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स्तोत्र

देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्: मूल पाठ, हिन्दी अर्थ और पाठभेद

क्षमा की बारह-पदीय प्रार्थना जो पूजा की कमी और जीवन की भूलों के बीच मातृकरुणा का आश्वासन खोजती है।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

श्रीगणेशाय नमः ॥

अर्थ

स्तोत्र के पहले छपा गणेश-वन्दन।

व्याख्या

मुद्रित संग्रह में यह आरम्भिक मंगलाचरण है; बारह मूल पदों की संख्या में इसे नहीं गिनते।

1

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः । न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १ ॥

अर्थ

मुझे न मन्त्र का ज्ञान है, न यन्त्र का; न उत्तम स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्राएँ या करुण पुकार ठीक से आती है। हे माता, इतना अवश्य जानता हूँ कि आपका अनुसरण क्लेश हरने वाला है।

व्याख्या

आरम्भ में साधक अपनी विधि-असमर्थता स्वीकार करता है, विधियों का तिरस्कार नहीं करता। मन्त्र, यन्त्र, आवाहन, ध्यान और मुद्रा अलग-अलग उपासना-अंग हैं, पर उनकी सूची यहाँ अभ्यास सिखाने के लिए नहीं है। अन्तिम पद त्वदनुसरणम् में सम्बन्ध और विश्वास को महत्व देता है: सही शब्द न आने पर भी प्रार्थना सम्भव है। इससे किसी गुप्त क्रिया की स्वतः अनुमति नहीं मिलती।

2

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् । तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ २ ॥

अर्थ

विधि न जानने, साधन न होने, आलस्य या अपेक्षित कर्म न कर पाने से आपके चरणों की सेवा में जो कमी रह गयी, उसे क्षमा करें, हे सबका उद्धार करने वाली कल्याणमयी जननी। कुपुत्र सम्भव है, पर माता की ममता को यहाँ अटल माना गया है।

व्याख्या

यहाँ त्रुटि के कारण अलग-अलग गिनाए हैं—अज्ञान, धनाभाव, आलस्य, असमर्थता। आर्थिक अभाव को नैतिक दोष मान लेना कविता का भाव नहीं है। ‘कुपुत्रो जायेत…’ का पुनरावृत्त वाक्य देवी की ममता के प्रति भरोसा है; इसे मनुष्यों पर अत्याचार सहते रहने का आदेश नहीं समझना चाहिए। यही पंक्ति तीसरे और चौथे पद में भी आती है और भाव को दृढ़ करती है।

3

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः । मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ३ ॥

अर्थ

हे जननी, संसार में आपके अनेक सरल-सहज पुत्र हैं, पर मैं उनमें अत्यन्त चंचल और अस्थिर पुत्र हूँ। हे शिवे, मुझे त्याग देना आपके अनुरूप नहीं होगा; कुपुत्र हो सकता है, पर माता की कृपा का भाव नहीं मिटता।

व्याख्या

विरलतरलः जैसा विशिष्ट पद बेचैन, डगमगाते या अस्थिर भक्त का चित्र बनाता है। यह किसी ऐतिहासिक लेखक की जीवनकथा का प्रमाण नहीं। भक्त दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा नहीं करता, बल्कि कहता है कि वह स्वयं सहजता से स्थिर नहीं रह पाता। ‘कुमाता न भवति’ की पुनरुक्ति इस अस्थिरता के बीच मातृकृपा की आशा को सामने लाती है।

4

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ ४ ॥

अर्थ

हे जगन्माता, मैंने आपके चरणों की सेवा नहीं की और अधिक द्रव्य या भेंट भी नहीं चढ़ायी; फिर भी आप मुझ पर अतुलनीय स्नेह करती हैं। कुपुत्र हो सकता है, पर देवी-माता की करुणा बनी रहती है।

व्याख्या

इस पद में भक्ति को लेन-देन बनाने का विरोध दिखता है: अधिक चढ़ावे से ही माता का स्नेह मिलेगा, ऐसा नहीं कहा गया। ‘द्रविण’ धन या भौतिक साधन का शब्द है, जो दूसरे पद के धनाभाव की याद दिलाता है। इसका अर्थ कर्म, उत्तरदायित्व या दूसरों की सहायता छोड़ देना नहीं, बल्कि भेंट की मात्रा को प्रेम का एकमात्र पैमाना न मानना है।

5

परित्यक्त्वा देवान्विविधविधसेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि । इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ ५ ॥

अर्थ

अनेक प्रकार की देव-सेवाओं की उलझन में अन्य आराधनाओं से हटते हुए, जब आयु पचासी वर्ष से भी अधिक बीत गयी, तब मैं पूछता हूँ—हे लम्बोदर गणेश की जननी, यदि अब भी आपकी कृपा न मिले तो निराधार मैं किसकी शरण जाऊँ?

