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स्तोत्र

श्रीकालभैरवाष्टकम्

काशीपति कालभैरव की आठ श्लोकों वाली स्तुति; फलश्रुति अलग और मुद्रित पाठभेद स्पष्ट।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

श्रीगणेशाय नमः ॥

अर्थ

आरम्भ में श्रीगणेश के प्रति नमस्कार।

व्याख्या

चुने हुए मुद्रित ग्रन्थ में यह मंगलाचरण क्रमांकित स्तोत्र से पहले आता है। यह स्वतंत्र श्लोक नहीं है। इसे रखने का अर्थ यह नहीं कि मूल रचना के सबसे पुराने रूप में भी यही आरम्भ था।

1

देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् । नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १ ॥

अर्थ

मैं काशी के अधिपति कालभैरव की स्तुति करता हूँ। देवराज भी जिनके पावन चरणकमलों की वन्दना करते हैं; जो सर्प को यज्ञोपवीत की भाँति धारण करते, चन्द्रमा को मस्तक पर रखते और करुणामय कहे जाते हैं; नारद तथा योगी जिनको प्रणाम करते हैं और जो दिगम्बर कहलाते हैं।

व्याख्या

प्रथम पद में उग्र प्रतीकों के साथ दयालु रूप भी है। सर्प-यज्ञोपवीत विरक्त शिव-परम्परा की प्रतीकात्मक छवि है, पहनावे का निर्देश नहीं। ‘दिगम्बर’ का शाब्दिक आशय दिशाओं को वस्त्र मानना है; इसे सामान्य सामाजिक अलंकारों से परे स्वरूप के रूप में समझ सकते हैं। ‘काशिकापुराधिनाथ’ की आवृत्ति पूरे अष्टक का भाव-केंद्र है।

2

भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् । कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २ ॥

अर्थ

मैं काशीपति कालभैरव का भजन करता हूँ—जो असंख्य सूर्यों के समान प्रकाशमान, संसार-सागर से पार ले जाने वाले, परम, नीलकण्ठ, त्रिनेत्र और अभिलषित प्रयोजन देने वाले हैं; जो काल के भी काल, कमलनयन, ‘अक्षशूल’ पद से वर्णित तथा अविनाशी हैं।

व्याख्या

‘भवाब्धि’ जीवन की बन्धनकारी आवृत्तियों का रूपक है; उससे पार लगना मुक्ति का संकेत है। ‘कालकाल’ कहने का अर्थ है—काल भी जिनकी सीमा में आता है। ‘अक्षशूल’ का अर्थ निश्चित करके प्रस्तुत नहीं किया गया; आसपास आयुध का प्रसंग है, पर इस समास का शुद्ध व्याकरणिक अर्थ विशेषज्ञ से जँचना बाकी है।

3

शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् । भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३ ॥

अर्थ

मैं काशी के कालभैरव की वन्दना करता हूँ। उनके हाथों में शूल, टङ्क (कुल्हाड़ी जैसे आयुध), पाश और दण्ड का वर्णन है। वे आदिकारण, श्यामवर्ण, आदिदेव, अक्षर और निरामय हैं; उनका पराक्रम प्रचण्ड है और वे अद्भुत ताण्डव के प्रिय हैं।

व्याख्या

यहाँ आयुध शक्ति, संयम और अनुशासन के प्रतीक हैं; पाठक को किसी आयुध का प्रयोग सिखाने की बात नहीं है। ‘आदिकारण’ शब्द बताता है कि स्तुति केवल रूप का वर्णन नहीं कर रही, सृष्टि के आधार की भी कल्पना करती है। ताण्डव को दिव्य गति और सृजन-विनाश की लय के रूप में समझा जा सकता है।

4

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् । विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ४ ॥

अर्थ

मैं काशी के कालभैरव को नमस्कार करता हूँ। वे भुक्ति और मुक्ति दोनों के दाता कहे गए हैं, मनोहर रूप वाले, भक्तवत्सल, स्थिर और समस्त लोकों में व्यापक रूप वाले हैं; उनकी कटि पर मनोहर स्वर्णकिंकिणियों की झंकार का वर्णन है।

