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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

आरती

जय गणेश देवा — गणेश जी की आरती

चयनित पाँच-पदी आरती का संपूर्ण देवनागरी पाठ, भावार्थ और पाठभेद-सूचना।

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सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

अर्थ

हे गणेश देव, आपकी जय हो। आपकी माता पार्वती और पिता महादेव शिव हैं।

व्याख्या

बार-बार आया “जय” पद सामूहिक आराधना का उल्लास व्यक्त करता है। “जाकी” लोकभाषा का रूप है, जिसका अर्थ “जिनकी” है; मूल पाठ में इसे आधुनिक हिंदी बनाकर नहीं बदला गया। पार्वती और महादेव का स्मरण गणेश को शिव–शक्ति परिवार से जोड़ता है, पर स्तुति का केंद्र स्वयं गणेश हैं। बहुत-से परिवार इस पंक्ति को हर पद के बाद दोहराते हैं; चयनित पाँच-दोहरे के स्रोत में यह एक ही बार लिखी है।

2

एकदन्त दयावन्त चार भुजाधारी। मस्तक पर सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी॥

अर्थ

गणेश एकदंत, दयालु और चार भुजाओं वाले हैं। उनके मस्तक पर सिंदूर शोभित है तथा मूषक उनका वाहन माना गया है।

व्याख्या

“एकदन्त” गणेश का परिचित नाम है; टूटे हुए दाँत से जुड़ी सभी कथाएँ एक जैसी नहीं हैं। चार भुजाएँ इस पद के विशिष्ट प्रतिमा-स्वरूप का वर्णन करती हैं, न कि यह दावा कि हर प्राचीन मूर्ति चारभुजी है। सिंदूर मंगलमय अलंकरण का संकेत देता है। बड़े गजानन और छोटे मूषक का साथ भक्ति-चिंतन में चंचलता पर विवेक के नियंत्रण का रूपक भी माना जाता है, हालाँकि ऐसा अर्थ इस पद में सीधे लिखा नहीं है। संग्रहालयों के प्रतिमा-विवरण से एकदंत, भोग और विविध भुजाओं की परंपरा की पुष्टि होती है। 4 5

3

अन्धन को आंख देत कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥

अर्थ

भक्त गणेश की ऐसी करुणा का गान करते हैं जो दृष्टिहीन को दृष्टि, रोगी को स्वस्थ काया, संतानहीन को संतान और निर्धन को साधन देने वाली मानी जाती है।

व्याख्या

इस पद में भक्त की तीव्र विनती है, चिकित्सा-विधि या रोगमुक्ति, गर्भधारण अथवा धन-प्राप्ति की प्रमाणित गारंटी नहीं। “कोढ़िन” पुराने प्रयोग का शब्द है जो कुष्ठ-प्रभावित व्यक्तियों के लिए आज असम्मानजनक लग सकता है; इसे केवल स्रोत-पाठ की निष्ठा से रखा गया है। “बांझन” भी संतानहीनता के संदर्भ में पीड़ादायक हो सकने वाला पुराना शब्द है। समकालीन व्याख्या में मनुष्य की गरिमा, करुणा और सहारा प्रधान होने चाहिए। यहाँ “माया” का संदर्भ धन-साधन से है; इसे स्वतः अद्वैत दर्शन की तकनीकी “माया” न मानें।

4

पान चढ़ै फूल चढ़ै और चढ़ै मेवा। लडुअन का भोग लागे सन्त करें सेवा॥

अर्थ

पान, फूल और मेवे अर्पित किए जाते हैं; लड्डुओं का भोग लगाया जाता है और भक्तजन सेवा करते हैं।

