पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

आरती

ॐ जय जगदीश हरे — भगवान विष्णु की आरती

भगवान विष्णु की चयनित आरती का पूरा पाठ, हिंदी भावार्थ और सावधानीपूर्वक स्रोत-परीक्षण।

पठन की सेटिंग

सेटिंग इस पृष्ठ के URL में रहती है और पिछले या अगले अध्याय में भी लागू होती है। इसे सहेजने के लिए URL बुकमार्क करें। देवनागरी का विशेष पठन फ़ॉन्ट बना रहेगा।

सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

अर्थ

जगत् के स्वामी हरि की जय हो। भक्त ईश्वर को ऐसे कृपालु स्वामी के रूप में पुकारता है जो अपने भक्तों और सेवकों के संकट पल भर में दूर करने में समर्थ हैं।

व्याख्या

“जगदीश” अर्थात् जगत् के ईश्वर और “हरि” विशेषतः विष्णु से जुड़ा प्रिय नाम है। “भक्त जन” तथा “दास जन” यहाँ दो बंद सामाजिक वर्ग नहीं, बल्कि प्रेम और विनम्र सेवा के भाव हैं। “क्षण में” विश्वास की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है; इससे हर कठिनाई तत्काल समाप्त होने की निश्चित सांसारिक गारंटी नहीं मिलती। यही टेक आगे के पदों के बीच सामूहिक स्वर को जोड़ती है।

2

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ

जो ईश्वर का ध्यान करता है वह अपने दुःख कम होने, घर में मंगल और समृद्धि आने तथा शारीरिक कठिनाइयों से राहत मिलने की कामना करता है।

व्याख्या

“ध्यावे” का आशय ध्यान करना और मन में स्मरण रखना है। “फल” साधक की अपेक्षित कृपा का बोध कराता है। मन का दुःख, घर का कल्याण और शरीर का कष्ट—तीनों सामान्य मानवीय चिंताएँ एक ही पद में आ जाती हैं। इन वाक्यों को भक्ति की प्रार्थना समझें; आरती गाने को बीमारी, गरीबी या मानसिक परेशानी का सुनिश्चित उपचार न मानें। चुने हुए पाठ में “सम्पति” लिखा है; आधुनिक वर्तनी में “सम्पत्ति” भी मिलता है।

3

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी॥

ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ

आप मेरे माता-पिता समान हैं; आपकी शरण छोड़कर मैं किसके पास जाऊँ? मेरी अंतिम आशा और भरोसा आप पर ही है।

व्याख्या

यहाँ “मात-पिता” का संबोधन स्नेह और पालन की निकटता लाता है; यह कोई पारिवारिक या लिंग-आधारित सिद्धांत स्थापित करने का प्रयास नहीं है। “शरण” विश्वास और आश्रय का भाव है, इसका अर्थ संसार के संबंधों, कर्तव्यों या आवश्यकता पड़ने पर मिलने वाली सहायता को छोड़ देना नहीं है। “तुम बिन” की पुनरुक्ति इस व्यक्तिगत पुकार को गहरी बनाती है।

4

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥

ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ

आप पूर्ण परमात्मा, सबके भीतर की बात जानने वाले अंतर्यामी, परब्रह्म परमेश्वर और समस्त जीवों के स्वामी हैं।

व्याख्या

यह पद आरती का सबसे स्पष्ट दार्शनिक भाग है। “परमात्मा” सर्वोच्च आत्मतत्त्व, “अंतर्यामी” भीतर विद्यमान या भीतर की बात जानने वाले ईश्वर और “परब्रह्म” परम सत्य की ओर संकेत करता है। अलग-अलग वेदान्त परंपराएँ जीव, जगत् और ईश्वर का संबंध अलग ढंग से समझाती हैं। यह आरती उन सभी मतभेदों का समाधान घोषित नहीं करती; यहाँ ये नाम श्रद्धा और स्तुति के लिए साथ आए हैं।

5

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥

ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ

आप करुणा के सागर और पालनकर्ता हैं। मैं अपनी अज्ञानता तथा फल की चाह स्वीकार करता हूँ; आपका सेवक होकर कृपा माँगता हूँ।

