पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

आरती

जय पार्वती माता — चुना हुआ पूरा पाठ और सरल अर्थ

माता पार्वती की आरती—टेक और सात पद पहले, फिर हर पद का अर्थ, स्रोत और पाठभेद।

पठन की सेटिंग

सेटिंग इस पृष्ठ के URL में रहती है और पिछले या अगले अध्याय में भी लागू होती है। इसे सहेजने के लिए URL बुकमार्क करें। देवनागरी का विशेष पठन फ़ॉन्ट बना रहेगा।

सामान्य सेटिंग पर लौटें

पाठ, अर्थ और व्याख्या

टेक — सनातन माता

जय पार्वती माता, जय पार्वती माता। ब्रह्म सनातन देवी, शुभ फल की दाता॥

अर्थ

माता पार्वती की जय हो। भक्त उन्हें सनातन, परम दिव्य सत्ता से जुड़ी देवी तथा कल्याण का आशीष देने वाली माता कहकर प्रणाम करते हैं।

व्याख्या

टेक में पार्वती को सीधे माता कहकर पुकारा गया है। “ब्रह्म सनातन” का भाव शाश्वत दिव्यता, परम सत्ता या अनादि शक्ति की ओर हो सकता है; इसे बिना प्रमाण किसी एक दर्शन का तकनीकी सूत्र अथवा चारमुखी ब्रह्मा की चर्चा नहीं मानना चाहिए। “शुभ फल” जीवन में मंगल की भक्तिपूर्ण कामना है, निश्चित परिणाम का दावा नहीं। चुने हुए स्रोत में यही दो पंक्तियाँ हर अगले पद के बाद लौटती हैं 1।

रक्षक और जगदम्बा

अरिकुल कंटक नाशिनि, जय सेवक त्राता। जग जननी जगदम्बा, हरिहर गुण गाता॥

अर्थ

भक्त माता को बाधाएँ दूर करने वाली, अपनी शरण में आए जनों की रक्षक और समस्त जगत की जननी कहते हैं; हरि और हर से जुड़ा स्तुतिभाव उनकी महिमा बढ़ाता है।

व्याख्या

“अरिकुल” शत्रु-समूह और “कंटक” काँटे का बिंब है। इसका भाव संकट व भय से रक्षा है, किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का आदेश नहीं। “जगजननी/जगदम्बा” से पार्वती केवल पारिवारिक देवी नहीं रह जातीं, बल्कि विश्वमाता रूप में सामने आती हैं। “हरिहर गुण गाता” की संक्षिप्त व्याकरण-रचना से दो अर्थ सम्भव हैं—हरि और हर देवी की महिमा गाते हैं, या उनके नामों से जुड़ा संयुक्त स्तुतिभाव व्यक्त होता है। अंतिम अर्थ विशेषज्ञ समीक्षा का विषय है। इस पंक्ति के पूर्वार्ध में अन्य स्रोतों के पाठभेद मिलते हैं 23।

सिंह को वाहन साजे, कुण्डल है साथा। देव वधू जस गावत, नृत्य करत ताथा॥

अर्थ

देवी को सिंह-वाहिनी और कुण्डलधारिणी रूप में देखा गया है। देवांगनाएँ उनका यश गाती और नृत्य करती दिखाई गई हैं।

व्याख्या

सिंहवाहिनी रूप सामान्यतः दुर्गा की युद्धमयी प्रतिमा से जुड़ता है, जबकि अनेक उमा-महेश्वर मूर्तियों में पार्वती शिव के साथ बैठी दिखाई देती हैं। यहाँ दोनों रूपों का भक्तिपरक समन्वय है; इसे पार्वती की प्रत्येक प्रतिमा की निश्चित पहचान न बनाएँ 67। “ताथा” शब्द गीत की ध्वनि अथवा स्थानीय पाठ-परंपरा का अंश हो सकता है। उसे बिना प्रमाण किसी तय वाद्य या नृत्य-चरण का नाम बताना उचित नहीं।

सती और हिमालय-पुत्री

सतयुग रूप शील अतिसुन्दर, नाम सती कहलाता। हेमांचल घर जन्मी, सखियन संग राता॥

अर्थ

पद पहले देवी के सती नाम और उनके रूप-शील को याद करता है, फिर हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म और सखियों के साथ स्नेहमय जीवन का चित्र रखता है।

