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स्तोत्र

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (अयि गिरिनन्दिनि) — २१ पदों का पाठ

दुर्गा के साहस, शक्ति, सौन्दर्य और करुणा का लयपूर्ण स्तोत्र—२१ पदों वाले एक चिह्नित पाठ के अनुसार।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

अयिगिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते गिरिवरविन्ध्य-शिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥

अर्थ

देवी को पर्वतराज की पुत्री, पृथ्वी को आनन्द देने वाली, पर्वतों में निवास करने वाली और देवताओं से स्तुत माता कहा गया है। वह शिव की सहचरी और महिषासुर का नाश करने वाली हैं।

व्याख्या

पहला पद देवी के अनेक नामों को एक साथ गूँथता है। विन्ध्य और हिमालय का स्मरण उनके व्यापक स्वरूप की ओर संकेत करता है। “शितिकण्ठ” शिव का विशेषण है। हर पद की ‘जय जय’ टेक युद्ध के साथ मातृत्व और कल्याण का भाव भी जोड़ती है.

2

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणी हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते । दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥

अर्थ

देवी तीनों लोकों का पालन करती हैं, शंकर को प्रिय हैं, पाप और घमण्ड दूर करती हैं और दानवी अहंकार का प्रतिकार करती हैं। “सिन्धुसुते” भी उनका एक सम्बोधन है।

व्याख्या

यह पद केवल युद्ध नहीं, संसार के पुनः पोषण की बात करता है। “सिन्धुसुते” का सम्बन्ध अलग पौराणिक नामपरम्पराओं से भी हो सकता है; इसे किसी एक जन्मकथा का निश्चयात्मक प्रमाण नहीं मानना चाहिए.

3

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते । मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ ३ ॥

अर्थ

जगदम्बा कदम्बवन में रमण करने वाली, हिमालय की चोटियों में प्रतिष्ठित और मधु-कैटभ का पराभव करने वाली कही गई हैं।

व्याख्या

वन, शिखर और मुस्कान की कोमल छवि के साथ दुष्टता के विनाश का स्वर जुड़ता है। मधु-कैटभ की कथा विभिन्न ग्रन्थों में भिन्न धार्मिक व्याख्याओं के साथ आती है; यहाँ मुख्य बात देवी के सामर्थ्य की काव्यात्मक स्तुति है.

4

अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपते रिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशुण्डमृगाधिपते । निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ ४ ॥

अर्थ

युद्ध में हाथियों, उनके योद्धाओं और सेनापतियों के प्रचण्ड बल पर देवी की विजय का चित्र है।

व्याख्या

हाथी, सिंह, सूँड़, अस्त्र और रणनायकों की सघन छवियाँ आती हैं। इस पद के कुछ समास अलग पाठों में बदलते हैं, इसलिए हर शब्द का निर्विवाद अर्थ अभी तय नहीं माना गया है.

5

अयि रणदुर्मदशत्रुवधोद्यतदुर्धरनिर्जरशक्तिभृते चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते । दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ ५ ॥

अर्थ

देवी उद्धत शत्रुओं से संघर्ष के लिए अविजेय शक्ति धारण करती हैं और शिव से जुड़े दूत-कार्य तथा दैवी सेनाओं का उल्लेख आता है।

व्याख्या

शाक्त कथा में शिव-दूत का चित्र देवी की स्वाधीन सामर्थ्य को व्यक्त करता है। यह सम्प्रदायों में श्रेष्ठता की लड़ाई नहीं, स्तुति की कथा-भाषा है.

6

अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभयदानकरे त्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिशिरोधिकृतामलशूलकरे । दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहो मुखरीकृततिग्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ ६ ॥

अर्थ

शरण चाहने वालों को देवी निर्भय करती हैं; विरोधी अत्याचार के सामने उनका त्रिशूल उठता है और देवताओं की दुन्दुभियाँ गूँजती हैं।

व्याख्या

पहले समास, विशेषकर ‘वैरिवधू’ से जुड़े अर्थ, में पाठभेद और व्याकरणगत प्रश्न हैं। इसे हिंसा का सामान्य आदेश नहीं मानना चाहिए। ‘दुमिदुमित’ ढोल की गूँज का शब्दचित्र है.

7

अयि निजहुङ्कृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशते समरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते । शिवशिवशुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ ७ ॥

अर्थ

देवी की एक हुँकार से धूम्रलोचन का बल मिटता है; फिर रक्तबीज, शुम्भ और निशुम्भ के संघर्ष याद किए जाते हैं।

व्याख्या

ये प्रसंग देवीमाहात्म्य की कथा-स्मृति जगाते हैं, किन्तु यह स्तोत्र उसी ग्रन्थ का कोई अध्याय नहीं है। रक्तबीज का बार-बार फैलता संकट देवी के निर्णायक सामर्थ्य को उभारता है.

8

धनुरनुसंगरणक्षणसंगपरिस्फुरदङ्गनटत्कटके कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गरसद्भटशृङ्गहताबटुके । कृतचतुरंगबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ ८ ॥

अर्थ

धनुष, तरकश, सेना और रणभूमि की गति से देवी का पराक्रम चित्रित होता है।

व्याख्या

शब्दों की दौड़ती लय ही इस पद का प्रमुख सौन्दर्य है। चतुरंग बल और युद्ध का दृश्य स्पष्ट है, पर कुछ दुर्लभ समासों का सूक्ष्म अर्थ विशेषज्ञ जाँच चाहता है.

