पढ़ने की सहायता

सरल रोमन संस्कृत के लिए देवनागरी-आधारित पठन-सहायता है। IAST में शास्त्रीय लिप्यंतरण के भेद सुरक्षित हैं। जहाँ दिया हुआ रोमन पाठ नहीं है, वहाँ IAST देवनागरी से स्वतः बनाया गया है; यह प्रमाणित उच्चारण-निर्देश नहीं है। हिन्दी और अन्य लोकभाषा के गीतों में दिए गए शब्द और बोलचाल के स्वरान्त सुरक्षित रहते हैं; सरल रोमन स्पष्ट लिप्यंतरण-चिह्नों को सुलभ बनाता है। उनके शास्त्रीय दृश्य में दिया हुआ रोमन पाठ रहता है, संस्कृत उच्चारण नहीं गढ़ा जाता। बीजाक्षरों का चुना हुआ रोमन रूप जहाँ स्पष्ट है, सुरक्षित रखा गया है।

आरती

ॐ जय शिव ओंकारा — शिव आरती

शिव आरती का चयनित आठ-पदी संपूर्ण देवनागरी पाठ, सरल अर्थ और स्रोत-सचेत विवेचन।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अर्थ

गायक ओंकार-स्वरूप शिव की जय बोलता है और ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव तथा देवी-संबंध का स्मरण करता है। यह आरंभ तीन रूपों के एकत्व का भाव तैयार करता है।

व्याख्या

“अर्द्धांगी” शब्द शिव के साथ पार्वती के अविभाज्य संबंध की ओर संकेत करता है। यह काव्यात्मक संबोधन है, किसी एक दार्शनिक मत का निर्णायक सूत्र नहीं।

2

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। शिव पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा.॥

अर्थ

एक, चार और पाँच मुख तथा हंस, गरुड़ एवं वृषभ—ये संकेत परिचित देव-स्वरूपों और उनके वाहनों की ओर ले जाते हैं।

व्याख्या

आरती प्रतीकों को काव्यात्मक ढंग से साथ रखती है। इसे हर परंपरा पर लागू मूर्तिशास्त्र की अंतिम सूची नहीं समझना चाहिए।

3

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। स्वामी दस भुज अति सोहे। तीनों रूप निरखते। त्रिभुवन मन मोहे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अर्थ

अलग-अलग भुजाओं के रूप देवताओं की विविध छवियाँ जगाते हैं; तीनों रूपों के दर्शन से त्रिभुवन के जनों के मोहित होने का चित्र खींचा गया है।

व्याख्या

यहाँ भुजाओं की संख्याएँ भावपूर्ण दृश्य बनाती हैं, न कि सभी ऐतिहासिक मूर्तियों पर लागू अनिवार्य नियम।

4

अक्षमाला बनमाला मुण्डमाला धारी। शिव मुण्डमाला धारी। चंदन मृगमद चंदा, सोहे त्रिपुरारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अर्थ

अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला, चन्दन, मृगमद और चन्द्र का उल्लेख अलंकरण का चित्र रचता है; ‘त्रिपुरारी’ शिव का एक नाम है।

व्याख्या

इस चयनित पाठ में “चंदन मृगमद चंदा” है; अन्य संस्करणों के शब्द भिन्न हों तो उन्हें पाठांतर के रूप में दर्ज करना चाहिए।

5

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। शिव बाघम्बर अंगे। ब्रह्मादिक सनकादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अर्थ

श्वेत, पीत और व्याघ्रचर्म वस्त्रों से विविध दिव्य रूप सामने आते हैं; ब्रह्मादि, सनकादि तथा भूतादि संगति का चित्र भी है।

व्याख्या

बाघम्बर शिव की परिचित प्रतिमा-परंपरा से जुड़ा प्रतीक है; इसे पूजा में शाब्दिक रूप से अपनाने का निर्देश नहीं समझना चाहिए।

6

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता। शिव कर में त्रिशूल धर्ता। जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अर्थ

कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल तीन परिचित दिव्य चिह्न हैं; आरती जगत की रचना, संहार और पालन के भाव भी जोड़ती है।

