पाठ, अर्थ और व्याख्या
भैरव चरणन ध्यान धरि, करूँ विनय मन खोल।
भय के बीच विवेक रहे, करुणा भरे सब बोल॥
अर्थ
भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
भैरव, मन में धीरज भर दो।
भय की गाँठें ढीली कर दो॥
अर्थ
मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
जागे भीतर दीप उजाला।
मिटे अहं का घना अँधियाला॥
अर्थ
भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
काल तुम्हारा रूप निराला।
क्षण-क्षण का हो मोल सँभाला॥
अर्थ
भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
बीता कल मैं छोड़ सकूँ अब।
आज करूँ सद्कर्म उचित सब॥
अर्थ
बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
जो कुछ टूटे, धीर धरूँ मैं।
टूटे मन का हाथ धरूँ मैं॥
अर्थ
हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
मेरा क्रोध न पथ को घेरे।
सुनना सीखूँ दुख बहुतेरे॥
अर्थ
क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
तीखा वचन रोकना सिखलाओ।
सच को कोमल स्वर में लाओ॥
अर्थ
कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
निज दुर्बलता देख न भागूँ।
धीरज लेकर फिर मैं जागूँ॥
अर्थ
अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
मन का दर्पण साफ रखूँ मैं।
अपने छल को देख सकूँ मैं॥
अर्थ
मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
जो अनजाना, उसे न ठुकराऊँ।
पहले सुनकर फिर समझाऊँ॥
अर्थ
अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
कपटी लाभ न मन को भाये।
श्रम का अन्न हृदय सुख पाये॥
अर्थ
छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
दीन जनों से दूर न जाऊँ।
अपना थोड़ा भाग बँटाऊँ॥
अर्थ
ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
निर्बल प्राणी भय न पावें।
मेरे हाथ सहारा लावें॥
अर्थ
निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
द्वार खुले सद्भाव हमारे।
जाति-भेद के मिटें अँधियारे॥
अर्थ
सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
भिन्न मतों का मान निभाऊँ।
अपने मद में उन्हें न दबाऊँ॥
अर्थ
अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
भैरव, दे दो दृष्टि सुहानी।
हर चेहरे में देखूँ कहानी॥
अर्थ
हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
जो गलती की, उसे सुधारूँ।
केवल दोष न औरों धारूँ॥
अर्थ
अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
क्षमा माँगने में न सकुचाऊँ।
क्षमा मिले तो शीश नवाऊँ॥
अर्थ
क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
गुरु-मर्यादा मन में राखूँ।
निज अधिकार न झूठा भाखूँ॥
अर्थ
गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
नाथ-स्मरण में मन ठहराऊँ।
अनुशासन को प्रेम बनाऊँ॥
अर्थ
नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
निज अनुभव को सब न बताऊँ।
एक रीति सब पर न चलाऊँ॥
अर्थ
अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
शिव-स्मृति से सरल बनूँ मैं।
दिखलावे से दूर रहूँ मैं॥
अर्थ
शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
मौन मिले तो सजग रहूँ मैं।
शब्द मिलें तो हित ही कहूँ मैं॥
अर्थ
मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
साँझ ढले तो दिन को देखूँ।
मन के लेखे सच ही लेखूँ॥
अर्थ
संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
कल की चिन्ता आज न खाये।
आज की सेवा राह दिखाये॥
अर्थ
भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
संकट में भी साथ निभाऊँ।
झूठे आश्वासन न बँटाऊँ॥
अर्थ
कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
आशा रखूँ, यत्न न छोड़ूँ।
टूटी डोरी फिर से जोड़ूँ॥
अर्थ
आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
भक्ति बने न केवल गान।
दुःखी जनों का हो सम्मान॥
अर्थ
भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
खेत, नदी, वन सभी सँभालूँ।
धरती माँ का मान न टालूँ॥
अर्थ
खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
अन्न मिले तो कृतज्ञता लाऊँ।
जल की बूँद न व्यर्थ बहाऊँ॥
अर्थ
अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
जीवन क्षणभंगुर पहचानूँ।
इसीलिए हर मिलन सँभालूँ॥
अर्थ
जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
कपाल-चिह्न यह याद दिलाये।
मानव देह सदा न रह पाये॥
अर्थ
कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
भस्म सदृश हो मेरा अभिमान।
भीतर जागे समता-ज्ञान॥
अर्थ
अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
त्रिशूल देखूँ तो यह चाहूँ।
भय, छल, द्वेष से दूर मैं जाऊँ॥
अर्थ
त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
काशी-रक्षक नाम तुम्हारा।
निज आचरण बने रखवारा॥
अर्थ
काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
अन्ध-विश्वास न बुद्धि दबाये।
श्रद्धा प्रश्नों से न घबराये॥
अर्थ
अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
चमत्कार की माँग न लाऊँ।
सद्बुद्धि का दीपक चाहूँ॥
अर्थ
चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
अपना पथ मैं सत्य से साधूँ।
दूसर का सम्मान न त्यागूँ॥
अर्थ
अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
सुख में विनय, दुःख में साहस।
दोनों में ही प्रेम का अभ्यास॥
अर्थ
सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
भैरव, ऐसी बुद्धि जगाओ।
जीवन को उपहार बनाओ॥
अर्थ
ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
शिवगोरक्ष की प्रार्थना, अर्पित आज नवीन।
भैरव, रखियो चेतना, सत्य-स्नेह में लीन॥
अर्थ
शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है।
व्याख्या
यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।
सन्दर्भ और उपयोग
सन्दर्भ और संस्करण
