कल्पना कीजिए, आप ऐसे प्राचीन मंदिर में पहुँचे हैं जिसकी छत खुला आकाश है। चारों ओर बने छोटे-छोटे स्थानों में अलग-अलग देवियों की मूर्तियाँ हैं। किसी का रूप परिचित मातृदेवी जैसा है, किसी के चेहरे में पशु-पक्षी की आकृति दिखाई देती है, तो किसी के हाथ में दैनिक जीवन की वस्तु के साथ कोई उग्र प्रतीक है। यहाँ किसी एक प्रतिमा को देखकर पूरे मंदिर को समझना कठिन है। योगिनियों की विशेषता उनके सामूहिक रूप और उनके भीतर विद्यमान भिन्नता में है।
हिंदू धर्म की अनेक ऐतिहासिक शाक्त और शैव तांत्रिक परंपराओं में योगिनियाँ शक्तिशाली स्त्री-दैवी स्वरूपों का समूह हैं। परंतु योगिनी शब्द का अर्थ केवल देवी नहीं है। योग करने वाली स्त्री, साधिका अथवा आध्यात्मिक अनुशासन का अभ्यास करने वाली महिला के लिए भी यह शब्द प्रयुक्त हो सकता है। किसी साधिका को योगिनी कहा जाना और किसी मध्यकालीन मंदिर की योगिनी देवी होना—दो अलग संदर्भ हैं। बौद्ध तांत्रिक ग्रंथों में भी इससे जुड़े शब्द मिलते हैं, पर उनकी अपनी परंपराएँ हैं। 1 2
प्रसिद्ध नाम चौसठ योगिनी सुनकर अक्सर लगता है कि सब जगह एक ही सूची की ठीक चौसठ देवियाँ मानी जाती होंगी। इतिहास इससे अधिक रोचक है। कहीं बयालीस, कहीं चौसठ और कहीं इक्यासी योगिनियों के समूहों का प्रमाण मिलता है। यहाँ तक कि चौसठ नामों वाली अलग-अलग सूचियाँ भी आपस में नहीं मिलतीं। इसलिए इस लेख में कोई बनावटी 'सर्वमान्य चौसठ नाम' प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। हमारा उद्देश्य उन परंपराओं को उनके अपने संदर्भ में समझना है। 1 3
योगिनी शब्द, नाम और पहचान
संस्कृत में योगिनी शब्द योगिन् का स्त्रीलिंग रूप है। एक स्त्री के लिए योगिनी और अनेक के लिए योगिनियाँ या योगिनियों जैसे रूप हिंदी में चलते हैं। चौसठ, चौंसठ तथा ओड़िया प्रयोग चौसठी संख्या 64 से जुड़े रूप हैं। योगिनीचक्र अथवा योगिनी-मंडल का आशय किसी क्रमबद्ध समूह या वृत्त से हो सकता है; इससे किसी एक निश्चित मंत्र, एक ही चित्र या सार्वभौम नामावली का पता अपने-आप नहीं चल जाता।
इन संदर्भों में तीन प्रमुख अर्थ अलग रखना उपयोगी है। पहला, देवीस्वरूप योगिनी, जिसका उल्लेख प्रतिमाओं और धार्मिक साहित्य में है। दूसरा, मानवीय योगिनी, अर्थात योग या संबंधित साधना करने वाली स्त्री। तीसरा, कुछ विशिष्ट साधना-परंपराओं में मनुष्य और देवी-शक्ति के संबंध से विकसित अर्थ। कुछ ग्रंथ इन अर्थों को जोड़ते हैं, किंतु हर परिस्थिति में इन्हें एक ही मान लेना सही नहीं होगा। 2
एक बात और समझनी चाहिए। योगिनियों को केवल एक देवी के चौसठ पर्यायवाची नाम मान लेना पर्याप्त नहीं है। किसी परंपरा में वे महादेवी की शक्तियाँ हैं, कहीं मातृकाओं से संबंधित समूह हैं, कहीं स्थानीय देवियों और रक्षिकाओं के स्वरूप हैं। बौद्ध तांत्रिक साहित्य की डाकिनी जैसी संज्ञाओं से उनकी तुलना हो सकती है, लेकिन दोनों को बिना ग्रंथ और प्रसंग देखे पूरी तरह एक समान नहीं कहा जा सकता। 1 2
उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
