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चालीसा

श्री गणेश चालीसा — चयनित सम्पूर्ण पाठ और हिंदी भावार्थ

गणेश चालीसा का चयनित पूरा पाठ, 38 क्रमांकित चौपाइयाँ, तीन दोहे, सरल अर्थ और विश्वसनीय पाठ-टिप्पणियाँ।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

आरम्भिक दोहा

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल । विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल ॥

अर्थ

कवि सद्गुणों के धाम, कृपालु और विघ्न हरने वाले गिरिजानन्दन गणपति को प्रणाम करता है।

व्याख्या

यह मंगलाचरण सद्गुण और शुभ आरम्भ पर बल देता है; इसका भाव हर समस्या अपने-आप मिट जाने का आश्वासन नहीं है।

चौपाई 1

जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभः काजू ॥1॥

अर्थ

गणों के अधिपति गणपति की जय हो, जो शुभ कार्यों में मंगल का भाव भरते हैं।

व्याख्या

बार-बार ‘जय’ कहना स्तुति की लय बनाता है। गणराज एक दैवी पदवी है, सांसारिक राजवंश का ऐतिहासिक दावा नहीं।

चौपाई 2

जै गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायका बुद्धि विधाता ॥2॥

अर्थ

गजमुख विनायक की वंदना है; उन्हें सुख और विवेक के दाता कहा गया है।

व्याख्या

गजमुख गणेश का विशिष्ट रूप है। ‘बुद्धि’ में केवल पढ़ाई नहीं, उचित निर्णय और संयम भी समझे जा सकते हैं।

चौपाई 3

वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥3॥

अर्थ

भक्त गणेश की वक्र सूँड़ और ललाट के तिलक-त्रिपुण्ड का सुंदर रूप वर्णित करता है।

व्याख्या

ललाट के चिह्न भक्तिपरक मूर्तिवर्णन हैं; सभी स्थानों में गणेश की प्रतिमाओं पर एक जैसे चिह्न होना आवश्यक नहीं।

चौपाई 4

राजत मणि मुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥4॥

अर्थ

गणेश के वक्ष पर रत्न-मोती की माला, सिर पर स्वर्ण मुकुट और विशाल नेत्र शोभित हैं।

व्याख्या

आभूषण प्रभु के वैभव का काव्यमय चित्र खींचते हैं; यह किसी एक ऐतिहासिक प्रतिमा की सूची नहीं।

चौपाई 5

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥5॥

अर्थ

ग्रंथ, कुठार और त्रिशूल जैसे आयुधों के साथ मोदक और सुगंधित पुष्पों का उल्लेख है।

व्याख्या

पुस्तक ज्ञान का संकेत और नैवेद्य श्रद्धा का माध्यम है। अलग-अलग गणेश-मूर्तियों में आयुध भिन्न हो सकते हैं।

चौपाई 6

सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥6॥

अर्थ

पीताम्बर से उनका स्वरूप सुशोभित है; मुनि उनके चरण-पादुकाओं का आदर करते हैं।

व्याख्या

पादुका और चरण नम्रता तथा शरणागत भाव के प्रतीक हैं; इस वैभवपूर्ण चित्र में विनय भी जुड़ी है।

चौपाई 7

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्व-विख्याता ॥7॥

अर्थ

शिवपुत्र, षडानन स्कन्द के भाई और गौरी के प्रिय ललन गणेश की स्तुति है।

व्याख्या

यह पद गणेश को शिव-पार्वती परिवार से जोड़ता है; पुराणों में जन्म और पारिवारिक कथाओं के कई रूप मिलते हैं।

चौपाई 8

ऋद्धि-सिद्धि तव चंवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्वारे ॥8॥

अर्थ

ऋद्धि-सिद्धि चँवर-सेवा करती हैं और मूषक वाहन द्वार पर शोभित होता है।

व्याख्या

ऋद्धि-सिद्धि समृद्धि और सिद्धि के मानवीकृत रूप भी माने जाते हैं; मूषक गणेश के रूप-वर्णन की प्रसिद्ध पहचान है।

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी । अति शुची पावन मंगलकारी ॥9॥

अर्थ

अब कवि गणेश की जन्म-कथा कहने का संकल्प करता है।

व्याख्या

यहाँ स्तुति से कथा में प्रवेश है; अगली घटना एक परम्परागत आख्यान है, सभी ग्रंथों का एकमात्र मत नहीं।

चौपाई 10

एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ॥10॥

अर्थ

गिरिराज-पुत्री पार्वती ने पुत्र की कामना से कठिन तप किया।

व्याख्या

कथा में तप और आकांक्षा का वर्णन है; इससे संतान-प्राप्ति का कोई प्रमाणित अनुष्ठान या परिणाम नहीं निकालना चाहिए।

चौपाई 11

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा ॥11॥

अर्थ

उत्तम यज्ञ पूरा होने पर गणेश द्विज अतिथि के रूप में प्रकट हुए।

व्याख्या

अतिथि-रूप में दैवी आगमन की कथा सत्कार की महत्ता दिखाती है; यह ऐतिहासिक रूप से सत्यापित घटना नहीं है।

चौपाई 12

अतिथि जानी के गौरी सुखारी । बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ॥12॥

अर्थ

गौरी ने अतिथि जानकर प्रसन्नता से उनका आदर-सत्कार किया।

व्याख्या

पहचान से पहले ही सत्कार करना यहाँ महत्वपूर्ण है; आदर स्वार्थ से नहीं, सहज उदारता से जुड़ा है।

चौपाई 13

अति प्रसन्न हवै तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥13॥

अर्थ

प्रसन्न अतिथि पार्वती के पुत्र-कामना वाले तप के प्रसंग में वर देते हैं।

व्याख्या

वरदान इस भक्तिपरक कथा में कृपा का संकेत है; इसे निश्चित सांसारिक फल का वादा नहीं बनाना चाहिए।

