शिव से जुड़ी धार्मिक परंपराओं को समझने की एक सहज यात्रा—इतिहास और श्रद्धा, विचार और अनुभव, मंदिर और साधना के बीच।
किसी छोटे शिवालय में जल चढ़ाता भक्त, तमिल प्रदेश के मंदिर में गाया जाता प्राचीन स्तोत्र, चेतना के स्वरूप पर विचार करता दार्शनिक और गुरु की महिमा सुनाता नाथ योगी—इन सबकी दुनिया एक-दूसरे से अलग दिखाई दे सकती है। फिर भी इनके बीच एक व्यापक संबंध है: शिव का महत्त्व। इसी विविध संसार के लिए हम शैव परंपरा या शैवमत (Shaivism) का नाम इस्तेमाल करते हैं। (Śaivism) का नाम इस्तेमाल करते हैं।
शैव परंपरा को समझने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि इसमें शिव की पूजा होती है। हमें यह भी पूछना होगा कि अलग-अलग समुदाय शिव को कैसे समझते हैं, उनकी शिक्षाओं के स्रोत क्या हैं, इतिहासकार किन बातों की पुष्टि कर सकते हैं और किन कथाओं का मूल्य धार्मिक आस्था में है। इस परिचय में कठिन शब्दों को सरल अर्थों के साथ समझाया गया है। यहाँ किसी दीक्षा-विशेष की गोपनीय विधि या जोखिमपूर्ण योगाभ्यास के निर्देश नहीं दिए गए हैं।
इस मार्गदर्शिका से क्या समझेंगे?
- शैव परंपरा एक ही संस्था या मत का नाम नहीं; यह शिव-केंद्रित अनेक धार्मिक, दार्शनिक और भक्तिपरक धाराओं का व्यापक समूह है। 1
- वैदिक रुद्र की स्तुतियाँ इस इतिहास की महत्वपूर्ण प्रारंभिक सामग्री हैं, लेकिन संगठित शैव संप्रदायों का स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण बाद के युगों में मिलता है। 2 1
- शैव जीवन में भक्ति, पूजा, तीर्थ, मंदिर, दर्शन, संन्यास और योग अलग-अलग स्थान पा सकते हैं। सभी समुदायों की प्राथमिकताएँ समान नहीं होतीं।
- शैव सिद्धांत, कश्मीर की अद्वैत-उन्मुख शैव धाराएँ, तमिल शिव-भक्ति और नाथ संप्रदाय के संबंध हैं, पर वे एक ही सिद्धांत की अलग वर्तनी नहीं हैं। 3 4 5
- शिवलिंग और नटराज के अर्थ अनेक स्तरों पर समझे जाते हैं। उपलब्ध मूर्तियों का ऐतिहासिक अध्ययन कुछ रूपों के विकास को दिखाता है। 6 7
- मोक्ष, अनुग्रह और परम चेतना संबंधी मत विशिष्ट धार्मिक-दार्शनिक व्याख्याएँ हैं; उन्हें सभी व्यक्तियों के लिए वैज्ञानिक रूप से सिद्ध परिणाम नहीं कहना चाहिए।
1. 'शैव' शब्द का अर्थ क्या है?
