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स्तोत्र

निर्वाणषट्कम् (आत्मषट्कम्) — छह श्लोकों का अद्वैत पाठ

अद्वैत में चैतन्य और आत्मपहचान को समझाने वाले छह श्लोक, पुराने मुद्रित स्रोत पर आधारित।

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पाठ, अर्थ और व्याख्या

1

मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ १ ॥

अर्थ

मैं मन, बुद्धि, अहंकार या चित्त की बदलती वृत्तियाँ नहीं हूँ। कान, जिह्वा, नाक और आँखों से भी मेरा वास्तविक स्वरूप सीमित नहीं है; न मैं आकाश, पृथ्वी, अग्नि या वायु हूँ। मेरा मूल स्वरूप चैतन्य और आनन्द है—शिवोऽहम्।

व्याख्या

आरम्भ का निषेध शरीर या मन के अस्तित्व को नकारना नहीं है। मन अनुभवों को ग्रहण करता है, बुद्धि विवेक करती है, अहंकार उन्हें ‘मेरे’ होने का रंग देता है और चित्त में संस्कार-स्मृतियाँ एवं अन्य मानसिक वृत्तियाँ आती हैं। ये सब देखे और बदले जा सकने वाले अनुभव हैं; स्तोत्र पूछता है कि इन्हें जानने वाली आधारभूत चेतना क्या है। पृथ्वी आदि तत्त्व देह-जगत् की ओर संकेत करते हैं, आधुनिक भौतिक विज्ञान की पूर्ण सूची नहीं हैं। ‘शिवोऽहम्’ यहाँ अहंकार की बड़ाई नहीं, अद्वैत के संदर्भ में चैतन्य-स्वरूप की पहचान का कथन है।

2

न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः । न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायू चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ २ ॥

अर्थ

मेरा वास्तविक स्वरूप न प्राण नामक जीवन-क्रिया में सीमित है, न पाँच प्रकार के प्राणों में; न सात शरीरधातुओं में, न पाँच कोशों में। बोलना, पकड़ना, चलना तथा प्रजनन और उत्सर्जन की क्रियाएँ भी अंतिम आत्म-परिचय नहीं हैं। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ।

व्याख्या

दूसरे श्लोक में विचार इन्द्रियों से भीतर की शारीरिक क्रियाओं तक पहुँचता है। पञ्चवायु जीवन-गतियों का पारम्परिक विभाजन है; सप्तधातु भारतीय चिकित्सा परम्परा में वर्णित शरीर के सात घटक हैं; पञ्चकोश वेदान्त में अनुभव के पाँच आवरणों का विवेचन है। इन संकल्पनाओं को आधुनिक शरीर-विज्ञान का सटीक पर्याय नहीं मानना चाहिए। वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ और पायु कर्मेन्द्रियों से जुड़ी क्रियाओं का संकेत करते हैं। देह की देखभाल आवश्यक है, पर उसका कोई एक कार्य आत्मा की सम्पूर्ण परिभाषा नहीं बन जाता। इस संस्करण के शब्दरूप किसी अन्य गायन-पाठ से मिलाकर नहीं बदले गए हैं।

3

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः । न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ३ ॥

अर्थ

परम आत्मस्वरूप से राग-द्वेष, लोभ-मोह, मद और ईर्ष्या का सम्बन्ध नहीं है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—जीवन के चार पुरुषार्थ—भी उस स्वभाव की अंतिम पहचान नहीं हैं। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ।

व्याख्या

पहले राग-द्वेष और लोभ-मोह जैसी प्रवृत्तियों का निषेध है, फिर चार पुरुषार्थों का—धर्म (सम्यक् आचरण), अर्थ (जीविका-साधन), काम (जीवन की उचित इच्छाएँ) और मोक्ष (मुक्ति)। इसका आशय धर्म, परिवार या सामाजिक कर्तव्य छोड़ देना नहीं है। व्यवहार में ये लक्ष्य महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं; अद्वैत-दृष्टि में चेतना का मूल स्वरूप किसी इच्छा या उपलब्धि से निर्मित नहीं होता। यहाँ तक कि मोक्ष भी कोई बाहरी वस्तु नहीं जिसे शुद्ध आत्मा खरीदकर प्राप्त करे। यह विवेक की शिक्षा है, नैतिक उदासीनता की अनुमति नहीं।

4

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः । अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ४ ॥

