आरम्भिक दोहा {#opening-doha}
भावार्थ: कवि सद्गुणों के धाम, कृपालु और विघ्न हरने वाले गिरिजानन्दन गणपति को प्रणाम करता है। व्याख्या: यह मंगलाचरण सद्गुण और शुभ आरम्भ पर बल देता है; इसका भाव हर समस्या अपने-आप मिट जाने का आश्वासन नहीं है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
समापन दोहा १ {#closing-doha}
भावार्थ: समापन दोहा ध्यानपूर्वक चालीसा पढ़ने को शुभता और सम्मान की कामना से जोड़ता है। व्याख्या: शुभता और सम्मान की बात पारम्परिक भक्तिभाव है; इसे प्रमाणित या अनिवार्य फल-विधान न माना जाए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
समापन कोलाफन {#colophon-doha}
भावार्थ: अन्तिम पद में चालीसा की पूर्णता और ऋषि पंचमी का संकेत है, लेकिन आरम्भिक कालसूचक शब्द स्पष्ट नहीं हैं। व्याख्या: इस अस्थिर पाठ से कोई ऐतिहासिक संवत् तय करना उचित नहीं; दूसरे स्रोत में इसकी आरम्भिक पंक्ति भिन्न है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चालीसा का परिचय
गणेश चालीसा भगवान गणपति की लोकभाषा में रची भक्तिस्तुति है। इसका आरम्भ गणपति को मंगलकर्ता तथा बुद्धि और गुणों के आधार के रूप में संबोधित करता है। आगे गणेश के रूप, परिवार, जन्म तथा प्रथम-पूज्य होने की कथाओं के माध्यम से भक्ति का भाव विकसित होता है। अंत में कवि अपनी सीमाएँ स्वीकार कर दया, शक्ति और भक्ति माँगता है। इस प्रकार चालीसा केवल घटनाओं की सूची नहीं, स्तुति से कथा और कथा से व्यक्तिगत प्रार्थना की यात्रा है। 1
यह Braj/Awadhi-प्रभावित हिंदी की रचना है, संस्कृत श्लोकों का संकलन नहीं। “कविवर”, “गजबदन”, “मूषक”, “षडानन”, “शम्भु” आदि शब्दों को क्रमशः काव्य-सम्बन्धी विशेषण, गजमुख, चूहे के वाहन, कार्तिकेय और शिव से जोड़कर पढ़ना उपयोगी है। देवनागरी की प्राचीन बोलियों में “ह्वै”, “भयो”, “कहयऊ” जैसे रूप सामान्य हो सकते हैं; इन्हें आधुनिक खड़ी बोली में अनावश्यक रूप से सुधारना स्रोत का स्वर मिटा देगा।
इस संस्करण में 38 चौपाइयाँ क्यों हैं?
‘चालीसा’ नाम सामान्यतः चालीस-पद वाले भक्तिगीत की ओर संकेत करता है, लेकिन गणेश चालीसा के इस विशेष Wikisource पाठ में चौपाइयाँ १ से ३८ तक क्रमांकित हैं। इनके अतिरिक्त एक आरम्भिक और दो समापन दोहे हैं। कुल मिलाकर 41 पाठ-इकाइयाँ हैं। “चालीसा” शब्द देखकर दो काल्पनिक चौपाइयाँ जोड़ना पाठ के प्रति अन्याय होगा। दूसरी किसी प्रमाणित 40-इकाई वाली रचना या अलग गणेश चालीसा को इसी पाठ का अवशेष कहना भी सुरक्षित नहीं है। 124
गणेश का रूप और उससे मिलने वाली शिक्षा
आरम्भिक चौपाइयों में वक्र सूँड़, मस्तक के चिह्न, मुकुट, अलंकार, पुस्तक, मोदक, पीताम्बर और मूषक वाहन आते हैं। ये वस्तुएँ ज्ञान, ऐश्वर्य, प्रसन्नता, विनम्रता और साथ-साथ छोटे-बड़े सभी प्राणियों की उपस्थिति जैसी भक्तिपरक व्याख्याओं के द्वार खोलती हैं। तथापि हर चिह्न के लिए एक ही सार्वभौमिक शास्त्रीय अर्थ घोषित करना उचित नहीं। संग्रहालयों में गणेश की एक से अनेक भुजाओं वाली प्रतिमाएँ मिलती हैं; क्षेत्र और समय के अनुसार आयुध और रूप में बदलाव होता है। 56
गणेश का शिव, गौरी और षडानन से सम्बन्ध कविता को शिव–शक्ति पारिवारिक परिप्रेक्ष्य में रखता है। ऋद्धि–सिद्धि और मूषक वाहन का उल्लेख यह भी दिखाता है कि आराधक बुद्धि, समृद्धि, सफलता और साधारण जीवन की जरूरतों को एक दूसरे से अलग नहीं देखता। यह उपदेश रूपक के स्तर पर है; किसी चित्र को इतिहास का शाब्दिक प्रमाण मानना सही नहीं।
शनि-दृष्टि वाली जन्मकथा और दूसरी कथाएँ