चौपाई 14

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला । बिना गर्भ धारण यहि काला ॥14॥

अर्थ

कथा में असाधारण ढंग से बुद्धिमान पुत्र मिलने का वर वर्णित है।

व्याख्या

अलौकिक जन्म का यह विवरण पुराणकथात्मक भाषा है; इसे जैविक या चिकित्सकीय तथ्य नहीं कहा गया है।

चौपाई 15

गणनायक गुण ज्ञान निधाना । पूजित प्रथम रूप भगवाना ॥15॥

अर्थ

गणनायक को गुण-ज्ञान का भंडार और प्रथम पूज्य देव कहा गया है।

व्याख्या

‘प्रथम पूज्य’ व्यापक आराधना-परम्परा की पदवी है; अलग संस्कारों और समुदायों के क्रम में भिन्नता संभव है।

चौपाई 16

अस कही अन्तर्धान रूप हवै । पालना पर बालक स्वरूप हवै ॥16॥

अर्थ

यह कहकर अतिथि अंतर्धान हुए और पालने में शिशु-रूप दिखाई दिया।

व्याख्या

अचानक रूप-परिवर्तन से कथा दैवी वरदान और शिशु-जन्म को जोड़ती है।

चौपाई 17

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना । लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना ॥17॥

अर्थ

बालक रोने लगे और उनका मुख देखकर गौरी का आनंद उमड़ पड़ा।

व्याख्या

शिशु का रोना और माता का उल्लास कथा को घरेलू, मानवीय वात्सल्य से जोड़ता है।

चौपाई 18

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं । नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं ॥18॥

अर्थ

सब लोग मंगलगान करते हैं और पाठ के अनुसार देवगण पुष्प-वृष्टि करते हैं।

व्याख्या

यहाँ मूल साक्ष्य ‘नाभ ते’ पढ़ता है, जबकि दूसरे पाठ में ‘नभ ते’ है; असामान्य शब्द को बिना सूचना बदला नहीं गया।

शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहिं । सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं ॥19॥

अर्थ

शिव और उमा दान देते हैं और देव तथा मुनि बालक के दर्शन को आते हैं।

व्याख्या

दान तथा सामूहिक उत्सव से जन्म-कथा का सामाजिक और धार्मिक आयाम उभरता है।

चौपाई 20

लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ॥20॥

अर्थ

उत्सव का वातावरण देखकर शनि भी बालक के दर्शन को आते हैं।

व्याख्या

यहाँ से शनि-दृष्टि वाली गजमुख-कथा शुरू होती है; दूसरी प्रसिद्ध कथा में शिव की भूमिका अलग है।

चौपाई 21

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक, देखन चाहत नाहीं ॥21॥

अर्थ

अपनी दृष्टि से जुड़े अनिष्ट को सोचकर शनि बालक को देखना नहीं चाहते।

व्याख्या

यह कथा-विशेष की आशंका है; इससे ग्रह-स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति पर अनिष्ट का वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं निकलता।

चौपाई 22

गिरिजा कछु मन भेद बढायो । उत्सव मोर, न शनि तुही भायो ॥22॥

अर्थ

गिरिजा को लगता है कि शायद शनि को उनका उत्सव अच्छा नहीं लगा।

व्याख्या

इस शंका से संवाद में तनाव आता है; पात्र दूसरे के संकोच का कारण नहीं समझ पा रहे।

चौपाई 23

कहन लगे शनि, मन सकुचाई । का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई ॥23॥

अर्थ

शनि संकोच से पूछते हैं कि यदि वे बालक को देखें तो क्या होगा।

व्याख्या

शनि का संकोच आगामी कथा-घटना का संकेत है; इसे किसी वास्तविक दर्शन-निषेध में न बदला जाए।

चौपाई 24

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ । शनि सों बालक देखन कहयऊ ॥24॥

अर्थ

उमा ने चेतावनी को स्वीकार नहीं किया और शनि से बालक को देखने को कहा।

व्याख्या

कथा में आग्रह और आशंका के टकराव से दुःखद मोड़ आता है।

चौपाई 25

पदतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा । बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ॥25॥

अर्थ

कविता के अनुसार शनि की तिरछी दृष्टि पड़ते ही शिशु का सिर आकाश में चला गया।

व्याख्या

यह विशिष्ट धार्मिक आख्यान का अलौकिक प्रसंग है; सभी परम्पराओं का एकसमान ऐतिहासिक वर्णन नहीं।

चौपाई 26

गिरिजा गिरी विकल ह्वै धरणी । सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी ॥26॥

अर्थ

शोक से व्याकुल गिरिजा धरती पर गिर पड़ती हैं; उनके दुःख का वर्णन कठिन बताया गया है।

व्याख्या

यह पद माता के दुःख को केंद्र में रखता है; कथा के करुण पक्ष की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

चौपाई 27

हाहाकार मच्यौ कैलाशा । शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा ॥27॥

अर्थ

कैलास में हाहाकार मच जाता है और बालक के अनिष्ट का सम्बन्ध शनि-दृष्टि से जोड़ा जाता है।

व्याख्या

कथा में पात्रों की मान्यता कही गई है; वास्तविक लोगों के प्रति ग्रह-आधारित भय या भेदभाव का आधार नहीं।

चौपाई 28

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये । काटी चक्र सो गज सिर लाये ॥28॥

अर्थ

विष्णु गरुड़ पर जाकर चक्र से गज-मस्तक लाते हैं।

व्याख्या

इस पाठ में विष्णु समाधान लाते हैं; शिव द्वारा सिर काटने वाला प्रसंग दूसरी परम्परा में मिलता है।

