं. व्याख्या: युद्ध-संबंधी नाम भक्तिगीत में हैं; इन्हें किसी मनुष्य के प्रति हिंसा का औचित्य न बनाएँ.

सहस्रनाम 23

अर्थ: गुरुतम, धाम, सत्य, वाचस्पति तथा निमिष-अनिमिष के नाम सत्य और दृष्टि के आयाम हैं. व्याख्या: ‘निमिष-अनिमिष’ आँख बंद-खुलने का विरोधाभास है, सतत जागरूकता का काव्यात्मक संकेत.

सहस्रनाम 24

अर्थ: अग्रणी, न्याय, नेता, सहस्रमूर्धा, सहस्राक्ष और विश्वात्मा सर्वव्याप्त नेतृत्व का बोध देते हैं. व्याख्या: सहस्र सिर-नेत्र का आशय ब्रह्मांडीय अनेकता है; यह शारीरिक गणना नहीं.

सहस्रनाम 25

अर्थ: आवर्तन, संवर्तन, वह्नि, अनिल और धरणीधर सृष्टि-चक्र और धारण-शक्ति दिखाते हैं. व्याख्या: सृष्टि के ये क्रियापद निरंतरता, परिवर्तन और लय की धार्मिक रूपक-भाषा हैं.

सहस्रनाम 26

अर्थ: सुप्रसाद, प्रसन्नात्मा, विश्वधृक्, नारायण और नर में कृपा तथा विश्वाधार का भाव है. व्याख्या: ‘नारायण-नर’ के अनेक शास्त्रीय अर्थ हैं; एक लोकव्युत्पत्ति को अंतिम न मानें.

सहस्रनाम 27

अर्थ: असंख्येय, अप्रमेयात्मा, शुचि, सिद्धसंकल्प और सिद्धिसाधन में अगणनीयता और पूर्णता है. व्याख्या: ‘सिद्धि’ का अर्थ सफलता/पूर्णता भी है; इसे अलौकिक शक्ति की गारंटी न बताएँ.

सहस्रनाम 28

अर्थ: वृष-संबंधी नाम धर्म, वृद्धि, विविक्तता और श्रुतिसागर की विशालता व्यक्त करते हैं. व्याख्या: अन्तिम सहस्रनाम शब्द-सूची बनाने से पहले इन समासों के पृथक विशेषज्ञ अर्थ जाँचना आवश्यक है.

सहस्रनाम 29

अर्थ: सुभुज, वाग्मी, महेन्द्र, वसुद, बृहद्रूप और प्रकाशन के नाम वैभव तथा प्रकाश दिखाते हैं. व्याख्या: ‘शिपिविष्ट’ कठिन प्राचीन नाम है; इसके लिए सरल एक-शब्द अर्थ देना भ्रामक हो सकता है.

सहस्रनाम 30

अर्थ: ओजस्, तेजस्, प्रकाशात्मा, मन्त्र, चन्द्रांशु और भास्करद्युति ज्ञान की ज्योति दिखाते हैं. व्याख्या: चन्द्र और सूर्य यहाँ पूरक उपमाएँ हैं, खगोल की प्रतिद्वन्द्वी धारणाएँ नहीं.

सहस्रनाम 31

अर्थ: भानु, सुरेश्वर, औषध, जगतः सेतु और सत्यधर्मपराक्रम में प्रकाश, संरक्षण और धर्मबल है. व्याख्या: ‘औषध’ रूपक है; पाठ को चिकित्सा के स्थान पर रखने का निर्देश नहीं.

सहस्रनाम 32

अर्थ: भूतभव्यभवन्नाथ, पवन, पावन, कामहा और कामप्रद में समय, शुद्धि और इच्छा का द्वंद्व है. व्याख्या: कामना की पूर्ति और उससे ऊपर उठने के नाम साथ हैं; यह हर मानवीय आवश्यकता दबाने का आदेश नहीं.

सहस्रनाम 33

अर्थ: युगादिकृत्, नैकमाय, अदृश्य, व्यक्तरूप और अनन्तजित् सृष्टि और अगोचरता दिखाते हैं. व्याख्या: ‘माया’ की व्याख्या विभिन्न वेदान्तों में अलग है; एक मत को ही अंतिम न मानें.

सहस्रनाम 34

अर्थ: इष्ट, शिष्टेष्ट, क्रोधहा, कर्ता, विश्वबाहु और महीधर में नैतिक अनुशासन तथा शक्ति है. व्याख्या: क्रोध के विपरीत नामों का अर्थ सोच-समझकर करें; अनियंत्रित क्रोध की प्रशंसा नहीं है.

सहस्रनाम 35

अर्थ: अच्युत, प्राण, प्राणद, अपांनिधि और अधिष्ठान जीवन तथा स्थिर आश्रय के नाम हैं. व्याख्या: ‘वासवानुज’ वामन-कथा में इन्द्र के संबंध की ओर संकेत करता है.

सहस्रनाम 36

अर्थ: स्कन्द, धुर्य, वरद, वासुदेव और आदिदेव के नाम जिम्मेदारी, अनुग्रह तथा प्रकाश हैं. व्याख्या: ‘पुरन्दर’ और ‘स्कन्द’ अन्य देव-परंपराओं में भी आते हैं; यहाँ स्तुति का विषय विष्णु हैं.

सहस्रनाम 37

अर्थ: अशोक, तारण, तार, शौरि, अनुकूल और पद्मनिभेक्षण में करुणा तथा साहस है. व्याख्या: कमल-जैसी दृष्टि वीरता और संकट-पार की भाषा के बीच कोमलता जोड़ती है.

सहस्रनाम 38

अर्थ: पद्मनाभ, अरविन्दाक्ष, शरीरभृत्, महर्द्धि और गरुडध्वज में पालन और ऐश्वर्य का भाव है. व्याख्या: गरुड़ध्वज एक मूर्तिकला-संकेत है; आसपास के सारे बिंब शाब्दिक नहीं मानें.

सहस्रनाम 39

अर्थ: अतुल, भीम, सर्वलक्षणलक्षण्य, लक्ष्मीवान और समितिञ्जय महिमा तथा विजय के नाम हैं. व्याख्या: ‘शरभ’ के अर्थ कई संदर्भों में भिन्न हैं; अन्य परंपराओं का इतिहास मिटाए बिना अर्थ दर्ज करें.

सहस्रनाम 40

अर्थ: मार्ग, हेतु, दामोदर, महीधर और वेगवान ईश्वर को साध्य-पथ तथा रक्षक रूप में कहते हैं. व्याख्या: ‘दामोदर’ कृष्ण की डोरी से बाँधने वाली बाल-लीला से जुड़ा है; इसमें प्रेम का अर्थ प्रमुख है.

सहस्रनाम 41

अर्थ: उद्भव, कारण, करण, कर्ता, गहन और गुह सृष्टि के कारण और रहस्य का वर्णन हैं. व्याख्या: ‘करण’ साधन और ‘कारण’ हेतु में भेद है; यह दार्शनिक रूप से महत्वपूर्ण है.

सहस्रनाम 42

अर्थ: व्यवसाय, व्यवस्था, संस्थान, स्थानद, तुष्ट और शुभेक्षण व्यवस्था तथा पोषण दर्शाते हैं. व्याख्या: व्यवस्था की स्तुति का अर्थ किसी विशेष राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था को दैवी आदेश मानना नहीं है.

सहस्रनाम 43

अर्थ: राम, विराम, विरज, मार्ग, नय, धर्म और धर्मविदुत्तम के नाम विश्रान्ति और नीति से जुड़े हैं. व्याख्या: ‘विरज/विरत’ पाठभेद से अर्थ बदलता है; चुना हुआ पाठ तथा विकल्प अलग रखें.

सहस्रनाम 44

अर्थ: वैकुण्ठ, प्राण, प्रणव, हिरण्यगर्भ और अधोक्षज के नाम जीवनीशक्ति तथा इन्द्रियातीतता का बोध देते हैं. व्याख्या: ‘अधोक्षज’ की व्याख्या व्यापक है; एक सीधा हिंदी शब्द सब मत नहीं समेटता.

सहस्रनाम 45

अर्थ: ऋतु, सुदर्शन, काल, संवत्सर, विश्राम और विश्वदक्षिण समय तथा विश्रान्ति का भाव देते हैं. व्याख्या: ‘सुदर्शन’ उत्तम दर्शन और प्रसिद्ध चक्र—दोनों संबंधित अर्थ रख सकता है.

सहस्रनाम 46

अर्थ: विस्तार, प्रमाण, बीज, अर्थ और अनर्थ में जगत् का विस्तार तथा लाभ-हानि से परे सत्ता दिखती है. व्याख्या: ‘अर्थ-अनर्थ’ की जोड़ी अहित का समर्थन नहीं, मूल्य और उसकी सीमाओं का संकेत है.

सहस्रनाम 47

अर्थ: अनिर्विण्ण, धर्मयूप, महामख, नक्षत्री, क्षम और समीहन में यज्ञ, काल और धैर्य है. व्याख्या: ‘धर्मयूप’ ऐतिहासिक यज्ञ-भाषा है; यह लेख अनुष्ठान की विधि नहीं सिखाता.