व्याख्या

चयनित पाठ में “जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता” छपा है; दूसरे पाठों का शब्दक्रम या पद अलग हो सकता है।

7

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। स्वामी जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अर्थ

इस पद का मुख्य भाव है कि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव प्रणव ॐ के अंतर्गत एकत्व से देखे गए हैं; केवल भेद पर ठहरने को गीत अविवेक कहता है।

व्याख्या

यह आरती का भक्तिपरक कथन है; अलग हिन्दू दर्शन एकत्व और भेद को अलग प्रकार से समझाते हैं।

8
विषय-सूची पर लौटें

त्रिगुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे। स्वामी प्रेम सहित गावे। कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अर्थ

अंतिम पद प्रेमपूर्वक आरती गाने की प्रशंसा करता है, मनोवांछित फल की भक्तिमय आशा कहता है और शिवानन्द स्वामी का नाम लाता है।

व्याख्या

‘शिवानन्द स्वामी’ का नाम पद में होना ऐतिहासिक लेखक की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। फल-कथन को निश्चित परिणाम की गारंटी न बनाएँ।

सन्दर्भ और उपयोग

हर पद का अर्थ और विस्तृत व्याख्या

आरती का मूल परिचय

यह शिव की स्तुति में गाई जाने वाली हिन्दी आरती है। ‘आरती’ शब्द दीप-समर्पण और उसके साथ गाए जाने वाले स्तुति-गीत, दोनों के लिए आता है। इस रचना में मुखड़े की पुनरावृत्ति, त्रिदेवों के रूप-संकेत और ओंकार की एकत्व-दृष्टि पाठ को विशेष बनाते हैं। शिव को ओंकार कहने का भाव पवित्र ‘ॐ’ से जुड़ता है, पर इससे सभी परंपराओं का दर्शन एक समान सिद्ध नहीं होता। 6

भाषा और लिपि: मूल पाठ भक्तिपरक हिन्दी का है; देवनागरी यहाँ मूल पाठ प्रस्तुत करती है। अंग्रेज़ी पृष्ठ में वही हिन्दी शब्द रोमन/हिंग्लिश में लिखे हैं। अंग्रेज़ी अर्थ और हिन्दी भावार्थ उनसे अलग व्याख्यात्मक परतें हैं।

आठ और नौ पदों का प्रश्न

यहाँ आठ क्रमांकित पदों का ढाँचा हिन्दी विकिपीडिया के चुने गए आधार-साक्ष्य से लिया गया है; ऊपर प्रदर्शित पाठ में आपके अनुरोध के अनुसार दो तरह के स्पष्ट चिह्नित गायन-पाठांतर लागू किए गए हैं। पूर्व प्रारूप में परखा गया उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय का 2024 पाठ नौ क्रमांकित पद देता है, जिनमें काशी के विश्वनाथ और नंदी का एक अतिरिक्त वर्णन है। मुद्रित पाठ के आगे अलग से गायन-विस्तार भी मिलता है। उस अन्य साक्ष्य को यहाँ बीच में जोड़कर एक मिश्रित ‘पूर्ण आरती’ नहीं बनाई गई। आरती से अलग कर्पूर गौरम् श्लोक को भी अनिवार्य पहला पद नहीं माना गया। 1 6

यहाँ टेक ‘ॐ हर हर हर महादेव’ है, दूसरे संस्करण ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ गाते हैं। चौथे और छठे पद के भी पाठांतर हैं। भिन्न गीत-पुस्तकों या लोक-गायन से आई पंक्तियों को बदलने पर उनका स्रोत बताना चाहिए। यह पाठ अपने चयनित साक्ष्य के अनुसार पूरा है, यह दावा नहीं कि हर मंदिर में आठ ही पद गाए जाते हैं।

आरती में शिव-शक्ति और त्रिदेव

पहले पद का ‘अर्द्धांगी’ संबोधन शिव-पार्वती के संबंध को स्मरण कराता है। अर्धनारीश्वर का संयुक्त रूप इसे समझने में सहायक है, किंतु इससे किसी खास मूर्ति से आरती की सीधी उत्पत्ति अथवा सभी मतों में एक दार्शनिक निष्कर्ष सिद्ध नहीं होता। संग्रहालय की एक ऐतिहासिक अर्धनारीश्वर प्रतिमा इस संदर्भ को स्पष्ट करती है। 4

