संस्करण-सूचना: आठ मूल श्लोक और अलग फलश्रुति १९१२ के बृहत्स्तोत्ररत्नाकर से सम्बद्ध चयनित पाठ का अनुसरण करते हैं। पूरा कार्यकारी पाठ दिया गया है; मूल पृष्ठ-चित्र मिलान, विशेषज्ञ समीक्षा और पुनर्प्रकाशन अनुमति अभी लंबित हैं। 1 2
फलश्रुति
अर्थ: समापन फलश्रुति कहती है कि शिव की सन्निधि में इस पुण्य अष्टक का पाठ करने वाला शिवलोक पाता है और शिव के साथ आनन्द करता है। व्याख्या: यह फलश्रुति आठ मुख्य स्तुतिश्लोकों से अलग है; इसके कारण ‘अष्टकम्’ नौ श्लोकों वाला अष्टक नहीं हो जाता। शिवलोक का फल ग्रन्थ की आस्थामूलक वाणी है, जिसे वैज्ञानिक या सार्वभौमिक निश्चितता के रूप में न प्रस्तुत करें। ‘शिवसन्निधौ’ पाठ का शब्द है; इससे कोई समय, शुल्क या अनिवार्य संख्या नहीं गढ़ी गई। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
समापन-पंक्ति
अर्थ: यहाँ श्रीलिङ्गाष्टकस्तोत्र का समापन होता है। व्याख्या: यह ग्रन्थ-समापन की पंक्ति है; न दसवाँ श्लोक है, न पृथक मन्त्र। इसका मुद्रित स्थान प्रतिलिपि-विवरण से जाना गया है; मूल स्कैन के साथ स्वतंत्र मिलान अभी आवश्यक है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
लिङ्गाष्टकम् क्या है? लिङ्गाष्टकम् शिवलिङ्ग की स्तुति में रचित आठ संस्कृत श्लोकों का स्तोत्र है। प्रत्येक मूल पद का समापन ‘तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्’ से होता है—अर्थात् ‘उस सदाशिवलिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ।’ इसमें सुगन्ध, चन्दन, पुष्प और अलंकार जैसी प्रत्यक्ष पूजा-छवियों के साथ शिव को परम कारण और परात्पर सत्ता भी कहा गया है। आठ श्लोकों के बाद अलग फलश्रुति आती है; उसे अष्टक का नौवाँ मुख्य स्तुति-पद नहीं गिनना चाहिए। 1 2
शिवलिङ्ग की स्तुति का अर्थ
‘लिङ्ग’ का एक अर्थ चिह्न या संकेत भी है। शैव उपासना में यह शिव की ऐसी मूर्ति है जो हर बार मानवीय आकृति में नहीं होती। लिङ्ग की ऐतिहासिक रूप-परम्परा भी विविध है: ब्रिटिश म्यूज़ियम में लिङ्ग, योनि-आधार और नाग सहित उदाहरण है; मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम के सातवीं शताब्दी के कश्मीर-सम्बद्ध उदाहरण में लिङ्ग से शिव का मुख निकलता है। इसलिए लिङ्ग के पुरातात्त्विक, सृजनात्मक और दार्शनिक अर्थों को एक-दूसरे का खण्डन मानना सही नहीं। 5 6
यह स्तोत्र लिङ्ग और योनि की विस्तृत तन्त्रशास्त्रीय विवेचना नहीं देता। अलग-अलग शैव परम्पराएँ अपने दार्शनिक सिद्धान्तों को भिन्न ढंग से कह सकती हैं।
स्तोत्र में आने वाले पौराणिक संकेत
दूसरे श्लोक में कामदेव का दहन और रावण का दर्पनाश स्मरण किया गया है। एक ओर कामनाओं पर विवेकपूर्ण संयम, दूसरी ओर शक्ति के साथ विनय—ये दो प्रमुख भाव हैं। चौथा श्लोक दक्ष-यज्ञ के प्रसंग की याद दिलाता है, जो सती-शिव की अनेक पौराणिक कथाओं में मिलता है। स्तोत्र की छोटी पंक्तियों को किसी एक संस्करण की पूरी ऐतिहासिक घटना मानकर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। 2
शिव के अनन्त अग्निस्तम्भ की कथा में ब्रह्मा और विष्णु छोर नहीं खोज पाते; शिव स्वयं प्रकट होते हैं। मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम के लिङ्गोद्भव शिल्प में इस पुराण-आगम-सम्बद्ध कथानक का अंकन मिलता है। इससे शिवलिङ्ग की अनन्तता-संबंधी व्याख्या समझने में सहायता मिलती है, किन्तु लिङ्गाष्टकम् के आठ पद स्वयं पूरी लिङ्गोद्भव कथा नहीं सुनाते। 4