व्याख्या

पान, पुष्प, मेवा और लड्डू जैसे सहज पदार्थ आरती को घरेलू तथा सामूहिक पूजा से जोड़ते हैं। गणेश के हाथ में मिठाई-पात्र वाली मूर्तियाँ संग्रहालयों में भी मिलती हैं। 4 यहाँ प्रत्येक व्यक्ति को हर सामग्री अनिवार्य रूप से जुटाने का आदेश नहीं है। “सन्त” और “सेवा” से चढ़ावे की वस्तुओं के साथ भक्त के भाव की महत्ता भी प्रकट होती है। “चढ़ै” और “लागे” जैसे लोकभाषिक रूप उसी स्रोत से रखे गए हैं; आधुनिक हिंदी में बदलने पर मूल गीत बदल जाएगा।

5
विषय-सूची पर लौटें

दीनन की लाज राखो शम्भु-सुत वारी। कामना को पूरी करो जग बलिहारी॥

अर्थ

हे शम्भु-पुत्र, दीन-दुखियों की लाज रखें। भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करता है और प्रेमपूर्वक स्वयं को समर्पित बताता है।

व्याख्या

अंतिम पद में रूप-वर्णन से सीधे प्रार्थना की ओर गति होती है। “लाज राखो” का भाव पीड़ित व्यक्ति के सम्मान और संरक्षण से भी जुड़ता है; इसे केवल धन की माँग तक सीमित नहीं करना चाहिए। “शम्भु-सुत” कहकर आरंभ का शिव-पार्वती संदर्भ लौट आता है। “बलिहारी” प्रेमपूर्ण समर्पण की भाषा है, किसी हानिकारक बलि का निर्देश नहीं। यह पंक्ति कामना व्यक्त करती है, परिणाम की सुनिश्चित घोषणा नहीं। स्रोत में “वारी” और “जग बलिहारी” हैं; अन्य पाठों में भिन्न शब्द मिलते हैं। 1 2

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित साक्ष्य: गुजराती विकिस्रोत, “ગણેશ આરતી”, संशोधन 204056; उसका पूरा पाँच-पदी पाठ। लिप्यंतरण प्रस्तुत है, अन्य लंबे पाठों के पद इसमें मिलाए नहीं गए हैं। 1

इस आरती का विषय क्या है?

“जय गणेश देवा” भगवान गणेश की हिंदी लोकभाषा में गाई जाने वाली आरती है। इसमें माता पार्वती और पिता महादेव का आत्मीय स्मरण, गणेश के स्वरूप का वर्णन, भक्तों द्वारा चढ़ाया जाने वाला भोग तथा दीन-दुखियों के लिए प्रार्थना एक साथ आती है। यह संस्कृत का वैदिक मंत्र नहीं है और इसे मराठी आरती “सुखकर्ता दुःखहर्ता” का दूसरा नाम भी नहीं मानना चाहिए। 1 2

ऊपर का पाँच-पदी पाठ गुजराती विकिस्रोत की “ગણેશ આરતી” शीर्षक वाली स्थिर 2023 संशोधन-प्रति पर आधारित है। वहाँ लिपि गुजराती है, लेकिन भाषा हिंदी की लोकभाषिक शैली की है—जैसे “जाकी”, “मूसे की सवारी”, “दीनन”। यहाँ देवनागरी प्रस्तुति उस स्रोत का लिप्यंतरण है; यह दावा नहीं कि मूल वेबपृष्ठ देवनागरी में था। अंग्रेज़ी पृष्ठ पर इन्हीं शब्दों को रोमन अक्षरों में लिखा गया है, अंग्रेज़ी भावानुवाद बनाकर नहीं। 1

मुखड़ा और गायन-परंपरा

पहला पद आरती का जयघोष है। कई गायन-परंपराएँ इसे अन्य पदों के बाद दोहराती हैं; कहीं दो बार भी गाया जाता है। किंतु गायन में पुनरावृत्ति और चयनित लिखित साक्ष्य के विशिष्ट पदों की संख्या को अलग रखना आवश्यक है। इस साक्ष्य में पाँच लगातार दो-पंक्ति पद लिखे हैं। नीचे उनके स्थिर क्रमांक दिए गए हैं। 1 2

