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स्तोत्र

गणेशपञ्चरत्नम्: सम्पूर्ण पाठ, अर्थ और पाठभेद

गणेश की आनन्दमय, करुणामय और अन्तर्यामी छवि को प्रकट करते पाँच पद तथा उनसे अलग फलश्रुति।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम् । अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥ १ ॥

अर्थ

मैं उन विनायक को प्रणाम करता हूँ जो आनन्दपूर्वक हाथ में मोदक धारण करते हैं, मुक्ति में सहायक माने गए हैं, चन्द्रकला का अलंकार धारण करते हैं, लीला के साथ जगत की रक्षा करते हैं, असहायों के अद्वितीय नायक हैं, हाथी-संबंधी असुर का नाश करने वाले कहे गए हैं और शरणागत का अमंगल शीघ्र दूर करने वाले रूप में स्तुत हैं।

व्याख्या

मुदा करात्तमोदकम् में मुदा का अर्थ आनन्द से और मोदक प्रसन्नता का प्रिय प्रतीक भी है। विमुक्ति केवल सांसारिक बाधा हटने की बात नहीं, आध्यात्मिक मुक्त होने की आकांक्षा भी सामने रखती है। कलाधर चन्द्रकला और शैव-पारिवारिक प्रतीक की याद दिला सकता है, पर इस एक शब्द से किसी निश्चित मूर्ति का ऐतिहासिक रूप सिद्ध नहीं होता। अनायकैकनायकम् का भाव है—जिसका कोई सहारा नहीं, उसका भी मार्गदर्शक। दैत्य-विनाश की उपमा को पौराणिक काव्य के रूप में समझना चाहिए; वास्तविक जीवन में हर परेशानी तत्काल मिटने की गारंटी नहीं।

2

नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभास्वरं नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् । सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥ २ ॥

अर्थ

मैं निरन्तर उस परम आश्रय को खोजता हूँ जो न झुकने वाले अभिमान के लिए भयावह, नवोदित सूर्य के समान तेजस्वी, देवताओं द्वारा वन्दित, बड़े संकट में झुके भक्त को उठाने वाले तथा देवों, निधियों, गजों और गणों के ईश्वर कहकर स्तुत हैं; यहाँ उन्हें महेश्वर और परात्पर भी कहा गया है।

व्याख्या

सुरेश्वर, निधीश्वर, गजेश्वर, गणेश्वर जैसे लगातार आने वाले नाम स्तुति में प्रभाव पैदा करते हैं। नवोदितार्क का बिम्ब नए उगते सूर्य के समान तेज बताता है, किसी अनिवार्य समय-नियम को नहीं। नतेतरातिभीकरम् में विनम्रता के विपरीत अभिमान की तीखी काव्यात्मक छवि है; इसे किसी दूसरे मत या व्यक्ति को भयभीत करने की अनुमति न माना जाए। यहाँ महेश्वर गणेश-महिमा का स्तुतिपरक पद है; शैव और गाणपत्य परम्पराओं में देवताओं का सम्बन्ध बहुत व्यापक है।

3

समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरं दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् । कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं मनस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥ ३ ॥

अर्थ

मैं उस प्रकाशमान गणेश को नमस्कार करता हूँ जो समस्त लोकों के लिए मंगलकारी, दैत्यरूपी गज के दमनकर्ता, श्रेष्ठ गजमुखधारी तथा अक्षर अर्थात् अविनाशी रूप में स्तुत हैं। वे करुणा, क्षमा, आनन्द, यश और श्रद्धापूर्वक नमने वालों के मन को सँभालने वाले बताए गए हैं।