अर्थ

मेरा शुद्ध आत्मस्वरूप न पुण्य-पाप है, न सुख-दुःख; न किसी मन्त्र, तीर्थ, वेद या यज्ञ के रूप में सीमित है। मैं भोगने की प्रक्रिया, भोग्य पदार्थ और अलग व्यक्तिगत भोक्ता—इनमें से किसी एक में बँधा हुआ नहीं हूँ। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ।

व्याख्या

यहाँ नैतिक श्रेणियों से धार्मिक साधनों और अनुभव की तीन भूमिकाओं तक विचार पहुँचता है। पुण्य-पाप व्यवहारिक जीवन में उत्तरदायित्व का बोध करा सकते हैं; अध्ययन, मन्त्र और पूजा भी साधना के साधन हो सकते हैं। पर इन्हें जानने वाली चेतना इन साधनों के समान नहीं है। भोजन–भोज्य–भोक्ता में अनुभव की क्रिया, उसका विषय और अनुभव करने वाला व्यक्ति आते हैं। अद्वैत इन तीनों को परम सत्य के स्तर पर स्वतंत्र मानने पर प्रश्न उठाता है। इससे वास्तविक भूख-दुःख की उपेक्षा या किसी धार्मिक परम्परा का अनादर नहीं निकलता।

5

न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः पिता नैव मे नैव माता च जन्म । न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ५ ॥

अर्थ

आत्मस्वरूप मृत्यु, भय या जन्म-आधारित भेद से परिभाषित नहीं होता। पिता-माता, जन्म, सम्बन्धी, मित्र, गुरु और शिष्य जैसी पहचानें भी उसका अंतिम स्वरूप नहीं हैं। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ। पाठ-सावधानी: इस मुद्रण में ‘माता च जन्म’ है; दूसरे पाठ में ‘माता न जन्म’ मिलता है। मुद्रित वाक्य की व्याकरणिक व्याख्या पुनः जाँच के अधीन है।

व्याख्या

सम्बन्ध हमारे व्यवहारिक जीवन में वास्तविक कर्तव्य और स्नेह पैदा करते हैं, फिर भी वे व्यक्ति की परम पहचान नहीं हैं। जातिभेद का उल्लेख जन्म पर आधारित विभेद का है; उससे किसी तरह के सामाजिक भेदभाव का समर्थन नहीं निकलता। चुने हुए मुद्रित पृष्ठ पर ‘न मृत्युर्न शङ्का’ मिलता है, जबकि लोकप्रिय गायन में ‘न मे मृत्युशङ्का’ सुनाई देता है। उसी पृष्ठ पर ‘माता च जन्म’ छपा है; बहुत-से अन्य पाठ ‘माता न जन्म’ देते हैं। यहाँ सहज लगने वाला पाठ चुपचाप प्रतिस्थापित नहीं किया गया है। व्याकरण और आशय पर विशेषज्ञ-समीक्षा अभी आवश्यक है।

6

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम् । न चासाङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ६ ॥

अर्थ

मैं विकल्पों में बँधने वाला और किसी सीमित आकार से परिभाषित होने वाला नहीं हूँ; श्लोक इन्द्रिय-सीमाओं से परे व्यापक चैतन्य की बात करता है। मुक्ति या कोई ज्ञेय वस्तु भी उस आत्मस्वरूप की अंतिम सीमा नहीं है। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ। पाठ-सावधानी: मुद्रित ‘न चासाङ्गतं’ की व्याकरणिक व्याख्या अभी निश्चित नहीं है; इसे किसी मनचाहे अर्थ से नहीं भरा गया है।

व्याख्या

निर्विकल्प का तात्पर्य विभाजन करने वाले संकल्प-विकल्पों से परे स्वरूप है; निराकार का आशय किसी एक सीमित रूप में न बँधना है। ‘विभुत्वाच्च…’ चेतना की व्यापकता की ओर संकेत करता है, किसी व्यक्ति की सर्वशक्तिमत्ता की घोषणा नहीं करता। तीसरी पंक्ति में महत्त्वपूर्ण पाठभेद हैं। चुने हुए मुद्रण में कठिन ‘न चासाङ्गतं … न मेयः’ है; प्रचलित पाठ में ‘सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः’ भी मिलता है। दोनों को मिलाकर नया श्लोक नहीं बनाया गया। ‘असाङ्गतं’ के रूप और उसके दीर्घ स्वर की पुनः जाँच चाहिए, इसलिए कृत्रिम शब्दार्थ नहीं दिया गया है। शिवोऽहम् का कथन दैनिक उत्तरदायित्वों से पलायन का आदेश नहीं है।