बालक के धड़ ऊपर धारयो । प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ॥29॥

अर्थ

गज-मस्तक बालक के धड़ पर रखकर शंकर प्राण-संचार करते हैं।

व्याख्या

यह धार्मिक चमत्कार की कथा है, न शल्य-चिकित्सा की विधि और न अभ्यास करने योग्य मंत्र-निर्देश।

चौपाई 30

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे । प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे ॥30॥

अर्थ

शम्भु उनका नाम गणेश रखकर प्रथम पूज्य होने का वर देते हैं।

व्याख्या

नाम और वरदान की कथा बताती है कि अनेक पूजाओं के आरम्भ में गणेश की वंदना क्यों की जाती है।

चौपाई 31

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा । पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ॥31॥

अर्थ

शिव बुद्धि की परीक्षा के लिए पृथ्वी-प्रदक्षिणा का प्रसंग रखते हैं।

व्याख्या

यहाँ कथा बल और गति से आगे बढ़कर विवेक की परीक्षा बन जाती है।

चौपाई 32

चले षडानन, भरमि भुलाई । रचे बैठी तुम बुद्धि उपाई ॥32॥

अर्थ

षडानन यात्रा पर निकलते हैं और गणेश सोच-समझकर एक अलग उपाय रचते हैं।

व्याख्या

दोनों भाइयों के मार्ग अलग हैं; कविता केवल वेग नहीं, चतुर और सार्थक विचार को महत्त्व देती है।

चौपाई 33

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें । तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ॥33॥

अर्थ

गणेश माता-पिता के चरणों में जाकर उनकी सात परिक्रमा करते हैं।

व्याख्या

माता-पिता को जगत्समान मानने का भाव सम्मान दिखाता है; इसे हर जीवन-परिस्थिति पर थोपना उचित नहीं।

चौपाई 34

धनि गणेश कही शिव हिये हरषे । नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे ॥34॥

अर्थ

शिव गणेश की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होते हैं; देवगण पुष्प-वृष्टि करते हैं।

व्याख्या

कथा का सुखद मोड़ बुद्धि और विनय के समन्वय का उत्सव है।

चौपाई 35

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई । शेष सहस मुख सके न गाई ॥35॥

अर्थ

शेष के सहस्र मुख भी गणेश की महिमा और बुद्धि का पूरा गान नहीं कर सकते।

व्याख्या

सहस्र मुखों का उदाहरण श्रद्धा की अतिशयोक्तिपूर्ण काव्यभाषा है, कोई नाप-तौल नहीं।

चौपाई 36

मैं मतिहीन मलीन दुखारी । करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी ॥36॥

अर्थ

कवि अपनी अल्पबुद्धि और दुःख स्वीकार कर विनयपूर्वक पूछता है कि प्रार्थना कैसे करे।

व्याख्या

इस ‘मैं’ के साथ गौरवगाथा निजी विनय में बदलती है; इसमें स्वयं की सीमाएँ समझने का भाव है।

चौपाई 37

भजत 'रामसुन्दर' प्रभुदासा । जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा ॥37॥

अर्थ

इस पंक्ति में ‘रामसुन्दर’ नाम और प्रयाग, ककरा, दुर्वासा जैसे कठिन-व्याख्येय शब्द आते हैं।

व्याख्या

‘रामसुन्दर’ सम्भावित कवि-छाप है, पर इससे जन्मकाल या लेखक की पहचान सिद्ध नहीं होती; अन्य शब्दों की पाठ-समीक्षा जरूरी है।

चौपाई 38

अब प्रभु दया दीन पर कीजै । अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै ॥38॥

अर्थ

दीन भक्त प्रभु से दया, शक्ति और भक्ति की प्रार्थना करता है।

व्याख्या

शक्ति का भाव सही कर्म के साहस से भी जुड़ता है; यह अलौकिक क्षमता मिलने की गारंटी नहीं।

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान । नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान ॥

अर्थ

समापन दोहा ध्यानपूर्वक चालीसा पढ़ने को शुभता और सम्मान की कामना से जोड़ता है।

व्याख्या

शुभता और सम्मान की बात पारम्परिक भक्तिभाव है; इसे प्रमाणित या अनिवार्य फल-विधान न माना जाए।

सम्बन्ध अपने सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश । पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ती गणेश ॥

अर्थ

अन्तिम पद में चालीसा की पूर्णता और ऋषि पंचमी का संकेत है, लेकिन आरम्भिक कालसूचक शब्द स्पष्ट नहीं हैं।

व्याख्या

इस अस्थिर पाठ से कोई ऐतिहासिक संवत् तय करना उचित नहीं; दूसरे स्रोत में इसकी आरम्भिक पंक्ति भिन्न है।

सन्दर्भ और उपयोग

आरम्भिक दोहा {#opening-doha}

भावार्थ: कवि सद्गुणों के धाम, कृपालु और विघ्न हरने वाले गिरिजानन्दन गणपति को प्रणाम करता है। व्याख्या: यह मंगलाचरण सद्गुण और शुभ आरम्भ पर बल देता है; इसका भाव हर समस्या अपने-आप मिट जाने का आश्वासन नहीं है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

समापन दोहा १ {#closing-doha}

भावार्थ: समापन दोहा ध्यानपूर्वक चालीसा पढ़ने को शुभता और सम्मान की कामना से जोड़ता है। व्याख्या: शुभता और सम्मान की बात पारम्परिक भक्तिभाव है; इसे प्रमाणित या अनिवार्य फल-विधान न माना जाए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