बाहरी अलंकरण से भीतर के भाव तक
तीसरे से पाँचवें श्लोक तक सुगन्ध, रत्न, नाग, कुमकुम, चन्दन और कमल की छवियाँ आती हैं। छठे में भाव और भक्ति, सातवें में समस्त उत्पत्ति का कारण, तथा आठवें में परात्पर, परमात्मक जैसे शब्द प्रमुख हो जाते हैं। इस क्रम को पढ़ते हुए बाह्य रूप और निराकार अर्थ का मेल देखा जा सकता है। यह पाठक की एक विवेचनात्मक दृष्टि है, कोई ऐसी बाध्यकारी व्याख्या नहीं जिसे हर शैव परम्परा समान रूप से स्वीकार करे। 1 5
मूल स्रोत, पाठभेद और रचयिता
इस संस्करण का पाठ-आधार निर्णयसागर प्रेस का १९१२ का बृहत्स्तोत्ररत्नाकर, क्रमांक ४९, मुद्रित पृष्ठ ११९ है। उसके पाठ का एक आधुनिक, मुद्रित-पृष्ठ-विशिष्ट मिलान उपलब्ध है; उसी के आधार पर आठ पद, फलश्रुति और समापन-पंक्ति रखी गई हैं। मैंने मुद्रित स्कैन का पुस्तक-सूची विवरण देखा और दूसरे पाठों से तुलना की है, किन्तु इस सत्र में उस मूल पृष्ठ-चित्र से हर पंक्ति का स्वतंत्र मिलान नहीं किया। अतः यह पूरा कार्यकारी पाठ है, अभी स्वीकृत आलोचनात्मक संस्करण नहीं। 1 2
प्रमुख भेद हैं—पहले श्लोक में भाषित / भासित, दूसरे में कामदहं / कामदहन, सातवें में विनाशित / विनाशन, तथा आठवें में पद-विन्यास और वर्तनी। अनेक आधुनिक वेबसाइटें रचयिता के रूप में आदि शङ्कराचार्य का नाम देती हैं, पर चुने गए मुद्रित स्रोत में प्रमाणित लेखक का उल्लेख नहीं मिला। परम्परागत श्रेय और ऐतिहासिक लेखकीय प्रमाण को अलग रखना आवश्यक है। 2 3
पुराना संस्कृत काव्य, ऐतिहासिक स्कैन और आधुनिक स्वयंसेवकों की प्रतिलिपि—इनकी उपयोग-अनुमतियाँ एक जैसी नहीं होतीं। संस्कृत डॉक्युमेंट्स अपनी प्रतिलिपियों को वेबसाइट-प्रचार के लिए बिना अनुमति पुनः प्रकाशित करने से रोकता है। इसलिए उसकी प्रति केवल तुलना में देखी गई; यहाँ अपना अनुवाद और विवेचन लिखा गया है। अन्तिम वैधानिक समीक्षा अभी बाकी है। 1 7
भक्ति का महत्त्व और सीमाएँ
इस स्तोत्र में प्रणाम, विनय और शिव के व्यापक स्वरूप पर मनन प्रमुख हैं। फलश्रुति का शिवलोक सम्बन्धी कथन आस्था की अभिव्यक्ति है, इसे स्वास्थ्य, सम्पत्ति या मुक्ति की सुनिश्चित गारंटी न बनाया जाए। सामग्री केवल शैक्षिक पाठक-अनुभव के लिए है; किसी दीक्षा, गुप्त साधना, अभिषेक-विधि, जाप संख्या या तिथि-निर्धारण के निर्देश यहाँ नहीं दिए गए।
प्रमुख शब्द
| पद | सरल अर्थ |
|---|---|
| लिङ्ग | चिह्न, संकेत तथा शिव की पूज्य प्रतीक-मूर्ति |
| अष्टकम् | आठ मुख्य स्तुति-श्लोकों वाला काव्य |
| सदाशिव | शिव का मंगलमय नाम या स्वरूप; अर्थ परम्परानुसार बदल सकता है |
| मुरारि | विष्णु/कृष्ण का नाम |
| काम | इच्छा; दूसरे पद में कामदेव-संबंधी कथा का संकेत |
| भाव | भीतर की श्रद्धा और मनोभाव |
| परात्पर | सबसे ऊँचे से भी परे |
| फलश्रुति | स्तोत्र के फल का परम्परागत समापन-वचन |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
