पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता — श्री लक्ष्मी जी की आरती

माँ लक्ष्मी की चयनित आठ-पदीय आरती, मूल देवनागरी पाठ, सरल अर्थ और विश्वसनीय स्रोत-समीक्षा।

पठन की सेटिंग

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशिदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥

अर्थ

माता लक्ष्मी को प्रणाम और जयकार। आरती कहती है कि दिव्य सत्ता भी दिन-रात उनका आदर करती है; ‘हरि विष्णु विधाता’ वाला संक्षिप्त पद अलग पाठों में भिन्न रूप से मिलता है।

व्याख्या

“मैया” निकटता और स्नेह का संबोधन है; “निशिदिन” यानी दिन-रात और “सेवत” यानी सेवा/आदर करना। चयनित पाठ में “हरि विष्णु विधाता” लिखा है। कुछ अन्य पाठों में “हर विष्णु धाता” है, जिसका अर्थ शिव, विष्णु और ब्रह्मा से जोड़ा जाता है। दोनों पाठों को मिलाकर कोई नया मूल-पद नहीं बनाया गया है। मुखड़ा सामूहिक गायन को जोड़ता है।

2

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता। सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

अर्थ

गायक लक्ष्मी को उमा, रमा और ब्रह्माणी जैसे नामों से जगन्माता मानकर स्तुति करता है। सूर्य-चंद्र उनका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि उनका यश गाते हैं।

व्याख्या

यहाँ कई देवीनामों को एक मातृरूप में संबोधित करने वाली भक्तिभाषा है। “रमा” लक्ष्मी का नाम है; यहाँ पुरुष देवता श्रीराम का उल्लेख नहीं। जो परंपराएँ लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती के रूपों में भेद करती हैं, उनके मत को इस काव्यात्मक एकत्व से मिटाया नहीं जाना चाहिए। नारद का उल्लेख पुराणकथाओं में गायन और भक्ति के प्रतीक रूप में है।

3

दुर्गा रुप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

अर्थ

देवी को दुर्गा-रूप में निर्मल शक्ति तथा सुख और समृद्धि की दात्री कहा गया है। ध्यान करने वाला भक्त जीवन की उन्नति, सफलता और साधनों की आशा प्रकट करता है।

व्याख्या

“निरंजनी” का भाव मलिनता से रहित या निर्मल है। “ऋद्धि” वृद्धि, “सिद्धि” सिद्ध होना/सफलता और “धन” संसाधनों को सूचित करता है। पद में भक्त की आशा है, धन-लाभ का कोई निश्चित नुस्खा नहीं। लक्ष्मी-दुर्गा का यह एकत्व शाक्त भक्ति में समझा जा सकता है, फिर भी दोनों की पृथक् उपासना-परंपराएँ बनी रहती हैं।

4

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता। कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

अर्थ

देवी को पाताल तक व्याप्त, मंगल की दात्री, कर्म के प्रभाव को प्रकाशित करने वाली तथा संसार-सागर से उबारने वाली कहा गया है।

व्याख्या

“पाताल” पुराणिक लोककल्पना का शब्द है; इसे आधुनिक भूगोल का तथ्य न समझें। “कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी” का अर्थ कर्मों के प्रभाव को प्रकट करने वाली लिया गया है, जबकि इसके अन्य सूक्ष्म अर्थ भी संभव हैं। “भवनिधि” भवसागर का रूपक और “त्राता” उद्धार करने वाली हैं। दूसरे पाठ में “त्राता” की जगह “दाता” भी मिलता है; यह अर्थ बदलने वाला पाठभेद है।

5

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता। सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

अर्थ

जहाँ लक्ष्मी का स्वागत होता है, वहाँ सद्गुण, अवसर और मन का धैर्य बढ़ने की कल्पना की गई है।