सहस्रनाम 48

अर्थ: यज्ञ, इज्य, क्रतु, सत्र, विमुक्तात्मा, सर्वज्ञ और ज्ञानमुत्तम में उपासना तथा ज्ञान हैं. व्याख्या: यह पद्य बाह्य अर्पण से आगे जाकर विवेकपूर्ण उपासना में ज्ञान का स्थान बताता है.

सहस्रनाम 49

अर्थ: सुव्रत, सुमुख, सुखद, सुहृत्, जितक्रोध और वीरबाहु मित्रता तथा आत्मसंयम जोड़ते हैं. व्याख्या: ‘जितक्रोध’ आत्मसंयम की स्तुति है; क्रोध अनुभव करने वाले व्यक्ति का अपमान नहीं.

सहस्रनाम 50

अर्थ: स्ववश, व्यापी, नैकात्मा, वत्सल, वत्सी और रत्नगर्भ में व्यापकता तथा वात्सल्य है. व्याख्या: ‘वत्स’ से जुड़े शब्द ब्रह्मांडीय महिमा में स्नेह और निकटता जोड़ते हैं.

सहस्रनाम 51

अर्थ: धर्मगुप्, धर्मकृत्, धर्मी, सत्-असत् और क्षर-अक्षर के नाम जगत् के परिवर्तनशील-अविनाशी स्तर जोड़ते हैं. व्याख्या: ‘सत्-असत्’ और ‘क्षर-अक्षर’ दार्शनिक युग्म हैं, व्यवहार में सच-झूठ का भेद नकारने के लिए नहीं.

सहस्रनाम 52

अर्थ: गभस्तिनेमि, सत्त्वस्थ, आदिदेव, महादेव और देवभृद्गुरु सर्वोच्चता तथा प्रकाश के नाम हैं. व्याख्या: यहाँ शैव परंपरा के परिचित नाम भी हैं; तुलना सावधानी और सम्मान से हो.

सहस्रनाम 53

अर्थ: उत्तरो, गोपति, गोप्ता, ज्ञानगम्य, पुरातन और भूरिदक्षिण पालन तथा दानशीलता के भाव हैं. व्याख्या: ‘गोपति’ का अर्थ गौ, पृथ्वी और इन्द्रिय आदि अनेक व्युत्पत्तियों से जोड़ा जाता है.

सहस्रनाम 54

अर्थ: सोम, अमृत, विनय, जय, सत्यसन्ध और सात्त्वतांपति में नम्रता और वैष्णव पहचान दिखती है. व्याख्या: ‘सात्त्वत’ नाम विशेष वैष्णव परंपरा से जुड़ा है, फिर भी इस पाठ के पाठक व्यापक हैं.

सहस्रनाम 55

अर्थ: जीव, साक्षी, मुकुन्द, अनन्तात्मा तथा अन्तक में सजीवता, मुक्ति और लय के भाव हैं. व्याख्या: ‘मुकुन्द’ मुक्ति से जुड़ता है; ‘अन्तक’ अंत की शक्ति है, मृत्यु की महिमा का निर्देश नहीं.

सहस्रनाम 56

अर्थ: अज, प्रमोदन, आनन्द, नन्द और त्रिविक्रम सहज आनन्द तथा विराट गति का बोध देते हैं. व्याख्या: ‘त्रिविक्रम’ वामन के तीन पगों वाली पौराणिक कथा से जुड़ता है.

सहस्रनाम 57

अर्थ: महर्षि, कपिलाचार्य, मेदिनीपति, त्रिपद और कृतान्तकृत् ज्ञान तथा व्यापक सत्ता व्यक्त करते हैं. व्याख्या: ‘कपिलाचार्य’ की व्याख्या मतभेदपूर्ण हो सकती है; बिना प्रमाण एक ही जीवनकथा न थोपें.

सहस्रनाम 58

अर्थ: महावराह, गोविन्द, गुह्य, गम्भीर तथा चक्रगदाधर अवतार और रहस्य-भाव को जोड़ते हैं. व्याख्या: वराह की छवि पृथ्वी-उद्धार कथा से और चक्र-गदा रक्षण के प्रतीक से जुड़ती है.

सहस्रनाम 59

अर्थ: अजित, कृष्ण, संकर्षण, वरुण, वृक्ष, पुष्कराक्ष तथा महामना अजेयता और आधार दर्शाते हैं. व्याख्या: ‘संकर्षण’ व्यूह तथा कृष्ण-परंपरा में विशिष्ट नाम है; अर्थ सभी मतों में समान नहीं.

सहस्रनाम 60

अर्थ: भगवान्, आनन्दी, वनमाली, हलायुध और आदित्य नाम सौन्दर्य, बल तथा सूर्य-ज्योति को जोड़ते हैं. व्याख्या: ‘हलायुध’ बलराम से जुड़ा है; ऐसे नाम विविध अवतारों को स्तुति में जोड़ते हैं.

सहस्रनाम 61

अर्थ: सुधन्वा, खण्डपरशु, सर्वदृक्, व्यास, वाचस्पति तथा अयोनिज शस्त्र, विद्या और अजन्मा सत्ता दर्शाते हैं. व्याख्या: ‘व्यास’ नाम से महाभारत के हर पाठ-स्तर के ऐतिहासिक रचनाकार का प्रश्न हल नहीं होता.

सहस्रनाम 62

अर्थ: त्रिसामा, सामग, साम, निर्वाण, भेषज, भिषक् और शान्ति संगीत, विरक्ति तथा शान्ति जोड़ते हैं. व्याख्या: चिकित्सा जैसे शब्द भक्तिपरक हैं; उनसे उपचार रोकने की सलाह नहीं निकलती.

सहस्रनाम 63

अर्थ: शुभाङ्ग, शान्तिद, स्रष्टा, गोहित, गोपति और वृषप्रिय में कल्याण और संरक्षण हैं. व्याख्या: ‘गो’ अनेक अर्थ रखता है; इस पद्य को संकीर्ण राजनीतिक अर्थ में सीमित न करें.

सहस्रनाम 64

अर्थ: अनिवर्ती, क्षेमकृत्, श्रीवत्सवक्षाः, श्रीवास और श्रीपति में रक्षा तथा लक्ष्मी-संबंध है. व्याख्या: यह पद लक्ष्मी-विष्णु संबंध का सुंदर उदाहरण है; लक्ष्मी इकाई से जोड़ सकते हैं, काल्पनिक URL नहीं बनाएँ.

सहस्रनाम 65

अर्थ: श्रीद, श्रीश, श्रीनिवास, श्रीधर, श्रेयः और लोकत्रयाश्रय में मंगल तथा व्यापक आश्रय है. व्याख्या: ‘श्री’ देवी और मंगलमय समृद्धि दोनों का पद है; केवल धन तक अर्थ सीमित न रखें.

सहस्रनाम 66

अर्थ: स्वक्ष, शतानन्द, नन्दि, विजितात्मा, सत्कीर्ति तथा छिन्नसंशय प्रसन्नता और आत्मसंयम बताते हैं. व्याख्या: ‘छिन्नसंशय’ मूल संशय के निवारण का भाव है; जिज्ञासा करने पर रोक नहीं.

सहस्रनाम 67

अर्थ: सर्वतश्चक्षुः, शाश्वतस्थिर, भूति, विशोक और शोकनाशन जागरूकता तथा सांत्वना के नाम हैं. व्याख्या: शोकनाशन सांत्वना की भक्तिपरक भाषा है; हर वास्तविक दुःख समाप्त होने की गारंटी नहीं.

सहस्रनाम 68

अर्थ: अर्चिष्मान्, अर्चित, विशुद्धात्मा, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न तथा अमितविक्रम शक्ति और शुद्धि के रूप हैं. व्याख्या: ‘अनिरुद्ध’ और ‘प्रद्युम्न’ कुछ वैष्णव व्यूह-परंपराओं से जुड़े नाम हैं.

सहस्रनाम 69

अर्थ: कालनेमिनिहा, त्रिलोकेश, केशव, केशिहा और हरि रक्षक-अवतार की कथाएँ स्मरण कराते हैं. व्याख्या: दैत्य-नाम पौराणिक कथाओं में हैं; उन्हें जीवित व्यक्तियों पर आरोपित न करें.

सहस्रनाम 70

अर्थ: कामदेव, कामपाल, कान्त, अनिर्देश्यवपुः, अनन्त तथा धनंजय स्नेह और असीमता कहते हैं. व्याख्या: ‘काम’ से बने शब्द इच्छा और प्रेम के सूक्ष्म भेद रखते हैं; सबको एक अर्थ न दें.

सहस्रनाम 71

अर्थ: ब्रह्मण्य, ब्रह्मकृत्, ब्रह्म, ब्रह्मविद्, ब्रह्मज्ञ तथा ब्राह्मणप्रिय ब्रह्मज्ञान की श्रृंखला है. व्याख्या: नपुंसक ‘ब्रह्म’ (परम तत्त्व), ‘ब्रह्मा’ (स्रष्टा) और सामाजिक पदों का भेद आवश्यक है.