आरती के प्रमुख भाव

शिव–शक्ति परिवार और गणेश की स्वतंत्र आराधना

पहले पद में पार्वती और महादेव के नाम से गणेश के पारिवारिक संबंध स्पष्ट किए गए हैं। यह संदर्भ शिव–शक्ति साधना से आत्मीय संबंध बनाता है, लेकिन पूरी आरती में स्तुति के केंद्र स्वयं गणेश हैं। अलग-अलग पुराणों और स्थानीय कथाओं में उनके जन्म और गजानन-स्वरूप की व्याख्याएँ भिन्न हो सकती हैं; आरती उन कथाओं में से किसी एक को विस्तार से नहीं सुनाती। 4 5

एकदंत, चार भुजाएँ और मूषक

विशाल गजानन और छोटे-से मूषक का साथ इस आरती की अत्यंत याद रहने वाली छवि है। एकदंत और चार भुजाएँ इस पद में बताई गई पहचानें हैं; सभी ऐतिहासिक प्रतिमाएँ एक-सी नहीं बनीं। संग्रहालयों में गणेश की ऐसी प्रतिमाएँ मिलती हैं जिनमें एक दंत, मिठाई, अंकुश या अन्य आयुध दिखाई देते हैं। इससे प्रतीक-विकास समझने में सहायता मिलती है, पर आरती के रचनाकाल का प्रमाण नहीं मिलता। 4 5

चढ़ावे में प्रेम का भाव

पान, फूल, मेवे और लड्डू लोक-जीवन के सहज अर्पण हैं। इस आरती में कहीं नहीं कहा गया कि महँगी सामग्री चढ़ाने वाला भक्त अधिक कृपा का अधिकारी है। भोजन-भोग के साथ “सेवा” का स्मरण भक्त के मनोभाव की ओर ले जाता है। अंतिम पद में चढ़ावों की सूची से ध्यान हटकर दूसरों की पीड़ा और करुणा की प्रार्थना पर आता है।

पुरानी भाषा, आज की संवेदनशीलता

तीसरे पद में बीमारी, दृष्टिहीनता, संतानहीनता और दरिद्रता के संदर्भ में पुराने लोकशब्द आते हैं। स्रोत को बदले बिना प्रस्तुत करने के कारण उन्हें रखा गया है, लेकिन वर्तमान बोलचाल में किसी व्यक्ति को कलंकित करने के लिए उनका उपयोग उचित नहीं है। आरती आशा और कृपा की विनती व्यक्त करती है—चिकित्सकीय उपचार, संतान या धन की सुनिश्चित प्राप्ति का प्रमाण नहीं। समुचित इलाज, सहायता और हर व्यक्ति का सम्मान ज़रूरी है।

भाषा और पाठभेद

  • “जाकी”, “दीनन”, “चढ़ै”, “लडुअन” और “सोहे” लोकभाषिक रूप हैं। मूल गेय शब्दों को संस्कृत या मानक आधुनिक हिंदी से बिना सूचना बदला नहीं गया है।
  • किसी अन्य प्रचलित पाठ में “माथे पर तिलक सोहे” मिलता है, जबकि यहाँ “मस्तक पर सिन्दूर सोहे” है। दोनों को मिलाकर नया पद नहीं बनाया गया। 2
  • “पान”, “फूल”, “मेवा” के स्थान पर कहीं “हार” या “फल” मिलते हैं। ये पाठांतर हैं, अनिवार्य अतिरिक्त पद नहीं। 2
  • कुछ पाठों में “सूर श्याम शरण आए” पंक्ति है, जो इस पाँच-पदी स्रोत में नहीं है। केवल उस पंक्ति के आधार पर ऐतिहासिक सूरदास को आरती का निश्चित रचयिता कहना अनुचित होगा। 2 3
  • अंतिम पद के “शम्भु-सुत वारी / जग बलिहारी” के स्थान पर दूसरे पाठों में “शम्भु सुतकारी”, “जाऊँ बलिहारी” या “मनोरथ” जैसे शब्द मिलते हैं। यहाँ चयनित साक्ष्य का रूप ज्यों का त्यों रखा गया है। 1 2

