पाठ, अर्थ और व्याख्या
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
अर्थ
कवि गिरिजापुत्र गणेश का स्मरण कर उनसे निर्भयता का वर माँगते हैं।
व्याख्या
आरंभ गणेश-वंदना से है; इसे शिव की प्रत्यक्ष स्तुति समझना सही नहीं।
जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
अर्थ
गिरिजापति शिव दीनों पर दया करने और संतों की रक्षा करने वाले हैं।
व्याख्या
यहाँ दया और संरक्षण भक्तिभाव के कथन हैं, कोई अनुभवजन्य सुरक्षा-गारंटी नहीं।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के॥
अर्थ
शिव के मस्तक पर चन्द्रमा और कानों में नागफण जैसे कुण्डल सुशोभित हैं।
व्याख्या
चन्द्र और नाग शिव की पारंपरिक पहचान के चिह्न हैं; चित्रण में भिन्नताएँ मिलती हैं।
अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
अर्थ
शिव की जटाओं से गंगा बहती है; उनके शरीर पर भस्म तथा मुण्डमाला हैं।
व्याख्या
गंगा जीवनदायिनी है, जबकि भस्म और मुण्डमाला नश्वरता तथा वैराग्य की याद दिलाते हैं।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे॥
अर्थ
बाघम्बर धारण किए शिव के मनोहर रूप से मन मोहित होने का वर्णन है।
व्याख्या
इस स्रोत में नाग मुनि के स्थान पर नाग मन है। दोनों पाठों का व्याकरणिक अर्थ एक बताकर शब्द नहीं बदले गए हैं; व्याख्या अस्थायी है।
मैना मातु की हवे दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
अर्थ
मैना की प्रिय पुत्री पार्वती शिव के वाम भाग में विराजती हैं।
व्याख्या
शिव-पार्वती का युगल भाव प्रमुख है; अलग शाक्त व्याख्याएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
अर्थ
शिव के हाथ का त्रिशूल विघातक शक्तियों के विरोध का प्रतीक है।
व्याख्या
दैत्य-वध का काव्यात्मक संदर्भ वास्तविक लोगों पर हिंसा का निर्देश नहीं है।
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
अर्थ
नन्दी और गणेश शिव के समीप जल में खिले कमलों की तरह शोभते हैं।
व्याख्या
कमल का उदाहरण सौंदर्य की उपमा है; इसे ऐतिहासिक दृश्य का प्रमाण नहीं मानें।
कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥
अर्थ
कार्तिकेय और शिवगणों सहित इस दिव्य परिवार की शोभा अवर्णनीय है।
व्याख्या
‘श्याम’ तथा ‘गणराऊ’ के आशय पर पाठ-समीक्षा बाकी है; एकमात्र अर्थ निश्चित नहीं।
देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
अर्थ
देवताओं की पुकार सुनकर शिव उनका दुःख दूर करते हैं।
व्याख्या
यहाँ से प्रतिमा-वर्णन हटकर पुराण-कथाओं के संक्षिप्त संकेत आते हैं।
किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
अर्थ
तारकासुर के उपद्रव पर देवगण शिव की शरण में आए।
व्याख्या
तारकासुर-वध कार्तिकेय से जुड़ा है, पर कथाओं के विवरण अलग परंपराओं में भिन्न हैं।
तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
अर्थ
शिव ने षडानन कार्तिकेय को भेजा, जिन्होंने दैत्य को पराजित किया।
व्याख्या
‘षडानन’ का अर्थ छह मुखों वाला है—यह स्कन्द/कार्तिकेय का नाम है।
आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
अर्थ
चालीसा शिव द्वारा जलंधर दैत्य के संहार की महिमा गाती है।
व्याख्या
जलंधर-कथा धार्मिक आख्यान है, इतिहास की प्रत्यक्ष घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं।
