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स्तोत्र

पुरुषसूक्तम् — ऋग्वेद १०.९०

विराट् पुरुष, विश्व-उद्भव, यज्ञ-रूपक और सृष्टि की एकात्मता पर ऋग्वेद की सोलह ऋचाएँ।

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सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥

अर्थ

विराट् पुरुष के सहस्र सिर, नेत्र और चरण कहे गए हैं। वह समस्त पृथ्वी को घेरकर भी उससे ‘दस अँगुल’ आगे स्थित है।

व्याख्या

‘सहस्र’ यहाँ व्यापकता का काव्यात्मक संकेत है, शरीर के अंगों की गणना नहीं। ‘दस अँगुल’ से पृथ्वी के परे पुरुष की स्थिति का विरोधाभासी चित्र बनता है। इसे ब्रह्माण्ड की वैज्ञानिक दूरी बताने वाला वाक्य न समझें।

2

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥

अर्थ

जो कुछ बीत चुका और जो आगे होगा, सब पुरुष ही है। वही अमृतत्व का अधिपति है और अन्न से पोषित जीवन के क्षेत्र में भी प्रकट होता है।

व्याख्या

इस मन्त्र में समय, अन्न और अमृतत्व साथ आते हैं। अन्न से देहधारी जीवन की परनिर्भरता प्रकट होती है; अमृतत्व उससे परे स्थिति का संकेत है। अन्नसम्बन्धी पद के सूक्ष्म अर्थ पर वैदिक व्याकरण-विशेषज्ञ की समीक्षा आवश्यक है।

3

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥

अर्थ

पुरुष की प्रकट महिमा इतनी है, पर उसका स्वरूप उससे भी महान है। सभी भूत उसकी एक पाद-भाग की अभिव्यक्ति हैं; तीन पाद अमृतस्वरूप होकर दिवि में स्थित हैं।

व्याख्या

एक और तीन पाद का विभाजन गणितीय खगोलीय अनुपात नहीं, व्यक्त-अव्यक्त का प्रतीक है। अलग वेदान्त और वैष्णव परम्पराएँ इसका भिन्न विस्तार करती हैं। मूल ऋचा और बाद की व्याख्या के बीच अन्तर बनाए रखना ज़रूरी है।

4

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥

अर्थ

पुरुष के तीन पाद ऊपर, अप्रकट क्षेत्र में उठते हैं और एक पाद फिर इस जगत् में प्रकट होता है। वहाँ से वह खाने वाले और न खाने वाले सभी रूपों में व्याप्त होता है।

व्याख्या

यह ऋचा तीन पाद के अतीन्द्रिय आयाम से खाने वाले और न खाने वाले जगत् की ओर आती है। जीवित तथा निर्जीव का व्यापक संकेत दिखाई देता है। समास और संधि के कारण पदपाठ की जाँच बिना किसी एक शाब्दिक अर्थ को अंतिम न मानें।

5

तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥

अर्थ

पुरुष से विराट् का उदय हुआ और विराट् से पुनः पुरुष प्रकट हुआ। प्रकट होकर उसने पृथ्वी को आगे-पीछे सब ओर अतिक्रमित किया।

व्याख्या

‘विराट्’ सृष्टि के व्यापक, व्यवस्थित प्रकट रूप को सूचित कर सकता है। पुरुष और विराट् का परस्पर उदय एक साधारण रैखिक जन्म-कथा नहीं है; यह मूल और उसकी अभिव्यक्ति का सम्बन्ध भी दिखाता है।

6

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥

अर्थ

देवताओं ने पुरुष को हवि बनाकर यज्ञ का विस्तार किया। उस यज्ञ में वसन्त घृत, ग्रीष्म समिधा और शरद् हवि के रूप में कल्पित हुए।

व्याख्या

यज्ञ के पदार्थों में ऋतुओं को रखकर काव्य समय को विश्व-रचना से जोड़ता है। घृत, ईंधन और हवि वैदिक यज्ञ-भाषा के प्रतीक हैं। यह आधुनिक अनुष्ठान करने की निर्देशिका नहीं है।

