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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

प्रार्थना

वक्रतुण्ड महाकाय — शुभारम्भ की गणेश-प्रार्थना

श्रीगणेश का एक-श्लोकी मंगलाचरण, जिसमें सभी कामों के निर्विघ्न होने की कामना है।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

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वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

अर्थ

हे वक्र सूँड और विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान भगवान गणेश! कृपा करके मेरे सभी कार्य सदैव विघ्नों से रहित हों, ऐसा कीजिए।

व्याख्या

इस एक श्लोक का क्रम स्पष्ट है: पहले श्रीगणेश के तीन विशेष सम्बोधन आते हैं, फिर भक्त अपने सभी कार्यों के निर्विघ्न रहने की प्रार्थना करता है। वक्रतुण्ड का अभिप्राय मुड़ी हुई सूँड वाले गणेश से और महाकाय का आशय उनके विशाल स्वरूप से है। सूर्यकोटिसमप्रभ की उपमा करोड़ों सूर्यों जैसा तेज बताती है; इसे प्रकाश का वैज्ञानिक परिमाण नहीं समझना चाहिए। निर्विघ्नं बाधारहित अवस्था को सूचित करता है; कुरु का अर्थ “कीजिए”, मे का “मेरे लिए” और देव सम्बोधन है। सर्वकार्येषु सप्तमी बहुवचन—“सभी कार्यों में”—तथा सर्वदा “हमेशा” बताता है। श्लोक आस्था और आशा प्रकट करता है, पर सांसारिक सफलता की गारंटी, रोगमुक्ति, निश्चित जप-संख्या, दीक्षा या कोई अनिवार्य कर्मकाण्ड नहीं बताता। १९१३ में वर्णित विनायकव्रतकल्प-पाण्डुलिपि के पाठ में अविघ्नं तथा सर्वकार्याणि की सूचना है; इसलिए यहाँ चुने शब्दों को एकमात्र ऐतिहासिक पाठ नहीं कहा जा सकता। मूल रचयिता और सबसे पहला ग्रन्थ-स्रोत अभी अनिश्चित हैं। 1 4

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित पाठ के विषय में: यह गणेशजी की प्रचलित एक-श्लोकी प्रार्थना का पूरा चार-चरणीय पाठ है। एक उपलब्ध संस्कृत डिजिटल पाठ तथा अन्य स्वतंत्र पाठ-प्रदर्शनों से इसकी तुलना की गई है। इससे किसी बड़े पूजाविधान का पूरा पाठ प्रस्तुत करने का दावा नहीं किया जा रहा। पुराने छपे ग्रन्थों के विवरण मिले हैं, लेकिन उनके उल्लिखित पृष्ठों के मूल स्कैन को इस संस्करण के लिए प्रत्यक्ष देखकर नहीं मिलाया जा सका। रचयिता, सबसे प्राचीन ग्रन्थ-स्रोत और पुनर्प्रकाशन-अधिकार अभी अनिश्चित हैं। यह संपादकीय प्रारूप है, किसी पुराण का सिद्ध उद्धरण नहीं। 1 2 3 4

सम्पूर्ण मूल प्रार्थना — देवनागरी

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

यही चुनी गई प्रार्थना का पूरा मूल श्लोक है—चार चरणों को दो पंक्तियों में रखा गया है। 'ॐ' कुछ पूजापाठों में इसके पहले आता है; यहाँ उसे मूल स्वतंत्र श्लोक में जोड़कर नहीं दिखाया गया है। न कोई अलग फलश्रुति और न 'शान्तिः' का पाठ इस चयनित रूप का अंग माना गया है। संस्कृत मूल, हिन्दी अर्थ और आगे की व्याख्या तीन अलग स्तर हैं। 1 5 6