7
विषय-सूची पर लौटें

॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं निर्वाणषट्कं सम्पूर्णम् ॥

अर्थ

मुद्रित समाप्ति-वाक्य में निर्वाणषट्कम् का पाठ पूर्ण बताया गया है और उसकी रचना शङ्कराचार्य से परम्परानुसार जोड़ी गई है।

व्याख्या

यह ग्रन्थ का समाप्ति-वाक्य है; ऐतिहासिक लेखकत्व का स्वतंत्र प्रमाण नहीं और छह श्लोकों की गिनती में शामिल नहीं है।

सन्दर्भ और उपयोग

पाठ-स्रोत: बृहत्स्तोत्ररत्नाकर, प्रथम भाग, मुद्रित पृ. २५५–२५६ (स्कैन पृष्ठ २६३–२६४)। छह श्लोक और अलग समाप्ति-वाक्य। मूल संस्कृत पाठ पहले है; इसमें पाठभेद तथा कुछ शंकास्पद मुद्रित रूप हैं, अतः यह शोधाधीन संपादकीय प्रारूप है। 1

समाप्ति-वाक्य

सरल अर्थ: मुद्रित समाप्ति-वाक्य में निर्वाणषट्कम् का पाठ पूर्ण बताया गया है और उसकी रचना शङ्कराचार्य से परम्परानुसार जोड़ी गई है। व्याख्या: यह ग्रन्थ का समाप्ति-वाक्य है; ऐतिहासिक लेखकत्व का स्वतंत्र प्रमाण नहीं और छह श्लोकों की गिनती में शामिल नहीं है। 1

निर्वाणषट्कम् क्या समझाता है? यह छह श्लोकों की आत्म-विवेचनात्मक रचना है। ‘मैं क्या-क्या नहीं हूँ’ से आरम्भ होकर प्रत्येक श्लोक ‘चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्’ पर लौटता है। षट्कम् यानी छह का समूह, जबकि निर्वाण यहाँ बन्धन-बोध के क्षय और आत्मज्ञान के सन्दर्भ में आता है। यह किसी दर्शन की पूरी पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि संक्षिप्त चिन्तन-काव्य है।

शिवोऽहम् को कैसे समझें? इस अद्वैत प्रसंग में ‘शिव’ चेतना के पवित्र, अविभाज्य स्वरूप का सूचक है। इसे बोलने वाला व्यक्ति अपने अहंकार को सर्वज्ञ या सर्वशक्तिमान नहीं घोषित करता। परम्पराओं में शिव की व्यक्तिगत भक्ति और निराकार-अद्वैत का चिन्तन साथ भी रह सकता है; इनके आपसी सम्बन्ध की व्याख्या अलग सम्प्रदायों में अलग होगी।

जीवन के व्यवहार से टकराव नहीं

‘न धर्मो’, ‘न गुरुर्न शिष्यः’ जैसे वाक्यों का अर्थ नैतिक कर्तव्य छोड़ना, शिक्षकों का अनादर करना या सामाजिक सम्बन्धों को तोड़ना नहीं है। स्तोत्र आत्मस्वरूप के परम स्तर का विवेचन करता है; व्यवहार में करुणा, सत्यनिष्ठा और अन्य जिम्मेदारियाँ यथावत् हैं।

प्रमुख पाठभेद और संपादकीय सीमाएँ

  • दूसरा श्लोक: ‘वाक्पाणिपादं’ बनाम ‘वाक्पाणिपादौ’; मुद्रित रूप सुरक्षित है। टंकण में ‘पचवायु-ने’ जैसा दोष दिखाई देता है, जबकि स्कैन में ‘पञ्चवायुर्न वा’ का आधार मिलता है। 124
  • पाँचवाँ श्लोक: ‘न मृत्युर्न शङ्का’ के स्थान पर ‘न मे मृत्युशङ्का’ प्रचलित है। ‘माता च जन्म’ के बदले अन्य स्रोत ‘माता न जन्म’ देते हैं। यहाँ चुना गया असामान्य मुद्रित पाठ बदला नहीं गया। 134
  • छठा श्लोक: ‘विभुत्वाच्च’ बनाम ‘विभुर्व्याप्य’; ‘न चासाङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः’ बनाम ‘सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः’। मुद्रित तीसरी पंक्ति की भाषा और दीर्घ स्वर को लेकर अनिश्चितता है। 134
  • मुखड़ा: प्रथम श्लोक के बाद मुद्रित संक्षेप का स्पष्ट विस्तार पाठकों की सुविधा के लिए किया गया है; उसे मूल मुद्रण का अक्षरशः रूप न समझें। 1

