संस्करण सूचना: अम्बुद पर उपलब्ध 1910 Śaṅkarācārya Stotras खंड 18 से सम्बद्ध अठारह श्लोकों का चयनित डिजिटल पाठ। दो स्थानों (श्लोक 8 और 16) में अस्थायी संपादकीय संशोधन स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। 1910 के मुद्रित पृष्ठों से प्रत्यक्ष मिलान और अधिकार-जाँच बाकी हैं। यह प्रकाशन हेतु स्वीकृत पाठ नहीं है। 1 2
सम्पूर्ण मूल स्तोत्र — देवनागरी
नीचे संस्कृत का मूल पाठ है, हिन्दी अनुवाद नहीं। पुष्पिका श्लोक 19 नहीं है। श्लोक 1
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् । अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥ १ ॥
श्लोक 2
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि । मालादृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा मे श्रियं दिशतु सागरसंभवायाः ॥ २ ॥
श्लोक 3
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष- मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि । ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्ध- मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ३ ॥
श्लोक 4
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्द- मानन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् । आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगशयाङ्गनायाः ॥ ४ ॥
श्लोक 5
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति । कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ५ ॥
श्लोक 6
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारे- र्धाराधरे स्फुरति यत्तटिदङ्गनेव । मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्ति- र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥ ६ ॥
श्लोक 7
प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावा- न्माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन । मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ७ ॥
श्लोक 8
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा- मस्मिन्नकिंचनविहंगशिशौ विषण्णे । दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ८ ॥
श्लोक 9
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र- दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते । दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ९ ॥
श्लोक 10
गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति शाकंभरीति शशिशेखरवल्लभेति । सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १० ॥
श्लोक 11
श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै । शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११ ॥
श्लोक 12
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै । नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२ ॥
श्लोक 13
संपत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि । त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥ १३ ॥
श्लोक 14
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसंपदः । संतनोति वचनाङ्गमानसै- स्त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १४ ॥
श्लोक 15
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे । भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १५ ॥
श्लोक 16
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट- स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् । प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष- लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १६ ॥
श्लोक 17