योगिनियों की उत्पत्ति बताने वाली कोई एक ऐसी कथा नहीं है जिसे पूरे भारत की सभी परंपराओं ने समान रूप से स्वीकार किया हो। इतिहासकार देवी-समूहों, स्थानीय आस्थाओं, मातृका-उपासना तथा विकसित होती शैव-शाक्त तांत्रिक धाराओं के परस्पर संबंध का अध्ययन करते हैं। शमन हैटली का अकादमिक परिचय लगभग सातवीं शताब्दी ईस्वी के आसपास से तांत्रिक संदर्भों में योगिनियों की बढ़ती प्रमुखता की ओर संकेत करता है। पत्थर के विशिष्ट योगिनी मंदिर आगामी मध्यकालीन सदियों में स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर स्थल की तिथि एक जैसी निश्चित हो चुकी है। 2 3
धार्मिक ग्रंथ एक प्रकार का साक्ष्य देते हैं, मंदिरों का स्थापत्य दूसरा और शिलालेख या संग्रहालय में सुरक्षित प्रतिमाएँ तीसरा। इन सबको साथ रखकर इतिहास समझना पड़ता है। न तो किसी लोकप्रिय लोककथा को बिना प्रमाण ऐतिहासिक घटना बनाया जा सकता है और न ही किसी प्राचीन मूर्ति से उसके संपूर्ण अनुष्ठान का पता लगाया जा सकता है।
मातृकाएँ या मातृदेवियाँ योगिनी परंपराओं से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। कुछ व्यवस्थाओं में आठ मातृकाओं से आठ-आठ योगिनियों के समूहों की कल्पना की जाती है और संख्या चौसठ बनती है। लेकिन दूसरी व्यवस्थाओं में अलग देवियों का समावेश होता है या संख्या बदल जाती है। विद्या देहेजिया का महत्त्वपूर्ण अध्ययन विभिन्न नामावलियों, समूहों और मंदिरों को साथ रखता है; वह किसी एक सूची को सब पर लागू करने का आधार नहीं देता। 1 4
चार प्रमुख कथात्मक और धार्मिक परंपराएँ
इन देवियों के संबंध में किसी एक प्रमाणित, चार अध्यायों वाली सार्वदेशिक पुराण-कथा का दावा करना उचित नहीं है। इसके बजाय चार ऐसे परंपरा-प्रवाहों को समझना बेहतर है जो ग्रंथों और स्मारकों की सहायता से पहचाने जा सकते हैं।
1. महादेवी की अनेक शक्तियों की कल्पना
कुछ परंपराओं में योगिनियाँ देवी की अभिव्यक्तियाँ, सहचर शक्तियाँ अथवा उनके विविध सामर्थ्य की धारक हैं। एक केंद्र से प्रसारित अनेक दिव्य उपस्थितियों की कल्पना करें: कहीं रक्षा, कहीं उग्र परिवर्तन, कहीं जीवन के साधारण कामों से जुड़ा मंगल और कहीं स्थानीय देवी-विश्वास। यह धार्मिक अर्थ समझाने की एक विधि है, ऐसा दावा नहीं कि हर मंदिर में एक ही कथानक सुनाया जाता था। देहेजिया के अध्ययन में कई सूचियाँ देवी के व्यापक स्वरूप से संबंधित दिखाई देती हैं। 1
इस विचार में एकता और विविधता साथ दिखाई देती हैं। किसी श्रद्धालु को अनेक देवियों में एक महान शक्ति की उपस्थिति अनुभव हो सकती है; फिर भी प्रत्येक देवी की पहचान महत्त्वपूर्ण रहती है। शाक्त दर्शन के व्यापक संदर्भ में इस विचार को समझा जा सकता है, लेकिन योगिनियों को सीधे नवदुर्गा अथवा दस महाविद्याओं की हूबहू सूची बना देना भूल होगी।
2. मातृकाएँ और देवियों का चक्र
दूसरा प्रवाह योगिनियों को मातृकाओं से जोड़ता है। मातृकाएँ स्वयं प्राचीन भारतीय मूर्तिकला और देवी-उपासना का महत्त्वपूर्ण विषय हैं। कहीं सात तो कहीं आठ माताओं की चर्चा होती है। कुछ तांत्रिक या परवर्ती व्यवस्थाओं में इनके आसपास योगिनियों के क्रमबद्ध समूह रखे जाते हैं। इस प्रकार चक्र केवल गोल आकृति नहीं, बल्कि देवियों के पारस्परिक संबंध का प्रतीकात्मक विन्यास बन सकता है। 1 3