व्याख्या

“सद्गुण” को संपन्नता के साथ रखकर आरती बताती है कि घर की श्री केवल मुद्रा नहीं, बल्कि आचरण भी है। “सब सम्भव” काव्यात्मक उत्साह है, बाधाओं के मिटने की गारंटी नहीं। इसे देखभाल, ईमानदार आजीविका, विश्वास और उदारता का आमंत्रण समझें। निर्धनता को देवी की नाराजगी और धन को श्रेष्ठ चरित्र का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।

6

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता। खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

अर्थ

यह पद यज्ञ, वस्त्र, भोजन और आतिथ्य जैसी आवश्यक जीवन-सुविधाओं को देवी की उदार कृपा से जोड़ता है।

व्याख्या

“यज्ञ” समर्पण/अनुष्ठान से जुड़ी क्रिया और “वस्त्र” कपड़े हैं। आरती भौतिक साधनों को जीवन, परिवार और समाज की आवश्यक शर्तों के रूप में याद करती है। इससे ज़रूरतमंद के साथ संसाधन बाँटने की नैतिक प्रेरणा भी निकलती है। एक दूसरे मुद्रित पाठ में “वस्त्र” के स्थान पर “बरत” होने की रिपोर्ट है; मूल चित्र देखे बिना उसे यहाँ नहीं बदला गया है।

7

शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता। रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

अर्थ

लक्ष्मी को शुभ गुणों का सुंदर निवास और क्षीरसागर से प्रकट देवी कहा गया है। समुद्र-मंथन के चौदह रत्न उनकी समृद्धि से जोड़े गए हैं।

व्याख्या

“क्षीरोदधि” क्षीरसागर और “जाता” अर्थात् उत्पन्न/प्रकट हुई। समुद्र-मंथन की कथा इस पद की पौराणिक पृष्ठभूमि है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि पूरी हिंदी आरती किसी विशेष पुराण में लिखी हुई है। चौदह रत्नों की सूचियाँ कथाओं में बदलती हैं; इस पद में स्वयं उनके नाम नहीं दिए गए हैं।

8
विषय-सूची पर लौटें

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता। उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

अर्थ

समापन में आरती-गायन से हृदय में आनंद भरने और पाप के क्षय की भक्तिपूर्ण आशा व्यक्त की गई है।

व्याख्या

“उर” का अर्थ हृदय/अंतरात्मा है। “पाप उतर जाता” ऐसा दावा नहीं कि किसी को हानि पहुँचाकर केवल गीत गाने से उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है। इसे आत्मपरीक्षण, पश्चात्ताप और व्यवहार-सुधार की भक्ति-आशा के रूप में पढ़ें। घर या मंदिर में गायन के बाद टेक सामूहिक स्तुति को पूर्ण करती है।

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित पाठ: Drik Panchang में प्रदर्शित पूरे आठ खंड। पहले मूल देवनागरी आरती दी गई है। ऑनलाइन साक्ष्य का पाठ पूरा है; पुराने मुद्रित स्रोत, अधिकार और विशेषज्ञ सत्यापन शेष हैं। 1 2

1. मंगल-स्मरण और टेक

भावार्थ माता लक्ष्मी को प्रणाम और जयकार। आरती कहती है कि दिव्य सत्ता भी दिन-रात उनका आदर करती है; ‘हरि विष्णु विधाता’ वाला संक्षिप्त पद अलग पाठों में भिन्न रूप से मिलता है। व्याख्या “मैया” निकटता और स्नेह का संबोधन है; “निशिदिन” यानी दिन-रात और “सेवत” यानी सेवा/आदर करना। चयनित पाठ में “हरि विष्णु विधाता” लिखा है। कुछ अन्य पाठों में “हर विष्णु धाता” है, जिसका अर्थ शिव, विष्णु और ब्रह्मा से जोड़ा जाता है। दोनों पाठों को मिलाकर कोई नया मूल-पद नहीं बनाया गया है। मुखड़ा सामूहिक गायन को जोड़ता है।

