संस्करण-सूचना: ऋग्वेद-खिल २.६.१–१५ की १५ ऋचाओं का १९०६-आधारित शैक्षिक पाठ। वैदिक स्वर-चिह्न नहीं गढ़े गए हैं; मूल छपा पृष्ठ और पुनःप्रयोग-अधिकार की जाँच शेष है। 1 2
पाठ को समझें
श्रीसूक्तम् देवी श्री अथवा लक्ष्मी के स्वागत की वैदिक स्तुति है। जातवेदस् (अग्नि) से देवी को लाने की प्रार्थना करते हुए इसमें केवल स्वर्ण नहीं, गौ, अन्न, सत्य-वाणी, समाज में प्रतिष्ठा, उपजाऊ जल और घर में स्थायी मंगल की कामना भी है। इसके बिम्ब सूर्य, चन्द्र तथा कमल के बीच चलते हैं। यहाँ ऋग्वेद-खिल २.६.१–१५ की पन्द्रह ऋचाओं का १९०६ के शेफ़्टेलोविट्स संस्करण पर आधारित शोध-पाठ चुना गया है। यह ऋग्वेद की सामान्य दस-मण्डली संहिता का स्वतन्त्र क्रमांकित सूक्त नहीं, खिल या परिशिष्ट परम्परा का अंश है। 1 2 5
क्या सम्मिलित है, क्या नहीं। चुना हुआ मूल पाठ ठीक पन्द्रह ऋचाओं का है। शोध-पाठ में १५वीं ऋचा के आगे भी अन्य सामग्री है; बहुत-से प्रचलित पाठ ‘यः शुचिः प्रयतो भूत्वा’ को सोलहवीं ऋचा के रूप में जोड़कर और भी श्लोक देते हैं। यहाँ उसे बिना सूचना मूल पन्द्रह-ऋचा क्रम में नहीं मिलाया गया है। यह संस्करण-सीमा है, अन्य परम्पराओं का खण्डन नहीं। 2 4
पढ़ने की रीति: ऊपर मूल संस्कृत देवनागरी में है; नीचे प्रत्येक ऋचा का नया हिन्दी भावार्थ और व्याख्या है। चयनित साक्ष्य में वैदिक स्वर-चिह्न नहीं हैं; इसलिए यह पृष्ठ वैदिक उच्चारण-प्रशिक्षण, होम-विधि, मुहूर्त, दीक्षा या सिद्धि की विधि नहीं देता। 2 6
ऋचा 1 — ज्योति और आवाहन
भावार्थ। हे जातवेदस् अग्निदेव, स्वर्णिम आभा और हरिणी-जैसी कोमल छवि वाली, सोने-चाँदी की माला से सुशोभित तथा चन्द्रमा-सी दीप्त लक्ष्मी को मेरे पास लाएँ। व्याख्या। आरम्भिक निवेदन लक्ष्मी से सीधे नहीं, जातवेदस् अर्थात् अग्नि से है। स्वर्ण और चन्द्र-प्रकाश समृद्धि के साथ पवित्र उजास तथा मंगल के बिम्ब हैं। इसलिए यह सूक्त केवल धन माँगने का सूत्र नहीं, देवी के स्वागत का काव्य भी है। चयनित पाठ में मम आवह का सन्धियुक्त रूप ममावह दिया है; कहीं म आवह भी मिलता है।
ऋचा 2 — स्थायी समृद्धि
भावार्थ। हे जातवेदस्, ऐसी अविचल लक्ष्मी को लाएँ जिनकी उपस्थिति में मुझे स्वर्ण, गौ, अश्व और पाठ में वर्णित जन-सहयोग प्राप्त हो। व्याख्या। अनपगामिनी का अर्थ है—जो छोड़कर न जाए। प्रार्थना क्षणिक लाभ से अधिक टिकाऊ समृद्धि की है। गौ और अश्व पुराने सामाजिक जीवन में पशुधन, आजीविका और सामर्थ्य के संकेत हैं। ‘पुरुषान्’ को उसी ऐतिहासिक सन्दर्भ में पढ़ना चाहिए; इससे मनुष्यों पर स्वामित्व का आधुनिक नैतिक समर्थन नहीं निकलता।
ऋचा 3 — ऐश्वर्य की शोभा
भावार्थ। मैं अश्वों से अग्रसर, रथ के मध्य प्रतिष्ठित और हाथियों की ध्वनि से प्रमुदित देवी श्री को पुकारता हूँ। वे मुझ पर अनुग्रह करें। व्याख्या। यहाँ समृद्धि राजकीय शोभायात्रा की छवि में सामने आती है। अश्व, रथ और गज उस युग की गति, प्रतिष्ठा तथा ऐश्वर्य के संकेत हैं। इन्हें पूजा में अनिवार्य सामग्री की सूची नहीं समझना चाहिए। अंतिम पद देवी के अनुग्रह का सहज निवेदन है।
