सम्पादकीय स्रोत-सूचना। नीचे चयनित एक ऋचा का पूरा मूल देवनागरी पाठ दिया है; यह हिन्दी अनुवाद नहीं है। पाठ ऋग्वेद शाकल संहिता ७.५९.१२ के शब्दों के अनुसार बिना वैदिक स्वर-चिह्नों के प्रस्तुत है। मूल ऋग्वैदिक ऋचा के आरम्भ में ‘ॐ’ नहीं है। संस्थागत डिजिटल पाठ और पदपाठ से इसकी तुलना की गई है, लेकिन ऐतिहासिक मुद्रित प्रति का प्रत्यक्ष मिलान, स्वर-विशेषज्ञ जाँच, उपयोगाधिकार और अन्तिम शास्त्रीय समीक्षा अभी शेष है। 1 2 3
सम्पूर्ण मूल मन्त्र — देवनागरी (स्वर-चिह्न रहित)
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥
सरल अर्थ और विस्तृत व्याख्या
मन्त्र (ऋग्वेद ७.५९.१२)
सरल हिन्दी अर्थ। हम त्र्यम्बक—रुद्र—की उपासना करते हैं, जो सुगन्धित अर्थात् मंगलमय प्रभाव वाले और पुष्टि बढ़ाने वाले हैं। जैसे पका हुआ उर्वारुक-फल डंठल के बन्धन से छूटता है, वैसे मैं मृत्यु से मुक्त होऊँ, पर अमृतत्व से वंचित न होऊँ। विस्तृत व्याख्या। यह ऋग्वैदिक ऋचा त्र्यम्बक को सम्बोधित है; पारम्परिक ऋक्-वर्गीकरण में इसकी देवता-संज्ञा रुद्र दी जाती है। “यजामहे” में “हम उपासना करते हैं” का बहुवचन है, जबकि “मुक्षीय” में “मैं मुक्त होऊँ” की कामना व्यक्त होती है। “सुगन्धि” की सुगन्ध को परम्परागत टीका में दूर तक फैलने वाले शुभ प्रभाव की उपमा माना जाता है; “पुष्टि” में पोषण और उन्नति का आशय है। “उर्वारुक” ककड़ी/लौकी-जैसे फल के लिए प्रयुक्त शब्द है—पकने पर उसका डंठल से सहज अलग होना बन्धन-मुक्ति का बिम्ब है। अन्त का “मामृतात्” पदपाठ के अनुसार “मा + अमृतात्” है: “अमृतत्व से नहीं।” इसलिए प्रार्थना मृत्यु से मुक्ति की है, अमृतत्व से वियोग की नहीं। बाद की शैव परम्परा इसे आध्यात्मिक मुक्ति और निर्भयता से जोड़ती है; पाठ अपने-आप में न तो देह की अमरता सिद्ध करता है और न चिकित्सा का निश्चित परिणाम।
मन्त्र के हर पद को समझें
त्र्यम्बकम्। परम्परा में इसका प्रसिद्ध अर्थ ‘तीन नेत्रों वाले’ है। ऋग्वेद के इस मन्त्र के लिए पारम्परिक देवता-संज्ञा रुद्र है; शैव भक्ति में रुद्र-त्र्यम्बक को शिव के रूप में पूजा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि अलग-अलग ऐतिहासिक कालों के प्रत्येक पाठ में बाद की सभी मूर्तिपरक व्याख्याएँ ज्यों की त्यों उपस्थित थीं। व्याकरण की दृष्टि से ‘त्र्यम्बकम्’ ‘यजामहे’ क्रिया का कर्मपद है। 1 6
यजामहे। अर्थ है ‘हम यजन/पूजन करते हैं’। यह बहुवचन है। मन्त्र के प्राचीन वैदिक यज्ञ-सन्दर्भ और आज के व्यक्तिगत श्रद्धा-जप में सम्बन्ध है, पर दोनों को बिना भेद के एक ही अनुष्ठान नहीं कहा जाना चाहिए। 1 4
सुगन्धिम्। शाब्दिक अर्थ ‘सुगन्ध वाले’ है। पारम्परिक व्याख्या में सुगन्ध को दूर तक पहुँचने वाली कीर्ति, पुण्य और कल्याण के रूपक के रूप में भी समझा जाता है—जैसे पुष्पित वृक्ष की सुगन्ध फैलती है। यह टीकात्मक अर्थ है, मन्त्र का कोई अतिरिक्त शब्द नहीं। 2
पुष्टिवर्धनम्। जो पुष्टि, पोषण और फलने-फूलने की क्षमता बढ़ाता है। इसका सामान्य आध्यात्मिक भाव जीवन की रक्षा-पोषण है; इससे धन, आरोग्य अथवा आयु का निश्चयात्मक वैज्ञानिक परिणाम घोषित नहीं किया जा सकता। 2 6
