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सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

स्तोत्र

अन्नपूर्णा स्तोत्रम्: सम्पूर्ण पाठ, अर्थ और पाठभेद

भोजन, करुणा, ज्ञान और वैराग्य को जोड़ने वाली माँ अन्नपूर्णा की काशी-केन्द्रित प्रार्थना।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

श्रीगणेशाय नमः ॥

अर्थ

स्तोत्र से पहले मुद्रित श्रीगणेश का मंगलाचरण।

व्याख्या

यह संग्रह में स्तोत्र से पहले आया मंगलाचरण है; इसे अन्नपूर्णा के बारह पदों में नहीं गिनते।

1

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी । प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १ ॥

अर्थ

नित्य आनन्द, वरदान और निर्भयता देने वाली, सौन्दर्य की निधि, भयावह अशुभता को दूर कर पवित्र करने वाली प्रत्यक्ष महेश्वरी! हिमालयवंश को पावन करने वाली काशी की अधीश्वरी अन्नपूर्णेश्वरी, कृपा का आश्रय देकर मुझे भिक्षा दें।

व्याख्या

पहले श्लोक में भोजन देने वाली माता के साथ निर्भयता और पवित्रता देने वाली देवी का स्वरूप भी आता है। वराभय का आशय वर और अभय से है; प्रालेयाचल हिमालय का काव्यात्मक नाम है, जिससे अन्नपूर्णा का पार्वती से सम्बन्ध खुलता है। भिक्षा याचक को दिया जाने वाला अन्न भी है और कृपा का प्रतीक भी। बार-बार बोला गया ‘भिक्षां देहि’ हमें केवल पाने की इच्छा ही नहीं, दूसरों की भूख के प्रति संवेदना भी याद दिला सकता है। यह स्तुति है, किसी विशेष फल की गारंटी नहीं।

2

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी । काश्मीरागुरुवासिता रुचिकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ २ ॥

अर्थ

अनेक रत्नों के आभूषणों, स्वर्णाभ वस्त्रों और वक्षस्थल पर झूलती मोतीमाला से शोभित; केसर तथा अगरु की सुगन्ध से युक्त, कांति देने वाली काशी की अधीश्वरी माता, मुझे कृपा-भिक्षा दें।

व्याख्या

रत्न, स्वर्ण-वस्त्र, मोती, केसर और अगरु की सुगन्ध से देवी का राजसी सौन्दर्य उभरता है। यहाँ काश्मीरा को केसर के अर्थ में पढ़ना सम्भव है; इसे देवी के निवास का भूगोल न समझें। विडम्बना नहीं, बल्कि सुन्दर विरोध है कि इतने ऐश्वर्य के सामने भक्त केवल भिक्षा माँगता है। यह भिक्षा जीवन के आधारभूत पोषण और माता से निकटता की याद दिलाती है।

3

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी । सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ३ ॥

अर्थ

योग से जुड़ा आनन्द देने वाली, विरोधी शक्तियों को शांत करने वाली, धर्म तथा उचित अर्थोपार्जन में निष्ठा देने वाली; चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि-जैसी दीप्तिमान, तीनों लोकों की रक्षिका तथा समृद्धि देने वाली माता, कृपा-भिक्षा दें।

व्याख्या

इस पद में योगानन्द और धर्मार्थनिष्ठा साथ आते हैं। भोजन तथा सुरक्षित जीवन के बिना साधना और नैतिक कर्तव्य निभाना भी कठिन हो सकता है। ‘रिपुक्षय’ का मूल अर्थ शत्रु-दमन है; आधुनिक पाठक इसे क्रोध, लालच जैसे आन्तरिक विरोधों से भी जोड़ सकते हैं, पर यह व्याख्या है, शब्द का एकमात्र अर्थ नहीं। चन्द्र–सूर्य–अग्नि की उपमा देवी के तेज की काव्यात्मक स्तुति है।

4

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी । मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ४ ॥

अर्थ

कैलास की कन्दराओं में वास करने वाली गौरी, उमा, शंकरी और कौमारी; वेद-वचन के भाव को समझने योग्य बनाने वाली, ओंकार से सम्बद्ध, मुक्ति के बन्द कपाट खोलने वाली काशी-अधीश्वरी माता, भिक्षा दें।

व्याख्या

यहाँ अन्नपूर्णा के गौरी, उमा और शंकरी नाम उन्हें पार्वती के रूप में पहचानते हैं। निगम वेद-वाणी के लिए प्रयुक्त शब्द है; ओंकार-बीजाक्षरी ओम् से जुड़ी उपाधि है। ‘मोक्षद्वार के कपाट खोलना’ भीतर की मुक्ति का रूपक है—कृपा से बन्द राह खुलने की कल्पना। किसी बीजाक्षर का उल्लेख होने भर से यह स्तोत्र दीक्षा, न्यास या गुप्त अनुष्ठान का निर्देश नहीं बन जाता।