व्याख्या

‘भुक्ति’ सांसारिक उपभोग और ‘मुक्ति’ आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर संकेत करती है। मुद्रित पाठ में ‘स्थितं’ मिलता है; अन्य पाठों में ‘स्थिरं’ है। यहाँ ‘विनिक्वणन्’ को छन्द की दृष्टि से असहज होते हुए भी मूल छपी प्रति के सम्मान में रखा गया है। ‘निक्वणन्’ एक अन्य प्रचलित, छन्दानुकूल पाठ है।

5

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम् । स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५ ॥

अर्थ

मैं काशीपति कालभैरव का भजन करता हूँ। वे धर्मरूपी सेतु की रक्षा करने वाले और अधर्म-पथ को रोकने वाले, कर्म-बन्धन से छुड़ाने वाले, कल्याण देने वाले और सर्वव्यापक हैं। इस पाठ में उनके अंग स्वर्णवर्ण शेषनाग के पाश से सुशोभित बताए गए हैं।

व्याख्या

‘धर्मसेतु’ नैतिक आचरण की रक्षा का रूपक है। ‘कर्मपाश’ कर्मों से उत्पन्न बन्धन का चित्र है; उसका मोचन मुक्ति की भाषा में समझा जाता है। चयनित १९१२ पाठ में ‘शेषपाश’ यानी नागपाश-सदृश आभूषण है, जबकि अन्य पाठों में ‘केशपाश’ मिलता है। दोनों को मिलाकर नया समास नहीं बनाया गया है।

6

रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम् । मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६ ॥

अर्थ

मैं काशी के कालभैरव की वन्दना करता हूँ। रत्नजटित पादुकाओं से उनके चरण शोभित हैं; वे नित्य, अद्वितीय, इष्टदेव और निर्मल हैं। वे मृत्यु का गर्व हरते हैं; ‘करालदंष्ट्रमोक्षणं’ में उनकी उग्र दाढ़ों तथा मोचन की छवि आती है, पर उसका सूक्ष्म अर्थ अभी विचारणीय है।

व्याख्या

रत्नपादुकाएँ ऐश्वर्य का संकेत देती हैं, ‘अद्वितीय’ अनन्यता का और दंष्ट्राएँ उग्र रूप का। ‘करालदंष्ट्रमोक्षणं’ की व्याख्या में व्याकरणिक कठिनाई है; केवल अर्थ को सरल करने के लिए किसी आधुनिक पाठ का ‘करालदंष्ट्रभूषणं’ यहाँ चुपचाप नहीं रखा गया।

7

अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसन्ततिं दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम् । अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकन्धरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७ ॥

अर्थ

मैं काशी के कालभैरव का भजन करता हूँ। उनके अट्टहास से पद्मज अर्थात् ब्रह्मा से जुड़े ब्रह्माण्डों के आवरण भी टूटते हैं, उनकी दृष्टि पाप-जाल को मिटाने वाली कही गई है, उनका शासन कठोर है; वे अष्टसिद्धियों के दाता और कपालमाला धारण करने वाले कहे गए हैं।

व्याख्या

ब्रह्माण्ड का आवरण फाड़ देने वाला अट्टहास काव्य में परिमित सृष्टि से परे सत्ता दर्शाता है; यह खगोल-विज्ञान का दावा नहीं है। ‘अष्टसिद्धि’ स्तोत्र की परम्परागत स्तुति है, पाठ करने पर सिद्धि मिलने की गारंटी नहीं। यहाँ ‘कपालमालिकन्धरं’ है, जबकि अन्य पाठ में ‘कपालमालिकाधरं’ मिलता है।

8

भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् । नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८ ॥

अर्थ

मैं काशी के कालभैरव का भजन करता हूँ—जो भूतगणों के अधिपति, कीर्ति के दाता, काशी के निवासियों के पुण्य-पाप का शोधन करने वाले, विभु, नीति-पथ के ज्ञाता, पुरातन और जगत्पति कहे गए हैं।