व्याख्या

चुने हुए साक्ष्य में “फलकामी” है—अर्थात् फल की चाह रखने वाला। दूसरे प्रचलित पाठों में “खल कामी” मिलता है, जिसका भाव नैतिक दुर्बलता की ओर मुड़ता है; दोनों को चुपचाप मिलाना उचित नहीं। “भर्ता” का अर्थ पालनकर्ता या पोषण करने वाला है। भक्त की विनम्रता का अर्थ स्वयं से घृणा नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं को स्वीकार करके सुधार की इच्छा रखना है।

6

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥

ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ

आप सामान्य इंद्रिय-बोध से परे होकर भी सभी प्राणियों के आधार हैं। हे दयामय, अल्प समझ वाला मैं आपको कैसे पा सकूँ?

व्याख्या

“अगोचर” इंद्रियों की साधारण पकड़ से परे का संकेत है; इससे परमात्मा को जगत् से सर्वथा अनुपस्थित मानना आवश्यक नहीं। “प्राणपति” सभी प्राणियों के आधारस्वरूप प्रभु का संबोधन है। “तुमको मैं कुमति” लोकभाषा का कठिन संक्षिप्त प्रयोग है। यहाँ भक्त स्वयं की अल्पबुद्धि मानकर पूछता है कि कृपालु ईश्वर तक कैसे पहुँचे। प्रश्न किसी गुप्त साधना-विधि का निर्देश नहीं बनता।

7

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ

आप दीन-दुःखियों के मित्र और दुःख दूर करने वाले रक्षक हैं। कृपया रक्षा का हाथ बढ़ाकर मुझे शरण दें; मैं आपके द्वार आया हूँ।

व्याख्या

“दीनबंधु” वह मित्र है जो दुःख और असहायता में साथ खड़ा हो। “ठाकुर” यहाँ सम्मान और आत्मीयता का देव-संबोधन है; इसे आधुनिक सामाजिक ऊँच-नीच के सिद्धांत से नहीं जोड़ना चाहिए। उठे हुए हाथ में अभय और संरक्षण की कल्पना दिखाई देती है। द्वार पर आया भक्त अपनी असुरक्षा छिपाता नहीं। यह छवि समुदाय को भी याद दिलाती है कि शरण माँगने वालों के प्रति करुणा आवश्यक है।

8
विषय-सूची पर लौटें

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

ॐ जय जगदीश हरे।

अर्थ

हानिकारक आसक्तियाँ और अनुचित कर्मों की प्रवृत्ति कम हों; श्रद्धा और भक्ति बढ़े, तथा संत-सज्जनों की सेवा का भाव विकसित हो।

व्याख्या

अंतिम पद में प्रार्थना बाहरी संकटों से हटकर आचरण-सुधार की ओर बढ़ती है। “विषय-विकार” इंद्रिय-विषयों से जुड़ी ऐसी आसक्तियाँ हैं जो विवेक को विकृत कर दें; इसका अर्थ प्रत्येक सामान्य सुख को दोष देना नहीं है। “सन्तन” का अर्थ यहाँ संत अथवा सज्जन हैं, संतान यानी बच्चे नहीं। आरती का समापन केवल लाभ माँगने में नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और सेवा में होता है।

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित संपादकीय पाठ: BhaktiBharat का मुखड़ा और उसके बाद सात पद (कुल आठ पाठ-खंड)। नीचे पूरी चयनित आरती मूल हिंदी शब्दों में देवनागरी लिपि में है। स्रोत-पाठ अभी आंशिक रूप से सत्यापित है; पुराने मुद्रित साक्ष्य और पुनर्प्रकाशन-अधिकार की अलग पुष्टि आवश्यक है। 1 2

मुखड़ा / टेक

भावार्थ: जगत् के स्वामी हरि की जय हो। भक्त ईश्वर को ऐसे कृपालु स्वामी के रूप में पुकारता है जो अपने भक्तों और सेवकों के संकट पल भर में दूर करने में समर्थ हैं। विस्तृत व्याख्या: “जगदीश” अर्थात् जगत् के ईश्वर और “हरि” विशेषतः विष्णु से जुड़ा प्रिय नाम है। “भक्त जन” तथा “दास जन” यहाँ दो बंद सामाजिक वर्ग नहीं, बल्कि प्रेम और विनम्र सेवा के भाव हैं। “क्षण में” विश्वास की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है; इससे हर कठिनाई तत्काल समाप्त होने की निश्चित सांसारिक गारंटी नहीं मिलती। यही टेक आगे के पदों के बीच सामूहिक स्वर को जोड़ती है।