9

सुरललना-ततथेयि-तथेयि-कृताभिनयोदर-नृत्यरते कृतकुकुथः कुकुथो गडदादिक-ताल-कुतूहल-गानरते । धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमितध्वनिधीरमृदङ्गनिनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ ९ ॥

अर्थ

देवांगनाओं के नृत्य, गीत, ताल और मृदंग की ध्वनि का उल्लासपूर्ण दृश्य खुलता है।

व्याख्या

‘ततथेयि’ और मृदंग से मिलती ध्वनियाँ अर्थ से अधिक लय के लिए हैं। इस पद में पाठभेद विशेष अधिक हैं; एक ही गायन-रूप को सब पाठों का मूल नहीं माना गया है.

10
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जय-जय-जप्य-जयेजयशब्द-परस्तुति-तत्परविश्वनुते झण-झण-झिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरसिंजितमोहित भूतपते । नटितनटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १० ॥

अर्थ

बार-बार ‘जय’ की पुकार, घुँघरुओं की झंकार और नट-नटी का नृत्य देवी की स्तुति बन जाता है।

व्याख्या

यहाँ नृत्य के अनेक शब्द मिलते हैं; शिव के नटराज रूप की हल्की अनुगूँज भी समझी जा सकती है। युद्ध की समाप्ति पर ध्वनि आनन्द का स्वर धारण करती है.

11

अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहरकांतियुते श्रितरजनी-रजनीरजनी-रजनीरजनीकर-वक्त्रवृते । सुनयनविभ्रमर-भ्रमरभ्रमर-भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ ११ ॥

अर्थ

फूल, रात्रि, चन्द्रमा, नेत्र और भौंरों के संकेतों से देवी की मनोहर छवि बनती है।

व्याख्या

एक ही ध्वनि की पुनरावृत्ति से कई अर्थों का खेल रचा गया है। कठिन समासों का निश्चित पदच्छेद बाकी है; भाव का केंद्र कोमल सौन्दर्य और प्रशंसा है.

12

सहितमहाहव-मल्लमतल्लिक-मल्लितरल्लक-मल्लरते विरचितवल्लिक-पल्लिकमल्लिक-भिल्लिकभिल्लिक-वर्गवृते । सित्कृत्पुल्लसमुल्लसितारुण-तल्लज-पल्लव-सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥

अर्थ

कभी युद्ध की क्रीड़ा, कभी लताएँ, मल्लिका-पुष्प और नवपल्लव—देवी के आसपास प्रकृति और उत्सव का दृश्य है।

व्याख्या

मल्ल, वल्ली, भिल्ल आदि ध्वनियाँ अर्थ और अनुप्रास को साथ ले चलती हैं। इन्हें आधुनिक समुदायों का प्रमाणित समाज-वर्णन नहीं बनाना चाहिए। इस श्लोक के कुछ शब्दों में पाठभेद और अर्थ की अनिश्चितता है।

13

अविरलगण्ड-गलन्मदमेदुर-मत्तमत्तंगज-राजपते त्रिभिवनभूषणभूत-कलानिधि-रूपपयोनिधि-राजसुते । अयि सुदतीजन-लालसमानस-मोहनमन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥

अर्थ

मत्त गजराज, चन्द्रकला, सागर और सौन्दर्य से देवी की गरिमा प्रकट की जाती है।

व्याख्या

यह राजकीय काव्य में प्रचलित उपमानों की शैली है। दूसरे चरण में ‘त्रिभिवन’ पाठ सम्भावित लिपिकीय दोष है; उसे चुपचाप बदलने के बजाय जाँच के लिए दर्ज किया गया है.

14

कमलदलामल-कोमलकान्ति-कला-कलितामल-भाललते सकलविलास-कलानिलयक्रम-केलिचलत्कल-हंसकुले । अलिकुलसङ्कुल-कुवलयमण्डल-मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥

अर्थ

कमल जैसी कोमल ललाट-कान्ति, कलहंस, भौंरे और बकुल के फूलों से देवी का सौन्दर्य वर्णित है।

व्याख्या

युद्ध की तीव्रता से पाठ अब उद्यान की शान्त छवियों की ओर जाता है। तीसरे चरण के समास दूसरे पाठों में बदलते हैं; पाठानुसार अर्थ का सूक्ष्म अन्तर सम्भव है.

15

करमुरलीरव-वीजितकूजित-लज्जितकोकिल-मञ्जुमते मिलितपुलिन्द-मनोहरगुंजित-रंजितशैल-निकुञ्जगते । निजगुणभूत-महाशबरीगण-सद्गुणसम्भृत-केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥

अर्थ

कोयल, मुरली की धुन, भौंरों की गूँज और पर्वतीय निकुञ्ज देवी की लीला से भरते हैं।

व्याख्या

इस पद में पुलिन्द/मिलिन्द तथा अन्तिम चरण के भेद विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। ‘शबरी’ जैसे उल्लेख को वर्तमान समुदायों की रूढ़ छवि में नहीं बदलना चाहिए.