१. लिङ्गाष्टकम् में कितने श्लोक हैं? आठ मुख्य श्लोक हैं; अलग फलश्रुति और समापन-पंक्ति भी इस पाठ में दी गई हैं। २. क्या फलश्रुति नौवाँ मूल श्लोक है? नहीं। कुछ संस्करण सुविधा से उसे नौ क्रमांक देते हैं, लेकिन अष्टक की मूल स्तुति आठ पदों की है। ३. इसके रचयिता कौन हैं? कुछ लोकप्रिय परम्पराएँ आदि शङ्कराचार्य का नाम देती हैं; चुने गए संस्करण में प्रमाणित ऐतिहासिक लेखकीय सूचना नहीं मिली। ४. ‘तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्’ का अर्थ? ‘उस सदाशिवलिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ।’
५. पहले श्लोक में भाषित और भासित दोनों क्यों मिलते हैं? भाषित में वाणी का अर्थ, भासित में चमक या प्रकाश का अर्थ प्रमुख है। ये अलग पाठभेद हैं। ६. क्या यह स्तोत्र कोई पूजा-विधि बताता है? इसमें भक्ति और शिवसन्निधि का उल्लेख है; विस्तृत विधि-विधान नहीं। ७. ‘अष्टदरिद्र’ की कौन-सी आठ अवस्थाएँ हैं? श्लोक आठ नामों की सूची नहीं देता। दूसरी किसी सूची को जोड़ने से पहले उसका अलग प्रमाण चाहिए। ८. क्या पाठ से फल निश्चित मिलता है? फलश्रुति श्रद्धा का कथन है, किसी परिणाम की वस्तुनिष्ठ गारंटी नहीं।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
श्लोक 1
अर्थ: मैं उस सदाशिव-लिङ्ग को प्रणाम करता हूँ जिसकी ब्रह्मा, मुरारि अर्थात् विष्णु और देवता आराधना करते हैं; जो निर्मल वाणी से शोभित है और जन्मजन्य दुःख के निवारण का प्रतीक है। व्याख्या: इस मुद्रित पाठ में भाषित शब्द है, जिसका सम्बन्ध वाणी या कथन से है; प्रचलित भासित में प्रकाश का भाव आता है। दोनों को बिना बताए बदलना उचित नहीं। ‘जन्मज दुःख’ मानव जीवन की नश्वरता और आवागमन की पीड़ा का भक्तिपरक संकेत है; इसे रोग मिटने की चिकित्सकीय गारंटी न समझें। ब्रह्मा-विष्णु का उल्लेख शिव-आराधना के भीतर व्यापक देवसम्बन्ध दिखाता है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
श्लोक 2
अर्थ: श्रेष्ठ देवों और मुनियों से पूजित, काम के दहन और करुणा के स्रोत के रूप में स्मरणीय तथा रावण के अहंकार को शान्त करने वाले सदाशिव-लिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ। व्याख्या: यहाँ शिव के उग्र और करुणामय रूप साथ आते हैं—वे अनियंत्रित कामना का दमन करते हुए भी ‘करुणाकर’ हैं। कामदेव और रावण के प्रसंग शैव पौराणिक कथाओं के रूप में समझने चाहिए। रावण अत्यन्त बलवान होने पर भी अहंकार से मुक्त नहीं था; यही यहाँ का नैतिक संकेत है। मुद्रित कामदहं को दूसरे पाठ के कामदहन से चुपचाप नहीं बदला गया है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
श्लोक 3
अर्थ: सुगन्धित लेप से सुशोभित, बुद्धि की वृद्धि से सम्बद्ध और सिद्धों, देवों तथा असुरों से वन्दित शिवलिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ। व्याख्या: सुगन्धित लेप पूजा की स्नेहपूर्ण छवि है; यहाँ कोई अनिवार्य विधि या सामग्री-सूची नहीं दी जा रही। ‘बुद्धिविवर्धन’ भक्ति के साथ विवेक, विनय और समझ के विकास का आदर्श रखता है। सिद्ध, देव और असुर—तीनों के एक ही लिङ्ग को वन्दन करने की छवि आराध्य की व्यापकता दर्शाती है। सर्वसुगन्धि जैसे मुद्रित पाठ को अलग शब्द-विभाजन वाले संस्करण से अलग रखा गया है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
श्लोक 4