हंस, गरुड़, वृषभ, कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल से ब्रह्मा-विष्णु-शिव के परिचित प्रतीकों की शृंखला बनती है। इसे कवितामय प्रतीक-रचना समझें, सभी मूर्तियों के लिए कठोर नियम नहीं। सातवाँ पद ‘प्रणवाक्षर’ में तीनों का एकत्व कहता है—यह इस आरती की भक्ति-दृष्टि है; विभिन्न हिंदू दर्शनों में भेद और अभेद की व्याख्या अलग हो सकती है। 5 6

रचयिता के बारे में क्या प्रमाण है? अंतिम पद में ‘कहत शिवानन्द स्वामी’ आता है, इसलिए परंपरा में उनका नाम जुड़ा है। पर केवल कवि-छाप से ऐतिहासिक व्यक्ति, जीवनकाल अथवा मूल हस्तलिखित पाठ सिद्ध नहीं होते। हिन्दी विकिपीडिया की प्रस्तावना में श्रद्धाराम फिल्लौरी का नाम भी है, किंतु उसके उद्धृत संदर्भ इस विशिष्ट शिव आरती के लिए ऐसा निष्कर्ष स्वतंत्र रूप से सिद्ध नहीं करते; संभव है कि अलग ‘ॐ जय जगदीश हरे’ की रचना से भ्रम हुआ हो। शिवगोरक्ष के लिए लेखकीय श्रेय ऐतिहासिक रूप से अप्रमाणित है। 6

आरती कहाँ और कब गाई जाती है? यह गृह-पूजन एवं मंदिरों की शिव-भक्ति से जुड़ा गीत है। सोमवार, श्रावण और महाशिवरात्रि से इसका सांस्कृतिक संबंध बताया जाता है, लेकिन किसी एक स्थानीय रीति को सबके लिए बाध्यकारी न मानें। पाठ, सुर, दीप-समर्पण और क्रम बदलते रहते हैं। यहाँ अग्नि-संबंधी विधि, जप-संख्या या दीक्षा-संबंधी अनुष्ठान नहीं बताए जा रहे। ‘मनवांछित फल’ का कथन भक्तिमय आशा है, निश्चित फल की गारंटी नहीं। वास्तविक पर्व-तिथियाँ अलग सत्यापित पंचांग सेवा पर निर्भर हैं।

महत्वपूर्ण शब्द

  • ओंकार: पवित्र ॐ से संबद्ध नाम।
  • प्रणवाक्षर: पवित्र ॐ; इस गीत में दिव्य एकत्व का संकेत।
  • अर्द्धांगी: अविभाज्य सहचरी/अर्धरूप का भाव; यहाँ पार्वती-संबंध।
  • त्रिपुरारी: त्रिपुर-विजय से जुड़ा शिव का नाम।
  • वाहन: देवता से संबद्ध प्रतीकात्मक सवारी; जैसे नंदी-वृषभ।
  • फलश्रुति: स्तुति या पाठ के अंत में भक्तिपरक फल-कथन।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या ऊपर संपूर्ण आरती दी गई है? हाँ, यह आठ पदों का पूरा पाठकीय-गायन रूप है, जिसमें दो स्पष्ट संपादकीय पाठ-परिवर्तन हैं। दूसरे प्रकाशित और गाए जाने वाले रूपों में पदों की संख्या अलग हो सकती है; नौ-पदी मुद्रित पाठ का उल्लेख अलग किया गया है। 1 6

अंग्रेज़ी पृष्ठ पर आरती का अनुवाद है? आरती के मूल शब्द हिंग्लिश/रोमन हिन्दी में हैं, अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं। उनके अर्थ और व्याख्या बाद में अंग्रेज़ी भाषा में मिलते हैं।