16

कटितटपीत-दुकूलविचित्र-मयूखतिरस्कृत-चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर-मौलिमणिस्फुरदंशुल-सन्नख-चन्द्ररुचे । जितकनकाचल-मौलिपदोर्जित-निर्भरकुंजर-कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥

अर्थ

स्वर्णाभ वस्त्र, चन्द्रमा-सी आभा, प्रणाम करते देव-असुरों के मुकुटों के रत्न देवी की ज्योति का वर्णन करते हैं।

व्याख्या

तीसरे चरण में हाथी से सम्बन्धित शास्त्रीय काव्योपमा भी आती है। उसे हटाने या आधुनिक शारीरिक मानदण्ड बनाने के बजाय काव्य-परम्परा में समझना उचित है। चन्द्र/चण्ड तथा अन्य पाठभेद दर्ज हैं.

17

विजितसहस्र-करैक-सहस्र-करैक-सहस्र-करैकनुते कृतसुरतारक-सङ्गरतारक-सङ्गरतारक-सुनूसुते । सुरथसमाधि-समानसमाधि-समाधि-समाधि-सुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥

अर्थ

हजारों की पुनरावृत्ति वाले समास, तारक-संग्राम और सुरथ तथा समाधि के नाम देवी की स्तुति में आते हैं।

व्याख्या

सुरथ और समाधि देवीमाहात्म्य की आरम्भिक कथा से पहचाने जाते हैं। यहाँ ध्वनियों के खेल और समासों के कारण निश्चित व्याकरण और कथा-संबंध की विशेषज्ञ समीक्षा आवश्यक है.

18

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योनुदिनम् स शिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् । तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

अर्थ

जो देवी के कमल-चरणों की सेवा करता है वह कल्याण और उच्च आश्रय की याचना करता है; भक्त पूछता है कि ऐसी शरण में क्या असम्भव है।

व्याख्या

‘कमल’ में पुष्प और लक्ष्मी से जुड़ी अर्थछाया हो सकती है। समृद्धि का संकेत भक्ति-विश्वास है, धन की सुनिश्चित प्राप्ति का वैज्ञानिक दावा नहीं। यहाँ स्वर व्यक्तिगत प्रार्थना की ओर मुड़ता है.

19

कनकलसत्कलसिन्धु-जलैरनु-सिञ्चिनुते गुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भ-सुखानुभवम् । तवचरणं शरणङ्करवाणि नतामरवाणिनिवासिशिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥

अर्थ

स्वर्णपात्र, समुद्रजल और देवी-पूजा की भव्य छवि आती है; उसके बाद कवि उनके चरणों की शरण माँगता है।

व्याख्या

इन्द्राणी शची से जुड़ी भोग-संबंधी उपमा शास्त्रीय अतिशयोक्ति है, कोई सुनिश्चित फल या अनुकरणीय विधि नहीं। तीसरे चरण का पाठ भी कठिन है, इसलिए भावार्थ सीमित रखा गया है.

20
विषय-सूची पर लौटें

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननुकूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु-मुखी-सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते । मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥

अर्थ

देवी के चन्द्रमा जैसे मुख की छवि से भक्त सांसारिक आकर्षण और शिवनाम के धन की ओर विचार मोड़ता है।

व्याख्या

इन्द्रपुरी और चन्द्रमुखी से जुड़े पहले दो चरणों का अर्थ बहुविकल्पी है। ‘किमुत’ तथा ‘किमु न’ से प्रश्न का ढंग बदलता है; कृपा का वर्णन भक्तिभाव है, जाँच योग्य लाभ की गारंटी नहीं.

21

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते । यदुचितमत्र भवत्युररी-कुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्य कपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥

अर्थ

अन्त में भक्त जगज्जननी उमा से दया और अपने क्लेश से राहत माँगता है।

व्याख्या

युद्ध-वर्णन अब सीधे माँ को पुकारने वाली विनय में बदल जाता है। ‘उररी’ से बने कठिन समास और अन्तिम चरण के पाठ की जाँच आवश्यक है; इसे कष्ट हर हाल में मिटने का वादा नहीं समझना चाहिए.

22

स्तुतिमिमां स्तिमितः सुसमाधिना नियमतो यमतोनुदिनं पठेत् । परमया रमया स निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥

अर्थ

समापन पद में संयत मन से नियमित स्तुति-पाठ की प्रशंसा की गई है और मान-सम्मान तथा शुभफल की आशा व्यक्त होती है।

व्याख्या

यह फलश्रुति है—परम्परागत भक्ति-विश्वास का कथन, किसी सामाजिक या आर्थिक परिणाम की गारंटी नहीं। यह २१ मुख्य पदों से अलग है और तीस श्लोक वाले पाठ में इसका रूप भिन्न मिलता है।

23
विषय-सूची पर लौटें

॥ हरिः ॐ तत्सत् महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रं हरिः ॐ तत्सत् ॥

अर्थ

पाठ की समाप्ति पर नाम तथा मंगल-स्मरण देने वाला समापन-वाक्य।

व्याख्या

यह ऑनलाइन संस्करण का समाप्ति-सूचक वाक्य है; इससे तीस-पदीय रचना की सीमा या शंकराचार्य का लेखकत्व सिद्ध नहीं होता।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-निर्धारण: इस संस्करण में प्रचलित ‘अयि गिरिनन्दिनि’ के २१ मुख्य पद, फिर अलग फलश्रुति तथा ऑनलाइन समाप्ति-वाक्य हैं। आधार संस्कृत विकिस्रोत का oldid=418763 संस्करण है 1। पंक्ति-विभाजन और विराम-चिह्न पढ़ने की सुविधा से सँवारे गए हैं; शंकास्पद शब्दरूप मूल ऑनलाइन पाठ के अनुसार रखे हैं। यह किसी पुराने मुद्रित पृष्ठ से अक्षरशः मिलान किया हुआ आलोचनात्मक संस्करण नहीं है। तीस श्लोकों वाली भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि अलग पाठ-सीमा है 23।