सम्पूर्ण हिन्दी अर्थ और विस्तृत व्याख्या

प्रार्थना १

सम्पूर्ण भावार्थ। हे वक्र सूँड और विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान दीप्तिमान भगवान गणेश! कृपा करके मेरे सभी कार्य सदैव विघ्नों से रहित हों, ऐसा कीजिए। श्लोक के आरम्भ में गणेशजी के स्वरूप की वन्दना है और अन्त में उनसे विनम्र निवेदन। प्रार्थना का भाव यह नहीं कि जीवन में कठिनाई कभी आएगी ही नहीं या केवल श्लोक बोलने से हर काम अपने-आप पूरा हो जाएगा। भक्त काम आरम्भ करने से पहले अपने संकल्प को ईश्वर-स्मरण से जोड़ता है। दो चरणों में प्रशंसा और अगले दो में निवेदन—यही इसकी संक्षिप्त किन्तु सार्थक रचना है। 1 2

चारों चरणों का अलग-अलग अर्थ

१. वक्रतुण्ड महाकाय — हे वक्र सूँड वाले, विशालकाय प्रभु! वक्र अर्थात् मुड़ा हुआ या घुमावदार; तुण्ड का प्रयोग चोंच अथवा आगे निकले मुखभाग के लिए हो सकता है, पर गणेशजी के परिचित रूप में यहाँ सूँड अभिप्रेत है। महाकाय में महा अर्थात् बड़ा और काय अर्थात् शरीर या मूर्त स्वरूप है। ये दोनों सम्बोधन हैं—भक्त सीधे भगवान को पुकार रहा है। सूँड की वक्रता कोई अशुभ लक्षण नहीं, बल्कि गणेश-मूर्ति की विशिष्ट पहचान है। रूप का स्मरण मन को प्रार्थना में एकाग्र करने का साधन हो सकता है; यह हमारी व्याख्यात्मक बात है, मूल पाठ की अतिरिक्त पंक्ति नहीं। २. सूर्यकोटिसमप्रभ — करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले प्रभु! सूर्य का अर्थ सूर्य, कोटि का सामान्य भारतीय गणना में अर्थ एक करोड़, सम का अर्थ समान/तुलनीय तथा प्रभा का अर्थ प्रकाश या तेज है। संयुक्त रूप समप्रभ भगवान का सम्बोधन करता है। यहाँ असंख्य सूर्यों का बिम्ब ऐश्वर्य, तेजस्विता और ज्ञान के प्रकाश को उभारता है। यह किसी वास्तविक प्रकाश-मात्रा का वैज्ञानिक मापन नहीं। कुछ पाठों में सूर्यकोटि समप्रभ दो शब्दों की तरह छपता है; इससे अपने-आप कोई नया मन्त्र बन नहीं जाता। ३. निर्विघ्नं कुरु मे देव — हे देव, मेरे लिए विघ्नरहित कर दीजिए। विघ्न अर्थात् बाधा; निर्विघ्न अर्थात् बाधा से रहित; कुरु आज्ञार्थक क्रिया—'कीजिए/बनाइए'; मे 'मेरे लिए' और देव सम्बोधन है। इस चरण में मनुष्य अपनी योजना के लिए सहारा माँगता है। 'मेरा काम अवश्य सफल होगा', 'रोग अवश्य मिटेगा' या 'निर्धारित संख्या में जप से लाभ होगा'—ऐसी अलग-अलग निश्चित घोषणाएँ संस्कृत शब्दों में नहीं हैं। अगले चरण से स्पष्ट होता है कि निवेदन सभी कार्यों के विषय में है। ४. सर्वकार्येषु सर्वदा — सभी कार्यों में, हमेशा। सर्व का अर्थ सब; कार्य का अर्थ किया जाने वाला काम; -एषु सप्तमी बहुवचन का रूप है, जिसका अर्थ 'सभी कार्यों में' या 'सभी कार्यों के सम्बन्ध में' होता है। सर्वदा अर्थात् सदा। यह प्रार्थना केवल किसी एक परीक्षा, व्यापार या उत्सव को लेकर नहीं है। आरम्भ से अन्त तक सतर्कता, विनम्रता और स्थिरता का भाव इसमें देखा जा सकता है। एक पुराने पाण्डुलिपि-विवरण में सर्वकार्याणि पाठ मिलता है—वह द्वितीया बहुवचन है; उसे यहाँ के सर्वकार्येषु के स्थान पर चुपचाप नहीं रखा गया। 4