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निर्वाणषट्कम् में कितने श्लोक हैं? इस चुने हुए पाठ में छह श्लोक और अलग समाप्ति-वाक्य है; समापन को सातवाँ श्लोक नहीं गिना गया। क्या निर्वाणषट्कम् और आत्मषट्कम् अलग रचनाएँ हैं? इन दोनों नामों का प्रयोग अक्सर इसी छह-श्लोकी पाठ के लिए होता है; लेकिन पुस्तकें और पाठ-परम्पराएँ अलग शब्दरूप रख सकती हैं। क्या ‘शिवोऽहम्’ का अर्थ मेरा व्यक्तिगत अहंकार भगवान बन गया है? नहीं। यहाँ अद्वैत दृष्टि से शुद्ध चेतना की पहचान व्यक्त होती है; यह व्यक्तिगत शक्ति या पद का दावा नहीं। क्या यह किसी विशेष मंत्र-जप विधि का निर्देश देता है? नहीं। इस लेख में केवल ऐतिहासिक पाठ, अर्थ और विवेचन है; दीक्षा, संख्या, अनुष्ठान या फल-सिद्धि का निर्देश नहीं। क्या यह निश्चित रूप से आदि शङ्कराचार्य की रचना है? मुद्रण उन्हें श्रेय देता है, पर ऐतिहासिक लेखकत्व का स्वतंत्र प्रमाण स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं है।

स्रोत, श्रेय और लाइसेंस

संस्थापक द्वारा अधिकृत शैक्षिक प्रस्तुति। स्वतंत्र पाठ और विशेषज्ञ समीक्षा अधूरी है। यह दीक्षा या व्यक्तिगत अनुष्ठान की अनुमति नहीं है।

Inherited traditional wording; selected witness cited below. Romanization, meanings and explanations prepared for ShivGoraksh. No modern source translation, page layout or recording reproduced.

संस्करण का मूल रोमन पाठ

इस संस्करण में दिया गया रोमन पाठ, सरल रोमन प्रदर्शन से पहले की वर्तनी और शब्द-रूपों सहित।

  1. 1

    manobuddhyahaṅkāracittāni nāhaṃ na ca śrotrajihve na ca ghrāṇanetre | na ca vyoma bhūmir na tejo na vāyuḥ cidānandarūpaḥ śivo'haṃ śivo'ham || 1 ||

  2. 2

    na ca prāṇasaṃjño na vai pañcavāyuḥ na vā saptadhātur na vā pañcakośaḥ | na vākpāṇipādaṃ na copasthapāyū cidānandarūpaḥ śivo'haṃ śivo'ham || 2 ||

  3. 3

    na me dveṣarāgau na me lobhamohau mado naiva me naiva mātsaryabhāvaḥ | na dharmo na cārtho na kāmo na mokṣaḥ cidānandarūpaḥ śivo'haṃ śivo'ham || 3 ||

  4. 4

    na puṇyaṃ na pāpaṃ na saukhyaṃ na duḥkhaṃ na mantro na tīrthaṃ na vedā na yajñāḥ | ahaṃ bhojanaṃ naiva bhojyaṃ na bhoktā cidānandarūpaḥ śivo'haṃ śivo'ham || 4 ||

  5. 5

    na mṛtyur na śaṅkā na me jātibhedaḥ pitā naiva me naiva mātā ca janma | na bandhur na mitraṃ gurur naiva śiṣyaḥ cidānandarūpaḥ śivo'haṃ śivo'ham || 5 ||

  6. 6

    ahaṃ nirvikalpo nirākārarūpo vibhutvāc ca sarvatra sarvendriyāṇām | na cāsāṅgataṃ naiva muktir na meyaḥ cidānandarūpaḥ śivo'haṃ śivo'ham || 6 ||

  7. 7

    || iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ nirvāṇaṣaṭkaṃ sampūrṇam ||

