सम्पादकीय स्रोत-सूचना। नीचे इस प्रविष्टि का पूरा मूल पाँच-अक्षरी मन्त्र दिया गया है। ‘ॐ’ को बिना सूचना जोड़ा नहीं गया है। यही मूल देवनागरी पाठ है, हिन्दी अनुवाद नहीं। इसका अंश तैत्तिरीय संहिता के श्रीरुद्रम् में मिलता है और बाद के शैव ग्रन्थ इसका स्वतन्त्र मन्त्र के रूप में विवेचन करते हैं। मुद्रित स्रोत-मिलान, वैदिक स्वर, पुनःप्रयोग-अधिकार और परम्परा-विशेषज्ञ की अन्तिम स्वीकृति अभी शेष है। 1 2
सम्पूर्ण मूल मन्त्र — देवनागरी
नमः शिवाय ॥
मूल मन्त्र का अर्थ और व्याख्या
मन्त्र
सरल अर्थ। कल्याणस्वरूप भगवान् शिव को नमस्कार; मैं शिव के प्रति श्रद्धापूर्वक नमन करता/करती हूँ। विस्तृत व्याख्या। ‘शिव’ का अर्थ ‘मंगलमय/कल्याणकारी’ भी है और यह भगवान् शिव का नाम भी है। ‘शिवाय’ में ‘-आय’ चतुर्थी विभक्ति का रूप है—‘शिव के लिए/शिव को’। ‘नमः’ में आदरपूर्वक नमन का भाव है; यह किसी निश्चित लौकिक परिणाम का सौदा नहीं। यह पाँच अक्षरों वाला स्वतन्त्र भक्तिपरक मन्त्र है। उसके आगे ‘ॐ’ जोड़ना, रुद्रम् की पूरी पंक्ति पढ़ना, अथवा पाँच श्लोकों वाला शिवपञ्चाक्षरस्तोत्र पढ़ना—तीनों को एक ही पाठ-इकाई नहीं मानना चाहिए। विभिन्न शैव परम्पराओं में इसके गूढ़ अर्थ अलग-अलग ढंग से समझाए जाते हैं।
संस्कृत के दोनों शब्दों का अर्थ
नमः आदर, विनय और नमस्कार का शब्द है। इसे ऐसी शर्त न समझें कि मन्त्र पढ़ते ही निश्चित धन, स्वास्थ्य या अन्य फल मिलना अनिवार्य हो। शिवाय, ‘शिव’ शब्द का चतुर्थी रूप है—‘शिव को’। ‘शिव’ नाम के साथ ‘कल्याणकारी’ अर्थ जुड़ा है, किन्तु अलग शैव सम्प्रदाय ईश्वर, जीव तथा जगत् के सम्बन्ध को अलग दार्शनिक ढंग से समझाते हैं। सीधा व्याकरणिक अर्थ ‘शिव को नमस्कार’ है; अन्य सूक्ष्म तात्त्विक व्याख्याएँ परम्परागत टिप्पणी के स्तर पर आती हैं। 1 2
पाँच अक्षर कौन-से हैं? प्रचलित विभाजन न · मः · शि · वा · य है। यहाँ ‘अक्षर’ केवल लिखावट के अक्षरों की गिनती नहीं, बोले जाने वाले ध्वनि-खंडों का पारम्परिक विधान है। ‘मः’ में विसर्ग ः रहने पर भी वह अलग छठा अक्षर नहीं गिना जाता। ‘वा’ में दीर्घ आ है और ‘शि’ में श का उच्चारण है। देवनागरी मूल और IAST रूप namaḥ shivayanamaḥ śivāya को एक ही मूल का दो-लिपि रूप समझें, दो अलग मन्त्र नहीं। 2 6
श्रीरुद्रम् में मूल सन्दर्भ
कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता ४.५.८, श्रीरुद्रम् के नमकम् के आठवें अनुवाक में रुद्र के अनेक नाम लेकर नमस्कार किया गया है। सम्बद्ध अंश का स्वरचिह्न-रहित सन्दर्भ-पाठ है: नमः शङ्कराय च मयस्कराय च । नमः शिवाय च शिवतराय च । यह बड़ा अंश यहाँ केवल स्रोत बताने के लिए है; इस प्रविष्टि का एकमात्र मूल मन्त्र इससे ऊपर लिखा नमः शिवाय ही है। वैदिक स्वरों और संहितापाठ की सूक्ष्म सन्धि सीखने के लिए इसे निर्देश-पुस्तिका नहीं मानना चाहिए। 1 5
पंचाक्षरी और षडक्षरी में क्या अन्तर है? नमः शिवाय पाँच अक्षरों की पंचाक्षरी है। ॐ नमः शिवाय में ‘ॐ’ जुड़ने से छः अक्षरों वाली षडक्षरी कही जाती है। शिवपुराण के वायवीयसंहिता-उत्तरभाग में इन रूपों की धार्मिक व्याख्या मिलती है। यह अन्तर स्रोत-पहचान का है; इससे किसी एक रूप की सार्वभौमिक श्रेष्ठता या हर व्यक्ति के लिए एक समान दीक्षा-नियम निर्धारित नहीं हो जाता। 2 3
तमिल शैव भक्ति में इसी नाम का स्थान