शैव (Shaiva)शैव (Śaiva) उन धाराओं को कहा जाता है जिनमें शिव का विशेष या केंद्रीय स्थान होता है। किसी भक्त के लिए शिव परम आराध्य और करुणामय भगवान हो सकते हैं; किसी दार्शनिक परंपरा में शिव को चेतना की परम वास्तविकता के रूप में समझाया जाता है; किसी समुदाय में शिव और शक्ति का संबंध सबसे अधिक महत्त्व रखता है। कहीं मंदिर में सामूहिक पूजा मुख्य है, कहीं गुरु-परंपरा, कहीं भजन और कहीं तर्क-विचार। 1
शिव के अनेक नाम प्रचलित हैं—रुद्र, महादेव, महेश्वर, शंभु, पशुपति, शंकर और भोलेनाथ। ये नाम अलग-अलग साहित्य और भक्तिपरंपराओं में विविध अर्थ-छवियाँ लेकर आते हैं। शंकर और शिव की अलग वेबसाइट-प्रविष्टियाँ होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी परंपराओं में वे दो स्वतंत्र देवता हैं। इसी प्रकार हर नाम की व्याख्या हर ग्रंथ में एक-सी होना आवश्यक नहीं।
आवश्यक शब्दावली
| शब्द | सरल अर्थ | ध्यान रखने की बात |
|---|---|---|
| शिव (Shiva)शिव (Śiva) | शैव आराधना के केंद्रीय देवता; शुभता का भाव भी जुड़ता है | शिव का दार्शनिक स्वरूप परंपरा के अनुसार बदलता है |
| रुद्र (Rudra) | वैदिक मंत्रों में संबोधित देवता | बाद की सभी मान्यताएँ सीधे वैदिक मंत्र में उपस्थित नहीं हैं |
| शक्ति (Shakti)शक्ति (Śakti) | सामर्थ्य, दिव्य ऊर्जा अथवा तत्त्व | केवल एक देवी-रूप तक सीमित अर्थ नहीं |
| भक्ति (Bhakti) | श्रद्धापूर्ण प्रेम और समर्पण | शैव धर्म की अकेली विशेषता नहीं |
| लिंग (Linga)लिंग (Liṅga) | चिह्न या संकेत; शिवोपासना का प्रमुख रूप | इसके ऐतिहासिक रूप और अर्थ अनेक हैं |
| आगम (Āgama) | कुछ शैव समुदायों में महत्त्वपूर्ण शास्त्र-समूह | सभी शैवों का एक ही अनिवार्य आगम नहीं |
| मोक्ष (Moksha)मोक्ष (Mokṣa) | बंधन या पुनर्जन्म से मुक्ति की धार्मिक-दार्शनिक कल्पना | विभिन्न मतों में इसका स्वरूप भिन्न है |
| गुरु (Guru) | शिक्षक या आध्यात्मिक मार्गदर्शक | गुरु की भूमिका और दीक्षा-नियम परंपरा-विशेष के हैं |
| पति–पशु–पाश | शैव सिद्धांत में प्रभु–जीव–बंधन का विचार | पूरी शैव परंपरा की सार्वभौमिक परिभाषा नहीं |
वेदों में रुद्र
ऋग्वेद 2.33 में रुद्र की स्तुति मिलती है। इस सूक्त में संरक्षण और कल्याण के लिए प्रार्थना की गई है। यह वैदिक रुद्र के अध्ययन के लिए एक पहचाना जा सकने वाला मूल-पाठ है। लेकिन इस सूक्त से यह दावा नहीं करना चाहिए कि उसमें नाथ मठों, कश्मीर के प्रत्यभिज्ञा दर्शन या बाद में विकसित मंदिर-व्यवस्था का विस्तृत विधान मौजूद है। रुद्र और शिव के संबंध को भक्तिपरंपराओं तथा ऐतिहासिक अध्ययन में अलग प्रकार से समझा जाता है। 2 1
धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक प्रमाण में अंतर आवश्यक है। कोई परंपरा स्वयं को अनादि मान सकती है; इतिहासकार उपलब्ध अभिलेख, ग्रंथ, मूर्तियों और संस्थाओं के आधार पर किसी विशिष्ट संगठन की पहचान कर सकते हैं। श्रद्धा का अपना संदर्भ है और दस्तावेजी इतिहास का अपना। दोनों को मिलाकर निश्चित काल-निर्धारण कर देना उचित नहीं।
पाशुपत और संगठित शैव समुदाय
आधुनिक शैव इतिहास के शोध में सामान्यतः ईस्वी सन् के आरंभ के बाद की शताब्दियों में रुद्र–शिव की संगठित संप्रदायगत उपासना के अपेक्षाकृत स्पष्ट प्रमाण बताए जाते हैं। पाशुपत समुदाय इन प्रारंभिक संगठित धाराओं में महत्त्वपूर्ण हैं। आगे अलग-अलग संन्यासी समूह, आगमिक पूजा-पद्धतियाँ, मंदिर-संस्थाएँ, दार्शनिक मत और क्षेत्रीय भक्ति-परंपराएँ विकसित होती रहीं। इससे शैव इतिहास एक अकेले संस्थापक या बिल्कुल अपरिवर्तित व्यवस्था की कहानी नहीं रह जाता। 1
शोध-पुस्तकों में कभी अतिमार्ग और मंत्रमार्ग जैसे वर्गीकरण मिलते हैं। पहला कुछ प्राचीन शैव संन्यासी धाराओं और दूसरा मंत्र एवं दीक्षा से संबंधित विस्तृत धार्मिक साहित्य के इतिहास को समझने में प्रयुक्त होता है। ये अध्ययन-सुविधा के शब्द हैं; इन्हें हर साधक की आत्म-पहचान समझना गलत होगा। उनके जटिल अनुष्ठानों की तकनीकी विधियाँ इस परिचय का विषय नहीं हैं।
तमिल प्रदेश में शिव-भक्ति का स्वर
दक्षिण भारत में तमिल भाषा की शिव-भक्ति ने मंदिर, कविता और संगीत को गहराई से जोड़ा। तेवारम् (Tēvāram) के पदों का संबंध परंपरागत रूप से तिरुज्ञानसंबंदर, अप्पर (तिरुनावुक्करसर) और सुंदरर से जोड़ा जाता है। ये पद तिरुमुरै नामक तमिल शैव संकलन के प्रारंभिक सात खंडों से संबंधित हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की सामग्री और ब्रिटिश लाइब्रेरी की पांडुलिपि-सूचियाँ इन रचनाओं की सांस्कृतिक विरासत और प्रतिलिपि-परंपरा का दस्तावेजी आधार देती हैं। 8 9
भक्ति-स्मृति में शिव के संतों को नायनार कहा जाता है। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि शैवता को केवल कठिन दार्शनिक सूत्रों में सीमित नहीं किया जा सकता। भगवान से व्यक्तिगत संबोधन, मंदिर की यात्रा, गीत का गायन और सेवा—ये भी धार्मिक जीवन के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। संत-चरितों की अद्भुत घटनाओं को उनकी श्रद्धापूर्ण कथा-संस्कृति के संदर्भ में पढ़ना चाहिए; प्रत्येक घटना का ऐतिहासिक सत्यापन मान लेना अलग बात होगी।
मंदिर, कलाकृतियाँ और क्षेत्रीय विस्तार
मंदिर, मूर्तियाँ, अभिलेख तथा पांडुलिपियाँ हमें धार्मिक इतिहास के मूर्त साक्ष्य देती हैं। न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम में संरक्षित चोल-कालीन नटराज की तिथि लगभग ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की बताई गई है। संग्रहालय डमरू, अग्नि, अभय-मुद्रा और उठे चरण को सृष्टि-परिवर्तन तथा शरण के प्रतीकों के रूप में समझाता है। उसी संग्रहालय की सातवीं शताब्दी की कश्मीर से संबंधित एकमुखी शिवलिंग-मूर्ति हमें शिव-प्रतिमाओं की क्षेत्रीय विविधता दिखाती है। 6 7