समापन कोलाफन {#colophon-doha}

भावार्थ: अन्तिम पद में चालीसा की पूर्णता और ऋषि पंचमी का संकेत है, लेकिन आरम्भिक कालसूचक शब्द स्पष्ट नहीं हैं। व्याख्या: इस अस्थिर पाठ से कोई ऐतिहासिक संवत् तय करना उचित नहीं; दूसरे स्रोत में इसकी आरम्भिक पंक्ति भिन्न है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चालीसा का परिचय

गणेश चालीसा भगवान गणपति की लोकभाषा में रची भक्तिस्तुति है। इसका आरम्भ गणपति को मंगलकर्ता तथा बुद्धि और गुणों के आधार के रूप में संबोधित करता है। आगे गणेश के रूप, परिवार, जन्म तथा प्रथम-पूज्य होने की कथाओं के माध्यम से भक्ति का भाव विकसित होता है। अंत में कवि अपनी सीमाएँ स्वीकार कर दया, शक्ति और भक्ति माँगता है। इस प्रकार चालीसा केवल घटनाओं की सूची नहीं, स्तुति से कथा और कथा से व्यक्तिगत प्रार्थना की यात्रा है। 1

यह Braj/Awadhi-प्रभावित हिंदी की रचना है, संस्कृत श्लोकों का संकलन नहीं। “कविवर”, “गजबदन”, “मूषक”, “षडानन”, “शम्भु” आदि शब्दों को क्रमशः काव्य-सम्बन्धी विशेषण, गजमुख, चूहे के वाहन, कार्तिकेय और शिव से जोड़कर पढ़ना उपयोगी है। देवनागरी की प्राचीन बोलियों में “ह्वै”, “भयो”, “कहयऊ” जैसे रूप सामान्य हो सकते हैं; इन्हें आधुनिक खड़ी बोली में अनावश्यक रूप से सुधारना स्रोत का स्वर मिटा देगा।

इस संस्करण में 38 चौपाइयाँ क्यों हैं?

‘चालीसा’ नाम सामान्यतः चालीस-पद वाले भक्तिगीत की ओर संकेत करता है, लेकिन गणेश चालीसा के इस विशेष Wikisource पाठ में चौपाइयाँ १ से ३८ तक क्रमांकित हैं। इनके अतिरिक्त एक आरम्भिक और दो समापन दोहे हैं। कुल मिलाकर 41 पाठ-इकाइयाँ हैं। “चालीसा” शब्द देखकर दो काल्पनिक चौपाइयाँ जोड़ना पाठ के प्रति अन्याय होगा। दूसरी किसी प्रमाणित 40-इकाई वाली रचना या अलग गणेश चालीसा को इसी पाठ का अवशेष कहना भी सुरक्षित नहीं है। 124

गणेश का रूप और उससे मिलने वाली शिक्षा

आरम्भिक चौपाइयों में वक्र सूँड़, मस्तक के चिह्न, मुकुट, अलंकार, पुस्तक, मोदक, पीताम्बर और मूषक वाहन आते हैं। ये वस्तुएँ ज्ञान, ऐश्वर्य, प्रसन्नता, विनम्रता और साथ-साथ छोटे-बड़े सभी प्राणियों की उपस्थिति जैसी भक्तिपरक व्याख्याओं के द्वार खोलती हैं। तथापि हर चिह्न के लिए एक ही सार्वभौमिक शास्त्रीय अर्थ घोषित करना उचित नहीं। संग्रहालयों में गणेश की एक से अनेक भुजाओं वाली प्रतिमाएँ मिलती हैं; क्षेत्र और समय के अनुसार आयुध और रूप में बदलाव होता है। 56

गणेश का शिव, गौरी और षडानन से सम्बन्ध कविता को शिव–शक्ति पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में रखता है। ऋद्धि–सिद्धि और मूषक वाहन का उल्लेख यह भी दिखाता है कि आराधक बुद्धि, समृद्धि, सफलता और साधारण जीवन की जरूरतों को एक दूसरे से अलग नहीं देखता। यह उपदेश रूपक के स्तर पर है; किसी चित्र को इतिहास का शाब्दिक प्रमाण मानना सही नहीं।

शनि-दृष्टि वाली जन्मकथा और दूसरी कथाएँ

इस पाठ के 20–30वें पदों में शनि बालक को देखने से हिचकते हैं, एक विपत्ति घटती है, विष्णु गज-मस्तक लाते हैं और शिव प्राण-संचार तथा वरदान देते हैं। दूसरी बहुत प्रसिद्ध परम्परा में पार्वती स्वयं बालक रचती हैं और द्वार पर हुए संघर्ष में शिव उसका सिर काट देते हैं। दोनों अलग धार्मिक आख्यान हैं; किसी को दूसरे की छूटी हुई चौपाई की तरह जोड़ना या दोनों को एक ऐतिहासिक घटना के विवरण कहना गलत होगा। ब्रिटिश म्यूज़ियम के गणेश-संबंधी विवरण में भी पार्वती-निर्मित बालक का रूप मिलता है। 15

शनि और ग्रहों के प्रसंग को भय बेचने, किसी व्यक्ति को अशुभ ठहराने अथवा ग्रह-आधारित भेदभाव के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। कथा का स्रोतधर्मी अर्थ संकट, शोक और कृपा की भक्ति-भाषा में समझा जा सकता है; यह आधुनिक खगोलविज्ञान या स्वास्थ्य-संबंधी कारण-परिणाम का परीक्षण नहीं है।

माता-पिता की परिक्रमा: बुद्धि, संबंध और विवेक

चौपाई 31–34 में पृथ्वी-प्रदक्षिणा की परीक्षा और माता-पिता के चारों ओर सात परिक्रमा करने का प्रसंग आता है। इससे कविता गणेश को केवल शारीरिक सामर्थ्य से नहीं, विवेकपूर्ण निर्णय से जोड़ती है। परिवार का आदर करने की धार्मिक अभिव्यक्ति को समझना चाहिए, लेकिन इससे किसी कठिन या असुरक्षित पारिवारिक परिस्थिति में अंध-अनुकरण की मांग नहीं निकलती।