हर पाठ-इकाई का अर्थ एवं व्याख्या

ये अर्थ और व्याख्याएँ शिवगोरक्ष हेतु नया संपादकीय लेखन हैं; अन्य साइट का अनुवाद नहीं। कुछ कठिन समासों के अर्थ अनिश्चित हैं। 1

फलश्रुति · phalashruti-001

सरल अर्थ: समापन पद में संयत मन से नियमित स्तुति-पाठ की प्रशंसा की गई है और मान-सम्मान तथा शुभफल की आशा व्यक्त होती है। व्याख्या: यह फलश्रुति है—परम्परागत भक्ति-विश्वास का कथन, किसी सामाजिक या आर्थिक परिणाम की गारंटी नहीं। यह २१ मुख्य पदों से अलग है और तीस श्लोक वाले पाठ में इसका रूप भिन्न मिलता है। पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

समाप्ति-वाक्य

सरल अर्थ: पाठ की समाप्ति पर नाम तथा मंगल-स्मरण देने वाला समापन-वाक्य। व्याख्या: यह ऑनलाइन संस्करण का समाप्ति-सूचक वाक्य है; इससे तीस-पदीय रचना की सीमा या शंकराचार्य का लेखकत्व सिद्ध नहीं होता। 1

स्तोत्र का स्वरूप और क्रम

महिषासुरमर्दिनी अर्थात् महिषासुर को परास्त करने वाली देवी। ‘अयि गिरिनन्दिनि’ में कवि पर्वतपुत्री को सीधे पुकारता है। हर पद में अनेक विशेषण आते हैं और अन्त में विजय की एक ही टेक दोहराई जाती है। बहुत-से समासों में शब्दों का अर्थ जितना महत्त्वपूर्ण है, उतनी ही उनकी लय और अनुप्रास भी। आरम्भ में देवी का पर्वतीय और मातृरूप (१–३), आगे युद्ध और रणध्वनि (४–८), फिर नृत्य, संगीत और सौन्दर्य (९–१७), तथा अन्त में भक्त की शरणागति और करुणा की प्रार्थना (१८–२१) आती है। अलग फलश्रुति को मुख्य इक्कीस पदों में नहीं गिना गया है। असुर-वध के दृश्य पौराणिक काव्य हैं; वे सामान्य जीवन में हिंसा का आदेश या चमत्कारी फल की निश्चित गारंटी नहीं हैं।

देवीमाहात्म्य से सम्बन्ध

धूम्रलोचन, रक्तबीज, शुम्भ और निशुम्भ के प्रसंग देवीमाहात्म्य की घटनाओं का स्मरण दिलाते हैं, लेकिन यह स्तोत्र देवीमाहात्म्य का अध्याय नहीं है। शिवगोरक्ष के तैयार शास्त्रीय पाठ से श्लोक-स्तर पर सम्बन्ध तभी जोड़ा जाएगा जब उसी संस्करण के अध्याय और श्लोक पहचान सत्यापित हों।

रचयिता कौन हैं? लोकप्रिय परम्परा में इसकी रचना प्रायः आदि शंकराचार्य के नाम से कही जाती है, पर इस विशेष स्तोत्र के लिए निर्णायक आरम्भिक प्रमाण यहाँ प्राप्त नहीं हुआ। तीस-श्लोकी भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि के अन्तिम भाग में रामकृष्ण कवि का नाम मिलता है; वेलकम संग्रह का १८९६ के प्रथम संस्करण का विवरण भी रामकृष्ण को लेखक के रूप में दर्ज करता है 23। संस्कृतडॉक्यूमेंट्स की संख्या के अनुसार लोकप्रिय इक्कीस पद बड़े पाठ के ७–२७ पदों के अनुरूप हैं। इस सम्बन्ध से हर आधुनिक पाठ का अक्षरशः एक ही रचयिता द्वारा लिखा जाना स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता।

