मूलपाठ: शङ्कराचार्यविरचितानि स्तोत्राणि, प्रथम भाग (१९१०), मुद्रित पृष्ठ १०२–१०४; पाठक-सुलभ लेखन के सम्पादकीय बदलाव दर्ज हैं। दस क्रमांकित श्लोक। 1
मुद्रित मंगलाचरण
भावार्थ: मुद्रक का मंगलसूचक ‘श्रीः’। व्याख्या: यह ग्रन्थ का आरम्भिक मंगलसूचक है; दस श्लोकों में इसकी गिनती नहीं होती।
समाप्ति-वाक्य
भावार्थ: मुद्रित समाप्ति-वाक्य में रचना का श्रेय गोविन्द भगवत्पाद के शिष्य कहे गए शङ्करभगवत्पाद को दिया गया है। व्याख्या: यह परम्परागत मुद्रित श्रेय है, लेखकत्व का स्वतन्त्र ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।
दक्षिणामूर्ति स्तोत्र क्या सिखाता है? यह स्तोत्र शिव की दक्षिणामूर्ति—अर्थात् ज्ञान देने वाले गुरु—के रूप में वन्दना है। इसकी भाषा भक्तिपूर्ण होने के साथ गहरी अद्वैत-वेदान्तीय है। आत्मा, माया, तत्त्वमसि, प्रत्यभिज्ञा और सर्वात्मत्व जैसे शब्द केवल स्मरण करने की चीजें नहीं, विचार के प्रश्न हैं: ‘मैं जानता हूँ’ का आधार क्या है? स्वप्न, जागरण और सुषुप्ति में अनुभव कैसे बदलता है? आयु और सम्बन्ध बदलने पर पहचान की कौन-सी धारा बनी रहती है? पहले नौ श्लोकों का समान नमस्कार इन प्रश्नों को गुरु के प्रति कृतज्ञता से जोड़ता है। 1, 4
परम्परा में दक्षिण की ओर मुख करके वटवृक्ष के नीचे बैठे युवा गुरु शिव का दक्षिणामूर्ति-रूप प्रसिद्ध है। इस व्यापक चित्र-विधान को समझना उपयोगी है, पर हमारा चुना हुआ १९१० का स्तोत्र कर्मकाण्ड या दीक्षा की विधि नहीं देता। उसका अंतिम श्लोक फल-वर्णन है, चमत्कारी सिद्धि की निश्चित प्रतिज्ञा नहीं। 5
रचनाकार, ऐतिहासिक सन्दर्भ और चुना गया संस्करण
मूल आधार १९१० में प्रकाशित शङ्कराचार्यविरचितानि स्तोत्राणि, प्रथम भाग, का श्रीदक्षिणामूर्त्यष्टकम् है। मुद्रित पृष्ठ १०२–१०४ पर दस क्रमांकित श्लोक और एक समाप्ति-वाक्य मिलते हैं। मुद्रित समाप्ति-वाक्य में शङ्कराचार्य को रचनाकार कहा गया है और गोविन्द भगवत्पाद से शिष्य-सम्बन्ध जोड़ा गया है। यह परम्परागत मुद्रित श्रेय है; इसे स्वतन्त्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक लेखकत्व नहीं कहना चाहिए। 1, 6
‘अष्टकम्’ नाम के बावजूद इसी मुद्रण में १० श्लोक हैं। नौवें श्लोक में भगवान् की अष्टमूर्ति का उल्लेख है और दसवाँ श्लोक श्रवण, मनन आदि का फल बताता है। १९१२ के बृहत्स्तोत्ररत्नाकर में दस श्लोकों के बाद पाँच ध्यान-श्लोक और जोड़े गए हैं; १९३३ के एक दूसरे संकलन में शुरुआत और क्रमांकन भी अलग है। उन अतिरिक्त पदों को १९१० के पाठ में जोड़कर मिश्रित पाठ नहीं बनाया गया है। 3, 7
मानसोल्लास की परम्परा सुरेश्वराचार्य से जोड़ती है; उसका संस्कृत डिजिटल-पाठ अर्थ और पाठभेदों की तुलना में उपयोगी है, किन्तु केवल उसी से आरम्भिक पाण्डुलिपि और निश्चित लेखकत्व सिद्ध नहीं हो जाता। 4
प्रमुख पाठभेद और सम्पादकीय निर्णय