7

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥

अर्थ

प्रथम प्रकट पुरुषरूप यज्ञ का बर्हिष् पर प्रोक्षण किया गया। देवता, साध्य देवगण और ऋषि उसी यज्ञ के माध्यम से उपासना करते हैं।

व्याख्या

पुरुष इस यज्ञ में अर्पण भी है और अर्थ भी। ‘बर्हिष्’ वैदिक यज्ञ की कुशा/आसन-व्यवस्था का पद है। ‘साध्य’ देवताओं के एक वर्ग का नाम है; इसकी चर्चा से किसी खास वर्तमान कर्मकाण्ड का आदेश नहीं निकलता।

8

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये ॥

अर्थ

उस सर्वाहुति-यज्ञ से पृषदाज्यरूपी पोषण प्रकट हुआ तथा वायव्य, वन्य और ग्राम्य पशुओं का उद्भव बताया गया।

व्याख्या

यहाँ पशु-समूह एक ही विश्व-उद्भव के रूपक से जुड़े हैं। वायव्य, आरण्य और ग्राम्य वैदिक-यज्ञीय वर्गीकरण हैं, आधुनिक जीव-विकास का कालक्रम नहीं। विशेष पदों की पदपाठ से मिलान की आवश्यकता बनी हुई है।

9

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥

अर्थ

उस सर्वाहुति-यज्ञ से ऋचाएँ और सामगान उत्पन्न हुए; छन्द और यजुष् भी उसी से प्रकट हुए।

व्याख्या

ऋक्, साम, यजुस् और छन्द विश्व की मूल व्यवस्था में रखे गए हैं। यह पवित्र वाणी की उत्पत्ति का धार्मिक चित्रण है, ग्रन्थों की ऐतिहासिक रचना-तिथि नहीं। इन पदों के अपने-अपने वैदिक प्रयोग हैं।

10
विषय-सूची पर लौटें

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥

अर्थ

उसी से अश्व और अन्य उभयादत् प्राणी उत्पन्न हुए। गायें, बकरियाँ और भेड़ें भी उसी स्रोत से प्रकट हुईं।

व्याख्या

अश्व, गौ, अज और अवि जैसे प्राणी उस समाज के परिचित जीवन को भी सूक्त में लाते हैं। ‘उभयादतः’ का ठीक जीवशास्त्रीय सन्दर्भ विवेचन का विषय है। यहाँ विश्व-रूपक और अनुभवजन्य पशु-परिचय साथ दिखाई देते हैं।

11

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥

अर्थ

पुरुष का विभाजन करते समय कितने भाग किए गए? मुख क्या बना, भुजाएँ कौन-सी हुईं, ऊरु क्या थे और पाद क्या कहलाए?

व्याख्या

यह प्रश्न अगली ऋचाओं की रचना समझने की कुंजी है। विराट् शरीर को समाज और आकाशीय जगत् से किस प्रकार जोड़ा गया, आगे उसका प्रतीकात्मक उत्तर दिया गया है।

12

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥

अर्थ

ब्राह्मण की कल्पना पुरुष के मुख से, राजन्य की भुजाओं से, वैश्य की ऊरुओं से और शूद्र की चरणों से उत्पत्ति के रूप में की गई है।

व्याख्या

यह चार वर्ण-श्रेणियों का ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली तथा विवादित धार्मिक रूपक है। इससे आज किसी व्यक्ति की ऊँच-नीच, जन्माधारित भेदभाव या सामाजिक अपमान का औचित्य सिद्ध नहीं होता। परम्पराओं में इसे पारस्परिक निर्भरता, सामाजिक क्रम या दोनों रूपों में पढ़ा गया; इनके बीच अन्तर स्पष्ट रखना आवश्यक है।

13

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥

अर्थ

उसके मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, मुख से इन्द्र और अग्नि तथा प्राण से वायु प्रकट हुए।

व्याख्या

मन-चन्द्र, नेत्र-सूर्य, मुख-अग्नि/इन्द्र और प्राण-वायु रूपकात्मक सम्बन्ध हैं। ये पुरातन धार्मिक विश्व-दृष्टि दिखाते हैं; सूर्य या चन्द्रमा के भौतिक जन्म की वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हैं।

