भैरव कौन हैं?
मंदिर के किसी कोने में एक ऐसी प्रतिमा दिखाई देती है जिसके केश खुले हैं, हाथ में त्रिशूल और कपाल है तथा पास में कुत्ता खड़ा है। देखने वाला पहली बार में चौंक सकता है। लेकिन भैरव के भक्त उन्हें केवल भयावह देवता नहीं मानते। अनेक शैव परंपराओं में वे शिव का उग्र, रक्षक और अनुशासनकारी स्वरूप हैं। उनके रूप में ऐसी शक्ति की कल्पना की जाती है जो अहंकार को चुनौती देती है, तीर्थ और नगर की रक्षा करती है तथा जीवन की कठिन सच्चाइयों की ओर हमारा ध्यान ले जाती है। काशी के कालभैरव को श्रद्धापूर्वक नगर का कोतवाल कहा जाता है। यह धार्मिक सम्मानसूचक संबोधन है, सरकारी पद का ऐतिहासिक दावा नहीं। 3 7
भैरव का रूप तीव्र है, लेकिन उनकी समझ केवल क्रोध से पूरी नहीं होती। कपाल हमें नश्वरता की याद दिला सकता है; प्रहरी का स्वरूप मर्यादा और उत्तरदायित्व की ओर ले जा सकता है। यह संभावित दार्शनिक व्याख्या है, हर संप्रदाय का अनिवार्य मत नहीं। कश्मीर की कुछ अद्वैत शैव परंपराओं में 'भैरव' परम चेतना के लिए भी प्रयुक्त होता है। इस प्रकार एक ही नाम मूर्ति, कथा, उपासना और सूक्ष्म दार्शनिक चिंतन में अलग-अलग स्तरों पर सामने आता है। 10
नाम, अर्थ और अलग-अलग पहचान
भैरव शब्द का संबंध प्रचंड, विस्मयकारी या भय उत्पन्न करने वाले स्वरूप से जोड़ा जाता है। कालभैरव में 'काल' को समय, मृत्यु तथा उनसे परे सत्ता के संदर्भ में समझा जाता है। शिवपुराण का एक विशिष्ट अध्याय भैरव की भीषण आकृति, जगत को धारण करने की शक्ति और काल पर प्रभुत्व के आधार पर उनके नाम की व्याख्या करता है। यह उस ग्रंथ की व्याख्या है; इसे बिना तुलना के सर्वमान्य भाषावैज्ञानिक व्युत्पत्ति नहीं कहना चाहिए। 1
क्षेत्रपाल का अर्थ है किसी क्षेत्र, मंदिर या पवित्र स्थल का रक्षक। बटुक अथवा वटुक भैरव कुछ परंपराओं में बाल अथवा युवा रूप से संबंधित हैं। अष्टभैरव आठ भैरव स्वरूपों के समूह का नाम है। विभिन्न क्षेत्रों में इसके अतिरिक्त स्थानीय नाम भी मिलते हैं। महाकाल और भैरव की कुछ छवियाँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं, पर हर जगह दोनों नामों को समानार्थक मान लेना ठीक नहीं। उदाहरण के लिए, संग्रहालय में सुरक्षित एक महाकाल मूर्ति बौद्ध तांत्रिक परिवेश से संबंधित है, जहाँ उसका धार्मिक अर्थ शैव उपासना से अलग भी हो सकता है। 12
इस विषय को पढ़ते समय दो बातों को साथ रखना उपयोगी है। पहली, अनेक भक्त भैरव को शिव से अभिन्न मानते हैं। दूसरी, प्रत्येक ग्रंथ, स्थान और परंपरा में उनके स्वरूप का जोर एक जैसा नहीं है। जहाँ एक पूजा-पद्धति में वे रक्षक हैं, वहीं किसी शैव दार्शनिक ग्रंथ में वे व्यापक चेतना का नाम हो सकते हैं।
उत्पत्ति और इतिहास: हम क्या जान सकते हैं?