सहस्रनाम 72

अर्थ: महाक्रम, महाकर्मा, महातेज, महायज्ञ, महायज्वा और महाहविः सभी यज्ञ-पक्ष जोड़ते हैं. व्याख्या: यज्ञ में अलग दिखाई देने वाली भूमिकाओं को एक ही आधार में रखकर एकता का बोध कराया गया है.

सहस्रनाम 73

अर्थ: स्तव्य, स्तोत्र, स्तुति, स्तोता, पूर्ण तथा पुण्यकीर्ति में आराध्य और आराधना मिलते हैं. व्याख्या: इस पद्य में स्तोत्र, स्तुति और स्तोता एक साथ हैं; पाठ करना भी अर्थ का हिस्सा बनता है.

सहस्रनाम 74

अर्थ: मनोजव, तीर्थकर, वसुप्रद, वासुदेव और हविः गति, पारगमन तथा अर्पण दर्शाते हैं. व्याख्या: बार-बार ‘वसु’ आने से संपदा, निवास और कल्याण जुड़े हैं; व्युत्पत्ति सावधानी से करें.

सहस्रनाम 75

अर्थ: सद्गति, सत्कृति, सत्परायण, यदुश्रेष्ठ और सुयामुन कृष्ण-संबंध तथा कल्याण का बोध देते हैं. व्याख्या: यमुना-संबंधी नाम विराट ईश्वर को एक परिचित भक्तिभूमि से जोड़ते हैं.

सहस्रनाम 76

अर्थ: भूतावास, सर्वासुनिलय, दर्पहा और अपराजित जीवों के आधार और अभिमान-शमन का भाव हैं. व्याख्या: अहंकार हटाने का अर्थ अपने आचरण का अवलोकन है, दूसरे का अपमान नहीं.

सहस्रनाम 77

अर्थ: विश्वमूर्ति, महामूर्ति, अमूर्तिमान्, अनेकमूर्ति और अव्यक्त अनेक रूप एवं अरूप को जोड़ते हैं. व्याख्या: रूप और अरूप की विरोधाभासी भाषा स्तोत्र की व्यापक दृष्टि है, लिपिकीय भूल नहीं.

सहस्रनाम 78

अर्थ: एक, नैक, अनुत्तम पद, लोकबन्धु और भक्तवत्सल एकता, बहुरूपता और स्नेह दिखाते हैं. व्याख्या: ‘कः’ और ‘किं’ जैसे छोटे नामों की विशेष व्याख्या है; साधारण प्रश्नवाचक अर्थ पर्याप्त नहीं.

सहस्रनाम 79

अर्थ: सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वीरहा, अचल और चल तेजस्विता तथा स्थिर-गतिशील विरोधाभास दर्शाते हैं. व्याख्या: ‘शून्य’ को ईश्वर का अभाव कहना उचित नहीं; यह संदर्भ-विशेष दार्शनिक नाम है.

सहस्रनाम 80

अर्थ: अमानी, मानद, मान्य, त्रिलोकधृक्, सुमेधा और सत्यमेधा विनय तथा प्रज्ञा जोड़ते हैं. व्याख्या: ‘अमानी-मानद-मान्य’ अहंकारहीनता, सम्मान देने और सम्मानयोग्यता का भेद दिखाते हैं.

सहस्रनाम 81

अर्थ: तेजोवृष, सर्वशस्त्रभृतांवर, प्रग्रह, निग्रह और गदाग्रज संयमित सामर्थ्य के नाम हैं. व्याख्या: ‘प्रग्रह-निग्रह’ में ग्रहण और रोकना साथ है; शक्ति विवेक से बँधी रहती है.

सहस्रनाम 82

अर्थ: चतुर्मूर्ति, चतुर्व्यूह, चतुर्गतिः, चतुर्वेदविद् और एकपात विविधता में व्यवस्था दर्शाते हैं. व्याख्या: चार-चार के समूह धार्मिक प्रतीकात्मक योजनाएँ हैं; हर वास्तविक वस्तु के चार भाग होने का दावा नहीं.

सहस्रनाम 83

अर्थ: दुर्जय, दुरतिक्रम, दुर्लभ, दुर्गम और दुरारिहा कठिनाई तथा संरक्षण की भाषा है. व्याख्या: कठिनता के नाम साधना में गंभीरता बताते हैं; पाठक में निराशा पैदा करना उद्देश्य नहीं.

सहस्रनाम 84

अर्थ: शुभाङ्ग, लोकसारङ्ग, सुतन्तु, तन्तुवर्धन और महाकर्मा विश्व के ताने-बाने का बोध देते हैं. व्याख्या: ‘तन्तु’ का बिंब संबंधों और निरंतरता का है; यह यांत्रिक नक्शा नहीं.

सहस्रनाम 85

अर्थ: सुन्दर, रत्ननाभ, सुलोचन, अर्क, जयन्त और सर्वविज्जयी सौन्दर्य तथा विजय कहते हैं. व्याख्या: यहाँ रूप-सौन्दर्य, ज्ञान और विजय को एक ही स्तुति में पिरोया गया है.

सहस्रनाम 86

अर्थ: सुवर्णबिन्दु, अक्षोभ्य, सर्ववागीश्वरेश्वर, महाह्रद और महानिधि अपरिमेय गहराई दिखाते हैं. व्याख्या: ताल, गर्त और निधि के रूपक अनन्तता दिखाते हैं, ईश्वर के भौतिक पते नहीं.

सहस्रनाम 87

अर्थ: कुमुद, कुन्द, पर्जन्य, पावन, अमृतांश और सर्वतोमुख जीवनदायी कोमलता बताते हैं. व्याख्या: प्रकृति-बिंब युद्ध-प्रधान पदों के बीच जीवन की परस्पर निर्भरता दिखाते हैं.

सहस्रनाम 88

अर्थ: सुलभ, सुव्रत, सिद्ध, न्यग्रोध, अश्वत्थ और चाणूरनिषूदन निकटता तथा कृष्णकथा जोड़ते हैं. व्याख्या: वृक्ष-नाम धार्मिक प्रतीकों से जुड़े हैं; ‘उदुम्बर’ वाला डिजिटल पाठ मिलान माँगता है.

सहस्रनाम 89

अर्थ: सहस्रार्चि, सप्तजिह्व, अमूर्ति, अचिन्त्य और भयनाशन अग्नि और अगोचरता दर्शाते हैं. व्याख्या: ‘सप्तजिह्व’ वैदिक अग्नि की याद दिलाता है; यहाँ कोई अग्नि-विधि नहीं सिखाई जा रही.

सहस्रनाम 90

अर्थ: अणु, बृहत्, कृश, स्थूल, गुणभृत् और निर्गुण विरोधी आकारों से असीमता दिखाते हैं. व्याख्या: ‘निर्गुण’ का अर्थ वेदान्त-सम्प्रदायों में अलग है; एक अर्थ थोपना उचित नहीं.

सहस्रनाम 91

अर्थ: भारभृत्, योगी, योगीश, आश्रम, श्रमण तथा सर्वकामद आश्रय और प्रयत्न बताते हैं. व्याख्या: ‘श्रमण’ और ‘आश्रम’ को केवल आधुनिक संस्था के अर्थ में न पढ़ें.

सहस्रनाम 92

अर्थ: धनुर्धर, धनुर्वेद, दमयिता, दम और अपराजित संयम के साथ युद्ध-सामर्थ्य जोड़ते हैं. व्याख्या: मुख्य भाव अनुशासन है, किसी को धमकाने का धार्मिक आधार नहीं.

सहस्रनाम 93

अर्थ: सत्त्ववान्, सात्त्विक, सत्यधर्मपरायण, प्रियकृत् और प्रीतिवर्धन सच्चाई तथा प्रेम जोड़ते हैं. व्याख्या: ‘सत्त्व’ दार्शनिक गुण भी है और सामान्य सद्गुण भी; इन दोनों स्तरों को पहचानें.

सहस्रनाम 94

अर्थ: विहायसगति, ज्योति, रवि, सूर्य और सविता जगत् को प्रकाशित करने वाली ज्योति हैं. व्याख्या: सूर्य-नाम होने से यह पाठ वैदिक सावित्री/गायत्री मन्त्र बन नहीं जाता.

सहस्रनाम 95

अर्थ: अनन्त, सुखद, अग्रज, सदामर्षी और लोकाधिष्ठान अनन्तता तथा धैर्य का भाव हैं. व्याख्या: ‘सदामर्षी’ सहनशीलता का भाव है; अन्याय के प्रति निष्क्रिय रहने का आदेश नहीं.

सहस्रनाम 96

अर्थ: सनातनतम, कपिल, अव्यय, स्वस्तिद और स्वस्तिकृत् शुभता एवं अनश्वरता बताते हैं. व्याख्या: ‘स्वस्ति’ कल्याण का मंगल-सूचक पद है, माँगने पर परिणाम की गारंटी नहीं.

