पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

चालीसा

भैरव प्रार्थना चालीसा — शिवगोरक्ष की नवरचना

चालीस पदों तथा आरम्भ और समापन पदों की नई शिवगोरक्ष प्रार्थना, AI की सहायता से रचित। यह समकालीन नवरचना है, ऐतिहासिक भैरव चालीसा नहीं।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

प्रारम्भिक पद

भैरव चरणन ध्यान धरि, करूँ विनय मन खोल। भय के बीच विवेक रहे, करुणा भरे सब बोल॥

अर्थ

भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 1

भैरव, मन में धीरज भर दो। भय की गाँठें ढीली कर दो॥

अर्थ

मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 2

जागे भीतर दीप उजाला। मिटे अहं का घना अँधियाला॥

अर्थ

भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 3

काल तुम्हारा रूप निराला। क्षण-क्षण का हो मोल सँभाला॥

अर्थ

भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 4

बीता कल मैं छोड़ सकूँ अब। आज करूँ सद्कर्म उचित सब॥

अर्थ

बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 5

जो कुछ टूटे, धीर धरूँ मैं। टूटे मन का हाथ धरूँ मैं॥

अर्थ

हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 6

मेरा क्रोध न पथ को घेरे। सुनना सीखूँ दुख बहुतेरे॥

अर्थ

क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 7

तीखा वचन रोकना सिखलाओ। सच को कोमल स्वर में लाओ॥

अर्थ

कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 8

निज दुर्बलता देख न भागूँ। धीरज लेकर फिर मैं जागूँ॥

अर्थ

अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

मन का दर्पण साफ रखूँ मैं। अपने छल को देख सकूँ मैं॥

अर्थ

मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 10

जो अनजाना, उसे न ठुकराऊँ। पहले सुनकर फिर समझाऊँ॥

अर्थ

अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 11

कपटी लाभ न मन को भाये। श्रम का अन्न हृदय सुख पाये॥

अर्थ

छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 12

दीन जनों से दूर न जाऊँ। अपना थोड़ा भाग बँटाऊँ॥

अर्थ

ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 13

निर्बल प्राणी भय न पावें। मेरे हाथ सहारा लावें॥

अर्थ

निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 14

द्वार खुले सद्भाव हमारे। जाति-भेद के मिटें अँधियारे॥

अर्थ

सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 15

भिन्न मतों का मान निभाऊँ। अपने मद में उन्हें न दबाऊँ॥

अर्थ

अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 16

भैरव, दे दो दृष्टि सुहानी। हर चेहरे में देखूँ कहानी॥

अर्थ

हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 17

जो गलती की, उसे सुधारूँ। केवल दोष न औरों धारूँ॥

अर्थ

अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 18

क्षमा माँगने में न सकुचाऊँ। क्षमा मिले तो शीश नवाऊँ॥

अर्थ

क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

गुरु-मर्यादा मन में राखूँ। निज अधिकार न झूठा भाखूँ॥

अर्थ

गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 20

नाथ-स्मरण में मन ठहराऊँ। अनुशासन को प्रेम बनाऊँ॥

अर्थ

नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 21

निज अनुभव को सब न बताऊँ। एक रीति सब पर न चलाऊँ॥

अर्थ

अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 22

शिव-स्मृति से सरल बनूँ मैं। दिखलावे से दूर रहूँ मैं॥

अर्थ

शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 23

मौन मिले तो सजग रहूँ मैं। शब्द मिलें तो हित ही कहूँ मैं॥

अर्थ

मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 24

साँझ ढले तो दिन को देखूँ। मन के लेखे सच ही लेखूँ॥

अर्थ

संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 25

कल की चिन्ता आज न खाये। आज की सेवा राह दिखाये॥