- श्लोक ३: चुने हुए १९१० मुद्रण का असत्कल्पार्थगं अन्य पाठों के असत्कल्पार्थकं से भिन्न है। मूल पाठ को बिना सूचना बदला नहीं गया; व्याकरणिक अर्थ की विशेषज्ञ समीक्षा बाकी है।
- श्लोक २, ४ और ८: कुछ संधि और पंक्ति-विच्छेद पाठक-सुलभ रूप में दिखाए गए हैं; हर परिवर्तन का ब्यौरा स्रोत-फाइल में है।
- श्लोक ८: डिजिटल मानसोल्लास पाठ में ‘य एष’ के स्थान पर ‘एष’ भी मिलता है। चुने १९१० का रूप रखा गया है।
- श्लोक १०: ‘सिध्येत्’ और ‘सिद्ध्येत्’ का लेखन-भेद दर्ज है।
- अतिरिक्त ध्यान-श्लोक: वे दूसरे संकलन में हैं; चुने हुए दस-श्लोकी पाठ का हिस्सा नहीं। यह किसी एक पाठ को हर परम्परा का ‘एकमात्र मूल’ घोषित करना नहीं है। विस्तृत अभिलेख स्रोत-सूची और मूल पाठ-अभिलेख में हैं।
आवश्यक दार्शनिक शब्द
आत्मा इस पाठ का विवेचनीय स्वस्वरूप है, केवल सामाजिक परिचय नहीं। माया अनेकता के दिखाई देने की वेदान्तीय संकल्पना है, किसी के दुःख को झुठलाने का बहाना नहीं। ‘तत्त्वमसि’ श्लोक ३ में आया उपनिषद्-वाक्य है। सर्वात्मत्व का अर्थ इस दार्शनिक सन्दर्भ में सबमें एक आत्मतत्त्व का विवेक है। अष्टमूर्ति में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और पुरुष की गणना की गई है। भिन्न दर्शन इन शब्दों को अलग ढंग से समझ सकते हैं।
संवेदनशील भाषा को कैसे पढ़ें? पाँचवें श्लोक में प्राचीन वाद-विवाद के दौरान स्त्रियों, बच्चों, दृष्टिबाधित लोगों और ‘जड़’ जैसे उपमान प्रयुक्त हुए हैं। ऐतिहासिक पाठ सुरक्षित रखना और ऐसे अपमानसूचक उपमानों का समर्थन करना अलग बातें हैं। पाठक इसका दार्शनिक तर्क समझ सकते हैं, बिना किसी समुदाय की बुद्धि, गरिमा या आध्यात्मिक योग्यता के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकाले।
सामान्य प्रश्न
दक्षिणामूर्ति कौन हैं? इस स्तोत्र में वे शिव के गुरु तथा ज्ञानदाता रूप हैं। ‘अष्टकम्’ होते हुए दस श्लोक क्यों? इसलिए कि चुने हुए १९१० के मुद्रित पाठ में दस श्लोक स्पष्ट क्रमांकित हैं। नाम से हर संस्करण की कुल संख्या निश्चित नहीं होती। पाँच ध्यान-श्लोक क्यों नहीं जोड़े? वे १९१२ आदि दूसरे संकलनों में अलग से मिलते हैं, पर चुने १९१० के दस-श्लोक खण्ड में नहीं हैं। पाठ करने से सिद्धियाँ निश्चित मिलती हैं? नहीं। दसवाँ श्लोक पारम्परिक फल-वर्णन है, किसी निश्चित लौकिक लाभ का प्रमाण नहीं। क्या रचनाकार का नाम पूरी तरह प्रमाणित है? परम्परा और १९१० का मुद्रित ग्रन्थ शङ्कराचार्य को श्रेय देते हैं; इस मसौदे में ऐतिहासिक लेखकत्व स्वतन्त्र रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है।





पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
नीचे के अर्थ और व्याख्याएँ इस संग्रह के लिए मौलिक रूप से लिखी गई हैं। प्रत्येक खंड का पहचान-चिह्न मूल पाठ-अभिलेख में भी वही है।
श्लोक 1 ·