पद १ — स्मरण और आशा

भावार्थ: जो ईश्वर का ध्यान करता है वह अपने दुःख कम होने, घर में मंगल और समृद्धि आने तथा शारीरिक कठिनाइयों से राहत मिलने की कामना करता है। विस्तृत व्याख्या: “ध्यावे” का आशय ध्यान करना और मन में स्मरण रखना है। “फल” साधक की अपेक्षित कृपा का बोध कराता है। मन का दुःख, घर का कल्याण और शरीर का कष्ट—तीनों सामान्य मानवीय चिंताएँ एक ही पद में आ जाती हैं। इन वाक्यों को भक्ति की प्रार्थना समझें; आरती गाने को बीमारी, गरीबी या मानसिक परेशानी का सुनिश्चित उपचार न मानें। चुने हुए पाठ में “सम्पति” लिखा है; आधुनिक वर्तनी में “सम्पत्ति” भी मिलता है।

पद २ — माता-पिता और शरण

भावार्थ: आप मेरे माता-पिता समान हैं; आपकी शरण छोड़कर मैं किसके पास जाऊँ? मेरी अंतिम आशा और भरोसा आप पर ही है। विस्तृत व्याख्या: यहाँ “मात-पिता” का संबोधन स्नेह और पालन की निकटता लाता है; यह कोई पारिवारिक या लिंग-आधारित सिद्धांत स्थापित करने का प्रयास नहीं है। “शरण” विश्वास और आश्रय का भाव है, इसका अर्थ संसार के संबंधों, कर्तव्यों या आवश्यकता पड़ने पर मिलने वाली सहायता को छोड़ देना नहीं है। “तुम बिन” की पुनरुक्ति इस व्यक्तिगत पुकार को गहरी बनाती है।

पद ३ — अंतर्यामी परमात्मा

भावार्थ: आप पूर्ण परमात्मा, सबके भीतर की बात जानने वाले अंतर्यामी, परब्रह्म परमेश्वर और समस्त जीवों के स्वामी हैं। विस्तृत व्याख्या: यह पद आरती का सबसे स्पष्ट दार्शनिक भाग है। “परमात्मा” सर्वोच्च आत्मतत्त्व, “अंतर्यामी” भीतर विद्यमान या भीतर की बात जानने वाले ईश्वर और “परब्रह्म” परम सत्य की ओर संकेत करता है। अलग-अलग वेदान्त परंपराएँ जीव, जगत् और ईश्वर का संबंध अलग ढंग से समझाती हैं। यह आरती उन सभी मतभेदों का समाधान घोषित नहीं करती; यहाँ ये नाम श्रद्धा और स्तुति के लिए साथ आए हैं।

पद ४ — करुणा और आत्मस्वीकार

भावार्थ: आप करुणा के सागर और पालनकर्ता हैं। मैं अपनी अज्ञानता तथा फल की चाह स्वीकार करता हूँ; आपका सेवक होकर कृपा माँगता हूँ। विस्तृत व्याख्या: चुने हुए साक्ष्य में “फलकामी” है—अर्थात् फल की चाह रखने वाला। दूसरे प्रचलित पाठों में “खल कामी” मिलता है, जिसका भाव नैतिक दुर्बलता की ओर मुड़ता है; दोनों को चुपचाप मिलाना उचित नहीं। “भर्ता” का अर्थ पालनकर्ता या पोषण करने वाला है। भक्त की विनम्रता का अर्थ स्वयं से घृणा नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं को स्वीकार करके सुधार की इच्छा रखना है।