भारत के अतिरिक्त दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के ऐतिहासिक धार्मिक परिवेश में भी शैव उपासना के प्रमाण मिलते हैं। किंतु किसी एक शासक, मंदिर या वस्तु का मिलना यह सिद्ध नहीं कर देता कि किसी व्यापक क्षेत्र के सभी निवासी एक ही दर्शन मानते थे। 1
आराध्य भगवान और परम वास्तविकता
भक्त शिव से प्रार्थना कर सकता है कि वे कठिन समय में मार्गदर्शन करें। कोई शास्त्रीय विचारक पूछ सकता है कि शिव, चेतना और व्यक्तिगत आत्मा का संबंध क्या है। कहीं शिव को स्वतंत्र परम प्रभु और जीवों को उनसे अलग सत्ता के रूप में समझाया जाता है; कहीं शिव के संदर्भ में स्वयं चेतना और उसकी पहचान पर विचार होता है। इन अलग प्रश्नों को एक उत्तर में घुला देना उचित नहीं। 3 4
शिव की छवि में कई बार विरोधी लगने वाले रूप साथ आते हैं—संन्यासी और गृहस्थ, गहन शांति और नृत्य, संहार और नव-सृजन। ये कथा, दर्शन और कला में विकसित अर्थ हैं; जरूरी नहीं कि हर शैव ग्रंथ इन्हें एक ही शब्दावली या एक ही सिद्धांत के रूप में रखता हो। उदाहरण के लिए नदी का प्रवाह और उसकी गहराई एक साथ समझे जा सकते हैं, पर यह केवल समझाने के लिए उदाहरण है, किसी प्राचीन शास्त्र का उद्धरण नहीं।
शिव और शक्ति का संबंध
कई शैव और शाक्त धाराओं में शक्ति को परम सामर्थ्य या प्रकट होने की क्षमता के रूप में समझा जाता है। कश्मीर की कुछ अद्वैत-उन्मुख परंपराओं में चेतना तथा उसकी सक्रिय क्षमता पर गंभीर दार्शनिक चर्चा मिलती है। दूसरी ओर अनेक भक्तिपरक घरों और मंदिरों में शिव तथा पार्वती की पारिवारिक, कृपालु और संबंधपरक छवियाँ विशेष महत्त्व रखती हैं। दोनों संदर्भों को अनिवार्य रूप से एक सिद्धांत नहीं कहना चाहिए। 4
अर्धनारीश्वर की संयुक्त प्रतिमा शिव तथा देवी के संबंध पर चिंतन का एक प्रसिद्ध माध्यम है। कोई परंपरा एकता पर बल दे सकती है, कोई पारस्परिकता पर। इसे बिना संदर्भ के समस्त हिंदू दर्शन, सामाजिक लिंग-विचार या हर शैव संप्रदाय की अंतिम व्याख्या बताना सही नहीं।
बंधन, अनुग्रह और मोक्ष
कई शैव दर्शन पूछते हैं कि मनुष्य सीमितता और दुख क्यों अनुभव करता है और मुक्ति का अर्थ क्या है। कुछ विचारधाराओं में कर्म, अज्ञान, मल, पाश, ईश्वर-कृपा, साधना और ज्ञान जैसे विषय महत्त्वपूर्ण हैं। शैव सिद्धांत में प्रसिद्ध त्रयी पति (शिव), पशु (जीव) और पाश (बंधन) है। परंतु प्रारंभिक संस्कृत शैव सिद्धांत और बाद की तमिल दार्शनिक परंपरा के बीच ऐतिहासिक विकास को ध्यान में रखना होता है। 3
कश्मीर के प्रत्यभिज्ञा दर्शन में ध्यान चेतना और उसकी पहचान या पुनः-पहचान के प्रश्न पर जाता है। यह केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि तर्क, अनुभूति और व्याख्या से संबंधित गंभीर दार्शनिक परियोजना है। किसी अवधारणा को पढ़ लेने से किसी व्यक्ति के मोक्ष की वैज्ञानिक या आध्यात्मिक गारंटी नहीं दी जा सकती। 4