संक्षिप्त शब्दार्थ और व्याकरण

मूल पदभूमिकाअर्थ
वक्रतुण्डसम्बोधनहे मुड़ी हुई सूँड वाले
महाकायसम्बोधनहे विशालकाय प्रभु
सूर्यकोटिसमप्रभसंयुक्त सम्बोधनहे करोड़ों सूर्यों जैसे तेजस्वी
निर्विघ्नंबाधा से रहित होने का भावबिना विघ्न का
कुरु'कृ' धातु का आज्ञार्थक रूपकर दीजिए/बना दीजिए
मेसर्वनाममेरे लिए/मेरा
देवसम्बोधनहे देव
सर्वकार्येषुसप्तमी बहुवचनसभी कामों में
सर्वदाअव्ययहमेशा

पाठ-संकेत। मूल श्लोक संस्कृत में है, हिन्दी में रचा कोई नया भजन नहीं। अंग्रेज़ी संस्करण में यही शब्द IAST रोमन लिप्यन्तरण में दिए गए हैं। तुण्ड के ण् और निर्विघ्नं के अनुस्वार जैसे ध्वनि-चिह्नों को अर्थ-सम्बन्धी सजावट न समझें। यहाँ वैदिक स्वरचिह्न या किसी परम्परा के अधिकृत उच्चारण-नियम प्रमाणित नहीं किए जा रहे। श्लोक की सामान्य चार-चरणीय योजना को अनुष्टुभ-जैसी कहा जा सकता है; छन्द का विशेषज्ञ सत्यापन अलग कार्य है।

वक्रतुण्ड महाकाय किस प्रकार की प्रार्थना है? शिवगोरक्ष के संग्रह में इसे प्रार्थना रखा गया है। इसमें पहले श्रीगणेश के रूप-गुणों का स्मरण है और फिर विघ्न-निवारण का अनुरोध। बोलचाल में इसे 'गणेश मंत्र' भी कहा जाता है; साहित्यिक रूप की दृष्टि से यह संस्कृत का एक संक्षिप्त श्लोक है। इसे गणेश चालीसा, गणेश पंचरत्नम् या गणेश कवचम् का पूरा पाठ नहीं मानना चाहिए—वे अलग रचनाएँ हैं। मंगलाचरण का अर्थ है किसी कार्य के आरम्भ में मंगल का स्मरण अथवा कामना। इसी कारण यह श्लोक पढ़ाई, सभा, पारिवारिक अनुष्ठान या उपासना के आरम्भ में सुनाई देता है। तथापि यहाँ किसी विशेष समय, संख्या, व्रत, पूजा-विधान, दीक्षा या फल-प्राप्ति की अनिवार्य विधि नहीं बताई जा रही। वर्तमान में उपलब्ध सिद्धिविनायक षोडशोपचार पूजास्तुति के डिजिटल पाठ में यह पहले श्लोक के रूप में मिलता है; विघ्नेश्वरपूजाविधानम् के दूसरे डिजिटल पाठ में इसके दो अलग शब्दरूप भी दिखाई देते हैं। इन बड़े ग्रन्थों के बाकी अंश को इस स्वतंत्र एक-श्लोकी प्रार्थना में शामिल करना उचित नहीं होगा। 1 6

