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स्तोत्र

श्रीदक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् (दक्षिणामूर्त्यष्टकम्)

गुरु-रूप शिव के ज्ञान और अद्वैत विषयक दस श्लोक; १९१० के मुद्रित स्रोत से संपादित पाठ।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

॥ श्रीः ॥

अर्थ

मुद्रक का मंगलसूचक ‘श्रीः’।

व्याख्या

यह ग्रन्थ का आरम्भिक मंगलसूचक है; दस श्लोकों में इसकी गिनती नहीं होती।

1

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया । यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ १॥

अर्थ

दर्पण में दिखने वाली नगरी के समान यह जगत बाहर प्रतीत होता है, पर स्तोत्र इसे चैतन्य में प्रकट अनुभव के रूप में देखता है। जागरण में अद्वय आत्मा का साक्षात्कार कराने वाले गुरु-स्वरूप दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

व्याख्या

दर्पण और स्वप्न का उदाहरण दुनिया के व्यवहार को निरर्थक घोषित करने के लिए नहीं है। वह पूछता है कि अनुभव कहाँ और कैसे प्रकाशित होता है। जागरण यहाँ सामान्य नींद से उठने के साथ आत्मज्ञान का भी संकेत है। प्रत्येक श्लोक का नमस्कार शिव के गुरु-रूप से जुड़ता है।

2

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुनर्मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम् । मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ २॥

अर्थ

बीज में छिपे अंकुर की तरह सृष्टि को आरम्भ में अविभाजित कहा गया है; देश और काल की कल्पना से विविधता प्रकट होती है। जादूगर या महायोगी के उपमान से प्रकट करने वाले दक्षिणामूर्ति की वन्दना की गई है।

व्याख्या

बीज–अंकुर का बिम्ब संभाव्यता के व्यक्त होने की ओर ध्यान दिलाता है। यहाँ माया का अर्थ केवल साधारण छल नहीं, बल्कि भिन्न-भिन्न रूप दिखाई देने की दार्शनिक व्यवस्था है। यह विज्ञान के स्थान पर रखी गई सृष्टि-प्रक्रिया नहीं, स्तोत्र का अद्वैत-दृष्टिकोण है।

3

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थगं भासते साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् । यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ३॥

अर्थ

सत्ता-स्वरूप चैतन्य के प्रकाश से अस्थिर या अवास्तविक-सा प्रतीत होने वाला विषय भी दिखाई पड़ता है। ‘तत्त्वमसि’ के वेद-वाक्य द्वारा गुरु साधक को आत्मतत्त्व समझाते हैं; उसी ज्ञान से भवसागर में फिर बँधने का अन्त बताया गया है।

व्याख्या

इस श्लोक का केन्द्र ‘तत्त्वमसि’ — ‘वह तुम हो’ — का वेदान्तीय उपदेश है। १९१० के पाठ में असत्कल्पार्थगं है, जबकि कई दूसरे पाठों में असत्कल्पार्थकं। इस संस्करण में मूल मुद्रित पाठ रखा गया है; पद के सटीक व्याकरणिक अर्थ को लेकर अनिश्चितता है।

4

नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते । जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत् तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ४॥

अर्थ

जैसे छिद्रों वाले घड़े में रखे दीपक की ज्योति बाहर दीखती है, वैसे ही ज्ञान नेत्र आदि इन्द्रियों के माध्यम से प्रकट होता है। उसी प्रकाश में ‘मैं जानता हूँ’ और जगत् का अनुभव सम्भव बताया गया है।

व्याख्या

घड़े–दीपक का रूपक जानने वाले चैतन्य और ज्ञान के साधनों में भेद करता है। यह आँखों से सचमुच प्रकाश की किरणें निकलने का वैज्ञानिक दावा नहीं है। १९१० की मुद्रण-पंक्ति में ‘जगत्’ बीच से टूटता है; यहाँ उसे सामान्य पाठ्य-रूप में जोड़ा गया है।