सहस्रनाम 97

अर्थ: अरौद्र, चक्री, विक्रमी, शब्दातिग, शिशिर और शर्वरीकर शक्ति के साथ शीतलता जोड़ते हैं. व्याख्या: ‘शब्दातिग’ बताता है कि नामों से स्तुति करते हुए भी परम तत्त्व शब्द से परे है.

सहस्रनाम 98

अर्थ: अक्रूर, पेशल, दक्ष, क्षमिणांवर, वीतभय तथा पुण्यश्रवणकीर्तन सद्व्यवहार और निर्भयता कहते हैं. व्याख्या: यह कोमल भाषा स्तोत्र के उग्र और विराट वर्णनों का संतुलन करती है.

सहस्रनाम 99

अर्थ: उत्तारण, दुष्कृतिहा, रक्षण, जीवन और दुःस्वप्ननाशन संकट से पार लगाने का भाव हैं. व्याख्या: स्वप्न और रक्षा के वर्णन आस्था-भाषा हैं; नींद संबंधी चिकित्सकीय परिणाम का वादा नहीं.

सहस्रनाम 100

अर्थ: अनन्तरूप, अनन्तश्री, जितमन्यु, गभीरात्मा और दिशो व्यापकता तथा संयम दिखाते हैं. व्याख्या: दिशाओं की भाषा सर्वव्यापकता बताती है, नक्शे के निर्देशांक नहीं.

सहस्रनाम 101

अर्थ: अनादि, लक्ष्मी, जनन, जनजन्मादि, भीम और भीमपराक्रम में जन्म और संरक्षण है. व्याख्या: विष्णु-स्तोत्र में ‘लक्ष्मी’ को व्याकरण और देवी-संबंध दोनों के संदर्भ से पढ़ना चाहिए.

सहस्रनाम 102

अर्थ: आधारनिलय, प्रजागर, सत्पथाचार, प्राणद और प्रणव जीवन तथा उचित आचरण दिखाते हैं. व्याख्या: ‘प्रणव’ पवित्र अक्षर का नाम है; यहाँ किसी दीक्षा-प्रक्रिया का विधान नहीं है.

सहस्रनाम 103

अर्थ: प्रमाण, प्राणनिलय, प्राणजीवन, तत्त्व और जन्ममृत्युजरातिगः जीवनाधार और परम सत्य कहते हैं. व्याख्या: ‘तत्त्व’ वास्तविक सिद्धान्त है; जन्म-मृत्यु से परे नाम जैविक अमरता का वादा नहीं.

सहस्रनाम 104

अर्थ: भूर्भुवःस्वस्तरु, सविता, प्रपितामह, यज्ञ, यज्ञपति और यज्ञवाहन विश्व-आधार तथा अर्पण हैं. व्याख्या: यज्ञ के अनेक पद एक दार्शनिक एकता व्यक्त करते हैं; यह यज्ञ-विधि पुस्तिका नहीं.

सहस्रनाम 105

अर्थ: यज्ञभृत्, यज्ञकृत्, यज्ञगुह्य, अन्न और अन्नाद में यज्ञ का पूर्ण चक्र समाया है. व्याख्या: ‘अन्न-अन्नाद’ पद्य 16 के पोषण-भाव को पूर्ण करता है; इसमें परस्पर आश्रय प्रकट है.

सहस्रनाम 106

अर्थ: आत्मयोनि, स्वयंजात, सामगायन, देवकीनन्दन, स्रष्टा और पापनाशन उत्पत्ति तथा कृष्णकथा जोड़ते हैं. व्याख्या: ‘देवकीनन्दन’ विश्वव्यापक स्तुति को कृष्ण के जीवन-कथानक से जोड़ता है.

सहस्रनाम 107

अर्थ: शङ्खभृत्, नन्दकी, चक्री, शार्ङ्गधन्वा, गदाधर और सर्वप्रहरणायुध अंतिम आयुध-नाम हैं. व्याख्या: ये आयुध-नाम सहस्रनाम के मूल क्रम का समापन हैं; कुछ पाठों में अंतिम नाम दोहराकर रक्षा-पद्य अलग पढ़ा जाता है.

फलश्रुति: अर्थ और ऐतिहासिक संदर्भ

फलश्रुति 1

अर्थ: भीष्म कहते हैं कि स्तुत्य केशव के दिव्य सहस्रनाम पूरे सुनाए गए हैं. व्याख्या: यह नाम-क्रम का समापन है; स्वयं सहस्र नामों में अगला नाम नहीं है.

फलश्रुति 2

अर्थ: यहाँ सुनने और कीर्तन को इस लोक तथा परलोक में मंगलकारी बताया गया है. व्याख्या: यह फलश्रुति की पारंपरिक प्रतिज्ञा है, परीक्षण योग्य निश्चित परिणाम नहीं.

फलश्रुति 3

अर्थ: इस पद्य में उस काल के वर्ण-सम्बन्धी शब्दों द्वारा भिन्न लाभ बताए गए हैं. व्याख्या: वर्णाधारित प्राचीन भाषा को ईमानदारी से समझाएँ; जन्म-आधारित भेदभाव का समर्थन नहीं है.

फलश्रुति 4

अर्थ: धर्म, अर्थ, कामना या संतान चाहने वालों के लिए फल की आशा व्यक्त की गई है. व्याख्या: इसे भक्तिपरक आशा समझें, संतान या धन की निश्चित प्राप्ति का वादा नहीं.

फलश्रुति 5

अर्थ: इस पद्य में भक्तिभाव और एकाग्रचित्त से वासुदेव के नामों का स्मरण करने वाले की चर्चा है. व्याख्या: यहाँ शुद्धि धार्मिक साहित्य का प्रसंग है; इससे पाठ पढ़ने पर किसी के प्रवेश-प्रतिबंध का नियम न निकालें.

फलश्रुति 6

अर्थ: यहाँ यश, सम्मान, स्थिर श्री और परम श्रेय की भक्तिपरक कामना है. व्याख्या: ‘श्रेयस्’ का अर्थ क्षणिक सांसारिक लाभ से कहीं व्यापक हो सकता है.

फलश्रुति 7

अर्थ: निर्भयता, तेज, शक्ति और आरोग्य को अपेक्षित फल बताया गया है. व्याख्या: इससे रोग-प्रतिरोध की चिकित्सकीय गारंटी सिद्ध नहीं होती.

फलश्रुति 8

अर्थ: रोग, बंधन, भय और विपत्ति से मुक्ति की प्रार्थनात्मक आशा व्यक्त है. व्याख्या: रोग-विषयक कथन पारंपरिक विश्वास है; ज़रूरत पर उपचार आवश्यक रहता है.

फलश्रुति 9

अर्थ: यह पुरुषोत्तम की भक्ति से कठिनाइयाँ पार करने का विश्वास व्यक्त करता है. व्याख्या: मुख्य बिंब संकट-पार करना है, व्यवहारिक प्रयत्न छोड़ देना नहीं.

फलश्रुति 10

अर्थ: वासुदेव में आश्रय लेने वाले को चित्तशुद्धि तथा सनातन ब्रह्म की ओर अग्रसर बताया है. व्याख्या: यह आध्यात्मिक आदर्श है, किसी व्यक्ति के नैतिक मूल्य का आकलन नहीं.

फलश्रुति 11

अर्थ: वासुदेव-भक्ति से जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग के भय से ऊपर उठने का भाव है. व्याख्या: यह पद्य नहीं कहता कि उपासक को वास्तविक वृद्धावस्था या बीमारी नहीं होगी.

फलश्रुति 12

अर्थ: श्रद्धा से पाठ को आत्मसुख, क्षमा, धैर्य, स्मृति और यश से जोड़ा गया है. व्याख्या: ये सार्थक नैतिक आकांक्षाएँ हैं; आवश्यक मानसिक स्वास्थ्य-सेवा का विकल्प नहीं.

फलश्रुति 13

अर्थ: आदर्श भक्त को मत्सर, लोभ, क्रोध और अशुभ विचार से दूर बताया गया है. व्याख्या: यह नैतिक प्रेरणा है, साधारण मानवीय कमी के कारण किसी को लज्जित करने का आधार नहीं.

फलश्रुति 14

अर्थ: आकाश, सूर्य-चन्द्र, दिशाओं, पृथ्वी और महासागर को वासुदेव से धारित कहा गया है. व्याख्या: यह भक्तिपरक विश्व-दृष्टि है, खगोलीय प्रक्रिया का वैज्ञानिक वर्णन नहीं.

फलश्रुति 15

अर्थ: देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष और अन्य प्राणी कृष्ण की व्यापक सत्ता में स्थित बताए गए हैं. व्याख्या: ये पौराणिक वर्ग हैं; उन्हें आधुनिक मनुष्यों के समूहों पर आरोपित न करें.

फलश्रुति 16

अर्थ: इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ वासुदेवात्मक माने गए हैं. व्याख्या: ‘क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ’ की भाषा गीता की याद दिलाती है, किंतु दोनों पाठ अलग हैं.