फिर संख्या हमेशा चौसठ ही क्यों नहीं है? भेड़ाघाट का उदाहरण इक्यासी योगिनियों की चर्चा के लिए प्रसिद्ध है। शोधकर्ताओं ने बयालीस योगिनियों के समूहों का भी उल्लेख किया है। इसलिए संख्या को उसके विशिष्ट ग्रंथ और मंदिर के भीतर समझना चाहिए। एक मंदिर का प्रमाण दूसरे मंदिर के नामों का पूरा उत्तर नहीं है। 3 5
3. शिव, भैरव और योगिनी परंपराओं का संबंध
शैव तांत्रिक परंपराओं में भैरव तथा संबंधित देवी-शक्तियों के संदर्भ में योगिनियों का महत्त्व मिलता है। कुछ मंदिरों में देवियों के समूह के बीच शिव से संबंधित रूप या देवालय दिखाई देता है। ऐसी रचना से धार्मिक संबंध का संकेत मिलता है, किंतु यह कहना गलत होगा कि सभी योगिनियाँ केवल शिव की एक जैसी परिचारिकाएँ थीं या प्रत्येक शैव मत में एक समान योगिनी-साधना होती थी। 2 5
इन परंपराओं में मंत्र, दीक्षा और विशिष्ट अनुष्ठानों की चर्चा मिलती है। उनका ऐतिहासिक उल्लेख करना और उन्हें आज किसी भी पाठक के लिए विधि के रूप में दे देना अलग बातें हैं। इस सार्वजनिक ज्ञान-लेख का उद्देश्य अनुष्ठान कराना नहीं, उनके धार्मिक संदर्भ को समझाना है।
4. जब देवी-मंडल मंदिर के स्थापत्य में दिखाई देता है
हीरापुर के मंदिर में खुली छत के नीचे वृत्ताकार दीवार और देवी-प्रतिमाओं के स्थान दिखाई देते हैं। रानीपुर-झरियाल में योगिनी मंदिर एक बड़े ऐतिहासिक तीर्थ-परिसर का भाग है। खजुराहो में, इसके विपरीत, मंदिर का रूप आयताकार है। इन स्थलों पर देवियों का समूह केवल पढ़ा जाने वाला विचार नहीं रहता; वह पत्थरों के माध्यम से देखने और अनुभव करने योग्य स्थापत्य बन जाता है। 6 7 5
फिर भी हमें यह नहीं मानना चाहिए कि हजार वर्ष पुराना प्रत्येक अनुष्ठान आज भी बिल्कुल उसी रूप में चलता है। प्रतिमाएँ टूट सकती हैं, स्थान बदल सकते हैं, और उपासना की विधियाँ समय के साथ विकसित होती हैं। इसलिए उपलब्ध प्रमाण जितना बताए, उससे अधिक का दावा नहीं करना चाहिए।
योगिनी मंदिरों की अनूठी रचना
कई योगिनी मंदिर आकाशमुक्त या हाइपीथ्रल शैली के हैं—अर्थात उनका मुख्य आँगन खुला रहता है। भीतर की ओर मुख किए अनेक छोटे स्थानों में देवियों की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती थीं। कुछ स्थानों पर बीच में अलग देवालय भी है। यह व्यवस्था सामूहिक दर्शन का वातावरण बनाती है। किंतु सभी मंदिर गोलाकार नहीं हैं और खुली छत देखकर किसी विशेष तांत्रिक विधि की निश्चित जानकारी नहीं मिलती। 3 5
हीरापुर, ओडिशा
भुवनेश्वर के पास हीरापुर का चौसठी योगिनी मंदिर इस स्थापत्य परंपरा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। ओडिशा के हिंदू धार्मिक न्यास विभाग का विवरण मंदिर को लगभग नौवीं शताब्दी के संदर्भ में रखता है और इसके निर्माण को रानी हीरादेवी से जोड़ने वाली मान्यता का उल्लेख करता है। यह राजकीय संबंध एक प्रचलित ऐतिहासिक आरोपण है; अंतिम निष्कर्ष के लिए स्वतंत्र शिलालेखीय पुष्टि आवश्यक है। 6
छोटे से घेरे में स्थापित अलग-अलग आकृतियाँ दर्शाती हैं कि योगिनी समूह में एक ही रूप की बार-बार पुनरावृत्ति नहीं है। कहीं वाहन, कहीं आभूषण और कहीं हाथों की वस्तु बदलती है। किसी चित्र में अलग से दिखाई गई मूर्ति को उसके मूल स्थान से जोड़कर देखना अधिक उपयोगी है।