2. उमा, रमा और ब्रह्माणी

भावार्थ गायक लक्ष्मी को उमा, रमा और ब्रह्माणी जैसे नामों से जगन्माता मानकर स्तुति करता है। सूर्य-चंद्र उनका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि उनका यश गाते हैं। व्याख्या यहाँ कई देवीनामों को एक मातृरूप में संबोधित करने वाली भक्तिभाषा है। “रमा” लक्ष्मी का नाम है; यहाँ पुरुष देवता श्रीराम का उल्लेख नहीं। जो परंपराएँ लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती के रूपों में भेद करती हैं, उनके मत को इस काव्यात्मक एकत्व से मिटाया नहीं जाना चाहिए। नारद का उल्लेख पुराणकथाओं में गायन और भक्ति के प्रतीक रूप में है।

3. दुर्गा और मंगलमय समृद्धि

भावार्थ देवी को दुर्गा-रूप में निर्मल शक्ति तथा सुख और समृद्धि की दात्री कहा गया है। ध्यान करने वाला भक्त जीवन की उन्नति, सफलता और साधनों की आशा प्रकट करता है। व्याख्या “निरंजनी” का भाव मलिनता से रहित या निर्मल है। “ऋद्धि” वृद्धि, “सिद्धि” सिद्ध होना/सफलता और “धन” संसाधनों को सूचित करता है। पद में भक्त की आशा है, धन-लाभ का कोई निश्चित नुस्खा नहीं। लक्ष्मी-दुर्गा का यह एकत्व शाक्त भक्ति में समझा जा सकता है, फिर भी दोनों की पृथक् उपासना-परंपराएँ बनी रहती हैं।

4. समस्त लोकों में आश्रय

भावार्थ देवी को पाताल तक व्याप्त, मंगल की दात्री, कर्म के प्रभाव को प्रकाशित करने वाली तथा संसार-सागर से उबारने वाली कहा गया है। व्याख्या “पाताल” पुराणिक लोककल्पना का शब्द है; इसे आधुनिक भूगोल का तथ्य न समझें। “कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी” का अर्थ कर्मों के प्रभाव को प्रकट करने वाली लिया गया है, जबकि इसके अन्य सूक्ष्म अर्थ भी संभव हैं। “भवनिधि” भवसागर का रूपक और “त्राता” उद्धार करने वाली हैं। दूसरे पाठ में “त्राता” की जगह “दाता” भी मिलता है; यह अर्थ बदलने वाला पाठभेद है।

5. गृह में सद्गुण और धैर्य

भावार्थ जहाँ लक्ष्मी का स्वागत होता है, वहाँ सद्गुण, अवसर और मन का धैर्य बढ़ने की कल्पना की गई है। व्याख्या “सद्गुण” को संपन्नता के साथ रखकर आरती बताती है कि घर की श्री केवल मुद्रा नहीं, बल्कि आचरण भी है। “सब सम्भव” काव्यात्मक उत्साह है, बाधाओं के मिटने की गारंटी नहीं। इसे देखभाल, ईमानदार आजीविका, विश्वास और उदारता का आमंत्रण समझें। निर्धनता को देवी की नाराजगी और धन को श्रेष्ठ चरित्र का प्रमाण नहीं मानना चाहिए।

6. अन्न, वस्त्र और जीवन-संपदा

भावार्थ यह पद यज्ञ, वस्त्र, भोजन और आतिथ्य जैसी आवश्यक जीवन-सुविधाओं को देवी की उदार कृपा से जोड़ता है। व्याख्या “यज्ञ” समर्पण/अनुष्ठान से जुड़ी क्रिया और “वस्त्र” कपड़े हैं। आरती भौतिक साधनों को जीवन, परिवार और समाज की आवश्यक शर्तों के रूप में याद करती है। इससे ज़रूरतमंद के साथ संसाधन बाँटने की नैतिक प्रेरणा भी निकलती है। एक दूसरे मुद्रित पाठ में “वस्त्र” के स्थान पर “बरत” होने की रिपोर्ट है; मूल चित्र देखे बिना उसे यहाँ नहीं बदला गया है।