shloka-001भावार्थ: दर्पण में दिखने वाली नगरी के समान यह जगत बाहर प्रतीत होता है, पर स्तोत्र इसे चैतन्य में प्रकट अनुभव के रूप में देखता है। जागरण में अद्वय आत्मा का साक्षात्कार कराने वाले गुरु-स्वरूप दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है। व्याख्या: दर्पण और स्वप्न का उदाहरण दुनिया के व्यवहार को निरर्थक घोषित करने के लिए नहीं है। वह पूछता है कि अनुभव कहाँ और कैसे प्रकाशित होता है। जागरण यहाँ सामान्य नींद से उठने के साथ आत्मज्ञान का भी संकेत है। प्रत्येक श्लोक का नमस्कार शिव के गुरु-रूप से जुड़ता है।
श्लोक 2 ·
shloka-002भावार्थ: बीज में छिपे अंकुर की तरह सृष्टि को आरम्भ में अविभाजित कहा गया है; देश और काल की कल्पना से विविधता प्रकट होती है। जादूगर या महायोगी के उपमान से प्रकट करने वाले दक्षिणामूर्ति की वन्दना की गई है। व्याख्या: बीज–अंकुर का बिम्ब संभाव्यता के व्यक्त होने की ओर ध्यान दिलाता है। यहाँ माया का अर्थ केवल साधारण छल नहीं, बल्कि भिन्न-भिन्न रूप दिखाई देने की दार्शनिक व्यवस्था है। यह विज्ञान के स्थान पर रखी गई सृष्टि-प्रक्रिया नहीं, स्तोत्र का अद्वैत-दृष्टिकोण है।
श्लोक 3 ·
shloka-003भावार्थ: सत्ता-स्वरूप चैतन्य के प्रकाश से अस्थिर या अवास्तविक-सा प्रतीत होने वाला विषय भी दिखाई पड़ता है। ‘तत्त्वमसि’ के वेद-वाक्य द्वारा गुरु साधक को आत्मतत्त्व समझाते हैं; उसी ज्ञान से भवसागर में फिर बँधने का अन्त बताया गया है। व्याख्या: इस श्लोक का केन्द्र ‘तत्त्वमसि’ — ‘वह तुम हो’ — का वेदान्तीय उपदेश है। १९१० के पाठ में असत्कल्पार्थगं है, जबकि कई दूसरे पाठों में असत्कल्पार्थकं। इस संस्करण में मूल मुद्रित पाठ रखा गया है; पद के सटीक व्याकरणिक अर्थ को लेकर अनिश्चितता है।
श्लोक 4 ·
shloka-004भावार्थ: जैसे छिद्रों वाले घड़े में रखे दीपक की ज्योति बाहर दीखती है, वैसे ही ज्ञान नेत्र आदि इन्द्रियों के माध्यम से प्रकट होता है। उसी प्रकाश में ‘मैं जानता हूँ’ और जगत् का अनुभव सम्भव बताया गया है। व्याख्या: घड़े–दीपक का रूपक जानने वाले चैतन्य और ज्ञान के साधनों में भेद करता है। यह आँखों से सचमुच प्रकाश की किरणें निकलने का वैज्ञानिक दावा नहीं है। १९१० की मुद्रण-पंक्ति में ‘जगत्’ बीच से टूटता है; यहाँ उसे सामान्य पाठ्य-रूप में जोड़ा गया है।
श्लोक 5 ·
shloka-005भावार्थ: कुछ मतों में ‘मैं’ को केवल शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, बदलती बुद्धि या शून्य मानने की प्रवृत्ति पर श्लोक प्रश्न उठाता है। माया से उपजे गहरे भ्रम को हटाने वाले गुरु को प्रणाम किया गया है। व्याख्या: पाँचवें श्लोक में स्त्री, बालक, दृष्टिबाधित व्यक्ति और जड़ता के उपमान का प्राचीन विवादात्मक प्रयोग आया है। ऐसे उपमानों को आज किसी व्यक्ति या समूह की योग्यता अथवा गरिमा के बारे में सत्य कथन नहीं समझना चाहिए। मुख्य दार्शनिक प्रश्न यह है कि क्या चेतना का परिचय केवल किसी परिवर्तनशील अंग से पूरा हो जाता है।