5

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः । मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणे तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ५॥

अर्थ

कुछ मतों में ‘मैं’ को केवल शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, बदलती बुद्धि या शून्य मानने की प्रवृत्ति पर श्लोक प्रश्न उठाता है। माया से उपजे गहरे भ्रम को हटाने वाले गुरु को प्रणाम किया गया है।

व्याख्या

पाँचवें श्लोक में स्त्री, बालक, दृष्टिबाधित व्यक्ति और जड़ता के उपमान का प्राचीन विवादात्मक प्रयोग आया है। ऐसे उपमानों को आज किसी व्यक्ति या समूह की योग्यता अथवा गरिमा के बारे में सत्य कथन नहीं समझना चाहिए। मुख्य दार्शनिक प्रश्न यह है कि क्या चेतना का परिचय केवल किसी परिवर्तनशील अंग से पूरा हो जाता है।

6

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात् सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् । प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ६॥

अर्थ

जैसे ग्रहण में सूर्य या चन्द्रमा ढँक जाता है, वैसे ही माया का आवरण होने पर आत्मा अप्रकट-सी प्रतीत होती है। सुषुप्ति से जागकर ‘मैं पहले सोया था’ की पहचान उसी निरन्तरता की ओर संकेत करती है।

व्याख्या

यहाँ गहरी नींद का उदाहरण विचार के लिए है। इन्द्रिय-व्यापार रुकने के बाद भी जागने पर निरन्तरता का स्मरण होता है—स्तोत्र इसे आत्मतत्त्व की ओर संकेत मानता है। इसे सभी लोगों के नींद-अनुभव का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं समझना चाहिए।

7

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा । स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ७॥

अर्थ

बाल्यावस्था से आगे की आयु तक, जागरण आदि बदलती अवस्थाओं में भी ‘मैं’ का अनुभव बना रहता है। शुभ ज्ञान-मुद्रा से आत्मस्वरूप को प्रकट करने वाले दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

व्याख्या

यह श्लोक जीवन में बदलते शरीर, भूमिकाओं और अनुभवों के बीच पहचान की निरन्तरता पर विचार कराता है। दक्षिणामूर्ति की मुद्रा शिक्षा का प्रतीक है; यहाँ कोई अनिवार्य अनुष्ठान-विधि नहीं दी गई। प्रश्न यह है कि परिवर्तन के साथ क्या कुछ स्थायी भी अनुभूत होता है।

8

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबन्धतः शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः । स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ८॥

अर्थ

जगत् कारण–कार्य, स्वामी–स्वत्व, गुरु–शिष्य और पिता–पुत्र जैसे सम्बन्धों में देखा जाता है। स्वप्न और जागरण में माया से भ्रमित व्यक्ति इन भेदों को परम सत्य मान बैठता है; दक्षिणामूर्ति उसी दृष्टि को स्पष्ट करते हैं।

व्याख्या

स्तोत्र का आशय पारिवारिक दायित्वों अथवा शिक्षक–शिष्य सम्बन्ध को त्यागना नहीं है। वह दिखाता है कि सम्बन्धों की श्रेणियाँ हमारे अनुभव को कैसे आकार देती हैं। मूल मुद्रण की अन्तिम पंक्ति में संधि से जुड़े शब्दों को पाठक-सुविधा के लिए अलग किया गया है।

9
विषय-सूची पर लौटें

भूरम्भांस्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान् इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् । नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ९॥

अर्थ

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और जीव को प्रभु की अष्टमूर्ति कहा गया है। विचार करने वाले साधक को सर्वव्यापक सत्य से पृथक् कोई सत्ता नहीं दिखाई देती—ऐसे दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है।

व्याख्या

अष्टमूर्ति का विचार बताता है कि ‘अष्टक’ नाम होने पर भी चुने हुए पुराने मुद्रण में दस क्रमांकित श्लोक क्यों हैं। यह भक्तिपरक और दार्शनिक रूपक है; आधुनिक भौतिक विज्ञान में सभी पदार्थों को एक जैसा घोषित करने का प्रयत्न नहीं।