5

दृश्यादृश्यप्रभूतवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी । श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ५ ॥

अर्थ

दृश्य-अदृश्य जगत् की व्यापकता को धारण करने वाली, ब्रह्माण्ड को अपने भीतर समेटने वाली; संसार के लीला-नाटक के सूत्रों को खोलने वाली, विवेक-ज्ञान के दीप की चिनगारी, विश्वेश्वर शिव को प्रसन्न करने वाली माता, मुझे भिक्षा दें।

व्याख्या

ब्रह्माण्डभाण्डोदरी में सम्पूर्ण जगत् को माता के उदर-रूपी पात्र में देखने की कल्पना है। विज्ञानदीप विवेक या विशेष ज्ञान का प्रकाश है। ‘लीला-नाटक के सूत्र’ वाला बड़ा समास कठिन है; संसार के बन्धन और उसके रहस्य को समझने के रूप में इसे पढ़ा जा सकता है। यह शाब्दिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान नहीं। इस पुराने मुद्रित पाठ में प्रभूतवाहनकरी है, जबकि आधुनिक पाठों में विभूतिवाहनकरी भी मिलता है; दोनों को एक पंक्ति में मिलाना ठीक नहीं।

6

उर्वी सर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी । सर्वानन्दकरी दशाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ६ ॥

अर्थ

पृथ्वी-स्वरूपा, सब जनों की अधीश्वरी भगवती अन्नपूर्णा, वेणी-सी गहरी-काली लहराती केशराशि वाली, नित्य अन्नदान की स्वामिनी; सभी को आनन्द और दशा को शुभता देने वाली माता, कृपा-भिक्षा दें।

व्याख्या

उर्वी पृथ्वी है; माता को सम्पूर्ण पृथ्वी और प्रतिदिन अन्न देने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है। नित्यान्नदान केवल धन का प्रदर्शन नहीं, नियमित पोषण का आदर्श भी याद दिलाता है। आधुनिक पाठक इससे जरूरतमन्द को सम्मानपूर्वक भोजन देने की प्रेरणा ले सकता है। यहाँ छपे दशाशुभकरी का भाव जीवन की दशा को शुभ बनाने वाली है; प्रचलित सदाशुभकरी अलग पाठ है, जिसे मूल में बदलना उचित नहीं।

7

आदिक्षान्तिसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी काश्मीरा त्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी । कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ७ ॥

अर्थ

‘अ’ से ‘क्ष’ तक समस्त वर्णमाला में प्रकट होने वाली, शम्भु के त्रिविध भाव से जुड़ी; काश्मीरा, त्रिजलेश्वरी, त्रिलहरी, नित्य अंकुरित रहने वाली और शर्वरी कहलाई माता, कामना जगाने तथा जनों का उत्थान करने वाली, भिक्षा दें।

व्याख्या

यह पद विशेष सावधानी से पढ़ना चाहिए। आदि–क्षान्त का सामान्य आशय ‘अ’ से ‘क्ष’ तक वर्णों का समूह है, लेकिन पुराने पृष्ठ का आदिक्षान्ति रूप तथा त्रिजलेश्वरी, त्रिलहरी जैसे शब्द विशेषज्ञ जाँच माँगते हैं। कई आधुनिक पाठों में यहाँ त्रिपुरेश्वरी, त्रिनयनी का भिन्न क्रम मिलता है। इस मसौदे में छपे शब्द रखे गए हैं और उनके आधार पर कोई निश्चित तांत्रिक सिद्धान्त घोषित नहीं किया गया।

8

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी । भक्ताभीष्टकरी दशाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ८ ॥

अर्थ

अनेक अद्भुत रत्नों से अलंकृत सुन्दरी दाक्षायणी देवी; वामभाग, मातृस्तन्य के पोषण और माहेश्वरी की सौभाग्यदायिनी छवि से जुड़ी, भक्तों की अभिलाषा तथा जीवन की दशा में शुभता लाने वाली काशी की अधीश्वरी, भिक्षा दें।

व्याख्या

दाक्षायणी दक्ष-कन्या सती का नाम है, जिससे शिव–शक्ति की व्यापक कथा याद आती है। वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी का समास इस छपे रूप में व्याकरण की दृष्टि से सरल नहीं है। इसे शिव के वामभाग और मातृपोषण की भावना से समझा जा सकता है, पर निश्चित पदच्छेद विशेषज्ञ को करना होगा। हमने मूल का वामं बदला नहीं; वामा/वामे जैसे पाठ अलग रूप में दर्ज हैं।