उर्वारुकमिव। ‘उर्वारुक फल की तरह’। इसे प्रायः ककड़ी अथवा लौकी-जैसे पके फल का बिम्ब कहा गया है। ठीक किस आधुनिक वनस्पति-प्रजाति को यहाँ मानें, इस पर आवश्यकता से अधिक निश्चितता उचित नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि परिपक्व फल डंठल का बन्धन छोड़ देता है। ‘इव’ का अर्थ ‘के समान’ है। 2 6
बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय। संहिता के जुड़े हुए रूप को पदपाठ अलग करता है: बन्धनात् । मृत्योः । मुक्षीय। ‘बन्धन’ अर्थात् बँधे होने की दशा, ‘मृत्योः’ अर्थात् मृत्यु से, और ‘मुक्षीय’ अर्थात् मैं मुक्त होऊँ। ध्यान दें—प्रारम्भिक ‘हम पूजा करते हैं’ के बाद यहाँ प्रथम पुरुष एकवचन की मुक्ति-प्रार्थना है। 2 3
मामृतात्। इस संधियुक्त शब्द का पदपाठ मा । अमृतात् है। भाव है ‘अमृतत्व से नहीं’—अर्थात् मृत्यु के बन्धन से मुक्ति मिले, पर अमृतत्व से वियोग न हो। ‘मामृतात्’ को ‘मेरा अमृत’ मानना या इससे देह की निश्चित अमरता का वादा निकालना पाठ-संगत नहीं। शैव साधना में अमृतत्व का गहरा आध्यात्मिक अर्थ हो सकता है, किन्तु उसे स्रोत से अलग व्याख्या के रूप में स्पष्ट रखना चाहिए। 2 3
मूल मन्त्र में ॐ है या नहीं? ऋग्वेद ७.५९.१२ का मूल आरम्भ ‘त्र्यम्बकं’ से होता है। अनेक पूजा-पाठ पुस्तिकाओं और लोकप्रचलित जप-रूपों में ‘ॐ त्र्यम्बकं…’ कहा जाता है। ‘ॐ’ एक भक्तिपरक/पाठ-परम्परागत उपसर्ग है; उसे ऋग्वैदिक ऋचा का छूटा हुआ पहला शब्द मानकर मूल में चुपचाप नहीं जोड़ेंगे। यहाँ की एकमात्र मूल पाठ-इकाई में न अतिरिक्त ‘ॐ’ है, न बाद की फलश्रुति। 1 4 5
ऋग्वेद में यह मन्त्र कहाँ है? मन्त्र ऋग्वेद मण्डल ७, सूक्त ५९, ऋचा १२ है। इस सूक्त की पहले की ऋचाएँ सामान्यतः मरुतों से सम्बन्धित हैं, जबकि अन्तिम १२वीं ऋचा की देवता-संज्ञा रुद्र दी गई है। पारम्परिक ऋषि-निर्देश वसिष्ठ मैत्रावरुणि है और इस ऋचा का छन्द अनुष्टुप् बताया गया है। ‘महामृत्युञ्जय’ आज का प्रसिद्ध उपासना-नाम है; उसे श्लोक के मूल में नया शब्द जोड़ने या दूसरे श्लोक की रचना करने का आधार नहीं बनाना चाहिए। 1 3
इसी त्र्यम्बक-प्रार्थना का पाठ तैत्तिरीय संहिता १.८.६ और वाजसनेयी संहिता ३.६० के यजुर्वैदिक सन्दर्भों में भी मिलता है। उनके पास के अनुष्ठान-वाक्य, स्वर तथा पाठरूप अलग हैं। वाजसनेयी संहिता ३.६० में इसके बाद पतिवेदनम् वाला सम्बन्धित मन्त्र आता है; वह ऋग्वेद ७.५९.१२ की कोई गुम पंक्ति नहीं है। 4 5
पके फल की उपमा का जीवन में अर्थ
फल बढ़ते समय डंठल से जुड़ा रहता है और पक जाने पर अलग होता है। इस उपमा से भय, आसक्ति, मृत्यु-बोध और जीवन की परिपक्वता पर विचार किया जा सकता है। यह आधुनिक, सरल चिंतनपरक अर्थ-विस्तार है; इसे यह दावा नहीं बनाना चाहिए कि मन्त्र-पाठ करते ही मृत्यु असम्भव हो जाती है। दुःख या रोग के समय श्रद्धा से प्रार्थना किसी व्यक्ति को मानसिक और आध्यात्मिक आधार दे सकती है, पर यह चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
क्या महामृत्युञ्जय मन्त्र रोग ठीक करने की गारंटी है? नहीं। लोग परम्परागत रूप से इस मन्त्र को कुशलता, रक्षा, धैर्य और आरोग्य की कामना से स्मरण करते हैं। लेकिन इस ऋचा से किसी रोग का निदान, सिद्ध उपचार, दुर्घटना से निश्चित रक्षा, अमरत्व या नियत अवधि में कोई चमत्कार प्रमाणित नहीं होता। बीमारी हो तो उचित चिकित्सकीय देखभाल आवश्यक है। इस लेख में जप की संख्या, रोग के अनुसार मन्त्र-उपयोग या किसी परिणाम की गारंटी नहीं दी जाती।