ऋचा 4 — तृप्ति और तर्पण
भावार्थ। मैं यहाँ स्वर्णावरण से युक्त, आर्द्र, तेजस्विनी, स्वयं तृप्त होकर दूसरों को तृप्त करने वाली, कमल पर स्थित तथा कमलवर्णा श्री का आह्वान करता हूँ। आरम्भिक शब्द इस संस्करण का कठिन पाठ है। व्याख्या। तृप्तां तर्पयन्तीम् में संतोष और दूसरों का पोषण एक-दूसरे से जुड़े हैं। इस पद के जल, कमल और सुवर्ण-बिम्ब परस्पर सहायक हैं। १९०६-आधारित पाठ में कांस्यस्मि और हिरण्यप्रवाराम् जैसे कठिन शब्द हैं, जबकि अन्य पाठों में कां सोस्मिताम्, हिरण्यप्राकाराम् मिलते हैं। पद्मे स्थिताम् का पृथक्करण सम्पादकीय है; मूल छापे से पुनः मिलान शेष है।
ऋचा 5 — शरण और अलक्ष्मी
भावार्थ। मैं चन्द्र-सी प्रकाशमयी, यशस्विनी, देवताओं को प्रिय और उदार श्री की शरण ग्रहण करता हूँ। मैं उनका आश्रय चुनता हूँ और अलक्ष्मी—विपन्नता—के दूर होने की प्रार्थना करता हूँ। यहाँ तं पद्मनेमिं कठिन पाठ है। व्याख्या। अलक्ष्मीर्मे नश्यताम् अभाव और अमंगल के मिटने की कामना है, निर्धन व्यक्तियों का तिरस्कार नहीं। पाठ की दृष्टि से तं पद्मनेमिं व्याकरण और अर्थ में कठिन है; दूसरी परम्पराओं में तां पद्मिनीम् अथवा तां पद्मनेमीम् मिलता है। यहाँ चयनित साक्ष्य को चुपचाप बदला नहीं गया है।
ऋचा 6 — बिल्व और तप
भावार्थ। हे सूर्य-सी दीप्त देवी, आपका बिल्व-वृक्ष तप से उत्पन्न कहा गया है। उसके फल और तप की शक्ति बाधाओं तथा बाहरी विपन्नता को दूर करें—यही प्रार्थना है। व्याख्या। इस ऋचा में बिल्व-वृक्ष का स्पष्ट उल्लेख है; इसलिए इसका सम्बन्ध यहाँ श्री से भी जुड़ता है, भले अन्य परम्पराओं में बिल्व शिवोपासना का प्रमुख प्रतीक हो। फल, तप और विघ्न-निवारण के चित्र को जीवन के परिश्रम से भी समझ सकते हैं। इससे अपने-आप कोई निश्चित अर्पण-विधि सिद्ध नहीं होती। मायान्तरायाः सम्बन्धी पदसमूह की पुनः जाँच अपेक्षित है।
ऋचा 7 — समाज में प्रतिष्ठा
भावार्थ। देव-सखा, कीर्ति और मणि सहित मेरे निकट आएँ। इस राष्ट्र या समाज में रहने वाले मुझे सम्मानित प्रतिष्ठा और विकास प्राप्त हो। व्याख्या। प्रार्थना घर की समृद्धि से बढ़कर समाज में सम्मान तक पहुँचती है। यहाँ राष्ट्र प्राचीन समुदाय या राज्य-व्यवस्था का शब्द है; उसका अर्थ सीधे आधुनिक राष्ट्र-राज्य जैसा मानना ठीक नहीं। कीर्ति को केवल प्रसिद्धि नहीं, सदाचरण से बनी प्रतिष्ठा के रूप में भी समझा जा सकता है।
ऋचा 8 — भूख और अभाव
भावार्थ। मैं भूख-प्यास और अभाव से सम्बद्ध ‘ज्येष्ठा अलक्ष्मी’ को दूर करने की प्रार्थना करता हूँ। हे देवी, मेरे घर से विपन्नता, असमृद्धि और बाधाएँ हटाएँ। व्याख्या। क्षुत् और पिपासा भूख तथा प्यास हैं, जिनसे अभाव की पीड़ा का रूपक बनता है। अलक्ष्मी का विरोध गरीब व्यक्ति का विरोध नहीं है; सामाजिक पीड़ा को मिटाना इस विनती की मानवीय दिशा है। चयनित पाठ का सर्वान् समीपवर्ती स्त्रीलिंग शब्दों से व्याकरण में पूरी तरह नहीं बैठता; इसे सुधारकर छिपाया नहीं गया है।