9
विषय-सूची पर लौटें

चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी । मालापुस्तकपाशसाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ ९ ॥

अर्थ

असंख्य चन्द्रमाओं, सूर्यों और अग्नियों-जैसे तेज वाली, चन्द्र-किरण और बिम्ब-फल की उपमाओं से सुशोभित; माला, पुस्तक, पाश और अंकुश धारण करने वाली काशी-अधीश्वरी माता, मुझे भिक्षा दें।

व्याख्या

यहाँ देवी के तेज की तुलना करोड़ों-करोड़ों चन्द्र, सूर्य और अग्नियों से होती है। माला, पुस्तक, पाश और अंकुश को भक्ति, शिक्षा, संयम तथा दिशा-प्रदान के प्रतीकों की तरह समझा जा सकता है; हर अन्नपूर्णा-मूर्ति के लिए इन्हीं चार वस्तुओं का होना अनिवार्य नहीं। छपे पाठ में कुन्तलधरी अर्थात् केशधारण करने वाली है, जबकि एक अन्य पाठ में कुण्डलधरी अर्थात् कुण्डलधारण करने वाली मिलता है। यह अर्थ बदलने वाला वास्तविक पाठभेद है।

10

क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी । दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥ १० ॥

अर्थ

रक्षा और महान अभय देने वाली कृपासागर माता, मुक्ति एवं शिवमय कल्याण की दात्री, विश्वेश्वर की श्री धारण करने वाली; दक्ष के विलाप के प्रसंग तथा निरामयता से जुड़ी काशी-अधीश्वरी माता, कृपा-भिक्षा दें।

व्याख्या

अन्तिम मुख्य पद में रक्षा, अभय, मुक्ति और कल्याण की विशेषताएँ एकत्र हैं। दक्षाक्रन्दकरी सती–शिव से जुड़ी दक्ष की कथा का संकेत करती है; पूरी कथा इस स्तोत्र में नहीं दी गई। निरामयकरी धार्मिक प्रशंसा है, किसी रोग के उपचार का वैज्ञानिक वादा नहीं। पुराने मुद्रण का विश्वेश्वरश्रीधरी आधुनिक विश्वेश्वरी श्रीधरी से अलग है; इस मसौदे में पुराना पाठ ही रखा गया है।

11

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥ ११ ॥

अर्थ

हे सदा पूर्ण रहने वाली, शंकर को प्राणों-सी प्रिय अन्नपूर्णा-पार्वती! ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए मुझे भिक्षा दें।

व्याख्या

इस छोटी प्रार्थना में माँगी गई भिक्षा का अर्थ स्पष्ट होता है—ज्ञान और वैराग्य। वैराग्य का अर्थ शरीर, परिवार या भूखे व्यक्ति की उपेक्षा करना नहीं; वह आसक्ति से मुक्त, समझदार जीवन का गुण हो सकता है। छपे ग्रन्थ में यह ग्यारहवाँ पद है और दस मुख्य स्तुति-पदों के बाद समापन-प्रार्थना के रूप में आता है।

12

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः । बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥ १२ ॥

अर्थ

देवी पार्वती मेरी माता और देव महेश्वर मेरे पिता हैं; शिवभक्त मेरे बन्धु हैं और तीनों लोक मेरा अपना देश हैं।

व्याख्या

आखिरी पद में अपना परिवार सम्पूर्ण जगत् तक फैल जाता है। भुवनत्रय भारतीय परम्परा के तीन लोकों का संकेत है; यहाँ उसका भाव अपनत्व की सीमा को बड़ा करना है। यह वास्तविक माता-पिता, परिवार या अन्य आस्थाओं के लोगों को नकारने का आदेश नहीं। पुराने छपे पाठ में माता च है, कुछ प्रचलित ऑनलाइन पाठों में माता मे मिलता है—दोनों को बिना सूचना मिलाना उचित नहीं।

14
विषय-सूची पर लौटें

इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितमन्नपूर्णाष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

अर्थ

मुद्रित समापन-वाक्य इस स्तोत्र को शंकराचार्य-रचित बताता है और पाठ समाप्त घोषित करता है; यह ऐतिहासिक लेखक-निर्धारण का स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है।