विघ्नहर्ता गणेश और इस श्लोक का संदेश

गणेशजी को भक्तिपरम्परा में विघ्नेश्वर तथा विघ्नहर्ता कहा जाता है। इसी पृष्ठभूमि में निर्विघ्नं कुरु के शब्द समझ में आते हैं। बाधा कभी बाहरी होती है—समय की कमी, संसाधनों का अभाव या अप्रत्याशित रुकावट। कभी भीतर भी बाधा होती है—उतावली, भ्रम, असावधानी या भय। मूल श्लोक इन उदाहरणों को अलग से नहीं गिनाता; ये उसके भाव को आज के जीवन में समझने के लिए शिवगोरक्ष की स्वतंत्र व्याख्या हैं। एक विद्यार्थी इस प्रार्थना में आरम्भ से पहले संयम का संकेत देख सकता है; परिवार किसी शुभ अवसर पर सामूहिक मंगलकामना का भाव। भक्त करोड़ों सूर्यों की उपमा में आशा और स्पष्टता की भावना अनुभव कर सकता है। किन्तु प्रार्थना और अपना उत्तरदायी प्रयत्न परस्पर विरोधी नहीं हैं। धर्मपरम्परा की आस्था का सम्मान करते हुए भी किसी निश्चित सांसारिक परिणाम की गारंटी देना उचित नहीं है।

प्राचीन स्रोत, रचयिता और पाठ का इतिहास

रचयिता की पहचान स्थापित नहीं है। उपलब्ध साक्ष्य यह दिखाते हैं कि इस श्लोक का प्रयोग गणेश-स्मरण तथा पूजापाठ की परम्पराओं में होता आया है। अभी इसकी रचना को किसी निश्चित वेद, उपनिषद्, पुराण के अध्याय या किसी एक प्राचीन कवि से जोड़ने का सत्यापित प्रमाण हमारे पास नहीं है। किसी आधुनिक संग्रह में इस श्लोक का मिलना यह सिद्ध नहीं करता कि वह संग्रह ही इसकी मौलिक रचना-स्थली था। 1 3 4

सन् १९१३ में प्रकाशित म. शेषगिरि शास्त्री के नाम से सम्बद्ध A Descriptive Catalogue of the Sanskrit Manuscripts of the Government Oriental Manuscripts Library, Madras के खण्ड १६ में क्रमांक 8521, विनायकव्रतकल्प के अन्तर्गत इस प्रार्थना का पाठ दिया गया है। ऑनलाइन उपलब्ध पृष्ठ 271 पर पाठ अविघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्याणि सर्वदा दिखता है। उस वेबसाइट पर पृष्ठ को स्पष्टतः 'प्रूफरीड नहीं हुआ' बताया गया है। इसलिए यह मुद्रित पाण्डुलिपि-विवरण का डिजिटल पुनर्प्रस्तुतीकरण है; न उस पाण्डुलिपि की मूल छवि यहाँ देखी गई है, न १९१३ के मुद्रित पृष्ठ की छवि का स्वतन्त्र अक्षरशः परीक्षण हुआ है। 4

इंटरनेट आर्काइव में लक्ष्मण रामचन्द्र पांगारकर का भक्तिमार्ग प्रदीप (१९१०), पहचान in.ernet.dli.2015.366206, सूचीबद्ध है। एक अन्य सम्पादकीय अध्ययन का दावा है कि उसके स्कैन के पृष्ठ 9 (मुद्रित पृष्ठ 1) पर वक्रतुंड, सूर्यकोटिसमप्रभ तथा निर्विघ्नं पाठ मिलता है। हमने उस अध्ययन और आर्काइव के सूची-विवरण को पढ़ा है, किन्तु मूल पृष्ठ-छवि का स्वयं मिलान नहीं कर पाए। इस अन्तर को छिपाकर प्रत्यक्ष सत्यापन का दावा नहीं किया जाएगा। 2 3