ऋचा 9 — उर्वरता और पोषण
भावार्थ। मैं सुगन्ध से जुड़ी, अजेय, नित्य पोषण देने वाली, उपजाऊ जीवन के बिम्ब से सम्बद्ध तथा सभी प्राणियों की अधिष्ठात्री श्री का आह्वान करता हूँ। व्याख्या। यह पद केवल अलंकारिक नहीं, धरती और जीविका से भी जुड़ा है। करीषिणी का अर्थ कठिन है; इसे खेती, उर्वरता या पशुधन-सम्बद्ध समृद्धि से जोड़ा गया है, पर एक अर्थ को अंतिम मानना उचित नहीं। नित्यपुष्टा के कारण भोजन-पोषण की धारा फिर सामने आती है।
ऋचा 10 — सत्यवाणी तथा अन्न
भावार्थ। हम मन की उचित अभिलाषा और वाणी की सत्यता प्राप्त करें; पशुधन, अन्न, श्री तथा यश मेरे जीवन में टिकें—यह कामना है। व्याख्या। यहाँ वाणी का सत्य समृद्धि के साथ स्पष्ट रूप से जोड़ा गया है। मन की अभिलाषा, भोजन, पशुधन और यश को एक ही प्रार्थना में रखने से पता चलता है कि जीवन की भलाई केवल मुद्रा का नाम नहीं। सत्य और निर्वाह के बिना ‘श्री’ की समझ अधूरी रह जाती है।
ऋचा 11 — कर्दम और कुल
भावार्थ। कर्दम से सन्तान या सृजन का सम्बन्ध कहा गया है। हे कर्दम, मेरे भीतर प्रकट हो और कमलमाला धारण करने वाली माता श्री को मेरे कुल में प्रतिष्ठित करो। व्याख्या। कर्दम का सामान्य अर्थ गीली, उपजाऊ मिट्टी से जुड़ता है; सूक्त में यह सम्बोधन के रूप में भी आता है। इसे बिना प्रमाण किसी विस्तृत पौराणिक जीवनी में बदलना उचित नहीं। यहाँ समृद्धि व्यक्ति से आगे कुल और घर के सतत पोषण तक पहुँचती है।
ऋचा 12 — चिक्लीता और जल
भावार्थ। स्नेह और पोषण देने वाला जल प्रवाहित हो; हे चिक्लीता, मेरे घर में निवास करो और देवी माता श्री को भी यहाँ स्थिर करो। व्याख्या। जल का बिम्ब घर को पोषित और जीवंत बनाता है। श्री यहाँ बहते हुए जल की तरह जीवन को सींचने वाली उपस्थिति है। चिक्लीता नाम की व्याख्या सभी परम्पराओं में समान नहीं; इसे बिना साक्ष्य कोई एक कथा मानकर न लिखें। वैदिक व्याकरण और सम्बोधन की सूक्ष्म जाँच अभी अपेक्षित है।
ऋचा 13 — सूर्य तथा परिपक्वता
भावार्थ। हे जातवेदस्, परिपक्वता से युक्त, कमल-सरोवर के बिम्ब वाली, पुष्ट, पिङ्गलवर्णा, कमलमाला धारण करने वाली सूर्यप्रभा लक्ष्मी को लाएँ। व्याख्या। चयनित पाठ का पक्वाम् (‘पकी या परिपक्व’) महत्त्वपूर्ण है। अनेक पाठों में यहाँ आर्द्राम् मिलता है, पर दोनों को बिना सूचना अदल-बदल नहीं सकते। इस साक्ष्य में ऋचा १३ सूर्य और ऋचा १४ चन्द्र से जुड़ी है; अन्य परम्पराओं में क्रम और विशेषण उलटते हैं।
ऋचा 14 — चन्द्र और सुवर्ण
भावार्थ। हे जातवेदस्, आर्द्र, कमल-सरोवर से सम्बद्ध, यष्टि की उपमा वाली, सुवर्णमयी, हेममालाधारिणी और चन्द्रमयी लक्ष्मी को लाएँ। व्याख्या। आर्द्रा, पुष्करिणी, यष्टी जैसे पदों की अर्थ-छाया समृद्ध है, पर हर शब्द का अर्थ निर्विवाद नहीं। यष्टी डंडी या छड़ी का अर्थ देती है; उससे कोई निश्चित गूढ़ उपासना-विधि निकालना अनुचित होगा। पूर्ववर्ती सूर्य-बिम्ब के बाद यहाँ चन्द्र की शीतल आभा आती है। अन्य पाठों का करिणीम् या बदला हुआ क्रम अलग दर्ज है।