इस पाठ के 20–30वें पदों में शनि बालक को देखने से हिचकते हैं, एक विपत्ति घटती है, विष्णु गज-मस्तक लाते हैं और शिव प्राण-संचार तथा वरदान देते हैं। दूसरी बहुत प्रसिद्ध परम्परा में पार्वती स्वयं बालक रचती हैं और द्वार पर हुए संघर्ष में शिव उसका सिर काट देते हैं। दोनों अलग धार्मिक आख्यान हैं; किसी को दूसरे की छूटी हुई चौपाई की तरह जोड़ना या दोनों को एक ऐतिहासिक घटना के विवरण कहना गलत होगा। ब्रिटिश म्यूज़ियम के गणेश-संबंधी विवरण में भी पार्वती-निर्मित बालक का रूप मिलता है। 15
शनि और ग्रहों के प्रसंग को भय बेचने, किसी व्यक्ति को अशुभ ठहराने अथवा ग्रह-आधारित भेदभाव के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। कथा का स्रोतधर्मी अर्थ संकट, शोक और कृपा की भक्ति-भाषा में समझा जा सकता है; यह आधुनिक खगोलविज्ञान या स्वास्थ्य-संबंधी कारण-परिणाम का परीक्षण नहीं है।
माता-पिता की परिक्रमा: बुद्धि, संबंध और विवेक
चौपाई 31–34 में पृथ्वी-प्रदक्षिणा की परीक्षा और माता-पिता के चारों ओर सात परिक्रमा करने का प्रसंग आता है। इससे कविता गणेश को केवल शारीरिक सामर्थ्य से नहीं, विवेकपूर्ण निर्णय से जोड़ती है। परिवार का आदर करने की धार्मिक अभिव्यक्ति को समझना चाहिए, लेकिन इससे किसी कठिन या असुरक्षित पारिवारिक परिस्थिति में अंध-अनुकरण की मांग नहीं निकलती।
लेखक-नाम और कठिन समापन पाठ
चौपाई 37 में “रामसुन्दर” नाम मिलता है; इसे कवि-छाप का संकेत कहना सावधान निष्कर्ष है। इससे लेखक का निश्चित जीवनकाल, जन्मस्थान या किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व से पहचान सिद्ध नहीं होती। अंतिम दोहे में ऋषि पंचमी का संकेत आता है, किंतु “सम्बन्ध अपने सहस्र दश” और दूसरे पाठ का “संवत् अपन सहस्र दश” एक समान नहीं हैं। बिना मूल मुद्रित प्रमाण और भाषावैज्ञानिक परीक्षण के कोई संवत् या वर्ष निकालना अनुचित होगा। 12
पाठ-परम्परा और पाठभेद
यहां चुने गए स्थिर Wikisource पाठ के ही शब्द छापे गए हैं। उसके “जै”, “विश्व विनायका”, “नाभ ते”, “रचे बैठी”, तथा समापन की कठिन कालसूचक पंक्ति को दूसरे स्रोतों से जोड़कर “सुधारा” नहीं गया। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के पाठ में “जय”, “विश्व विनायक”, “नभ ते” और भिन्न समापन-आरम्भ जैसे पाठ हैं। उनका स्थान स्रोत-सूची और मूल पाठ-अभिलेख के variant records में है, मूल पाठ के भीतर नहीं। 12
भक्ति, पर्व और अभ्यास की सीमा
गणपति की वंदना अनेक परिवारों में कार्यारम्भ, उत्सव और गणेश चतुर्थी से जुड़ी है। यहाँ पाठ के अर्थ और संस्कृति को समझाया गया है; पूजा-विधि, अनिवार्य जप-संख्या, बीजमंत्र प्रयोग, दीक्षा या निश्चित फल का निर्देश नहीं दिया गया। आध्यात्मिक विश्वास और प्रमाणित चिकित्सकीय परिणाम अलग विषय हैं। यदि किसी को शारीरिक या मानसिक कष्ट हो, तो चालीसा को उपचार का विकल्प न मानें।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
चौपाई 1 {#chaupai-01}
भावार्थ: गणों के अधिपति गणपति की जय हो, जो शुभ कार्यों में मंगल का भाव भरते हैं। व्याख्या: बार-बार ‘जय’ कहना स्तुति की लय बनाता है। गणराज एक दैवी पदवी है, सांसारिक राजवंश का ऐतिहासिक दावा नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 2 {#chaupai-02}
भावार्थ: गजमुख विनायक की वंदना है; उन्हें सुख और विवेक के दाता कहा गया है। व्याख्या: गजमुख गणेश का विशिष्ट रूप है। ‘बुद्धि’ में केवल पढ़ाई नहीं, उचित निर्णय और संयम भी समझे जा सकते हैं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 3 {#chaupai-03}