भैरव की 'सबसे पहली' उपासना कब आरंभ हुई, इसका एक निश्चित, सर्वसम्मत ऐतिहासिक वर्ष बताना संभव नहीं। पुराण उनकी उत्पत्ति को दिव्य कथाओं के रूप में बताते हैं; पुराणकथा को आधुनिक ऐतिहासिक जन्म-तिथि के बराबर नहीं रखा जा सकता। इतिहासकार ग्रंथों, मूर्तियों, मंदिरों और धार्मिक व्यवहारों को देखकर परंपरा के विकास का अध्ययन करते हैं। पुदुचेरी के फ़्रांसीसी शोध संस्थान (Institut Français de Pondichéry) की दक्षिण भारतीय भैरव-प्रतिमा संबंधी सामग्री से स्पष्ट होता है कि उनकी आकृतियाँ अनेक मंदिरों में मिलती हैं और स्थान के अनुसार भिन्न हैं। 6
ब्रिटिश म्यूज़ियम में कर्नाटक से संबद्ध लगभग दसवीं शताब्दी की एक कांस्य प्रतिमा है। उसमें भैरव के साथ श्वान, कपाल, त्रिशूल और डमरू जैसे चिह्न दिखाई देते हैं। सिंगापुर के एशियाई सभ्यता संग्रहालय में चोलकालीन एक शिल्प को भैरव अथवा भिक्षाटन शिव से जोड़ा गया है। इससे ऐतिहासिक कलाकृतियों की विविधता का पता चलता है, लेकिन यह सिद्ध नहीं होता कि हर युग में भैरव की मूर्ति का एक ही निश्चित रूप था। भैरव और शिव के अन्य संन्यासी स्वरूपों के बीच कुछ कलात्मक संबंध भी मिलते हैं। 3 5
1. ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर: अहंकार और मर्यादा की कथा
एक प्रसिद्ध शैव पौराणिक कथा में ब्रह्मा और विष्णु के बीच सर्वोच्चता को लेकर विवाद होता है। दोनों के दावों के बीच शिव की महिमा प्रकट होती है। ब्रह्मा के गर्व को दूर करने के लिए भैरव का आविर्भाव बताया गया है। शिवपुराण के शतरुद्र-संहिता, अध्याय 8 में भैरव ब्रह्मा का पाँचवाँ मस्तक अलग कर देते हैं। इसके बाद कथा प्रायश्चित्त, कपाल और काशी में उनकी विशेष स्थिति की ओर बढ़ती है। यह एक धार्मिक आख्यान है; इसे किसी प्रमाणित, तिथि-युक्त ऐतिहासिक घटना का वृत्तांत नहीं कहना चाहिए। 1
यहाँ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पाठभेद है। शिवपुराण की ही विद्येश्वर-संहिता, अध्याय 8 में शिव अपनी भृकुटि से भैरव को उत्पन्न करते हैं और वे ब्रह्मा को दंड देने बढ़ते हैं। किंतु विष्णु के निवेदन पर शिव उन्हें रोक देते हैं; उस संस्करण में ब्रह्मा का सिर वास्तव में काटा नहीं जाता। दूसरी ओर शतरुद्र-संहिता वाले विवरण में सिर काटने की घटना आती है। दोनों पाठों को बिना भेद बताए एक ही कथा की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं। 2 1
इस प्रसंग से पाठक अहंकार और विनम्रता पर चिंतन कर सकता है। देवताओं के बीच भी यदि गर्व विवाद को जन्म देता है, तो मनुष्य को अपने ज्ञान और अधिकार के प्रति सावधान रहना चाहिए। यह हमारी व्याख्यात्मक टिप्पणी है, पुराण से उद्धृत श्लोक नहीं। इस कथा को किसी व्यक्ति पर हिंसा करने की अनुमति के रूप में भी नहीं पढ़ना चाहिए।
2. कपाल धारण करने वाला यात्री: कर्म और उत्तरदायित्व
शतरुद्र-संहिता के संस्करण में भैरव की कथा दंड देने के साथ समाप्त नहीं होती। शिव उन्हें ब्रह्मा का कपाल धारण करने और गंभीर अपराध के प्रायश्चित्त का उदाहरण प्रस्तुत करने को कहते हैं। कथा में इस अपराध को ब्रह्महत्या कहा गया है और उसके दुष्परिणाम का मानवीकृत रूप उनका पीछा करता है। काशी पहुँचने पर मुक्ति का प्रसंग आता है। इस पृष्ठभूमि से भैरव के कपाल, भिक्षुक तथा विचरण करने वाले स्वरूप का एक संबंध समझ में आता है। 1