लेखक-नाम और कठिन समापन पाठ

चौपाई 37 में “रामसुन्दर” नाम मिलता है; इसे कवि-छाप का संकेत कहना सावधान निष्कर्ष है। इससे लेखक का निश्चित जीवनकाल, जन्मस्थान या किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व से पहचान सिद्ध नहीं होती। अंतिम दोहे में ऋषि पंचमी का संकेत आता है, किंतु “सम्बन्ध अपने सहस्र दश” और दूसरे पाठ का “संवत् अपन सहस्र दश” एक समान नहीं हैं। बिना मूल मुद्रित प्रमाण और भाषावैज्ञानिक परीक्षण के कोई संवत् या वर्ष निकालना अनुचित होगा। 12

पाठ-परम्परा और पाठभेद

यहां चुने गए स्थिर Wikisource पाठ के ही शब्द छापे गए हैं। उसके “जै”, “विश्व विनायका”, “नाभ ते”, “रचे बैठी”, तथा समापन की कठिन कालसूचक पंक्ति को दूसरे स्रोतों से जोड़कर “सुधारा” नहीं गया। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के पाठ में “जय”, “विश्व विनायक”, “नभ ते” और भिन्न समापन-आरम्भ जैसे पाठ हैं। उनका स्थान स्रोत-सूची और मूल पाठ-अभिलेख के variant records में है, मूल पाठ के भीतर नहीं। 12

भक्ति, पर्व और अभ्यास की सीमा

गणपति की वंदना अनेक परिवारों में कार्यारम्भ, उत्सव और गणेश चतुर्थी से जुड़ी है। यहाँ पाठ के अर्थ और संस्कृति को समझाया गया है; पूजा-विधि, अनिवार्य जप-संख्या, बीजमंत्र प्रयोग, दीक्षा या निश्चित फल का निर्देश नहीं दिया गया। आध्यात्मिक विश्वास और प्रमाणित चिकित्सकीय परिणाम अलग विषय हैं। यदि किसी को शारीरिक या मानसिक कष्ट हो, तो चालीसा को उपचार का विकल्प न मानें।

संबद्ध सामग्री

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या यहाँ पूरी गणेश चालीसा है? हाँ, चुने हुए ऑनलाइन साक्ष्य का पूरा पाठ है: एक आरम्भिक दोहा, 38 चौपाइयाँ और दो समापन दोहे। स्वतंत्र ऐतिहासिक संस्करण से मिलान अभी बाकी है।

नाम चालीसा है तो चौपाइयाँ 38 क्यों? इस साक्ष्य में 38 पंक्तियाँ ही क्रमांकित हैं। संख्या पूरी करने के लिए हम दो पंक्तियाँ नहीं गढ़ते।

गणेश चालीसा किसने लिखी? पाठ में “रामसुन्दर” नाम आता है, किंतु ऐतिहासिक लेखक और रचना-काल स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुए हैं।

गणेश का सिर किसने बदला? इस विशेष पाठ में विष्णु गज-मस्तक लाते हैं; अन्य प्रसिद्ध परम्परा शिव द्वारा बालक का सिर काटने का आख्यान कहती है।

क्या चालीसा का उच्चारण केवल हिंदी में होना चाहिए? मूल पाठ लोकभाषा में है। रोमन रूप उच्चारण में सहायक है, शब्द बदलकर अंग्रेजी अर्थ पढ़ना मूल पाठ का स्थान नहीं लेता।

क्या यह चालीसा जपने से हर परीक्षा में सफलता निश्चित है? नहीं। भक्त इसे बुद्धि और साहस की प्रार्थना मान सकते हैं; निश्चित सफलता का दावा नहीं है।

“नाभ ते” का क्या अर्थ है? यह चुने हुए पाठ का कठिन पाठ है; दूसरे स्रोत में “नभ ते” मिलता है। अंतिम अर्थ पाठ-समीक्षा के बाद ही तय होगा।

क्या वेबसाइट पर यह पाठ प्रकाशित हो गया है? नहीं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on गणेशचालीसा — fixed Wikisource revision 958500. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Opening Doha

    Jai Ganpati sadgun sadan, kavivar badan kripaal. Vighn haran mangal karan, jai jai Girija-laal.

  2. Chaupai 1

    Jai jai jai Ganpati Ganraaju. Mangal bharan karan shubh kaaju.

  3. Chaupai 2

    Jai Gajbadan sadan sukhdaata. Vishva Vinaayaka buddhi vidhaata.

  4. Chaupai 3

    Vakra tund shuchi shund suhaavana. Tilak tripund bhaal man bhaavan.

  5. Chaupai 4

    Raajat mani muktan ur maala. Swarn mukut shir nayan vishaala.

  6. Chaupai 5

    Pustak paani kuthaar trishoolam. Modak bhog sugandhit phoolam.

  7. Chaupai 6

    Sundar peetaambar tan saajit. Charan paaduka muni man raajit.

  8. Chaupai 7

    Dhani Shiv suvan Shadaanan bhraata. Gauri lalan vishva-vikhyaata.

  9. Chaupai 8

    Riddhi Siddhi tav chanvar sudhaare. Mooshak vaahan sohat dvaare.

  10. Chaupai 9

    Kahau janm shubh katha tumhaari. Ati shuchi paavan mangalkaari.

  11. Chaupai 10

    Ek samay Giriraaj kumaari. Putra hetu tap keenha bhaari.

  12. Chaupai 11

    Bhayo yagya jab poorn anoopa. Tab pahunchyo tum dhari dvij roopa.