भावार्थ: भक्त गणेश की वक्र सूँड़ और ललाट के तिलक-त्रिपुण्ड का सुंदर रूप वर्णित करता है। व्याख्या: ललाट के चिह्न भक्तिपरक मूर्तिवर्णन हैं; सभी स्थानों में गणेश की प्रतिमाओं पर एक जैसे चिह्न होना आवश्यक नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 4 {#chaupai-04}
भावार्थ: गणेश के वक्ष पर रत्न-मोती की माला, सिर पर स्वर्ण मुकुट और विशाल नेत्र शोभित हैं। व्याख्या: आभूषण प्रभु के वैभव का काव्यमय चित्र खींचते हैं; यह किसी एक ऐतिहासिक प्रतिमा की सूची नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 5 {#chaupai-05}
भावार्थ: ग्रंथ, कुठार और त्रिशूल जैसे आयुधों के साथ मोदक और सुगंधित पुष्पों का उल्लेख है। व्याख्या: पुस्तक ज्ञान का संकेत और नैवेद्य श्रद्धा का माध्यम है। अलग-अलग गणेश-मूर्तियों में आयुध भिन्न हो सकते हैं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 6 {#chaupai-06}
भावार्थ: पीताम्बर से उनका स्वरूप सुशोभित है; मुनि उनके चरण-पादुकाओं का आदर करते हैं। व्याख्या: पादुका और चरण नम्रता तथा शरणागत भाव के प्रतीक हैं; इस वैभवपूर्ण चित्र में विनय भी जुड़ी है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 7 {#chaupai-07}
भावार्थ: शिवपुत्र, षडानन स्कन्द के भाई और गौरी के प्रिय ललन गणेश की स्तुति है। व्याख्या: यह पद गणेश को शिव-पार्वती परिवार से जोड़ता है; पुराणों में जन्म और पारिवारिक कथाओं के कई रूप मिलते हैं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 8 {#chaupai-08}
भावार्थ: ऋद्धि-सिद्धि चँवर-सेवा करती हैं और मूषक वाहन द्वार पर शोभित होता है। व्याख्या: ऋद्धि-सिद्धि समृद्धि और सिद्धि के मानवीकृत रूप भी माने जाते हैं; मूषक गणेश के रूप-वर्णन की प्रसिद्ध पहचान है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 9 {#chaupai-09}
भावार्थ: अब कवि गणेश की जन्म-कथा कहने का संकल्प करता है। व्याख्या: यहाँ स्तुति से कथा में प्रवेश है; अगली घटना एक परम्परागत आख्यान है, सभी ग्रंथों का एकमात्र मत नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 10 {#chaupai-10}
भावार्थ: गिरिराज-पुत्री पार्वती ने पुत्र की कामना से कठिन तप किया। व्याख्या: कथा में तप और आकांक्षा का वर्णन है; इससे संतान-प्राप्ति का कोई प्रमाणित अनुष्ठान या परिणाम नहीं निकालना चाहिए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 11 {#chaupai-11}
भावार्थ: उत्तम यज्ञ पूरा होने पर गणेश द्विज अतिथि के रूप में प्रकट हुए। व्याख्या: अतिथि-रूप में दैवी आगमन की कथा सत्कार की महत्ता दिखाती है; यह ऐतिहासिक रूप से सत्यापित घटना नहीं है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 12 {#chaupai-12}
भावार्थ: गौरी ने अतिथि जानकर प्रसन्नता से उनका आदर-सत्कार किया। व्याख्या: पहचान से पहले ही सत्कार करना यहाँ महत्वपूर्ण है; आदर स्वार्थ से नहीं, सहज उदारता से जुड़ा है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 13 {#chaupai-13}
भावार्थ: प्रसन्न अतिथि पार्वती के पुत्र-कामना वाले तप के प्रसंग में वर देते हैं। व्याख्या: वरदान इस भक्तिपरक कथा में कृपा का संकेत है; इसे निश्चित सांसारिक फल का वादा नहीं बनाना चाहिए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 14 {#chaupai-14}
