मुखड़ा और प्रत्येक पद का अर्थ एवं व्याख्या
मुखड़ा
सरल भावार्थ: जगत के रक्षक के रूप में पूजित गोरक्ष की, सदाशिव से जुड़े भक्तिभाव के साथ, आरती उतारने का आह्वान। व्याख्या: मुखड़ा में गोरक्षनाथ को जगत के रक्षक के रूप में नमन किया गया है। “सदाशिव बाले” स्थानीय गायन-रूप का शब्दसमूह है; इसे बिना परंपरागत भाषिक पुष्टि के निश्चित संबंधसूचक अर्थ देना उचित नहीं होगा।
पद १
सरल भावार्थ: भक्त गोरक्षनाथ को कानों के कुण्डल धारण किए, पशुचर्म के आसन पर ध्यानस्थ और सदाशिव-संबद्ध तेजस्वी रूप में देखता है; फिर उनकी शरण की प्रार्थना करता है। व्याख्या: कुण्डल नाथ योगियों की कुछ परंपराओं में पहचानी जाने वाली छवि है। “बाघम्बर छाला” पशुचर्म-आसन की काव्यात्मक छवि प्रस्तुत करता है, न कि पाठकों के लिए कोई आचरण-निर्देश। “आला”, “बाला” और “करोड़ों भूप” को लोक-काव्य की ध्वनि सहित सुरक्षित रखा गया है; उनका निश्चित शब्दार्थ परंपरा-विशेष समीक्षा का विषय है।
पद २
सरल भावार्थ: सुनहरी जटाओं, मस्तक पर अर्धचंद्र, गेरुए वस्त्र, त्रिपुण्ड और रुद्राक्ष-माला से गोरक्षनाथ का शैव योगी-स्वरूप चित्रित होता है। व्याख्या: अर्धचंद्र, त्रिपुण्ड और रुद्राक्ष शैव उपासना की प्रसिद्ध प्रतीक-छवियाँ हैं। यहाँ उनका प्रयोग भक्तिमय रूप-वर्णन है, किसी ऐतिहासिक चित्र का प्रमाण नहीं। “जती पती लाजे” का पदरूप पाठ-परंपरा के अनुसार और जाँचा जा सकता है; इसे बदलकर नया कथन नहीं बनाया गया है।
पद ३
सरल भावार्थ: इस पद में भस्म, डमरू की मधुर ध्वनि, योगी की खड़ाऊँ तथा देव, मनुष्य और मुनियों की मुग्ध दृष्टि के माध्यम से गोरक्षनाथ को योग-शिक्षक मानकर प्रणाम किया गया है। व्याख्या: भस्म और डमरू शैव भक्ति की परिचित छवियाँ हैं। “गले विच नाद” में “विच” जैसा लोकभाषिक रूप सुरक्षित है; “नाद” का यहाँ किस विशिष्ट वस्तु या अनुभव से संबंध है, यह परंपरा की समीक्षा माँगता है। “योग के शिक्षक” श्रद्धासूचक संबोधन है, समस्त योग-परंपराओं की उत्पत्ति का ऐतिहासिक दावा नहीं।
पद ४
सरल भावार्थ: यह पद गुरु की महिमा को अलौकिक काव्य-भाषा में रखता है: सिद्धों के प्रिय योगी-अवधूत, आयोनिज जन्म की परंपरागत छवि, पंचमहाभूत और कालातीतता की उपमा। व्याख्या: “पार्वती पार नहीं पावे” तथा राम-कृष्ण की स्तुति यहाँ भक्तिकाव्य की अतिशयोक्ति हैं; इन्हें देवताओं की ऐतिहासिक भेंट या किसी एक मत की सर्वमान्य श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। “आयोनिज” परंपरागत जन्म-कथा का पद है, जैविक तथ्य का दावा नहीं। “काल के भक्षक” मृत्यु-भय से परे आध्यात्मिक महिमा की छवि है।
पद ५
सरल भावार्थ: समापन पद में गोरक्षनाथ को योगज्ञान का अमृत बाँटने वाले, सिद्ध-संतों की शरण और विनयी याचना सुनने वाले गुरु के रूप में पुकारा गया है; भक्त “पारस” का नाम लेकर अरज करता है। व्याख्या: झोली और “योगामृत” ज्ञान एवं करुणापूर्ण उपदेश की रूपक-छवियाँ हैं; इस पद से कोई गुप्त साधना-विधि नहीं निकलती। “पारस” संभवतः भक्त या रचनाकार का नाम-चिह्न हो सकता है, किंतु इससे वास्तविक लेखक और उनके अधिकार निश्चित नहीं होते। “आरज” और “भिक्षूक” पाठक-प्रदत्त लोकपाठ के अनुसार रखे गए हैं।
यह पाठ किस अर्थ में संपूर्ण है? यह संस्करण उपयोगकर्ता द्वारा स्मरण से उपलब्ध कराई गई पूर्ण आरती को प्रस्तुत करता है: मुखड़ा और पाँच क्रमांकित पद। पाठक को अब केवल पहली पंक्ति नहीं, बल्कि उसी परंपरागत गान का संपूर्ण दिया गया पाठ मिल रहा है। “संपूर्ण” का अर्थ यहाँ इस विशिष्ट प्रस्तुत लोकपाठ की पूर्णता है, सभी क्षेत्रों के सभी पाठ-भेदों की अंतिम प्रामाणिकता नहीं। 8