पद ५ — अगोचर और मिलन की आकांक्षा

भावार्थ: आप सामान्य इंद्रिय-बोध से परे होकर भी सभी प्राणियों के आधार हैं। हे दयामय, अल्प समझ वाला मैं आपको कैसे पा सकूँ? विस्तृत व्याख्या: “अगोचर” इंद्रियों की साधारण पकड़ से परे का संकेत है; इससे परमात्मा को जगत् से सर्वथा अनुपस्थित मानना आवश्यक नहीं। “प्राणपति” सभी प्राणियों के आधारस्वरूप प्रभु का संबोधन है। “तुमको मैं कुमति” लोकभाषा का कठिन संक्षिप्त प्रयोग है। यहाँ भक्त स्वयं की अल्पबुद्धि मानकर पूछता है कि कृपालु ईश्वर तक कैसे पहुँचे। प्रश्न किसी गुप्त साधना-विधि का निर्देश नहीं बनता।

पद ६ — दीनों के सखा

भावार्थ: आप दीन-दुःखियों के मित्र और दुःख दूर करने वाले रक्षक हैं। कृपया रक्षा का हाथ बढ़ाकर मुझे शरण दें; मैं आपके द्वार आया हूँ। विस्तृत व्याख्या: “दीनबंधु” वह मित्र है जो दुःख और असहायता में साथ खड़ा हो। “ठाकुर” यहाँ सम्मान और आत्मीयता का देव-संबोधन है; इसे आधुनिक सामाजिक ऊँच-नीच के सिद्धांत से नहीं जोड़ना चाहिए। उठे हुए हाथ में अभय और संरक्षण की कल्पना दिखाई देती है। द्वार पर आया भक्त अपनी असुरक्षा छिपाता नहीं। यह छवि समुदाय को भी याद दिलाती है कि शरण माँगने वालों के प्रति करुणा आवश्यक है।

पद ७ — भक्ति, संयम और सेवा

भावार्थ: हानिकारक आसक्तियाँ और अनुचित कर्मों की प्रवृत्ति कम हों; श्रद्धा और भक्ति बढ़े, तथा संत-सज्जनों की सेवा का भाव विकसित हो। विस्तृत व्याख्या: अंतिम पद में प्रार्थना बाहरी संकटों से हटकर आचरण-सुधार की ओर बढ़ती है। “विषय-विकार” इंद्रिय-विषयों से जुड़ी ऐसी आसक्तियाँ हैं जो विवेक को विकृत कर दें; इसका अर्थ प्रत्येक सामान्य सुख को दोष देना नहीं है। “सन्तन” का अर्थ यहाँ संत अथवा सज्जन हैं, संतान यानी बच्चे नहीं। आरती का समापन केवल लाभ माँगने में नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और सेवा में होता है।

यह आरती क्या है?

“ॐ जय जगदीश हरे” हरि/विष्णु को जगदीश, अर्थात् जगत् के ईश्वर के रूप में संबोधित करने वाली हिंदी आरती है। अनेक परिवारों और मंदिरों में इसे पूजा के अंत में मिलकर गाया जाता है। भगवान सत्यनारायण की उपासना से भी इसका विशेष संबंध बताया जाता है। फिर भी इसके अनेक संबोधन इतने व्यापक हैं कि दूसरी देव-पूजाओं के अंत में भी लोग इसका गायन करते हैं। यह लोकप्रयोग की बात है; इससे सभी संप्रदायों के दार्शनिक मत एक जैसे होने का निष्कर्ष नहीं निकलता। 1 2

“आरती” शब्द दीप द्वारा सम्मान व्यक्त करने की एक सामान्य धार्मिक क्रिया और साथ में गाए जाने वाले भक्ति-गीत—दोनों का नाम हो सकता है। यहाँ मुख्य विषय गाए जाने वाले शब्द, उनका अर्थ और स्रोत हैं; यह कोई अनिवार्य विधि-पुस्तिका नहीं है। आरती के लिए निश्चित संख्या में दीप घुमाने, किसी खास संख्या में पाठ करने या निश्चित परिणाम पाने का दावा नहीं किया जा रहा।