व्याख्या

कृपाकर, क्षमाकर, मुदाकर, यशस्कर का क्रम करुणा, क्षमा, आनन्द और यश जैसे गुणों को साथ रखता है। चुने गए १९१० पाठ में मनस्करं नमस्कृताम् है; गीताप्रेस-सम्बद्ध अन्य पाठ में नमस्करं नमस्कृताम् बताया गया है। इस अन्तर को मिटाकर एक ही निर्विवाद अर्थ देना ठीक नहीं। यहाँ मनस्कर को सावधानी से मन को सहारा देने वाला/जाग्रत करने वाला समझा गया है। अक्षर शब्द अविनाशी भाव का संकेत देता है; गजमुख काव्य और मूर्तिशास्त्रीय परम्परा का प्रतीक है।

4

अकिंचनार्तिमार्जनं चिरंतनोक्तिभाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् । प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणं कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥ ४ ॥

अर्थ

मैं उस पुरातन गजमुख प्रभु की भक्ति करता हूँ जो अकिञ्चनों—जिनके पास साधन नहीं—की पीड़ा मिटाने वाले, पुरातन स्तुतियों के पात्र, त्रिपुरारि शिव के ज्येष्ठ पुत्र कहे गए, देवविरोधी शक्तियों के घमण्ड को चूर्ण करने वाले और ऐश्वर्यशाली गजरूप की उपमा से वर्णित हैं।

व्याख्या

अकिञ्चन का अर्थ है जिसके पास संपत्ति या सहारा नहीं; इस पद में ऐसे लोगों की पीड़ा पर विशेष ध्यान है। पुरारि त्रिपुर-विजेता शिव का नाम है; पुरारिपूर्वनन्दन शैव परिवार की भक्ति-भाषा है, जन्म-क्रम के सभी पुराणों को एक समान घोषित करने का आधार नहीं। प्रपञ्चनाशभीषण संसार-भ्रम और अहंभाव को चुनौती देने वाले रूप का विशेषण हो सकता है। कपोलदानवारण प्राचीन गज-वर्णन की काव्य-भाषा है। धनञ्जयादि के संकेत पर विद्वान की अलग पुष्टि जरूरी है; इसलिए अर्थ को अनावश्यक निश्चितता से नहीं दिया गया।

5

नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजम् अचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् । हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि संततम् ॥ ५ ॥

अर्थ

मैं निरन्तर उस एकदन्त प्रभु का चिंतन करता हूँ जिनका दन्त अनुपम शोभा वाला कहा गया है, जो शिव के पुत्र रूप में स्मरण किए जाते हैं, जिनका स्वरूप साधारण विचार से परे है, जिनकी महिमा सीमातीत है, जो बाधाएँ काटने वाले हैं और योगियों के हृदय में सतत विराजते हैं।

व्याख्या

इस पद में कान्त–दन्त–कान्ति की ध्वनि-योजना अद्भुत है; उसका सौन्दर्य केवल गद्य अनुवाद से पूरा नहीं उतरता। कान्तकात्मजम् जैसा दीर्घ समास अलग-अलग सन्धि-विच्छेद का विषय हो सकता है; यहाँ शैव-पारिवारिक अर्थ को सावधानी के साथ समझाया है, न कि निर्विवाद व्याकरणिक फैसला बताकर। अन्तरायकृन्तनम् बाधा काटने की छवि है, जबकि हृदन्तरे निरन्तरम् चिंतन को भीतर के जीवन से जोड़ता है। अंत में एकदन्त नाम सम्पूर्ण स्तुति को स्मरणीय बनाता है।

6
विषय-सूची पर लौटें

महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं प्रजल्पति प्रभातके हृदि स्मरन्गणेश्वरम् । अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥ ६ ॥

अर्थ

फलश्रुति में कहा गया है कि जो व्यक्ति आदरपूर्वक इन पाँच रत्नों का प्रतिदिन प्रातः हृदय में गणेश्वर को स्मरण करते हुए पाठ करता है, उसे शीघ्र आरोग्य, दोषों से मुक्तता, उत्तम अभिव्यक्ति, उत्तम सन्तान, संयमित/समृद्ध आयु और आठ प्रकार की विभूतियों के फल प्राप्त होते हैं—यह स्तोत्र का पारम्परिक फल-वचन है।