7. क्षीरसागर से प्राकट्य और चौदह रत्न

भावार्थ लक्ष्मी को शुभ गुणों का सुंदर निवास और क्षीरसागर से प्रकट देवी कहा गया है। समुद्र-मंथन के चौदह रत्न उनकी समृद्धि से जोड़े गए हैं। व्याख्या “क्षीरोदधि” क्षीरसागर और “जाता” अर्थात् उत्पन्न/प्रकट हुई। समुद्र-मंथन की कथा इस पद की पौराणिक पृष्ठभूमि है, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि पूरी हिंदी आरती किसी विशेष पुराण में लिखी हुई है। चौदह रत्नों की सूचियाँ कथाओं में बदलती हैं; इस पद में स्वयं उनके नाम नहीं दिए गए हैं।

8. गायन से आनंद का समापन

भावार्थ समापन में आरती-गायन से हृदय में आनंद भरने और पाप के क्षय की भक्तिपूर्ण आशा व्यक्त की गई है। व्याख्या “उर” का अर्थ हृदय/अंतरात्मा है। “पाप उतर जाता” ऐसा दावा नहीं कि किसी को हानि पहुँचाकर केवल गीत गाने से उत्तरदायित्व समाप्त हो जाता है। इसे आत्मपरीक्षण, पश्चात्ताप और व्यवहार-सुधार की भक्ति-आशा के रूप में पढ़ें। घर या मंदिर में गायन के बाद टेक सामूहिक स्तुति को पूर्ण करती है।

ॐ जय लक्ष्मी माता आरती क्या है?

“ॐ जय लक्ष्मी माता” देवी लक्ष्मी की प्रशंसा में गाई जाने वाली लोकप्रिय हिंदी आरती है। यह न संस्कृत का वैदिक सूक्त है, न श्रीसूक्त का कोई अध्याय। इसके मुखड़े को बार-बार दोहराया जाता है, जिससे समूह-गायन का स्वर बनता है। आगे के पदों में देवी को जगन्माता, शुभ की अधिष्ठात्री, अन्न-वस्त्र की पोषक और कठिनाई में भरोसे का आधार कहा गया है। नीचे एक पहचान योग्य ऑनलाइन पाठ-साक्ष्य का चयनित पाठ है; यह दावा नहीं कि देश की हर परंपरा में यही एकमात्र मान्य रूप है। 1 2

आरती शब्द दीप से की जाने वाली पूजा और उस समय गाए जाने वाले स्तुतिगीत—दोनों अर्थों में आता है। यह लेख पाठ और अर्थ का अध्ययन कराता है; अनुष्ठान की बाध्यकारी विधि, निश्चित समय, जप-संख्या या धन-प्राप्ति की गारंटी नहीं देता। परिवार, मंदिर और संप्रदाय की विधियाँ अलग हो सकती हैं।

लक्ष्मी का अर्थ केवल पैसा नहीं

भारतीय भक्ति में लक्ष्मी को श्री, सौभाग्य, सौंदर्य और पोषण से जोड़ा जाता है। वैष्णव परंपरा में उनका भगवान विष्णु से घनिष्ठ संबंध है; ऐतिहासिक प्रतिमाओं में वे स्वयं महत्त्वपूर्ण देवी के रूप में भी दिखाई देती हैं। मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम की सातवीं शताब्दी की लक्ष्मी-मूर्ति तथा पूर्वी भारत की विष्णु-लक्ष्मी-सरस्वती प्रतिमा इस बहुविध दृश्य-परंपरा का प्रमाण हैं। ये मूर्तियाँ स्वयं इस हिंदी आरती की रचना-तिथि या लेखक का प्रमाण नहीं हैं। 5 6

इस आरती की श्री में सुख, संपत्ति, सद्गुण, अन्न, वस्त्र और मानसिक धैर्य सब सम्मिलित हैं। ऐसी समृद्धि वह क्षमता है जिससे व्यक्ति स्वयं और दूसरों का जीवन सँवार सके। गरीबी को आध्यात्मिक असफलता या देवी की नाराजगी नहीं कहना चाहिए; धनवान होना भी नैतिक श्रेष्ठता की गारंटी नहीं।