यह प्रसंग एक कठिन प्रश्न उठाता है: क्या दंड देने वाली शक्ति भी अपने कार्य के परिणाम से मुक्त रहती है? कथा के भीतर उत्तरदायित्व की अनुभूति पर विचार किया जा सकता है। पर यह समझना ज़रूरी है कि कापालिक संन्यासी परंपराएँ, भिक्षाटन संबंधी प्रतिमाएँ और अलग-अलग पुराणकथाएँ एक ही चीज़ नहीं हैं। मूर्ति में कपाल दिखाई देने से उसके आधार पर कोई विशिष्ट ऐतिहासिक अनुष्ठान अपने-आप सिद्ध नहीं हो जाता। संग्रहालय की वस्तु-विवरणिका आकार और आयुधों का प्रमाण दे सकती है; किसी संप्रदाय की पूरी साधना-पद्धति का नहीं। 3 5
3. काशी के कोतवाल: एक तीर्थ की धार्मिक स्मृति
वाराणसी में कालभैरव की पहचान शहर के दिव्य रक्षक के रूप में अत्यंत प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़िले की सरकारी वेबसाइट भी उन्हें 'कोतवाल ऑफ वाराणसी' कहती है। काशी के आधिकारिक पोर्टल में यह लोकविश्वास दर्ज है कि नगर में प्रवेश और निवास उनकी अनुमति से जुड़ा माना जाता है। भक्तों के लिए यह रक्षक की निकटता और नगर के पवित्र स्वरूप का अनुभव है। किसी धार्मिक विश्वास का सामाजिक महत्त्व बताने के लिए उसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य कहना आवश्यक नहीं। 7 8
शतरुद्र-संहिता के अध्याय में भी शिव भैरव को काशी पर विशेष अधिकार देते हैं। इस तरह ग्रंथ का आख्यान और नगर की जीवित उपासना-परंपरा एक-दूसरे से संवाद करते हैं। पर प्रत्येक श्रद्धालु की यात्रा, दर्शन का क्रम और पूजा-पद्धति समान नहीं होती। तीर्थ की गरिमा के सम्मान और यह दावे के बीच अंतर है कि किसी एक क्रम के बिना सबके लिए धार्मिक यात्रा निष्फल हो जाती है। यहाँ ऐसी सार्वभौम बाध्यता का दावा नहीं किया जा रहा। 1
4. विज्ञानभैरव: उग्र रूप से चेतना के प्रश्न तक
भैरव को समझने का एक और द्वार विज्ञानभैरव तंत्र है। कश्मीर की शैव दार्शनिक परंपरा से संबद्ध इस ग्रंथ का आधार देवी और भैरव का संवाद है। यहाँ भैरव का महत्व केवल शस्त्रधारी रूप की चर्चा तक सीमित नहीं रहता। चेतना, अनुभव और परम सत्य से संबंधित प्रश्न प्रमुख हो उठते हैं। विद्वान व्लादिमीर इवानोव ने क्षेमराज की उपलब्ध टीका का अध्ययन करते हुए दिखाया है कि देवी और शिव का संवाद केवल साहित्यिक ढाँचा नहीं, बल्कि अद्वैत शैव विचार में स्वयं गहरे अर्थ वाला है। 10
इस परिचय का उद्देश्य किसी गूढ़ साधना का अभ्यास करवाना नहीं है। तांत्रिक साहित्य को उसके परंपरागत संदर्भ, भाषा और शिक्षक-शिष्य संबंध से अलग करके निर्देशों की सूची बना देना ठीक नहीं होगा। कुछ अभ्यासों में दीक्षा अथवा उपयुक्त मार्गदर्शन अपेक्षित हो सकता है। यहाँ न कोई अप्रशिक्षित साधना-विधि दी जा रही है, न गुप्त मंत्र, न चमत्कार का आश्वासन। सामान्य पाठक इतना समझ सकता है कि भैरव का नाम कुछ परंपराओं में शिव–शक्ति और व्यापक चेतना के प्रश्नों से जुड़ता है।
भैरव की प्रतिमा के प्रतीक