  13. Chaupai 12

    Atithi jaani ke Gauri sukhaari. Bahuvidhi seva kari tumhaari.

  14. Chaupai 13

    Ati prasann havai tum var deenha. Maatu putra hit jo tap keenha.

  15. Chaupai 14

    Milahi putra tuhi, buddhi vishaala. Bina garbh dhaaran yahi kaala.

  16. Chaupai 15

    Gannaayak gun gyaan nidhaana. Poojit pratham roop Bhagvaana.

  17. Chaupai 16

    As kahi antardhaan roop havai. Paalna par baalak swaroop havai.

  18. Chaupai 17

    Bani shishu rudan jabahin tum thaana. Lakhi mukh sukh nahin Gauri samaana.

  19. Chaupai 18

    Sakal magan, sukhmangal gaavahin. Naabh te suran, suman varshaavahin.

  20. Chaupai 19

    Shambhu Uma bahudaan lutaavahin. Sur munijan sut dekhan aavahin.

  21. Chaupai 20

    Lakhi ati aanand mangal saaja. Dekhan bhi aaye Shani raaja.

  22. Chaupai 21

    Nij avgun guni Shani man maahin. Baalak dekhan chaahat naahin.

  23. Chaupai 22

    Girija kachhu man bhed badhaayo. Utsav mor, na Shani tuhi bhaayo.

  24. Chaupai 23

    Kahan lage Shani, man sakuchaai. Ka karihau, shishu mohi dikhaai.

  25. Chaupai 24

    Nahin vishvaas, Uma ur bhayau. Shani son baalak dekhan kahyau.

  26. Chaupai 25

    Padat-hin Shani drig kon prakaasha. Baalak sir udi gayo aakaasha.

  27. Chaupai 26

    Girija giri vikal hvai dharani. So dukh dasha gayo nahin varani.

  28. Chaupai 27

    Haahaakaar machyau Kailaasha. Shani keenhon lakhi sut ko naasha.

  29. Chaupai 28

    Turat Garud chadhi Vishnu sidhaaye. Kaati chakra so gaj sir laaye.

  30. Chaupai 29

    Baalak ke dhad oopar dhaarayo. Praan mantra padhi Shankar daarayo.

  31. Chaupai 30

    Naam Ganesh Shambhu tab keenhe. Pratham poojya buddhi nidhi var deenhe.

  32. Chaupai 31

    Buddhi pareeksha jab Shiv keenha. Prithvi kar pradakshina leenha.

  33. Chaupai 32

    Chale Shadaanan, bharami bhulaai. Rache baithi tum buddhi upaai.

  34. Chaupai 33

    Charan maatu-pitu ke dhar leenhen. Tinke saat pradakshin keenhen.

  35. Chaupai 34

    Dhani Ganesh kahi Shiv hiye harshe. Nabh te suran suman bahu barse.

  36. Chaupai 35

    Tumhari mahima buddhi badaai. Shesh sahas mukh sake na gaai.

  37. Chaupai 36

    Main matiheen maleen dukhaari. Karahun kaun vidhi vinay tumhaari.

  38. Chaupai 37

    Bhajat Ramsundar Prabhudaasa. Jag Prayaag Kakra Durvaasa.

  39. Chaupai 38

    Ab Prabhu daya deen par keejai. Apni shakti bhakti kuchh deejai.

  40. Closing Doha 1

    Shri Ganesh yah Chalisa, paath karai kar dhyaan. Nit nav mangal grih basai, lahe jagat sanmaan.

  41. Closing Colophon

    Sambandh apne sahasra dash, Rishi Panchami dinesh. Pooran Chalisa bhayo, mangal moorti Ganesh.

स्रोत, श्रेय और सम्पादकीय अवस्था

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

चौपाई 1 {#chaupai-01}

भावार्थ: गणों के अधिपति गणपति की जय हो, जो शुभ कार्यों में मंगल का भाव भरते हैं। व्याख्या: बार-बार ‘जय’ कहना स्तुति की लय बनाता है। गणराज एक दैवी पदवी है, सांसारिक राजवंश का ऐतिहासिक दावा नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 2 {#chaupai-02}

भावार्थ: गजमुख विनायक की वंदना है; उन्हें सुख और विवेक के दाता कहा गया है। व्याख्या: गजमुख गणेश का विशिष्ट रूप है। ‘बुद्धि’ में केवल पढ़ाई नहीं, उचित निर्णय और संयम भी समझे जा सकते हैं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 3 {#chaupai-03}

भावार्थ: भक्त गणेश की वक्र सूँड़ और ललाट के तिलक-त्रिपुण्ड का सुंदर रूप वर्णित करता है। व्याख्या: ललाट के चिह्न भक्तिपरक मूर्तिवर्णन हैं; सभी स्थानों में गणेश की प्रतिमाओं पर एक जैसे चिह्न होना आवश्यक नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 4 {#chaupai-04}

भावार्थ: गणेश के वक्ष पर रत्न-मोती की माला, सिर पर स्वर्ण मुकुट और विशाल नेत्र शोभित हैं। व्याख्या: आभूषण प्रभु के वैभव का काव्यमय चित्र खींचते हैं; यह किसी एक ऐतिहासिक प्रतिमा की सूची नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 5 {#chaupai-05}

भावार्थ: ग्रंथ, कुठार और त्रिशूल जैसे आयुधों के साथ मोदक और सुगंधित पुष्पों का उल्लेख है। व्याख्या: पुस्तक ज्ञान का संकेत और नैवेद्य श्रद्धा का माध्यम है। अलग-अलग गणेश-मूर्तियों में आयुध भिन्न हो सकते हैं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 6 {#chaupai-06}