10

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिंस्तवे तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च संकीर्तनात् । सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः सिध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम् ॥ १०॥

अर्थ

स्तोत्र के सुनने, अर्थ पर मनन करने, ध्यान और संकीर्तन से सर्वात्मभाव का बोध स्पष्ट होने की बात अन्तिम श्लोक कहता है। इसे ईश्वरत्व और अष्टधा ऐश्वर्य की भाषा में व्यक्त किया गया है।

व्याख्या

यह दसवाँ श्लोक फल-वर्णन है; इसमें पहले नौ श्लोकों वाला ‘तस्मै’ नमस्कार नहीं है। ऐश्वर्य की बात को धन, चमत्कारी शक्ति या रोग-निवारण की सुनिश्चित प्रतिज्ञा की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं। मूल मुद्रण का ‘सिध्येत्’ रूप रखा गया है; अन्य पाठों में ‘सिद्ध्येत्’ भी मिलता है।

12
विषय-सूची पर लौटें

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ श्रीदक्षिणामूर्त्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥

अर्थ

मुद्रित समाप्ति-वाक्य में रचना का श्रेय गोविन्द भगवत्पाद के शिष्य कहे गए शङ्करभगवत्पाद को दिया गया है।

व्याख्या

यह परम्परागत मुद्रित श्रेय है, लेखकत्व का स्वतन्त्र ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।

सन्दर्भ और उपयोग

मूलपाठ: शङ्कराचार्यविरचितानि स्तोत्राणि, प्रथम भाग (१९१०), मुद्रित पृष्ठ १०२–१०४; पाठक-सुलभ लेखन के सम्पादकीय बदलाव दर्ज हैं। दस क्रमांकित श्लोक। 1

मुद्रित मंगलाचरण

भावार्थ: मुद्रक का मंगलसूचक ‘श्रीः’। व्याख्या: यह ग्रन्थ का आरम्भिक मंगलसूचक है; दस श्लोकों में इसकी गिनती नहीं होती।

समाप्ति-वाक्य

भावार्थ: मुद्रित समाप्ति-वाक्य में रचना का श्रेय गोविन्द भगवत्पाद के शिष्य कहे गए शङ्करभगवत्पाद को दिया गया है। व्याख्या: यह परम्परागत मुद्रित श्रेय है, लेखकत्व का स्वतन्त्र ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।

दक्षिणामूर्ति स्तोत्र क्या सिखाता है? यह स्तोत्र शिव की दक्षिणामूर्ति—अर्थात् ज्ञान देने वाले गुरु—के रूप में वन्दना है। इसकी भाषा भक्तिपूर्ण होने के साथ गहरी अद्वैत-वेदान्तीय है। आत्मा, माया, तत्त्वमसि, प्रत्यभिज्ञा और सर्वात्मत्व जैसे शब्द केवल स्मरण करने की चीजें नहीं, विचार के प्रश्न हैं: ‘मैं जानता हूँ’ का आधार क्या है? स्वप्न, जागरण और सुषुप्ति में अनुभव कैसे बदलता है? आयु और सम्बन्ध बदलने पर पहचान की कौन-सी धारा बनी रहती है? पहले नौ श्लोकों का समान नमस्कार इन प्रश्नों को गुरु के प्रति कृतज्ञता से जोड़ता है। 1, 4

परम्परा में दक्षिण की ओर मुख करके वटवृक्ष के नीचे बैठे युवा गुरु शिव का दक्षिणामूर्ति-रूप प्रसिद्ध है। इस व्यापक चित्र-विधान को समझना उपयोगी है, पर हमारा चुना हुआ १९१० का स्तोत्र कर्मकाण्ड या दीक्षा की विधि नहीं देता। उसका अंतिम श्लोक फल-वर्णन है, चमत्कारी सिद्धि की निश्चित प्रतिज्ञा नहीं। 5