व्याख्या

‘भूत’ यहाँ केवल लोककथाओं के प्रेत नहीं, शिवगणों जैसे अनुचर समूहों की ओर भी संकेत कर सकता है। काशी वास्तविक तीर्थनगरी है और स्तोत्र का आध्यात्मिक परिवेश भी। ‘नीतिमार्ग’ बताता है कि उग्र रूप के साथ धर्म-विवेक की कल्पना जुड़ी है। पुण्य-पाप का शोधन धार्मिक विश्वास के रूप में समझना चाहिए।

9
विषय-सूची पर लौटें

कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् । शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम् ॥ ९ ॥

अर्थ

समापन की फलश्रुति कहती है कि इस मनोहर कालभैरवाष्टक का पाठ करने वाले, जिसे ज्ञान-मुक्ति का साधन, विविध पुण्य की वृद्धि और शोक, मोह, दैन्य, लोभ, क्रोध तथा ताप का नाश करने वाला बताया गया है, कालभैरव के चरणों की सन्निधि पाते हैं।

व्याख्या

यह फलश्रुति है, अर्थात् पाठ से जुड़े धार्मिक फल का साहित्यिक वर्णन। इसे वैज्ञानिक रूप से सिद्ध परिणाम या निश्चित पाठ-संख्या के निर्देश की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। इस मुद्रित प्रति में यह श्लोक ‘९’ है, किन्तु आठ स्तुति-श्लोकों से अलग समापन है।

11
विषय-सूची पर लौटें

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

अर्थ

इस मुद्रित समापन-वाक्य के अनुसार श्रीशङ्कराचार्य-विरचित कालभैरवाष्टक यहाँ समाप्त होता है।

व्याख्या

यह मुद्रित ग्रन्थ की रचनाकार-सूचना है, ऐतिहासिक शङ्कराचार्य की लेखकीयता का स्वतंत्र प्रमाण नहीं। शिवरहस्य में एक भिन्न पाठ मिलता है; दोनों पाठों को बिना सूचना मिलाना अनुचित है।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-सूचना: १९१२ के बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (मुद्रित पृष्ठ १२७–१२८; स्कैन चित्र १३५–१३६) के आठ मूल स्तुति-श्लोक, आरम्भिक मंगलाचरण, पृथक् फलश्रुति और समापन-वाक्य प्रस्तुत हैं। वर्तनी का मानकीकरण किया गया है तथा मुद्रित संक्षिप्त आवृत्ति को प्रथम पूर्ण आवृत्ति के आधार पर खोला गया है। विशेषज्ञ और प्रकाशन-समीक्षा अभी शेष है। 1 7

आरम्भिक मंगलाचरण

भावार्थ। आरम्भ में श्रीगणेश के प्रति नमस्कार। व्याख्या। चुने हुए मुद्रित ग्रन्थ में यह मंगलाचरण क्रमांकित स्तोत्र से पहले आता है। यह स्वतंत्र श्लोक नहीं है। इसे रखने का अर्थ यह नहीं कि मूल रचना के सबसे पुराने रूप में भी यही आरम्भ था।

फलश्रुति — मुद्रित श्लोक ९ · phalashruti-001

भावार्थ। समापन की फलश्रुति कहती है कि इस मनोहर कालभैरवाष्टक का पाठ करने वाले, जिसे ज्ञान-मुक्ति का साधन, विविध पुण्य की वृद्धि और शोक, मोह, दैन्य, लोभ, क्रोध तथा ताप का नाश करने वाला बताया गया है, कालभैरव के चरणों की सन्निधि पाते हैं। व्याख्या। यह फलश्रुति है, अर्थात् पाठ से जुड़े धार्मिक फल का साहित्यिक वर्णन। इसे वैज्ञानिक रूप से सिद्ध परिणाम या निश्चित पाठ-संख्या के निर्देश की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। इस मुद्रित प्रति में यह श्लोक ‘९’ है, किन्तु आठ स्तुति-श्लोकों से अलग समापन है।

मुद्रित समापन-वाक्य

भावार्थ। इस मुद्रित समापन-वाक्य के अनुसार श्रीशङ्कराचार्य-विरचित कालभैरवाष्टक यहाँ समाप्त होता है। व्याख्या। यह मुद्रित ग्रन्थ की रचनाकार-सूचना है, ऐतिहासिक शङ्कराचार्य की लेखकीयता का स्वतंत्र प्रमाण नहीं। शिवरहस्य में एक भिन्न पाठ मिलता है; दोनों पाठों को बिना सूचना मिलाना अनुचित है।

कालभैरवाष्टकम् क्या है?