व्याख्या

१९१२ के मुद्रित पाठ में परित्यक्त्वा देवान् है, जबकि कई अन्य पाठों में परित्यक्ता देवाः मिलता है; इससे वाक्य का कर्तृत्व और अर्थ बदल सकते हैं। यहाँ पचासी वर्ष से अधिक आयु काव्य-वक्ता की स्थिति है, रचनाकार की जन्मतिथि या आयु का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। लम्बोदरजननि से गणेश की माता का बोध होता है। अन्तिम प्रश्न बुढ़ापे में सहारे और करुणा की चाह का है।

6

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ ६ ॥

अर्थ

कवि आश्चर्य से कहता है कि समाज में तिरस्कृत व्यक्ति की वाणी मधु जैसी मधुर हो सकती है और निर्धन व्यक्ति निर्भय होकर अतुल सम्पदा के बीच रह सकता है। हे अपर्णा, आपके मन्त्र के एक अक्षर का भी श्रवण होने का फल कौन पूरी तरह जान सकता है?

व्याख्या

श्वपाक पुरानी सामाजिक व्यवस्था का अपमानसूचक शब्द है। उसे ऐतिहासिक पद के रूप में रखा गया है, किसी व्यक्ति की मर्यादा का माप मानकर नहीं। मधुर वाणी और असंख्य सोने की छवि स्तुतिकाव्य की अतिशयोक्ति है—धन मिलने की गारंटी नहीं। ‘मनुवर्ण’ में मन्त्र-अक्षर का संकेत है, पर यहाँ किसी दीक्षा-विशेष, जप-संख्या या गुप्त विधि का निर्देश नहीं दिया गया। अन्तिम वाक्य के व्याकरण की विद्वत् समीक्षा आवश्यक है।

7

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ ७ ॥

अर्थ

चिताभस्म लगाए, विष से सम्बद्ध, दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाले, जटाधारी, गले में सर्पराज धारण करने वाले, कपालधारी भूतनाथ पशुपति शिव जगदीश्वर कहलाते हैं। हे भवानी, कवि इस महिमा को आपसे उनके मिलन का फल बताता है।

व्याख्या

शिव की बाहरी छवि राजसी वैभव के विपरीत है—भस्म, जटा, सर्प, कपाल और दिगम्बर भाव। फिर भी वे जगदीश्वर हैं; इस विरोध से काव्य की शक्ति बनती है। पाणिग्रहण विवाह में हाथ ग्रहण करने का शब्द है और यहाँ शिव–शक्ति की एकता का प्रतीक है। विष सेवन, चिताभस्म या सर्प का उल्लेख अनुष्ठानिक नकल की अनुमति नहीं देता। इसे देवी-शिव सम्बन्ध की स्तुति के रूप में समझना चाहिए।

8

न मोक्षस्याकाङ्क्षा न च विभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः । अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥ ८ ॥

अर्थ

हे चन्द्रमुखी जननी, मुझे न मोक्ष की आकांक्षा है, न सांसारिक वैभव की; न विशेष ज्ञान की चाह, न सुख की लालसा। मेरी विनती केवल इतनी है कि ‘मृडानी, रुद्राणी, शिवे, भवानी’ का स्मरण करते हुए मेरा जन्म-जीवन बीते।

व्याख्या

१९१२ में इस पद की शुरुआत न मोक्षस्याकाङ्क्षा न च विभववाञ्छापि च न मे है; प्रचलित पाठ में भवविभववाञ्छापि च न मे मिलता है। दोनों को बिना बताए नहीं मिलाया गया है। कवि के लिए मोक्ष, सम्पत्ति, विशेष ज्ञान और सुख की प्राप्ति से अधिक मूल्यवान माता का स्मरण है। ‘मृडानी–रुद्राणी–शिवे–भवानी’ पाठ के भीतर देवीनाम हैं, किसी अनिवार्य जप-विधान की घोषणा नहीं।

9
विषय-सूची पर लौटें

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ ९ ॥

अर्थ

अनेक उपचारों से विधिपूर्वक आपकी आराधना नहीं कर पाया; रूखे विचारों और वचनों से भी क्या अच्छा किया? हे श्यामा, मुझ असहाय पर यदि आप तनिक भी कृपा करें तो वह आपकी मातृकरुणा के ही अनुरूप है।