पाठभेद, संस्करण और अधिकार

  1. इस संस्करण का आधार: संस्कृत विकिस्रोत पर उपलब्ध इक्कीस पदों का निश्चित डिजिटल संशोधन 418763 1। यह किसी प्रमाणित प्राचीन मूल पाण्डुलिपि का दावा नहीं करता।
  2. पुराने साक्ष्य: १८९६ की पुस्तक का वेलकम सूची-विवरण देखा गया, उसके सम्पूर्ण पृष्ठ-चित्र नहीं; १९१२ के संग्रह का सूचकांक मिला, किन्तु सम्बन्धित पंक्तियों का मिलान नहीं हुआ 35।
  3. दूसरा डिजिटल पाठ: संस्कृतडॉक्यूमेंट्स ने अपने स्वयंसेवी पाठ का वेबसाइट पर पुनर्प्रकाशन अनुमति बिना न करने की सूचना दी है। उसे यहाँ तुलना हेतु पढ़ा गया है, न कि मूल पाठ के पुनःप्रकाशन-स्रोत के रूप में 2।
  4. महत्त्वपूर्ण अंतर: छठे और नौवें पद की ध्वनियाँ कई पाठों में बदलती हैं; तेरहवें में चुने पाठ का ‘त्रिभिवन’ अपेक्षित ‘त्रिभुवन’ से अलग है; पन्द्रहवें में ‘पुलिन्द’ के स्थान पर कुछ पाठों में ‘मिलिन्द’ है; इक्कीसवें पद का अन्तिम समास कठिन है। विवरण स्रोत-सूची में हैं; इन्हें चुपचाप सुधारा नहीं गया।
  5. पाठ-अधिकार: विकिस्रोत का फ़ुटर CC BY-SA लाइसेंस बताता है। उपयुक्त श्रेय, परिवर्तन-सूचना और शेयर-अलाइक शर्तों के वास्तविक अनुप्रयोग की विधिक समीक्षा बाकी है। मूल कविता, आधुनिक लिप्यन्तरण और अनुवादों के अधिकार अलग प्रश्न हैं।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं? यहाँ २१ मुख्य पद, उसके अतिरिक्त एक फलश्रुति और एक समाप्ति-वाक्य हैं। विस्तृत भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि के ३० श्लोक अलग पाठ-सीमा हैं 12। क्या यह दुर्गासप्तशती का श्लोक है? नहीं। दोनों में देवी की कुछ कथाएँ समान हैं, किन्तु यह स्तोत्र स्वतंत्र रचना की परम्परा में मिलता है। ‘जय जय’ का आशय क्या है? पर्वतकन्या और महिषासुर-विनाशिनी देवी की जय तथा स्तुति; यही टेक विविध पदों को एक सूत्र देती है। क्या सभी गायकों के लिए यही एकमात्र मूल पाठ है? नहीं। यह एक चिह्नित डिजिटल पाठ-परम्परा है। विशेष शब्द और दूसरे पाठों के भेद जाँच हेतु दर्ज हैं। क्या पाठ के लिए कोई विशेष मुहूर्त आवश्यक है? इस लेख में कोई अनिवार्य समय या अनुष्ठान निर्धारित नहीं किया गया है। नवरात्रि जैसे पर्व सांस्कृतिक संदर्भ हैं; तिथि और विधि अलग समीक्षा के विषय हैं। क्या फलश्रुति की फल-प्राप्ति सुनिश्चित है? नहीं। वह भक्ति की आशा है, चिकित्सकीय या आर्थिक भविष्यवाणी नहीं।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Wikimedia contributors. Based on महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (21 verses, phalaśruti and closing formula). Original words, new Roman rendering and derivative meanings: CC BY-SA 4.0. Script conversion, punctuation, Romanization and any declared editorial lyric changes are adaptations; no independent textual certification.

पाठ का लाइसेंस

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    ayigirinandini nanditamedini viśvavinodini nandanute girivaravindhya-śirodhinivāsini viṣṇuvilāsini jiṣṇunute | bhagavati he śitikaṇṭhakuṭumbini bhūrikuṭumbini bhūrikṛte jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 1 ||

  2. 2

    suravaravarṣiṇi durdharadharṣiṇi durmukhamarṣiṇī harṣarate tribhuvanapoṣiṇi śaṃkaratoṣiṇi kilbiṣamoṣiṇi ghoṣarate | danujaniroṣiṇi ditisutaroṣiṇi durmadaśoṣiṇi sindhusute jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 2 ||

  3. 3

    ayi jagadamba madamba kadambavanapriyavāsini hāsarate śikhariśiromaṇi tuṅgahimālayaśṛṅganijālayamadhyagate | madhumadhure madhukaiṭabhagañjini kaiṭabhabhañjini rāsarate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 3 ||

  4. 4

    ayi śatakhaṇḍavikhaṇḍitaruṇḍavituṇḍitaśuṇḍagajādhipate ripugajagaṇḍavidāraṇacaṇḍaparākramaśuṇḍamṛgādhipate | nijabhujadaṇḍanipātitakhaṇḍavipātitamuṇḍabhaṭādhipate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 4 ||

  5. 5

    ayi raṇadurmadaśatruvadhodyatadurdharanirjaraśaktibhṛte caturavicāradhurīṇamahāśivadūtakṛtapramathādhipate | duritadurīhadurāśayadurmatidānavadūtakṛtāntamate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 5 ||

  6. 6

    ayi śaraṇāgatavairivadhūvaravīravarābhayadānakare tribhuvanamastakaśūlavirodhiśirodhikṛtāmalaśūlakare | dumidumitāmaradundubhinādamaho mukharīkṛtatigmakare jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 6 ||

  7. 7

    ayi nijahuṅkṛtimātranirākṛtadhūmravilocanadhūmraśate samaraviśoṣitaśoṇitabījasamudbhavaśoṇitabījalate | śivaśivaśumbhaniśumbhamahāhavatarpitabhūtapiśācarate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 7 ||

  8. 8

    dhanuranusaṃgaraṇakṣaṇasaṃgaparisphuradaṅganaṭatkaṭake kanakapiśaṅgapṛṣatkaniṣaṅgarasadbhaṭaśṛṅgahatābaṭuke | kṛtacaturaṃgabalakṣitiraṅgaghaṭadbahuraṅgaraṭadbaṭuke jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 8 ||

  9. 9

    suralalanā-tatatheyi-tatheyi-kṛtābhinayodara-nṛtyarate kṛtakukuthaḥ kukutho gaḍadādika-tāla-kutūhala-gānarate | dhudhukuṭa dhukkuṭa dhiṃdhimitadhvanidhīramṛdaṅganinādarate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramyakapardini śailasute || 9 ||