व्याख्या

पुराण-सम्बद्ध लोकप्रिय कथाओं में सती दक्ष की पुत्री हैं; बाद में पर्वतराज हिमवान और मेना के यहाँ पार्वती का जन्म माना जाता है। आरती इन दोनों जीवन-कथाओं को एक अखंड देवी-भाव में समेट देती है। “सतयुग” यहाँ पवित्र कथा-समय का काव्य-शब्द है, आरती की रचना-तिथि का प्रमाण नहीं। “हेमांचल” हिमालय और “सखियन” सहेलियों के घरेलू, आत्मीय संसार की स्मृति है। यह शिवपुराण का शब्दशः उद्धरण नहीं। हिमालय-पुत्री गौरी की पहचान संग्रहालय की कला-विवेचना में भी मिलती है 6।

शुम्भ निशुम्भ विदारे, हेमांचल स्थाता। सहस्र भुजा तनु धरि के, चक्र लियो हाथा॥

अर्थ

देवी को शुम्भ-निशुम्भ का संहार करने वाली कहा गया है। सहस्र भुजाओं और चक्र का चित्र उनके व्यापक सामर्थ्य का भक्तिपूर्ण वर्णन है।

व्याख्या

शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध देवीमाहात्म्य के विशेषतः नवम तथा दशम अध्यायों में आता है 8। वहाँ दुर्गा, चण्डिका आदि देवी-रूप प्रमुख हैं। आरती भक्तिभाव से उस विजय को पार्वती-महादेवी की महिमा से जोड़ती है। शैव और शाक्त परंपराओं में यह संबंध महत्त्वपूर्ण है, पर सभी दार्शनिक या चित्रपरंपराएँ समान शब्दों में इसे नहीं कहतीं। “सहस्र भुजा” असंख्य शक्तियों का काव्यमय चित्र है; उसे हर प्रतिमा के लिए अनिवार्य संख्या न समझें 7।

सृष्टि रूप तुही है जननी, शिव संग रंगराता। नन्दी भृंगी बीन लही, सारा जग मदमाता॥

अर्थ

माता को सृष्टिरूपा और शिव के संग आनंदमयी कहा गया है। नन्दी तथा भृंगी के साथ संगीत और उमंग से भरे जगत का काव्यचित्र उपस्थित होता है।

व्याख्या

“सृष्टिरूप” देवी की सर्वव्यापक महिमा का भक्तिपूर्ण कथन है; यह अपने-आप किसी दर्शन का पूरा सिद्धांत नहीं बना देता। “शिव संग” उमा-महेश्वर की युगल छवि का स्मरण कराता है, जिसे ऐतिहासिक मूर्तिकला में देखा जा सकता है 5। नन्दी शिव के प्रसिद्ध वाहन और गण हैं; भृंगी शैव आख्यानों के अन्य गण/भक्त के रूप में आते हैं। “बीन लही” क्षेत्रीय प्रयोग है—वाद्य धारण करने का भाव सम्भव है, लेकिन इसे किसी प्रमाणित ऐतिहासिक संगीत-प्रदर्शन का विवरण न समझें।

भक्त की निजी विनती

देवन अरज करत हम, चरण ध्यान लाता। तेरी कृपा रहे तो, मन नहिं भरमाता॥

अर्थ

देवताओं के समान भक्त भी माता से विनती करते हैं, उनका चरण-स्मरण करते हैं और कृपा से मन स्थिर रहने की प्रार्थना करते हैं।

व्याख्या

विश्वव्यापक देवी-वर्णन के बाद पाठ अचानक व्यक्तिगत स्वर अपनाता है। “चरण-ध्यान” श्रद्धा से देवी का स्मरण है; इससे कोई विशेष प्राणायाम अथवा दीक्षा-क्रम सिद्ध नहीं होता। चुने हुए स्रोत में “चरण ध्यान” और “तेरी कृपा ... मन नहिं भरमाता” है 1, जबकि द्रिक पंचांग में गाने और ताली बजाने का दूसरा पद मिलता है 2। दोनों को जोड़कर तीसरा काल्पनिक मूलपाठ बनाना ठीक नहीं।

मैया जी की आरती, भक्ति भाव से जो नर गाता। नित्य सुखी रह करके, सुख सम्पत्ति पाता॥

अर्थ

अंतिम पद में श्रद्धा से माता की आरती गाने वाले के सुख और समृद्धि की मंगलकामना की गई है।