14

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥

अर्थ

नाभि से अन्तरिक्ष, सिर से द्युलोक, चरणों से पृथ्वी और कानों से दिशाएँ कल्पित हुईं; इस तरह लोकों का रूपांकन हुआ।

व्याख्या

नाभि, शिर, पाद तथा श्रवण को ब्रह्माण्ड की दिशाओं से जोड़ना प्रतीकों का मानचित्र है। यह विश्व और व्यक्ति की एकात्मता का धार्मिक बिम्ब है, प्राकृतिक विज्ञान का दावा नहीं।

15

सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम् ॥

अर्थ

देवताओं के यज्ञ में सात परिधियाँ और इक्कीस समिधाएँ कल्पित हुईं; यज्ञरूप पुरुष को पशु की भाँति बाँधने का प्राचीन रूपक आता है।

व्याख्या

सात परिधि और इक्कीस समिधा वैदिक यज्ञ से जुड़े पद हैं। पुरुष को बाँधने और पशु कहने का चित्र प्राचीन यज्ञ-कथा का अंश है; यह पाठ किसी को ऐसे कर्म की व्यावहारिक विधि नहीं बताता।

16
विषय-सूची पर लौटें

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥

अर्थ

देवताओं ने यज्ञ से ही यज्ञ का आराधन किया; वे प्रारम्भिक धर्म-विधान बने। उनकी महिमा से वे उस ऊँचे लोक तक पहुँचे जहाँ पहले से साध्य देवता हैं।

व्याख्या

समापन में यज्ञ स्वयं अपने द्वारा आराधित होता है—यह सूक्त की चक्रीय रचना को पूरा करता है। ‘धर्माणि’ का सम्बन्ध आरम्भिक नियमन/विधानों से है; इसे आज के विधान या जाति-संहिता की सीधी स्वीकृति न समझें। मूल 16 ऋचाओं के बाद कोई नया शान्ति-मन्त्र नहीं जोड़ा गया।

सन्दर्भ और उपयोग

सर्वप्रथम मूल शब्द: ऋग्वेद १०.९० की सभी सोलह ऋचाएँ नीचे देवनागरी के स्वरचिह्न-रहित रूप में दी गई हैं। यह एक आन्तरिक सम्पादकीय पाठ है, वैदिक स्वर-उच्चारण सिखाने वाला पाठ नहीं। मुद्रित संहिता एवं पदपाठ-मिलान, स्वर-परीक्षा और उपयोगाधिकार की स्वीकृति बाकी है।

सम्पूर्ण मूल पुरुषसूक्त — १६ ऋचाएँ

ऋचा १०.९०.1

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ (ऋ. १०.९०.1)

ऋचा १०.९०.2

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (ऋ. १०.९०.2)

ऋचा १०.९०.3

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (ऋ. १०.९०.3)

ऋचा १०.९०.4

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्वङ्व्यक्रामत्साशनानशने अभि ॥ (ऋ. १०.९०.4)

ऋचा १०.९०.5

तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (ऋ. १०.९०.5)

ऋचा १०.९०.6

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (ऋ. १०.९०.6)

ऋचा १०.९०.7

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ (ऋ. १०.९०.7)

ऋचा १०.९०.8

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये ॥ (ऋ. १०.९०.8)

ऋचा १०.९०.9

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥ (ऋ. १०.९०.9)

ऋचा १०.९०.10

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥ (ऋ. १०.९०.10)

ऋचा १०.९०.11

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥ (ऋ. १०.९०.11)

ऋचा १०.९०.12

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ (ऋ. १०.९०.12)

ऋचा १०.९०.13

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥ (ऋ. १०.९०.13)

ऋचा १०.९०.14

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥ (ऋ. १०.९०.14)

ऋचा १०.९०.15

सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम् ॥ (ऋ. १०.९०.15)

ऋचा १०.९०.16

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ (ऋ. १०.९०.16)