‘अष्टक’ वह स्तोत्र है जिसमें आठ प्रधान श्लोक हों। यह रचना काशी (वाराणसी) के अधिपति कालभैरव की स्तुति करती है। प्रत्येक मूल श्लोक का अंत ‘काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे’ से होता है—अर्थात् ‘मैं काशीपुरी के स्वामी कालभैरव का भजन करता हूँ।’ लंबे समासों और अनेक रूपकों के बीच यह दोहराया गया वाक्य पाठक को मूल भाव से जोड़े रखता है। 1

कालभैरव के रूप में उग्रता अवश्य है, लेकिन इस अष्टक का भाव भय फैलाना नहीं है। प्रथम श्लोक में करुणा, पाँचवें में धर्मरक्षा और आठवें में नीति की कुशलता का उल्लेख है। सर्प, शूल, दंष्ट्राएँ और कपालमाला जैसे बिंब बाहरी रूप की सूची भर नहीं, बल्कि मृत्यु, समय, बन्धन, अनुशासन और उनसे परे जाने की धार्मिक कल्पनाएँ हैं। ये प्रतीक पाठक को स्वयं अस्त्र उठाने या कोई निषिद्ध साधना करने को नहीं कहते।

काशी, काल और भैरव का स्वरूप

‘काल’ से समय तथा मृत्यु दोनों भाव लिए जा सकते हैं। ‘कालकाल’—काल के भी काल—भगवान को मृत्यु और समय की सीमाओं से परे रूप में प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ शरीर के अमर हो जाने का सत्यापनीय वादा नहीं है। ‘काशी’ एक ऐतिहासिक तीर्थनगरी भी है और स्तोत्र में आध्यात्मिक मुक्ति की प्रतीक-भूमि भी। नीलकण्ठ, त्रिलोचन, चन्द्रशेखर तथा ताण्डव के संकेत भैरव की शिव-सम्बद्धता दिखाते हैं, फिर भी इस पाठ में भैरव का विशिष्ट स्वरूप स्पष्ट बना रहता है। यहाँ अनेक विरोधाभासी दिखने वाले गुण साथ आते हैं—सुन्दर स्वरूप और विकराल दंष्ट्राएँ, करुणा और उग्र शासन, भुक्ति और मुक्ति, रत्नपादुका तथा कपालमाला। यही स्तोत्र की साहित्यिक विशेषता है। ‘कर्मपाश’ बन्धन का और ‘धर्मसेतु’ नैतिक मर्यादा का दृश्य रूपक है। इनका विवेचन जीवन के निर्णयों और अस्थिरता पर विचार करने में मदद करता है, बिना किसी अनुष्ठान का दावा किए।

१९१२ का चुना हुआ पाठ और अन्य पाठों में अंतर

इस अंक का आधार १९१२ में प्रकाशित बृहत्स्तोत्ररत्नाकर के क्रमांक ५७ का मुद्रित पाठ है। चित्र १३५–१३६, पुस्तक के मुद्रित पृष्ठ १२७–१२८ हैं। छपी प्रति के प्रथम श्लोक में पूरा आवर्त ‘काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे’ है, लेकिन बाद में जगह बचाने के लिए ‘काशिका०’ छापा गया है। पाठक-सुविधा के लिए हमने वही प्रमाणित आवर्तन आगे भी पूरा दिखाया है; यह संपादकीय विस्तार है, पुरानी पुस्तक में हर बार अक्षरशः छपी पंक्ति नहीं। ‘अंघ्रि’ और ‘दिगंबर’ जैसी पुरानी मुद्रण-वर्तनियों को ‘अङ्घ्रि’ और ‘दिगम्बर’ जैसे मानक रूप में दिखाया गया है। 1