व्याख्या

यह फलश्रुति पाँच मुख्य रत्न-पदों के बाद का छठा श्लोक है; इसे छठा मुख्य “रत्न” नहीं कहना चाहिए। अरोगता, अदोषता, सुसाहिती, सुपुत्रता और अष्टभूति धार्मिक काव्य के वांछित फल हैं। ‘सुसाहिती’ को यहाँ अच्छी वाणी/साहित्यिक अभिव्यक्ति की सम्भावना के रूप में सावधानी से समझा गया है। १९१० पाठ में प्रजल्पति तथा समाहितायुर् है; अन्य पाठों में प्रगायति तथा आयु-संबंधी अलग रूप मिलते हैं। पाठ से रोगमुक्ति, सन्तान या धन की वैज्ञानिक/चिकित्सकीय गारंटी नहीं मिलती, और कोई अनिवार्य कर्मकाण्ड यहाँ निर्धारित नहीं किया गया।

सन्दर्भ और उपयोग

संस्करण सूचना: १९१० वाणी विलास प्रेस (पृष्ठ १–२) के देखे गए मूल पाठ पर आधारित पाँच मुख्य श्लोक और अलग छठी फलश्रुति; अम्बुद CC0 पाठ से मिलान। 1 2

गणेशपञ्चरत्नम् क्या है? गणेशपञ्चरत्नम् का अर्थ है गणेश की स्तुति के पाँच रत्न जैसे श्लोक। इसमें मोदक, चन्द्रकला, सूर्य-तेज, करुणा, क्षमा, गजमुख और अन्ततः योगी के हृदय में स्थित एकदन्त के बिम्ब क्रमशः आते हैं। पहले पाँच पद मुख्य स्तोत्र हैं। मुद्रित पाठ में इनके बाद एक छठा श्लोक फलश्रुति के रूप में है—उसे पाँच रत्नों में अलग से नहीं गिनना चाहिए। 1 2

इस पाठ का नियंत्रण-स्रोत १९१० में श्री वाणी विलास प्रेस से प्रकाशित _शङ्कराचार्यविरचितानि स्तोत्राणि_, प्रथम भाग, पृष्ठ १–२ है। मूल छपे दोनों पृष्ठ देखे गए हैं और उन्हीं पर आधारित अम्बुद (Ambuda) के CC0 घोषित डिजिटल पाठ से तुलना की गयी है। लोकप्रिय पाठों के अलग शब्दों को चुपचाप इसमें नहीं मिलाया गया है। आदि शंकराचार्य को पारम्परिक रचनाकार मानने और उनका ऐतिहासिक लेखन सिद्ध होने में अन्तर है। 1 2

कविता का सौन्दर्य केवल अर्थ में नहीं, ध्वनि-क्रम में भी है—कर, ईश्वर, कान्त जैसे दोहराते पद स्मरण और लय बनाते हैं। भाव-यात्रा बाहरी प्रतीकों से अन्तरात्मा की ओर चलती है: पहले आनन्द और आश्रय, फिर करुणा-क्षमा, फिर असहाय की रक्षा और अन्ततः योगियों के हृदय में निरन्तर वास। अन्त की फलश्रुति परम्परा का आशीर्वचन है, किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य, संतान या धन का प्रमाणित परिणाम नहीं।

इस पाठ को कैसे पढ़ें

ऊपर पूरा मूल पाठ किसी अर्थ या व्याख्या से पहले दिया गया है। नीचे सभी छह इकाइयों के लिए अलग हिन्दी अर्थ और व्याख्या है।