कलात्मक प्रमाणों को सावधानी से पढ़ना चाहिए। भैरव की सभी मूर्तियों में एक जैसी भुजाएँ, आयुध या वेश नहीं होते। फ़्रांसीसी शोध संस्थान का दक्षिण भारतीय प्रतिमा-संग्रह और विभिन्न संग्रहालयों के अभिलेख इस विविधता को दिखाते हैं। 6 3
- श्वान या कुत्ता: भैरव के साथ बार-बार दिखाई देने वाला पशु और अनेक प्रतिमाओं में उनका वाहन है। कहीं उसकी व्याख्या निष्ठा से, कहीं श्मशान अथवा सामाजिक सीमाओं से जुड़कर की जाती है। किसी एक अर्थ को प्रत्येक मूर्ति के कलाकार का निश्चित उद्देश्य नहीं मानना चाहिए।
- कपाल और कटा हुआ सिर: ब्रह्मा-संबंधी आख्यान, तपस्वी स्वरूप तथा मृत्यु की अनिवार्यता का स्मरण करा सकते हैं। वस्तु-विवरण में 'कपाल' का उल्लेख स्वयं किसी गुप्त विधि का प्रमाण नहीं है।
- त्रिशूल, डमरू, खड्ग या अन्य आयुध: शिव से संबंध, ऊर्जा, अधिकार और प्रचंडता दर्शाने वाली छवियों के रूप में पढ़े जाते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों की मूर्तियों में इनके संयोजन बदलते हैं।
- जटा, सर्प, ज्वाला, दाँत और मुंडमाला: सामान्य मानवीय रूप से भिन्न, विशिष्ट दिव्य आकृति की पहचान बनाते हैं। नेपाल की मुखौटा-जैसी विशाल प्रतिमा दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्ति से बहुत अलग लग सकती है।
- दिगंबर या संन्यासी जैसा रूप: कुछ प्रतिमाओं का महत्वपूर्ण अंग है, लेकिन सभी चित्रों या भक्तों के लिए कोई वस्त्र-संबंधी नियम नहीं।
ब्रिटिश म्यूज़ियम की राजस्थान-शैली की एक पेंटिंग में भैरव के पास दो श्वान हैं। दूसरी ओर स्मिथसोनियन संस्थान की नेपाल-संबंधी प्रतिमा में तीन मुख और छह भुजाएँ हैं तथा एक हाथ में कमल भी दिखाई देता है। इसलिए 'भैरव हमेशा इतने ही हाथों वाले होते हैं' जैसी बात को सार्वभौम सत्य नहीं मानना चाहिए। 4 11
अष्टभैरव: आठ स्वरूप, अनेक परंपराएँ
अष्टभैरव का अर्थ है भैरव के आठ रूपों का एक समूह। प्रचलित सूचियों में असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहार जैसे नाम मिलते हैं। कुछ परंपराओं में दिशाओं, मातृकाओं और अन्य समूहों से भी संबंध बताया जाता है। किंतु अलग-अलग संप्रदायों की सूचियों, रंगों, आयुधों और देवताओं से संबंधों में अंतर हो सकता है। एक परंपरा-आधारित विवरण में दिया गया संयोजन सभी शैव पंथों का सर्वसम्मत मानचित्र नहीं है। 14
उज्जैन जिला प्रशासन भी उस क्षेत्र की शिव-भक्ति में आठ भैरवों की उपासना का उल्लेख करता है। इससे समूह की जीवित धार्मिक उपस्थिति स्पष्ट होती है। लेकिन इससे इंटरनेट पर उपलब्ध हर तालिका—जैसे निश्चित ग्रह, दिशा, रंग, गुप्त मंत्र या तुरंत फल देने वाला उपाय—सत्यापित नहीं हो जाती। ऐसी जानकारी के लिए स्वतंत्र प्रमाण, परंपरा-विशेष का स्पष्ट नाम और विशेषज्ञ समीक्षा चाहिए। 9
भारत और नेपाल की जीवित परंपराओं में भैरव
काशी: यहाँ कालभैरव का नाम नगर की संरक्षक धार्मिक पहचान से जुड़ा है। श्रद्धालु दर्शन, प्रार्थना और स्थानीय कथाओं के माध्यम से उन्हें अनुभव करते हैं। यह काशी की खास धार्मिक स्मृति है; इसे सभी हिंदू क्षेत्रों की अनिवार्य मान्यता नहीं समझना चाहिए। 7