व्याख्या

यह फलश्रुति-जैसी समापन-शैली है जिसमें भक्त के कल्याण की कामना की जाती है। इससे आय, आरोग्य या मानसिक दशा बदलने की वैज्ञानिक गारंटी नहीं निकलती। चुने हुए पाठ का अंत “मैया जी की आरती” से होता है 1। द्रिक पंचांग में “श्री प्रताप आरती मैया की” मिलता है 2। “प्रताप” कवि-नाम है या महिमा का शब्द—केवल अनुमान से फैसला नहीं किया जा सकता। पुराने मुद्रित साक्ष्य की जाँच बाकी है।

सन्दर्भ और उपयोग

स्रोत और अधिकार सूचना: टेक तथा सात पद नित्य के मूलपाठ वाले डेटा से लिए गए हैं, जिसे वह सार्वजनिक-क्षेत्र का पाठ बताता है 1। किसी दूसरे प्रकाशक का आधुनिक अर्थ नहीं लिया गया है।

टेक — सनातन माता

सरल अर्थ: माता पार्वती की जय हो। भक्त उन्हें सनातन, परम दिव्य सत्ता से जुड़ी देवी तथा कल्याण का आशीष देने वाली माता कहकर प्रणाम करते हैं। व्याख्या: टेक में पार्वती को सीधे माता कहकर पुकारा गया है। “ब्रह्म सनातन” का भाव शाश्वत दिव्यता, परम सत्ता या अनादि शक्ति की ओर हो सकता है; इसे बिना प्रमाण किसी एक दर्शन का तकनीकी सूत्र अथवा चारमुखी ब्रह्मा की चर्चा नहीं मानना चाहिए। “शुभ फल” जीवन में मंगल की भक्तिपूर्ण कामना है, निश्चित परिणाम का दावा नहीं। चुने हुए स्रोत में यही दो पंक्तियाँ हर अगले पद के बाद लौटती हैं 1।

रक्षक और जगदम्बा

सरल अर्थ: भक्त माता को बाधाएँ दूर करने वाली, अपनी शरण में आए जनों की रक्षक और समस्त जगत की जननी कहते हैं; हरि और हर से जुड़ा स्तुतिभाव उनकी महिमा बढ़ाता है। व्याख्या: “अरिकुल” शत्रु-समूह और “कंटक” काँटे का बिंब है। इसका भाव संकट व भय से रक्षा है, किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का आदेश नहीं। “जगजननी/जगदम्बा” से पार्वती केवल पारिवारिक देवी नहीं रह जातीं, बल्कि विश्वमाता रूप में सामने आती हैं। “हरिहर गुण गाता” की संक्षिप्त व्याकरण-रचना से दो अर्थ सम्भव हैं—हरि और हर देवी की महिमा गाते हैं, या उनके नामों से जुड़ा संयुक्त स्तुतिभाव व्यक्त होता है। अंतिम अर्थ विशेषज्ञ समीक्षा का विषय है। इस पंक्ति के पूर्वार्ध में अन्य स्रोतों के पाठभेद मिलते हैं 23।

सिंह, कुण्डल और देव-स्तुति

सरल अर्थ: देवी को सिंह-वाहिनी और कुण्डलधारिणी रूप में देखा गया है। देवांगनाएँ उनका यश गाती और नृत्य करती दिखाई गई हैं। व्याख्या: सिंहवाहिनी रूप सामान्यतः दुर्गा की युद्धमयी प्रतिमा से जुड़ता है, जबकि अनेक उमा-महेश्वर मूर्तियों में पार्वती शिव के साथ बैठी दिखाई देती हैं। यहाँ दोनों रूपों का भक्तिपरक समन्वय है; इसे पार्वती की प्रत्येक प्रतिमा की निश्चित पहचान न बनाएँ 67। “ताथा” शब्द गीत की ध्वनि अथवा स्थानीय पाठ-परंपरा का अंश हो सकता है। उसे बिना प्रमाण किसी तय वाद्य या नृत्य-चरण का नाम बताना उचित नहीं।