व्याख्या

लम्बे छन्दों के बाद प्रार्थना यहाँ संक्षिप्त हो जाती है। उपचार पूजा में अर्पित की जाने वाली सेवाएँ या वस्तुएँ हैं; कविता उनकी क्रमबद्ध विधि नहीं बताती। रूक्ष विचार और वाणी की बात से आचरण का प्रश्न खुलता है—केवल सामग्री न चढ़ा पाना नहीं, किसी से कठोर बोलना भी आत्मपरीक्षण का विषय है। दूसरी पंक्ति की वाक्यरचना का संस्कृत विशेषज्ञ से परीक्षण शेष है।

10

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि । नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ १० ॥

अर्थ

विपत्ति में डूबते समय मैं आपका स्मरण करता हूँ, हे करुणा-सागर दुर्गे। इसे मेरा छल न मानिए; भूख और प्यास से पीड़ित सन्तान अपनी माता को ही याद करती है।

व्याख्या

यह पद आम अनुभव से जुड़ता है: संकट आते ही मन सहायता के लिए पुकारता है। शठत्व छल या कुटिलता है; भक्त को संकोच है कि केवल कठिन समय में स्मरण कहीं स्वार्थ न लगे। भूखे-प्यासे बच्चे और माता का उदाहरण बताता है कि आवश्यकता की पुकार को तिरस्कार से न देखें। पुराने स्कैन की पहली पंक्ति धुँधली है, इसलिए वहाँ पुनर्पाठ की समीक्षा दर्ज है।

11

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि । अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ ११ ॥

अर्थ

हे जगदम्बे, यदि मुझ पर आपकी करुणा पूर्ण है तो इसमें आश्चर्य ही क्या? अनेक अपराधों से घिरी सन्तान को भी माता उपेक्षित नहीं करती—यही इस पद का विश्वास है।

व्याख्या

१९१२ के मुद्रण में अपराधपरम्परावृतं है, पर अनेक दूसरे पाठों में अपराधपरम्परापरं मिलता है। यह केवल मात्रा का अन्तर नहीं, अर्थ बदलने वाला पाठभेद है। माता–सन्तान की छवि पश्चात्ताप के बाद सम्बन्ध सुधरने की आशा देती है; गलत कर्म का महत्व मिटा देने का बहाना नहीं। सघन मुद्रित अक्षरों की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है।

12

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि । एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥ १२ ॥

अर्थ

मेरे समान पाप करने वाला कोई नहीं, और आपके समान पाप का नाश करने वाली भी कोई नहीं, हे महादेवी। यह जानकर आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।

व्याख्या

अन्तिम पद में अतिशयोक्ति से अपनी त्रुटि और देवी की पापनाशिनी महिमा साथ रखी गयी है। यथायोग्यं तथा कुरु का अर्थ है—आप जो उचित समझें, वही करें; यहाँ किसी निश्चित फल का दावा नहीं। ‘मैं सबसे बड़ा पापी’ काव्य-विनय है, पाठक के आत्म-मूल्य का नकार नहीं। इस क्षमायाचना में गलती मानना, पश्चात्ताप, कृपा की आशा और आचरण सुधारने की सम्भावना जुड़ी है।

14
विषय-सूची पर लौटें

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

अर्थ

१९१२ के मुद्रित संग्रह में शंकराचार्य-नाम से दिया गया समापन-वाक्य।

व्याख्या

मुद्रित समापन में शंकराचार्य का नाम होने मात्र से किसी निश्चित ऐतिहासिक काल और रचनाकार की पुष्टि नहीं होती।

सन्दर्भ और उपयोग

चयनित मूल पाठ: बृहत्स्तोत्ररत्नाकर (१९१२), क्रम ७३, मुद्रित पृष्ठ १६३–१६४ / स्कैन पत्र १७१–१७२। बारह क्रमांकित पद, अतिरिक्त मंगलाचरण एवं समापन अलग। पाठभेदों और स्वतंत्र जाँच के कारण यह केवल शैक्षिक संस्करण है 1।

श्लोकानुसार अर्थ और विस्तृत व्याख्या

मंगलाचरण

अर्थ: स्तोत्र के पहले छपा गणेश-वन्दन। मुद्रित संग्रह में यह आरम्भिक मंगलाचरण है; बारह मूल पदों की संख्या में इसे नहीं गिनते।