भावार्थ: पीताम्बर से उनका स्वरूप सुशोभित है; मुनि उनके चरण-पादुकाओं का आदर करते हैं। व्याख्या: पादुका और चरण नम्रता तथा शरणागत भाव के प्रतीक हैं; इस वैभवपूर्ण चित्र में विनय भी जुड़ी है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 7 {#chaupai-07}

भावार्थ: शिवपुत्र, षडानन स्कन्द के भाई और गौरी के प्रिय ललन गणेश की स्तुति है। व्याख्या: यह पद गणेश को शिव-पार्वती परिवार से जोड़ता है; पुराणों में जन्म और पारिवारिक कथाओं के कई रूप मिलते हैं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 8 {#chaupai-08}

भावार्थ: ऋद्धि-सिद्धि चँवर-सेवा करती हैं और मूषक वाहन द्वार पर शोभित होता है। व्याख्या: ऋद्धि-सिद्धि समृद्धि और सिद्धि के मानवीकृत रूप भी माने जाते हैं; मूषक गणेश के रूप-वर्णन की प्रसिद्ध पहचान है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 9 {#chaupai-09}

भावार्थ: अब कवि गणेश की जन्म-कथा कहने का संकल्प करता है। व्याख्या: यहाँ स्तुति से कथा में प्रवेश है; अगली घटना एक परम्परागत आख्यान है, सभी ग्रंथों का एकमात्र मत नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 10 {#chaupai-10}

भावार्थ: गिरिराज-पुत्री पार्वती ने पुत्र की कामना से कठिन तप किया। व्याख्या: कथा में तप और आकांक्षा का वर्णन है; इससे संतान-प्राप्ति का कोई प्रमाणित अनुष्ठान या परिणाम नहीं निकालना चाहिए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 11 {#chaupai-11}

भावार्थ: उत्तम यज्ञ पूरा होने पर गणेश द्विज अतिथि के रूप में प्रकट हुए। व्याख्या: अतिथि-रूप में दैवी आगमन की कथा सत्कार की महत्ता दिखाती है; यह ऐतिहासिक रूप से सत्यापित घटना नहीं है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 12 {#chaupai-12}

भावार्थ: गौरी ने अतिथि जानकर प्रसन्नता से उनका आदर-सत्कार किया। व्याख्या: पहचान से पहले ही सत्कार करना यहाँ महत्वपूर्ण है; आदर स्वार्थ से नहीं, सहज उदारता से जुड़ा है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 13 {#chaupai-13}

भावार्थ: प्रसन्न अतिथि पार्वती के पुत्र-कामना वाले तप के प्रसंग में वर देते हैं। व्याख्या: वरदान इस भक्तिपरक कथा में कृपा का संकेत है; इसे निश्चित सांसारिक फल का वादा नहीं बनाना चाहिए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 14 {#chaupai-14}

भावार्थ: कथा में असाधारण ढंग से बुद्धिमान पुत्र मिलने का वर वर्णित है। व्याख्या: अलौकिक जन्म का यह विवरण पुराणकथात्मक भाषा है; इसे जैविक या चिकित्सकीय तथ्य नहीं कहा गया है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 15 {#chaupai-15}

भावार्थ: गणनायक को गुण-ज्ञान का भंडार और प्रथम पूज्य देव कहा गया है। व्याख्या: ‘प्रथम पूज्य’ व्यापक आराधना-परम्परा की पदवी है; अलग संस्कारों और समुदायों के क्रम में भिन्नता संभव है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 16 {#chaupai-16}

भावार्थ: यह कहकर अतिथि अंतर्धान हुए और पालने में शिशु-रूप दिखाई दिया। व्याख्या: अचानक रूप-परिवर्तन से कथा दैवी वरदान और शिशु-जन्म को जोड़ती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 17 {#chaupai-17}

भावार्थ: बालक रोने लगे और उनका मुख देखकर गौरी का आनंद उमड़ पड़ा। व्याख्या: शिशु का रोना और माता का उल्लास कथा को घरेलू, मानवीय वात्सल्य से जोड़ता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 18 {#chaupai-18}

भावार्थ: सब लोग मंगलगान करते हैं और पाठ के अनुसार देवगण पुष्प-वृष्टि करते हैं। व्याख्या: यहाँ मूल साक्ष्य ‘नाभ ते’ पढ़ता है, जबकि दूसरे पाठ में ‘नभ ते’ है; असामान्य शब्द को बिना सूचना बदला नहीं गया। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 19 {#chaupai-19}

भावार्थ: शिव और उमा दान देते हैं और देव तथा मुनि बालक के दर्शन को आते हैं। व्याख्या: दान तथा सामूहिक उत्सव से जन्म-कथा का सामाजिक और धार्मिक आयाम उभरता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 20 {#chaupai-20}

भावार्थ: उत्सव का वातावरण देखकर शनि भी बालक के दर्शन को आते हैं। व्याख्या: यहाँ से शनि-दृष्टि वाली गजमुख-कथा शुरू होती है; दूसरी प्रसिद्ध कथा में शिव की भूमिका अलग है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 21 {#chaupai-21}

भावार्थ: अपनी दृष्टि से जुड़े अनिष्ट को सोचकर शनि बालक को देखना नहीं चाहते। व्याख्या: यह कथा-विशेष की आशंका है; इससे ग्रह-स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति पर अनिष्ट का वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं निकलता। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 22 {#chaupai-22}

भावार्थ: गिरिजा को लगता है कि शायद शनि को उनका उत्सव अच्छा नहीं लगा। व्याख्या: इस शंका से संवाद में तनाव आता है; पात्र दूसरे के संकोच का कारण नहीं समझ पा रहे। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 23 {#chaupai-23}