वस्तुओं के वर्णन से अधिक, रिश्तों की प्रार्थना

कई देव-स्तुतियाँ आयुधों, वाहनों, आभूषणों और दिव्य रूप का विस्तार से वर्णन करती हैं। इस आरती की विशेषता भिन्न है। इसमें भगवान से माता-पिता, अंतर्यामी, करुणामय पालनकर्ता, रक्षक, दीनबंधु और आत्मिक आश्रय के रूप में बातचीत होती है। प्रारम्भ में संकट से रक्षा की पुकार है; अंत में विश्वास, संयम और सज्जनों की सेवा करने की आकांक्षा है। इस क्रम को आठ यांत्रिक फल देने वाले अलग-अलग मंत्रों की सूची की तरह न पढ़ें। “स्वामी” की बार-बार पुकार भक्ति का अपनापन और समर्पण दिखाती है। “दास” का भाव ऐतिहासिक भक्तिभाषा में स्वेच्छा से ईश्वर की सेवा के लिए विनम्रता है, मनुष्यों के बीच अन्यायपूर्ण अधीनता का आदर्श नहीं।

हरि, जगदीश, परमात्मा और परब्रह्म

हरि विशेषकर विष्णु का प्रिय नाम है; जगदीश का अर्थ जगत् के ईश्वर से है। परमात्मा और परब्रह्म परम सत्य की भाषा हैं, जबकि अंतर्यामी हृदय में रहने या भीतर की बात जानने वाले प्रभु का संबोधन है। एक ही गीत में भक्त कहता है “मात पिता तुम मेरे” और “तुम सब के स्वामी”। निजी स्नेह और व्यापक दर्शन इस प्रकार जुड़ते हैं। 2

अलग-अलग वैष्णव, वेदान्त, शैव और शाक्त मत इन शब्दों को एक समान दार्शनिक अर्थ नहीं देते। शिवगोरक्ष पर इस रचना को विष्णु-भक्ति की पहचान के साथ प्रस्तुत करना उचित है, न कि उसकी व्यापक लोकप्रियता को आधार बनाकर मूल रूप से शैव गीत घोषित कर देना।

आरती में कही गई कृपा और वास्तविक जीवन की देखभाल

आरती में मन का दुःख, शरीर का कष्ट, सुख-संपत्ति और संकट दूर होने की प्रार्थना है। ये भक्ति-काव्य के दावे और आशाएँ हैं, चिकित्सा, धन या मनोवैज्ञानिक परिणाम का वैज्ञानिक परीक्षण नहीं। किसी की तबीयत खराब हो तो आरती उसके लिए आश्वासन का भाव दे सकती है, पर निदान, उपचार या जरूरी सहायता का विकल्प नहीं बनती। इसी तरह “क्षण में दूर करे” किसी व्यक्ति के लिए समय-बद्ध गारंटी नहीं है। अंतिम पद में एक व्यावहारिक सीख भी है—अपनी आसक्तियों पर ध्यान देना, श्रद्धा को संवेदनशीलता में बदलना और संत-सज्जनों की सेवा का भाव रखना। यह आरती को केवल निजी लाभ माँगने का गीत बनने से बचाता है।

रचना-काल और रचयिता: प्रमाण की सीमा

इस प्रसिद्ध आरती का श्रेय आमतौर पर पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी (श्रद्धाराम शर्मा) को दिया जाता है। दैनिक जागरण के २०२२ के जीवन-परिचय में उनका जीवनकाल १८३७–१८८१ और रचना-काल लगभग १८७० बताया गया है। यह प्रचलित श्रेय का प्रकाशित ऐतिहासिक विवरण है; इस संस्करण के लिए किसी लेखक-हस्ताक्षरयुक्त पांडुलिपि अथवा सबसे पुराने मुद्रण की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। 5

रचयिता का ऐतिहासिक प्रमाण, रचना का सबसे पुराना मूल पाठ और आज गाया जाने वाला पाठ—ये तीन अलग प्रश्न हैं। नई रिकॉर्डिंग और वेबसाइटें कभी-कभी अतिरिक्त पंक्तियों या आधुनिक वर्तनी के साथ प्रस्तुत करती हैं। अतः “परंपरा में श्रेय दिया जाता है” को बिना नए प्रमाण “निर्विवाद प्रमाणित” नहीं लिखना चाहिए।