  10. 10

    jaya-jaya-japya-jayejayaśabda-parastuti-tatparaviśvanute jhaṇa-jhaṇa-jhiñjhimi jhiṅkṛta nūpurasiṃjitamohita bhūtapate | naṭitanaṭārdha naṭī naṭa nāyaka nāṭitanāṭya sugānarate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 10 ||

  11. 11

    ayi sumanaḥ sumanaḥ sumanaḥ sumanaḥ sumanoharakāṃtiyute śritarajanī-rajanīrajanī-rajanīrajanīkara-vaktravṛte | sunayanavibhramara-bhramarabhramara-bhramarabhramarādhipate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 11 ||

  12. 12

    sahitamahāhava-mallamatallika-mallitarallaka-mallarate viracitavallika-pallikamallika-bhillikabhillika-vargavṛte | sitkṛtpullasamullasitāruṇa-tallaja-pallava-sallalite jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 12 ||

  13. 13

    aviralagaṇḍa-galanmadamedura-mattamattaṃgaja-rājapate tribhivanabhūṣaṇabhūta-kalānidhi-rūpapayonidhi-rājasute | ayi sudatījana-lālasamānasa-mohanamanmatharājasute jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 13 ||

  14. 14

    kamaladalāmala-komalakānti-kalā-kalitāmala-bhālalate sakalavilāsa-kalānilayakrama-kelicalatkala-haṃsakule | alikulasaṅkula-kuvalayamaṇḍala-maulimiladbakulālikule jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 14 ||

  15. 15

    karamuralīrava-vījitakūjita-lajjitakokila-mañjumate militapulinda-manoharaguṃjita-raṃjitaśaila-nikuñjagate | nijaguṇabhūta-mahāśabarīgaṇa-sadguṇasambhṛta-kelitale jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 15 ||

  16. 16

    kaṭitaṭapīta-dukūlavicitra-mayūkhatiraskṛta-candraruce praṇatasurāsura-maulimaṇisphuradaṃśula-sannakha-candraruce | jitakanakācala-maulipadorjita-nirbharakuṃjara-kumbhakuce jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 16 ||

  17. 17

    vijitasahasra-karaika-sahasra-karaika-sahasra-karaikanute kṛtasuratāraka-saṅgaratāraka-saṅgaratāraka-sunūsute | surathasamādhi-samānasamādhi-samādhi-samādhi-sujātarate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 17 ||

  18. 18

    padakamalaṃ karuṇānilaye varivasyati yonudinam sa śive ayi kamale kamalānilaye kamalānilayaḥ sa kathaṃ na bhavet | tava padameva parampadamityanuśīlayato mama kiṃ na śive jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 18 ||

  19. 19

    kanakalasatkalasindhu-jalairanu-siñcinute guṇaraṅgabhuvam bhajati sa kiṃ na śacīkucakumbhataṭīparirambha-sukhānubhavam | tavacaraṇaṃ śaraṇaṅkaravāṇi natāmaravāṇinivāsiśivam jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 19 ||

  20. 20

    tava vimalendukulaṃ vadanendumalaṃ sakalaṃ nanukūlayate kimu puruhūtapurīndu-mukhī-sumukhībhirasau vimukhīkriyate | mama tu mataṃ śivanāmadhane bhavatī kṛpayā kimuta kriyate jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 20 ||

  21. 21

    ayi mayi dīna dayālutayā kṛpayaiva tvayā bhavitavyamume ayi jagato jananī kṛpayāsi yathāsi tathānumitāsirate | yaducitamatra bhavatyurarī-kurutādurutāpamapākurute jaya jaya he mahiṣāsuramardini ramya kapardini śailasute || 21 ||

  22. 22

    stutimimāṃ stimitaḥ susamādhinā niyamato yamatonudinaṃ paṭhet | paramayā ramayā sa niṣevyate parijano'rijano'pi ca taṃ bhajet ||

  23. 23

    || hariḥ oṃ tatsat mahiṣāsuramardinistotraṃ hariḥ oṃ tatsat ||

पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

पद 1 · shloka-001

सरल अर्थ: देवी को पर्वतराज की पुत्री, पृथ्वी को आनन्द देने वाली, पर्वतों में निवास करने वाली और देवताओं से स्तुत माता कहा गया है। वह शिव की सहचरी और महिषासुर का नाश करने वाली हैं। व्याख्या: पहला पद देवी के अनेक नामों को एक साथ गूँथता है। विन्ध्य और हिमालय का स्मरण उनके व्यापक स्वरूप की ओर संकेत करता है। “शितिकण्ठ” शिव का विशेषण है। हर पद की ‘जय जय’ टेक युद्ध के साथ मातृत्व और कल्याण का भाव भी जोड़ती है. 1

पद 2 · shloka-002

सरल अर्थ: देवी तीनों लोकों का पालन करती हैं, शंकर को प्रिय हैं, पाप और घमण्ड दूर करती हैं और दानवी अहंकार का प्रतिकार करती हैं। “सिन्धुसुते” भी उनका एक सम्बोधन है। व्याख्या: यह पद केवल युद्ध नहीं, संसार के पुनः पोषण की बात करता है। “सिन्धुसुते” का सम्बन्ध अलग पौराणिक नामपरम्पराओं से भी हो सकता है; इसे किसी एक जन्मकथा का निश्चयात्मक प्रमाण नहीं मानना चाहिए. 1