व्याख्या

समापन में ‘अष्टक’ नाम है, लेकिन इसी मुद्रण में दस मुख्य और दो समापन पद क्रमांकित हैं। इसलिए नाम के कारण मूल श्लोकों की संख्या आठ नहीं कर दी गई।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-परिचय: बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (१९१२), प्रविष्टि ८३, मुद्रित पृष्ठ १६०–१६१ (कॉमन्स स्कैन पत्र १८८–१८९) के पुराने मुद्रण में आरम्भ का गणेश-मंगलाचरण, दस मुख्य स्तुति-पद, दो समापन-प्रार्थनाएँ तथा अलग समापन-वाक्य हैं; सब यहाँ शामिल हैं। मुद्रक ने पद २–१० में ‘भिक्षां देहि०’ से पूरी टेक संक्षिप्त की थी। पाठक-सुविधा से प्रथम पद की टेक उन सभी में पूरी लिखी है। अन्य संस्करणों के तीन अतिरिक्त पद इस मुद्रित पाठ में नहीं हैं 13।

मंगलाचरण

अर्थ: स्तोत्र से पहले मुद्रित श्रीगणेश का मंगलाचरण। व्याख्या: यह संग्रह में स्तोत्र से पहले आया मंगलाचरण है; इसे अन्नपूर्णा के बारह पदों में नहीं गिनते।

समापन-वाक्य

अर्थ: मुद्रित समापन-वाक्य इस स्तोत्र को शंकराचार्य-रचित बताता है और पाठ समाप्त घोषित करता है; यह ऐतिहासिक लेखक-निर्धारण का स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है। व्याख्या: समापन में ‘अष्टक’ नाम है, लेकिन इसी मुद्रण में दस मुख्य और दो समापन पद क्रमांकित हैं। इसलिए नाम के कारण मूल श्लोकों की संख्या आठ नहीं कर दी गई।

अन्नपूर्णा का स्वरूप और ‘भिक्षां देहि’ का भाव

अन्नपूर्णा शब्द में अन्न यानी भोजन/पोषण और पूर्णा यानी परिपूर्णता का भाव है। स्तोत्र के प्रत्येक बड़े पद में देवी के अनेक नाम, आभूषण, गुण या विश्वरूप का वर्णन आता है और अंत में वही सहज याचना लौटती है—भिक्षां देहि। इससे पाठक को अनुभव होता है कि बड़े से बड़ा आध्यात्मिक आदर्श भी रोज़ के भोजन और दूसरे के सामने हाथ फैलाने की मानवीय परिस्थिति से अलग नहीं है। भोजन पाने वाले का सम्मान भी इस पाठ का महत्त्वपूर्ण समकालीन अर्थ हो सकता है। यहाँ देवी काशीपुराधीश्वरी हैं। काशी की जीवित परम्परा में अन्नपूर्णा पार्वती का रूप मानी जाती हैं और उनका मंदिर काशी विश्वनाथ के पास है 56। एक प्रसिद्ध कथा में शिव को भोजन का महत्त्व समझाने के लिए पार्वती अन्नपूर्णा के रूप में अन्न प्रदान करती हैं। यह कथा लोक-परम्परा का सन्दर्भ है; इसे बारह श्लोकों का शाब्दिक कथानक न समझें। अन्त की दो प्रार्थनाएँ भोजन से आगे ले जाती हैं—पहली में ज्ञान-वैराग्य की भिक्षा, दूसरी में सम्पूर्ण तीनों लोकों को अपना देश मानने का भाव आता है। वैराग्य को दूसरों की भूख से विमुखता नहीं समझना चाहिए। उलटे, आसक्ति घटाकर किसी को सम्मान से भोजन देना भी इस पाठ की एक सार्थक नैतिक प्रतिध्वनि हो सकती है। यहाँ कोई विधिवत् भोजनदान-नियम या मूहूर्त नहीं बनाया गया है।

पाठ-सीमा, पुराना मुद्रण और रचयिता

चुने गए संग्रह की शीर्ष पंक्ति में अन्नपूर्णास्तोत्रम् लिखा है; अन्तिम पंक्ति उसे अन्नपूर्णाष्टकस्तोत्रम् कहती है। फिर भी उसी छपे पाठ में बारह क्रमांकित पद हैं—दस लम्बे स्तुति-पद और दो छोटी समापन-प्रार्थनाएँ। ‘अष्टक’ नाम देखकर केवल आठ पद रखना इस साक्षी के प्रति ईमानदार नहीं होगा। कॉमन्स की स्कैन शीट १८८–१८९, पुस्तक के छपे पृष्ठ १६०–१६१ हैं 1। पुराने संस्करण की समापन-पंक्ति में शंकराचार्य का नाम रचनाकार के रूप में है। परम्परा इसे आदि शंकराचार्य से जोड़ती है, पर केवल यह मुद्रित उल्लेख ऐतिहासिक लेखकीय प्रमाण नहीं बन जाता। इसीलिए लेखक को ‘परम्परागत रूप से आरोपित’ कहना उचित है। यह १९१२ का उपलब्ध मुद्रित पाठ है, सर्वमान्य आलोचनात्मक संस्करण नहीं।