ऋचा १०.९०.1

सरल अर्थ। विराट् पुरुष के सहस्र सिर, नेत्र और चरण कहे गए हैं। वह समस्त पृथ्वी को घेरकर भी उससे ‘दस अँगुल’ आगे स्थित है। विस्तृत व्याख्या। ‘सहस्र’ यहाँ व्यापकता का काव्यात्मक संकेत है, शरीर के अंगों की गणना नहीं। ‘दस अँगुल’ से पृथ्वी के परे पुरुष की स्थिति का विरोधाभासी चित्र बनता है। इसे ब्रह्माण्ड की वैज्ञानिक दूरी बताने वाला वाक्य न समझें।

ऋचा १०.९०.2

सरल अर्थ। जो कुछ बीत चुका और जो आगे होगा, सब पुरुष ही है। वही अमृतत्व का अधिपति है और अन्न से पोषित जीवन के क्षेत्र में भी प्रकट होता है। विस्तृत व्याख्या। इस मन्त्र में समय, अन्न और अमृतत्व साथ आते हैं। अन्न से देहधारी जीवन की परनिर्भरता प्रकट होती है; अमृतत्व उससे परे स्थिति का संकेत है। अन्नसम्बन्धी पद के सूक्ष्म अर्थ पर वैदिक व्याकरण-विशेषज्ञ की समीक्षा आवश्यक है।

ऋचा १०.९०.3

सरल अर्थ। पुरुष की प्रकट महिमा इतनी है, पर उसका स्वरूप उससे भी महान है। सभी भूत उसकी एक पाद-भाग की अभिव्यक्ति हैं; तीन पाद अमृतस्वरूप होकर दिवि में स्थित हैं। विस्तृत व्याख्या। एक और तीन पाद का विभाजन गणितीय खगोलीय अनुपात नहीं, व्यक्त-अव्यक्त का प्रतीक है। अलग वेदान्त और वैष्णव परम्पराएँ इसका भिन्न विस्तार करती हैं। मूल ऋचा और बाद की व्याख्या के बीच अन्तर बनाए रखना ज़रूरी है।

ऋचा १०.९०.4

सरल अर्थ। पुरुष के तीन पाद ऊपर, अप्रकट क्षेत्र में उठते हैं और एक पाद फिर इस जगत् में प्रकट होता है। वहाँ से वह खाने वाले और न खाने वाले सभी रूपों में व्याप्त होता है। विस्तृत व्याख्या। यह ऋचा तीन पाद के अतीन्द्रिय आयाम से खाने वाले और न खाने वाले जगत् की ओर आती है। जीवित तथा निर्जीव का व्यापक संकेत दिखाई देता है। समास और संधि के कारण पदपाठ की जाँच बिना किसी एक शाब्दिक अर्थ को अंतिम न मानें।

ऋचा १०.९०.5

सरल अर्थ। पुरुष से विराट् का उदय हुआ और विराट् से पुनः पुरुष प्रकट हुआ। प्रकट होकर उसने पृथ्वी को आगे-पीछे सब ओर अतिक्रमित किया। विस्तृत व्याख्या। ‘विराट्’ सृष्टि के व्यापक, व्यवस्थित प्रकट रूप को सूचित कर सकता है। पुरुष और विराट् का परस्पर उदय एक साधारण रैखिक जन्म-कथा नहीं है; यह मूल और उसकी अभिव्यक्ति का सम्बन्ध भी दिखाता है।

ऋचा १०.९०.6

सरल अर्थ। देवताओं ने पुरुष को हवि बनाकर यज्ञ का विस्तार किया। उस यज्ञ में वसन्त घृत, ग्रीष्म समिधा और शरद् हवि के रूप में कल्पित हुए। विस्तृत व्याख्या। यज्ञ के पदार्थों में ऋतुओं को रखकर काव्य समय को विश्व-रचना से जोड़ता है। घृत, ईंधन और हवि वैदिक यज्ञ-भाषा के प्रतीक हैं। यह आधुनिक अनुष्ठान करने की निर्देशिका नहीं है।

ऋचा १०.९०.7

सरल अर्थ। प्रथम प्रकट पुरुषरूप यज्ञ का बर्हिष् पर प्रोक्षण किया गया। देवता, साध्य देवगण और ऋषि उसी यज्ञ के माध्यम से उपासना करते हैं। विस्तृत व्याख्या। पुरुष इस यज्ञ में अर्पण भी है और अर्थ भी। ‘बर्हिष्’ वैदिक यज्ञ की कुशा/आसन-व्यवस्था का पद है। ‘साध्य’ देवताओं के एक वर्ग का नाम है; इसकी चर्चा से किसी खास वर्तमान कर्मकाण्ड का आदेश नहीं निकलता।