पद 3 · shloka-003

सरल अर्थ: जगदम्बा कदम्बवन में रमण करने वाली, हिमालय की चोटियों में प्रतिष्ठित और मधु-कैटभ का पराभव करने वाली कही गई हैं। व्याख्या: वन, शिखर और मुस्कान की कोमल छवि के साथ दुष्टता के विनाश का स्वर जुड़ता है। मधु-कैटभ की कथा विभिन्न ग्रन्थों में भिन्न धार्मिक व्याख्याओं के साथ आती है; यहाँ मुख्य बात देवी के सामर्थ्य की काव्यात्मक स्तुति है. 1

पद 4 · shloka-004

सरल अर्थ: युद्ध में हाथियों, उनके योद्धाओं और सेनापतियों के प्रचण्ड बल पर देवी की विजय का चित्र है। व्याख्या: हाथी, सिंह, सूँड़, अस्त्र और रणनायकों की सघन छवियाँ आती हैं। इस पद के कुछ समास अलग पाठों में बदलते हैं, इसलिए हर शब्द का निर्विवाद अर्थ अभी तय नहीं माना गया है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 5 · shloka-005

सरल अर्थ: देवी उद्धत शत्रुओं से संघर्ष के लिए अविजेय शक्ति धारण करती हैं और शिव से जुड़े दूत-कार्य तथा दैवी सेनाओं का उल्लेख आता है। व्याख्या: शाक्त कथा में शिव-दूत का चित्र देवी की स्वाधीन सामर्थ्य को व्यक्त करता है। यह सम्प्रदायों में श्रेष्ठता की लड़ाई नहीं, स्तुति की कथा-भाषा है. 1

पद 6 · shloka-006

सरल अर्थ: शरण चाहने वालों को देवी निर्भय करती हैं; विरोधी अत्याचार के सामने उनका त्रिशूल उठता है और देवताओं की दुन्दुभियाँ गूँजती हैं। व्याख्या: पहले समास, विशेषकर ‘वैरिवधू’ से जुड़े अर्थ, में पाठभेद और व्याकरणगत प्रश्न हैं। इसे हिंसा का सामान्य आदेश नहीं मानना चाहिए। ‘दुमिदुमित’ ढोल की गूँज का शब्दचित्र है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 7 · shloka-007

सरल अर्थ: देवी की एक हुँकार से धूम्रलोचन का बल मिटता है; फिर रक्तबीज, शुम्भ और निशुम्भ के संघर्ष याद किए जाते हैं। व्याख्या: ये प्रसंग देवीमाहात्म्य की कथा-स्मृति जगाते हैं, किन्तु यह स्तोत्र उसी ग्रन्थ का कोई अध्याय नहीं है। रक्तबीज का बार-बार फैलता संकट देवी के निर्णायक सामर्थ्य को उभारता है. 1

पद 8 · shloka-008

सरल अर्थ: धनुष, तरकश, सेना और रणभूमि की गति से देवी का पराक्रम चित्रित होता है। व्याख्या: शब्दों की दौड़ती लय ही इस पद का प्रमुख सौन्दर्य है। चतुरंग बल और युद्ध का दृश्य स्पष्ट है, पर कुछ दुर्लभ समासों का सूक्ष्म अर्थ विशेषज्ञ जाँच चाहता है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 9 · shloka-009

सरल अर्थ: देवांगनाओं के नृत्य, गीत, ताल और मृदंग की ध्वनि का उल्लासपूर्ण दृश्य खुलता है। व्याख्या: ‘ततथेयि’ और मृदंग से मिलती ध्वनियाँ अर्थ से अधिक लय के लिए हैं। इस पद में पाठभेद विशेष अधिक हैं; एक ही गायन-रूप को सब पाठों का मूल नहीं माना गया है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 10 · shloka-010

सरल अर्थ: बार-बार ‘जय’ की पुकार, घुँघरुओं की झंकार और नट-नटी का नृत्य देवी की स्तुति बन जाता है। व्याख्या: यहाँ नृत्य के अनेक शब्द मिलते हैं; शिव के नटराज रूप की हल्की अनुगूँज भी समझी जा सकती है। युद्ध की समाप्ति पर ध्वनि आनन्द का स्वर धारण करती है. 1

पद 11 · shloka-011

सरल अर्थ: फूल, रात्रि, चन्द्रमा, नेत्र और भौंरों के संकेतों से देवी की मनोहर छवि बनती है। व्याख्या: एक ही ध्वनि की पुनरावृत्ति से कई अर्थों का खेल रचा गया है। कठिन समासों का निश्चित पदच्छेद बाकी है; भाव का केंद्र कोमल सौन्दर्य और प्रशंसा है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 12 · shloka-012

सरल अर्थ: कभी युद्ध की क्रीड़ा, कभी लताएँ, मल्लिका-पुष्प और नवपल्लव—देवी के आसपास प्रकृति और उत्सव का दृश्य है। व्याख्या: मल्ल, वल्ली, भिल्ल आदि ध्वनियाँ अर्थ और अनुप्रास को साथ ले चलती हैं। इन्हें आधुनिक समुदायों का प्रमाणित समाज-वर्णन नहीं बनाना चाहिए। इस श्लोक के कुछ शब्दों में पाठभेद और अर्थ की अनिश्चितता है। पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 13 · shloka-013