यह २४ अक्टूबर २०२६ के संस्थापक निर्देश पर AI की सहायता से शिवगोरक्ष के लिए लिखी नई हिन्दी प्रार्थना है। यह पुरानी भैरव चालीसा या ऐतिहासिक नाथ-परम्परा का पाठ नहीं है। इस संस्करण के वास्तविक 42 पाठ-खण्ड सुरक्षित हैं। रोमन पाठ देवनागरी का वर्तनी-आधारित IAST रूप है; हिन्दी बोलचाल के स्वर-लोप अलग हो सकते हैं। स्वतंत्र भाषा एवं छन्द समीक्षा अधूरी है।
पाठ की मर्यादा
इसे भक्ति-काव्य के रूप में पढ़ें। यह दीक्षा, अनुष्ठानिक अधिकार, आरोग्य-धन की गारंटी या अग्नि-विधि का निर्देश नहीं देता। पारम्परिक पाठ में नाम, कथा और फल-कथन उसी स्तुति की भाषा हैं।
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव का ध्यान करके खुले मन से विवेक और करुणा की प्रार्थना है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन में धैर्य आए और भय की पकड़ ढीली हो। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भीतर समझ का प्रकाश हो और अहंकार घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भैरव के स्मरण से समय का मूल्य समझ में आए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: बीते कल में अटके बिना आज अच्छे कर्म कर सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हानि में धैर्य रहे और दुःखी व्यक्ति का साथ दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्रोध बाधा न बने और दूसरों का दुःख सुन सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कटु बोल रोककर सच्ची बात नम्रता से कह सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी कमियाँ देखकर भागूँ नहीं, धैर्य से नया प्रयास करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मन साफ रखकर अपना छल पहचान सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपरिचित बात को ठुकराने से पहले सुनकर समझ सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: छल से कमाई न लुभाए, ईमानदार श्रम में सन्तोष मिले। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ज़रूरतमंदों से मुँह न मोड़ूँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बाँटूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: निर्बल प्राणियों को डराने के बजाय सहारा दे सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सद्भाव बढ़े और जातिगत भेदभाव घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अलग मतों का सम्मान करूँ, अहंकार से उन्हें न दबाऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: हर व्यक्ति की परिस्थिति को करुणा से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपनी गलती सुधारूँ और केवल दूसरों पर दोष न डालूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: क्षमा माँगने में संकोच न हो और मिली क्षमा का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: गुरु की मर्यादा रखूँ और अपने पास न होने वाला अधिकार न जताऊँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: नाथ-स्मरण से मन स्थिर हो और अनुशासन प्रेमपूर्ण बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने अनुभव या एक परम्परा को सब पर लागू न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिव-स्मरण से सरलता आए और दिखावा घटे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: मौन में सजगता और वाणी में हितभाव रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: संध्या में दिन के व्यवहार को ईमानदारी से देख सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भविष्य की चिन्ता में आज न खोए, वर्तमान की सेवा मार्ग दिखाए। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कठिनाई में साथ दूँ, झूठे वादे न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: आशा के साथ प्रयास रहे और टूटे सम्बन्ध सँभाल सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: भक्ति के साथ दुःखी लोगों की सुध भी ले सकूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: खेत, नदी और वन का सम्मान करूँ, धरती के उपकार न भूलूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्न के लिए कृतज्ञता रहे और जल व्यर्थ न करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: जीवन की क्षणभंगुरता समझकर हर मिलन का आदर करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: कपाल का प्रतीक शरीर की नश्वरता का स्मरण कराता है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अभिमान शान्त हो और समता की समझ जागे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: त्रिशूल देखकर भय, छल और द्वेष से दूर होने की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: काशी-रक्षक के स्मरण से अपने आचरण की रक्षा सीखूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अन्धविश्वास विवेक न दबाए और श्रद्धा सच्चे प्रश्नों से न डरे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: चमत्कार की ज़िद के बजाय सद्बुद्धि की कामना करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: अपने मार्ग पर सत्यनिष्ठ रहकर दूसरे के मार्ग का सम्मान करूँ। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: सुख में नम्रता, दुःख में साहस और दोनों में प्रेम बना रहे। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: ऐसी बुद्धि जागे कि जीवन दूसरों के लिए उपयोगी उपहार बने। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है। शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है। यह नई प्रार्थना का अपना भाव है: शिवगोरक्ष की यह नई प्रार्थना चेतना को सत्य और स्नेह में स्थिर रखने की विनती करती है। यह किसी प्राचीन पाठ या दीक्षा-विधि का अनुवाद नहीं है।