ऋचा १०.९०.8

सरल अर्थ। उस सर्वाहुति-यज्ञ से पृषदाज्यरूपी पोषण प्रकट हुआ तथा वायव्य, वन्य और ग्राम्य पशुओं का उद्भव बताया गया। विस्तृत व्याख्या। यहाँ पशु-समूह एक ही विश्व-उद्भव के रूपक से जुड़े हैं। वायव्य, आरण्य और ग्राम्य वैदिक-यज्ञीय वर्गीकरण हैं, आधुनिक जीव-विकास का कालक्रम नहीं। विशेष पदों की पदपाठ से मिलान की आवश्यकता बनी हुई है।

ऋचा १०.९०.9

सरल अर्थ। उस सर्वाहुति-यज्ञ से ऋचाएँ और सामगान उत्पन्न हुए; छन्द और यजुष् भी उसी से प्रकट हुए। विस्तृत व्याख्या। ऋक्, साम, यजुस् और छन्द विश्व की मूल व्यवस्था में रखे गए हैं। यह पवित्र वाणी की उत्पत्ति का धार्मिक चित्रण है, ग्रन्थों की ऐतिहासिक रचना-तिथि नहीं। इन पदों के अपने-अपने वैदिक प्रयोग हैं।

ऋचा १०.९०.10

सरल अर्थ। उसी से अश्व और अन्य उभयादत् प्राणी उत्पन्न हुए। गायें, बकरियाँ और भेड़ें भी उसी स्रोत से प्रकट हुईं। विस्तृत व्याख्या। अश्व, गौ, अज और अवि जैसे प्राणी उस समाज के परिचित जीवन को भी सूक्त में लाते हैं। ‘उभयादतः’ का ठीक जीवशास्त्रीय सन्दर्भ विवेचन का विषय है। यहाँ विश्व-रूपक और अनुभवजन्य पशु-परिचय साथ दिखाई देते हैं।

ऋचा १०.९०.11

सरल अर्थ। पुरुष का विभाजन करते समय कितने भाग किए गए? मुख क्या बना, भुजाएँ कौन-सी हुईं, ऊरु क्या थे और पाद क्या कहलाए? विस्तृत व्याख्या। यह प्रश्न अगली ऋचाओं की रचना समझने की कुंजी है। विराट् शरीर को समाज और आकाशीय जगत् से किस प्रकार जोड़ा गया, आगे उसका प्रतीकात्मक उत्तर दिया गया है।

ऋचा १०.९०.12

सरल अर्थ। ब्राह्मण की कल्पना पुरुष के मुख से, राजन्य की भुजाओं से, वैश्य की ऊरुओं से और शूद्र की चरणों से उत्पत्ति के रूप में की गई है। विस्तृत व्याख्या। यह चार वर्ण-श्रेणियों का ऐतिहासिक रूप से प्रभावशाली तथा विवादित धार्मिक रूपक है। इससे आज किसी व्यक्ति की ऊँच-नीच, जन्माधारित भेदभाव या सामाजिक अपमान का औचित्य सिद्ध नहीं होता। परम्पराओं में इसे पारस्परिक निर्भरता, सामाजिक क्रम या दोनों रूपों में पढ़ा गया; इनके बीच अन्तर स्पष्ट रखना आवश्यक है।

ऋचा १०.९०.13

सरल अर्थ। उसके मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, मुख से इन्द्र और अग्नि तथा प्राण से वायु प्रकट हुए। विस्तृत व्याख्या। मन-चन्द्र, नेत्र-सूर्य, मुख-अग्नि/इन्द्र और प्राण-वायु रूपकात्मक सम्बन्ध हैं। ये पुरातन धार्मिक विश्व-दृष्टि दिखाते हैं; सूर्य या चन्द्रमा के भौतिक जन्म की वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हैं।