श्लोक-दर-श्लोक अर्थ और व्याख्या

फलश्रुति 6 — फलश्रुति: स्तोत्र में वर्णित फल

सरल अर्थ। फलश्रुति में कहा गया है कि जो व्यक्ति आदरपूर्वक इन पाँच रत्नों का प्रतिदिन प्रातः हृदय में गणेश्वर को स्मरण करते हुए पाठ करता है, उसे शीघ्र आरोग्य, दोषों से मुक्तता, उत्तम अभिव्यक्ति, उत्तम सन्तान, संयमित/समृद्ध आयु और आठ प्रकार की विभूतियों के फल प्राप्त होते हैं—यह स्तोत्र का पारम्परिक फल-वचन है। व्याख्या। यह फलश्रुति पाँच मुख्य रत्न-पदों के बाद का छठा श्लोक है; इसे छठा मुख्य “रत्न” नहीं कहना चाहिए। अरोगता, अदोषता, सुसाहिती, सुपुत्रता और अष्टभूति धार्मिक काव्य के वांछित फल हैं। ‘सुसाहिती’ को यहाँ अच्छी वाणी/साहित्यिक अभिव्यक्ति की सम्भावना के रूप में सावधानी से समझा गया है। १९१० पाठ में प्रजल्पति तथा समाहितायुर् है; अन्य पाठों में प्रगायति तथा आयु-संबंधी अलग रूप मिलते हैं। पाठ से रोगमुक्ति, सन्तान या धन की वैज्ञानिक/चिकित्सकीय गारंटी नहीं मिलती, और कोई अनिवार्य कर्मकाण्ड यहाँ निर्धारित नहीं किया गया।

प्रमुख बिम्ब और ऐतिहासिक सावधानियाँ

मोदक और आनन्द। आरम्भ में हाथ में पकड़े मधुर मोदक की छवि है। घर-परिवार की पूजा में भोग की भूमिका हो सकती है, पर श्लोक को ‘इतनी भेंट करो तो परिणाम निश्चित है’ जैसी विधि बना देना ठीक नहीं। अनायक का नायक। जो असहाय है उसके लिए आश्रय की बात केवल संकट हटाने का दावा नहीं; यह विवेक, साहस और विनम्रता का भाव भी जगा सकती है। शैव परिवार की भाषा। चौथे पद में पुरारि, अर्थात् त्रिपुर-विजेता शिव, का उल्लेख है। दूसरे पद में गणेश के लिए परात्पर जैसे उत्कर्ष-पद भी हैं। हिन्दू स्तुति-काव्य में ऐसी प्रशंसाएँ परम्परा के अनुसार अर्थ ग्रहण करती हैं; उनसे सभी सम्प्रदायों की एक अनिवार्य श्रेणी बनाना उचित नहीं। गजमुख की छवि। वारण और गज-मद का काव्य-संकेत गणेश की विभिन्न पौराणिक कथाओं का पूर्ण इतिहास नहीं हैं; उनके स्रोत अलग पहचानने पड़ेंगे। हृदय तक आती यात्रा। पाँचवें श्लोक का हृदन्तर ध्यान और भीतर की जागरूकता का बिम्ब है। इसे यहाँ साहित्यिक-दार्शनिक सन्दर्भ में समझाया गया है; कोई गुप्त या निश्चित फल देने वाली साधना-विधि नहीं बतायी गयी है। स्रोत से क्या सिद्ध नहीं होता? १९१० का ग्रन्थ स्तोत्र के उस समय तक प्रचलित होने और शंकराचार्य-नाम से प्रकाशित होने का प्रमाण है, मूल रचना के आठवीं शताब्दी में होने का निर्णायक प्रमाण नहीं। यह स्तोत्र गणेश चालीसा, जय गणेश देवा आरती या वक्रतुण्ड महाकाय प्रार्थना से अलग है। 1 8