उज्जैन: यहाँ कालभैरव मंदिर की अपनी विशिष्ट परंपरा है। जिला प्रशासन के अनुसार स्थानीय मान्यता में उसका संबंध स्कन्दपुराण के अवन्ति-खण्ड से माना जाता है। मंदिर में मदिरा अर्पित करने की प्रथा का भी सरकारी विवरण मिलता है। यह एक विशेष मंदिर की परंपरा का वर्णन है, पाठकों के लिए घरेलू पूजा का निर्देश या सभी भैरव मंदिरों का नियम नहीं। नशे या जोखिमपूर्ण आचरण को आध्यात्मिक सफलता की शर्त बताना उचित नहीं। 9
दक्षिण भारत: शिव मंदिरों और अन्य कुछ मंदिर परिसरों में भैरव की प्रतिमाएँ मिलती हैं। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र क्षेत्र की प्रतिमाओं में भुजाओं की संख्या, आयुधों तथा मुद्रा में भिन्नता पर शोध हुआ है। कहीं-कहीं भैरव और भिक्षाटन शिव की कलात्मक पहचान बहुत निकट आती है। 6 5
नेपाल: काठमांडू घाटी की नेवार कला में भैरव के विशाल मुख और जटिल धातु-मूर्तियाँ विशेष स्थान रखती हैं। मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम में सोलहवीं शताब्दी का एक भैरव-मुख संरक्षित है, जिसका संबंध इन्द्रजात्रा उत्सव से बताया गया है। नेपाल पर्यटन बोर्ड के अनुसार इस पर्व में आकाश भैरव की छवि सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित होती है। यहाँ हिंदू और बौद्ध कलात्मक-सांस्कृतिक परिवेश के बीच संपर्क भी मिलता है। इसे काशी की पूजा का हूबहू रूप नहीं मानना चाहिए। 13 15 11 12
दर्शन: भय, काल, मर्यादा और संरक्षण
क्या भैरव का अर्थ केवल क्रोध है? अलग-अलग स्रोतों को देखने पर उत्तर अधिक गहरा मिलता है। रक्षक भैरव पवित्र क्षेत्र और मर्यादा का स्मरण कराते हैं। कपालधारी भैरव मृत्यु तथा परिणामों से मुँह न मोड़ने का प्रश्न उठाते हैं। अद्वैत शैव चिंतन में भैरव चेतना के उस आयाम से जुड़ते हैं जहाँ बाहरी भय ही अंतिम सत्य नहीं रह जाता। इन तीनों को जोड़कर पढ़ना सार्थक हो सकता है, किंतु इनके ग्रंथ और धार्मिक संदर्भ अलग हैं। 7 1 10
'काल' को समय की निरंतर गति के रूप में देखें तो कालभैरव की उपासना के भीतर परिवर्तन की स्वीकृति का विचार उभर सकता है। मनुष्य बहुत कुछ नियंत्रित करना चाहता है, पर समय, हानि और अनिश्चितता की सीमाओं से बच नहीं सकता। इसलिए साहस का अर्थ यह नहीं कि हम स्वयं को अमर या सर्वशक्तिमान मान लें। यह पाठक की सुविधा के लिए प्रस्तुत विचारात्मक व्याख्या है, किसी प्राचीन मंत्र का प्रमाणित अनुवाद नहीं और किसी प्रकार की सुरक्षा का वैज्ञानिक आश्वासन भी नहीं।
शैव, शाक्त, नाथ, स्थानीय और बौद्ध धार्मिक संदर्भों में भैरव अथवा उनसे मिलते स्वरूपों की व्याख्या एक जैसी नहीं है। परंपराओं के बीच संबंधों का सम्मान करते हुए उनके भेद को बचाए रखना भी आवश्यक है।
भक्ति, पर्व और सांस्कृतिक आचरण
भैरव के प्रति सामान्य सार्वजनिक श्रद्धा में मंदिर जाना, कथा सुनना, प्रार्थना करना तथा समुदाय के उत्सवों में भाग लेना शामिल हो सकता है। काशी की परंपरा, उज्जैन के मंदिर की रीति और नेपाल की इन्द्रजात्रा—तीनों में स्थान और समुदाय के अनुसार अलग व्यवहार हैं। किसी एक मंदिर की पद्धति को सब लोगों पर लागू करना उचित नहीं। 8 9 15