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः । अवलोकय मामकिंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ १७ ॥
श्लोक 18
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् । गुणाधिका गुरुतरभाग्यभाजिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ १८ ॥
समापन पुष्पिका
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ कनकधारास्तोत्रं संपूर्णम् ॥
श्लोकानुसार अर्थ और व्याख्या
नीचे दिये सभी भावार्थ और विवेचन ShivGoraksh के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गये हैं। वे मूल पाठ की जगह नहीं लेते।
समापन पुष्पिका
भावार्थ: मुद्रित समापन-वाक्य में इसे गोविन्दभगवत्पाद के शिष्य शङ्कर के नाम से जोड़ा गया है। यह परम्परागत श्रेय की सूचना देता है, रचना-काल और ऐतिहासिक लेखक का स्वतंत्र प्रमाण नहीं। व्याख्या: यह पुष्पिका है, उन्नीसवाँ मूल स्तोत्र-श्लोक नहीं।
इस स्तोत्र को कैसे समझें
कनकधारा का शाब्दिक आशय ‘सोने की धारा’ है, पर इसकी अधिकांश कविता लक्ष्मी के कटाक्ष—करुणा और स्नेह की दृष्टि—को केन्द्र में रखती है। लक्ष्मी विष्णु के साथ प्रेममय सम्बन्ध में चित्रित हैं। कमल, भ्रमर, मेघ, विद्युत और गजलक्ष्मी के अभिषेक का सौन्दर्य पढ़ने वाले को करुणा, उदारता और संतुलित समृद्धि की कल्पना देता है।
स्वर्ण-आँवला कथा और रचनाकार
लोकप्रिय कथा के अनुसार बाल शङ्कर को एक निर्धन गृहिणी ने केवल आँवला दिया और लक्ष्मी की कृपा से स्वर्ण-आँवलों की वर्षा हुई। यह परम्परागत भक्तिकथा है; इस रूप में उसका ऐतिहासिक सत्यापन नहीं किया गया है। स्तोत्र का श्रेय परम्परा और मुद्रित पुष्पिका में शङ्कराचार्य को दिया जाता है, किन्तु पुष्पिका रचना का स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। 1 3
पाठभेद एवं चयन का कारण
इस संपादकीय प्रारूप में 18 श्लोक और एक अलग पुष्पिका हैं। प्रचलित 21 तथा 25 श्लोकों के पाठों में अतिरिक्त ‘नमोऽस्तु’ पद, ध्यान/प्रार्थना या दूसरी फलश्रुति मिल सकती है। इन्हें यहाँ मूल 18 में मिलाया नहीं गया। श्लोक 8 में शब्द-जोड़ तथा श्लोक 16 में दिघ्वस्तिभिः → दिग्घस्तिभिः अस्थायी सुधार हैं; मूल मुद्रण की जाँच के बाद ही उन्हें स्वीकार किया जा सकेगा। 1 3 4
सामान्य प्रश्न
क्या यह धन मिलने की गारंटी देता है? नहीं। धन-वर्षा और समृद्धि की भाषा धार्मिक आशा और स्तुति की है, किसी वित्तीय परिणाम का प्रमाण नहीं। 18 या 21 श्लोक—कौन-सा सही है? दोनों अलग पाठ-परम्पराओं के क्रम/विस्तार हो सकते हैं। इस संस्करण का नामित संस्करण 18 श्लोकों वाला है; इसे सभी पाठों का अंतिम निर्णय न समझें। क्या पाठ में कोई विशेष दीक्षा चाहिए? यह सार्वजनिक स्तुति है। इस संस्करण में अनिवार्य जप-संख्या, विशेष विधान अथवा अनुष्ठान-सिद्धि का निर्देश नहीं दिया गया है।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
श्लोक 1
भावार्थ: मंगलमयी देवी का कृपापूर्ण कटाक्ष मेरे लिए कल्याणकारी हो। वह श्रीहरि के प्रेम से रोमाञ्चित अंग पर ऐसे ठहरता है, जैसे कलियों से सजे गहरे तमाल-वृक्ष पर भौंरी मंडराती है। उस दृष्टि में समस्त ऐश्वर्य समाया हुआ दिखाया गया है। व्याख्या: पहले श्लोक में धन का वर्णन नहीं, प्रेम और कृपा की दृष्टि का चित्र है। तमाल-वृक्ष से विष्णु के श्याम वर्ण तथा भौंरी से लक्ष्मी की स्नेहभरी दृष्टि का बोध होता है। मंगल का आशय केवल आर्थिक लाभ नहीं, जीवन में शुभता और संतुलन भी है।
श्लोक 2
भावार्थ: समुद्र से प्रकट हुई लक्ष्मी मुझे श्री और समृद्धि प्रदान करें। उनकी आँखें प्रेम और लज्जा से मुरारि के मुख की ओर बार-बार जाती और लौटती हैं, जैसे भौंरी विशाल कमल के चारों ओर घूमती है। व्याख्या: यहाँ लज्जा प्रेम के कोमल भाव को व्यक्त करती है। ‘श्री’ में धन के साथ शोभा, गरिमा और जीवन की सम्पन्नता भी आती है। ‘सागरसम्भवा’ नाम समुद्र-मंथन से जुड़ी प्रचलित कथा की याद दिलाता है।