रचना, काल और रचयिता के बारे में क्या निश्चित है? यह हिंदी क्षेत्र की गेय भक्ति-आरती है; इसे किसी निश्चित प्राचीन उपनिषद् के मंत्र के रूप में प्रस्तुत करना अनुचित है। चयनित विकिस्रोत प्रविष्टि रचयिता “अज्ञात” कहती है। अन्य वेबसाइटों में कुछ नामों या कवि-छापों का संकेत मिलता है, लेकिन बिना पहचाने गए प्रारंभिक संस्करण, दिनांकित हस्तलिपि या स्वतंत्र विद्वत्-परीक्षण के रचनाकाल और लेखक का दावा नहीं किया जा सकता। किसी पंक्ति का लोकप्रिय होना उसके मूल-रचनाकार का प्रमाण नहीं है। 1 2

इस संस्करण में एक निर्दिष्ट पाँच-पदी स्रोत का पूरा पाठ है, पर अभी स्रोत-पीडीएफ के पृष्ठ से स्वतंत्र मिलान तथा प्रतिनिधि मुद्रित संग्रहों से पाठालोचन शेष है।

आरती का धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भ

आरती का सामान्य आशय दीप और गान के माध्यम से देवता के प्रति सम्मान व्यक्त करना है। यह पाठ गृह-भक्ति या सामूहिक आराधना में गाया जा सकता है, पर यहाँ कोई अनिवार्य संख्या, मुहूर्त, सामग्री-सूची या विशेषज्ञ दीक्षा-विधि निर्धारित नहीं की गई है। मंदिर और परिवार की परंपरा का अपना महत्त्व है। पूजा-अभ्यास का वर्गीकरण मानव समीक्षा के बाद ही अंतिम होगा।

सामान्य प्रश्न

क्या यह जय गणेश देवा की पूरी आरती है? हाँ। यह चयनित गुजराती विकिस्रोत पाठ के पूरे पाँच दो-पंक्ति पद हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर गाया या मुद्रित संस्करण पाँच पद का ही है। कुछ परंपराओं में मुखड़ा दोहराया जाता है या अतिरिक्त पंक्तियाँ होती हैं।

अंग्रेज़ी पृष्ठ पर हिंदी शब्द क्यों हैं? पहले भाग में उसी मूल हिंदी पदावली को रोमन अक्षरों में लिखा गया है; वह अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं है। हर पद का अंग्रेज़ी अर्थ उसके बाद है।

इस आरती के रचयिता कौन हैं? चयनित साक्ष्य में रचयिता “अज्ञात” हैं। कुछ दूसरे पाठों में “सूर श्याम” आता है, किंतु मात्र उस पंक्ति से सूरदास की रचना सिद्ध नहीं होती।

क्या यह संस्कृत मंत्र है? नहीं। यह संस्कृत-मूल नामों वाली हिंदी/उत्तर भारतीय लोकभाषिक आरती है, वैदिक सूक्त नहीं।

क्या हर पद के बाद मुखड़ा दोहराना चाहिए? अनेक गायन-परंपराओं में ऐसा होता है। चयनित विकिस्रोत पाठ में मुखड़ा एक बार मुद्रित है; उसकी पुनरावृत्ति गायन-शैली का विकल्प है, इस संस्करण का अतिरिक्त लिखित पद नहीं।

क्या तीसरा पद रोगमुक्ति या संतान की गारंटी देता है? यह करुणा और आशा की भक्तिपरक अभिव्यक्ति है; चिकित्सा-प्रभाव या निश्चित परिणाम का प्रमाण नहीं। स्वास्थ्य-सेवा और मानवीय सहयोग का महत्त्व बना रहता है।

यह सुखकर्ता दुःखहर्ता से कैसे अलग है? दोनों गणेश-स्तुति हैं, लेकिन सुखकर्ता दुःखहर्ता अलग मराठी आरती है। उसे इस हिंदी आरती का अतिरिक्त पद नहीं मानना चाहिए।