एक १९१०-सम्बद्ध तुलना-पाठ में प्रथम श्लोक का ‘बिन्दु’ मिलता है, जबकि इस मुद्रित प्रति में ‘इन्दु’ है। चौथे श्लोक में ‘स्थितं/स्थिरं’, ‘विनिक्वणन्/निक्वणन्’, पाँचवें में ‘शेषपाश/केशपाश’, सातवें में ‘कपालमालिकन्धरं/कपालमालिकाधरं’ जैसे भेद हैं। अर्थ बदलने वाले पाठभेदों को छिपाया नहीं गया है। शिवरहस्य के महादेवाख्य एकादशांश, अध्याय ३४, श्लोक ५३–६१ में एक भिन्न विन्यास और अलग फलश्रुति का पाठ भी है; उसे इस १९१२ की रचना में मिलाया नहीं गया। 1 3 5

रचनाकार का नाम: परम्परा और इतिहास

इस ग्रन्थ के अंतिम वाक्य में स्तोत्र को शङ्कराचार्यविरचितम् कहा गया है। यह परम्परा में प्रचलित रचनाकार-संबंध को प्रमाणित करता है, लेकिन ऐतिहासिक आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचना किए जाने का स्वतंत्र निष्कर्ष इससे नहीं निकलता। तुलना के लिए उपलब्ध दूसरे स्तोत्र-संकलन में भी शङ्कराचार्य-नाम आता है। दूसरी ओर शिवरहस्य में मिलते-जुलते पद शिव-पार्वती संवाद के प्रसंग में आते हैं और उनके पाठ में वास्तविक अंतर है। साहित्यिक प्रमाण और ऐतिहासिक लेखकीयता को अलग रखना आवश्यक है। 1 3 5

फलश्रुति और कालाष्टमी का प्रसंग

अष्टक के बाद दिया गया नौवाँ श्लोक फलश्रुति है—पाठ के साथ जुड़ी पारम्परिक धार्मिक फल-कथा। इसे स्वास्थ्य, सुरक्षा, सिद्धि या आर्थिक लाभ की निश्चित गारंटी नहीं समझना चाहिए। शिवरहस्य की भिन्न पाठ-परम्परा का संदर्भ कालाष्टमी से जुड़ा है, लेकिन इस परिचय में कोई तिथि, मुहूर्त, संख्या, दीक्षा, न्यास या तन्त्र-विधि नहीं बताई जा रही। किसी विशिष्ट पूजा का मार्गदर्शन स्वतंत्र रूप से जाँची हुई सामग्री और योग्य परम्परा के आधार पर ही दिया जाना चाहिए। 5

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नाम अष्टक है, तो नौवाँ श्लोक क्यों? आठ मूल स्तुति-श्लोक हैं। उसके बाद पुस्तक में एक क्रमांकित फलश्रुति आती है। अलग आरम्भिक मंगलाचरण और समापन-वाक्य मिलाकर इस संस्करण में ११ पाठ-इकाइयाँ हैं; इसका अर्थ ग्यारह मुख्य श्लोक नहीं है। रोमन पाठ में संस्कृत शब्द रोमन लिपि में क्यों हैं? पाठ की भाषाएँ अलग हैं, किन्तु मूल शब्द दोनों जगह वही रखे गए हैं। रोमन पाठ में IAST लिप्यन्तरण है, अनूदित अंग्रेज़ी कविता नहीं। प्रचलित पाठ के बजाय पुराना कठिन शब्द क्यों रखा गया? हमारा उद्देश्य पहचाने गए ऐतिहासिक संस्करण को ईमानदारी से दिखाना है। यदि दूसरा पाठ सहज लगता है तो उसे ‘पाठभेद’ में बताया जाएगा, मूल छपी प्रति के नाम पर बिना सूचना नहीं रखा जाएगा। क्या उग्र प्रतीकों से कोई अनुष्ठान सीखना चाहिए? नहीं। यह साहित्यिक और भक्तिपरक अध्ययन है। विशिष्ट तान्त्रिक अथवा दीक्षा-आधारित क्रियाओं के निर्देश इसका हिस्सा नहीं हैं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    śrīgaṇeśāya namaḥ ||