कितने पद हैं? चुना हुआ पाठ और अन्य पाठभेद

इस पृष्ठ का पूरा चयनित पाठ BhaktiBharat में दिखाई देने वाले आठ खंडों पर आधारित है—एक मुखड़ा और उसके बाद सात पद। बीच-बीच में टेक को अलग से दिखाया गया है, पर उसे नए स्वतंत्र पद की गणना में नहीं रखा गया है। 1 कुछ वेबसाइटें पुनरुक्त पंक्तियाँ संक्षिप्त कर देती हैं। Drik Panchang के पाठ में “शिवानन्द स्वामी” की छाप वाला एक अतिरिक्त समापन-पद है, जो इस चयनित पाठ में नहीं है। कुछ जगह “तन मन धन…” का प्रचलित समर्पण-पद गाया जाता है। इन अन्य रूपों को मूल चुने हुए पाठ में चुपचाप नहीं जोड़ा गया। 2 3 6

विशेष रूप से चौथे पद में चुना गया शब्द “फलकामी” है, जबकि दूसरे पाठ में “खल कामी” मिलता है। दोनों के अर्थ अलग हैं। अंतिम पद के ऑनलाइन रूप में “पाप(कष्ट)” जैसा संपादकीय विकल्प तथा “स्वमी” जैसी स्पष्ट वर्तनी-त्रुटि है; इन्हें मूल गीत का अतिरिक्त शब्द नहीं बनाया गया। अतः चुने हुए आधुनिक ऑनलाइन पाठ के आठ खंड पूरे हैं, लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी का प्रामाणिक मूल पाठ अभी आंशिक रूप से सत्यापित है।

शिवगोरक्ष में इसका स्थान

शिवगोरक्ष का प्रमुख विषय शिव–शक्ति–नाथ परंपराएँ हैं, पर विष्णु-संबंधी भक्ति-पाठ भी आध्यात्मिक संदर्भ और तुलनात्मक अध्ययन में उपयोगी हैं। “शरण” और “सेवा” जैसे भाव अनेक भक्ति-परंपराओं में मिलते हैं; इससे उनके अपने-अपने इतिहास तथा दार्शनिक भेद मिट नहीं जाते। यह आरती न तो वैदिक ऋचा है, न भगवद्गीता का श्लोक और न किसी पुराण का प्रमाणित उद्धरण; यह अपेक्षाकृत आधुनिक हिंदी भक्ति-रचना है।

मुख्य शब्दों का सरल परिचय

शब्दअर्थविशेष ध्यान
जगदीशजगत् के ईश्वरयहाँ विष्णु से संबंधित नाम
हरिविष्णु का प्रिय नामअन्य भक्ति-संदर्भों में भी आता है
शरणआश्रय, भरोसास्वयं के कर्तव्य छोड़ना नहीं
अंतर्यामीभीतर का ज्ञातामतों में व्याख्या भिन्न हो सकती है
अगोचरइंद्रियों की पकड़ से परेजगत् से अनुपस्थित होना अनिवार्य नहीं
फलकामीफल की इच्छा रखने वाला“खल कामी” अलग पाठभेद है
दीनबंधुदुखियों के मित्रकरुणा का नैतिक आदर्श
संतनसंतों, सज्जनों कीयहाँ “संतान” अर्थात् बच्चे नहीं

सामान्य प्रश्न

१. “ॐ जय जगदीश हरे” किसकी आरती है? मुख्य रूप से भगवान विष्णु/हरि की; दूसरे सामुदायिक पूजन-अवसरों पर भी गायी जाती है। 2

२. अंग्रेजी पृष्ठ पर आरती का अंग्रेजी अनुवाद है? नहीं। ऊपर मूल हिंदी शब्द रोमन अक्षरों में हैं; अंग्रेजी भावार्थ नीचे अलग दिया गया है। ३. रचना किसने की? सामान्यतः पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी को श्रेय दिया जाता है और लगभग १८७० कहा जाता है; सबसे पुराना लेखक-प्रमाणित मुद्रण यहाँ नहीं जाँचा गया। 5