यह आरती कब गाई जाती है? यह गृह-पूजा, सामूहिक गणेश-आराधना तथा गणेश चतुर्थी जैसे अवसरों पर गाई जाती है। इन पदों से किसी एक निश्चित समय या सार्वभौमिक विधि का निर्धारण नहीं होता।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Unknown lyric author; Gujarati Wikisource contributors (transcription). Based on ગણેશ આરતી (Ganesh Aarti), permanent revision 204056. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    Jai Ganesh Jai Ganesh Jai Ganesh Deva. Mata Jaki Parvati Pita Mahadeva.

  2. 2

    Ekadant Dayavant Chaar Bhujadhaari. Mastak Par Sindoor Sohe Moose Ki Savaari.

  3. 3

    Andhan Ko Aankh Det Kodhin Ko Kaaya. Baanjhan Ko Putra Det Nirdhan Ko Maaya.

  4. 4

    Paan Chadhai Phool Chadhai Aur Chadhai Meva. Laduan Ka Bhog Laage Sant Karen Seva.

  5. 5

    Deenan Ki Laaj Raakho Shambhu-Sut Vaari. Kaamna Ko Poori Karo Jag Balihaari.

स्रोत और पुनःप्रयोग की सूचना

मूल पाठ गुजराती विकिस्रोत के स्थिर संस्करण 1 से लिया गया है, जिस पर CC BY-SA 4.0 लाइसेंस का उल्लेख है। देवनागरी तथा रोमन प्रस्तुतियाँ लिप्यंतरण रूपांतरण हैं। स्रोत का श्रेय, लिंक, किए गए रूपांतरण और लाइसेंस स्रोत-सूची में दर्ज हैं। वेबसाइट पर पुनःप्रकाशन से पहले श्रेय, ShareAlike तथा लाइसेंस-संगति की अलग कानूनी-संपादकीय जाँच आवश्यक है। 2 और 3 केवल पाठभेद के संदर्भ हैं; उनसे आधुनिक व्याख्या या स्वतंत्र प्रकाशित रूपांतर नहीं उठाए गए हैं। 4 और 5 मूर्तिशास्त्रीय संदर्भ देते हैं, आरती की तिथि नहीं बताते। 6 लाइसेंस-शर्तों का विवरण है।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

पद 1

सरल अर्थ: हे गणेश देव, आपकी जय हो। आपकी माता पार्वती और पिता महादेव शिव हैं। व्याख्या: बार-बार आया “जय” पद सामूहिक आराधना का उल्लास व्यक्त करता है। “जाकी” लोकभाषा का रूप है, जिसका अर्थ “जिनकी” है; मूल पाठ में इसे आधुनिक हिंदी बनाकर नहीं बदला गया। पार्वती और महादेव का स्मरण गणेश को शिव–शक्ति परिवार से जोड़ता है, पर स्तुति का केंद्र स्वयं गणेश हैं। बहुत-से परिवार इस पंक्ति को हर पद के बाद दोहराते हैं; चयनित पाँच-दोहरे के स्रोत में यह एक ही बार लिखी है।

पद 2

सरल अर्थ: गणेश एकदंत, दयालु और चार भुजाओं वाले हैं। उनके मस्तक पर सिंदूर शोभित है तथा मूषक उनका वाहन माना गया है। व्याख्या: “एकदन्त” गणेश का परिचित नाम है; टूटे हुए दाँत से जुड़ी सभी कथाएँ एक जैसी नहीं हैं। चार भुजाएँ इस पद के विशिष्ट प्रतिमा-स्वरूप का वर्णन करती हैं, न कि यह दावा कि हर प्राचीन मूर्ति चारभुजी है। सिंदूर मंगलमय अलंकरण का संकेत देता है। बड़े गजानन और छोटे मूषक का साथ भक्ति-चिंतन में चंचलता पर विवेक के नियंत्रण का रूपक भी माना जाता है, हालाँकि ऐसा अर्थ इस पद में सीधे लिखा नहीं है। संग्रहालयों के प्रतिमा-विवरण से एकदंत, भोग और विविध भुजाओं की परंपरा की पुष्टि होती है। 4 5