वैदिक स्वर, उच्चारण और साधना की सीमा
यह मूल देवनागरी पाठ स्वर-चिह्न रहित अध्ययन-पाठ है। वैदिक संहिताओं में उदात्त-अनुदात्त आदि स्वर-पद्धति का अपना महत्त्व है। यहाँ दिया हुआ पाठ औपचारिक वैदिक स्वर-शिक्षा अथवा यज्ञ-विधि का निर्देश नहीं है। होम, न्यास, बीज-विस्तार, श्वास-नियन्त्रण, दीक्षा, विशिष्ट समय या जप-संख्या जैसी विधियों पर परम्परा-विशेषज्ञ की स्वीकृति सहित अलग ‘पूजा एवं अभ्यास’ सामग्री चाहिए। अलग-अलग परम्पराओं के नियमों को बिना प्रमाण किसी एक सार्वभौमिक निषेध या अनुमति के रूप में नहीं कहेंगे। 1 3 4
महत्त्वपूर्ण पाठभेद और सम्पादकीय निर्णय
- स्वरयुक्त और स्वररहित रूप: संस्थागत स्रोत में वैदिक स्वर अंकित हैं; यहाँ स्वर हटाने की स्पष्ट सूचना है, इसे वैदिक उच्चारण में स्वर को अनावश्यक बताना नहीं समझना चाहिए। 1
- संहिता और पदपाठ: ‘बन्धनान्मृत्योः’ के पद ‘बन्धनात्’ और ‘मृत्योः’ हैं; ‘मामृतात्’ का पदच्छेद ‘मा’ तथा ‘अमृतात्’ है। 2
- अवग्रह वाला रूप: ‘माऽमृतात्’ में अवग्रह संधि को समझने में मदद करता है; चयनित ऋग्वेद-पाठ में ‘मामृतात्’ रखा गया है। 4
- ॐ सहित प्रचलित पाठ: श्रद्धापरक प्रचलन है, मूल ७.५९.१२ का शब्दशः आरम्भ नहीं। 1
- मुद्रित प्रति का सत्यापन: १८६२ के मैक्स मूलर-सम्पादित मुद्रित खण्ड की जानकारी मिली है, पर उसके सटीक पृष्ठ का इस संस्करण हेतु प्रत्यक्ष मिलान नहीं किया गया। इसलिए मुद्रित-मिलान को पूरा नहीं बताया जाएगा। 7
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
महामृत्युञ्जय नाम का अर्थ क्या है? प्रचलित भक्ति-नाम का आशय ‘मृत्यु पर विजय’ से जोड़ा जाता है; मूल ऋग्वैदिक ऋचा की पहली शब्दावली ‘त्र्यम्बकं’ है। क्या आरम्भ में ‘ॐ’ लगाना मूल मन्त्र का अनिवार्य अंग है? ऋग्वेद ७.५९.१२ में नहीं। अनेक प्रचलित प्रार्थना-रूपों में यह जोड़ा जाता है; पाठ की पहचान अलग दिखानी चाहिए। इस मन्त्र की देवता कौन है? ऋग्वेद के पारम्परिक निर्देश में इस ऋचा की देवता रुद्र हैं, जिन्हें शैव भक्ति में शिव के रूप में पूजा जाता है। उर्वारुक क्या है? ककड़ी अथवा लौकी जैसे फल का प्रसिद्ध बिम्ब है, विशेषतः डंठल से पकने पर अलग होने का। सटीक आधुनिक वनस्पतिक नाम तय करना अर्थ समझने के लिए जरूरी नहीं। ‘यजामहे’ में ‘हम’ और ‘मुक्षीय’ में ‘मैं’ क्यों है? यह मूल व्याकरण का भेद है—सामूहिक पूजा और व्यक्तिगत मुक्ति-कामना दोनों मन्त्र में उपस्थित हैं। ‘मामृतात्’ का मतलब क्या मरने की इच्छा है? नहीं। पदच्छेद ‘मा + अमृतात्’ है: मृत्यु से मुक्ति हो, अमृतत्व से वियोग न हो। क्या इससे रोग, दुर्घटना या मृत्यु का निश्चित निवारण होता है? इस मन्त्र को लेकर ऐसी चिकित्सकीय अथवा भौतिक गारंटी उचित नहीं। क्या यह पृष्ठ स्वर सहित वैदिक जप सिखाता है? नहीं, इसमें स्वर हटाए गए हैं। स्वरसिद्ध पाठ और विशेष विधि के लिए मान्य शिक्षक व विशेषज्ञ की समीक्षा चाहिए। क्या यजुर्वेद में यही मन्त्र है? सम्बन्धित पाठ आता है; किन्तु ऋग्वेद ७.५९.१२ के साथ यजुर्वेद के अतिरिक्त अनुष्ठान-मन्त्र मिलाकर नया संयुक्त मूल-पाठ नहीं बनाया गया है।