स्रोत, पाठ-परम्परा और लेखकत्व

इस संपादकीय पाठ का आधार बृहत्स्तोत्ररत्नाकर, प्रथम भाग, पृष्ठ २५५–२५६ का उपलब्ध स्कैन है। इन दोनों पृष्ठों में छह क्रमांकित श्लोक हैं और अंत में ‘शङ्कराचार्यविरचितं’ का पारम्परिक श्रेय है। मुद्रित ग्रन्थ की तिथि अभी अनिर्णीत है—कॉमन्स के अभिलेख में १९३३ और संबद्ध विकिस्रोत लेख में १९५३ का संकेत मिलता है। अलग १९१० का संकलन भी उपलब्ध है; उसे इस पाठ में मिलाया नहीं गया। 156

शङ्कराचार्य को रचनाकार मानना पारम्परिक मान्यता है, इस संस्करण में सिद्ध ऐतिहासिक निष्कर्ष नहीं। अन्य शाङ्कर-नामांकित रचनाओं की प्रामाणिकता पर हुए शोध से यह सामान्य सावधानी पुष्ट होती है कि केवल मुद्रित श्रेय पर्याप्त नहीं; किन्तु वह शोध इस विशेष स्तोत्र का लेखकत्व तय नहीं करता। 7

स्रोत-सूची और प्रकाशन-स्थिति

  • 1, 2 — मुद्रित दो पृष्ठ और संगत विकिस्रोत पृष्ठ।
  • 3, 4, 5 — अलग पाठों और पाठभेदों की तुलना; इनके आधुनिक अनुवाद/टिप्पणियाँ यहाँ पुनर्प्रकाशित नहीं हैं।
  • 6 — कॉमन्स फ़ाइल के लाइसेंस/तिथि-सम्बन्धी अभिलेख।
  • 7 — शाङ्कर-नामांकित ग्रन्थों के लेखकत्व पर व्यापक शैक्षिक संदर्भ, इस स्तोत्र का सीधा निर्णय नहीं।
पदों पर अतिरिक्त टिप्पणी

नीचे दिए अर्थ और व्याख्याएँ शिवगोरक्ष के लिए नए लिखे गए हैं; स्रोत-सिद्ध मूल पाठ से अलग व्याख्यात्मक परत हैं।

श्लोक 1 · shloka-001

सरल अर्थ: मैं मन, बुद्धि, अहंकार या चित्त की बदलती वृत्तियाँ नहीं हूँ। कान, जिह्वा, नाक और आँखों से भी मेरा वास्तविक स्वरूप सीमित नहीं है; न मैं आकाश, पृथ्वी, अग्नि या वायु हूँ। मेरा मूल स्वरूप चैतन्य और आनन्द है—शिवोऽहम्। व्याख्या: आरम्भ का निषेध शरीर या मन के अस्तित्व को नकारना नहीं है। मन अनुभवों को ग्रहण करता है, बुद्धि विवेक करती है, अहंकार उन्हें ‘मेरे’ होने का रंग देता है और चित्त में संस्कार-स्मृतियाँ एवं अन्य मानसिक वृत्तियाँ आती हैं। ये सब देखे और बदले जा सकने वाले अनुभव हैं; स्तोत्र पूछता है कि इन्हें जानने वाली आधारभूत चेतना क्या है। पृथ्वी आदि तत्त्व देह-जगत् की ओर संकेत करते हैं, आधुनिक भौतिक विज्ञान की पूर्ण सूची नहीं हैं। ‘शिवोऽहम्’ यहाँ अहंकार की बड़ाई नहीं, अद्वैत के संदर्भ में चैतन्य-स्वरूप की पहचान का कथन है। मुख्य पद: manas / मनस् · buddhi / बुद्धि · ahaṅkāra / अहंकार · cidānanda / चिदानन्द। 1