ऋचा 15 — स्थायी श्री की पुनःप्रार्थना
भावार्थ। हे जातवेदस्, कभी न जाने वाली लक्ष्मी को लाएँ, जिनकी उपस्थिति में स्वर्ण प्रचुर हो और पाठ में वर्णित गौ तथा तत्कालीन गृहस्थ-सामाजिक संसाधन उपलब्ध हों। व्याख्या। अन्तिम ऋचा आरम्भ की स्थायी लक्ष्मी की इच्छा को फिर दोहराकर पाठ को पूर्णता देती है। दास्यो जैसा शब्द अपने ऐतिहासिक सामाजिक सन्दर्भ और असमान शक्ति-सम्बन्धों सहित समझना चाहिए; इसे छिपाना या दासत्व को उचित ठहराना दोनों गलत हैं। प्रचलित पाठों में अश्वान् सहित भिन्न सूची मिलती है; वह यहाँ नहीं जोड़ी गई है। व्याकरणिक जाँच भी अभी शेष है।
पाठ की तीन धाराएँ
पन्द्रह ऋचाओं को तीन पाठ-खंडों में देखना सहायक है। ऋचा १–५ में ज्योति, स्वागत, ऐश्वर्य और शरण का स्वर है। ऋचा ६–१० बिल्व, कीर्ति, भूख-अभाव, उर्वरता, सत्यवाणी और अन्न को जोड़ती हैं। ऋचा ११–१५ में घर, जल, पीढ़ियाँ तथा बनी रहने वाली श्री की प्रार्थना है। यह साहित्यिक समझ है, बाद में जुड़े हर श्लोक को उसी मूल लेखक का सिद्ध करने का प्रमाण नहीं। 2
मुख्य शब्द
श्री मंगल, शोभा और समृद्धि की अवधारणा तथा देवी का नाम है; लक्ष्मी पाठ में देवी का नाम है। जातवेदस् अग्नि का सम्बोधन है। अलक्ष्मी अभाव या अमंगल की प्रतिमा है, न कि निर्धन मनुष्य। बिल्व एक स्पष्ट रूप से नामित वृक्ष है; इससे स्वयं कोई विशेष हवन या पूजा-विधि निर्धारित नहीं होती। कर्दम और चिक्लीता की व्याख्या पर अतिरिक्त पाठ-जाँच आवश्यक है। 2
वैदिक स्वर और पुनर्प्रकाशन-अधिकार
वैदिक उच्चारण के स्वर-चिह्न इस चयनित डिजिटल साक्ष्य में नहीं हैं। उन्हें अनुमान से जोड़ना उचित नहीं। वैदिक पाठ की पद्धति परम्परा-विशेष में विशेषज्ञ से ही समझी जानी चाहिए। GRETIL/TextGrid के आधुनिक डिजिटल संस्करण पर गैर-व्यावसायिक, समान-शर्त वाला लाइसेंस दर्ज है। प्राचीन मूल शब्द और आधुनिक डिजिटल प्रतिलिपि के अधिकार अलग हैं; इस प्रारूप को वेबसाइट के लिए अभी कानूनी स्वीकृति प्राप्त नहीं है। 3 6
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या श्रीसूक्त ऋग्वेद में है? यह ऋग्वेद की खिल/परिशिष्ट परम्परा में है, सामान्य दस-मण्डली मुख्य संहिता का अलग क्रमांकित सूक्त नहीं। 2 5
कहीं १६ या उससे अधिक मन्त्र क्यों हैं? अनेक पाठ-पद्धतियाँ अनुष्ठान-सम्बन्धी पद और बाद की स्तुतियाँ जोड़ती हैं। उनका मूल संस्करण और स्थान अलग पहचानना चाहिए। 2 4
चौथी ऋचा में अपरिचित शब्द क्यों हैं? चुने हुए १९०६-आधारित साक्ष्य का कठिन पाठ छिपाने के बजाय पाठभेद स्पष्ट रखे गए हैं। 2
स्वर-चिह्न क्यों नहीं हैं? यहाँ प्रमाणित स्वर-युक्त पाठ उपलब्ध नहीं कराया गया है; इसलिए अनुमानित वैदिक स्वर नहीं छापे गए। परम्परागत उच्चारण हेतु योग्य अध्यापक से सीखना उचित है। 2 6
क्या पाठ से धन निश्चित मिलता है? यह समृद्धि, गरिमा और पोषण की पारम्परिक प्रार्थना है; किसी आर्थिक फल की वैज्ञानिक या व्यावहारिक गारंटी नहीं।