4. शैव परंपराओं का तुलनात्मक परिचय
'प्रमुख शैव मत' की कोई ऐसी सूची नहीं है जो हर काल तथा हर क्षेत्र में पूरी तरह लागू हो। नीचे दिए गए समूह अध्ययन के प्रवेश-द्वार हैं, अंतिम और परस्पर बंद डिब्बे नहीं।
| परंपरा या परिवेश | मुख्य परिचय | आवश्यक सावधानी |
|---|---|---|
| पाशुपत | शिव/पशुपति-केंद्रित प्राचीन संगठित उपासना तथा संन्यासी रुझान | सभी बाद के संन्यासी पाशुपत नहीं थे। 1 |
| शैव सिद्धांत | शिव, जीव, बंधन; आगमिक तथा मंदिर से जुड़ी धाराएँ | संस्कृत और तमिल विकासक्रम में अंतर है। 3 |
| कश्मीर की अद्वैत-उन्मुख शैव धाराएँ | चेतना, शक्ति, प्रत्यभिज्ञा और त्रिक से संबंधित विमर्श | कश्मीर में अन्य शैव दर्शन भी उपस्थित थे। 4 |
| तमिल शिव-भक्ति | भजन, मंदिर, संत और शिव से आत्मीय संबंध | इसे एकमात्र दार्शनिक सिद्धांत में सीमित नहीं कर सकते। 8 |
| नाथ संप्रदाय | गुरु-परंपरा, योग, संन्यास और लोकभाषाओं में साहित्य | समय-निर्धारण तथा ग्रंथों के लेखकत्व पर मतभेद हैं। 5 |
| लिंगायत / वीरशैव | शिव-भक्ति तथा कर्नाटक की विशिष्ट धार्मिक-सामाजिक परंपराएँ | समुदाय की आत्म-पहचान को बाहरी वर्गीकरण से बदलना नहीं चाहिए। |
शैव सिद्धांत पूरी तमिल शिव-भक्ति का पर्याय नहीं
शोध के अनुसार शैव सिद्धांत का प्राचीन आगमिक और दार्शनिक इतिहास केवल तमिल क्षेत्र तक सीमित नहीं था। बाद में दक्षिण भारत में इसकी मंदिर-संस्थाएँ, तमिल शास्त्र और भक्ति के साथ संबंध विशेष रूप से विकसित हुए। प्रारंभिक द्वैतवादी व्याख्या में भगवान और जीव का भेद महत्त्वपूर्ण है, पर बाद की तमिल अभिव्यक्तियों को बिना अंतर के उसी रूप में समेटना उचित नहीं। 3
कश्मीर शैव दर्शन केवल एक ही मत नहीं
उत्पलदेव और अभिनवगुप्त से संबद्ध प्रत्यभिज्ञा दर्शन कश्मीर की अद्वैत-उन्मुख शैव बौद्धिक परंपराओं का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। किंतु कश्मीर के मध्यकालीन इतिहास में शैव सिद्धांत की भिन्न धाराएँ भी थीं। इसलिए 'कश्मीर' स्थान का नाम सुनकर हर ग्रंथ का दर्शन अद्वैत घोषित नहीं करना चाहिए। 4
नाथ परंपरा: शैव संबंध के साथ अपनी विशिष्ट पहचान
मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ का नाम नाथ धार्मिक स्मृतियों तथा योग परंपराओं में विशेष स्थान रखता है। नाथ संन्यासी जीवन, गुरु-शिष्य संबंध, लोकभाषा में वाणी तथा हठयोग से जुड़े साहित्य के अध्ययन का एक बड़ा क्षेत्र हैं। विद्वानों के बीच नाथ इतिहास के आरंभ, गोरखनाथ के निश्चित जीवनकाल और अनेक ग्रंथों के लेखकत्व पर चर्चा जारी है। नाथों का अन्य धार्मिक समुदायों से संवाद भी रहा है। उनकी विस्तृत कहानी स्वतंत्र मार्गदर्शिका में पढ़नी चाहिए। 5 10