पाठभेद और चयनित संस्करण

  1. पहला श्लोक—‘विलासिलोकरक्षकम्’। १९१० का आधार-पाठ और अम्बुद यही रूप देते हैं; विकिस्रोत के अन्य पाठ में विलासलोकरक्षकम्, जबकि संस्कृतडॉक्युमेंट्स में विकल्प के रूप में विलासिलोकरञ्जकम् मिलता है। इनमें ‘रक्षा’ और ‘रंजन’ का अर्थ अलग हो सकता है। 1 2 3 4
  2. तीसरा श्लोक—‘मनस्करम्’। ऐतिहासिक आधार-पाठ में मनस्करं नमस्कृताम् है। Ved Path द्वारा गीताप्रेस के मुद्रित पृष्ठ से बताया गया, पर इस कार्य में स्वतंत्र रूप से न देखा गया, दूसरा रूप नमस्करम् है। इस भेद को दबाया नहीं गया है। 1 5
  3. छठा श्लोक—‘प्रजल्पति’। १९१० की फलश्रुति का पाठ प्रजल्पति प्रभातके है। कई पाठों में प्रगायति प्रभातके मिलता है। दोनों सम्भव परम्परागत पाठ हैं; अलग-अलग संस्करण के शब्द मिलाकर नया ‘मूल’ नहीं बनाया गया। 1 4 5
  4. छठा श्लोक—‘समाहितायुर्’। इस चयन में समाहितायुरष्टभूतिम् है; कुछ डिजिटल क्षेत्रीय पाठों में समीहितायु की सूचना मिलती है। इसकी स्वतंत्र छपी-जाँच बाकी है। 1 2 6
  5. लिपि के सामान्य भेद। पुराने और नए पाठों में अनुस्वार, संयुक्ताक्षर और समासों का स्थान बदल सकता है (शंकर/शङ्कर; अकिंचन/अकिञ्चन)। केवल टंकण-रूप बदलने को हर बार नया पाठभेद नहीं माना गया है।

रचनाकार, अधिकार और सम्पादकीय सीमा

१९१० के संग्रह में शंकराचार्य का नाम है, पर उससे ऐतिहासिक लेखकत्व सिद्ध नहीं होता। Wikimedia Commons ने इस पुरानी मुद्रित प्रति को Public Domain Mark 1.0 से चिह्नित किया है और अम्बुद ने अपनी डिजिटल प्रतिलिपि को CC0 घोषित किया है। फिर भी इन स्रोत-संकेतों को भारत सहित सभी उपयोग-क्षेत्रों के लिए अन्तिम कानूनी अनुमति मानना ठीक नहीं; प्रत्येक उपयोग पर सम्बद्ध स्रोत की शर्तें लागू होती हैं। संस्कृतडॉक्युमेंट्स की स्वयंसेवी प्रतिलिपि पर व्यावसायिक/प्रचारात्मक पुनर्प्रकाशन-सम्बन्धी शर्तें हैं; उसका उपयोग केवल तुलनात्मक पाठ-साक्ष्य के रूप में हुआ है। इस संस्करण के अर्थ और विवेचन नए लिखे गए हैं। 1 2 4 7

यह सार्वजनिक रूप से पढ़े जाने वाला भक्ति-स्तोत्र है; इस प्रारूप में दीक्षा, निश्चित जप-संख्या, चमत्कार या किसी रोग का उपचार नहीं सिखाया गया है। गणेश चतुर्थी से सामान्य सांस्कृतिक सम्बन्ध का अर्थ यह नहीं कि कोई तिथि या मुहूर्त यहाँ स्वतः स्वीकृत हो गया।

सामान्य प्रश्न

गणेशपञ्चरत्न में कितने श्लोक हैं? पाँच मुख्य ‘रत्न’-श्लोक हैं। चुने गए १९१० मुद्रित पाठ में उनके बाद छठा क्रमांकित श्लोक फलश्रुति है।

रचनाकार कौन माने जाते हैं? परम्परा में आदि शंकराचार्य का नाम मिलता है; ऐतिहासिक लेखकत्व केवल संग्रह के शीर्षक से सिद्ध नहीं होता।

क्या शुरुआत ‘मुदा करात्तमोदकम्’ से होती है? हाँ। प्रथम पद आनंदपूर्वक हाथ में धरे मोदक की छवि से आरम्भ होता है; छपे और डिजिटल पाठ में शब्द-विराम अलग दिख सकते हैं।