रचनाकार, ऐतिहासिक सन्दर्भ और चुना गया संस्करण

मूल आधार १९१० में प्रकाशित शङ्कराचार्यविरचितानि स्तोत्राणि, प्रथम भाग, का श्रीदक्षिणामूर्त्यष्टकम् है। मुद्रित पृष्ठ १०२–१०४ पर दस क्रमांकित श्लोक और एक समाप्ति-वाक्य मिलते हैं। मुद्रित समाप्ति-वाक्य में शङ्कराचार्य को रचनाकार कहा गया है और गोविन्द भगवत्पाद से शिष्य-सम्बन्ध जोड़ा गया है। यह परम्परागत मुद्रित श्रेय है; इसे स्वतन्त्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक लेखकत्व नहीं कहना चाहिए। 1, 6

‘अष्टकम्’ नाम के बावजूद इसी मुद्रण में १० श्लोक हैं। नौवें श्लोक में भगवान् की अष्टमूर्ति का उल्लेख है और दसवाँ श्लोक श्रवण, मनन आदि का फल बताता है। १९१२ के बृहत्स्तोत्ररत्नाकर में दस श्लोकों के बाद पाँच ध्यान-श्लोक और जोड़े गए हैं; १९३३ के एक दूसरे संकलन में शुरुआत और क्रमांकन भी अलग है। उन अतिरिक्त पदों को १९१० के पाठ में जोड़कर मिश्रित पाठ नहीं बनाया गया है। 3, 7

मानसोल्लास की परम्परा सुरेश्वराचार्य से जोड़ती है; उसका संस्कृत डिजिटल-पाठ अर्थ और पाठभेदों की तुलना में उपयोगी है, किन्तु केवल उसी से आरम्भिक पाण्डुलिपि और निश्चित लेखकत्व सिद्ध नहीं हो जाता। 4

प्रमुख पाठभेद और सम्पादकीय निर्णय

  • श्लोक ३: चुने हुए १९१० मुद्रण का असत्कल्पार्थगं अन्य पाठों के असत्कल्पार्थकं से भिन्न है। मूल पाठ को बिना सूचना बदला नहीं गया; व्याकरणिक अर्थ की विशेषज्ञ समीक्षा बाकी है।
  • श्लोक २, ४ और ८: कुछ संधि और पंक्ति-विच्छेद पाठक-सुलभ रूप में दिखाए गए हैं; हर परिवर्तन का ब्यौरा स्रोत-फाइल में है।
  • श्लोक ८: डिजिटल मानसोल्लास पाठ में ‘य एष’ के स्थान पर ‘एष’ भी मिलता है। चुने १९१० का रूप रखा गया है।
  • श्लोक १०: ‘सिध्येत्’ और ‘सिद्ध्येत्’ का लेखन-भेद दर्ज है।
  • अतिरिक्त ध्यान-श्लोक: वे दूसरे संकलन में हैं; चुने हुए दस-श्लोकी पाठ का हिस्सा नहीं। यह किसी एक पाठ को हर परम्परा का ‘एकमात्र मूल’ घोषित करना नहीं है। विस्तृत अभिलेख स्रोत-सूची और मूल पाठ-अभिलेख में हैं।

आवश्यक दार्शनिक शब्द

आत्मा इस पाठ का विवेचनीय स्वस्वरूप है, केवल सामाजिक परिचय नहीं। माया अनेकता के दिखाई देने की वेदान्तीय संकल्पना है, किसी के दुःख को झुठलाने का बहाना नहीं। ‘तत्त्वमसि’ श्लोक ३ में आया उपनिषद्-वाक्य है। सर्वात्मत्व का अर्थ इस दार्शनिक सन्दर्भ में सबमें एक आत्मतत्त्व का विवेक है। अष्टमूर्ति में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और पुरुष की गणना की गई है। भिन्न दर्शन इन शब्दों को अलग ढंग से समझ सकते हैं।