ऋचा १०.९०.14

सरल अर्थ। नाभि से अन्तरिक्ष, सिर से द्युलोक, चरणों से पृथ्वी और कानों से दिशाएँ कल्पित हुईं; इस तरह लोकों का रूपांकन हुआ। विस्तृत व्याख्या। नाभि, शिर, पाद तथा श्रवण को ब्रह्माण्ड की दिशाओं से जोड़ना प्रतीकों का मानचित्र है। यह विश्व और व्यक्ति की एकात्मता का धार्मिक बिम्ब है, प्राकृतिक विज्ञान का दावा नहीं।

ऋचा १०.९०.15

सरल अर्थ। देवताओं के यज्ञ में सात परिधियाँ और इक्कीस समिधाएँ कल्पित हुईं; यज्ञरूप पुरुष को पशु की भाँति बाँधने का प्राचीन रूपक आता है। विस्तृत व्याख्या। सात परिधि और इक्कीस समिधा वैदिक यज्ञ से जुड़े पद हैं। पुरुष को बाँधने और पशु कहने का चित्र प्राचीन यज्ञ-कथा का अंश है; यह पाठ किसी को ऐसे कर्म की व्यावहारिक विधि नहीं बताता।

ऋचा १०.९०.16

सरल अर्थ। देवताओं ने यज्ञ से ही यज्ञ का आराधन किया; वे प्रारम्भिक धर्म-विधान बने। उनकी महिमा से वे उस ऊँचे लोक तक पहुँचे जहाँ पहले से साध्य देवता हैं। विस्तृत व्याख्या। समापन में यज्ञ स्वयं अपने द्वारा आराधित होता है—यह सूक्त की चक्रीय रचना को पूरा करता है। ‘धर्माणि’ का सम्बन्ध आरम्भिक नियमन/विधानों से है; इसे आज के विधान या जाति-संहिता की सीधी स्वीकृति न समझें। मूल 16 ऋचाओं के बाद कोई नया शान्ति-मन्त्र नहीं जोड़ा गया।

परिचय: विराट् पुरुष का सूक्त

यहाँ पुरुष कौन है? ‘पुरुष’ केवल सामान्य मनुष्य का नाम नहीं, सम्पूर्ण विश्व को व्यापक और उससे परे स्थित विराट् सत्ता का वैदिक चित्र है। शुरुआती ऋचाओं में जगत् की व्यापकता तथा उससे परे अमृतत्व का विरोधाभासी-सा सुन्दर सम्बन्ध दिखाई देता है। 1

विश्वयज्ञ का रूपक: ऋचा ६–१० एवं १५–१६ में वसन्त, ग्रीष्म, शरद्, जीव-जगत् और वेद-वाणी यज्ञ-भाषा के भीतर जुड़े हैं। यह सृष्टि का काव्यात्मक धार्मिक वर्णन है, किसी आधुनिक यज्ञ की विधि या निश्चित लाभ का वचन नहीं। शरीर में सम्पूर्ण विश्व: ऋचा ११–१४ में पुरुष के मुख, भुजा, मन, नेत्र, प्राण, नाभि आदि से समाज तथा ब्रह्माण्ड का प्रतिमान रचा गया है। प्रतीकात्मक एकात्मता को समझते समय इन कथनों के ऐतिहासिक सामाजिक प्रभाव भी याद रखने चाहिए।

वर्ण-सम्बन्धी बारहवीं ऋचा: ऐतिहासिक और नैतिक सन्दर्भ

ऋग्वेद १०.९०.१२ में ब्राह्मण, राजन्य, वैश्य और शूद्र के मूल शब्द आते हैं। इन्हें अनुवाद में हटाना या केवल आधुनिक व्यवसायों के नामों से बदलना पाठ को अस्पष्ट करेगा। इस ऋचा के सामाजिक अनुक्रम से इतिहास में विभिन्न अर्थ तथा जाति-आधारित पदानुक्रम के समर्थन भी निकाले गए हैं। कुछ भक्ति-व्याख्याओं में शरीर के अंगों की परस्पर निर्भरता पर ज़ोर मिलता है। यहाँ ऐतिहासिक पाठ का विवेचन है, किसी व्यक्ति को जन्म के कारण ऊँचा-नीचा मानने, भेदभाव करने या अपमानित करने का समर्थन नहीं। पहले आए प्रश्न (१०.९०.११) तथा अगले विश्व-रूपक के साथ इस पद को पढ़ना आवश्यक है। 1 4