तीसरे श्लोक में ‘मनस्करम्’ है या ‘नमस्करम्’? इस १९१० स्रोत में ‘मनस्करम्’ है; ‘नमस्करम्’ दूसरे मुद्रित पाठ के सम्बन्ध में रिपोर्ट हुआ भेद है।

क्या इस पाठ से आरोग्य या धन निश्चित मिलेगा? नहीं। छठा श्लोक भक्ति-काव्य की फलश्रुति है, उपचार, संतान या आर्थिक परिणाम की गारंटी नहीं।

क्या अंग्रेज़ी पृष्ठ पर मूल श्लोक का अनुवाद है? पहले भाग में वही संस्कृत शब्द IAST रोमन लिपि में हैं; अनुवाद और अर्थ बाद में अलग हैं।

क्या इसे किसी पुराण के निश्चित अध्याय से जोड़ा गया है? नहीं। इस कार्य का आधार १९१० का पृथक स्तोत्र-पाठ है; बिना प्रमाण कोई पुराण-अध्याय नहीं जोड़ा गया।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    mudā karāttamodakaṃ sadā vimuktisādhakaṃ kalādharāvataṃsakaṃ vilāsilokarakṣakam | anāyakaikanāyakaṃ vināśitebhadaityakaṃ natāśubhāśunāśakaṃ namāmi taṃ vināyakam || 1 ||

  2. 2

    natetarātibhīkaraṃ navoditārkabhāsvaraṃ namatsurārinirjaraṃ natādhikāpaduddharam | sureśvaraṃ nidhīśvaraṃ gajeśvaraṃ gaṇeśvaraṃ maheśvaraṃ tamāśraye parātparaṃ nirantaram || 2 ||

  3. 3

    samastalokaśaṃkaraṃ nirastadaityakuñjaraṃ daretarodaraṃ varaṃ varebhavaktramakṣaram | kṛpākaraṃ kṣamākaraṃ mudākaraṃ yaśaskaraṃ manaskaraṃ namaskṛtāṃ namaskaromi bhāsvaram || 3 ||

  4. 4

    akiṃcanārtimārjanaṃ cirantanoktibhājanaṃ purāripūrvanandanaṃ surārigarvacarvaṇam | prapañcanāśabhīṣaṇaṃ dhanaṃjayādibhūṣaṇaṃ kapoladānavāraṇaṃ bhaje purāṇavāraṇam || 4 ||

  5. 5

    nitāntakāntadantakāntimantakāntakātmajam acintyarūpamantahīnamantarāyakṛntanam | hṛdantare nirantaraṃ vasantameva yogināṃ tamekadantameva taṃ vicintayāmi saṃtatam || 5 ||

  6. 6

    mahāgaṇeśapañcaratnamādareṇa yo'nvahaṃ prajalpati prabhātake hṛdi smarangaṇeśvaram | arogatāmadoṣatāṃ susāhitīṃ suputratāṃ samāhitāyuraṣṭabhūtimabhyupaiti so'cirāt || 6 ||

स्रोत और सम्पादकीय स्थिति

  • 1 शङ्कराचार्यविरचितानि स्तोत्राणि, प्रथम भाग (वाणी विलास, १९१०), मूल पृष्ठ १–२ / PDF पृष्ठ ९–१०—इस पाठ का आधार।
  • 2 उसी पुराने छपे स्रोत की अम्बुद CC0 घोषित डिजिटल प्रतिलिपि।
  • 3 अन्य संस्कृत विकिस्रोत पाठ (पाठभेद तुलना)।
  • 4 संस्कृतडॉक्युमेंट्स ganesha5.itx (केवल पाठभेद, अलग पुनर्प्रकाशन शर्तें)।
  • 5 Ved Path पर गीताप्रेस से बताये गए भेद (मूल गीताप्रेस पृष्ठ स्वतंत्र रूप से नहीं देखे गए)।
  • 6 तेलुगु पाठ के एक द्वितीयक भेद की सूचना।
  • 7 Commons पर पुराने स्कैन की अधिकार-मेटाडेटा सूचना।
  • 8 इंडिया ऑफिस पुस्तक-सूची का संदर्भ। जाँच: चुने गए छह में से सभी छह मूल श्लोक उपस्थित हैं; छठा फलश्रुति है। पाठ की स्थिति आंशिक सत्यापन।
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1 — हाथ का मोदक और शरणागत की आशा