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
अर्थ
शिव त्रिपुरासुर से युद्ध कर संकटग्रस्त जनों को बचाते हैं।
व्याख्या
त्रिपुरकथा के अनेक पाठ हैं; चालीसा की एक पंक्ति सभी विवाद नहीं सुलझाती।
किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
अर्थ
भागीरथ की तपस्या और गंगा के अवतरण में शिव की करुणा का स्मरण है।
व्याख्या
भागीरथ की तपस्या तथा शिव द्वारा गंगा को धारण करना शक्ति-संयम का प्रतीक है।
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
अर्थ
कवि शिव की अनुपम उदारता का गुणगान करते हैं।
व्याख्या
अद्वितीय दानशीलता का वर्णन भक्तिपरक अतिशयोक्ति है।
वेद माहि महिमा तुम गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
अर्थ
वेद भी शिव के अनादि, अगम स्वरूप का पार नहीं पा सकते।
व्याख्या
अनिर्वचनीय शिव का भाव पहले आए रूपक-वर्णन को दार्शनिक गहराई देता है।
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए विहाला॥
अर्थ
समुद्रमंथन से निकले विष ने देव और असुर दोनों को व्याकुल किया।
व्याख्या
हलाहल-विष की कथा समुद्रमंथन के व्यापक पुराण-प्रसंग से जुड़ी है।
कीन्ही दया तहं करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
अर्थ
विष का संकट हरने से शिव नीलकण्ठ कहलाते हैं।
व्याख्या
नीलकण्ठ कण्ठ पर विष के प्रभाव का पारंपरिक नाम है, त्याग का रूपक भी।
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
अर्थ
चालीसा राम के शिवपूजन को लंका-विजय और विभीषण के राज्य से जोड़ती है।
व्याख्या
राम-शिव के परस्पर पूजन की कथाओं में परंपरा के अनुसार पाठभेद हैं।
सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
अर्थ
सहस्र कमलों से की गई पूजा में भक्त की परीक्षा का प्रसंग आता है।
व्याख्या
सहस्रकमल की परीक्षा एक अलग भक्तिकथा है जिसका यहाँ संकेत मात्र है।
एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई॥
अर्थ
एक कमल कम पड़ने पर कमलनयन भक्त अपना नेत्र अर्पित करने को तत्पर है।
व्याख्या
कमलनयन और नेत्र-अर्पण की कथा प्रतीकात्मक है, आत्म-हानि का अनुकरण नहीं।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
अर्थ
अडिग भक्ति देखकर शंकर प्रसन्न हो वर देते हैं।
व्याख्या
भक्ति की दृढ़ता का सम्मान यहाँ मुख्य है, किसी निश्चित लाभ की गारंटी नहीं।
जय जय जय अनन्त अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी॥
अर्थ
अविनाशी शिव सबके हृदय में विराजने और कृपा करने वाले हैं।
व्याख्या
‘घटवासी’ अंतर्यामी का संकेत है; शैव दर्शनों में इसकी अलग व्याख्याएँ हैं।
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
अर्थ
भक्त उत्पीड़न और मन की अशांति की व्यथा बताते हैं।
व्याख्या
यह पद भक्त की वास्तविक चिंता और बेचैनी को बिना छिपाए व्यक्त करता है।
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
अर्थ
भक्त संकट में शिव से शीघ्र रक्षा की पुकार करते हैं।
व्याख्या
‘त्राहि’ संकट-प्रार्थना है; वास्तविक आपातकाल में व्यावहारिक सहायता आवश्यक है।
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट ते मोहि आन उबारो॥
अर्थ
शिव से शत्रुता और संकट दूर कर रक्षा करने की विनती है।
व्याख्या