संवेदनशील भाषा को कैसे पढ़ें? पाँचवें श्लोक में प्राचीन वाद-विवाद के दौरान स्त्रियों, बच्चों, दृष्टिबाधित लोगों और ‘जड़’ जैसे उपमान प्रयुक्त हुए हैं। ऐतिहासिक पाठ सुरक्षित रखना और ऐसे अपमानसूचक उपमानों का समर्थन करना अलग बातें हैं। पाठक इसका दार्शनिक तर्क समझ सकते हैं, बिना किसी समुदाय की बुद्धि, गरिमा या आध्यात्मिक योग्यता के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकाले।

सामान्य प्रश्न

दक्षिणामूर्ति कौन हैं? इस स्तोत्र में वे शिव के गुरु तथा ज्ञानदाता रूप हैं। ‘अष्टकम्’ होते हुए दस श्लोक क्यों? इसलिए कि चुने हुए १९१० के मुद्रित पाठ में दस श्लोक स्पष्ट क्रमांकित हैं। नाम से हर संस्करण की कुल संख्या निश्चित नहीं होती। पाँच ध्यान-श्लोक क्यों नहीं जोड़े? वे १९१२ आदि दूसरे संकलनों में अलग से मिलते हैं, पर चुने १९१० के दस-श्लोक खण्ड में नहीं हैं। पाठ करने से सिद्धियाँ निश्चित मिलती हैं? नहीं। दसवाँ श्लोक पारम्परिक फल-वर्णन है, किसी निश्चित लौकिक लाभ का प्रमाण नहीं। क्या रचनाकार का नाम पूरी तरह प्रमाणित है? परम्परा और १९१० का मुद्रित ग्रन्थ शङ्कराचार्य को श्रेय देते हैं; इस मसौदे में ऐतिहासिक लेखकत्व स्वतन्त्र रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    || śrīḥ ||

  2. 1

    viśvaṃ darpaṇadṛśyamānanagarītulyaṃ nijāntargataṃ paśyannātmani māyayā bahirivodbhūtaṃ yathā nidrayā | yaḥ sākṣātkurute prabodhasamaye svātmānamevādvayaṃ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 1||

  3. 2

    bījasyāntarivāṅkuro jagadidaṃ prāṅnirvikalpaṃ punarmāyākalpitadeśakālakalanāvaicitryacitrīkṛtam | māyāvīva vijṛmbhayatyapi mahāyogīva yaḥ svecchayā tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 2||

  4. 3

    yasyaiva sphuraṇaṃ sadātmakamasatkalpārthagaṃ bhāsate sākṣāttattvamasīti vedavacasā yo bodhayatyāśritān | yatsākṣātkaraṇādbhavenna punarāvṛttirbhavāmbhonidhau tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 3||

  5. 4

    nānācchidraghaṭodarasthitamahādīpaprabhābhāsvaraṃ jñānaṃ yasya tu cakṣurādikaraṇadvārā bahiḥ spandate | jānāmīti tameva bhāntamanubhātyetatsamastaṃ jagat tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 4||

  6. 5

    dehaṃ prāṇamapīndriyāṇyapi calāṃ buddhiṃ ca śūnyaṃ viduḥ strībālāndhajaḍopamāstvahamiti bhrāntā bhṛśaṃ vādinaḥ | māyāśaktivilāsakalpitamahāvyāmohasaṃhāriṇe tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 5||

  7. 6

    rāhugrastadivākarendusadṛśo māyāsamācchādanāt sanmātraḥ karaṇopasaṃharaṇato yo’bhūtsuṣuptaḥ pumān | prāgasvāpsamiti prabodhasamaye yaḥ pratyabhijñāyate tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 6||

  8. 7

    bālyādiṣvapi jāgradādiṣu tathā sarvāsvavasthāsvapi vyāvṛttāsvanuvartamānamahamityantaḥ sphurantaṃ sadā | svātmānaṃ prakaṭīkaroti bhajatāṃ yo mudrayā bhadrayā tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 7||