४. कुल कितने पद हैं? इस चयनित पाठ में एक मुखड़ा तथा सात अगले पद हैं, जिन्हें आठ पाठ-खंड बनाया गया है। दूसरे पाठों में भिन्न संख्या मिल सकती है। ५. “तन मन धन” पंक्ति कहाँ है? कुछ परिवारों का लोकप्रिय अतिरिक्त समापन है, पर इस चयनित पाठ में नहीं था, इसलिए जोड़ा नहीं गया। ६. क्या इस आरती से स्वास्थ्य या संपत्ति का निश्चित लाभ होगा? ऐसा सुनिश्चित परिणाम प्रमाणित नहीं है; इसे श्रद्धा और सामूहिक प्रार्थना के रूप में पढ़ें। ७. क्या यह वैदिक मंत्र है? नहीं; यह बाद की हिंदी आरती है जिसमें दार्शनिक नामों का प्रयोग हुआ है। ८. क्या “परब्रह्म” को सभी संप्रदाय एक जैसे समझते हैं? नहीं; ईश्वर, जीव और जगत् का संबंध अलग दर्शनों में अलग रूप से समझा जाता है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Traditional hymn attributed to Shraddha Ram Phillauri (1837–1881). Historical witness: Manohar Pushpanjali, archive item cited below; exact imprint still requires inspection. Comparative words: Nitya, permitted for any purpose. Supplied sung repetitions and variant invocations retained. Original manuscript wording and unit sequence retained. Roman rendering, meanings and explanations: ShivGoraksh. No source recording, scan image or modern third-party explanation is reproduced. Independent textual certification remains incomplete.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    Om Jai Jagdish Hare, Swami Jai Jagdish Hare. Bhakt Janon Ke Sankat, Daas Janon Ke Sankat, Kshan Mein Door Kare.

  2. 2

    Jo Dhyaave Phal Paave, Dukh Binse Man Ka, Swami Dukh Binse Man Ka. Sukh Sampati Ghar Aave, Sukh Sampati Ghar Aave, Kasht Mite Tan Ka.

  3. 3

    Maat Pita Tum Mere, Sharan Gahun Kiski, Swami Sharan Gahun Main Kiski. Tum Bin Aur Na Dooja, Tum Bin Aur Na Dooja, Aas Karun Main Jiski.

  4. 4

    Tum Pooran Paramatma, Tum Antaryaami, Swami Tum Antaryaami. Paarbrahm Parameshwar, Paarbrahm Parameshwar, Tum Sab Ke Swami.

  5. 5

    Tum Karuna Ke Saagar, Tum Paalankarta, Swami Tum Paalankarta. Main Moorakh Phalkaami, Main Sevak Tum Swami, Kripa Karo Bharta.

  6. 6

    Tum Ho Ek Agochar, Sabke Praanpati, Swami Sabke Praanpati. Kis Vidhi Milun Dayaamay, Kis Vidhi Milun Dayaamay, Tumko Main Kumati.

  7. 7

    Deen-Bandhu Dukh-Harta, Thaakur Tum Mere, Swami Rakshak Tum Mere. Apne Haath Uthaao, Apne Sharan Lagaao, Dwaar Pada Tere.

  8. 8

    Vishay-Vikaar Mitaao, Paap Haro Deva, Swami Paap Haro Deva. Shraddha Bhakti Badhaao, Shraddha Bhakti Badhaao, Santan Ki Seva.

स्रोत, पाठाधार और संपादकीय स्थिति

चयनित पाठ 1; तुलना 2, 3, 4; रचयिता-संबंधी विवरण 5; अतिरिक्त पद का उल्लेख 6। सटीक पते और अधिकार-समीक्षा स्रोत-सूची में हैं। केवल ड्राफ्ट। चुने हुए आधुनिक ऑनलाइन साक्ष्य का पाठ पूरा है; ऐतिहासिक मूल पाठ आंशिक सत्यापित, पुनर्प्रकाशन अधिकार अप्रमाणित, और विशेषज्ञ-संपादकीय अनुमोदन बाकी है।

  1. Om Jai Jagdish Hare — Aarti · स्रोत खोलें
  2. Shree Jagdish Ji Ki Aarti · स्रोत खोलें
  3. Om Jai Jagdish Hare — Traditional Text · स्रोत खोलें
  4. Jai Jagadish Hare · स्रोत खोलें
  5. Om Jai Jagdish Hare author Shraddha Ram Phillauri — profile · स्रोत खोलें
  6. Sources & Accuracy: Om Jai Jagdish Hare · स्रोत खोलें
  7. Additional reusable textual witness (comparison, not a replacement edition) · स्रोत खोलें