मुख्य पाठभेद और सम्पादकीय निर्णय

पाँचवें श्लोक में यहाँ प्रभूतवाहनकरी है, कुछ ऑनलाइन पाठों में विभूतिवाहनकरी; छठे और आठवें में दशाशुभकरी, अन्यत्र सदाशुभकरी आदि; सातवें में त्रिजलेश्वरी त्रिलहरी, कहीं त्रिपुरेश्वरी त्रिनयनी; नवें में कुन्तलधरी, दूसरे पाठ में कुण्डलधरी; दसवें में विश्वेश्वरश्रीधरी, दूसरे पाठ में विश्वेश्वरी श्रीधरी; और बारहवें का आरम्भ माता च, अन्य पाठों में माता मे भी मिलता है। इन सबका क्रम, स्वरूप और स्रोत स्रोत-सूची तथा मूल पाठ-अभिलेख में अलग दर्ज है 134। कुछ आधुनिक संस्करण दसवें पद के बाद तीन अलग श्लोक जोड़ते हैं। इस चुने गए १९१२ संस्करण में वे नहीं हैं, इसलिए मूल पाठ में नहीं जोड़े गए। उनके किसी अन्य तांत्रिक पाठ से सम्बन्ध के दावे का आगे अलग अध्ययन आवश्यक है। रोमन IAST लिप्यन्तरण अभी यांत्रिक-सहायता से तैयार है; संस्कृत विशेषज्ञ की अन्तिम जाँच बाकी है।

सामान्य प्रश्न

इसे अन्नपूर्णाष्टकम् क्यों कहते हैं? ‘अष्टक’ नाम प्रचलित है और पुराने मुद्रित समापन में भी मिलता है। लेकिन इस साक्षी में दस मुख्य तथा दो समापन श्लोक हैं; प्रत्येक संस्करण की संख्या उसके अनुसार ही बतानी चाहिए। ‘भिक्षां देहि’ का अर्थ केवल अन्न माँगना है? मूल अर्थ भिक्षा/अन्न की याचना है, किन्तु भक्तिभाव में कृपा और जीवन का आधार भी समझा जा सकता है। ग्यारहवें पद में ज्ञान और वैराग्य की भिक्षा स्पष्ट माँगी गई है। क्या लेखक निश्चित रूप से आदि शंकराचार्य हैं? पाठ का मुद्रित कोलोफॉन शंकराचार्य का नाम देता है; केवल इससे ऐतिहासिक रचनाकाल या लेखकीय पहचान सिद्ध नहीं होती। क्या यह पाठ धन, भोजन, रोग-मुक्ति या मोक्ष की गारंटी देता है? नहीं। ये भक्तिभाव के स्तुतिपरक कथन हैं, चिकित्सकीय या आर्थिक आश्वासन नहीं। क्या किसी विशेष दीक्षा या मुहूर्त की अनिवार्यता है? इस पठन-सामग्री में कोई अनिवार्य अनुष्ठान, समय, गणना या व्यक्तिगत साधना-विधि नहीं दी जा रही।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    śrīgaṇeśāya namaḥ ||

  2. 1

    nityānandakarī varābhayakarī saundaryaratnākarī nirdhūtākhilaghorapāvanakarī pratyakṣamāheśvarī | prāleyācalavaṃśapāvanakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 1 ||

  3. 2

    nānāratnavicitrabhūṣaṇakarī hemāmbarāḍambarī muktāhāravilambamānavilasadvakṣojakumbhāntarī | kāśmīrāguruvāsitā rucikarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 2 ||

  4. 3

    yogānandakarī ripukṣayakarī dharmārthaniṣṭhākarī candrārkānalabhāsamānalaharī trailokyarakṣākarī | sarvaiśvaryasamastavāñchitakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 3 ||

  5. 4

    kailāsācalakandarālayakarī gaurī umā śaṅkarī kaumārī nigamārthagocarakarī oṅkārabījākṣarī | mokṣadvārakapāṭapāṭanakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 4 ||

  6. 5

    dṛśyādṛśyaprabhūtavāhanakarī brahmāṇḍabhāṇḍodarī līlānāṭakasūtrabhedanakarī vijñānadīpāṅkurī | śrīviśveśamanaḥprasādanakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 5 ||

  7. 6

    urvī sarvajaneśvarī bhagavatī mātānnapūrṇeśvarī veṇīnīlasamānakuntalaharī nityānnadāneśvarī | sarvānandakarī daśāśubhakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 6 ||

  8. 7

    ādikṣāntisamastavarṇanakarī śambhostribhāvākarī kāśmīrā trijaleśvarī trilaharī nityāṅkurā śarvarī | kāmākāṅkṣakarī janodayakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 7 ||