फलश्रुति 17

अर्थ: यहाँ आचार को प्रथम और धर्म का आधार कहा गया है; अच्युत धर्माधिपति हैं. व्याख्या: ‘आचार’ पर बल बताता है कि केवल पाठ नहीं, जीवन का व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण है.

फलश्रुति 18

अर्थ: ऋषि, पितर, देव और समस्त चर-अचर जगत् को नारायण से उद्भूत कहा गया है. व्याख्या: यह पवित्र उत्पत्ति की धार्मिक अवधारणा है, जैविक वंशावली नहीं.

फलश्रुति 19

अर्थ: योग, ज्ञान, सांख्य, शिल्प, विद्या और शास्त्र जनार्दन से उत्पन्न बताए गए हैं. व्याख्या: विद्या की व्यापकता यहाँ प्रशंसनीय है; स्वतंत्र जिज्ञासा रोकना इसका उद्देश्य नहीं.

फलश्रुति 20

अर्थ: एक विष्णु अनगिनत पृथक प्राणियों और तीनों लोकों में अविनाशी आत्मरूप से व्यापते हैं. व्याख्या: एकता और विविधता दोनों कही गई हैं; सभी दर्शन एक ही मत के नहीं बन जाते.

फलश्रुति 21

अर्थ: श्रेय और सुख चाहने वाले के लिए व्यास-कीर्तित स्तोत्र पढ़ने की प्रेरणा दी गई है. व्याख्या: ‘व्यास’ ग्रंथ की परंपरागत प्रामाणिकता बताते हैं; महाकाव्य के पाठ-इतिहास का प्रश्न अलग है.

फलश्रुति 22

अर्थ: अंत में अज, अव्यय और पुष्कराक्ष प्रभु की भक्ति से पराभव न होने की आशा व्यक्त है. व्याख्या: यह आध्यात्मिक आश्वासन है, हर सांसारिक प्रतियोगिता में विजय की गारंटी नहीं.

ऐतिहासिक एवं पाठ-संबंधी टिप्पणियाँ

  • कथास्थिति: अनुशासन पर्व में भीष्म युधिष्ठिर को उपदेश देते हैं। व्यास-सम्बन्ध परंपरागत है; इस डिजिटल पाठ से स्वतंत्र ऐतिहासिक लेखक प्रमाणित नहीं होता।
  • सीमा: आरम्भ के १३ संवाद-श्लोक + १०७ नाम-श्लोक + अंत के २२ फलश्रुति-श्लोक = १४२। प्रचलित रक्षा-पद्य इस चयनित क्रम का अंग नहीं है।
  • पाठभेद: मुख्य श्लोक ४३ में विरजो चुना है जबकि विरतो का विकल्प भी दर्ज है। श्लोक ५४ का विनयो जयः और ८८ के वृक्ष-नामों को विशेषज्ञ से मिलाना होगा।
  • अर्थ की सीमा: कई नामों की व्याकरणिक और दार्शनिक व्याख्याएँ अलग हैं। यहाँ हर श्लोक का भावार्थ है; एक-एक हज़ार नामों का अंतिम भाषाशास्त्रीय कोश नहीं।
  • पाठ और अनुष्ठान: न्यास या विशेष अनुष्ठान की विधि यहाँ नहीं दी गई है; परंपरागत व्यवहार की समीक्षा अलग से आवश्यक है।
  • फलश्रुति: रोग, धन, भय और वर्ण-भेद की भाषा प्राचीन पाठ का हिस्सा है; यह लेख उससे चिकित्सा-आर्थिक गारंटी या भेदभाव का समर्थन नहीं करता।
  • अधिकार: चुना हुआ डिजिटल स्रोत संस्कृत डॉक्यूमेंट्स से आए पाठ को श्रेय देता है; वेबसाइट के सार्वजनिक/विज्ञापनयुक्त उपयोग से पहले स्वतंत्र ऐतिहासिक पाठ-मिलान या स्पष्ट अनुमति आवश्यक है।

प्रश्न और उत्तर

१०७ मुख्य श्लोक हैं तो १०८ क्यों कहे जाते हैं? इस महाभारत पाठ में मूल नामावली के १०७ श्लोक हैं। बाद में प्रसिद्ध रक्षा-पद्य वनमाली गदी शार्ङ्गी जोड़कर अनेक पाठ-पुस्तिकाएँ १०८ गिनती हैं; उसे यहाँ मूल १४२ श्लोकों में नहीं मिलाया है।

क्या हज़ारों नामों में हर नाम का अलग अर्थ भी है? इस संस्करण में मूल १०७ नाम-श्लोक पूरे हैं और प्रत्येक का अर्थ-विश्लेषण है। ठीक १००० नामों की पृथक संधि-विच्छेद वाली शब्द-सूची अभी स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं है।

क्या यह शंकराचार्य की रचना है? इसका ऐसा ऐतिहासिक प्रमाण नहीं दिया गया है। यह महाभारत में भीष्म-वचन और व्यास से जुड़ी परंपरा है; शंकराचार्य की प्रसिद्ध टीका अलग परंपरा का विषय है।

क्या इससे सभी विशेष अनुष्ठानों की विधि मिल जाएगी? नहीं। यह शैक्षिक पाठ है; न्यास, दीक्षा, होम और व्यक्तिगत व्रत की पद्धति नहीं सिखाता।

क्या फलश्रुति के लाभ निश्चित हैं? नहीं। इन्हें भक्तिपरक आस्था के रूप में समझें; स्वास्थ्य, आजीविका और व्यवहारिक फैसलों के लिए सामान्य सावधानी आवश्यक है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on Viṣṇusahasranāmastotram (Sanskrit Wikisource digital recension). Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    śrutvā dharmānaśeṣeṇa pāvanāni ca sarvaśaḥ| yudhiṣṭhiraḥ śāntanavaṃ punarevābhyabhāṣata||1||

  2. 2

    kimekaṃ daivataṃ loke kiṃ vāpyekaṃ parāyaṇam| stuvantaḥ kaṃ kamarcantaḥ prāpnuyurmānavāḥ śubham||2||

  3. 3

    ko dharmaḥ sarvadharmāṇāṃ bhavataḥ paramo mataḥ| kiṃ japanmucyate janturjanmasaṃsārabandhanāt||3||

  4. 4

    jagatprabhuṃ devadevamanantaṃ puruṣottamam| stuvan nāmasahasreṇa puruṣaḥ satatotthitaḥ||4||

  5. 5

    tameva cārcayannityaṃ bhaktyā puruṣamavyayam| dhyāyan stuvan namasyaṃśca yajamānastameva ca||5||

  6. 6

    anādinidhanaṃ viṣṇuṃ sarvalokamaheśvaram| lokādhyakṣaṃ stuvannityaṃ sarvaduḥkhātigo bhavet||6||

  7. 7

    brahmaṇyaṃ sarvadharmajñaṃ lokānāṃ kīrtivardhanam| lokanāthaṃ mahadbhūtaṃ sarvabhūtabhavodbhavam||7||

  8. 8

    eṣa me sarvadharmāṇāṃ dharmo'dhikatamo mataḥ| yadbhaktyā puṇḍarīkākṣaṃ stavairarcennaraḥ sadā||8||

  9. 9

    paramaṃ yo mahattejaḥ paramaṃ yo mahattapaḥ| paramaṃ yo mahadbrahma paramaṃ yaḥ parāyaṇam||9||

  10. 10

    pavitrāṇāṃ pavitraṃ yo maṅgalānāṃ ca maṅgalam| daivataṃ daivatānāṃ ca bhūtānāṃ yo'vyayaḥ pitā||10||

  11. 11

    yataḥ sarvāṇi bhūtāni bhavantyādiyugāgame| yasmiṃśca pralayaṃ yānti punareva yugakṣaye||11||

  12. 12

    tasya lokapradhānasya jagannāthasya bhūpate| viṣṇornāmasahasraṃ me śṛṇu pāpabhayāpaham||12||

  13. 13

    yāni nāmāni gauṇāni vikhyātāni mahātmanaḥ| ṛṣibhiḥ parigītāni tāni vakṣyāmi bhūtaye||13||

  14. 14

    viśvaṃ viṣṇurvaṣaṭkāro bhūtabhavyabhavatprabhuḥ| bhūtakṛdbhūtabhṛdbhāvo bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ||1||

  15. 15

    pūtātmā paramātmā ca muktānāṃ paramā gatiḥ| avyayaḥ puruṣaḥ sākṣī kṣetrajño'kṣara eva ca||2||

  16. 16

    yogo yogavidāṃ netā pradhānapuruṣeśvaraḥ| nārasiṃhavapuḥ śrīmān keśavaḥ puruṣottamaḥ||3||

  17. 17

    sarvaḥ śarvaḥ śivaḥ sthāṇurbhūtādirnidhiravyayaḥ| saṃbhavo bhāvano bhartā prabhavaḥ prabhurīśvaraḥ||4||

  18. 18

    svayaṃbhūḥ śambhurādityaḥ puṣkarākṣo mahāsvanaḥ| anādinidhano dhātā vidhātā dhāturuttamaḥ||5||