उमा, रमा, ब्रह्माणी और दुर्गा: स्तुति की समावेशी भाषा

दूसरे पद में “उमा, रमा, ब्रह्माणी” और तीसरे में “दुर्गा रूप” मिलता है। कुछ शाक्त दृष्टियों में ये स्त्री-दिव्यता की एक व्यापक मातृशक्ति के काव्यात्मक नाम हैं। दूसरी ओर कई वैष्णव उपासना-प्रणालियों में लक्ष्मी की विशिष्ट पहचान और विष्णु के साथ उनका संबंध केंद्र में रहता है। आरती की समावेशी भाषा का सम्मान करते हुए भी सभी मतों को एक जैसा बताना ठीक नहीं होगा। किसी लोकभजन की कविता और किसी शास्त्रीय दर्शन के निश्चित सिद्धांत में भेद बनाए रखना चाहिए। लक्ष्मी की प्रतिमाओं में कमल तथा गजलक्ष्मी के रूप में हाथियों का विशेष महत्त्व है। संग्रहालयों के उदाहरण इस परंपरा को स्पष्ट करते हैं। लेकिन चयनित आरती के हर पद में वे चिह्न नहीं आए हैं; इनका उल्लेख सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है, कोई छूटा हुआ श्लोक जोड़ने का प्रयास नहीं। 7

क्षीरसागर, समुद्र-मंथन और चौदह रत्न

सातवाँ पद “क्षीरोदधि-जाता” कहकर लक्ष्मी को क्षीरसागर से प्रकट देवी कहता है। यह समुद्र-मंथन की व्यापक पौराणिक कथा की ओर संकेत है। “रत्न चतुर्दश” उस मंथन से जुड़े चमत्कारी रत्नों की परंपरागत संख्या है। अलग-अलग कथाओं में रत्नों की सूचियाँ एक-सी नहीं; आरती स्वयं सूची नहीं देती। इसलिए किसी एक सूची को इस पद के भीतर डाल देना पाठ की सत्यनिष्ठा के विरुद्ध होगा। इस कथा-संकेत से यह सिद्ध नहीं होता कि पूरी आरती किसी पुराण का शब्दशः अंश है। यह हिंदी का भक्तिगीत है, जबकि समुद्र-मंथन के प्रसंग पुराने संस्कृत आख्यानों में भी मिलते हैं।

पाठ का चयन और वास्तविक पाठभेद

इस संस्करण में Drik Panchang के “लक्ष्मी माता आरती” पृष्ठ के आठ प्रदर्शित पाठ-खंड लिए गए हैं: प्रारंभिक मुखड़ा और उसके बाद सात पद। हर अगले पद के बाद छोटी टेक “ॐ जय लक्ष्मी माता” गायन-संकेत के रूप में दी है। शब्द और क्रम उसी चयनित पाठ के हैं। 1

भिन्न पाठों को समझना आवश्यक है। शुरुआत में कहीं “हरि विष्णु विधाता”, तो कहीं “हर विष्णु धाता” मिलता है। कुछ गायकों की पुस्तकें “ओ मैया” जैसे दोहराव जोड़ती हैं। “भवनिधि की त्राता” का “दाता” पाठ भी मिलता है; वस्त्र वाले पद में दूसरे मुद्रित रूप की रिपोर्ट है। इनमें किसी को चुपके से मिलाकर “मूल प्राचीन पाठ” नहीं बनाया गया। Sanskrit Documents पर स्वतंत्र रूप से उपलब्ध विस्तृत गायन-पाठ तुलना में उपयोगी है। Hari Darshan/Agarwal स्कैन के बारे में रिपोर्ट शोध-संकेत है, पर इस संस्करण के लिए उनके चित्रों का स्वतंत्र परीक्षण पूरा नहीं हुआ। 2 3 4