सती और हिमालय-पुत्री

सरल अर्थ: पद पहले देवी के सती नाम और उनके रूप-शील को याद करता है, फिर हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म और सखियों के साथ स्नेहमय जीवन का चित्र रखता है। व्याख्या: पुराण-सम्बद्ध लोकप्रिय कथाओं में सती दक्ष की पुत्री हैं; बाद में पर्वतराज हिमवान और मेना के यहाँ पार्वती का जन्म माना जाता है। आरती इन दोनों जीवन-कथाओं को एक अखंड देवी-भाव में समेट देती है। “सतयुग” यहाँ पवित्र कथा-समय का काव्य-शब्द है, आरती की रचना-तिथि का प्रमाण नहीं। “हेमांचल” हिमालय और “सखियन” सहेलियों के घरेलू, आत्मीय संसार की स्मृति है। यह शिवपुराण का शब्दशः उद्धरण नहीं। हिमालय-पुत्री गौरी की पहचान संग्रहालय की कला-विवेचना में भी मिलती है 6।

शुम्भ-निशुम्भ और बहुभुजा देवी

सरल अर्थ: देवी को शुम्भ-निशुम्भ का संहार करने वाली कहा गया है। सहस्र भुजाओं और चक्र का चित्र उनके व्यापक सामर्थ्य का भक्तिपूर्ण वर्णन है। व्याख्या: शुम्भ और निशुम्भ से युद्ध देवीमाहात्म्य के विशेषतः नवम तथा दशम अध्यायों में आता है 8। वहाँ दुर्गा, चण्डिका आदि देवी-रूप प्रमुख हैं। आरती भक्तिभाव से उस विजय को पार्वती-महादेवी की महिमा से जोड़ती है। शैव और शाक्त परंपराओं में यह संबंध महत्त्वपूर्ण है, पर सभी दार्शनिक या चित्रपरंपराएँ समान शब्दों में इसे नहीं कहतीं। “सहस्र भुजा” असंख्य शक्तियों का काव्यमय चित्र है; उसे हर प्रतिमा के लिए अनिवार्य संख्या न समझें 7।

सृष्टि, शिव, नन्दी और भृंगी

सरल अर्थ: माता को सृष्टिरूपा और शिव के संग आनंदमयी कहा गया है। नन्दी तथा भृंगी के साथ संगीत और उमंग से भरे जगत का काव्यचित्र उपस्थित होता है। व्याख्या: “सृष्टिरूप” देवी की सर्वव्यापक महिमा का भक्तिपूर्ण कथन है; यह अपने-आप किसी दर्शन का पूरा सिद्धांत नहीं बना देता। “शिव संग” उमा-महेश्वर की युगल छवि का स्मरण कराता है, जिसे ऐतिहासिक मूर्तिकला में देखा जा सकता है 5। नन्दी शिव के प्रसिद्ध वाहन और गण हैं; भृंगी शैव आख्यानों के अन्य गण/भक्त के रूप में आते हैं। “बीन लही” क्षेत्रीय प्रयोग है—वाद्य धारण करने का भाव सम्भव है, लेकिन इसे किसी प्रमाणित ऐतिहासिक संगीत-प्रदर्शन का विवरण न समझें।

भक्त की निजी विनती

सरल अर्थ: देवताओं के समान भक्त भी माता से विनती करते हैं, उनका चरण-स्मरण करते हैं और कृपा से मन स्थिर रहने की प्रार्थना करते हैं। व्याख्या: विश्वव्यापक देवी-वर्णन के बाद पाठ अचानक व्यक्तिगत स्वर अपनाता है। “चरण-ध्यान” श्रद्धा से देवी का स्मरण है; इससे कोई विशेष प्राणायाम अथवा दीक्षा-क्रम सिद्ध नहीं होता। चुने हुए स्रोत में “चरण ध्यान” और “तेरी कृपा ... मन नहिं भरमाता” है 1, जबकि द्रिक पंचांग में गाने और ताली बजाने का दूसरा पद मिलता है 2। दोनों को जोड़कर तीसरा काल्पनिक मूलपाठ बनाना ठीक नहीं।

समापन-आशीर्वाद और फल-कामना

सरल अर्थ: अंतिम पद में श्रद्धा से माता की आरती गाने वाले के सुख और समृद्धि की मंगलकामना की गई है। व्याख्या: यह फलश्रुति-जैसी समापन-शैली है जिसमें भक्त के कल्याण की कामना की जाती है। इससे आय, आरोग्य या मानसिक दशा बदलने की वैज्ञानिक गारंटी नहीं निकलती। चुने हुए पाठ का अंत “मैया जी की आरती” से होता है 1। द्रिक पंचांग में “श्री प्रताप आरती मैया की” मिलता है 2। “प्रताप” कवि-नाम है या महिमा का शब्द—केवल अनुमान से फैसला नहीं किया जा सकता। पुराने मुद्रित साक्ष्य की जाँच बाकी है।