  19. 19

    aprameyo hṛṣīkeśaḥ padmanābho'maraprabhuḥ| viśvakarmā manustvaṣṭā sthaviṣṭhaḥ sthaviro dhruvaḥ||6||

  20. 20

    agrāhyaḥ śāśvataḥ kṛṣṇo lohitākṣaḥ pratardanaḥ| prabhūtastrikakubdhāma pavitraṃ maṅgalaṃ param||7||

  21. 21

    īśānaḥ prāṇadaḥ prāṇo jyeṣṭhaḥ śreṣṭhaḥ prajāpatiḥ| hiraṇyagarbho bhūgarbho mādhavo madhusūdanaḥ||8||

  22. 22

    īśvaro vikramī dhanvī medhāvī vikramaḥ kramaḥ| anuttamo durādharṣaḥ kṛtajñaḥ kṛtirātmavān||9||

  23. 23

    sureśaḥ śaraṇaṃ śarma viśvaretāḥ prajābhavaḥ| ahaḥ saṃvatsaro vyālaḥ pratyayaḥ sarvadarśanaḥ||10||

  24. 24

    ajaḥ sarveśvaraḥ siddhaḥ siddhiḥ sarvādiracyutaḥ| vṛṣākapirameyātmā sarvayogaviniḥsṛtaḥ||11||

  25. 25

    vasurvasumanāḥ satyaḥ samātmā'sammitaḥ samaḥ| amoghaḥ puṇḍarīkākṣo vṛṣakarmā vṛṣākṛtiḥ||12||

  26. 26

    rudro bahuśirā babhrurviśvayoniḥ śuciśravāḥ| amṛtaḥ śāśvataḥ sthāṇurvarāroho mahātapāḥ||13||

  27. 27

    sarvagaḥ sarvavidbhānurviṣvakseno janārdanaḥ| vedo vedavidavyaṅgo vedāṅgo vedavit kaviḥ||14||

  28. 28

    lokādhyakṣaḥ surādhyakṣo dharmādhyakṣaḥ kṛtākṛtaḥ| caturātmā caturvyūhaścaturdaṃṣṭraścaturbhujaḥ||15||

  29. 29

    bhrājiṣṇurbhojanaṃ bhoktā sahiṣṇurjagadādijaḥ| anagho vijayo jetā viśvayoniḥ punarvasuḥ||16||

  30. 30

    upendro vāmanaḥ prāṃśuramoghaḥ śucirūrjitaḥ| atīndraḥ saṃgrahaḥ sargo dhṛtātmā niyamo yamaḥ||17||

  31. 31

    vedyo vaidyaḥ sadāyogī vīrahā mādhavo madhuḥ| atīndriyo mahāmāyo mahotsāho mahābalaḥ||18||

  32. 32

    mahābuddhirmahāvīryo mahāśaktirmahādyutiḥ| anirdeśyavapuḥ śrīmānameyātmā mahādridhṛk||19||

  33. 33

    maheṣvāso mahībhartā śrīnivāsaḥ satāṃ gatiḥ| aniruddhaḥ surānando govindo govidāṃ patiḥ||20||

  34. 34

    marīcirdamano haṃsaḥ suparṇo bhujagottamaḥ| hiraṇyanābhaḥ sutapāḥ padmanābhaḥ prajāpatiḥ||21||

  35. 35

    amṛtyuḥ sarvadṛk siṃhaḥ sandhātā sandhimān sthiraḥ| ajo durmarṣaṇaḥ śāstā viśrutātmā surārihā||22||

  36. 36

    gururgurutamo dhāma satyaḥ satyaparākramaḥ| nimiṣo'nimiṣaḥ sragvī vācaspatirudāradhīḥ||23||

  37. 37

    agraṇīrgrāmaṇīḥ śrīmān nyāyo netā samīraṇaḥ| sahasramūrdhā viśvātmā sahasrākṣaḥ sahasrapāt||24||

  38. 38

    āvartano nivṛttātmā saṃvṛtaḥ saṃpramardanaḥ| ahaḥ saṃvartako vahniranilo dharaṇīdharaḥ||25||

  39. 39

    suprasādaḥ prasannātmā viśvadhṛgviśvabhugvibhuḥ| satkartā satkṛtaḥ sādhurjahnurnārāyaṇo naraḥ||26||

  40. 40

    asaṃkhyeyo'prameyātmā viśiṣṭaḥ śiṣṭakṛcchuciḥ| siddhārthaḥ siddhasaṃkalpaḥ siddhidaḥ siddhisādhanaḥ||27||

  41. 41

    vṛṣāhī vṛṣabho viṣṇurvṛṣaparvā vṛṣodaraḥ| vardhano vardhamānaśca viviktaḥ śrutisāgaraḥ||28||

  42. 42

    subhujo durdharo vāgmī mahendro vasudo vasuḥ| naikarūpo bṛhadrūpaḥ śipiviṣṭaḥ prakāśanaḥ||29||

  43. 43

    ojastejodyutidharaḥ prakāśātmā pratāpanaḥ| ṛddhaḥ spaṣṭākṣaro mantraścandrāṃśurbhāskaradyutiḥ||30||

  44. 44

    amṛtāṃśūdbhavo bhānuḥ śaśabinduḥ sureśvaraḥ| auṣadhaṃ jagataḥ setuḥ satyadharmaparākramaḥ||31||

  45. 45

    bhūtabhavyabhavannāthaḥ pavanaḥ pāvano'nalaḥ| kāmahā kāmakṛtkāntaḥ kāmaḥ kāmapradaḥ prabhuḥ||32||

  46. 46

    yugādikṛdyugāvarto naikamāyo mahāśanaḥ| adṛśyo vyaktarūpaśca sahasrajidanantajit||33||

  47. 47

    iṣṭo'viśiṣṭaḥ śiṣṭeṣṭaḥ śikhaṇḍī nahuṣo vṛṣaḥ| krodhahā krodhakṛtkartā viśvabāhurmahīdharaḥ||34||

  48. 48

    acyutaḥ prathitaḥ prāṇaḥ prāṇado vāsavānujaḥ| apāṃnidhiradhiṣṭhānamapramattaḥ pratiṣṭhitaḥ||35||

  49. 49

    skandaḥ skandadharo dhuryo varado vāyuvāhanaḥ| vāsudevo bṛhadbhānurādidevaḥ purandaraḥ||36||

  50. 50

    aśokastāraṇastāraḥ śūraḥ śaurirjaneśvaraḥ| anukūlaḥ śatāvartaḥ padmī padmanibhekṣaṇaḥ||37||

  51. 51

    padmanābho'ravindākṣaḥ padmagarbhaḥ śarīrabhṛt| maharddhirṛddho vṛddhātmā mahākṣo garuḍadhvajaḥ||38||

  52. 52

    atulaḥ śarabho bhīmaḥ samayajño havirhariḥ| sarvalakṣaṇalakṣaṇyo lakṣmīvān samitiñjayaḥ||39||

  53. 53

    vikṣaro rohito mārgo heturdāmodaraḥ sahaḥ| mahīdharo mahābhāgo vegavānamitāśanaḥ||40||

  54. 54

    udbhavaḥ kṣobhaṇo devaḥ śrīgarbhaḥ parameśvaraḥ| karaṇaṃ kāraṇaṃ kartā vikartā gahano guhaḥ||41||

  55. 55

    vyavasāyo vyavasthānaḥ saṃsthānaḥ sthānado dhruvaḥ| pararddhiḥ paramaspaṣṭastuṣṭaḥ puṣṭaḥ śubhekṣaṇaḥ||42||

  56. 56

    rāmo virāmo virajo mārgo neyo nayo'nayaḥ| vīraḥ śaktimatāṃ śreṣṭho dharmo dharmaviduttamaḥ||43||

  57. 57

    vaikuṇṭhaḥ puruṣaḥ prāṇaḥ prāṇadaḥ praṇavaḥ pṛthuḥ| hiraṇyagarbhaḥ śatrughno vyāpto vāyuradhokṣajaḥ||44||

  58. 58

    ṛtuḥ sudarśanaḥ kālaḥ parameṣṭhī parigrahaḥ| ugraḥ saṃvatsaro dakṣo viśrāmo viśvadakṣiṇaḥ||45||

  59. 59

    vistāraḥ sthāvarasthāṇuḥ pramāṇaṃ bījamavyayam| artho'nartho mahākośo mahābhogo mahādhanaḥ||46||

  60. 60

    anirviṇṇaḥ sthaviṣṭho'bhūrdharmayūpo mahāmakhaḥ| nakṣatranemirnakṣatrī kṣamaḥ kṣāmaḥ samīhanaḥ||47||

  61. 61

    yajña ijyo mahejyaśca kratuḥ satraṃ satāṃ gatiḥ| sarvadarśī vimuktātmā sarvajño jñānamuttamam||48||

  62. 62

    suvrataḥ sumukhaḥ sūkṣmaḥ sughoṣaḥ sukhadaḥ suhṛt| manoharo jitakrodho vīrabāhurvidāraṇaḥ||49||