  9. 8

    viśvaṃ paśyati kāryakāraṇatayā svasvāmisaṃbandhataḥ śiṣyācāryatayā tathaiva pitṛputrādyātmanā bhedataḥ | svapne jāgrati vā ya eṣa puruṣo māyāparibhrāmitaḥ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 8||

  10. 9

    bhūrambhāṃsyanalo’nilo’mbaramaharnātho himāṃśuḥ pumān ityābhāti carācarātmakamidaṃ yasyaiva mūrtyaṣṭakam | nānyatkiñcana vidyate vimṛśatāṃ yasmātparasmādvibhoḥ tasmai śrīgurumūrtaye nama idaṃ śrīdakṣiṇāmūrtaye || 9||

  11. 10

    sarvātmatvamiti sphuṭīkṛtamidaṃ yasmādamuṣmiṃstave tenāsya śravaṇāttadarthamananāddhyānācca saṃkīrtanāt | sarvātmatvamahāvibhūtisahitaṃ syādīśvaratvaṃ svataḥ sidhyettatpunaraṣṭadhā pariṇataṃ caiśvaryamavyāhatam || 10||

  12. 12

    iti śrīmatparamahaṃsaparivrājakācāryasya śrīgovindabhagavatpūjyapādaśiṣyasya śrīmacchaṅkarabhagavataḥ kṛtau śrīdakṣiṇāmūrtyaṣṭakaṃ sampūrṇam ||

स्रोत और संपादकीय स्थिति

  • 1 १९१० शङ्कराचार्यविरचितानि स्तोत्राणि, पृष्ठ १०२–१०४, PDF फ्रेम ११४–११६।
  • 2 उक्त ग्रन्थ से जुड़ा संस्कृत विकिस्रोत का पाठ।
  • 3 १९१२ बृहत्स्तोत्ररत्नाकर, ग्रन्थ ९४, मुद्रित पृष्ठ २१६–२१८; अतिरिक्त ध्यान-श्लोकों के लिए तुलना।
  • 4 मानसोल्लास, संस्कृत विकिस्रोत; दस श्लोक और परम्परागत व्याख्या।
  • 5 संस्कृतडॉक्युमेंट्स का dakshina.html, तुलना के लिए।
  • 6 १९१० के स्कैन का कॉमन्स अधिकार और ग्रन्थसूची विवरण।
  • 7 १९३३ के संकलन में अलग शुरुआत और क्रमांकन। यह है; न प्रकाशित, न आदेश के लिए उपलब्ध।
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

नीचे के अर्थ और व्याख्याएँ इस संग्रह के लिए मौलिक रूप से लिखी गई हैं। प्रत्येक खंड का पहचान-चिह्न मूल पाठ-अभिलेख में भी वही है।

श्लोक 1 · shloka-001

भावार्थ: दर्पण में दिखने वाली नगरी के समान यह जगत बाहर प्रतीत होता है, पर स्तोत्र इसे चैतन्य में प्रकट अनुभव के रूप में देखता है। जागरण में अद्वय आत्मा का साक्षात्कार कराने वाले गुरु-स्वरूप दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है। व्याख्या: दर्पण और स्वप्न का उदाहरण दुनिया के व्यवहार को निरर्थक घोषित करने के लिए नहीं है। वह पूछता है कि अनुभव कहाँ और कैसे प्रकाशित होता है। जागरण यहाँ सामान्य नींद से उठने के साथ आत्मज्ञान का भी संकेत है। प्रत्येक श्लोक का नमस्कार शिव के गुरु-रूप से जुड़ता है।