यहाँ ‘ॐ जय शिव ओंकारा’ क्यों दोहराया गया है? यह उपयोगकर्ता द्वारा चुना गया लोकप्रिय गायन-रूप है, जिसमें ‘प्रभु’ के स्थान पर ‘स्वामी’ भी है। इसके स्वतंत्र साक्ष्य हैं 7 8। मूल स्रोत 6 की टेक अलग थी; उसे मूल पाठ-अभिलेख में बिना बदले सहेजा गया है।

क्या यह संस्कृत स्तोत्र है? नहीं। आरती भक्तिपरक हिन्दी में है, जिसमें संस्कृत-मूल शब्द आते हैं।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों क्यों आते हैं? आरती का सातवाँ पद ‘प्रणवाक्षर’ के सहारे तीन रूपों के एकत्व का भाव कहता है। इसे सभी हिंदू दर्शन का एकमात्र मत न मानें। 6

क्या इसमें काशी का पद है? इस आठ-पदी पाठ में नहीं। नौ-पदी स्वतंत्र मुद्रित पाठ में विश्वनाथ–नंदी का संदर्भ मिलता है। 1

क्या शिवानन्द स्वामी निश्चित रचयिता थे? ऐतिहासिक पुष्टि नहीं मिली। पद में नाम है और पारंपरिक श्रेय मिलता है, पर रचनाकार और रचनाकाल अप्रमाणित हैं। 6

क्या यह अब प्रकाशित और आदेश में उपलब्ध है? नहीं। यह केवल संपादकीय प्रारूप है। अधिकार, पाठ, विशेषज्ञ समीक्षा और अनुप्रयोग-एकीकरण के बाद ही कोई अलग निर्णय होगा।

मूल स्रोत, लाइसेंस और संपादकीय स्थिति

मूल पाठ का चयनित साक्ष्य: हिन्दी विकिपीडिया सहयोगी, “शिव की आरती”, स्थायी संस्करण https://hi.wikipedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%B5_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80&oldid=6550774। लाइसेंस: क्रिएटिव कॉमन्स श्रेय–समानसाझा 4.0 (https://creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0/)। किए गए परिवर्तन: पाठ में ‘प्रभु’→‘स्वामी’ और मूल टेक→‘ॐ जय शिव ओंकारा’ (हर पद में); स्वतंत्र नया हिंग्लिश/रोमन लिप्यंतरण, पाठकीय पद-विन्यास और दोनों भाषाओं में स्वतंत्र अर्थ-व्याख्या। यह मूल का संपादित रूप है; Creative Commons की परिवर्तन-सूचना और समानसाझा की समीक्षा अभी बाकी है। प्रकाशित प्रयोग से पहले लाइसेंस की श्रेय और समानसाझा शर्तों की संपादकीय/कानूनी जाँच आवश्यक है। नौ-पदी विश्वविद्यालयी पाठ 1 अलग तुलना-साक्ष्य है, यहाँ छपे पदों का आधार नहीं। संबंधित ऐतिहासिक संकेत 4 और त्रिदेव संदर्भ 5। **केवल प्रारूप।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Hindi Wikipedia contributors; individual historic poet not established. Based on शिव की आरती. Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    Om Jai Shiv Omkara, Swami Jai Shiv Omkara. Brahma Vishnu Sadashiv, Ardhaangi Dhaara. Om Jai Shiv Omkara.

  2. 2

    Ekanan Chaturanan Panchanan Raaje. Shiv Panchanan Raaje. Hansasan Garudasan Vrishvahan Saaje. Om Jai Shiv Omkara.

  3. 3

    Do Bhuj Chaar Chaturbhuj Das Bhuj Ati Sohe. Swami Das Bhuj Ati Sohe. Teeno Roop Nirakhte. Tribhuvan Man Mohe. Om Jai Shiv Omkara.

  4. 4

    Akshamala Banmala Mundmala Dhaari. Shiv Mundmala Dhaari. Chandan Mrigmad Chanda, Sohe Tripuraari. Om Jai Shiv Omkara.

  5. 5

    Shvetambar Peetambar Baghambar Ange. Shiv Baghambar Ange. Brahmadik Sanakadik Bhootadik Sange. Om Jai Shiv Omkara.