रानीपुर-झरियाल, ओडिशा
बलांगीर जिले का रानीपुर-झरियाल अपने योगिनी मंदिर और आसपास के प्राचीन धार्मिक अवशेषों के कारण जाना जाता है। राज्य पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन इसे शैव, वैष्णव, बौद्ध तथा तांत्रिक इतिहास के मेल वाले क्षेत्र के रूप में वर्णित करते हैं। इससे पता चलता है कि ऐतिहासिक धार्मिक स्थल अक्सर एक ही संप्रदाय की सीमाओं में नहीं बँधते। 7 9
यहाँ योगिनी मंदिर को अलग-थलग रहस्यमय स्मारक कहने के बजाय उसके आसपास के मंदिरों, स्थानिक भूगोल और स्थानीय धार्मिक जीवन के साथ समझना चाहिए। किसी देवालय की मौजूदगी पूरे परिसर में प्रचलित सभी विचारों को एक जैसा सिद्ध नहीं करती।
खजुराहो, मध्य प्रदेश
खजुराहो का चौसठ योगिनी मंदिर सामान्य धारणा को सुधारता है कि योगिनी मंदिर हमेशा गोल होते हैं। यह आयताकार आँगन के आसपास बने छोटे प्रकोष्ठों वाला मंदिर है। यूनेस्को के विश्व धरोहर केंद्र की एक प्रस्तावित अस्थायी सूची में इसकी चर्चा की गई है। ध्यान रहे, अस्थायी सूची में नाम होने का मतलब यह नहीं कि योगिनी मंदिरों का पूरा समूह अलग से विश्व धरोहर घोषित हो गया है। 5
मंदिर के कई हिस्से और मूर्तियाँ अपने मूल रूप में सुरक्षित नहीं हैं। इसलिए किसी रिक्त स्थान पर किस देवी की प्रतिमा रही होगी, यह दावा प्रमाण मिलने पर ही करना चाहिए। इस स्थल का अध्ययन हमें इतिहास की उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाएँ भी सिखाता है।
भेड़ाघाट, मध्य प्रदेश
जबलपुर के समीप भेड़ाघाट अथवा भेराघाट का योगिनी स्थल विशेष रूप से इक्यासी की संख्या के कारण महत्त्वपूर्ण है। यहाँ की चर्चा से स्पष्ट होता है कि हर देवी-मंडल को चौसठ में समेटना उचित नहीं। अलग ग्रंथों में अलग चक्रों और समूहों के संदर्भ भी मिलते हैं। स्थल के नाम में प्रचलित ‘चौसठ’ होने मात्र से उसकी ऐतिहासिक प्रतिमाओं की वास्तविक संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती। 3 5
मितावली, मध्य प्रदेश
मुरैना जिले का मितावली या मितौली मंदिर, जिसे एकत्तरसौ महादेव भी कहा जाता है, पहाड़ी पर स्थित प्रभावशाली वृत्ताकार संरचना है। उसके चारों ओर बने कक्ष और मध्य में शिव-संबंधी मंदिर इस स्थल को विशिष्ट बनाते हैं। यहाँ हीरापुर जैसे सुरक्षित योगिनी समूह का पूरा दृश्य आज उपलब्ध नहीं है। 10 11
मितावली की तिथि को लेकर सरकारी विवरणों में भी असंगति दिखाई देती है। मुरैना जिला प्रशासन की वेबसाइट 1323 ईस्वी के लेख और उससे संबद्ध राजा के लिए अलग शताब्दी में पड़ने वाला शासनकाल साथ बताती है। अतः इस लेख में उस तिथि को निर्विवाद तथ्य नहीं माना गया है। यह भी लोकप्रिय दावा है कि इस मंदिर ने पुरानी भारतीय संसद के भवन को सीधे प्रेरित किया। दोनों की आकृति में समानता दिखाई देना अलग बात है, निर्माण-प्रेरणा का ठोस दस्तावेज मिलना अलग; इसे अभी प्रमाणित इतिहास नहीं कहना चाहिए।
प्रतिमाओं के रूप और प्रतीकों का अर्थ