उसी तुलनात्मक अध्ययन में '१९१६ के आह्निक सूत्रावली' संस्करण की चर्चा है, जबकि उससे जुड़े इंटरनेट आर्काइव रिकॉर्ड in.ernet.dli.2015.405955 पर प्रकाशन-वर्ष १८८३ दर्ज है। यह सम्भवतः संस्करण/लिंक का भ्रम है; प्रमाण के बिना हम उसे १९१६ की प्रत्यक्ष जाँची हुई प्रति नहीं कह सकते। उस अध्ययन के कथित अविघ्नं पाठ को भी इसी सावधानी से देखना चाहिए। 2 7

प्रमुख पाठभेद — अलग रखें, मिलाएँ नहीं

विषययहाँ स्वीकृत पाठअन्य उपलब्ध/सूचित पाठस्थिति
गणेशजी का सम्बोधनवक्रतुण्डवक्रतुंडण्‍ड और अनुस्वार की वर्तनी का अन्तर; १९१० की रिपोर्ट में दूसरा रूप
सूर्य की उपमासूर्यकोटिसमप्रभकोटिसूर्यसमप्रभपदक्रम का अन्तर; दूसरी रचना अनिवार्यतः नहीं
बाधा-रहित करने का शब्दनिर्विघ्नंअविघ्नंअलग उपसर्ग, मिलताजुलता निवेदन
सभी कार्यसर्वकार्येषुसर्वकार्याणिसप्तमी और द्वितीया बहुवचन का वास्तविक व्याकरणिक अन्तर
श्लोक से पहलेॐ नहींकुछ पूजापाठों में ॐपाठ-पूर्व अनुष्ठानिक जोड़
संयुक्त पदसूर्यकोटिसमप्रभसूर्यकोटि समप्रभमुख्यतः लेखन/मुद्रण में पद-विभाजन

हर पंक्ति को किसी एक निश्चित काल के मूल हस्तलेख का प्रमाण नहीं माना गया है। हमारे पास डिजिटल प्रतिलिपियाँ, एक पुराना मुद्रित पाण्डुलिपि-विवरण, और ऐतिहासिक मुद्रणों पर दूसरे शोधकर्ता के नोट—इनके साक्ष्य-स्तर अलग हैं। विस्तृत जानकारी स्रोत-सूची में दी गई है। 2 4 5 6

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वक्रतुण्ड महाकाय का पूरा हिन्दी अर्थ क्या है?

'हे वक्र सूँड और विशाल देह वाले, करोड़ों सूर्यों जैसे तेजस्वी भगवान गणेश, मेरे सभी कार्य सदा निर्विघ्न करें।' यही दो पंक्तियों वाले पूरे श्लोक का संक्षिप्त अर्थ है।

क्या यह श्लोक गणेश पुराण या वेद का है? इसके मूल रचयिता और किसी निश्चित पुराण अथवा वेद में मूल अध्याय-संख्या का विश्वसनीय प्रमाण अभी नहीं मिला है। पुराने मुद्रित संग्रहों और एक पाण्डुलिपि-विवरण में इसका प्रचलन दिखता है, पर मूल रचनास्थान तय करना अलग शोध का विषय है। 3 4

'सूर्यकोटि' और 'कोटिसूर्य' में कौन-सा रूप सही है? दोनों पदक्रम उपलब्ध स्रोतों में दिखाई देते हैं। इस संस्करण में सूर्यकोटि रखा गया है; कोटिसूर्य को पाठभेद की तरह दर्ज किया गया है। अर्थ की मुख्य उपमा वही रहती है। 1 5

'निर्विघ्नं' और 'अविघ्नं' में क्या अन्तर है? यहाँ निर्विघ्नं चुना गया है। १९१३ के पाण्डुलिपि-विवरण तथा एक पूजाविधान के डिजिटल पाठ में अविघ्नं भी है। दोनों में बाधा के न रहने की कामना है, किन्तु पाठों को एक-दूसरे में छिपाकर जोड़ना सही नहीं। 4 6