त्रिशूल का उल्लेख पौराणिक भाषा है, आक्रामक आचरण की अनुमति नहीं।
मात-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥
अर्थ
विपत्ति में भक्त को अपने परिजनों से भी सहारा नहीं मिलता।
व्याख्या
यह संकट की भावनात्मक अनुभूति है, हर परिवार के बारे में सार्वभौमिक दावा नहीं।
स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी॥
अर्थ
भक्त शिव को अपना अंतिम और एकमात्र आश्रय मानते हैं।
व्याख्या
शरणागति का भाव मानवीय सहायता और जिम्मेदार कदमों के विरोध में नहीं है।
धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अर्थ
निर्धनों के प्रति शिव की दयालुता और आशापूर्ति की स्तुति है।
व्याख्या
धन की स्तुति वित्तीय सफलता की निश्चित भविष्यवाणी नहीं है।
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
अर्थ
भक्त अपनी अपूर्ण स्तुति और भूलों के लिए क्षमा माँगते हैं।
व्याख्या
क्षमा-याचना आत्म-संशोधन का अवसर है, आत्मग्लानि का आदेश नहीं।
शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
अर्थ
शंकर को संकटहर्ता, मंगलदाता और विघ्नविनाशक कहा गया है।
व्याख्या
‘शंकर’ नाम में कल्याण का अर्थ निहित है; पद नाम-स्तुति भी है।
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं॥
अर्थ
योगी-मुनि शिव का ध्यान करते हैं; नारद और शारदा नमन करते हैं।
व्याख्या
योगी, यति और मुनि व्यापक तपस्वी परंपराओं के पद हैं, एक ही संस्था नहीं।
नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
अर्थ
शिव का स्वरूप देवताओं और ब्रह्मा की समझ से भी परे बताया गया है।
व्याख्या
‘नमः शिवाय’ सार्वजनिक स्तुति में आया है; यहाँ गोपनीय दीक्षा-विधि नहीं दी गई।
जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई॥
अर्थ
चालीसा एकाग्र मन से पाठ करने वाले के प्रति शिव-सहायता का आश्वासन देती है।
व्याख्या
शिव-सहायता को अनिवार्य चमत्कार या रोगमुक्ति का प्रमाण न मानें।
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥
अर्थ
ऋण के बोझ से दबे व्यक्ति के लिए मुक्ति की आशा व्यक्त की गई है।
व्याख्या
ऋण-मुक्ति की आशा के साथ वास्तविक आर्थिक जिम्मेदारियाँ भी बनी रहती हैं।
पुत्र होन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
अर्थ
संतान की इच्छा रखने वाला भक्त शिवकृपा में आशा रखता है।
व्याख्या
पुत्र-कामना तत्कालीन सामाजिक अपेक्षा दिखाती है; इससे लिंग-भेद या संतान की गारंटी नहीं सिद्ध होती।
पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥
अर्थ
त्रयोदशी को पण्डित द्वारा होम कराने का उल्लेख है।
व्याख्या
पण्डित और होम का उल्लेख सूचना है; कोई अनुष्ठान-विधि या पात्रता-निर्णय नहीं।
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।
ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
अर्थ
त्रयोदशी-व्रत से कष्टों के निवारण की पारंपरिक आशा जुड़ी है।
व्याख्या
यहाँ उपवास की कार्यविधि नहीं दी जा रही; स्वास्थ्य के अनुरूप विवेक आवश्यक है।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
अर्थ
धूप, दीप, नैवेद्य और शिव के समक्ष पाठ का वर्णन है।
व्याख्या
पूजन-सामग्री का वर्णन श्रद्धा के संदर्भ में है, विस्तृत कर्मकांड निर्देश नहीं।
जन्म जन्म के पाप नसावे।
अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
अर्थ
भक्त पापों से मुक्ति और अंत में शिवधाम की आशा करता है।
व्याख्या
‘शिवपुर’ आध्यात्मिक आशा का चित्र है, स्वतंत्र रूप से सिद्ध गंतव्य नहीं।
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
अर्थ
पाठ में अपना नाम कहने वाले अयोध्यादास शिव से दुःखहरण की प्रार्थना करते हैं।
व्याख्या
काव्य में नामोल्लेख है, पर केवल उससे रचनाकार का काल या जीवनवृत्त प्रमाणित नहीं होता।
नित्त नेम उठि प्रातः ही, पाठ करो चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
अर्थ
नित्य चालीसा-पाठ के साथ मनोकामना-पूर्ति की प्रार्थना की गई है।
व्याख्या
नित्य-पाठ कवि के संकल्प का वर्णन है, सभी पाठकों के लिए बाध्य नियम नहीं।
मगसिर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।
स्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥
अर्थ
अंतिम दोहा मगसर, हेमन्त और संवत का उल्लेख करता है; तिथि-पाठ की पुष्टि शेष है।
व्याख्या
सम्वत की पंक्ति के पाठ अलग मिलते हैं; इससे 1607 ईस्वी की तिथि स्वतः प्रमाणित नहीं होती।
सन्दर्भ और उपयोग
सन्दर्भ और संस्करण
यह MIT लाइसेंसयुक्त hindu-devotional-texts 0.8.0 पर आधारित अलग संस्करण है। इसे पूर्व पाण्डुलिपि-संस्करण का अभिन्न पाठ न समझें। इस संस्करण के वास्तविक 44 पाठ-खण्ड सुरक्षित हैं। रोमन पाठ देवनागरी का वर्तनी-आधारित IAST रूप है; हिन्दी बोलचाल के स्वर-लोप अलग हो सकते हैं। स्वतंत्र भाषा एवं छन्द समीक्षा अधूरी है।
पाठ की मर्यादा
इसे भक्ति-काव्य के रूप में पढ़ें। यह दीक्षा, अनुष्ठानिक अधिकार, आरोग्य-धन की गारंटी या अग्नि-विधि का निर्देश नहीं देता। पारम्परिक पाठ में नाम, कथा और फल-कथन उसी स्तुति की भाषा हैं।
स्रोत, श्रेय और लाइसेंस
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पाठ का लाइसेंस
संस्करण का मूल रोमन पाठ
इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।
- Opening 1
jaya gaṇeśa girijā suvana, maṃgala mūla sujāna|
kahata ayodhyādāsa tuma, dehu abhaya varadāna||
- Chaupai 1
jaya girijā pati dīna dayālā|
sadā karata santana pratipālā||
- Chaupai 2
bhāla candramā sohata nīke|
kānana kuṇḍala nāgaphanī ke||
- Chaupai 3
aṃga gaura śira gaṃga bahāye|
muṇḍamāla tana kṣāra lagāe||
- Chaupai 4
vastra khāla bāghambara sohe|
chavi ko dekhi nāga mana mohe||
- Chaupai 5
mainā mātu kī have dulārī|
bāma aṃga sohata chavi nyārī||
- Chaupai 6
kara triśūla sohata chavi bhārī|
karata sadā śatruna kṣayakārī||
- Chaupai 7
nandi gaṇeśa sohai taham̐ kaise|
sāgara madhya kamala haiṃ jaise||
- Chaupai 8
kārtika śyāma aura gaṇarāū|
yā chavi ko kahi jāta na kāū||
- Chaupai 9
devana jabahīṃ jāya pukārā|
taba hī dukha prabhu āpa nivārā||
- Chaupai 10
kiyā upadrava tāraka bhārī|
devana saba mili tumahiṃ juhārī||
- Chaupai 11
turata ṣaḍānana āpa paṭhāyau|
lavanimeṣa maham̐ māri girāyau||
- Chaupai 12
āpa jalaṃdhara asura saṃhārā|
suyaśa tumhāra vidita saṃsārā||
- Chaupai 13
tripurāsura sana yuddha macāī|
sabahiṃ kṛpā kara līna bacāī||
- Chaupai 14
kiyā tapahiṃ bhāgīratha bhārī|