इस आरती के प्रामाणिक रचनाकार और निश्चित रचना-वर्ष का निर्धारण नहीं हुआ है। “ॐ जय जगदीश हरे” के साथ उन्नीसवीं शताब्दी के श्रद्धाराम फिल्लौरी का नाम जुड़ने से लक्ष्मी-आरती की रचना भी उन्हें दे देना बिना स्वतंत्र प्रमाण के उचित नहीं।

आरती से आज के जीवन में क्या समझें? इस गीत को कृतज्ञता की भक्ति मानकर पढ़ सकते हैं: जीवन के लिए अन्न, वस्त्र, श्रम, सहकार, विश्वास और करुणा चाहिए। “सद्गुण” वाला पद संपन्नता को नैतिक जीवन से जोड़ता है। अंत में पाप क्षय की भाषा आत्मपरीक्षण और आचरण-सुधार का आग्रह बन सकती है; किसी को कष्ट देकर जिम्मेदारी से बच निकलने का उपाय नहीं। धन, सुरक्षा और आनंद की कामनाएँ धार्मिक विश्वास की अभिव्यक्तियाँ हैं। यह लेख इन्हें जाँच से सिद्ध निश्चित आर्थिक, स्वास्थ्य-संबंधी या कानूनी परिणाम नहीं बताता। श्रद्धा का सम्मान और वास्तविक जीवन की जिम्मेदारी साथ-साथ रह सकती है।

आरती कब गाई जाती है? लक्ष्मी आरती घरों और मंदिरों में सामान्य भक्ति के अवसरों पर और दीपावली की लक्ष्मी-पूजा जैसे पर्वों में सुनाई देती है। कुछ परिवार शुक्रवार को भी इसे गाते हैं। स्थानीय और पारिवारिक रीति में विविधता रहती है। यहाँ कोई तय तिथि, प्रदोषकाल, व्रत-पारण अथवा मुहूर्त नहीं दिया गया है; ऐसी जानकारी केवल स्वीकृत, स्थान-सापेक्ष ShivGoraksh Calendar से ही ली जानी चाहिए। 1 4

उच्चारण और दोनों भाषाओं का पाठ

अंग्रेज़ी पृष्ठ पर मूल हिंदी शब्द रोमन अक्षरों में रखे गए हैं, अंग्रेज़ी कविता बनाकर नहीं लिखे गए। जैसे निशिदिन = दिन-रात, शुभदाता = मंगल देने वाली, और उर = हृदय। रोमन हिंदी पढ़ने में सहायक है, हर ध्वनि का शास्त्रीय IAST लिप्यंतरण नहीं। संस्कृत से आए शब्द भी इस गीत की हिंदी काव्यभाषा के अंग हैं। बार-बार आने वाली छोटी टेक स्वयं एक नया स्वतंत्र पद नहीं है। मूल पाठ-अभिलेख में मूल आठ खंडों के स्थायी क्रमांक हैं और प्रत्येक अगले पद से मुखड़े का संदर्भ जुड़ा है।

शब्दार्थ-संग्रह

शब्दसरल अर्थ
आरतीप्रशंसा का गीत और/या दीप-समर्पण की परंपरा
मैयामाता के प्रति स्नेहिल संबोधन
निशिदिनरात-दिन
ऋद्धि–सिद्धिवृद्धि और उपलब्धि/सफलता; प्रसंगानुसार अर्थ बदलते हैं
सद्गुणअच्छे गुण, सदाचरण
भवनिधिसंसार-रूपी सागर का रूपक
क्षीरोदधिपौराणिक क्षीरसागर
उरहृदय, अंतरमन