यह गोरक्षनाथ आरती का योगदानकर्ता द्वारा दिया गया पाठ है। इसकी प्राचीनतम रचना-तिथि और मूल रचनाकार का निर्धारण नहीं हुआ है।
आरती की मुख्य भाव-छवियाँ
पहले पद में ध्यानस्थ योगी, कुण्डल और पशुचर्म-आसन की छवि है। दूसरे पद में जटा, अर्धचंद्र, त्रिपुण्ड तथा रुद्राक्ष से शैव स्वरूप उभरता है। तीसरे पद में भस्म, डमरू और योग-शिक्षक का स्तवन है। चौथे पद में अवधूत, आयोनिज, पंचमहाभूत और काल की उपमाएँ गुरु-महिमा को अलौकिक काव्य-भाषा देती हैं। पाँचवाँ पद झोली, योगामृत, सिद्ध-संतों और भक्त के विनम्र निवेदन के साथ समाप्त होता है। यह भक्तिपरक रूप-वर्णन है; गोरक्षनाथ का निश्चित ऐतिहासिक जीवनवृत्त नहीं। कुण्डल, भस्म, खड़ाऊ और झोली जैसी वस्तुओं की छवियाँ नाथ योगियों की कुछ परंपराओं और व्यापक शैव तपस्वी संसार से संबंधित मानी जा सकती हैं। अलग-अलग नाथ समुदाय इनके अर्थ भिन्न रूप से समझ सकते हैं। नाथ परंपरा के ऐतिहासिक अध्ययन के लिए वेरोनिक बुयिये तथा जेम्स मालिनसन की शोध सामग्री केवल पृष्ठभूमि देती है, गीत-पाठ की प्रत्यक्ष स्रोत-सिद्धि नहीं। 4 5
लोकभाषा के विशेष शब्द
- सदाशिव बाले: उपयोगकर्ता के पाठ के अनुसार सुरक्षित है; “बाले” का एकमात्र निश्चित भाषिक अर्थ अभी आरोपित नहीं किया गया।
- आला, बाला, जती पती, गले विच नाद: कुछ क्षेत्रीय या लोकगान-संबद्ध रूप प्रतीत होते हैं। बिना पुष्टि नया संस्कृतनिष्ठ पद नहीं बनाया गया।
- बाघम्बर छाला: योगी के आसन से संबंधित पशुचर्म-छवि; इसका वर्णन अभ्यास-निर्देश नहीं है।
- आयोनिज पुत: परंपरागत चमत्कारिक जन्म-वर्णन की भाषा, ऐतिहासिक या जैविक सिद्ध तथ्य नहीं।
- योगामृत: अध्यात्म-ज्ञान और अनुग्रह की रूपक-छवि।
- पारस: पाँचवें पद में नाम-चिह्न है; यह संभवतः किसी गायक, भक्त या रचयिता से संबद्ध हो, किंतु इससे लेखक का प्रमाण नहीं मिलता। 8
उपयोगकर्ता के नए संशोधनों के अनुसार अद्यतन पाठ स्रोत-सूची में सुरक्षित है; पहले भेजा गया पाठ पूर्व संस्करण में उपलब्ध है। मुख्य देवनागरी प्रस्तुति में वर्तनी, विराम और अंतराल भी साफ किए गए हैं। विशेषतः “Damroo” को “डमरू” और “Shikshak” को “शिक्षक” लिखा गया है। नए पद या पंक्तियाँ नहीं जोड़ी गईं। 8
रचना का श्रेय और शिवगोरक्ष संस्करण
मूल आरती के कवि/रचयिता का नाम निश्चित नहीं है। यह आरती शिवगोरक्ष की ओर से पहली बार लिखी गई नई मौलिक रचना होने का दावा नहीं करती। उपयोगकर्ता द्वारा दिया गया स्मृतिपाठ इसका मूल आधार है। शिवगोरक्ष इस पाठ के संपादित संस्करण, रोमन लिप्यंतरण, दोनों भाषाओं के अर्थ और अपनी व्याख्या का श्रेय ले सकता है। पाँचवें पद का “पारस” नाम लेखक का संकेत हो सकता है, लेकिन पहचान और अधिकारों की जाँच अभी बाकी है। 8
दूसरी गोरखनाथ आरतियों से अंतर
गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर की प्रकाशित संध्या आरती “ॐ गुरुजी शिव जय जय गोरक्ष देवा” से शुरू होती है। “जय गोरख देवा” नाम से प्रचलित अन्य आरती भी भिन्न है। इन्हें इस लोकपाठ में जोड़कर कृत्रिम मिश्रित रचना नहीं बनाई गई है। 2 3
सार्वजनिक भक्ति और साधना की सीमा
यह सामग्री सार्वजनिक आरती-पाठ, श्रद्धा और सांस्कृतिक अध्ययन के लिए लिखी गई है। इससे नाथ संप्रदाय की दीक्षा, गोपनीय मंत्र, प्राणायाम के उन्नत अभ्यास या सिद्धियों की विधियाँ स्वतः प्राप्त नहीं होतीं। दिव्य सुरक्षा, रोगमुक्ति अथवा मोक्ष का निश्चित आश्वासन भी नहीं किया जाता। परंपरा-विशेष के विधि-विधान योग्य गुरु से ही समझे जाने चाहिए।