भावार्थ: कथा में असाधारण ढंग से बुद्धिमान पुत्र मिलने का वर वर्णित है। व्याख्या: अलौकिक जन्म का यह विवरण पुराणकथात्मक भाषा है; इसे जैविक या चिकित्सकीय तथ्य नहीं कहा गया है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 15 {#chaupai-15}
भावार्थ: गणनायक को गुण-ज्ञान का भंडार और प्रथम पूज्य देव कहा गया है। व्याख्या: ‘प्रथम पूज्य’ व्यापक आराधना-परम्परा की पदवी है; अलग संस्कारों और समुदायों के क्रम में भिन्नता संभव है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 16 {#chaupai-16}
भावार्थ: यह कहकर अतिथि अंतर्धान हुए और पालने में शिशु-रूप दिखाई दिया। व्याख्या: अचानक रूप-परिवर्तन से कथा दैवी वरदान और शिशु-जन्म को जोड़ती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 17 {#chaupai-17}
भावार्थ: बालक रोने लगे और उनका मुख देखकर गौरी का आनंद उमड़ पड़ा। व्याख्या: शिशु का रोना और माता का उल्लास कथा को घरेलू, मानवीय वात्सल्य से जोड़ता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 18 {#chaupai-18}
भावार्थ: सब लोग मंगलगान करते हैं और पाठ के अनुसार देवगण पुष्प-वृष्टि करते हैं। व्याख्या: यहाँ मूल साक्ष्य ‘नाभ ते’ पढ़ता है, जबकि दूसरे पाठ में ‘नभ ते’ है; असामान्य शब्द को बिना सूचना बदला नहीं गया। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 19 {#chaupai-19}
भावार्थ: शिव और उमा दान देते हैं और देव तथा मुनि बालक के दर्शन को आते हैं। व्याख्या: दान तथा सामूहिक उत्सव से जन्म-कथा का सामाजिक और धार्मिक आयाम उभरता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 20 {#chaupai-20}
भावार्थ: उत्सव का वातावरण देखकर शनि भी बालक के दर्शन को आते हैं। व्याख्या: यहाँ से शनि-दृष्टि वाली गजमुख-कथा शुरू होती है; दूसरी प्रसिद्ध कथा में शिव की भूमिका अलग है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 21 {#chaupai-21}
भावार्थ: अपनी दृष्टि से जुड़े अनिष्ट को सोचकर शनि बालक को देखना नहीं चाहते। व्याख्या: यह कथा-विशेष की आशंका है; इससे ग्रह-स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति पर अनिष्ट का वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं निकलता। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 22 {#chaupai-22}
भावार्थ: गिरिजा को लगता है कि शायद शनि को उनका उत्सव अच्छा नहीं लगा। व्याख्या: इस शंका से संवाद में तनाव आता है; पात्र दूसरे के संकोच का कारण नहीं समझ पा रहे। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 23 {#chaupai-23}
भावार्थ: शनि संकोच से पूछते हैं कि यदि वे बालक को देखें तो क्या होगा। व्याख्या: शनि का संकोच आगामी कथा-घटना का संकेत है; इसे किसी वास्तविक दर्शन-निषेध में न बदला जाए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 24 {#chaupai-24}
भावार्थ: उमा ने चेतावनी को स्वीकार नहीं किया और शनि से बालक को देखने को कहा। व्याख्या: कथा में आग्रह और आशंका के टकराव से दुःखद मोड़ आता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 25 {#chaupai-25}
भावार्थ: कविता के अनुसार शनि की तिरछी दृष्टि पड़ते ही शिशु का सिर आकाश में चला गया। व्याख्या: यह विशिष्ट धार्मिक आख्यान का अलौकिक प्रसंग है; सभी परम्पराओं का एकसमान ऐतिहासिक वर्णन नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 26 {#chaupai-26}
भावार्थ: शोक से व्याकुल गिरिजा धरती पर गिर पड़ती हैं; उनके दुःख का वर्णन कठिन बताया गया है। व्याख्या: यह पद माता के दुःख को केंद्र में रखता है; कथा के करुण पक्ष की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 27 {#chaupai-27}