  2. 1

    devarājasevyamānapāvanāṅghripaṅkajaṃ vyālayajñasūtraminduśekharaṃ kṛpākaram | nāradādiyogivṛndavanditaṃ digambaraṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 1 ||

  3. 2

    bhānukoṭibhāsvaraṃ bhavābdhitārakaṃ paraṃ nīlakaṇṭhamīpsitārthadāyakaṃ trilocanam | kālakālamambujākṣamakṣaśūlamakṣaraṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 2 ||

  4. 3

    śūlaṭaṅkapāśadaṇḍapāṇimādikāraṇaṃ śyāmakāyamādidevamakṣaraṃ nirāmayam | bhīmavikramaṃ prabhuṃ vicitratāṇḍavapriyaṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 3 ||

  5. 4

    bhuktimuktidāyakaṃ praśastacāruvigrahaṃ bhaktavatsalaṃ sthitaṃ samastalokavigraham | vinikvaṇanmanojñahemakiṅkiṇīlasatkaṭiṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 4 ||

  6. 5

    dharmasetupālakaṃ tvadharmamārganāśakaṃ karmapāśamocakaṃ suśarmadāyakaṃ vibhum | svarṇavarṇaśeṣapāśaśobhitāṅgamaṇḍalaṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 5 ||

  7. 6

    ratnapādukāprabhābhirāmapādayugmakaṃ nityamadvitīyamiṣṭadaivataṃ nirañjanam | mṛtyudarpanāśanaṃ karāladaṃṣṭramokṣaṇaṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 6 ||

  8. 7

    aṭṭahāsabhinnapadmajāṇḍakośasantatiṃ dṛṣṭipātanaṣṭapāpajālamugraśāsanam | aṣṭasiddhidāyakaṃ kapālamālikandharaṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 7 ||

  9. 8

    bhūtasaṅghanāyakaṃ viśālakīrtidāyakaṃ kāśivāsalokapuṇyapāpaśodhakaṃ vibhum | nītimārgakovidaṃ purātanaṃ jagatpatiṃ kāśikāpurādhināthakālabhairavaṃ bhaje || 8 ||

  10. 9

    kālabhairavāṣṭakaṃ paṭhanti ye manoharaṃ jñānamuktisādhanaṃ vicitrapuṇyavardhanam | śokamohadainyalobhakopatāpanāśanaṃ te prayānti kālabhairavāṅghrisannidhiṃ dhruvam || 9 ||

  11. 11

    iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ kālabhairavāṣṭakaṃ sampūrṇam ||

स्रोत और प्रकाशन-स्थिति

  • 1 मुख्य ऐतिहासिक आधार: बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (१९१२), क्रमांक ५७, मुद्रित पृष्ठ १२७–१२८; स्कैन चित्र १३५–१३६। https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Brihat_Stotra_Ratnakara_1912.djvu
  • 3 १९१०-सम्बद्ध संस्करण का तुलना-पाठ, मुख्य आधार नहीं: https://sa.wikisource.org/w/index.php?oldid=288253
  • 5 शिवरहस्य में भिन्न पाठ (११.३४.५३–६१): https://sanskritdocuments.org/doc_shiva/kAlabhairavAShTakam1.html
  • 7 विकिमीडिया कॉमन्स पर मूल स्कैन का विवरण एवं अधिकार-सूचना: https://commons.wikimedia.org/w/index.php?oldid=1026446559&title=File:Brihat_Stotra_Ratnakara_1912.djvu
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1 · shloka-001

भावार्थ। मैं काशी के अधिपति कालभैरव की स्तुति करता हूँ। देवराज भी जिनके पावन चरणकमलों की वन्दना करते हैं; जो सर्प को यज्ञोपवीत की भाँति धारण करते, चन्द्रमा को मस्तक पर रखते और करुणामय कहे जाते हैं; नारद तथा योगी जिनको प्रणाम करते हैं और जो दिगम्बर कहलाते हैं। व्याख्या। प्रथम पद में उग्र प्रतीकों के साथ दयालु रूप भी है। सर्प-यज्ञोपवीत विरक्त शिव-परम्परा की प्रतीकात्मक छवि है, पहनावे का निर्देश नहीं। ‘दिगम्बर’ का शाब्दिक आशय दिशाओं को वस्त्र मानना है; इसे सामान्य सामाजिक अलंकारों से परे स्वरूप के रूप में समझ सकते हैं। ‘काशिकापुराधिनाथ’ की आवृत्ति पूरे अष्टक का भाव-केंद्र है।