कालाष्टमी सामान्यतः कृष्ण पक्ष की अष्टमी से संबंधित एक मासिक धार्मिक अवसर माना जाता है। विशेष वार्षिक पर्व को कालभैरव जयंती या भैरव अष्टमी कहा जाता है। उत्तर तथा दक्षिण भारत की चांद्र मास-गणना में मास के नाम भिन्न हो सकते हैं, भले ही पर्व का वास्तविक दिन एक ही हो। यहाँ किसी वर्ष की स्थायी अंग्रेज़ी तारीख या सबके लिए लागू मुहूर्त नहीं दिया गया है। आवश्यकता पड़ने पर स्थानीय पंचांग और मंदिर की आधिकारिक सूचना अलग से जाँची जानी चाहिए। 16
भैरव-संबंधी मंत्र, तांत्रिक क्रियाएँ, श्मशान प्रतीक, विशिष्ट अर्पण या दीक्षा पर आधारित साधनाएँ परंपरा-निर्भर विषय हैं। इनके बारे में पढ़ना और इनके अभ्यास का अधिकार या उचित प्रशिक्षण होना अलग बातें हैं। यह लेख किसी गुप्त प्रक्रिया, नशीले पदार्थ के उपयोग, पशु-हानि, भय पैदा करने वाली क्रिया या निश्चित चमत्कारी लाभ का निर्देश नहीं देता। मंदिर का सम्मान करने के साथ स्वास्थ्य, सुरक्षा, कानून और दूसरों की गरिमा का भी सम्मान आवश्यक है।
सामान्य प्रश्न और गलतफहमियाँ
क्या भैरव शिव से अलग देवता हैं? अनेक शैव परंपराएँ उन्हें शिव का रूप मानती हैं। कुछ दर्शन में 'भैरव' परम चेतना को भी सूचित करता है। अलग-अलग स्रोतों को देखे बिना एक वाक्य में सभी मतों का निर्णय नहीं किया जा सकता। 1 10
भैरव के साथ कुत्ता क्यों दिखता है? ऐतिहासिक प्रतिमाओं में वह बार-बार दिखाई देता है और अनेक परंपराओं में वाहन माना जाता है। उसका सांकेतिक अर्थ हर स्थान पर एक जैसा निश्चित नहीं है। 3
क्या सभी पुराणकथाओं में भैरव ने ब्रह्मा का सिर काटा? नहीं। शिवपुराण की यहाँ जाँची गई दो संहिताओं के कथन में यही प्रमुख अंतर है। 1 2
क्या अष्टभैरव की एक ही सूची सर्वमान्य है? नहीं। आठ रूपों का विचार महत्त्वपूर्ण है, पर नामों और उनसे जुड़े विवरणों को संबंधित परंपरा और स्रोत के साथ देखना चाहिए। 14
क्या उग्र मूर्ति का अर्थ हिंसक आचरण की स्वीकृति है? नहीं। प्रतिमा के प्रतीकों को मनुष्यों या पशुओं को नुकसान पहुँचाने की अनुमति नहीं माना जाना चाहिए। चमत्कार या निश्चित सुरक्षा के दावे आस्था के क्षेत्र में आते हैं, प्रमाणित वैज्ञानिक निष्कर्ष के रूप में नहीं।
क्या भैरव की उपासना केवल डर के कारण होती है? नहीं। संरक्षण, अनुशासन, समय, आत्मपरीक्षण और चेतना—इन सबके प्रसंग अलग-अलग परंपराओं में मिलते हैं। 7 10
शब्दावली
| शब्द | इस लेख में आशय |
|---|---|
| भैरव | शिव का प्रचंड रूप; कुछ दर्शनों में व्यापक परम चेतना का नाम |
| कालभैरव | समय और संरक्षण से जुड़े भैरव के स्वरूप का प्रचलित नाम |
| क्षेत्रपाल | पवित्र क्षेत्र या मंदिर का रक्षक |
| कपाल | खोपड़ी या खोपड़ी का पात्र; प्रतिमाओं में दिखाई देने वाला चिह्न |
| वाहन | देवप्रतिमा से जुड़ा पशु या प्रतीकात्मक सवारी |
| अष्टभैरव | आठ भैरव रूपों का समूह; विशिष्ट सूची परंपरा के अनुसार बदल सकती है |
| ब्रह्महत्या | संबंधित पौराणिक कथा में वर्णित गंभीर धार्मिक अपराध |
| दीक्षा | किसी धार्मिक परंपरा में गुरु द्वारा प्रदान किया जाने वाला विधिवत प्रवेश |
| कोतवाल | नगर-प्रहरी के लिए प्रयुक्त शब्द; काशी में कालभैरव का भक्तिपरक संबोधन |
| विज्ञानभैरव | देवी और भैरव के संवाद के रूप में प्रसिद्ध शैव तांत्रिक ग्रंथ |