पद 3

सरल अर्थ: भक्त गणेश की ऐसी करुणा का गान करते हैं जो दृष्टिहीन को दृष्टि, रोगी को स्वस्थ काया, संतानहीन को संतान और निर्धन को साधन देने वाली मानी जाती है। व्याख्या: इस पद में भक्त की तीव्र विनती है, चिकित्सा-विधि या रोगमुक्ति, गर्भधारण अथवा धन-प्राप्ति की प्रमाणित गारंटी नहीं। “कोढ़िन” पुराने प्रयोग का शब्द है जो कुष्ठ-प्रभावित व्यक्तियों के लिए आज असम्मानजनक लग सकता है; इसे केवल स्रोत-पाठ की निष्ठा से रखा गया है। “बांझन” भी संतानहीनता के संदर्भ में पीड़ादायक हो सकने वाला पुराना शब्द है। समकालीन व्याख्या में मनुष्य की गरिमा, करुणा और सहारा प्रधान होने चाहिए। यहाँ “माया” का संदर्भ धन-साधन से है; इसे स्वतः अद्वैत दर्शन की तकनीकी “माया” न मानें।

पद 4

सरल अर्थ: पान, फूल और मेवे अर्पित किए जाते हैं; लड्डुओं का भोग लगाया जाता है और भक्तजन सेवा करते हैं। व्याख्या: पान, पुष्प, मेवा और लड्डू जैसे सहज पदार्थ आरती को घरेलू तथा सामूहिक पूजा से जोड़ते हैं। गणेश के हाथ में मिठाई-पात्र वाली मूर्तियाँ संग्रहालयों में भी मिलती हैं। 4 यहाँ प्रत्येक व्यक्ति को हर सामग्री अनिवार्य रूप से जुटाने का आदेश नहीं है। “सन्त” और “सेवा” से चढ़ावे की वस्तुओं के साथ भक्त के भाव की महत्ता भी प्रकट होती है। “चढ़ै” और “लागे” जैसे लोकभाषिक रूप उसी स्रोत से रखे गए हैं; आधुनिक हिंदी में बदलने पर मूल गीत बदल जाएगा।

पद 5

सरल अर्थ: हे शम्भु-पुत्र, दीन-दुखियों की लाज रखें। भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना करता है और प्रेमपूर्वक स्वयं को समर्पित बताता है। व्याख्या: अंतिम पद में रूप-वर्णन से सीधे प्रार्थना की ओर गति होती है। “लाज राखो” का भाव पीड़ित व्यक्ति के सम्मान और संरक्षण से भी जुड़ता है; इसे केवल धन की माँग तक सीमित नहीं करना चाहिए। “शम्भु-सुत” कहकर आरंभ का शिव-पार्वती संदर्भ लौट आता है। “बलिहारी” प्रेमपूर्ण समर्पण की भाषा है, किसी हानिकारक बलि का निर्देश नहीं। यह पंक्ति कामना व्यक्त करती है, परिणाम की सुनिश्चित घोषणा नहीं। स्रोत में “वारी” और “जग बलिहारी” हैं; अन्य पाठों में भिन्न शब्द मिलते हैं। 1 2

  1. ગણેશ આરતી (Ganesh Aarti), permanent revision 204056 · स्रोत खोलें
  2. भगवान गणेश आरती — जय गणेश देवा · स्रोत खोलें
  3. Jai Ganesh Deva Aarti — variant and printed-witness research overview · स्रोत खोलें
  4. Seated Ganesha, Odisha, 17th century, object 64.102 · स्रोत खोलें
  5. Ganesha, Tamil Nadu, Chola period, 12th century, object 2015.500.4.12 · स्रोत खोलें
  6. Creative Commons Attribution-ShareAlike 4.0 International — Deed · स्रोत खोलें