समापन-वाक्य

अर्थ: १९१२ के मुद्रित संग्रह में शंकराचार्य-नाम से दिया गया समापन-वाक्य। मुद्रित समापन में शंकराचार्य का नाम होने मात्र से किसी निश्चित ऐतिहासिक काल और रचनाकार की पुष्टि नहीं होती।

यह स्तोत्र क्या है — और क्या नहीं

यह संस्कृत का क्षमापन-स्तोत्र है। ‘न मन्त्रं नो यन्त्रं’ से आरम्भ होने वाले इस चुने हुए रूप में बारह श्लोक हैं। ‘अपराधसहस्राणि क्रियन्ते’ से शुरू होने वाली छोटी क्षमा-प्रार्थना को भी कई संग्रहों में अपराध-क्षमापन कहा जाता है, पर दोनों को एक रचना समझना ठीक नहीं। स्तोत्र दुर्गा सप्तशती के आसपास परिशिष्ट में छप सकता है; इससे वह देवीमाहात्म्य के तेरह अध्यायों में शामिल नहीं हो जाता 126। रचना में आरम्भ की विधि-अनभिज्ञता (१), धनाभाव और कमी (२–४), आयु तथा आश्रय (५), अलंकारपूर्ण महिमा (६–७), फल-कामना से परे स्मरण (८), आत्मपरीक्षण (९), संकट की पुकार (१०) और अन्तिम समर्पण (११–१२) का क्रम दिखाई देता है। ‘माँ कभी नहीं छोड़ती’ इस काव्य का भक्तिपूर्ण विश्वास है; इसे धन, बीमारी, सुरक्षा या दण्ड से छूट का निश्चित परिणाम नहीं मानना चाहिए।

परम्परा, नाम और लेखकीय प्रश्न

१९१२ के मुद्रित संग्रह में शीर्षक देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् और अन्त के कोलोफॉन में शंकराचार्य का नाम है। इस आधार पर ‘परम्परागत रूप से आदि शंकराचार्य को समर्पित’ कहना सम्भव है, पर इससे ऐतिहासिक काल और लेखक की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। क्षमापन/क्षमापण जैसे नाम-रूप भी मिलते हैं; नाम में थोड़े अन्तर का अर्थ अनिवार्यतः अलग स्तोत्र नहीं 12।

पाठभेद और चयनित संस्करण

श्लोक ५: यहाँ परित्यक्त्वा देवान्, कुछ दूसरे पाठों में परित्यक्ता देवाः है; दोनों का व्याकरण अलग है। वहीं विविधविधसेवाकुलतया के स्थान पर विविधविधिसेवाकुलतया भी मिलता है। श्लोक ८: इस प्रिंट का न च विभववाञ्छा दूसरे पाठों के भवविभववाञ्छा से भिन्न है। श्लोक ११: यहाँ अपराधपरम्परावृतं, अन्यत्र अपराधपरम्परापरं है। श्लोक ६ की अन्तिम पंक्ति तथा श्लोक १० की आरम्भिक पंक्ति की पुनर्जाँच चाहिए। पूरे स्रोत-विवरण और निर्णय JSON अभिलेख में दर्ज हैं 123। ऊपर दिया मूल पाठ १९१२ के चुने हुए मुद्रित पाठ का पठन-सुलभ सम्पादकीय रूप है। संयुक्ताक्षर, अनुस्वार, टूटे शब्द और पंक्ति-विन्यास ठीक किए गए हैं; किसी दूसरे संस्करण की पंक्तियाँ चुपचाप नहीं मिलायी गयीं। साथ का रोमन लेखन उसी मूल का IAST लिप्यन्तरण है, अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं। विद्वत् अक्षर-परीक्षण शेष होने से सत्यापन ‘आंशिक’ है।

श्रद्धा, भाषा और अभ्यास की सीमा

स्तोत्र में मन्त्र, यन्त्र, मुद्रा और जप का उल्लेख आता है; पर वह किसी गुप्त साधना, दीक्षा, संख्या, मुहूर्त या क्रमबद्ध कर्मकाण्ड का निर्देश नहीं देता। माँ की करुणा को गलत कार्यों से जिम्मेदारी मिटाने का बहाना नहीं बनाना चाहिए। छठे श्लोक का पुराना सामाजिक अपमानसूचक शब्द समर्थन के लिए नहीं, पाठ-इतिहास समझाने के लिए रखा गया है। गलती मानने के साथ सुधार करना भी जीवन का आवश्यक पक्ष हो सकता है।