श्लोक 2 · shloka-002

भावार्थ। मैं काशीपति कालभैरव का भजन करता हूँ—जो असंख्य सूर्यों के समान प्रकाशमान, संसार-सागर से पार ले जाने वाले, परम, नीलकण्ठ, त्रिनेत्र और अभिलषित प्रयोजन देने वाले हैं; जो काल के भी काल, कमलनयन, ‘अक्षशूल’ पद से वर्णित तथा अविनाशी हैं। व्याख्या। ‘भवाब्धि’ जीवन की बन्धनकारी आवृत्तियों का रूपक है; उससे पार लगना मुक्ति का संकेत है। ‘कालकाल’ कहने का अर्थ है—काल भी जिनकी सीमा में आता है। ‘अक्षशूल’ का अर्थ निश्चित करके प्रस्तुत नहीं किया गया; आसपास आयुध का प्रसंग है, पर इस समास का शुद्ध व्याकरणिक अर्थ विशेषज्ञ से जँचना बाकी है।

श्लोक 3 · shloka-003

भावार्थ। मैं काशी के कालभैरव की वन्दना करता हूँ। उनके हाथों में शूल, टङ्क (कुल्हाड़ी जैसे आयुध), पाश और दण्ड का वर्णन है। वे आदिकारण, श्यामवर्ण, आदिदेव, अक्षर और निरामय हैं; उनका पराक्रम प्रचण्ड है और वे अद्भुत ताण्डव के प्रिय हैं। व्याख्या। यहाँ आयुध शक्ति, संयम और अनुशासन के प्रतीक हैं; पाठक को किसी आयुध का प्रयोग सिखाने की बात नहीं है। ‘आदिकारण’ शब्द बताता है कि स्तुति केवल रूप का वर्णन नहीं कर रही, सृष्टि के आधार की भी कल्पना करती है। ताण्डव को दिव्य गति और सृजन-विनाश की लय के रूप में समझा जा सकता है।

श्लोक 4 · shloka-004

भावार्थ। मैं काशी के कालभैरव को नमस्कार करता हूँ। वे भुक्ति और मुक्ति दोनों के दाता कहे गए हैं, मनोहर रूप वाले, भक्तवत्सल, स्थिर और समस्त लोकों में व्यापक रूप वाले हैं; उनकी कटि पर मनोहर स्वर्णकिंकिणियों की झंकार का वर्णन है। व्याख्या। ‘भुक्ति’ सांसारिक उपभोग और ‘मुक्ति’ आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर संकेत करती है। मुद्रित पाठ में ‘स्थितं’ मिलता है; अन्य पाठों में ‘स्थिरं’ है। यहाँ ‘विनिक्वणन्’ को छन्द की दृष्टि से असहज होते हुए भी मूल छपी प्रति के सम्मान में रखा गया है। ‘निक्वणन्’ एक अन्य प्रचलित, छन्दानुकूल पाठ है।

श्लोक 5 · shloka-005

भावार्थ। मैं काशीपति कालभैरव का भजन करता हूँ। वे धर्मरूपी सेतु की रक्षा करने वाले और अधर्म-पथ को रोकने वाले, कर्म-बन्धन से छुड़ाने वाले, कल्याण देने वाले और सर्वव्यापक हैं। इस पाठ में उनके अंग स्वर्णवर्ण शेषनाग के पाश से सुशोभित बताए गए हैं। व्याख्या। ‘धर्मसेतु’ नैतिक आचरण की रक्षा का रूपक है। ‘कर्मपाश’ कर्मों से उत्पन्न बन्धन का चित्र है; उसका मोचन मुक्ति की भाषा में समझा जाता है। चयनित १९१२ पाठ में ‘शेषपाश’ यानी नागपाश-सदृश आभूषण है, जबकि अन्य पाठों में ‘केशपाश’ मिलता है। दोनों को मिलाकर नया समास नहीं बनाया गया है।