  9. 8

    devī sarvavicitraratnaracitā dākṣāyaṇī sundarī vāmaṃ svādupayodharapriyakarī saubhāgyamāheśvarī | bhaktābhīṣṭakarī daśāśubhakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 8 ||

  10. 9

    candrārkānalakoṭikoṭisadṛśā candrāṃśubimbādharī candrārkāgnisamānakuntaladharī candrārkavarṇeśvarī | mālāpustakapāśasāṅkuśadharī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 9 ||

  11. 10

    kṣatratrāṇakarī mahā'bhayakarī mātā kṛpāsāgarī sākṣānmokṣakarī sadā śivakarī viśveśvaraśrīdharī | dakṣākrandakarī nirāmayakarī kāśīpurādhīśvarī bhikṣāṃ dehi kṛpāvalambanakarī mātānnapūrṇeśvarī || 10 ||

  12. 11

    annapūrṇe sadāpūrṇe śaṅkaraprāṇavallabhe | jñānavairāgyasiddhyarthaṃ bhikṣāṃ dehi ca pārvati || 11 ||

  13. 12

    mātā ca pārvatī devī pitā devo maheśvaraḥ | bāndhavāḥ śivabhaktāśca svadeśo bhuvanatrayam || 12 ||

  14. 14

    iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitamannapūrṇāṣṭakastotraṃ sampūrṇam ||

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

पद 1

अर्थ: नित्य आनन्द, वरदान और निर्भयता देने वाली, सौन्दर्य की निधि, भयावह अशुभता को दूर कर पवित्र करने वाली प्रत्यक्ष महेश्वरी! हिमालयवंश को पावन करने वाली काशी की अधीश्वरी अन्नपूर्णेश्वरी, कृपा का आश्रय देकर मुझे भिक्षा दें। व्याख्या: पहले श्लोक में भोजन देने वाली माता के साथ निर्भयता और पवित्रता देने वाली देवी का स्वरूप भी आता है। वराभय का आशय वर और अभय से है; प्रालेयाचल हिमालय का काव्यात्मक नाम है, जिससे अन्नपूर्णा का पार्वती से सम्बन्ध खुलता है। भिक्षा याचक को दिया जाने वाला अन्न भी है और कृपा का प्रतीक भी। बार-बार बोला गया ‘भिक्षां देहि’ हमें केवल पाने की इच्छा ही नहीं, दूसरों की भूख के प्रति संवेदना भी याद दिला सकता है। यह स्तुति है, किसी विशेष फल की गारंटी नहीं।

पद 2

अर्थ: अनेक रत्नों के आभूषणों, स्वर्णाभ वस्त्रों और वक्षस्थल पर झूलती मोतीमाला से शोभित; केसर तथा अगरु की सुगन्ध से युक्त, कांति देने वाली काशी की अधीश्वरी माता, मुझे कृपा-भिक्षा दें। व्याख्या: रत्न, स्वर्ण-वस्त्र, मोती, केसर और अगरु की सुगन्ध से देवी का राजसी सौन्दर्य उभरता है। यहाँ काश्मीरा को केसर के अर्थ में पढ़ना सम्भव है; इसे देवी के निवास का भूगोल न समझें। विडम्बना नहीं, बल्कि सुन्दर विरोध है कि इतने ऐश्वर्य के सामने भक्त केवल भिक्षा माँगता है। यह भिक्षा जीवन के आधारभूत पोषण और माता से निकटता की याद दिलाती है।

पद 3

अर्थ: योग से जुड़ा आनन्द देने वाली, विरोधी शक्तियों को शांत करने वाली, धर्म तथा उचित अर्थोपार्जन में निष्ठा देने वाली; चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि-जैसी दीप्तिमान, तीनों लोकों की रक्षिका तथा समृद्धि देने वाली माता, कृपा-भिक्षा दें। व्याख्या: इस पद में योगानन्द और धर्मार्थनिष्ठा साथ आते हैं। भोजन तथा सुरक्षित जीवन के बिना साधना और नैतिक कर्तव्य निभाना भी कठिन हो सकता है। ‘रिपुक्षय’ का मूल अर्थ शत्रु-दमन है; आधुनिक पाठक इसे क्रोध, लालच जैसे आन्तरिक विरोधों से भी जोड़ सकते हैं, पर यह व्याख्या है, शब्द का एकमात्र अर्थ नहीं। चन्द्र–सूर्य–अग्नि की उपमा देवी के तेज की काव्यात्मक स्तुति है।