जय पार्वती माता आरती क्या है? जय पार्वती माता उत्तर भारतीय हिंदी आरती है जिसमें भक्त पार्वती को गौरी, उमा, शिव की अर्धांगिनी और जगदम्बा के रूप में प्रणाम करता है। आरती सामान्यतः दीप-समर्पण से जुड़ा स्तुतिगीत है। यहाँ उसका पाठ और अध्ययन प्रस्तुत है; यह किसी अनिवार्य पूजा-विधान की निर्देशिका नहीं है। चुने हुए स्रोत में दो-पंक्तियों की टेक और उसके बाद सात पद हैं। हर पद के बाद टेक लौटती है 14। रचना के भीतर एक सुंदर क्रम उभरता है: सनातन माता का आवाहन, संकट से रक्षा की प्रार्थना, दिव्य आभूषण और संगीत, सती तथा हिमालय-कन्या का स्मरण, असुर-विजय, शिव के साथ आनंद, चित्त की स्थिरता की विनती और अंत में मंगलकामना। यह सब भक्ति-काव्य के स्तर पर समझना चाहिए; इन्हें सुनिश्चित सांसारिक उपलब्धियों का अनुबंध नहीं बनाना चाहिए।

पार्वती, उमा, सती, गौरी और दुर्गा—संबंध और भेद

शैव परंपराओं में पार्वती का शिव से घनिष्ठ संबंध है। उमा-महेश्वर के रूप में दोनों की युगल मूर्तियाँ प्राचीन कला में मिलती हैं। अल्मोड़ा क्षेत्र की मूर्ति और हिमाचल प्रदेश के लघु मंदिर के संग्रहालय-विवरण इस विविधता को दिखाते हैं 56। सती को लोकप्रिय पुराण-कथाओं में पार्वती का पूर्वजन्म माना गया है; आरती उसके पूरे आख्यान को नहीं बताती, केवल संकेत देती है। सिंह-वाहन, शुम्भ-निशुम्भ-वध और बहुभुजा रूप दुर्गा अथवा चण्डिका की युद्धमयी छवियों से अधिक सीधे जुड़े हैं। देवीमाहात्म्य के नवम-दशम अध्यायों में दोनों असुरों का प्रसंग आता है 78। कई शैव-शाक्त परंपराओं में पार्वती, दुर्गा और महादेवी की अभिन्नता भक्तिपूर्वक मानी जाती है, लेकिन सभी क्षेत्रों, मूर्तियों तथा दार्शनिक ग्रंथों में उनका निरूपण एक-सा नहीं है। इस भेद को समझते हुए ही पाठ का आनंद लेना चाहिए।

पाठ की रचना और पढ़ने का तरीका

चुने हुए साक्ष्य में एक टेक तथा सात पद हैं। इस प्रकार कुल आठ क्रमबद्ध पाठ-इकाइयाँ हैं; वे आठ स्वतंत्र पद नहीं जिनमें टेक का स्थान न हो। हर पद के बाद पूरी टेक गाने की परंपरा इस पाठ में स्पष्ट रखी गई है। अंग्रेज़ी लेख में भी यही हिंदी शब्द रोमन अक्षरों में मिलेंगे, उनका अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं। अंग्रेज़ी अर्थ बाद में दिए गए हैं और इस लेख में प्रत्येक पद के अर्थ अलग रखे गए हैं। भाषा हिंदी है, शुद्ध शास्त्रीय संस्कृत नहीं। “जस”, “सखियन”, “अरज”, “रंगराता” जैसे शब्दों में लोक-भाषा का रस है। किसी कठिन पंक्ति को सरल बनाने के लिए उसके मूल शब्द बदलना उचित नहीं। इसी कारण संशयपूर्ण पदावली की स्पष्ट टिप्पणी दी गई है।