puraba pratijñā tāsu purārī||
- Chaupai 15
dānina maham̐ tuma sama kou nāhīṃ|
sevaka stuti karata sadāhīṃ||
- Chaupai 16
veda māhi mahimā tuma gāī|
akatha anādi bheda nahiṃ pāī||
- Chaupai 17
prakaṭī udadhi maṃthana meṃ jvālā|
jarata surāsura bhae vihālā||
- Chaupai 18
kīnhī dayā tahaṃ karī sahāī|
nīlakaṇṭha taba nāma kahāī||
- Chaupai 19
pūjana rāmacandra jaba kīnhā|
jīta ke laṃka vibhīṣaṇa dīnhā||
- Chaupai 20
sahasa kamala meṃ ho rahe dhārī|
kīnha parīkṣā tabahiṃ purārī||
- Chaupai 21
eka kamala prabhu rākheu joī|
kamala nayana pūjana cahaṃ soī||
- Chaupai 22
kaṭhina bhakti dekhī prabhu śaṃkara|
bhae prasanna die icchita vara||
- Chaupai 23
jaya jaya jaya ananta avināśī|
karata kṛpā saba ke ghaṭavāsī||
- Chaupai 24
duṣṭa sakala nita mohi satāvai|
bhramata rahauṃ mohi caina na āvai||
- Chaupai 25
trāhi trāhi maiṃ nātha pukāro|
yehi avasara mohi āna ubāro||
- Chaupai 26
lai triśūla śatruna ko māro|
saṃkaṭa te mohi āna ubāro||
- Chaupai 27
māta-pitā bhrātā saba hoī|
saṃkaṭa meṃ pūchata nahiṃ koī||
- Chaupai 28
svāmī eka hai āsa tumhārī|
āya harahu mama saṃkaṭa bhārī||
- Chaupai 29
dhana nirdhana ko deta sadā hīṃ|
jo koī jāṃce so phala pāhīṃ||
- Chaupai 30
astuti kehi vidhi karaiṃ tumhārī|
kṣamahu nātha aba cūka hamārī||
- Chaupai 31
śaṃkara ho saṃkaṭa ke nāśana|
maṃgala kāraṇa vighna vināśana||
- Chaupai 32
yogī yati muni dhyāna lagāvaiṃ|
śārada nārada śīśa navāvaiṃ||
- Chaupai 33
namo namo jaya namaḥ śivāya|
sura brahmādika pāra na pāya||
- Chaupai 34
jo yaha pāṭha kare mana lāī|
tā para hota hai śambhu sahāī||
- Chaupai 35
ṛniyāṃ jo koī ho adhikārī|
pāṭha kare so pāvana hārī||
- Chaupai 36
putra hona kara icchā joī|
niścaya śiva prasāda tehi hoī||
- Chaupai 37
paṇḍita trayodaśī ko lāve|
dhyāna pūrvaka homa karāve||
- Chaupai 38
trayodaśī vrata karai hameśā|
tāke tana nahīṃ rahai kaleśā||
- Chaupai 39
dhūpa dīpa naivedya caṛhāve|
śaṃkara sammukha pāṭha sunāve||
- Chaupai 40
janma janma ke pāpa nasāve|
anta dhāma śivapura meṃ pāve||
- Chaupai 41
kahaiṃ ayodhyādāsa āsa tumhārī|
jāni sakala duḥkha harahu hamārī||
- Closing 1
nitta nema uṭhi prātaḥ hī, pāṭha karo cālīsā|
tuma merī manokāmanā, pūrṇa karo jagadīśa||
- Closing 2
magasira chaṭhi hemanta ṛtu, saṃvata causaṭha jāna|
stuti cālīsā śivahi, pūrṇa kīna kalyāṇa||
- hindu-devotional-texts 0.8.0, पाठ-संग्रह · स्रोत खोलें
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी
कवि गिरिजापुत्र गणेश का स्मरण कर उनसे निर्भयता का वर माँगते हैं। आरंभ गणेश-वंदना से है; इसे शिव की प्रत्यक्ष स्तुति समझना सही नहीं। गिरिजापति शिव दीनों पर दया करने और संतों की रक्षा करने वाले हैं। यहाँ दया और संरक्षण भक्तिभाव के कथन हैं, कोई अनुभवजन्य सुरक्षा-गारंटी नहीं। शिव के मस्तक पर चन्द्रमा और कानों में नागफण जैसे कुण्डल सुशोभित हैं। चन्द्र और नाग शिव की पारंपरिक पहचान के चिह्न हैं; चित्रण में भिन्नताएँ मिलती हैं। शिव की जटाओं से गंगा बहती है; उनके शरीर पर भस्म तथा मुण्डमाला हैं। गंगा जीवनदायिनी है, जबकि भस्म और मुण्डमाला नश्वरता तथा वैराग्य की याद दिलाते हैं। बाघम्बर धारण किए शिव के मनोहर रूप से मन मोहित होने का वर्णन है। इस स्रोत में नाग मुनि के स्थान पर नाग मन है। दोनों पाठों का व्याकरणिक अर्थ एक बताकर शब्द नहीं बदले गए हैं; व्याख्या अस्थायी है। मैना की प्रिय पुत्री पार्वती शिव के वाम भाग में विराजती हैं। शिव-पार्वती का युगल भाव प्रमुख है; अलग शाक्त व्याख्याएँ भी महत्त्वपूर्ण हैं। शिव के हाथ का त्रिशूल विघातक शक्तियों के विरोध का प्रतीक है। दैत्य-वध का काव्यात्मक संदर्भ वास्तविक लोगों पर हिंसा का निर्देश नहीं है। नन्दी और गणेश शिव के समीप जल में खिले कमलों की तरह शोभते हैं। कमल का उदाहरण सौंदर्य की उपमा है; इसे ऐतिहासिक दृश्य का प्रमाण नहीं मानें। कार्तिकेय और शिवगणों सहित इस दिव्य परिवार की शोभा अवर्णनीय है।
‘श्याम’ तथा ‘गणराऊ’ के आशय पर पाठ-समीक्षा बाकी है; एकमात्र अर्थ निश्चित नहीं। देवताओं की पुकार सुनकर शिव उनका दुःख दूर करते हैं। यहाँ से प्रतिमा-वर्णन हटकर पुराण-कथाओं के संक्षिप्त संकेत आते हैं। तारकासुर के उपद्रव पर देवगण शिव की शरण में आए। तारकासुर-वध कार्तिकेय से जुड़ा है, पर कथाओं के विवरण अलग परंपराओं में भिन्न हैं। शिव ने षडानन कार्तिकेय को भेजा, जिन्होंने दैत्य को पराजित किया।
‘षडानन’ का अर्थ छह मुखों वाला है—यह स्कन्द/कार्तिकेय का नाम है। चालीसा शिव द्वारा जलंधर दैत्य के संहार की महिमा गाती है। जलंधर-कथा धार्मिक आख्यान है, इतिहास की प्रत्यक्ष घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं। शिव त्रिपुरासुर से युद्ध कर संकटग्रस्त जनों को बचाते हैं। त्रिपुरकथा के अनेक पाठ हैं; चालीसा की एक पंक्ति सभी विवाद नहीं सुलझाती। भागीरथ की तपस्या और गंगा के अवतरण में शिव की करुणा का स्मरण है। भागीरथ की तपस्या तथा शिव द्वारा गंगा को धारण करना शक्ति-संयम का प्रतीक है। कवि शिव की अनुपम उदारता का गुणगान करते हैं। अद्वितीय दानशीलता का वर्णन भक्तिपरक अतिशयोक्ति है। वेद भी शिव के अनादि, अगम स्वरूप का पार नहीं पा सकते। अनिर्वचनीय शिव का भाव पहले आए रूपक-वर्णन को दार्शनिक गहराई देता है। समुद्रमंथन से निकले विष ने देव और असुर दोनों को व्याकुल किया। हलाहल-विष की कथा समुद्रमंथन के व्यापक पुराण-प्रसंग से जुड़ी है। विष का संकट हरने से शिव नीलकण्ठ कहलाते हैं। नीलकण्ठ कण्ठ पर विष के प्रभाव का पारंपरिक नाम है, त्याग का रूपक भी। चालीसा राम के शिवपूजन को लंका-विजय और विभीषण के राज्य से जोड़ती है। राम-शिव के परस्पर पूजन की कथाओं में परंपरा के अनुसार पाठभेद हैं। सहस्र कमलों से की गई पूजा में भक्त की परीक्षा का प्रसंग आता है। सहस्रकमल की परीक्षा एक अलग भक्तिकथा है जिसका यहाँ संकेत मात्र है। एक कमल कम पड़ने पर कमलनयन भक्त अपना नेत्र अर्पित करने को तत्पर है। कमलनयन और नेत्र-अर्पण की कथा प्रतीकात्मक है, आत्म-हानि का अनुकरण नहीं। अडिग भक्ति देखकर शंकर प्रसन्न हो वर देते हैं। भक्ति की दृढ़ता का सम्मान यहाँ मुख्य है, किसी निश्चित लाभ की गारंटी नहीं। अविनाशी शिव सबके हृदय में विराजने और कृपा करने वाले हैं।