भावार्थ: शनि संकोच से पूछते हैं कि यदि वे बालक को देखें तो क्या होगा। व्याख्या: शनि का संकोच आगामी कथा-घटना का संकेत है; इसे किसी वास्तविक दर्शन-निषेध में न बदला जाए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 24 {#chaupai-24}

भावार्थ: उमा ने चेतावनी को स्वीकार नहीं किया और शनि से बालक को देखने को कहा। व्याख्या: कथा में आग्रह और आशंका के टकराव से दुःखद मोड़ आता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 25 {#chaupai-25}

भावार्थ: कविता के अनुसार शनि की तिरछी दृष्टि पड़ते ही शिशु का सिर आकाश में चला गया। व्याख्या: यह विशिष्ट धार्मिक आख्यान का अलौकिक प्रसंग है; सभी परम्पराओं का एकसमान ऐतिहासिक वर्णन नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 26 {#chaupai-26}

भावार्थ: शोक से व्याकुल गिरिजा धरती पर गिर पड़ती हैं; उनके दुःख का वर्णन कठिन बताया गया है। व्याख्या: यह पद माता के दुःख को केंद्र में रखता है; कथा के करुण पक्ष की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 27 {#chaupai-27}

भावार्थ: कैलास में हाहाकार मच जाता है और बालक के अनिष्ट का सम्बन्ध शनि-दृष्टि से जोड़ा जाता है। व्याख्या: कथा में पात्रों की मान्यता कही गई है; वास्तविक लोगों के प्रति ग्रह-आधारित भय या भेदभाव का आधार नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 28 {#chaupai-28}

भावार्थ: विष्णु गरुड़ पर जाकर चक्र से गज-मस्तक लाते हैं। व्याख्या: इस पाठ में विष्णु समाधान लाते हैं; शिव द्वारा सिर काटने वाला प्रसंग दूसरी परम्परा में मिलता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 29 {#chaupai-29}

भावार्थ: गज-मस्तक बालक के धड़ पर रखकर शंकर प्राण-संचार करते हैं। व्याख्या: यह धार्मिक चमत्कार की कथा है, न शल्य-चिकित्सा की विधि और न अभ्यास करने योग्य मंत्र-निर्देश। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 30 {#chaupai-30}

भावार्थ: शम्भु उनका नाम गणेश रखकर प्रथम पूज्य होने का वर देते हैं। व्याख्या: नाम और वरदान की कथा बताती है कि अनेक पूजाओं के आरम्भ में गणेश की वंदना क्यों की जाती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 31 {#chaupai-31}

भावार्थ: शिव बुद्धि की परीक्षा के लिए पृथ्वी-प्रदक्षिणा का प्रसंग रखते हैं। व्याख्या: यहाँ कथा बल और गति से आगे बढ़कर विवेक की परीक्षा बन जाती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 32 {#chaupai-32}

भावार्थ: षडानन यात्रा पर निकलते हैं और गणेश सोच-समझकर एक अलग उपाय रचते हैं। व्याख्या: दोनों भाइयों के मार्ग अलग हैं; कविता केवल वेग नहीं, चतुर और सार्थक विचार को महत्त्व देती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 33 {#chaupai-33}

भावार्थ: गणेश माता-पिता के चरणों में जाकर उनकी सात परिक्रमा करते हैं। व्याख्या: माता-पिता को जगत्समान मानने का भाव सम्मान दिखाता है; इसे हर जीवन-परिस्थिति पर थोपना उचित नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 34 {#chaupai-34}

भावार्थ: शिव गणेश की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होते हैं; देवगण पुष्प-वृष्टि करते हैं। व्याख्या: कथा का सुखद मोड़ बुद्धि और विनय के समन्वय का उत्सव है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 35 {#chaupai-35}

भावार्थ: शेष के सहस्र मुख भी गणेश की महिमा और बुद्धि का पूरा गान नहीं कर सकते। व्याख्या: सहस्र मुखों का उदाहरण श्रद्धा की अतिशयोक्तिपूर्ण काव्यभाषा है, कोई नाप-तौल नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 36 {#chaupai-36}

भावार्थ: कवि अपनी अल्पबुद्धि और दुःख स्वीकार कर विनयपूर्वक पूछता है कि प्रार्थना कैसे करे। व्याख्या: इस ‘मैं’ के साथ गौरवगाथा निजी विनय में बदलती है; इसमें स्वयं की सीमाएँ समझने का भाव है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 37 {#chaupai-37}

भावार्थ: इस पंक्ति में ‘रामसुन्दर’ नाम और प्रयाग, ककरा, दुर्वासा जैसे कठिन-व्याख्येय शब्द आते हैं। व्याख्या: ‘रामसुन्दर’ सम्भावित कवि-छाप है, पर इससे जन्मकाल या लेखक की पहचान सिद्ध नहीं होती; अन्य शब्दों की पाठ-समीक्षा जरूरी है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

चौपाई 38 {#chaupai-38}

भावार्थ: दीन भक्त प्रभु से दया, शक्ति और भक्ति की प्रार्थना करता है। व्याख्या: शक्ति का भाव सही कर्म के साहस से भी जुड़ता है; यह अलौकिक क्षमता मिलने की गारंटी नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1

  1. गणेशचालीसा — fixed Wikisource revision 958500 · स्रोत खोलें
  2. Shri Ganesha Chalisa / gaNesha40.itx (Sanskrit Documents) · स्रोत खोलें
  3. Shri Ganesh Chalisa: Jai Ganpati Sadgun Sadan · स्रोत खोलें
  4. Ganesh Chalisa, 38 chaupai transcription and explanation · स्रोत खोलें
  5. Gaṇeśa: British Museum collection authority biography · स्रोत खोलें
  6. Recognizing the Gods · स्रोत खोलें
  7. Wikisource copyright licensing policy · स्रोत खोलें