अर्थ

भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 26

संकट में भी साथ निभाऊँ। झूठे आश्वासन न बँटाऊँ॥

अर्थ

कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 27

आशा रखूँ, यत्न न छोड़ूँ। टूटी डोरी फिर से जोड़ूँ॥

अर्थ

आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 28

भक्ति बने न केवल गान। दुःखी जनों का हो सम्मान॥

अर्थ

भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

खेत, नदी, वन सभी सँभालूँ। धरती माँ का मान न टालूँ॥

अर्थ

खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 30

अन्न मिले तो कृतज्ञता लाऊँ। जल की बूँद न व्यर्थ बहाऊँ॥

अर्थ

अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 31

जीवन क्षणभंगुर पहचानूँ। इसीलिए हर मिलन सँभालूँ॥

अर्थ

जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 32

कपाल-चिह्न यह याद दिलाये। मानव देह सदा न रह पाये॥

अर्थ

कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 33

भस्म सदृश हो मेरा अभिमान। भीतर जागे समता-ज्ञान॥

अर्थ

अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 34

त्रिशूल देखूँ तो यह चाहूँ। भय, छल, द्वेष से दूर मैं जाऊँ॥

अर्थ

त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 35

काशी-रक्षक नाम तुम्हारा। निज आचरण बने रखवारा॥

अर्थ

काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 36

अन्ध-विश्वास न बुद्धि दबाये। श्रद्धा प्रश्नों से न घबराये॥

अर्थ

अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 37

चमत्कार की माँग न लाऊँ। सद्बुद्धि का दीपक चाहूँ॥

अर्थ

चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 38

अपना पथ मैं सत्य से साधूँ। दूसर का सम्मान न त्यागूँ॥

अर्थ

अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

सुख में विनय, दुःख में साहस। दोनों में ही प्रेम का अभ्यास॥

अर्थ

सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

चौपाई 40

भैरव, ऐसी बुद्धि जगाओ। जीवन को उपहार बनाओ॥

अर्थ

ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

शिवगोरक्ष की प्रार्थना, अर्पित आज नवीन। भैरव, रखियो चेतना, सत्य-स्नेह में लीन॥

अर्थ

शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है।

व्याख्या

यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

सन्दर्भ और उपयोग

सन्दर्भ और संस्करण

यह २४ अक्टूबर २०२६ के संस्थापक निर्देश पर AI की सहायता से शिवगोरक्ष के लिए लिखी नई हिन्दी प्रार्थना है। यह पुरानी भैरव चालीसा या ऐतिहासिक नाथ-परम्परा का पाठ नहीं है। इस संस्करण के वास्तविक 42 पाठ-खण्ड सुरक्षित हैं। रोमन पाठ देवनागरी का वर्तनी-आधारित IAST रूप है; हिन्दी बोलचाल के स्वर-लोप अलग हो सकते हैं। स्वतंत्र भाषा एवं छन्द समीक्षा अधूरी है।

पाठ की मर्यादा

इसे भक्ति-काव्य के रूप में पढ़ें। यह दीक्षा, अनुष्ठानिक अधिकार, आरोग्य-धन की गारंटी या अग्नि-विधि का निर्देश नहीं देता। पारम्परिक पाठ में नाम, कथा और फल-कथन उसी स्तुति की भाषा हैं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

New AI-assisted ShivGoraksh devotional composition, expressly authorized by the founder. Forty new devotional couplets and opening/closing verses; not a historical Bhairav Chalisa, lineage instruction or independently reviewed metrical edition. Bilingual meanings, explanations and orthographic Roman rendering prepared with AI assistance. Prosodic and specialist review pending; no historical authenticity claimed.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. प्रारम्भिक पद

    bhairava caraṇana dhyāna dhari, karūm̐ vinaya mana khola| bhaya ke bīca viveka rahe, karuṇā bhare saba bola||