‘घटवासी’ अंतर्यामी का संकेत है; शैव दर्शनों में इसकी अलग व्याख्याएँ हैं। भक्त उत्पीड़न और मन की अशांति की व्यथा बताते हैं। यह पद भक्त की वास्तविक चिंता और बेचैनी को बिना छिपाए व्यक्त करता है। भक्त संकट में शिव से शीघ्र रक्षा की पुकार करते हैं।
‘त्राहि’ संकट-प्रार्थना है; वास्तविक आपातकाल में व्यावहारिक सहायता आवश्यक है। शिव से शत्रुता और संकट दूर कर रक्षा करने की विनती है। त्रिशूल का उल्लेख पौराणिक भाषा है, आक्रामक आचरण की अनुमति नहीं। विपत्ति में भक्त को अपने परिजनों से भी सहारा नहीं मिलता। यह संकट की भावनात्मक अनुभूति है, हर परिवार के बारे में सार्वभौमिक दावा नहीं। भक्त शिव को अपना अंतिम और एकमात्र आश्रय मानते हैं। शरणागति का भाव मानवीय सहायता और जिम्मेदार कदमों के विरोध में नहीं है। निर्धनों के प्रति शिव की दयालुता और आशापूर्ति की स्तुति है। धन की स्तुति वित्तीय सफलता की निश्चित भविष्यवाणी नहीं है। भक्त अपनी अपूर्ण स्तुति और भूलों के लिए क्षमा माँगते हैं। क्षमा-याचना आत्म-संशोधन का अवसर है, आत्मग्लानि का आदेश नहीं। शंकर को संकटहर्ता, मंगलदाता और विघ्नविनाशक कहा गया है।
‘शंकर’ नाम में कल्याण का अर्थ निहित है; पद नाम-स्तुति भी है। योगी-मुनि शिव का ध्यान करते हैं; नारद और शारदा नमन करते हैं। योगी, यति और मुनि व्यापक तपस्वी परंपराओं के पद हैं, एक ही संस्था नहीं। शिव का स्वरूप देवताओं और ब्रह्मा की समझ से भी परे बताया गया है।
‘नमः शिवाय’ सार्वजनिक स्तुति में आया है; यहाँ गोपनीय दीक्षा-विधि नहीं दी गई। चालीसा एकाग्र मन से पाठ करने वाले के प्रति शिव-सहायता का आश्वासन देती है। शिव-सहायता को अनिवार्य चमत्कार या रोगमुक्ति का प्रमाण न मानें। ऋण के बोझ से दबे व्यक्ति के लिए मुक्ति की आशा व्यक्त की गई है। ऋण-मुक्ति की आशा के साथ वास्तविक आर्थिक जिम्मेदारियाँ भी बनी रहती हैं। संतान की इच्छा रखने वाला भक्त शिवकृपा में आशा रखता है। पुत्र-कामना तत्कालीन सामाजिक अपेक्षा दिखाती है; इससे लिंग-भेद या संतान की गारंटी नहीं सिद्ध होती। त्रयोदशी को पण्डित द्वारा होम कराने का उल्लेख है। पण्डित और होम का उल्लेख सूचना है; कोई अनुष्ठान-विधि या पात्रता-निर्णय नहीं। त्रयोदशी-व्रत से कष्टों के निवारण की पारंपरिक आशा जुड़ी है। यहाँ उपवास की कार्यविधि नहीं दी जा रही; स्वास्थ्य के अनुरूप विवेक आवश्यक है। धूप, दीप, नैवेद्य और शिव के समक्ष पाठ का वर्णन है। पूजन-सामग्री का वर्णन श्रद्धा के संदर्भ में है, विस्तृत कर्मकांड निर्देश नहीं। भक्त पापों से मुक्ति और अंत में शिवधाम की आशा करता है।
‘शिवपुर’ आध्यात्मिक आशा का चित्र है, स्वतंत्र रूप से सिद्ध गंतव्य नहीं। पाठ में अपना नाम कहने वाले अयोध्यादास शिव से दुःखहरण की प्रार्थना करते हैं। काव्य में नामोल्लेख है, पर केवल उससे रचनाकार का काल या जीवनवृत्त प्रमाणित नहीं होता। नित्य चालीसा-पाठ के साथ मनोकामना-पूर्ति की प्रार्थना की गई है। नित्य-पाठ कवि के संकल्प का वर्णन है, सभी पाठकों के लिए बाध्य नियम नहीं। अंतिम दोहा मगसर, हेमन्त और संवत का उल्लेख करता है; तिथि-पाठ की पुष्टि शेष है। सम्वत की पंक्ति के पाठ अलग मिलते हैं; इससे 1607 ईस्वी की तिथि स्वतः प्रमाणित नहीं होती।