  63. 63

    svāpanaḥ svavaśo vyāpī naikātmā naikakarmakṛt| vatsaro vatsalo vatsī ratnagarbho dhaneśvaraḥ||50||

  64. 64

    dharmagubdharmakṛddharmī sadasatkṣaramakṣaram| avijñātā sahasrāṃśurvidhātā kṛtalakṣaṇaḥ||51||

  65. 65

    gabhastinemiḥ sattvasthaḥ siṃho bhūtamaheśvaraḥ| ādidevo mahādevo deveśo devabhṛdguruḥ||52||

  66. 66

    uttaro gopatirgoptā jñānagamyaḥ purātanaḥ| śarīrabhūtabhṛdbhoktā kapīndro bhūridakṣiṇaḥ||53||

  67. 67

    somapo'mṛtapaḥ somaḥ purujitpurusattamaḥ| vinayo jayaḥ satyasaṃdho dāśārhaḥ sāttvatāṃpatiḥ||54||

  68. 68

    jīvo vinayitā sākṣī mukundo'mitavikramaḥ| ambhonidhiranantātmā mahodadhiśayo'ntakaḥ||55||

  69. 69

    ajo mahārhaḥ svābhāvyo jitāmitraḥ pramodanaḥ| ānando nandano nandaḥ satyadharmā trivikramaḥ||56||

  70. 70

    maharṣiḥ kapilācāryaḥ kṛtajño medinīpatiḥ| tripadastridaśādhyakṣo mahāśṛṅgaḥ kṛtāntakṛt||57||

  71. 71

    mahāvarāho govindaḥ suṣeṇaḥ kanakāṅgadī| guhyo gabhīro gahano guptaścakragadādharaḥ||58||

  72. 72

    vedhāḥ svāṅgo'jitaḥ kṛṣṇo dṛḍhaḥ saṃkarṣaṇo'cyutaḥ| varuṇo vāruṇo vṛkṣaḥ puṣkarākṣo mahāmanāḥ||59||

  73. 73

    bhagavān bhagahā''nandī vanamālī halāyudhaḥ| ādityo jyotirādityaḥ sahiṣṇurgatisattamaḥ||60||

  74. 74

    sudhanvā khaṇḍaparaśurdāruṇo draviṇapradaḥ| divaḥspṛk sarvadṛgvyāso vācaspatirayonijaḥ||61||

  75. 75

    trisāmā sāmagaḥ sāma nirvāṇaṃ bheṣajaṃ bhiṣak| saṃnyāsakṛcchamaḥ śānto niṣṭhā śāntiḥ parāyaṇam||62||

  76. 76

    śubhāṅgaḥ śāntidaḥ sraṣṭā kumudaḥ kuvaleśayaḥ| gohito gopatirgoptā vṛṣabhākṣo vṛṣapriyaḥ||63||

  77. 77

    anivartī nivṛttātmā saṃkṣeptā kṣemakṛcchivaḥ| śrīvatsavakṣāḥ śrīvāsaḥ śrīpatiḥ śrīmatāṃvaraḥ||64||

  78. 78

    śrīdaḥ śrīśaḥ śrīnivāsaḥ śrīnidhiḥ śrīvibhāvanaḥ| śrīdharaḥ śrīkaraḥ śreyaḥ śrīmām̐llokatrayāśrayaḥ||65||

  79. 79

    svakṣaḥ svaṅgaḥ śatānando nandirjyotirgaṇeśvaraḥ| vijitātmā'vidheyātmā satkīrtiśchinnasaṃśayaḥ||66||

  80. 80

    udīrṇaḥ sarvataścakṣuranīśaḥ śāśvatasthiraḥ| bhūśayo bhūṣaṇo bhūtirviśokaḥ śokanāśanaḥ||67||

  81. 81

    arciṣmānarcitaḥ kumbho viśuddhātmā viśodhanaḥ| aniruddho'pratirathaḥ pradyumno'mitavikramaḥ||68||

  82. 82

    kālaneminihā vīraḥ śauriḥ śūrajaneśvaraḥ| trilokātmā trilokeśaḥ keśavaḥ keśihā hariḥ||69||

  83. 83

    kāmadevaḥ kāmapālaḥ kāmī kāntaḥ kṛtāgamaḥ| anirdeśyavapurviṣṇurvīro'nanto dhanaṃjayaḥ||70||

  84. 84

    brahmaṇyo brahmakṛd brahmā brahma brahmavivardhanaḥ| brahmavid brāhmaṇo brahmī brahmajño brāhmaṇapriyaḥ||71||

  85. 85

    mahākramo mahākarmā mahātejā mahoragaḥ| mahākraturmahāyajvā mahāyajño mahāhaviḥ||72||

  86. 86

    stavyaḥ stavapriyaḥ stotraṃ stutiḥ stotā raṇapriyaḥ| pūrṇaḥ pūrayitā puṇyaḥ puṇyakīrtiranāmayaḥ||73||

  87. 87

    manojavastīrthakaro vasuretā vasupradaḥ| vasuprado vāsudevo vasurvasumanā haviḥ||74||

  88. 88

    sadgatiḥ satkṛtiḥ sattā sadbhūtiḥ satparāyaṇaḥ| śūraseno yaduśreṣṭhaḥ sannivāsaḥ suyāmunaḥ||75||

  89. 89

    bhūtāvāso vāsudevaḥ sarvāsunilayo'nalaḥ| darpahā darpado dṛpto durdharo'thāparājitaḥ||76||

  90. 90

    viśvamūrtirmahāmūrtirdīptamūrtiramūrtimān| anekamūrtiravyaktaḥ śatamūrtiḥ śatānanaḥ||77||

  91. 91

    eko naikaḥ savaḥ kaḥ kiṃ yat tatpadamanuttamam| lokabandhurlokanātho mādhavo bhaktavatsalaḥ||78||

  92. 92

    suvarṇavarṇo hemāṅgo varāṅgaścandanāṅgadī| vīrahā viṣamaḥ śūnyo ghṛtāśīracalaścalaḥ||79||

  93. 93

    amānī mānado mānyo lokasvāmī trilokadhṛk| sumedhā medhajo dhanyaḥ satyamedhā dharādharaḥ||80||

  94. 94

    tejovṛṣo dyutidharaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ| pragraho nigraho vyagro naikaśṛṅgo gadāgrajaḥ||81||

  95. 95

    caturmūrtiścaturbāhuścaturvyūhaścaturgatiḥ| caturātmā caturbhāvaścaturvedavidekapāt||82||

  96. 96

    samāvarto'nivṛttātmā durjayo duratikramaḥ| durlabho durgamo durgo durāvāso durārihā||83||

  97. 97

    śubhāṅgo lokasāraṅgaḥ sutantustantuvardhanaḥ| indrakarmā mahākarmā kṛtakarmā kṛtāgamaḥ||84||

  98. 98

    udbhavaḥ sundaraḥ sundo ratnanābhaḥ sulocanaḥ| arko vājasanaḥ śṛṅgī jayantaḥ sarvavijjayī||85||

  99. 99

    suvarṇabindurakṣobhyaḥ sarvavāgīśvareśvaraḥ| mahāhrado mahāgarto mahābhūto mahānidhiḥ||86||

  100. 100

    kumudaḥ kundaraḥ kundaḥ parjanyaḥ pāvano'nilaḥ| amṛtāṃśo'mṛtavapuḥ sarvajñaḥ sarvatomukhaḥ||87||

  101. 101

    sulabhaḥ suvrataḥ siddhaḥ śatrujicchatrutāpanaḥ| nyagrodho'dumbaro'śvatthaścāṇūrāndhraniṣūdanaḥ||88||

  102. 102

    sahasrārciḥ saptajihvaḥ saptaidhāḥ saptavāhanaḥ| amūrtiranagho'cintyo bhayakṛdbhayanāśanaḥ||89||

  103. 103

    aṇurbṛhatkṛśaḥ sthūlo guṇabhṛnnirguṇo mahān| adhṛtaḥ svadhṛtaḥ svāsyaḥ prāgvaṃśo vaṃśavardhanaḥ||90||

  104. 104

    bhārabhṛt kathito yogī yogīśaḥ sarvakāmadaḥ| āśramaḥ śramaṇaḥ kṣāmaḥ suparṇo vāyuvāhanaḥ||91||

  105. 105

    dhanurdharo dhanurvedo daṇḍo damayitā damaḥ| aparājitaḥ sarvasaho niyantā'niyamo'yamaḥ||92||

  106. 106

    sattvavān sāttvikaḥ satyaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ| abhiprāyaḥ priyārho'rhaḥ priyakṛt prītivardhanaḥ||93||

  107. 107

    vihāyasagatirjyotiḥ surucirhutabhugvibhuḥ| ravirvirocanaḥ sūryaḥ savitā ravilocanaḥ||94||

  108. 108

    ananto hutabhugbhoktā sukhado naikajo'grajaḥ| anirviṇṇaḥ sadāmarṣī lokādhiṣṭhānamadbhutaḥ||95||

  109. 109

    sanātsanātanatamaḥ kapilaḥ kapiravyayaḥ| svastidaḥ svastikṛtsvasti svastibhuksvastidakṣiṇaḥ||96||