पाठभेद एवं समीक्षा-बिन्दु

  • १०.९०.३ एवं १०.९०.५: ‘पूरुषः’ तथा ‘विराळजायत’ जैसे वैदिक अक्षर-विन्यास जानबूझकर अभी रखे गए हैं; सामान्यीकृत रूप चुपचाप प्रतिस्थापित नहीं किए गए। 1
  • १०.९०.८ और १०.९०.१४: नासिक्य चिह्न एवं पद-विच्छेद का विशेषज्ञ परीक्षण आवश्यक है। 1 3
  • १०.९०.१२: चार वर्णों के वास्तविक संस्कृत पद सुरक्षित रखे गए हैं; भेदभाव का समर्थन किए बिना विवेचन किया गया है। 1 4
  • १०.९०.१६: यही इस ऋग्वैदिक पाठ की अंतिम ऋचा है; आगे मनगढ़ंत फलश्रुति नहीं जोड़ी गई। 1

सामान्य प्रश्न

पुरुषसूक्त में कितने मन्त्र हैं? यहाँ ऋग्वेद १०.९० की सोलह ऋचाएँ हैं। अन्य यजुर्वैदिक तथा पूजा-पाठ संकलनों में संख्या अधिक हो सकती है। क्या यह मंदिर में सुना जाने वाला वही क्रम है? अनिवार्यतः नहीं। तैत्तिरीय परम्परा में मन्त्रों का क्रम और विस्तार अलग हो सकते हैं। पुरुष और विष्णु का क्या सम्बन्ध है? अनेक वैष्णव सम्प्रदाय पुरुष को विष्णु/नारायण से पहचानते हैं। उस परम्परागत व्याख्या को मूल वैदिक शब्दों के ऐतिहासिक प्रसंग से अलग पहचानना चाहिए। क्या इस पाठ से वैदिक स्वर सीख सकते हैं? नहीं। इसमें उदात्त-अनुदात्त आदि चिह्न नहीं हैं। उच्चारण के लिए गुरु तथा स्वरयुक्त, जाँचा हुआ पाठ चाहिए। क्या वर्णवाली ऋचा भेदभाव का निर्देश है? वह वैदिक सृष्टि-रूपक की ऋचा है, जिसकी ऐतिहासिक व्याख्याएँ विवादित रही हैं। यहाँ जन्माधारित असमानता का समर्थन नहीं किया जाता।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Rigveda10.90, unaccented Sakala sixteen-verse reading. Comparative electronic text: Sanskrit Wikisource contributors, Rgvedah Suktam10.90, CC BY-SA4.0. This presentation, Roman rendering and derivative meanings retain CC BY-SA4.0 attribution and ShareAlike. No claim of an accented recension or independent scholarly verification. Original manuscript wording and unit sequence retained. Roman rendering, meanings and explanations: ShivGoraksh. No source recording, scan image or modern third-party explanation is reproduced. Independent textual certification remains incomplete.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt | sa bhūmiṃ viśvato vṛtvātyatiṣṭhaddaśāṅgulam ||

  2. 2

    puruṣa evedaṃ sarvaṃ yadbhūtaṃ yacca bhavyam | utāmṛtatvasyeśāno yadannenātirohati ||

  3. 3

    etāvānasya mahimāto jyāyām̐śca pūruṣaḥ | pādo’sya viśvā bhūtāni tripādasyāmṛtaṃ divi ||

  4. 4

    tripādūrdhva udaitpuruṣaḥ pādo’syehābhavatpunaḥ | tato viṣvaṅvyakrāmatsāśanānaśane abhi ||

  5. 5

    tasmādvirāḷajāyata virājo adhi pūruṣaḥ | sa jāto atyaricyata paścādbhūmimatho puraḥ ||

  6. 6

    yatpuruṣeṇa haviṣā devā yajñamatanvata | vasanto asyāsīdājyaṃ grīṣma idhmaḥ śaraddhaviḥ ||