सामान्य प्रश्न

१. क्या पूरी आरती दी है? हाँ। चयनित ऑनलाइन पाठ-साक्ष्य के पूरे आठ खंड और टेक दिए गए हैं; पुराने मुद्रित पाठ तथा पुनर्प्रकाशन-अधिकार की स्वतंत्र पुष्टि शेष है। २. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर मूल शब्द अंग्रेज़ी अनुवाद में क्यों नहीं हैं? शिवगोरक्ष में दोनों भाषाओं के पाठकों के लिए मूल शब्द समान रखे जाते हैं। अंग्रेज़ी अर्थ अलग दिया जाता है। ३. क्या यह संस्कृत मंत्र या वैदिक सूक्त है? नहीं। यह हिंदी आरती है। श्रीसूक्त अलग ग्रंथ-पाठ है। ४. क्या इसे गाने से धन निश्चित मिलता है? नहीं। आरती की भाषा श्रद्धा और आशा प्रकट करती है, भौतिक फल की गारंटी नहीं। ५. लक्ष्मी आरती में उमा और दुर्गा क्यों हैं? कुछ देवीभक्ति परंपराओं में स्त्री-दिव्यता के रूपों का समावेश होता है; अलग परंपराएँ देवियों में भेद भी करती हैं। ६. क्या सभी संस्करणों के शब्द एक-से हैं? नहीं। गायन-दोहराव, वर्तनी और कुछ पंक्तियों में पाठभेद मिलते हैं। यहाँ एक ही साक्ष्य चुना गया है। ७. आरती किसने लिखी? उपलब्ध प्रमाणों से प्रामाणिक रचनाकार और निश्चित वर्ष स्थापित नहीं हुए हैं। **८. पाठ-मिलान, स्रोत-अधिकार और विशेषज्ञ संपादन की स्वतंत्र मंज़ूरी बाकी है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

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पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    Om Jai Lakshmi Mata, Maiya Jai Lakshmi Mata. Tumko Nishidin Sevat, Hari Vishnu Vidhata.

  2. 2

    Uma, Rama, Brahmani, Tum Hi Jag-Mata. Surya-Chandrama Dhyavat, Narad Rishi Gaata.

  3. 3

    Durga Roop Niranjani, Sukh Sampatti Daata. Jo Koi Tumko Dhyavat, Riddhi-Siddhi Dhan Paata.

  4. 4

    Tum Pataal-Nivasini, Tum Hi Shubhdaata. Karma-Prabhaav-Prakaashini, Bhav-Nidhi Ki Traata.

  5. 5

    Jis Ghar Mein Tum Rehtin, Sab Sadgun Aata. Sab Sambhav Ho Jaata, Man Nahin Ghabraata.

  6. 6

    Tum Bin Yagya Na Hote, Vastra Na Koi Paata. Khaan-Paan Ka Vaibhav, Sab Tumse Aata.

  7. 7

    Shubh-Gun Mandir Sundar, Kshirodadhi-Jaata. Ratna Chaudah Tum Bin, Koi Nahin Paata.

  8. 8

    Mahalakshmi Ji Ki Aarti, Jo Koi Jan Gaata. Ur Aanand Samaata, Paap Utar Jaata.

स्रोत, श्रेय और संपादकीय स्थिति

आधार-पाठ: Drik Panchang का “लक्ष्मी माता आरती”, आठ खंड। तुलना: Sanskrit Documents तथा अन्य पाठभेद-रिपोर्ट। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम की कलावस्तु प्रविष्टियाँ। प्रत्येक स्रोत का URL, सत्यापन-सीमा तथा अधिकार-स्थिति स्रोत-सूची में दी गई है। 1 2 3 5 6 7

  1. Lakshmi Mata Aarti — ॥ आरती श्री लक्ष्मी जी ॥ · स्रोत खोलें
  2. Arati Sangrah — Om Jai Lakshmi Mata · स्रोत खोलें
  3. Om Jai Laxmi Mata Aarti Lyrics in Hindi & English · स्रोत खोलें
  4. Om Jai Lakshmi Mata — Lyrics & Meaning · स्रोत खोलें
  5. Lakshmi, Goddess of Prosperity · स्रोत खोलें
  6. Vishnu Accompanied by Lakshmi and Sarasvati · स्रोत खोलें
  7. Gajalakshmi · स्रोत खोलें
  8. Large print guide — Room 68 Money · स्रोत खोलें
  9. Additional reusable textual witness (comparison, not a replacement edition) · स्रोत खोलें