आरती के प्रमुख प्रतीकों का भाव

जगदम्बा और रक्षा: भक्त विराट देवी को अपनी माँ की तरह पुकारता है। “कंटक” का रूपक कठिनाई, भय या विरोध का बिंब है; किसी मनुष्य के प्रति द्वेष फैलाने का निर्देश नहीं। सिंह और सहस्र भुजा: यहाँ साहस और सामर्थ्य के काव्यमय प्रतीक आते हैं। प्रत्येक पार्वती-प्रतिमा का वाहन सिंह हो, ऐसा मानना आवश्यक नहीं। दुर्गा के युद्ध-दृश्य में सिंह-वाहन की पुष्टि संग्रहालय के चित्र-विवरण से होती है 7। हिमालय और सखियाँ: यह घर, जन्म और सहचरियों की स्नेहमयी छवि है। आरती में माता का वैभव और अपनापन साथ-साथ चलता है। शिव, नन्दी और भृंगी: शिव-पार्वती की युगल छवि मूर्तिकला में पुरानी है 5। नन्दी और भृंगी का उल्लेख शैव आख्यानों के पारिवारिक/गण-संसार को सामने लाता है। “बीन लही” जैसे शब्द को बिना अतिरिक्त प्रमाण विशिष्ट प्राचीन वाद्य-रीति का विवरण न मानें। कृपा और चित्त: चुने हुए छठे पद में देवी के चरणों का स्मरण करते हुए मन के न भटकने की प्रार्थना है। इससे कोई निश्चित ध्यान-आसन, श्वास-नियंत्रण या गुरु-दीक्षा-विधान निर्धारित नहीं होता।

पाठ-चयन, पाठभेद और लेखक का प्रश्न

मुख्य पाठ नित्य (Nitya) के अलग-अलग उपलब्ध देवनागरी और रोमन JSON स्रोत से लिया गया है। संस्था मूल परंपरागत पाठ को पब्लिक डोमेन बताती है और केवल पाठ वाले JSON के उपयोग की अनुमति देती है 1। उसके आधुनिक अर्थ एवं टिप्पणी अलग गैर-व्यावसायिक लाइसेंस में हैं, इसलिए उनका यहाँ पुनरुत्पादन नहीं किया गया। हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ इस संस्करण के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं। नित्य अपने आरती-पाठ का अन्य लोकप्रिय स्रोतों से मिलान बताता है, पर किसी निश्चित पुराने मुद्रित संस्करण का पृष्ठ/संग्रहालय-संकेत नहीं देता 4। द्रिक पंचांग में पहले पद के शब्द अलग हैं, छठा पद ताली बजाकर गाने का प्रसंग देता है और अंतिम पद में “श्री प्रताप” आता है 2। भक्तिभारत में “ब्रह्मा”, “निज सेवक” आदि पाठांतर मिलते हैं 3। इन्हें मूल आठ इकाइयों में चुपचाप जोड़ना गलत पाठ-संपादन होता। इसलिए संबंधित अंतर स्रोत-सूची और मूल पाठ-अभिलेख की पाठभेद-सूचियों में सुरक्षित हैं। लेखक और पहली रचना-तिथि प्रमाणित नहीं हैं; “श्री प्रताप” अकेले किसी व्यक्ति की ऐतिहासिक पहचान तय नहीं करता। पाठ की पूर्णता और प्रकाशन की अनुमति अलग प्रश्न हैं। चुनी हुई डिजिटल प्रति की आठों इकाइयाँ यहाँ मौजूद हैं, लेकिन स्वतंत्र पुराने मुद्रित प्रमाण, लेखक/अधिकार-संबंधी निष्कर्ष और भाषा-विशेषज्ञ अनुमोदन अभी शेष हैं। स्रोत के पब्लिक डोमेन दावे को अंतिम कानूनी अनुमति नहीं माना गया है।