श्लोक 3
भावार्थ: नील कमल के भीतर जैसे रंगवाली इन्दिरा की आधी-सी दृष्टि भी क्षणभर मुझ पर ठहर जाए। वह दृष्टि इन्द्रपद जैसी महान उपलब्धि देने में समर्थ कही गई है और मुर-विजेता विष्णु को भी अत्यन्त आनन्द देती है। व्याख्या: याचना बहुत छोटी है—क्षणभर की आधी दृष्टि। इसी विनम्रता से श्लोक का भाव गहरा होता है। इन्द्रपद का उदाहरण देवी की महिमा का काव्यात्मक विस्तार है, इसे निश्चित सांसारिक पद या धन मिलने का वादा नहीं समझना चाहिए।
श्लोक 4
भावार्थ: शेषशायी भगवान की सहचरी लक्ष्मी की कोमल, आधी झुकी हुई और तिरछी दृष्टि मेरे कल्याण का कारण बने। वह आनन्द के स्रोत मुकुन्द को प्रेमपूर्वक निहार रही हैं। व्याख्या: पलकों, पुतलियों और तिरछी निगाह के घने समास इस चित्र को सूक्ष्म बनाते हैं। कुछ पदों का सटीक व्याकरणिक विग्रह विशेषज्ञ जाँच माँगता है। ‘भूति’ का अर्थ व्यापक कल्याण और उन्नति के रूप में भी समझना चाहिए।
श्लोक 5
भावार्थ: कमलनिवासिनी लक्ष्मी की कटाक्ष-माला मेरा कल्याण करे। मधु-विजेता विष्णु के कौस्तुभ-मणि से सुशोभित वक्ष पर वह गहरे नीलम की माला-सी चमकती है और भगवान की प्रिय कही गई है। व्याख्या: बार-बार पड़ने वाली दृष्टियों की पंक्ति को हार के रूप में देखा गया है। कौस्तुभ विष्णु के वक्षस्थल से जुड़ा प्रसिद्ध रत्न है। ‘कामप्रदा’ को काव्य की स्तुतिपरक भाषा में समझना चाहिए, हर इच्छा पूरी होने की सुनिश्चित घोषणा की तरह नहीं।
श्लोक 6
भावार्थ: सभी लोकों की माता, भार्गव-नन्दिनी की पूजनीय छवि मुझे मंगल प्रदान करे। कैटभ-वध करने वाले विष्णु के मेघ-श्याम वक्ष पर वे वर्षा-मेघ में चमकती बिजली के समान दिखाई देती हैं। व्याख्या: काले मेघ और विद्युत की उपमा से विष्णु और लक्ष्मी की संयुक्त छवि बनती है। ‘भार्गवनन्दना’ देवी का पारम्परिक विशेषण है। ‘भद्र’ का अर्थ हितकारी और शुभ फल है, केवल सोना या धन नहीं।
श्लोक 7
भावार्थ: समुद्रकन्या लक्ष्मी की वह मन्द, कोमल आधी दृष्टि मुझ पर भी पड़े, जिसकी शक्ति से कामदेव को मधु-विजेता विष्णु के समीप स्थान मिला बताया गया है। व्याख्या: यह प्रेम की शक्ति का रूपक है। ‘मकरालयकन्या’ लक्ष्मी और ‘मधुमाथिन्’ विष्णु के विशेषण हैं। भक्त की प्रार्थना अनुग्रह की है, किसी दूसरे की इच्छा पर अधिकार पाने की नहीं।
श्लोक 8
भावार्थ: नारायण की प्रिया के नेत्ररूपी मेघ करुणा की हवा से चलकर मुझ असहाय, व्याकुल पक्षी-शावक पर समृद्धि की वर्षा करें और दुष्कर्मों के भार को दूर करें। व्याख्या: पक्षी के नन्हे बच्चे का रूपक अभाव और असुरक्षा को सामने लाता है। यहाँ सहायता की याचना के साथ आत्मशुद्धि का भाव भी है। पाठ करने से कर्मों की जिम्मेदारी अपने-आप समाप्त होने का दावा इस श्लोक से नहीं करना चाहिए।
श्लोक 9
भावार्थ: कमलासन-सम्बद्ध देवी की दया से भीगी दृष्टि, खिलते कमल के भीतर जैसी उज्ज्वल, मुझे इच्छित पुष्टि और विकास दे। कहा गया है कि ऐसी कृपा से अल्प-विवेकी भी ऊँची स्थिति पा सकता है। व्याख्या: ‘पुष्टि’ में पोषण, स्वास्थ्यकर विकास और सामर्थ्य का अर्थ है। छोटी क्षमता और महान फल का विरोध देवी की करुणा की महिमा बढ़ाता है। शुरुआती समास का व्याकरण विशेषज्ञ से पुनः जँचवाना है।
श्लोक 10
भावार्थ: वाणी की देवी, गरुड़ध्वज विष्णु की सुन्दरी, शाकम्भरी और चन्द्रशेखर शिव की प्रिया—ऐसे अनेक नामों से पुकारे जाने वाली देवी को नमस्कार, जो सृष्टि, पालन और लय के कार्यों में उपस्थित समझी जाती हैं। व्याख्या: यह श्लोक विभिन्न देवी-रूपों को एक व्यापक शक्ति-दृष्टि से देखता है। इससे यह निष्कर्ष जरूरी नहीं कि सब परम्पराओं की कथाएँ और उपासना-विधियाँ एक जैसी हैं; यहाँ काव्य का उद्देश्य दिव्य स्त्री-तत्त्व की व्यापकता दिखाना है।