श्लोक 2 · shloka-002

भावार्थ: बीज में छिपे अंकुर की तरह सृष्टि को आरम्भ में अविभाजित कहा गया है; देश और काल की कल्पना से विविधता प्रकट होती है। जादूगर या महायोगी के उपमान से प्रकट करने वाले दक्षिणामूर्ति की वन्दना की गई है। व्याख्या: बीज–अंकुर का बिम्ब संभाव्यता के व्यक्त होने की ओर ध्यान दिलाता है। यहाँ माया का अर्थ केवल साधारण छल नहीं, बल्कि भिन्न-भिन्न रूप दिखाई देने की दार्शनिक व्यवस्था है। यह विज्ञान के स्थान पर रखी गई सृष्टि-प्रक्रिया नहीं, स्तोत्र का अद्वैत-दृष्टिकोण है।

श्लोक 3 · shloka-003

भावार्थ: सत्ता-स्वरूप चैतन्य के प्रकाश से अस्थिर या अवास्तविक-सा प्रतीत होने वाला विषय भी दिखाई पड़ता है। ‘तत्त्वमसि’ के वेद-वाक्य द्वारा गुरु साधक को आत्मतत्त्व समझाते हैं; उसी ज्ञान से भवसागर में फिर बँधने का अन्त बताया गया है। व्याख्या: इस श्लोक का केन्द्र ‘तत्त्वमसि’ — ‘वह तुम हो’ — का वेदान्तीय उपदेश है। १९१० के पाठ में असत्कल्पार्थगं है, जबकि कई दूसरे पाठों में असत्कल्पार्थकं। इस संस्करण में मूल मुद्रित पाठ रखा गया है; पद के सटीक व्याकरणिक अर्थ को लेकर अनिश्चितता है।

श्लोक 4 · shloka-004

भावार्थ: जैसे छिद्रों वाले घड़े में रखे दीपक की ज्योति बाहर दीखती है, वैसे ही ज्ञान नेत्र आदि इन्द्रियों के माध्यम से प्रकट होता है। उसी प्रकाश में ‘मैं जानता हूँ’ और जगत् का अनुभव सम्भव बताया गया है। व्याख्या: घड़े–दीपक का रूपक जानने वाले चैतन्य और ज्ञान के साधनों में भेद करता है। यह आँखों से सचमुच प्रकाश की किरणें निकलने का वैज्ञानिक दावा नहीं है। १९१० की मुद्रण-पंक्ति में ‘जगत्’ बीच से टूटता है; यहाँ उसे सामान्य पाठ्य-रूप में जोड़ा गया है।

श्लोक 5 · shloka-005

भावार्थ: कुछ मतों में ‘मैं’ को केवल शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, बदलती बुद्धि या शून्य मानने की प्रवृत्ति पर श्लोक प्रश्न उठाता है। माया से उपजे गहरे भ्रम को हटाने वाले गुरु को प्रणाम किया गया है। व्याख्या: पाँचवें श्लोक में स्त्री, बालक, दृष्टिबाधित व्यक्ति और जड़ता के उपमान का प्राचीन विवादात्मक प्रयोग आया है। ऐसे उपमानों को आज किसी व्यक्ति या समूह की योग्यता अथवा गरिमा के बारे में सत्य कथन नहीं समझना चाहिए। मुख्य दार्शनिक प्रश्न यह है कि क्या चेतना का परिचय केवल किसी परिवर्तनशील अंग से पूरा हो जाता है।

श्लोक 6 · shloka-006

भावार्थ: जैसे ग्रहण में सूर्य या चन्द्रमा ढँक जाता है, वैसे ही माया का आवरण होने पर आत्मा अप्रकट-सी प्रतीत होती है। सुषुप्ति से जागकर ‘मैं पहले सोया था’ की पहचान उसी निरन्तरता की ओर संकेत करती है। व्याख्या: यहाँ गहरी नींद का उदाहरण विचार के लिए है। इन्द्रिय-व्यापार रुकने के बाद भी जागने पर निरन्तरता का स्मरण होता है—स्तोत्र इसे आत्मतत्त्व की ओर संकेत मानता है। इसे सभी लोगों के नींद-अनुभव का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं समझना चाहिए।