सामान्य प्रश्न

१. क्या यह संस्कृत आरती है? नहीं। उपलब्ध पाठ हिंदी और उत्तर भारतीय लोक-काव्य रूपों में है, यद्यपि देवताओं के अनेक नाम संस्कृत से आए हैं। २. अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आरती अंग्रेज़ी अनुवाद होगी? नहीं। मूल हिंदी शब्द ही रोमन अक्षरों (रोमन हिन्दी) में होंगे। अंग्रेज़ी अर्थ अलग भाग में मिलेंगे। ३. क्या पार्वती और दुर्गा बिल्कुल एक ही रूप हैं? अनेक परंपराएँ उन्हें एक शक्ति के रूप मानती हैं; मूर्तिकला और अलग-अलग शास्त्रीय विवेचन में रूप-भेद भी महत्त्वपूर्ण है। ४. आरती के लेखक कौन हैं? प्रमाणित लेखक नहीं मिला। अन्य संस्करण की “श्री प्रताप” पंक्ति पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। ५. अन्य वेबसाइट पर अंतिम पद अलग क्यों है? विभिन्न पाठ-परंपराएँ प्रचलित हैं। इस संस्करण में एक पहचाने हुए स्रोत का पाठ लिया गया है और बाकी पाठभेद अलग दर्ज हैं। ६. क्या हर पद के बाद टेक दोहराई जाती है? चुने हुए प्रस्तुतीकरण में हाँ। घर, मंदिर और क्षेत्र के गान-रूपों में दोहराव बदल सकता है। ७. क्या आरती पढ़ने के लिए दीक्षा चाहिए? सामान्य सार्वजनिक भजन-गान प्रायः सबके लिए सुलभ है; विशिष्ट पूजा-विधान अपने परिवार/गुरु-परंपरा के अनुसार समझने चाहिए। यह लेख कोई गोपनीय अनुष्ठान-विधि नहीं देता। ८. क्या इसे गाने से धन या स्वास्थ्य की गारंटी है? नहीं। समापन सुख-सम्पत्ति की भक्तिपूर्ण प्रार्थना है, सुनिश्चित परिणाम की पुष्टि नहीं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Text-only source: Nitya (getnitya.com), permitted for any purpose. Romanization, meanings and explanations newly prepared by ShivGoraksh.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. Refrain — The eternal Mother

    Jai Parvati Mata, Jai Parvati Mata Brahma Sanatan Devi, Shubh Phal Ki Data

  2. Protector and world-mother

    Arikul Kantak Nashini, Jai Sevak Trata Jag Janani Jagdamba, Harihar Gun Gata

  3. The lion, ornaments and celestial praise

    Singh Ko Vahan Saje, Kundal Hai Satha Dev Vadhu Jas Gavat, Nritya Karat Tatha

  4. Sati and the Himalayan daughter

    Satyug Roop Sheel Atisundar, Naam Sati Kahlata Hemanchal Ghar Janmi, Sakhiyan Sang Rata

  5. Shumbha, Nishumbha and the many-armed Devi

    Shumbh Nishumbh Vidare, Hemanchal Sthata Sahasra Bhuja Tanu Dhari Ke, Chakra Liyo Hatha

  6. The universe, Shiva, Nandi and Bhringi

    Srishti Roop Tuhi Hai Janani, Shiv Sang Rangrata Nandi Bhringi Been Lahi, Sara Jag Madmata

  7. The devotee’s personal petition

    Devan Araj Karat Ham, Charan Dhyan Lata Teri Kripa Rahe To, Man Nahin Bharmata

  8. Closing blessing and the limits of promise

    Maiya Ji Ki Aarti, Bhakti Bhav Se Jo Nar Gata Nitya Sukhi Rah Karke, Sukh Sampatti Pata

स्रोत और संपादकीय सूचना

मूल पाठ नित्य के देवनागरी और रोमन डेटा 1 से है, जिसकी तुलना द्रिक पंचांग 2 और भक्तिभारत 3 से की गई। ऐतिहासिक प्रतीकों के लिए मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम 567 तथा देवीमाहात्म्य के अध्याय-संदर्भ 8 देखे गए। स्रोत-दावे, पाठभेद और अधिकार-संबंधी सीमाएँ स्रोत-सूची में हैं। यह शैक्षिक पाठ है, स्वतंत्र रूप से प्रमाणित आलोचनात्मक संस्करण या दीक्षा का निर्देश नहीं।

  1. Nitya Open Data — Jai Parvati Mata (Devanagari and Roman JSON) · स्रोत खोलें
  2. Parvati Mata Ki Aarti (Jai Parvati Mata) · स्रोत खोलें
  3. आरती: श्री पार्वती माँ · स्रोत खोलें
  4. Nitya — Jai Parvati Mata, sources and editorial notes · स्रोत खोलें
  5. Shiva Seated with Parvati (Uma Maheshvara), object 1978.541 · स्रोत खोलें
  6. Miniature Brahmanical Shrine, object 713008 · स्रोत खोलें
  7. Devi vanquishes Nisumbha and his armies, object 909648 · स्रोत खोलें
  8. Devi Mahatmyam (Durga Saptashati), Chapter 10 — Slaying of Shumbha (reading context) · स्रोत खोलें