योगिनी मूर्तियों में आश्चर्यजनक विविधता है। कोई शांत दिखाई देती है, तो कोई उग्र; किसी का चेहरा मानवीय है, तो कहीं पशु-पक्षी से मिलती आकृति। कुछ के हाथों में अस्त्र या पात्र हैं; दूसरी प्रतिमाओं में सूप, झाड़ू या घर के काम से जुड़ी वस्तुएँ दिखाई देती हैं। यह भिन्नता धार्मिक कल्पना की विशेषता है, भूल नहीं। 12 13 14
स्मिथसोनियन के राष्ट्रीय एशियाई कला संग्रहालय में सुरक्षित एक योगिनी प्रतिमा के विवरण में सूप, झाड़ू, कपाल-पात्र और आधार पर पक्षी की आकृति का उल्लेख है। संग्रहालय इन विशेषताओं को देवी के एकाधिक स्वरूपों से जोड़ता है। पर यह व्याख्या उस विशेष मूर्ति के लिए है; उसे हर मंदिर की सभी योगिनियों पर लागू नहीं किया जा सकता। पेरिस के गिमे संग्रहालय की एक योगिनी प्रतिमा मातृका-संबंधी एवं उग्र देवी-चित्रण का अलग उदाहरण देती है। 12 13
वाहन, मुखाकृति, मुद्रा और हाथों की वस्तुओं का अर्थ समझने के लिए उनकी स्थानीय कला-परंपरा, प्रतिमा की दशा और संबंधित ग्रंथ देखना आवश्यक है। गोल मंडल को सामूहिक शक्ति का रूपक कहा जा सकता है, किंतु प्रत्येक मंदिर के शिल्पी का आशय निश्चित रूप से यही था—ऐसा प्रमाण बिना कह देना उचित नहीं। किसी भयानक दिखने वाले रूप को अपने-आप अशुभ या दुष्ट भी नहीं कहा जा सकता।
दर्शन: शक्ति की अनेकता को कैसे समझें?
योगिनियों को पढ़ते समय शक्ति की अवधारणा विशेष महत्त्व रखती है। एक सर्वोच्च देवी की अनेक अभिव्यक्तियों के रूप में देवी-मंडल को समझना शाक्त धार्मिक चिंतन की एक दिशा है। दूसरे प्रसंग में अनेक देवियाँ एक समूह बनाकर भी अपनी स्वतंत्र पहचान रखती हैं। इन दोनों दृष्टियों में एकता और बहुलता के बीच रोचक संबंध दिखाई देता है। 1 2
आधुनिक पाठक इन मंडलों को सहयोग, विविध क्षमता और स्त्री-दैवी सामर्थ्य की प्रतीकात्मक छवि के रूप में भी पढ़ सकता है। लेकिन यह समकालीन व्याख्या है, यह दावा नहीं कि हर प्राचीन साधक ने यही सामाजिक संदेश दिया था। देवी मूर्तियों की अधिकता से अपने-आप यह भी सिद्ध नहीं होता कि संबंधित समाजों में वास्तविक महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त थे। मानवीय योगिनियों की ऐतिहासिक भूमिका जानने के लिए अलग साक्ष्य चाहिए।
तंत्र किसी एक ढर्रे का दर्शन नहीं है। उसके अनेक ग्रंथ, मत और अनुष्ठान-परंपराएँ रही हैं। कहीं सिद्धि अर्थात विशेष सामर्थ्य प्राप्त करने की अभिलाषा का वर्णन मिलता है। ऐसी अभिलाषा का इतिहास लिखना, सिद्धियों के चमत्कारी प्रभावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कहना नहीं है। इस अंतर को समझने से विषय न तो सनसनीखेज बनता है और न ही उसकी धार्मिक गंभीरता कम होती है।
अन्य हिंदू और बौद्ध परंपराओं से संबंध
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में देवी की शक्ति और अनेक दैवी स्त्रीरूपों का प्रभावशाली चित्रण है। शाक्त चिंतन की तुलना के लिए यह उपयोगी है, लेकिन इसे चौसठ योगिनियों की सार्वभौम नामावली मानना अनुचित होगा।
मातृकाओं से योगिनियों के समूहगत संबंध मिलते हैं। शक्ति, दुर्गा और काली व्यापक देवी-परंपराओं के संदर्भ उपलब्ध कराती हैं। शिव और भैरव से शैव तांत्रिक संबंधों को समझा जा सकता है। वहीं कुछ बौद्ध तांत्रिक परंपराओं में योगिनी तथा डाकिनी जैसे रूपों की चर्चा होती है। अलग मतों की समानता समझने के लिए उनकी भिन्नता मिटाना आवश्यक नहीं है। 2