तमिल तिरुवाचकम् के शिवपुराणम् का आरम्भ ‘नमच्चिवाय’ नाम के महत्त्व के गायन से होता है। यह दक्षिण भारत में मन्त्र की जीवित भक्ति-परम्परा का प्रमाण है। लेकिन तमिल रूप और संस्कृत में लिखे ‘नमः शिवाय’ को बिना भेद बताए शब्दशः एक ही पाठ-साक्ष्य नहीं कहा जा सकता। 4
विनय, स्मरण और कल्याण का भाव
भक्त के लिए ‘नमः’ अहंभाव को ढीला करने, सम्बन्ध को विनय से याद करने और मन को शिव की ओर मोड़ने का संकेत हो सकता है। यह अर्थ-अनुभव की व्याख्या है, प्रयोगशाला में प्रमाणित कोई असर नहीं। पञ्चभूत, शिव के पाँच मुख अथवा चेतना के पाँच आयामों से अलग-अलग अक्षरों को जोड़ने की परम्पराएँ हैं, लेकिन सब सम्प्रदाय एक ही मानचित्र स्वीकार नहीं करते। इसलिए पहले मूल व्याकरणिक अर्थ समझना उपयोगी है, फिर अपनी परम्परा के व्याख्यान को उससे जोड़ें।
यह पाठ दीक्षा अथवा जप-विधि नहीं है
इस लेख से किसी को न्यास, बीज-विस्तार, श्वास-रोध, जप-संख्या, अनिवार्य मुहूर्त या वैदिक स्वर का व्यक्तिगत निर्देश नहीं दिया जा रहा। कुछ शैव शाखाएँ औपचारिक मन्त्र-उपदेश के लिए गुरु की भूमिका पर बल देती हैं, अन्य स्थानों पर नामस्मरण को व्यापक भक्ति के रूप में देखा जाता है। किसी एक समुदाय का नियम सभी पर लागू कर देना ठीक नहीं। किसी विशिष्ट साधना के लिए पृथक् सम्पादकीय स्वीकृति और उपयुक्त परम्परागत मार्गदर्शन आवश्यक होगा। 3 5
शिवपञ्चाक्षरस्तोत्र इस मन्त्र से अलग रचना है
शिवगोरक्ष की सम्बन्धित पाठ प्रविष्टि में पाँच श्लोकों वाला शिवपञ्चाक्षरस्तोत्र है। उसके श्लोक पाँच अक्षरों से जुड़े शिव-वर्णन करते हैं। वह इस दो-शब्द वाले मन्त्र का लम्बा संस्करण नहीं है; दोनों के स्थायी कार्य-ID अलग रहेंगे। 6
पाठभेद और सावधानियाँ
- सीमा: एक मन्त्र, एक मूल पाठ-अभिलेख इकाई। वैदिक सन्दर्भ-पंक्ति दूसरी मूल इकाई नहीं है। 1
- लिपि: ‘नमः शिवाय’ को मूल निरन्तर-पाठ से कभी-कभी सन्धि में अलग तरह लिखा जा सकता है; बिना प्रमाण किसी दूसरे स्रोत की वर्तनी को यहाँ नहीं चढ़ाएँ। 2
- ॐ जोड़ना: इससे षडक्षरी रूप बनता है; इसे सम्पादक द्वारा मूल के ‘छूटे हुए’ शब्द की पूर्ति नहीं कहा जाएगा।
- तमिल रूप: ‘नमच्चिवाय’ तमिल भक्ति परम्परा का पाठ-रूप है, देवनागरी की वर्तनी-दोषसूची नहीं। 4
- स्वर एवं अधिकार: रुद्रम् के वैदिक स्वर, अन्य सम्प्रदायों की आचार-संहिताएँ और प्रकाशन-अधिकार अभी अप्रूव्ड नहीं हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नमः शिवाय का सीधा अर्थ क्या है? ‘भगवान् शिव को नमस्कार।’ ‘शिव’ शब्द ‘कल्याणकारी’ भाव भी रखता है। इसे पंचाक्षरी क्यों कहा जाता है? न, मः, शि, वा, य—पाँच पारम्परिक ध्वनि-इकाइयों के कारण। क्या ॐ इसके पाँच अक्षरों में गिना जाता है? इस चयनित पाठ में नहीं। ‘ॐ नमः शिवाय’ छः अक्षरों वाला सम्बन्धित रूप है। क्या यही पूरा श्रीरुद्रम् है? नहीं। श्रीरुद्रम् में यह पद एक लम्बी स्तुति के भीतर आया है। क्या शिवपञ्चाक्षरस्तोत्र यही मन्त्र है? नहीं। वह पाँच श्लोकों वाला अलग स्तोत्र है, जिसका ID कार्य-०२३ है। क्या मन्त्र से कोई फल निश्चित मिलता है? यह सम्पादकीय पाठ किसी चिकित्सकीय, आर्थिक या अलौकिक परिणाम की गारंटी नहीं देता। पारम्परिक फलश्रुतियों को आस्था के सन्दर्भ में समझना चाहिए। क्या सबके लिए एक जैसी जप-विधि है? अलग वैदिक और शैव परम्पराओं के नियम भिन्न हैं। यहाँ अर्थ-पठन दिया है, व्यक्तिगत दीक्षा या स्वरोच्चारण-प्रशिक्षण नहीं।