सामान्य प्रश्न

कितने श्लोक हैं? इस १९१२ संस्करण में १२ क्रमांकित श्लोक हैं; गणेश-मंगलाचरण और मुद्रित समापन अलग हैं। क्या यह सप्तशती का अध्याय है? नहीं। पाठ-संग्रहों में परिशिष्ट साथ छपने और मूल अध्याय होने में अन्तर है। क्या ‘अपराधसहस्राणि’ वही स्तोत्र है? नहीं, वह दूसरे प्रचलित क्षमा-पाठ का आरम्भ है। क्या रचनाकार निश्चित रूप से आदि शंकराचार्य हैं? पुराना मुद्रित समापन शंकराचार्य नाम देता है; स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण अभी नहीं मिला। क्या पाठ से निश्चित धन, रोग-मुक्ति या क्षमा मिलती है? यह भक्ति का काव्य-वचन है, किसी लौकिक या आध्यात्मिक परिणाम की मशीनी गारंटी नहीं। क्या पाठ के लिए अनिवार्य मुहूर्त अथवा दीक्षा दी गयी है? इस शैक्षिक लेख में ऐसी कोई विधि प्रस्तावित नहीं है। विशिष्ट परम्पराओं के आचार अलग हो सकते हैं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    śrīgaṇeśāya namaḥ ||

  2. 1

    na mantraṃ no yantraṃ tadapi ca na jāne stutimaho na cāhvānaṃ dhyānaṃ tadapi ca na jāne stutikathāḥ | na jāne mudrāste tadapi ca na jāne vilapanaṃ paraṃ jāne mātastvadanusaraṇaṃ kleśaharaṇam || 1 ||

  3. 2

    vidherajñānena draviṇaviraheṇālasatayā vidheyāśakyatvāttava caraṇayoryā cyutirabhūt | tadetatkṣantavyaṃ janani sakaloddhāriṇi śive kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati || 2 ||

  4. 3

    pṛthivyāṃ putrāste janani bahavaḥ santi saralāḥ paraṃ teṣāṃ madhye viralataralo'haṃ tava sutaḥ | madīyo'yaṃ tyāgaḥ samucitamidaṃ no tava śive kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati || 3 ||

  5. 4

    jaganmātarmātastava caraṇasevā na racitā na vā dattaṃ devi draviṇamapi bhūyastava mayā | tathāpi tvaṃ snehaṃ mayi nirupamaṃ yatprakuruṣe kuputro jāyeta kvacidapi kumātā na bhavati || 4 ||

  6. 5

    parityaktvā devānvividhavidhasevākulatayā mayā pañcāśīteradhikamapanīte tu vayasi | idānīṃ cenmātastava yadi kṛpā nāpi bhavitā nirālambo lambodarajanani kaṃ yāmi śaraṇam || 5 ||

  7. 6

    śvapāko jalpāko bhavati madhupākopamagirā nirātaṅko raṅko viharati ciraṃ koṭikanakaiḥ | tavāparṇe karṇe viśati manuvarṇe phalamidaṃ janaḥ ko jānīte janani japanīyaṃ japavidhau || 6 ||

  8. 7

    citābhasmālepo garalamaśanaṃ dikpaṭadharo jaṭādhārī kaṇṭhe bhujagapatihārī paśupatiḥ | kapālī bhūteśo bhajati jagadīśaikapadavīṃ bhavāni tvatpāṇigrahaṇaparipāṭīphalamidam || 7 ||

  9. 8

    na mokṣasyākāṅkṣā na ca vibhavavāñchāpi ca na me na vijñānāpekṣā śaśimukhi sukhecchāpi na punaḥ | atastvāṃ saṃyāce janani jananaṃ yātu mama vai mṛḍānī rudrāṇī śiva śiva bhavānīti japataḥ || 8 ||

  10. 9

    nārādhitāsi vidhinā vividhopacāraiḥ kiṃ rukṣacintanaparairna kṛtaṃ vacobhiḥ | śyāme tvameva yadi kiñcana mayyanāthe dhatse kṛpāmucitamamba paraṃ tavaiva || 9 ||

  11. 10

    āpatsu magnaḥ smaraṇaṃ tvadīyaṃ karomi durge karuṇārṇaveśi | naitacchaṭhatvaṃ mama bhāvayethāḥ kṣudhātṛṣārtā jananīṃ smaranti || 10 ||

  12. 11

    jagadamba vicitramatra kiṃ paripūrṇā karuṇāsti cenmayi | aparādhaparamparāvṛtaṃ na hi mātā samupekṣate sutam || 11 ||