शिवलिंग: एक रूप, अनेक संदर्भ
संस्कृत में लिङ्ग का अर्थ चिह्न या संकेत भी हो सकता है। पूजा के संदर्भ में शिवलिंग भगवान की पवित्र उपस्थिति का केंद्र माना जाता है। अलग-अलग परंपराएँ उसमें ब्रह्मांडीय, दार्शनिक, सृजनात्मक या भक्तिपूर्ण अर्थ देख सकती हैं। ऐतिहासिक रूपों में भी भिन्नता है; उदाहरण के लिए संग्रहालय में सुरक्षित एकमुखलिंग में स्तंभाकार लिंग के साथ शिव का मानवीय मुख उकेरा गया है। इसे केवल 'साधारण पत्थर' अथवा केवल 'एक शारीरिक संकेत' बताना इसकी बहुविध धार्मिक तथा कलात्मक व्याख्या के साथ न्याय नहीं करता। 7
नटराज: गति के भीतर संतुलन
नटराज की चोल-कालीन कांस्य प्रतिमा में डमरू, अग्नि, अभय का संकेत और उठा हुआ चरण विविध अर्थ व्यक्त करते हैं। चारों ओर का अग्नि-वृत्त और चेहरे की शांत मुद्रा गति तथा स्थिरता को एक साथ दिखाते हैं। संग्रहालय की व्याख्या उस ऐतिहासिक कलाकृति को समझने का एक माध्यम है; अन्य शास्त्रीय और भक्तिपरक व्याख्याएँ अतिरिक्त अर्थ दे सकती हैं। 6
त्रिशूल, भस्म, चंद्रमा और नंदी
त्रिशूल, विभूति/भस्म, जटाएँ, चंद्रमा और नंदी शिव से जुड़े परिचित चिह्न हैं। मंदिर-कथाओं, पुराण-आधारित व्याख्याओं और दार्शनिक शिक्षाओं में इनके अर्थ विविध हो सकते हैं। हर प्रतीक के लिए एक तय संख्या में अर्थ गिनाकर यह दावा करना कि सभी समुदाय वही मानते हैं, भरोसेमंद अध्ययन-पद्धति नहीं है। बेहतर प्रश्न है—किस ग्रंथ या किस स्थानीय परंपरा में यह अर्थ बताया गया है?
6. शास्त्र और साहित्य: एक पुस्तक से बड़ा संसार
शैव समुदायों के लिए कोई एक ऐसी अनिवार्य पुस्तक नहीं है जिसे सभी परंपराएँ समान अधिकार देती हों। संदर्भ के अनुसार वैदिक रुद्र-सूक्त, शैव आगम और तंत्र, पुराण, तमिल तिरुमुरै, दार्शनिक ग्रंथ तथा गुरु-वाणी महत्त्व रखते हैं। कुछ ग्रंथ मंदिर-अर्चना का विषय लेते हैं, कुछ परम सत्य की व्याख्या करते हैं, कुछ संतों की जीवनकथा बताते हैं और कुछ प्रेमपूर्ण काव्य हैं। किस ग्रंथ को कितना प्रमाण माना जाए, यह परंपरा और प्रसंग पर निर्भर है। 1 3 4 8
उदाहरण के लिए शिवसूत्र और प्रत्यभिज्ञा-साहित्य का संदर्भ कश्मीर के दार्शनिक इतिहास में आता है। केवल ग्रंथ का नाम जान लेने से उसके हर संस्करण, लेखक या श्लोक के प्रमाण की पुष्टि नहीं हो जाती। इस आरंभिक मार्गदर्शिका में उन रचनाओं के अनजाँचे संस्कृत उद्धरण या आधुनिक अनुवाद प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। 4
ShivGoraksh परियोजना में भगवद्गीता, अष्टावक्र गीता और देवीमाहात्म्य की सामग्री अलग से तैयार की गई है। वे आगे की तुलनात्मक शिक्षा में काम आ सकती हैं, लेकिन किसी शैव दर्शन को सिद्ध करने के लिए केवल विषय-साम्य पर्याप्त नहीं है। उनकी पुस्तक-स्थिति, श्लोक-संदर्भ और प्रकाशन-अनुमोदन को अलग सत्यापित करना होगा।