  2. Chaupai 1

    bhairava, mana meṃ dhīraja bhara do| bhaya kī gām̐ṭheṃ ḍhīlī kara do||

  3. Chaupai 2

    jāge bhītara dīpa ujālā| miṭe ahaṃ kā ghanā am̐dhiyālā||

  4. Chaupai 3

    kāla tumhārā rūpa nirālā| kṣaṇa-kṣaṇa kā ho mola sam̐bhālā||

  5. Chaupai 4

    bītā kala maiṃ choṛa sakūm̐ aba| āja karūm̐ sadkarma ucita saba||

  6. Chaupai 5

    jo kucha ṭūṭe, dhīra dharūm̐ maiṃ| ṭūṭe mana kā hātha dharūm̐ maiṃ||

  7. Chaupai 6

    merā krodha na patha ko ghere| sunanā sīkhūm̐ dukha bahutere||

  8. Chaupai 7

    tīkhā vacana rokanā sikhalāo| saca ko komala svara meṃ lāo||

  9. Chaupai 8

    nija durbalatā dekha na bhāgūm̐| dhīraja lekara phira maiṃ jāgūm̐||

  10. Chaupai 9

    mana kā darpaṇa sāpha rakhūm̐ maiṃ| apane chala ko dekha sakūm̐ maiṃ||

  11. Chaupai 10

    jo anajānā, use na ṭhukarāūm̐| pahale sunakara phira samajhāūm̐||

  12. Chaupai 11

    kapaṭī lābha na mana ko bhāye| śrama kā anna hṛdaya sukha pāye||

  13. Chaupai 12

    dīna janoṃ se dūra na jāūm̐| apanā thoṛā bhāga bam̐ṭāūm̐||

  14. Chaupai 13

    nirbala prāṇī bhaya na pāveṃ| mere hātha sahārā lāveṃ||

  15. Chaupai 14

    dvāra khule sadbhāva hamāre| jāti-bheda ke miṭeṃ am̐dhiyāre||

  16. Chaupai 15

    bhinna matoṃ kā māna nibhāūm̐| apane mada meṃ unheṃ na dabāūm̐||

  17. Chaupai 16

    bhairava, de do dṛṣṭi suhānī| hara cehare meṃ dekhūm̐ kahānī||

  18. Chaupai 17

    jo galatī kī, use sudhārūm̐| kevala doṣa na auroṃ dhārūm̐||

  19. Chaupai 18

    kṣamā mām̐gane meṃ na sakucāūm̐| kṣamā mile to śīśa navāūm̐||

  20. Chaupai 19

    guru-maryādā mana meṃ rākhūm̐| nija adhikāra na jhūṭhā bhākhūm̐||

  21. Chaupai 20

    nātha-smaraṇa meṃ mana ṭhaharāūm̐| anuśāsana ko prema banāūm̐||

  22. Chaupai 21

    nija anubhava ko saba na batāūm̐| eka rīti saba para na calāūm̐||

  23. Chaupai 22

    śiva-smṛti se sarala banūm̐ maiṃ| dikhalāve se dūra rahūm̐ maiṃ||

  24. Chaupai 23

    mauna mile to sajaga rahūm̐ maiṃ| śabda mileṃ to hita hī kahūm̐ maiṃ||

  25. Chaupai 24

    sām̐jha ḍhale to dina ko dekhūm̐| mana ke lekhe saca hī lekhūm̐||

  26. Chaupai 25

    kala kī cintā āja na khāye| āja kī sevā rāha dikhāye||

  27. Chaupai 26

    saṃkaṭa meṃ bhī sātha nibhāūm̐| jhūṭhe āśvāsana na bam̐ṭāūm̐||

  28. Chaupai 27

    āśā rakhūm̐, yatna na choṛūm̐| ṭūṭī ḍorī phira se joṛūm̐||

  29. Chaupai 28

    bhakti bane na kevala gāna| duḥkhī janoṃ kā ho sammāna||

  30. Chaupai 29

    kheta, nadī, vana sabhī sam̐bhālūm̐| dharatī mām̐ kā māna na ṭālūm̐||

  31. Chaupai 30

    anna mile to kṛtajñatā lāūm̐| jala kī būm̐da na vyartha bahāūm̐||

  32. Chaupai 31

    jīvana kṣaṇabhaṃgura pahacānūm̐| isīlie hara milana sam̐bhālūm̐||

  33. Chaupai 32

    kapāla-cihna yaha yāda dilāye| mānava deha sadā na raha pāye||

  34. Chaupai 33

    bhasma sadṛśa ho merā abhimāna| bhītara jāge samatā-jñāna||

  35. Chaupai 34

    triśūla dekhūm̐ to yaha cāhūm̐| bhaya, chala, dveṣa se dūra maiṃ jāūm̐||

  36. Chaupai 35

    kāśī-rakṣaka nāma tumhārā| nija ācaraṇa bane rakhavārā||

  37. Chaupai 36

    andha-viśvāsa na buddhi dabāye| śraddhā praśnoṃ se na ghabarāye||

  38. Chaupai 37

    camatkāra kī mām̐ga na lāūm̐| sadbuddhi kā dīpaka cāhūm̐||

  39. Chaupai 38

    apanā patha maiṃ satya se sādhūm̐| dūsara kā sammāna na tyāgūm̐||

  40. Chaupai 39

    sukha meṃ vinaya, duḥkha meṃ sāhasa| donoṃ meṃ hī prema kā abhyāsa||

  41. Chaupai 40

    bhairava, aisī buddhi jagāo| jīvana ko upahāra banāo||

  42. Closing verse

    śivagorakṣa kī prārthanā, arpita āja navīna| bhairava, rakhiyo cetanā, satya-sneha meṃ līna||

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।

  1. Original ShivGoraksh Bhairav prayer, 24 October 2026