  110. 110

    araudraḥ kuṇḍalī cakrī vikramyūrjitaśāsanaḥ| śabdātigaḥ śabdasahaḥ śiśiraḥ śarvarīkaraḥ||97||

  111. 111

    akrūraḥ peśalo dakṣo dakṣiṇaḥ kṣamiṇāṃvaraḥ| vidvattamo vītabhayaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ||98||

  112. 112

    uttāraṇo duṣkṛtihā puṇyo duḥsvapnanāśanaḥ| vīrahā rakṣaṇaḥ santo jīvanaḥ paryavasthitaḥ||99||

  113. 113

    anantarūpo'nantaśrīrjitamanyurbhayāpahaḥ| caturaśro gabhīrātmā vidiśo vyādiśo diśaḥ||100||

  114. 114

    anādirbhūrbhuvo lakṣmīḥ suvīro rucirāṅgadaḥ| janano janajanmādirbhīmo bhīmaparākramaḥ||101||

  115. 115

    ādhāranilayo'dhātā puṣpahāsaḥ prajāgaraḥ| ūrdhvagaḥ satpathācāraḥ prāṇadaḥ praṇavaḥ paṇaḥ||102||

  116. 116

    pramāṇaṃ prāṇanilayaḥ prāṇabhṛtprāṇajīvanaḥ| tattvaṃ tattvavidekātmā janmamṛtyujarātigaḥ||103||

  117. 117

    bhūrbhuvaḥsvastarustāraḥ savitā prapitāmahaḥ| yajño yajñapatiryajvā yajñāṅgo yajñavāhanaḥ||104||

  118. 118

    yajñabhṛd yajñakṛd yajñī yajñabhuk yajñasādhanaḥ| yajñāntakṛd yajñaguhyamannamannāda eva ca||105||

  119. 119

    ātmayoniḥ svayaṃjāto vaikhānaḥ sāmagāyanaḥ| devakīnandanaḥ sraṣṭā kṣitīśaḥ pāpanāśanaḥ||106||

  120. 120

    śaṅkhabhṛnnandakī cakrī śārṅgadhanvā gadādharaḥ| rathāṅgapāṇirakṣobhyaḥ sarvapraharaṇāyudhaḥ||107||

  121. 121

    itīdaṃ kīrtanīyasya keśavasya mahātmanaḥ| nāmnāṃ sahasraṃ divyānāmaśeṣeṇa prakīrtitam||1||

  122. 122

    ya idaṃ śṛṇuyānnityaṃ yaścāpi parikīrtayet| nāśubhaṃ prāpnuyātkiṃcitso'mutreha ca mānavaḥ||2||

  123. 123

    vedāntago brāhmaṇaḥ syātkṣatriyo vijayī bhavet| vaiśyo dhanasamṛddhaḥ syācchūdraḥ sukhamavāpnuyāt||3||

  124. 124

    dharmārthī prāpnuyāddharmamarthārthī cārthamāpnuyāt| kāmānavāpnuyātkāmī prajārthī cāpnuyātprajām||4||

  125. 125

    bhaktimān yaḥ sadotthāya śucistadgatamānasaḥ| sahasraṃ vāsudevasya nāmnāmetatprakīrtayet||5||

  126. 126

    yaśaḥ prāpnoti vipulaṃ jñātiprādhānyameva ca| acalāṃ śriyamāpnoti śreyaḥ prāpnotyanuttamam||6||

  127. 127

    na bhayaṃ kvacidāpnoti vīryaṃ tejaśca vindati| bhavatyarogo dyutimānbalarūpaguṇānvitaḥ||7||

  128. 128

    rogārto mucyate rogādbaddho mucyeta bandhanāt| bhayānmucyeta bhītastu mucyetāpanna āpadaḥ||8||

  129. 129

    durgāṇyatitaratyāśu puruṣaḥ puruṣottamam| stuvannāmasahasreṇa nityaṃ bhaktisamanvitaḥ||9||

  130. 130

    vāsudevāśrayo martyo vāsudevaparāyaṇaḥ| sarvapāpaviśuddhātmā yāti brahma sanātanam||10||

  131. 131

    na vāsudevabhaktānāmaśubhaṃ vidyate kvacit| janmamṛtyujarāvyādhibhayaṃ naivopajāyate||11||

  132. 132

    imaṃ stavamadhīyānaḥ śraddhābhaktisamanvitaḥ| yujyetātmasukhakṣāntiśrīdhṛtismṛtikīrtibhiḥ||12||

  133. 133

    na krodho na ca mātsaryaṃ na lobho nāśubhā matiḥ| bhavanti kṛtapuṇyānāṃ bhaktānāṃ puruṣottame||13||

  134. 134

    dyauḥ sacandrārkanakṣatrā khaṃ diśo bhūrmahodadhiḥ| vāsudevasya vīryeṇa vidhṛtāni mahātmanaḥ||14||

  135. 135

    sasurāsuragandharvaṃ sayakṣoragarākṣasam| jagadvaśe vartatedaṃ kṛṣṇasya sacarācaram||15||

  136. 136

    indriyāṇi mano buddhiḥ sattvaṃ tejo balaṃ dhṛtiḥ| vāsudevātmakānyāhuḥ kṣetraṃ kṣetrajña eva ca||16||

  137. 137

    sarvāgamānāmācāraḥ prathamaṃ parikalpyate| ācāraprabhavo dharmo dharmasya prabhuracyutaḥ||17||

  138. 138

    ṛṣayaḥ pitaro devā mahābhūtāni dhātavaḥ| jaṅgamājaṅgamaṃ cedaṃ jagannārāyaṇodbhavam||18||

  139. 139

    yogo jñānaṃ tathā sāṃkhyaṃ vidyāḥ śilpādikarma ca| vedāḥ śāstrāṇi vijñānametatsarvaṃ janārdanāt||19||

  140. 140

    eko viṣṇurmahadbhūtaṃ pṛthagbhūtānyanekaśaḥ| trīṃllokānvyāpya bhūtātmā bhuṅkte viśvabhugavyayaḥ||20||

  141. 141

    imaṃ stavaṃ bhagavato viṣṇorvyāsena kīrtitam| paṭhedya icchetpuruṣaḥ śreyaḥ prāptuṃ sukhāni ca||21||

  142. 142

    viśveśvaramajaṃ devaṃ jagataḥ prabhumavyayam| bhajanti ye puṣkarākṣaṃ na te yānti parābhavam||22||

स्रोत और प्रकाशन-स्थिति

  • 1 — Viṣṇusahasranāmastotram (Sanskrit Wikisource digital recension): https://sa.wikisource.org/wiki/विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्‌
  • 2 — Works of Sri Sankaracharya, Vol. 13: Viṣṇusahasranāma and Sanatsujātīya bhāṣyas: https://www.valkala.com/vishnu-sahasranamam
  • 3 — Sri Vishnu Sahasranaamam, Project Gutenberg eBook #9000: https://www.gutenberg.org/ebooks/9000
  • 4 — Viṣṇusahasranāma manuscript catalogue, IIC Samhita 2.0: https://samhitadev.iicdelhi.in/manuscripts/visnusahasranama-ms-coll-390item-2327
  • 5 — Viṣṇusahasranāma 1, Sanskrit Documents: https://sanskritdocuments.org/doc_vishhnu/vsahasranew.html
  • 6 — The Teaching of Viṣṇusahasranāma (Arsha Vidyananda): https://arshavidyananda.in/wp-content/uploads/2024/09/The-Teaching-of-Vi%E1%B9%A3%E1%B9%87usahasranama-Final.pdf
  • 7 — Vishnu Sahasranama with the Bhashya of Sri Sankaracharya, translated by R. Ananthakrishna Sastry, 2nd ed.: https://sarvakosh.com/hi/granth/vishnu-sahasranama-stotram-shankara-bhashya
  • 8 — Sanskrit Documents home and copying FAQ: https://www.sanskritdocuments.org/faq/
  • 9 — Wikisource copyright policy: https://en.wikisource.org/wiki/Wikisource:Copyright_policy

**

  1. Viṣṇusahasranāmastotram (Sanskrit Wikisource digital recension) · स्रोत खोलें
  2. Works of Sri Sankaracharya, Vol. 13: Viṣṇusahasranāma and Sanatsujātīya bhāṣyas · स्रोत खोलें
  3. Sri Vishnu Sahasranaamam, Project Gutenberg eBook #9000 · स्रोत खोलें
  4. Viṣṇusahasranāma manuscript catalogue, IIC Samhita 2.0 · स्रोत खोलें
  5. Viṣṇusahasranāma 1, Sanskrit Documents · स्रोत खोलें
  6. The Teaching of Viṣṇusahasranāma (Arsha Vidyananda) · स्रोत खोलें
  7. Vishnu Sahasranama with the Bhashya of Sri Sankaracharya, translated by R. Ananthakrishna Sastry, 2nd ed. · स्रोत खोलें
  8. Sanskrit Documents home and copying FAQ · स्रोत खोलें
  9. Wikisource copyright policy · स्रोत खोलें