श्लोक 2 · shloka-002

सरल अर्थ: मेरा वास्तविक स्वरूप न प्राण नामक जीवन-क्रिया में सीमित है, न पाँच प्रकार के प्राणों में; न सात शरीरधातुओं में, न पाँच कोशों में। बोलना, पकड़ना, चलना तथा प्रजनन और उत्सर्जन की क्रियाएँ भी अंतिम आत्म-परिचय नहीं हैं। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ। व्याख्या: दूसरे श्लोक में विचार इन्द्रियों से भीतर की शारीरिक क्रियाओं तक पहुँचता है। पञ्चवायु जीवन-गतियों का पारम्परिक विभाजन है; सप्तधातु भारतीय चिकित्सा परम्परा में वर्णित शरीर के सात घटक हैं; पञ्चकोश वेदान्त में अनुभव के पाँच आवरणों का विवेचन है। इन संकल्पनाओं को आधुनिक शरीर-विज्ञान का सटीक पर्याय नहीं मानना चाहिए। वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ और पायु कर्मेन्द्रियों से जुड़ी क्रियाओं का संकेत करते हैं। देह की देखभाल आवश्यक है, पर उसका कोई एक कार्य आत्मा की सम्पूर्ण परिभाषा नहीं बन जाता। इस संस्करण के शब्दरूप किसी अन्य गायन-पाठ से मिलाकर नहीं बदले गए हैं। मुख्य पद: pañcavāyu / पञ्चवायु · saptadhātu / सप्तधातु · pañcakośa / पञ्चकोश · upastha/pāyu / उपस्थ-पायु। 1

श्लोक 3 · shloka-003

सरल अर्थ: परम आत्मस्वरूप से राग-द्वेष, लोभ-मोह, मद और ईर्ष्या का सम्बन्ध नहीं है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—जीवन के चार पुरुषार्थ—भी उस स्वभाव की अंतिम पहचान नहीं हैं। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ। व्याख्या: पहले राग-द्वेष और लोभ-मोह जैसी प्रवृत्तियों का निषेध है, फिर चार पुरुषार्थों का—धर्म (सम्यक् आचरण), अर्थ (जीविका-साधन), काम (जीवन की उचित इच्छाएँ) और मोक्ष (मुक्ति)। इसका आशय धर्म, परिवार या सामाजिक कर्तव्य छोड़ देना नहीं है। व्यवहार में ये लक्ष्य महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं; अद्वैत-दृष्टि में चेतना का मूल स्वरूप किसी इच्छा या उपलब्धि से निर्मित नहीं होता। यहाँ तक कि मोक्ष भी कोई बाहरी वस्तु नहीं जिसे शुद्ध आत्मा खरीदकर प्राप्त करे। यह विवेक की शिक्षा है, नैतिक उदासीनता की अनुमति नहीं। मुख्य पद: rāga–dveṣa / राग–द्वेष · mātsarya / मात्सर्य · puruṣārtha / पुरुषार्थ · moksha / मोक्ष। rāga–dveṣa / राग–द्वेष · mātsarya / मात्सर्य · puruṣārtha / पुरुषार्थ · mokṣa / मोक्ष। 1

श्लोक 4 · shloka-004

सरल अर्थ: मेरा शुद्ध आत्मस्वरूप न पुण्य-पाप है, न सुख-दुःख; न किसी मन्त्र, तीर्थ, वेद या यज्ञ के रूप में सीमित है। मैं भोगने की प्रक्रिया, भोग्य पदार्थ और अलग व्यक्तिगत भोक्ता—इनमें से किसी एक में बँधा हुआ नहीं हूँ। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ। व्याख्या: यहाँ नैतिक श्रेणियों से धार्मिक साधनों और अनुभव की तीन भूमिकाओं तक विचार पहुँचता है। पुण्य-पाप व्यवहारिक जीवन में उत्तरदायित्व का बोध करा सकते हैं; अध्ययन, मन्त्र और पूजा भी साधना के साधन हो सकते हैं। पर इन्हें जानने वाली चेतना इन साधनों के समान नहीं है। भोजन–भोज्य–भोक्ता में अनुभव की क्रिया, उसका विषय और अनुभव करने वाला व्यक्ति आते हैं। अद्वैत इन तीनों को परम सत्य के स्तर पर स्वतंत्र मानने पर प्रश्न उठाता है। इससे वास्तविक भूख-दुःख की उपेक्षा या किसी धार्मिक परम्परा का अनादर नहीं निकलता। मुख्य पद: puṇya/pāpa / पुण्य-पाप · tīrtha / तीर्थ · yajña / यज्ञ · bhoktā / भोक्ता। 1