  13. 12

    matsamaḥ pātakī nāsti pāpaghnī tvatsamā na hi | evaṃ jñātvā mahādevi yathāyogyaṃ tathā kuru || 12 ||

  14. 14

    iti śrīmatparamahaṃsaparivrājakācāryaśrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ devyaparādhakṣamāpanastotraṃ sampūrṇam ||

स्रोत और सम्बन्धित स्थिर पहचान

  • 1 Bṛhatstotraratnākara (बृहत्स्तोत्ररत्नाकर), seventh printing: https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Brihat_Stotra_Ratnakara_1912.djvu
  • 2 Devī Aparādha Kṣamāpaṇa Stotram, SanskritDocuments volunteer digital text: https://sanskritdocuments.org/doc_devii/dapradh.html
  • 3 देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्, Ved Path, Gita Press print-based editorial reading: https://www.vedpath.org/hi/stotrams/devyaparadha-kshamapana-stotram/
  • 4 Wikisource unproofread OCR for 1912 Bṛhatstotraratnākara leaves 171–172: https://sa.wikisource.org/wiki/पृष्ठम्:Brihat_Stotra_Ratnakara_1912.djvu/१७१
  • 5 देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्, Sanskrit Wikisource standalone article: https://sa.wikisource.org/wiki/देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
  • 6 Devī Aparādha Kṣamāpaṇa Stotram, Drik Panchang reading: https://www.drikpanchang.com/lyrics/durga-saptashati/aparadha-kshamapana-stotram/devi-aparadha-kshamapana-stotram.html
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

श्लोक 1

अर्थ: मुझे न मन्त्र का ज्ञान है, न यन्त्र का; न उत्तम स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्राएँ या करुण पुकार ठीक से आती है। हे माता, इतना अवश्य जानता हूँ कि आपका अनुसरण क्लेश हरने वाला है। आरम्भ में साधक अपनी विधि-असमर्थता स्वीकार करता है, विधियों का तिरस्कार नहीं करता। मन्त्र, यन्त्र, आवाहन, ध्यान और मुद्रा अलग-अलग उपासना-अंग हैं, पर उनकी सूची यहाँ अभ्यास सिखाने के लिए नहीं है। अन्तिम पद त्वदनुसरणम् में सम्बन्ध और विश्वास को महत्व देता है: सही शब्द न आने पर भी प्रार्थना सम्भव है। इससे किसी गुप्त क्रिया की स्वतः अनुमति नहीं मिलती।

श्लोक 2

अर्थ: विधि न जानने, साधन न होने, आलस्य या अपेक्षित कर्म न कर पाने से आपके चरणों की सेवा में जो कमी रह गयी, उसे क्षमा करें, हे सबका उद्धार करने वाली कल्याणमयी जननी। कुपुत्र सम्भव है, पर माता की ममता को यहाँ अटल माना गया है। यहाँ त्रुटि के कारण अलग-अलग गिनाए हैं—अज्ञान, धनाभाव, आलस्य, असमर्थता। आर्थिक अभाव को नैतिक दोष मान लेना कविता का भाव नहीं है। ‘कुपुत्रो जायेत…’ का पुनरावृत्त वाक्य देवी की ममता के प्रति भरोसा है; इसे मनुष्यों पर अत्याचार सहते रहने का आदेश नहीं समझना चाहिए। यही पंक्ति तीसरे और चौथे पद में भी आती है और भाव को दृढ़ करती है।

श्लोक 3

अर्थ: हे जननी, संसार में आपके अनेक सरल-सहज पुत्र हैं, पर मैं उनमें अत्यन्त चंचल और अस्थिर पुत्र हूँ। हे शिवे, मुझे त्याग देना आपके अनुरूप नहीं होगा; कुपुत्र हो सकता है, पर माता की कृपा का भाव नहीं मिटता। विरलतरलः जैसा विशिष्ट पद बेचैन, डगमगाते या अस्थिर भक्त का चित्र बनाता है। यह किसी ऐतिहासिक लेखक की जीवनकथा का प्रमाण नहीं। भक्त दूसरों से श्रेष्ठ होने का दावा नहीं करता, बल्कि कहता है कि वह स्वयं सहजता से स्थिर नहीं रह पाता। ‘कुमाता न भवति’ की पुनरुक्ति इस अस्थिरता के बीच मातृकृपा की आशा को सामने लाती है।