श्लोक 6 · shloka-006

भावार्थ। मैं काशी के कालभैरव की वन्दना करता हूँ। रत्नजटित पादुकाओं से उनके चरण शोभित हैं; वे नित्य, अद्वितीय, इष्टदेव और निर्मल हैं। वे मृत्यु का गर्व हरते हैं; ‘करालदंष्ट्रमोक्षणं’ में उनकी उग्र दाढ़ों तथा मोचन की छवि आती है, पर उसका सूक्ष्म अर्थ अभी विचारणीय है। व्याख्या। रत्नपादुकाएँ ऐश्वर्य का संकेत देती हैं, ‘अद्वितीय’ अनन्यता का और दंष्ट्राएँ उग्र रूप का। ‘करालदंष्ट्रमोक्षणं’ की व्याख्या में व्याकरणिक कठिनाई है; केवल अर्थ को सरल करने के लिए किसी आधुनिक पाठ का ‘करालदंष्ट्रभूषणं’ यहाँ चुपचाप नहीं रखा गया।

श्लोक 7 · shloka-007

भावार्थ। मैं काशी के कालभैरव का भजन करता हूँ। उनके अट्टहास से पद्मज अर्थात् ब्रह्मा से जुड़े ब्रह्माण्डों के आवरण भी टूटते हैं, उनकी दृष्टि पाप-जाल को मिटाने वाली कही गई है, उनका शासन कठोर है; वे अष्टसिद्धियों के दाता और कपालमाला धारण करने वाले कहे गए हैं। व्याख्या। ब्रह्माण्ड का आवरण फाड़ देने वाला अट्टहास काव्य में परिमित सृष्टि से परे सत्ता दर्शाता है; यह खगोल-विज्ञान का दावा नहीं है। ‘अष्टसिद्धि’ स्तोत्र की परम्परागत स्तुति है, पाठ करने पर सिद्धि मिलने की गारंटी नहीं। यहाँ ‘कपालमालिकन्धरं’ है, जबकि अन्य पाठ में ‘कपालमालिकाधरं’ मिलता है।

श्लोक 8 · shloka-008

भावार्थ। मैं काशी के कालभैरव का भजन करता हूँ—जो भूतगणों के अधिपति, कीर्ति के दाता, काशी के निवासियों के पुण्य-पाप का शोधन करने वाले, विभु, नीति-पथ के ज्ञाता, पुरातन और जगत्पति कहे गए हैं। व्याख्या। ‘भूत’ यहाँ केवल लोककथाओं के प्रेत नहीं, शिवगणों जैसे अनुचर समूहों की ओर भी संकेत कर सकता है। काशी वास्तविक तीर्थनगरी है और स्तोत्र का आध्यात्मिक परिवेश भी। ‘नीतिमार्ग’ बताता है कि उग्र रूप के साथ धर्म-विवेक की कल्पना जुड़ी है। पुण्य-पाप का शोधन धार्मिक विश्वास के रूप में समझना चाहिए।

  1. Bṛhatstotraratnākara (बृहत्स्तोत्ररत्नाकर), seventh reprint, 1912 · स्रोत खोलें
  2. Sanskrit Wikisource page for 1912 book, frames 135–136 · स्रोत खोलें
  3. Kālabhairavāṣṭakam (mūlasahitam), Sanskrit Wikisource, fixed revision · स्रोत खोलें
  4. Śrī Kālabhairavāṣṭakam 1-0 (sanskritdocuments.org) · स्रोत खोलें
  5. Kālabhairavāṣṭakam 1-1 (Śrīśivarahasya, Mahādevākhya 11, chapter 34, verses 53–61) · स्रोत खोलें
  6. Kālabhairavāṣṭakam, Bṛhatstotraratnākara Sanskrit Wikisource excerpt labelled 1953 · स्रोत खोलें
  7. Wikimedia Commons file description and licensing for Brihat Stotra Ratnakara 1912 · स्रोत खोलें
  8. Kalabhairava Ashtakam, Stotra Nidhi contemporary digital recital · स्रोत खोलें