अतः यह कहना कि ‘सभी योगिनियाँ केवल नवदुर्गा हैं’, ‘सब शिव की पत्नियाँ हैं’ या ‘सभी डाकिनियों के समान हैं’—इतिहास और परंपरागत विविधता के अनुरूप नहीं होगा। किसी एक ग्रंथ में दो रूप जुड़े मिलें तो भी दूसरे ग्रंथ के लिए वही संबंध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता।
ग्रंथ, साहित्य और प्रमाण की सीमा
योगिनियाँ किसी एक प्रसिद्ध कथा के सहारे समझी जाने वाली विषयवस्तु नहीं हैं। उनके अध्ययन में तांत्रिक साहित्य, कुछ पुराण-संबंधी नामावलियाँ, परवर्ती संकलन, मूर्तियाँ, मंदिर और शिलालेख सभी महत्त्वपूर्ण हैं। ब्रह्मयामल जैसे ग्रंथों का संबंध आधुनिक शैव-तांत्रिक शोध में उठता है, किंतु पांडुलिपि अथवा विशिष्ट संस्करण देखे बिना उसके नाम से श्लोक संख्या या संस्कृत उद्धरण देना अनुचित होगा। 1 2
विद्या देहेजिया की 1986 की पुस्तक Yoginī, Cult and Temples: A Tantric Tradition योगिनी प्रतिमाओं और अलग-अलग सूचियों का एक प्रमुख अध्ययन है। भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय की वेबसाइट पर इसका प्रकाशन-विवरण मिलता है। इस संस्करण ने इंटरनेट पर घूम रहे किसी स्कैन को स्वतंत्र पुनर्प्रकाशन की अनुमति प्राप्त सामग्री नहीं माना है। शमन हैटली के 2020 के अकादमिक लेख का सार्वजनिक सार भी उपयोग में आया है; उसकी संपूर्ण सशुल्क सामग्री पढ़ लेने का दावा यहाँ नहीं किया गया। 1 2 4
संग्रहालयों के स्पष्ट परिचय उपयोगी हैं क्योंकि उनसे किसी विशिष्ट प्रतिमा की पहचान, उसका संग्रह और अनुमानित काल देखा जा सकता है। लेकिन संग्रहालय की पट्टिका अकेले ही उस प्रतिमा से जुड़े सारे अनुष्ठानों, मौखिक इतिहास और मूल समुदाय की परंपरा की पूर्ण जानकारी नहीं देती।
उपासना, सांस्कृतिक विरासत और सार्वजनिक मर्यादा
योगिनियों का ऐतिहासिक अध्ययन मंदिर-उपासना, देवी-श्रद्धा और विशिष्ट तांत्रिक परंपराओं के संदर्भ में किया जाता है। कुछ मंदिर आज भी स्थानीय आस्था के स्थल हैं, जबकि कई टूटे हुए अवशेष शोध और संरक्षण का विषय हैं। आज की किसी पूजा को बिना प्रमाण सीधे नौवीं शताब्दी की अपरिवर्तित विधि कहना ठीक नहीं। 6 7
सामान्य पाठक या यात्री के लिए उचित तरीका है—स्थल का इतिहास जानना, वहाँ की मर्यादा का पालन करना, उपासकों का सम्मान करना और संरक्षित मूर्तियों को नुकसान पहुँचाए बिना देखना। किसी मंदिर का सार्वजनिक होना इस बात का प्रमाण नहीं कि उसके दीक्षा-आश्रित मंत्र या गोपनीय अनुष्ठान सबके लिए निर्देश के रूप में प्रकाशित किए जा सकते हैं। यह लेख कोई साधना-क्रम, गुप्त यंत्र, मंत्र-प्रयोग या चमत्कारी फल का आश्वासन नहीं देता।
शिवगोरक्ष पर किसी प्रतिमा का चित्र लगाने से पहले चित्र-उपयोग के अधिकार, मूर्ति का परिचय और उचित कैप्शन जाँचना आवश्यक है। संग्रहालय की वेबसाइट पर तस्वीर दिखने का अर्थ स्वतः यह नहीं कि उसे अपनी वेबसाइट में स्वतंत्र रूप से पुनः उपयोग किया जा सकता है।
क्या योगिनियाँ केवल चौसठ ही होती हैं?