श्लोक 4

अर्थ: हे जगन्माता, मैंने आपके चरणों की सेवा नहीं की और अधिक द्रव्य या भेंट भी नहीं चढ़ायी; फिर भी आप मुझ पर अतुलनीय स्नेह करती हैं। कुपुत्र हो सकता है, पर देवी-माता की करुणा बनी रहती है। इस पद में भक्ति को लेन-देन बनाने का विरोध दिखता है: अधिक चढ़ावे से ही माता का स्नेह मिलेगा, ऐसा नहीं कहा गया। ‘द्रविण’ धन या भौतिक साधन का शब्द है, जो दूसरे पद के धनाभाव की याद दिलाता है। इसका अर्थ कर्म, उत्तरदायित्व या दूसरों की सहायता छोड़ देना नहीं, बल्कि भेंट की मात्रा को प्रेम का एकमात्र पैमाना न मानना है।

श्लोक 5

अर्थ: अनेक प्रकार की देव-सेवाओं की उलझन में अन्य आराधनाओं से हटते हुए, जब आयु पचासी वर्ष से भी अधिक बीत गयी, तब मैं पूछता हूँ—हे लम्बोदर गणेश की जननी, यदि अब भी आपकी कृपा न मिले तो निराधार मैं किसकी शरण जाऊँ? १९१२ के मुद्रित पाठ में परित्यक्त्वा देवान् है, जबकि कई अन्य पाठों में परित्यक्ता देवाः मिलता है; इससे वाक्य का कर्तृत्व और अर्थ बदल सकते हैं। यहाँ पचासी वर्ष से अधिक आयु काव्य-वक्ता की स्थिति है, रचनाकार की जन्मतिथि या आयु का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। लम्बोदरजननि से गणेश की माता का बोध होता है। अन्तिम प्रश्न बुढ़ापे में सहारे और करुणा की चाह का है।

श्लोक 6

अर्थ: कवि आश्चर्य से कहता है कि समाज में तिरस्कृत व्यक्ति की वाणी मधु जैसी मधुर हो सकती है और निर्धन व्यक्ति निर्भय होकर अतुल सम्पदा के बीच रह सकता है। हे अपर्णा, आपके मन्त्र के एक अक्षर का भी श्रवण होने का फल कौन पूरी तरह जान सकता है? श्वपाक पुरानी सामाजिक व्यवस्था का अपमानसूचक शब्द है। उसे ऐतिहासिक पद के रूप में रखा गया है, किसी व्यक्ति की मर्यादा का माप मानकर नहीं। मधुर वाणी और असंख्य सोने की छवि स्तुतिकाव्य की अतिशयोक्ति है—धन मिलने की गारंटी नहीं। ‘मनुवर्ण’ में मन्त्र-अक्षर का संकेत है, पर यहाँ किसी दीक्षा-विशेष, जप-संख्या या गुप्त विधि का निर्देश नहीं दिया गया। अन्तिम वाक्य के व्याकरण की विद्वत् समीक्षा आवश्यक है।

श्लोक 7

अर्थ: चिताभस्म लगाए, विष से सम्बद्ध, दिशाओं को ही वस्त्र मानने वाले, जटाधारी, गले में सर्पराज धारण करने वाले, कपालधारी भूतनाथ पशुपति शिव जगदीश्वर कहलाते हैं। हे भवानी, कवि इस महिमा को आपसे उनके मिलन का फल बताता है। शिव की बाहरी छवि राजसी वैभव के विपरीत है—भस्म, जटा, सर्प, कपाल और दिगम्बर भाव। फिर भी वे जगदीश्वर हैं; इस विरोध से काव्य की शक्ति बनती है। पाणिग्रहण विवाह में हाथ ग्रहण करने का शब्द है और यहाँ शिव–शक्ति की एकता का प्रतीक है। विष सेवन, चिताभस्म या सर्प का उल्लेख अनुष्ठानिक नकल की अनुमति नहीं देता। इसे देवी-शिव सम्बन्ध की स्तुति के रूप में समझना चाहिए।

श्लोक 8

अर्थ: हे चन्द्रमुखी जननी, मुझे न मोक्ष की आकांक्षा है, न सांसारिक वैभव की; न विशेष ज्ञान की चाह, न सुख की लालसा। मेरी विनती केवल इतनी है कि ‘मृडानी, रुद्राणी, शिवे, भवानी’ का स्मरण करते हुए मेरा जन्म-जीवन बीते। १९१२ में इस पद की शुरुआत न मोक्षस्याकाङ्क्षा न च विभववाञ्छापि च न मे है; प्रचलित पाठ में भवविभववाञ्छापि च न मे मिलता है। दोनों को बिना बताए नहीं मिलाया गया है। कवि के लिए मोक्ष, सम्पत्ति, विशेष ज्ञान और सुख की प्राप्ति से अधिक मूल्यवान माता का स्मरण है। ‘मृडानी–रुद्राणी–शिवे–भवानी’ पाठ के भीतर देवीनाम हैं, किसी अनिवार्य जप-विधान की घोषणा नहीं।