भावार्थ: कैलास में हाहाकार मच जाता है और बालक के अनिष्ट का सम्बन्ध शनि-दृष्टि से जोड़ा जाता है। व्याख्या: कथा में पात्रों की मान्यता कही गई है; वास्तविक लोगों के प्रति ग्रह-आधारित भय या भेदभाव का आधार नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 28 {#chaupai-28}
भावार्थ: विष्णु गरुड़ पर जाकर चक्र से गज-मस्तक लाते हैं। व्याख्या: इस पाठ में विष्णु समाधान लाते हैं; शिव द्वारा सिर काटने वाला प्रसंग दूसरी परम्परा में मिलता है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 29 {#chaupai-29}
भावार्थ: गज-मस्तक बालक के धड़ पर रखकर शंकर प्राण-संचार करते हैं। व्याख्या: यह धार्मिक चमत्कार की कथा है, न शल्य-चिकित्सा की विधि और न अभ्यास करने योग्य मंत्र-निर्देश। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 30 {#chaupai-30}
भावार्थ: शम्भु उनका नाम गणेश रखकर प्रथम पूज्य होने का वर देते हैं। व्याख्या: नाम और वरदान की कथा बताती है कि अनेक पूजाओं के आरम्भ में गणेश की वंदना क्यों की जाती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 31 {#chaupai-31}
भावार्थ: शिव बुद्धि की परीक्षा के लिए पृथ्वी-प्रदक्षिणा का प्रसंग रखते हैं। व्याख्या: यहाँ कथा बल और गति से आगे बढ़कर विवेक की परीक्षा बन जाती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 32 {#chaupai-32}
भावार्थ: षडानन यात्रा पर निकलते हैं और गणेश सोच-समझकर एक अलग उपाय रचते हैं। व्याख्या: दोनों भाइयों के मार्ग अलग हैं; कविता केवल वेग नहीं, चतुर और सार्थक विचार को महत्त्व देती है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 33 {#chaupai-33}
भावार्थ: गणेश माता-पिता के चरणों में जाकर उनकी सात परिक्रमा करते हैं। व्याख्या: माता-पिता को जगत्समान मानने का भाव सम्मान दिखाता है; इसे हर जीवन-परिस्थिति पर थोपना उचित नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 34 {#chaupai-34}
भावार्थ: शिव गणेश की बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होते हैं; देवगण पुष्प-वृष्टि करते हैं। व्याख्या: कथा का सुखद मोड़ बुद्धि और विनय के समन्वय का उत्सव है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 35 {#chaupai-35}
भावार्थ: शेष के सहस्र मुख भी गणेश की महिमा और बुद्धि का पूरा गान नहीं कर सकते। व्याख्या: सहस्र मुखों का उदाहरण श्रद्धा की अतिशयोक्तिपूर्ण काव्यभाषा है, कोई नाप-तौल नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 36 {#chaupai-36}
भावार्थ: कवि अपनी अल्पबुद्धि और दुःख स्वीकार कर विनयपूर्वक पूछता है कि प्रार्थना कैसे करे। व्याख्या: इस ‘मैं’ के साथ गौरवगाथा निजी विनय में बदलती है; इसमें स्वयं की सीमाएँ समझने का भाव है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 37 {#chaupai-37}
भावार्थ: इस पंक्ति में ‘रामसुन्दर’ नाम और प्रयाग, ककरा, दुर्वासा जैसे कठिन-व्याख्येय शब्द आते हैं। व्याख्या: ‘रामसुन्दर’ सम्भावित कवि-छाप है, पर इससे जन्मकाल या लेखक की पहचान सिद्ध नहीं होती; अन्य शब्दों की पाठ-समीक्षा जरूरी है। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1
चौपाई 38 {#chaupai-38}
भावार्थ: दीन भक्त प्रभु से दया, शक्ति और भक्ति की प्रार्थना करता है। व्याख्या: शक्ति का भाव सही कर्म के साहस से भी जुड़ता है; यह अलौकिक क्षमता मिलने की गारंटी नहीं। स्थिर पाठ-संकेत: सम्बन्धित पाठ · 1