क्या इस प्रार्थना से हर काम में सफलता निश्चित होती है? नहीं। श्लोक विनम्र प्रार्थना है, किसी परीक्षा, व्यवसाय, धनलाभ या स्वास्थ्य-संबंधी परिणाम की निश्चित गारंटी नहीं। आस्था के साथ अपनी तैयारी, विवेक और कर्म भी आवश्यक रहते हैं।

क्या यही पूरा गणेश स्तोत्र है? यह एक स्वतंत्र प्रार्थना के रूप में पूरा एक श्लोक है। बड़े पूजाविधान या स्तुति-संग्रहों में इसके आगे और भी श्लोक हो सकते हैं; वे इस सीमित स्वतंत्र पाठ का हिस्सा नहीं बनाए गए हैं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

इस पाठ के लेख और पदवार व्याख्या में अर्थ की अलग अभिव्यक्तियाँ हैं; दोनों प्रस्तुत हैं।

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭisamaprabha | nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā ||

स्रोत, अधिकार और सम्पादकीय सावधानियाँ

मुख्य साक्ष्य: 1 संस्कृत डॉक्यूमेंट्स, सिद्धिविनायकषोडशोपचारपूजास्तुति १, श्लोक १ (डिजिटल पाठ प्रत्यक्ष पढ़ा); 2 वल्कला का १९१० स्कैन-पाठ पर संपादकीय विवरण; 3 इंटरनेट आर्काइव पर भक्तिमार्ग प्रदीप (१९१०) का रिकॉर्ड (मूल पृष्ठ नहीं पढ़ा); 4 १९१३ मद्रास पाण्डुलिपि-सूची, क्रमांक 8521, वेब पृष्ठ 271 (बिना प्रूफरीड किया गया OCR); 5 संस्कृत डॉक्यूमेंट्स का श्लोकसंग्रह १ (दूसरा पदक्रम); 6 विघ्नेश्वरपूजाविधानम् (दो पाठ-रूप); 7 इंटरनेट आर्काइव पर आह्निक सूत्रावली का १८८३ वाला रिकॉर्ड। पूरे URL, जाँचे गए स्थान और अधिकार-संबंधी स्थिति स्रोत-सूची में हैं। अधिकार का महत्त्वपूर्ण अन्तर: पारम्परिक मूल श्लोक, किसी पुराने मुद्रण का पृष्ठ, आधुनिक स्वयंसेवी प्रतिलिपि, हमारा IAST लिप्यन्तरण, नया हिन्दी/अंग्रेज़ी अर्थ और मौजूदा गणेश-चित्र—ये अलग विषय हैं। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स की वेबसाइट स्वयंसेवकों की डिजिटल सामग्री के प्रचारात्मक/व्यावसायिक पुनर्प्रकाशन पर बिना अनुमति रोक बताती है। इसलिए वेबसाइट पर प्रकाशन का अधिकार अपने-आप सिद्ध नहीं माना गया है। इस संस्करण की व्याख्या शिवगोरक्ष के लिए नये सिरे से लिखी गई है, अन्य वेबसाइट का अनुवाद उठाया नहीं गया। 1 5

  1. Siddhivinayaka Shodashopachara Pujastutih 1 — Sanskrit Documents electronic transcription · स्रोत खोलें
  2. Valkala — Vakratund Mahakay editorial source-and-variant report · स्रोत खोलें
  3. Bhaktimaargapradiipa / Bhaktimārga Pradīpa (1910) — Internet Archive DLI catalogue · स्रोत खोलें
  4. A Descriptive Catalogue of the Sanskrit Manuscripts of the Government Oriental Manuscripts Library, Madras, volume 16 · स्रोत खोलें
  5. Ślokasaṅgraha 1 / Common shlokas used for recitation set 1 · स्रोत खोलें
  6. Vighneshvara Pujavidhanam — Sanskrit Documents electronic edition · स्रोत खोलें
  7. Aahik Sutravali / Āhnika Sūtrāvalī — Internet Archive DLI catalogue · स्रोत खोलें