  6. 6

    Kar Ke Madhya Kamandalu Chakra Trishul Dharta. Shiv Kar Mein Trishul Dharta. Jagkarta Jagaharta Jagpalan Karta. Om Jai Shiv Omkara.

  7. 7

    Brahma Vishnu Sadashiv Jaanat Aviveka. Swami Jaanat Aviveka. Pranavakshar Ke Madhye Ye Teeno Eka. Om Jai Shiv Omkara.

  8. 8

    Trigun Shivji Ki Aarti Jo Koi Nar Gaave. Swami Prem Sahit Gaave. Kahat Shivanand Swami Manvanchhit Phal Paave. Om Jai Shiv Omkara.

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

पद 1 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: गायक ओंकार-स्वरूप शिव की जय बोलता है और ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव तथा देवी-संबंध का स्मरण करता है। यह आरंभ तीन रूपों के एकत्व का भाव तैयार करता है। व्याख्या: “अर्द्धांगी” शब्द शिव के साथ पार्वती के अविभाज्य संबंध की ओर संकेत करता है। यह काव्यात्मक संबोधन है, किसी एक दार्शनिक मत का निर्णायक सूत्र नहीं।

पद 2 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: एक, चार और पाँच मुख तथा हंस, गरुड़ एवं वृषभ—ये संकेत परिचित देव-स्वरूपों और उनके वाहनों की ओर ले जाते हैं। व्याख्या: आरती प्रतीकों को काव्यात्मक ढंग से साथ रखती है। इसे हर परंपरा पर लागू मूर्तिशास्त्र की अंतिम सूची नहीं समझना चाहिए।

पद 3 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: अलग-अलग भुजाओं के रूप देवताओं की विविध छवियाँ जगाते हैं; तीनों रूपों के दर्शन से त्रिभुवन के जनों के मोहित होने का चित्र खींचा गया है। व्याख्या: यहाँ भुजाओं की संख्याएँ भावपूर्ण दृश्य बनाती हैं, न कि सभी ऐतिहासिक मूर्तियों पर लागू अनिवार्य नियम।

पद 4 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: अक्षमाला, वनमाला, मुण्डमाला, चन्दन, मृगमद और चन्द्र का उल्लेख अलंकरण का चित्र रचता है; ‘त्रिपुरारी’ शिव का एक नाम है। व्याख्या: इस चयनित पाठ में “चंदन मृगमद चंदा” है; अन्य संस्करणों के शब्द भिन्न हों तो उन्हें पाठांतर के रूप में दर्ज करना चाहिए।

पद 5 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: श्वेत, पीत और व्याघ्रचर्म वस्त्रों से विविध दिव्य रूप सामने आते हैं; ब्रह्मादि, सनकादि तथा भूतादि संगति का चित्र भी है। व्याख्या: बाघम्बर शिव की परिचित प्रतिमा-परंपरा से जुड़ा प्रतीक है; इसे पूजा में शाब्दिक रूप से अपनाने का निर्देश नहीं समझना चाहिए।

पद 6 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: कमण्डलु, चक्र और त्रिशूल तीन परिचित दिव्य चिह्न हैं; आरती जगत की रचना, संहार और पालन के भाव भी जोड़ती है। व्याख्या: चयनित पाठ में “जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता” छपा है; दूसरे पाठों का शब्दक्रम या पद अलग हो सकता है।

पद 7 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: इस पद का मुख्य भाव है कि ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव प्रणव ॐ के अंतर्गत एकत्व से देखे गए हैं; केवल भेद पर ठहरने को गीत अविवेक कहता है। व्याख्या: यह आरती का भक्तिपरक कथन है; अलग हिन्दू दर्शन एकत्व और भेद को अलग प्रकार से समझाते हैं।

पद 8 — अर्थ और व्याख्या

अर्थ: अंतिम पद प्रेमपूर्वक आरती गाने की प्रशंसा करता है, मनोवांछित फल की भक्तिमय आशा कहता है और शिवानन्द स्वामी का नाम लाता है। व्याख्या: ‘शिवानन्द स्वामी’ का नाम पद में होना ऐतिहासिक लेखक की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। फल-कथन को निश्चित परिणाम की गारंटी न बनाएँ।

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