पद 4

अर्थ: कैलास की कन्दराओं में वास करने वाली गौरी, उमा, शंकरी और कौमारी; वेद-वचन के भाव को समझने योग्य बनाने वाली, ओंकार से सम्बद्ध, मुक्ति के बन्द कपाट खोलने वाली काशी-अधीश्वरी माता, भिक्षा दें। व्याख्या: यहाँ अन्नपूर्णा के गौरी, उमा और शंकरी नाम उन्हें पार्वती के रूप में पहचानते हैं। निगम वेद-वाणी के लिए प्रयुक्त शब्द है; ओंकार-बीजाक्षरी ओम् से जुड़ी उपाधि है। ‘मोक्षद्वार के कपाट खोलना’ भीतर की मुक्ति का रूपक है—कृपा से बन्द राह खुलने की कल्पना। किसी बीजाक्षर का उल्लेख होने भर से यह स्तोत्र दीक्षा, न्यास या गुप्त अनुष्ठान का निर्देश नहीं बन जाता।

पद 5

अर्थ: दृश्य-अदृश्य जगत् की व्यापकता को धारण करने वाली, ब्रह्माण्ड को अपने भीतर समेटने वाली; संसार के लीला-नाटक के सूत्रों को खोलने वाली, विवेक-ज्ञान के दीप की चिनगारी, विश्वेश्वर शिव को प्रसन्न करने वाली माता, मुझे भिक्षा दें। व्याख्या: ब्रह्माण्डभाण्डोदरी में सम्पूर्ण जगत् को माता के उदर-रूपी पात्र में देखने की कल्पना है। विज्ञानदीप विवेक या विशेष ज्ञान का प्रकाश है। ‘लीला-नाटक के सूत्र’ वाला बड़ा समास कठिन है; संसार के बन्धन और उसके रहस्य को समझने के रूप में इसे पढ़ा जा सकता है। यह शाब्दिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान नहीं। इस पुराने मुद्रित पाठ में प्रभूतवाहनकरी है, जबकि आधुनिक पाठों में विभूतिवाहनकरी भी मिलता है; दोनों को एक पंक्ति में मिलाना ठीक नहीं।

पद 6

अर्थ: पृथ्वी-स्वरूपा, सब जनों की अधीश्वरी भगवती अन्नपूर्णा, वेणी-सी गहरी-काली लहराती केशराशि वाली, नित्य अन्नदान की स्वामिनी; सभी को आनन्द और दशा को शुभता देने वाली माता, कृपा-भिक्षा दें। व्याख्या: उर्वी पृथ्वी है; माता को सम्पूर्ण पृथ्वी और प्रतिदिन अन्न देने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है। नित्यान्नदान केवल धन का प्रदर्शन नहीं, नियमित पोषण का आदर्श भी याद दिलाता है। आधुनिक पाठक इससे जरूरतमन्द को सम्मानपूर्वक भोजन देने की प्रेरणा ले सकता है। यहाँ छपे दशाशुभकरी का भाव जीवन की दशा को शुभ बनाने वाली है; प्रचलित सदाशुभकरी अलग पाठ है, जिसे मूल में बदलना उचित नहीं।

पद 7

अर्थ: ‘अ’ से ‘क्ष’ तक समस्त वर्णमाला में प्रकट होने वाली, शम्भु के त्रिविध भाव से जुड़ी; काश्मीरा, त्रिजलेश्वरी, त्रिलहरी, नित्य अंकुरित रहने वाली और शर्वरी कहलाई माता, कामना जगाने तथा जनों का उत्थान करने वाली, भिक्षा दें। व्याख्या: यह पद विशेष सावधानी से पढ़ना चाहिए। आदि–क्षान्त का सामान्य आशय ‘अ’ से ‘क्ष’ तक वर्णों का समूह है, लेकिन पुराने पृष्ठ का आदिक्षान्ति रूप तथा त्रिजलेश्वरी, त्रिलहरी जैसे शब्द विशेषज्ञ जाँच माँगते हैं। कई आधुनिक पाठों में यहाँ त्रिपुरेश्वरी, त्रिनयनी का भिन्न क्रम मिलता है। इस मसौदे में छपे शब्द रखे गए हैं और उनके आधार पर कोई निश्चित तांत्रिक सिद्धान्त घोषित नहीं किया गया।

पद 8

अर्थ: अनेक अद्भुत रत्नों से अलंकृत सुन्दरी दाक्षायणी देवी; वामभाग, मातृस्तन्य के पोषण और माहेश्वरी की सौभाग्यदायिनी छवि से जुड़ी, भक्तों की अभिलाषा तथा जीवन की दशा में शुभता लाने वाली काशी की अधीश्वरी, भिक्षा दें। व्याख्या: दाक्षायणी दक्ष-कन्या सती का नाम है, जिससे शिव–शक्ति की व्यापक कथा याद आती है। वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी का समास इस छपे रूप में व्याकरण की दृष्टि से सरल नहीं है। इसे शिव के वामभाग और मातृपोषण की भावना से समझा जा सकता है, पर निश्चित पदच्छेद विशेषज्ञ को करना होगा। हमने मूल का वामं बदला नहीं; वामा/वामे जैसे पाठ अलग रूप में दर्ज हैं।