श्लोक 5 · shloka-005

सरल अर्थ: आत्मस्वरूप मृत्यु, भय या जन्म-आधारित भेद से परिभाषित नहीं होता। पिता-माता, जन्म, सम्बन्धी, मित्र, गुरु और शिष्य जैसी पहचानें भी उसका अंतिम स्वरूप नहीं हैं। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ। पाठ-सावधानी: इस मुद्रण में ‘माता च जन्म’ है; दूसरे पाठ में ‘माता न जन्म’ मिलता है। मुद्रित वाक्य की व्याकरणिक व्याख्या पुनः जाँच के अधीन है। व्याख्या: सम्बन्ध हमारे व्यवहारिक जीवन में वास्तविक कर्तव्य और स्नेह पैदा करते हैं, फिर भी वे व्यक्ति की परम पहचान नहीं हैं। जातिभेद का उल्लेख जन्म पर आधारित विभेद का है; उससे किसी तरह के सामाजिक भेदभाव का समर्थन नहीं निकलता। चुने हुए मुद्रित पृष्ठ पर ‘न मृत्युर्न शङ्का’ मिलता है, जबकि लोकप्रिय गायन में ‘न मे मृत्युशङ्का’ सुनाई देता है। उसी पृष्ठ पर ‘माता च जन्म’ छपा है; बहुत-से अन्य पाठ ‘माता न जन्म’ देते हैं। यहाँ सहज लगने वाला पाठ चुपचाप प्रतिस्थापित नहीं किया गया है। व्याकरण और आशय पर विशेषज्ञ-समीक्षा अभी आवश्यक है। मुख्य पद: mṛtyu / मृत्यु · jātibheda / जातिभेद · guru/śiṣya / गुरु-शिष्य। 1 (अन्य पाठों से तुलना: 3, 4)

श्लोक 6 · shloka-006

सरल अर्थ: मैं विकल्पों में बँधने वाला और किसी सीमित आकार से परिभाषित होने वाला नहीं हूँ; श्लोक इन्द्रिय-सीमाओं से परे व्यापक चैतन्य की बात करता है। मुक्ति या कोई ज्ञेय वस्तु भी उस आत्मस्वरूप की अंतिम सीमा नहीं है। मैं चिदानन्दस्वरूप शिव हूँ। पाठ-सावधानी: मुद्रित ‘न चासाङ्गतं’ की व्याकरणिक व्याख्या अभी निश्चित नहीं है; इसे किसी मनचाहे अर्थ से नहीं भरा गया है। व्याख्या: निर्विकल्प का तात्पर्य विभाजन करने वाले संकल्प-विकल्पों से परे स्वरूप है; निराकार का आशय किसी एक सीमित रूप में न बँधना है। ‘विभुत्वाच्च…’ चेतना की व्यापकता की ओर संकेत करता है, किसी व्यक्ति की सर्वशक्तिमत्ता की घोषणा नहीं करता। तीसरी पंक्ति में महत्त्वपूर्ण पाठभेद हैं। चुने हुए मुद्रण में कठिन ‘न चासाङ्गतं … न मेयः’ है; प्रचलित पाठ में ‘सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः’ भी मिलता है। दोनों को मिलाकर नया श्लोक नहीं बनाया गया। ‘असाङ्गतं’ के रूप और उसके दीर्घ स्वर की पुनः जाँच चाहिए, इसलिए कृत्रिम शब्दार्थ नहीं दिया गया है। शिवोऽहम् का कथन दैनिक उत्तरदायित्वों से पलायन का आदेश नहीं है। मुख्य पद: nirvikalpa / निर्विकल्प · nirākāra / निराकार · meya / मेय। 1 (अन्य पाठों से तुलना: 3, 4)

  1. Bṛhatstotraratnākaraḥ, First Part (scanned print), Nirvāṇaṣaṭkam · स्रोत खोलें
  2. Sanskrit Wikisource proofread page 263 of Bṛhatstotraratnākara, Part I · स्रोत खोलें
  3. Nirvāṇaṣaṭkam, independent Sanskrit Wikisource electronic reading · स्रोत खोलें
  4. Ātmaṣaṭkam / Nirvāṇaṣaṭkam (Sanskrit Documents) · स्रोत खोलें
  5. Nirvāṇaṣaṭkam, Ambuda digital transcription of 1910 Vāṇī Vilāsa Press Works of Śaṅkarācārya, vol.16 · स्रोत खोलें
  6. Wikimedia Commons digital file page for Bṛhatstotraratnākara, Part I · स्रोत खोलें
  7. Research on the authenticity of prose writings attributed to Śaṅkara · स्रोत खोलें