श्लोक 7 · shloka-007

भावार्थ: बाल्यावस्था से आगे की आयु तक, जागरण आदि बदलती अवस्थाओं में भी ‘मैं’ का अनुभव बना रहता है। शुभ ज्ञान-मुद्रा से आत्मस्वरूप को प्रकट करने वाले दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है। व्याख्या: यह श्लोक जीवन में बदलते शरीर, भूमिकाओं और अनुभवों के बीच पहचान की निरन्तरता पर विचार कराता है। दक्षिणामूर्ति की मुद्रा शिक्षा का प्रतीक है; यहाँ कोई अनिवार्य अनुष्ठान-विधि नहीं दी गई। प्रश्न यह है कि परिवर्तन के साथ क्या कुछ स्थायी भी अनुभूत होता है।

श्लोक 8 · shloka-008

भावार्थ: जगत् कारण–कार्य, स्वामी–स्वत्व, गुरु–शिष्य और पिता–पुत्र जैसे सम्बन्धों में देखा जाता है। स्वप्न और जागरण में माया से भ्रमित व्यक्ति इन भेदों को परम सत्य मान बैठता है; दक्षिणामूर्ति उसी दृष्टि को स्पष्ट करते हैं। व्याख्या: स्तोत्र का आशय पारिवारिक दायित्वों अथवा शिक्षक–शिष्य सम्बन्ध को त्यागना नहीं है। वह दिखाता है कि सम्बन्धों की श्रेणियाँ हमारे अनुभव को कैसे आकार देती हैं। मूल मुद्रण की अन्तिम पंक्ति में संधि से जुड़े शब्दों को पाठक-सुविधा के लिए अलग किया गया है।

श्लोक 9 · shloka-009

भावार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और जीव को प्रभु की अष्टमूर्ति कहा गया है। विचार करने वाले साधक को सर्वव्यापक सत्य से पृथक् कोई सत्ता नहीं दिखाई देती—ऐसे दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है। व्याख्या: अष्टमूर्ति का विचार बताता है कि ‘अष्टक’ नाम होने पर भी चुने हुए पुराने मुद्रण में दस क्रमांकित श्लोक क्यों हैं। यह भक्तिपरक और दार्शनिक रूपक है; आधुनिक भौतिक विज्ञान में सभी पदार्थों को एक जैसा घोषित करने का प्रयत्न नहीं।

श्लोक 10 · shloka-010

भावार्थ: स्तोत्र के सुनने, अर्थ पर मनन करने, ध्यान और संकीर्तन से सर्वात्मभाव का बोध स्पष्ट होने की बात अन्तिम श्लोक कहता है। इसे ईश्वरत्व और अष्टधा ऐश्वर्य की भाषा में व्यक्त किया गया है। व्याख्या: यह दसवाँ श्लोक फल-वर्णन है; इसमें पहले नौ श्लोकों वाला ‘तस्मै’ नमस्कार नहीं है। ऐश्वर्य की बात को धन, चमत्कारी शक्ति या रोग-निवारण की सुनिश्चित प्रतिज्ञा की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं। मूल मुद्रण का ‘सिध्येत्’ रूप रखा गया है; अन्य पाठों में ‘सिद्ध्येत्’ भी मिलता है।

  1. Śaṅkarācāryaviracitāni Stotrāṇi, Part I (collected stotras), 1910 printed volume · स्रोत खोलें
  2. Dakṣiṇāmūrtyaṣṭakam Sanskrit Wikisource proofread edition (1910 witness) · स्रोत खोलें
  3. Bṛhat Stotra Ratnākara (1912), item 94 Dakṣiṇāmūrtistotram · स्रोत खोलें
  4. Mānasollāsa (traditionally credited to Sureśvara), Dakṣiṇāmūrti hymn and commentary · स्रोत खोलें
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  6. Wikimedia Commons scanned-file rights and bibliographic metadata for 1910 Stotras Part I · स्रोत खोलें
  7. Sanskrit Wikisource 1933 Brihatstotraratnakara first volume (alternative 11+-verse recension) · स्रोत खोलें