श्लोक 9

अर्थ: अनेक उपचारों से विधिपूर्वक आपकी आराधना नहीं कर पाया; रूखे विचारों और वचनों से भी क्या अच्छा किया? हे श्यामा, मुझ असहाय पर यदि आप तनिक भी कृपा करें तो वह आपकी मातृकरुणा के ही अनुरूप है। लम्बे छन्दों के बाद प्रार्थना यहाँ संक्षिप्त हो जाती है। उपचार पूजा में अर्पित की जाने वाली सेवाएँ या वस्तुएँ हैं; कविता उनकी क्रमबद्ध विधि नहीं बताती। रूक्ष विचार और वाणी की बात से आचरण का प्रश्न खुलता है—केवल सामग्री न चढ़ा पाना नहीं, किसी से कठोर बोलना भी आत्मपरीक्षण का विषय है। दूसरी पंक्ति की वाक्यरचना का संस्कृत विशेषज्ञ से परीक्षण शेष है।

श्लोक 10

अर्थ: विपत्ति में डूबते समय मैं आपका स्मरण करता हूँ, हे करुणा-सागर दुर्गे। इसे मेरा छल न मानिए; भूख और प्यास से पीड़ित सन्तान अपनी माता को ही याद करती है। यह पद आम अनुभव से जुड़ता है: संकट आते ही मन सहायता के लिए पुकारता है। शठत्व छल या कुटिलता है; भक्त को संकोच है कि केवल कठिन समय में स्मरण कहीं स्वार्थ न लगे। भूखे-प्यासे बच्चे और माता का उदाहरण बताता है कि आवश्यकता की पुकार को तिरस्कार से न देखें। पुराने स्कैन की पहली पंक्ति धुँधली है, इसलिए वहाँ पुनर्पाठ की समीक्षा दर्ज है।

श्लोक 11

अर्थ: हे जगदम्बे, यदि मुझ पर आपकी करुणा पूर्ण है तो इसमें आश्चर्य ही क्या? अनेक अपराधों से घिरी सन्तान को भी माता उपेक्षित नहीं करती—यही इस पद का विश्वास है। १९१२ के मुद्रण में अपराधपरम्परावृतं है, पर अनेक दूसरे पाठों में अपराधपरम्परापरं मिलता है। यह केवल मात्रा का अन्तर नहीं, अर्थ बदलने वाला पाठभेद है। माता–सन्तान की छवि पश्चात्ताप के बाद सम्बन्ध सुधरने की आशा देती है; गलत कर्म का महत्व मिटा देने का बहाना नहीं। सघन मुद्रित अक्षरों की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है।

श्लोक 12

अर्थ: मेरे समान पाप करने वाला कोई नहीं, और आपके समान पाप का नाश करने वाली भी कोई नहीं, हे महादेवी। यह जानकर आप जैसा उचित समझें, वैसा करें। अन्तिम पद में अतिशयोक्ति से अपनी त्रुटि और देवी की पापनाशिनी महिमा साथ रखी गयी है। यथायोग्यं तथा कुरु का अर्थ है—आप जो उचित समझें, वही करें; यहाँ किसी निश्चित फल का दावा नहीं। ‘मैं सबसे बड़ा पापी’ काव्य-विनय है, पाठक के आत्म-मूल्य का नकार नहीं। इस क्षमायाचना में गलती मानना, पश्चात्ताप, कृपा की आशा और आचरण सुधारने की सम्भावना जुड़ी है।

  1. Bṛhatstotraratnākara (बृहत्स्तोत्ररत्नाकर), seventh printing · स्रोत खोलें
  2. Devī Aparādha Kṣamāpaṇa Stotram, SanskritDocuments volunteer digital text · स्रोत खोलें
  3. देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्, Ved Path, Gita Press print-based editorial reading · स्रोत खोलें
  4. Wikisource unproofread OCR for 1912 Bṛhatstotraratnākara leaves 171–172 · स्रोत खोलें
  5. देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्, Sanskrit Wikisource standalone article · स्रोत खोलें
  6. Devī Aparādha Kṣamāpaṇa Stotram, Drik Panchang reading · स्रोत खोलें