अर्थ: स्वर्ण और बहुमूल्य मणियों से अलंकृत, नागराज से शोभित तथा दक्ष के यज्ञ-विनाश के प्रसंग से सम्बद्ध शिवलिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ। व्याख्या: सोना-मणि और नागराज का साथ आना सौन्दर्य तथा भयातीतता के अलग प्रतीकों को जोड़ता है। दक्ष-यज्ञ की कथा में केवल यज्ञ का विनाश नहीं, बल्कि अहंकार और अनादर की आलोचना भी पढ़ी जाती है, विशेषकर सती-शिव की परम्पराओं में। इसे वास्तविक पूजा को हानि पहुँचाने का निर्देश न समझें। विभिन्न पुराणों के विवरण अलग हैं; एक पद के आधार पर कोई एक कथा सार्वभौम नहीं कही जा सकती। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
श्लोक 5
अर्थ: कुमकुम और चन्दन से लेपित, कमलमालाओं से शोभित तथा संचित पापों के शमन की आशा जगाने वाले शिवलिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ। व्याख्या: चन्दन, कमल और कुमकुम क्रमशः शीतलता, पवित्रता और मांगल्य जैसे अर्थ जगा सकते हैं। ‘सञ्चित पाप’ पहले किए कर्मों के नैतिक भार की ओर संकेत करता है। शिवस्मरण का अर्थ आत्मपरीक्षण और व्यवहार-सुधार का प्रेरक बन सकता है। यह भक्ति का कथन है; किसी हानिकारक कर्म के सामाजिक या कानूनी परिणाम से स्वतः मुक्ति का वादा नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
श्लोक 6
अर्थ: देवगणों द्वारा पूजित-सेवित, सच्चे भाव और भक्ति से ग्रहणीय तथा असंख्य सूर्यों जैसी आभा वाला सदाशिव-लिङ्ग मेरा प्रणाम स्वीकारे। व्याख्या: यह पद बाहरी पूजन से मन के ‘भाव’ की ओर ध्यान मोड़ता है। करोड़ों सूर्यों की उपमा महिमा का काव्यमय विस्तार है, कोई वैज्ञानिक प्रकाश-मापन नहीं। भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् जैसे कुछ असहज लगने वाले पद को मूल पाठ के सम्मान में यथावत् रखा गया है। भावनिष्ठ भक्ति की स्तुति को किसी गोपनीय दीक्षा-विधि का आदेश नहीं बनाया गया है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
श्लोक 7
अर्थ: आठ दलों से परिवेष्टित, समस्त उत्पत्ति का कारण माने गए तथा आठ प्रकार की दरिद्रता के निवारण से सम्बद्ध शिवलिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ। व्याख्या: आठ दलों का संकेत प्रतीकात्मक अथवा मूर्तिकला की रचना से जुड़ सकता है, किन्तु स्तोत्र स्वयं कोई पूर्ण यन्त्र-विधान नहीं बताता। समस्त उत्पत्ति का कारण कहना दार्शनिक-धार्मिक दृष्टि है। १९१२ के पाठ में विनाशित, अन्य पाठों में विनाशन मिलता है; यह अन्तर स्पष्ट रखा गया है। स्तोत्र ‘आठ दरिद्रताओं’ की सूची नहीं देता, अतः मन से कोई निश्चित सूची जोड़ना उचित नहीं। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3
श्लोक 8
अर्थ: देवगुरु और श्रेष्ठ देवताओं से पूजित, दिव्य वन-पुष्पों से अर्चित, परात्पर और परमात्मस्वरूप सदाशिव-लिङ्ग को मैं प्रणाम करता हूँ। व्याख्या: समापन में पुष्प और देवपूजन जैसी ठोस छवियों से ‘परात्पर’ तथा ‘परमात्मक’ जैसे दार्शनिक पद आते हैं। लिङ्ग केवल कथाओं का स्मारक नहीं, परम सत्ता पर ध्यान का केन्द्र भी बनता है। फिर भी शैवसिद्धान्त और कश्मीर के अद्वैत शैव दर्शनों का तत्त्वचिन्तन सर्वथा एक नहीं है। परमात्मक के पाठ और उसके शब्द-विभाजन को अन्य प्रतियों से अलग दर्ज किया गया है। सम्बन्धित पाठ · 1 2 3