7. जीवन में शैव परंपरा के रूप
मंदिर में दीप, पुष्प और जल अर्पण, सामूहिक भजन, स्तोत्र-पाठ, यात्रा, पूजा और शांत प्रार्थना जैसे रूप देखने को मिल सकते हैं। गृहस्थ भक्त, मंदिर के पुरोहित, गायक, संन्यासी और मठ के शिक्षक अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं। महाशिवरात्रि, श्रावण सोमवार, मासिक शिवरात्रि और प्रदोष शिव-संबद्ध प्रमुख व्रत या उत्सव हैं, पर इनके दिनों एवं समय का निर्धारण स्थानीय पंचांग-पद्धति से संबंधित है। इस परिचय में किसी वर्ष की तिथि या मुहूर्त अनुमान से नहीं दिया जा रहा।
किसी व्यक्ति के लिए भक्ति ही मुख्य मार्ग हो सकती है; दूसरे के लिए दर्शन पढ़ना या गुरु की देखरेख में योग का अनुशासन महत्त्वपूर्ण हो सकता है। दीक्षा (diksha)दीक्षा (dīkṣā) और कुछ मंत्र या विशेष शारीरिक-श्वास-साधनाएँ विशिष्ट परंपराओं के नियमों के अंतर्गत आती हैं। उनके इतिहास की चर्चा करना उनकी बिना मार्गदर्शन विधि बताने जैसा नहीं है। 5
किसी एक प्रदेश का भजन, किसी दूसरे का उत्सव या एक मठ का नियम संपूर्ण शैव जगत का नियम नहीं माना जाना चाहिए। अच्छा अध्ययन स्थानीय भक्तों की वाणी का सम्मान करता है, साथ ही यह पूछता है कि किसी प्रथा का ऐतिहासिक प्रमाण कब और कहाँ मिलता है।
8. प्रचलित गलतफहमियाँ और उनका समाधान
'शैव परंपरा का एक ही संस्थापक है।' उपलब्ध इतिहास अनेक क्षेत्रों और समुदायों में हुए लंबे विकास की ओर संकेत करता है। किसी विशिष्ट संप्रदाय के प्रतिष्ठित गुरु का होना समस्त शैव मत का अकेला संस्थापक होना नहीं है। 1
'सभी शैव मानते हैं कि संसार मिथ्या है।' शैव सिद्धांत और कश्मीर की अद्वैत-उन्मुख धाराओं में वास्तविकता तथा जीव-ईश्वर संबंध के बारे में महत्त्वपूर्ण भेद हैं। किसी दूसरे दर्शन की लोकप्रिय पंक्ति यहाँ सभी पर लागू नहीं की जा सकती। 3 4
'शिव का अर्थ केवल विनाश है।' नटराज की छवि सृष्टि-क्रम के विभिन्न पक्षों को एक साथ दिखाती है। भक्तिमय साहित्य में शिव करुणामय आराध्य, शिक्षक और पारिवारिक देवता भी हैं। 6
'शैव होने का अर्थ विष्णु या देवी से शत्रुता है।' इतिहास में मतभेद और विवाद भी रहे हैं, साथ ही साझी पूजा-संस्कृतियाँ और पारस्परिक संबंध भी। किसी एक उदाहरण से सब जगह अनिवार्य संघर्ष या पूर्ण समानता सिद्ध नहीं होती।
'हर शैव व्यक्ति संन्यासी या योगी होता है।' गृहस्थ जीवन और मंदिर-भक्ति की परंपराएँ भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं जितने योगी एवं संन्यासी समुदाय। 1 5
'यदि किसी पौराणिक कथा का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं, तो उसका कोई अर्थ नहीं।' कथा के धार्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक अर्थ हो सकते हैं; पर उन अर्थों को इतिहास का प्रमाण बताना सही तरीका नहीं। सही पहचान दोनों की गरिमा बचाती है।