सरल अर्थ। मैं उन विनायक को प्रणाम करता हूँ जो आनन्दपूर्वक हाथ में मोदक धारण करते हैं, मुक्ति में सहायक माने गए हैं, चन्द्रकला का अलंकार धारण करते हैं, लीला के साथ जगत की रक्षा करते हैं, असहायों के अद्वितीय नायक हैं, हाथी-संबंधी असुर का नाश करने वाले कहे गए हैं और शरणागत का अमंगल शीघ्र दूर करने वाले रूप में स्तुत हैं। व्याख्या। मुदा करात्तमोदकम् में मुदा का अर्थ आनन्द से और मोदक प्रसन्नता का प्रिय प्रतीक भी है। विमुक्ति केवल सांसारिक बाधा हटने की बात नहीं, आध्यात्मिक मुक्त होने की आकांक्षा भी सामने रखती है। कलाधर चन्द्रकला और शैव-पारिवारिक प्रतीक की याद दिला सकता है, पर इस एक शब्द से किसी निश्चित मूर्ति का ऐतिहासिक रूप सिद्ध नहीं होता। अनायकैकनायकम् का भाव है—जिसका कोई सहारा नहीं, उसका भी मार्गदर्शक। दैत्य-विनाश की उपमा को पौराणिक काव्य के रूप में समझना चाहिए; वास्तविक जीवन में हर परेशानी तत्काल मिटने की गारंटी नहीं।

श्लोक 2 — भय, अहंकार और आश्रय

सरल अर्थ। मैं निरन्तर उस परम आश्रय को खोजता हूँ जो न झुकने वाले अभिमान के लिए भयावह, नवोदित सूर्य के समान तेजस्वी, देवताओं द्वारा वन्दित, बड़े संकट में झुके भक्त को उठाने वाले तथा देवों, निधियों, गजों और गणों के ईश्वर कहकर स्तुत हैं; यहाँ उन्हें महेश्वर और परात्पर भी कहा गया है। व्याख्या। सुरेश्वर, निधीश्वर, गजेश्वर, गणेश्वर जैसे लगातार आने वाले नाम स्तुति में प्रभाव पैदा करते हैं। नवोदितार्क का बिम्ब नए उगते सूर्य के समान तेज बताता है, किसी अनिवार्य समय-नियम को नहीं। नतेतरातिभीकरम् में विनम्रता के विपरीत अभिमान की तीखी काव्यात्मक छवि है; इसे किसी दूसरे मत या व्यक्ति को भयभीत करने की अनुमति न माना जाए। यहाँ महेश्वर गणेश-महिमा का स्तुतिपरक पद है; शैव और गाणपत्य परम्पराओं में देवताओं का सम्बन्ध बहुत व्यापक है।

श्लोक 3 — करुणा, क्षमा और आलोक

सरल अर्थ। मैं उस प्रकाशमान गणेश को नमस्कार करता हूँ जो समस्त लोकों के लिए मंगलकारी, दैत्यरूपी गज के दमनकर्ता, श्रेष्ठ गजमुखधारी तथा अक्षर अर्थात् अविनाशी रूप में स्तुत हैं। वे करुणा, क्षमा, आनन्द, यश और श्रद्धापूर्वक नमने वालों के मन को सँभालने वाले बताए गए हैं। व्याख्या। कृपाकर, क्षमाकर, मुदाकर, यशस्कर का क्रम करुणा, क्षमा, आनन्द और यश जैसे गुणों को साथ रखता है। चुने गए १९१० पाठ में मनस्करं नमस्कृताम् है; गीताप्रेस-सम्बद्ध अन्य पाठ में नमस्करं नमस्कृताम् बताया गया है। इस अन्तर को मिटाकर एक ही निर्विवाद अर्थ देना ठीक नहीं। यहाँ मनस्कर को सावधानी से मन को सहारा देने वाला/जाग्रत करने वाला समझा गया है। अक्षर शब्द अविनाशी भाव का संकेत देता है; गजमुख काव्य और मूर्तिशास्त्रीय परम्परा का प्रतीक है।