श्लोक 6 ·
shloka-006भावार्थ: जैसे ग्रहण में सूर्य या चन्द्रमा ढँक जाता है, वैसे ही माया का आवरण होने पर आत्मा अप्रकट-सी प्रतीत होती है। सुषुप्ति से जागकर ‘मैं पहले सोया था’ की पहचान उसी निरन्तरता की ओर संकेत करती है। व्याख्या: यहाँ गहरी नींद का उदाहरण विचार के लिए है। इन्द्रिय-व्यापार रुकने के बाद भी जागने पर निरन्तरता का स्मरण होता है—स्तोत्र इसे आत्मतत्त्व की ओर संकेत मानता है। इसे सभी लोगों के नींद-अनुभव का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं समझना चाहिए।
श्लोक 7 ·
shloka-007भावार्थ: बाल्यावस्था से आगे की आयु तक, जागरण आदि बदलती अवस्थाओं में भी ‘मैं’ का अनुभव बना रहता है। शुभ ज्ञान-मुद्रा से आत्मस्वरूप को प्रकट करने वाले दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है। व्याख्या: यह श्लोक जीवन में बदलते शरीर, भूमिकाओं और अनुभवों के बीच पहचान की निरन्तरता पर विचार कराता है। दक्षिणामूर्ति की मुद्रा शिक्षा का प्रतीक है; यहाँ कोई अनिवार्य अनुष्ठान-विधि नहीं दी गई। प्रश्न यह है कि परिवर्तन के साथ क्या कुछ स्थायी भी अनुभूत होता है।
श्लोक 8 ·
shloka-008भावार्थ: जगत् कारण–कार्य, स्वामी–स्वत्व, गुरु–शिष्य और पिता–पुत्र जैसे सम्बन्धों में देखा जाता है। स्वप्न और जागरण में माया से भ्रमित व्यक्ति इन भेदों को परम सत्य मान बैठता है; दक्षिणामूर्ति उसी दृष्टि को स्पष्ट करते हैं। व्याख्या: स्तोत्र का आशय पारिवारिक दायित्वों अथवा शिक्षक–शिष्य सम्बन्ध को त्यागना नहीं है। वह दिखाता है कि सम्बन्धों की श्रेणियाँ हमारे अनुभव को कैसे आकार देती हैं। मूल मुद्रण की अन्तिम पंक्ति में संधि से जुड़े शब्दों को पाठक-सुविधा के लिए अलग किया गया है।
श्लोक 9 ·
shloka-009भावार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और जीव को प्रभु की अष्टमूर्ति कहा गया है। विचार करने वाले साधक को सर्वव्यापक सत्य से पृथक् कोई सत्ता नहीं दिखाई देती—ऐसे दक्षिणामूर्ति को प्रणाम है। व्याख्या: अष्टमूर्ति का विचार बताता है कि ‘अष्टक’ नाम होने पर भी चुने हुए पुराने मुद्रण में दस क्रमांकित श्लोक क्यों हैं। यह भक्तिपरक और दार्शनिक रूपक है; आधुनिक भौतिक विज्ञान में सभी पदार्थों को एक जैसा घोषित करने का प्रयत्न नहीं।
श्लोक 10 ·
shloka-010भावार्थ: स्तोत्र के सुनने, अर्थ पर मनन करने, ध्यान और संकीर्तन से सर्वात्मभाव का बोध स्पष्ट होने की बात अन्तिम श्लोक कहता है। इसे ईश्वरत्व और अष्टधा ऐश्वर्य की भाषा में व्यक्त किया गया है। व्याख्या: यह दसवाँ श्लोक फल-वर्णन है; इसमें पहले नौ श्लोकों वाला ‘तस्मै’ नमस्कार नहीं है। ऐश्वर्य की बात को धन, चमत्कारी शक्ति या रोग-निवारण की सुनिश्चित प्रतिज्ञा की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं। मूल मुद्रण का ‘सिध्येत्’ रूप रखा गया है; अन्य पाठों में ‘सिद्ध्येत्’ भी मिलता है।