  7. 7

    taṃ yajñaṃ barhiṣi praukṣanpuruṣaṃ jātamagrataḥ | tena devā ayajanta sādhyā ṛṣayaśca ye ||

  8. 8

    tasmādyajñātsarvahutaḥ sambhṛtaṃ pṛṣadājyam | paśūntām̐ścakre vāyavyānāraṇyāngrāmyāśca ye ||

  9. 9

    tasmādyajñātsarvahuta ṛcaḥ sāmāni jajñire | chandāṃsi jajñire tasmādyajustasmādajāyata ||

  10. 10

    tasmādaśvā ajāyanta ye ke cobhayādataḥ | gāvo ha jajñire tasmāttasmājjātā ajāvayaḥ ||

  11. 11

    yatpuruṣaṃ vyadadhuḥ katidhā vyakalpayan | mukhaṃ kimasya kau bāhū kā ūrū pādā ucyete ||

  12. 12

    brāhmaṇo’sya mukhamāsīdbāhū rājanyaḥ kṛtaḥ | ūrū tadasya yadvaiśyaḥ padbhyāṃ śūdro ajāyata ||

  13. 13

    candramā manaso jātaścakṣoḥ sūryo ajāyata | mukhādindraścāgniśca prāṇādvāyurajāyata ||

  14. 14

    nābhyā āsīdantarikṣaṃ śīrṣṇo dyauḥ samavartata | padbhyāṃ bhūmirdiśaḥ śrotrāttathā lokām̐ akalpayan ||

  15. 15

    saptāsyāsanparidhayastriḥ sapta samidhaḥ kṛtāḥ | devā yadyajñaṃ tanvānā abadhnanpuruṣaṃ paśum ||

  16. 16

    yajñena yajñamayajanta devāstāni dharmāṇi prathamānyāsan | te ha nākaṃ mahimānaḥ sacanta yatra pūrve sādhyāḥ santi devāḥ ||

स्रोत एवं सम्पादकीय स्थिति

1 Vaidhika Dharma — ऋग्वेद १०.९०.१–१६ का स्वरयुक्त डिजिटल पाठ, चयनित आन्तरिक आधार; डिजिटल प्रतिलिपि-अधिकार अप्राप्त।

2 Sanskrit Documents — ऋग्वेद संहिता व उसके विभिन्न डिजिटल रूपों की सूची; इस कार्य में पूरी अलग फाइल से नया अक्षरशः मिलान नहीं किया गया।

3 University of Cologne का VedaWeb परियोजना-विवरण; विशिष्ट ऋचा का विशेषज्ञ विश्लेषण अभी नहीं लिया गया।

4 INFLIBNET की विभिन्न वेदों में पुरुषसूक्त की पाठ-परम्पराओं पर शैक्षिक चर्चा।

5 भारत सरकार के Vedic Heritage Portal में तैत्तिरीय आरण्यक सम्बन्धी जानकारी।

6 Griffith का ऐतिहासिक अंग्रेज़ी अनुवाद केवल तुलना हेतु पहचाना गया; यहाँ के हिन्दी/अंग्रेज़ी अर्थ मौलिक हैं।

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

नीचे के अर्थ और विवरण शिवगोरक्ष के मौलिक शैक्षिक संस्करण हैं। प्रत्येक भाग उसी मूल पाठ-अभिलेख की ऋचा से जुड़ा है। जहाँ पुरातन ‘मिथकीय/प्रतीकात्मक’ भाषा कही गई है वहाँ भक्ति-मूल्य का निषेध नहीं, साहित्यिक स्वरूप का भेद किया गया है।

  1. Puruṣa Sūktam (Ṛgveda), Śākala-saṃhitā, 10.90.1–16 · स्रोत खोलें
  2. Rigveda complete electronic text and display formats · स्रोत खोलें
  3. VedaWeb – academic research environment for Vedic textual analysis · स्रोत खोलें
  4. Pañca Sūktas and their importance · स्रोत खोलें
  5. Taittirīya Āraṇyaka · स्रोत खोलें
  6. Rig-Veda Book 10: Hymn XC (Puruṣa) · स्रोत खोलें
  7. Additional reusable textual witness (comparison, not a replacement edition) · स्रोत खोलें