श्लोक 11
भावार्थ: शुभ कर्मों के फल की जननी श्रुति-रूपा देवी को नमस्कार; सुन्दर गुणों के सागर रति-रूप को नमस्कार; शतदल कमल में रहने वाली शक्ति को नमस्कार; पुरुषोत्तम की प्रिय पुष्टि-रूपा देवी को नमस्कार। व्याख्या: चार नमस्कार समृद्धि की व्यापक परिभाषा देते हैं—ज्ञान, सद्कर्म, प्रेम, ऊर्जा और पोषण। लक्ष्मी को केवल मुद्रा की देवी बना देना इस श्लोक के भाव को बहुत सीमित कर देगा।
श्लोक 12
भावार्थ: कमल के समान मुखवाली देवी को नमस्कार; क्षीरसागर से प्रकट हुई देवी को नमस्कार; चन्द्र और अमृत से सम्बद्ध देवी को नमस्कार; नारायण की प्रिया को नमस्कार। व्याख्या: चार विशेषण समुद्र-मंथन, सौन्दर्य और विष्णु-लक्ष्मी सम्बन्ध को जोड़ते हैं। ये पारम्परिक पौराणिक प्रतीक हैं; इन्हें आधुनिक भूगोल या विज्ञान का शाब्दिक विवरण समझना आवश्यक नहीं है।
श्लोक 13
भावार्थ: हे कमलनयनी, पूजनीय माता! आपकी वन्दना का भाव दिन-रात मेरे साथ बना रहे। वह समृद्धि, इन्द्रियों को सुख, महान वैभव और दुःख-निवारण देने वाली कही गई है। व्याख्या: यहाँ मुख्य बात निरन्तर स्मरण और कृतज्ञता है। ‘साम्राज्य’ तथा विपुल वैभव स्तुति की अतिशयोक्ति-युक्त भाषा हो सकती है; उसे जिम्मेदार आचरण और उदारता से जोड़कर समझना अधिक सार्थक है।
श्लोक 14
भावार्थ: हे मुरारि के हृदय की ईश्वरी! मैं वाणी, शरीर और मन से आपकी भक्ति करता हूँ। आपके करुणापूर्ण कटाक्ष की उपासना भक्त के जीवन में सब प्रकार की सार्थक समृद्धि बढ़ाने वाली कही गई है। व्याख्या: वचन, कर्म और मन का एक होना इस पद का व्यावहारिक सन्देश है। केवल शब्दों से नहीं, व्यवहार और दृष्टिकोण से भी श्रद्धा प्रकट होती है। ‘कटाक्षसमुपासनाविधिः’ वाले समास का पाण्डुलिपि/मुद्रित मिलान बाकी है।
श्लोक 15
भावार्थ: हे कमल में विराजने वाली, कमलधारिणी, उज्ज्वल वस्त्र, सुगन्ध और मालाओं से सुशोभित, हरिप्रिया, मनोहर तथा तीनों लोकों का कल्याण करने वाली भगवती! मुझ पर प्रसन्न हों। व्याख्या: कटाक्ष के चित्रों से आगे बढ़कर श्लोक सीधी करुणा की प्रार्थना करता है। कमल, सुगन्ध और मालाएँ पवित्रता और स्वागत के प्रतीक हैं; इन्हें अनिवार्य पूजा-सामग्री की सूची नहीं माना गया है।
श्लोक 16
भावार्थ: प्रातः मैं जगन्माता, सब लोकों के स्वामी की सहचरी और अमृत-सागर की पुत्री को प्रणाम करता हूँ। दिशाओं के हाथियों के स्वर्ण कलशों से बहते स्वच्छ दिव्य जल से उनका अभिषेक होता दिखाया गया है। व्याख्या: यह गजलक्ष्मी की प्रसिद्ध अभिषेक-छवि का वर्णन है। पहले पद में डिजिटल पाठ के सम्भावित मुद्रण/पाठ-संबंधी दोष को अस्थायी रूप से सुधारा गया है; ऐतिहासिक पृष्ठ से जाँच के बिना उसे अन्तिम पाठ नहीं माना जाएगा।
श्लोक 17
भावार्थ: हे कमला, कमलनयन प्रभु की प्रिया! करुणा की लहरों से भरपूर अपनी दृष्टि से मुझे देखिए। मैं अकिञ्चनों में ऐसा व्यक्ति हूँ जो आपकी निष्कपट दया का सच्चा पात्र बनने की याचना करता है। व्याख्या: ‘अकिञ्चन’ भौतिक अभाव के साथ अहंकार-रहित मन की ओर भी संकेत कर सकता है। अंतिम विनती का भाव किसी और से अधिक योग्य होने का दावा नहीं, बल्कि खुले हृदय से करुणा माँगना है।
श्लोक 18
भावार्थ: जो त्रयीमयी, तीनों लोकों की माता रमा की इन स्तुतियों से नित्य प्रशंसा करते हैं, वे श्रेष्ठ गुणों और महान सौभाग्य से सम्पन्न बताए गए हैं; उनके भाव विद्वज्जनों को प्रिय होते हैं। व्याख्या: यह चुने हुए पाठ का अठारहवाँ और फलश्रुति-जैसा समापन पद है। इसका आशय गुणों तथा शुभ जीवन के आदर्श से भी है; धन मिलने की कोई निश्चित मात्रा या समय-सीमा इसमें नहीं बताई गई है।