सरल अर्थ: मत्त गजराज, चन्द्रकला, सागर और सौन्दर्य से देवी की गरिमा प्रकट की जाती है। व्याख्या: यह राजकीय काव्य में प्रचलित उपमानों की शैली है। दूसरे चरण में ‘त्रिभिवन’ पाठ सम्भावित लिपिकीय दोष है; उसे चुपचाप बदलने के बजाय जाँच के लिए दर्ज किया गया है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 14 · shloka-014

सरल अर्थ: कमल जैसी कोमल ललाट-कान्ति, कलहंस, भौंरे और बकुल के फूलों से देवी का सौन्दर्य वर्णित है। व्याख्या: युद्ध की तीव्रता से पाठ अब उद्यान की शान्त छवियों की ओर जाता है। तीसरे चरण के समास दूसरे पाठों में बदलते हैं; पाठानुसार अर्थ का सूक्ष्म अन्तर सम्भव है. 1

पद 15 · shloka-015

सरल अर्थ: कोयल, मुरली की धुन, भौंरों की गूँज और पर्वतीय निकुञ्ज देवी की लीला से भरते हैं। व्याख्या: इस पद में पुलिन्द/मिलिन्द तथा अन्तिम चरण के भेद विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। ‘शबरी’ जैसे उल्लेख को वर्तमान समुदायों की रूढ़ छवि में नहीं बदलना चाहिए. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 16 · shloka-016

सरल अर्थ: स्वर्णाभ वस्त्र, चन्द्रमा-सी आभा, प्रणाम करते देव-असुरों के मुकुटों के रत्न देवी की ज्योति का वर्णन करते हैं। व्याख्या: तीसरे चरण में हाथी से सम्बन्धित शास्त्रीय काव्योपमा भी आती है। उसे हटाने या आधुनिक शारीरिक मानदण्ड बनाने के बजाय काव्य-परम्परा में समझना उचित है। चन्द्र/चण्ड तथा अन्य पाठभेद दर्ज हैं. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 17 · shloka-017

सरल अर्थ: हजारों की पुनरावृत्ति वाले समास, तारक-संग्राम और सुरथ तथा समाधि के नाम देवी की स्तुति में आते हैं। व्याख्या: सुरथ और समाधि देवीमाहात्म्य की आरम्भिक कथा से पहचाने जाते हैं। यहाँ ध्वनियों के खेल और समासों के कारण निश्चित व्याकरण और कथा-संबंध की विशेषज्ञ समीक्षा आवश्यक है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 18 · shloka-018

सरल अर्थ: जो देवी के कमल-चरणों की सेवा करता है वह कल्याण और उच्च आश्रय की याचना करता है; भक्त पूछता है कि ऐसी शरण में क्या असम्भव है। व्याख्या: ‘कमल’ में पुष्प और लक्ष्मी से जुड़ी अर्थछाया हो सकती है। समृद्धि का संकेत भक्ति-विश्वास है, धन की सुनिश्चित प्राप्ति का वैज्ञानिक दावा नहीं। यहाँ स्वर व्यक्तिगत प्रार्थना की ओर मुड़ता है. 1

पद 19 · shloka-019

सरल अर्थ: स्वर्णपात्र, समुद्रजल और देवी-पूजा की भव्य छवि आती है; उसके बाद कवि उनके चरणों की शरण माँगता है। व्याख्या: इन्द्राणी शची से जुड़ी भोग-संबंधी उपमा शास्त्रीय अतिशयोक्ति है, कोई सुनिश्चित फल या अनुकरणीय विधि नहीं। तीसरे चरण का पाठ भी कठिन है, इसलिए भावार्थ सीमित रखा गया है. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 20 · shloka-020

सरल अर्थ: देवी के चन्द्रमा जैसे मुख की छवि से भक्त सांसारिक आकर्षण और शिवनाम के धन की ओर विचार मोड़ता है। व्याख्या: इन्द्रपुरी और चन्द्रमुखी से जुड़े पहले दो चरणों का अर्थ बहुविकल्पी है। ‘किमुत’ तथा ‘किमु न’ से प्रश्न का ढंग बदलता है; कृपा का वर्णन भक्तिभाव है, जाँच योग्य लाभ की गारंटी नहीं. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

पद 21 · shloka-021

सरल अर्थ: अन्त में भक्त जगज्जननी उमा से दया और अपने क्लेश से राहत माँगता है। व्याख्या: युद्ध-वर्णन अब सीधे माँ को पुकारने वाली विनय में बदल जाता है। ‘उररी’ से बने कठिन समास और अन्तिम चरण के पाठ की जाँच आवश्यक है; इसे कष्ट हर हाल में मिटने का वादा नहीं समझना चाहिए. पाठ-सावधानी: इस पद में शंकास्पद या भिन्न डिजिटल पाठ हैं। 12

  1. महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (21 verses, phalaśruti and closing formula) · स्रोत खोलें
  2. Bhagavatīpadya-puṣpāñjalīstotram / Mahiṣāsuramardinīstotram · स्रोत खोलें
  3. ŚrīBhagavatī puśapāṃjalī [sic] stotram, first edition (Samvat 1953 / 1896) · स्रोत खोलें
  4. मूल पाठ — महिषासुरमर्दिनीस्तोत्रम् (Dr Kiran Bhatia) · स्रोत खोलें
  5. बृहत्स्तोत्ररत्नाकर 1912 — bibliographical file entry · स्रोत खोलें
  6. Mahishasura Mardini Stotra (modern comparative description) · स्रोत खोलें