श्लोक 4 — असहाय की पीड़ा और अभिमान पर विजय

सरल अर्थ। मैं उस पुरातन गजमुख प्रभु की भक्ति करता हूँ जो अकिञ्चनों—जिनके पास साधन नहीं—की पीड़ा मिटाने वाले, पुरातन स्तुतियों के पात्र, त्रिपुरारि शिव के ज्येष्ठ पुत्र कहे गए, देवविरोधी शक्तियों के घमण्ड को चूर्ण करने वाले और ऐश्वर्यशाली गजरूप की उपमा से वर्णित हैं। व्याख्या। अकिञ्चन का अर्थ है जिसके पास संपत्ति या सहारा नहीं; इस पद में ऐसे लोगों की पीड़ा पर विशेष ध्यान है। पुरारि त्रिपुर-विजेता शिव का नाम है; पुरारिपूर्वनन्दन शैव परिवार की भक्ति-भाषा है, जन्म-क्रम के सभी पुराणों को एक समान घोषित करने का आधार नहीं। प्रपञ्चनाशभीषण संसार-भ्रम और अहंभाव को चुनौती देने वाले रूप का विशेषण हो सकता है। कपोलदानवारण प्राचीन गज-वर्णन की काव्य-भाषा है। धनञ्जयादि के संकेत पर विद्वान की अलग पुष्टि जरूरी है; इसलिए अर्थ को अनावश्यक निश्चितता से नहीं दिया गया।

श्लोक 5 — हृदय में एकदन्त का ध्यान

सरल अर्थ। मैं निरन्तर उस एकदन्त प्रभु का चिंतन करता हूँ जिनका दन्त अनुपम शोभा वाला कहा गया है, जो शिव के पुत्र रूप में स्मरण किए जाते हैं, जिनका स्वरूप साधारण विचार से परे है, जिनकी महिमा सीमातीत है, जो बाधाएँ काटने वाले हैं और योगियों के हृदय में सतत विराजते हैं। व्याख्या। इस पद में कान्त–दन्त–कान्ति की ध्वनि-योजना अद्भुत है; उसका सौन्दर्य केवल गद्य अनुवाद से पूरा नहीं उतरता। कान्तकात्मजम् जैसा दीर्घ समास अलग-अलग सन्धि-विच्छेद का विषय हो सकता है; यहाँ शैव-पारिवारिक अर्थ को सावधानी के साथ समझाया है, न कि निर्विवाद व्याकरणिक फैसला बताकर। अन्तरायकृन्तनम् बाधा काटने की छवि है, जबकि हृदन्तरे निरन्तरम् चिंतन को भीतर के जीवन से जोड़ता है। अंत में एकदन्त नाम सम्पूर्ण स्तुति को स्मरणीय बनाता है।

  1. Śaṅkarācāryaviracitāni Stotrāṇi, Prathamaḥ Bhāgaḥ (The Works of Sri Sankaracharya, Vol. 17, Stotras Part I) · स्रोत खोलें
  2. Gaṇeśapañcaratnam | Ambuda electronic Sanskrit transcription · स्रोत खोलें
  3. Gaṇeśapañcaratnam | Sanskrit Wikisource (alternate reading) · स्रोत खोलें
  4. Śrī Gaṇeśapañcaratna Stotram (ganesha5.itx / HTML) · स्रोत खोलें
  5. Gaṇeśapañcaratnam—Ved Path with claimed Gita Press print collation · स्रोत खोलें
  6. Ganesha Pancharatnam Telugu recitation comparison notes · स्रोत खोलें
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