पद 9

अर्थ: असंख्य चन्द्रमाओं, सूर्यों और अग्नियों-जैसे तेज वाली, चन्द्र-किरण और बिम्ब-फल की उपमाओं से सुशोभित; माला, पुस्तक, पाश और अंकुश धारण करने वाली काशी-अधीश्वरी माता, मुझे भिक्षा दें। व्याख्या: यहाँ देवी के तेज की तुलना करोड़ों-करोड़ों चन्द्र, सूर्य और अग्नियों से होती है। माला, पुस्तक, पाश और अंकुश को भक्ति, शिक्षा, संयम तथा दिशा-प्रदान के प्रतीकों की तरह समझा जा सकता है; हर अन्नपूर्णा-मूर्ति के लिए इन्हीं चार वस्तुओं का होना अनिवार्य नहीं। छपे पाठ में कुन्तलधरी अर्थात् केशधारण करने वाली है, जबकि एक अन्य पाठ में कुण्डलधरी अर्थात् कुण्डलधारण करने वाली मिलता है। यह अर्थ बदलने वाला वास्तविक पाठभेद है।

पद 10

अर्थ: रक्षा और महान अभय देने वाली कृपासागर माता, मुक्ति एवं शिवमय कल्याण की दात्री, विश्वेश्वर की श्री धारण करने वाली; दक्ष के विलाप के प्रसंग तथा निरामयता से जुड़ी काशी-अधीश्वरी माता, कृपा-भिक्षा दें। व्याख्या: अन्तिम मुख्य पद में रक्षा, अभय, मुक्ति और कल्याण की विशेषताएँ एकत्र हैं। दक्षाक्रन्दकरी सती–शिव से जुड़ी दक्ष की कथा का संकेत करती है; पूरी कथा इस स्तोत्र में नहीं दी गई। निरामयकरी धार्मिक प्रशंसा है, किसी रोग के उपचार का वैज्ञानिक वादा नहीं। पुराने मुद्रण का विश्वेश्वरश्रीधरी आधुनिक विश्वेश्वरी श्रीधरी से अलग है; इस मसौदे में पुराना पाठ ही रखा गया है।

पद 11

अर्थ: हे सदा पूर्ण रहने वाली, शंकर को प्राणों-सी प्रिय अन्नपूर्णा-पार्वती! ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए मुझे भिक्षा दें। व्याख्या: इस छोटी प्रार्थना में माँगी गई भिक्षा का अर्थ स्पष्ट होता है—ज्ञान और वैराग्य। वैराग्य का अर्थ शरीर, परिवार या भूखे व्यक्ति की उपेक्षा करना नहीं; वह आसक्ति से मुक्त, समझदार जीवन का गुण हो सकता है। छपे ग्रन्थ में यह ग्यारहवाँ पद है और दस मुख्य स्तुति-पदों के बाद समापन-प्रार्थना के रूप में आता है।

पद 12

अर्थ: देवी पार्वती मेरी माता और देव महेश्वर मेरे पिता हैं; शिवभक्त मेरे बन्धु हैं और तीनों लोक मेरा अपना देश हैं। व्याख्या: आखिरी पद में अपना परिवार सम्पूर्ण जगत् तक फैल जाता है। भुवनत्रय भारतीय परम्परा के तीन लोकों का संकेत है; यहाँ उसका भाव अपनत्व की सीमा को बड़ा करना है। यह वास्तविक माता-पिता, परिवार या अन्य आस्थाओं के लोगों को नकारने का आदेश नहीं। पुराने छपे पाठ में माता च है, कुछ प्रचलित ऑनलाइन पाठों में माता मे मिलता है—दोनों को बिना सूचना मिलाना उचित नहीं।

  1. Bṛhatstotraratnākara (बृहत्स्तोत्ररत्नाकर), seventh reprint · स्रोत खोलें
  2. Bṛhat Stotra Ratnakar Part I (Khemraj Print) · स्रोत खोलें
  3. Śrī Annapūrṇāstotram, also called Annapūrṇāṣṭakam · स्रोत खोलें
  4. अन्नपूर्णास्तोत्रम् — Sanskrit Wikisource · स्रोत खोलें
  5. Annapurna Bhavani Temple (Varanasi), official Kashi portal · स्रोत खोलें
  6. Temples of Importance — Varanasi district · स्रोत खोलें
  7. Annapurna Stotram: source comparison and 1912 scan pointers · स्रोत खोलें