नहीं। चौसठ प्रमुख संख्या है, पर बयालीस और इक्यासी के समूह भी ऐतिहासिक रूप से चर्चित हैं। चौसठ नामों वाली सूचियाँ भी परस्पर अलग हो सकती हैं। 1 3
क्या हर योगिनी एक महिला योग-साधिका होती है?
नहीं। शब्द का अर्थ प्रसंग के अनुसार मानवीय साधिका या देवीस्वरूप हो सकता है। इन दोनों को अलग रखना आवश्यक है। 2
क्या सभी योगिनी मंदिर वृत्ताकार हैं?
नहीं। खजुराहो का मंदिर आयताकार रचना वाला प्रसिद्ध अपवाद है। 5
क्या योगिनियाँ और नवदुर्गा एक ही सूची हैं?
नहीं। देवियों के दार्शनिक और धार्मिक संबंध हो सकते हैं, पर दोनों को एक ही वर्गीकरण कहना उचित नहीं। यही सावधानी महाविद्याओं के संदर्भ में भी आवश्यक है।
क्या उग्र चेहरे वाली योगिनियाँ अनिष्टकारी देवियाँ हैं?
प्रतिमा का उग्र रूप देखकर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। रक्षण, शक्ति और अन्य धार्मिक अर्थ संदर्भ के अनुसार होते हैं। 12 13
इंटरनेट पर मिली चौसठ नामों की सूची पर भरोसा किया जा सकता है?
उसका मूल ग्रंथ, मंदिर, पांडुलिपि या परंपरा स्पष्ट हो तो उसे उसी विशेष परंपरा की सूची के रूप में पढ़ा जा सकता है। बिना स्रोत की सूची को अंतिम और सर्वमान्य नहीं कहना चाहिए। 1
शब्दावली
- योगिनी: प्रसंगानुसार स्त्री साधिका अथवा देवीस्वरूप शक्तिशाली स्त्री-दैवी सत्ता।
- चौसठी / चौसठ: संख्या 64; कुछ योगिनी-मंडलों और मंदिरों का प्रचलित नाम।
- शक्ति: दिव्य सामर्थ्य; शाक्त परंपरा में देवी से केंद्रीय संबंध।
- मातृकाएँ: मातृदेवियों का समूह, जो कई योगिनी परंपराओं से जुड़ा है।
- चक्र / मंडल: क्रमबद्ध वृत्त या समूह; अर्थ प्रसंग पर निर्भर।
- भैरव: शिव का उग्र स्वरूप, कुछ शैव तांत्रिक व्यवस्थाओं में महत्त्वपूर्ण।
- तंत्र: विविध धार्मिक ग्रंथों, विधाओं और मत-परंपराओं का व्यापक क्षेत्र।
- आकाशमुक्त मंदिर: ऐसा स्थापत्य जिसका मध्य भाग खुले आकाश के नीचे हो।
- सिद्धि: योग या तांत्रिक साहित्य में वर्णित विशेष उपलब्धि; वैज्ञानिक प्रमाण का पर्याय नहीं।
- डाकिनी: विशेषकर बौद्ध तांत्रिक संदर्भों में प्रयुक्त स्त्री-दैवी संज्ञा; प्रत्येक हिंदू योगिनी का पर्याय नहीं।




